ब्रह्म खण्ड · अध्याय 81
लोहासुर-माहात्म्य-सम्पूर्ति वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.81.1)
सूत उवाच । अतः परं शृणुध्वं हि लोहासुरविचेष्टितम् बलेः पुत्रशतस्यापि कथयिष्यामि विश्रुतम्
sūta uvāca ataḥ paraṁ śṛṇudhvaṁ hi lohāsuraviceṣṭitam baleḥ putraśatasyāpi kathayiṣyāmi viśrutam
सूत जी ने कहा — अब आगे लोहासुर के चरित्र को सुनो; मैं बलि के सौ पुत्रों की भी प्रसिद्ध कथा सुनाऊँगा।
श्लोक 2 (skanda.3.81.2)
यथा तौ भ्रातरौ वृद्धौ प्रापतुः स्थानमुत्तमम्। तदा प्रभृति वैराग्यं दैत्यो लोहासुरे दधौ
yathā tau bhrātarau vṛddhau prāpatuḥ sthānam uttamam tadā prabhṛti vairāgyaṁ daityo lohāsure dadhau
जब वे दोनों वयोवृद्ध भ्राता उस उत्तम स्थान को प्राप्त हुए, तभी से लोहासुर नामक दैत्य के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया।
श्लोक 3 (skanda.3.81.3)
किं करोमि क्व गच्छामि तपसे स्थानमुत्तमम् यस्य पारं न जानंति देवता मुनयो नराः
kiṁ karomi kva gacchāmi tapase sthānam uttamam yasya pāraṁ na jānanti devatā munayo narāḥ
'मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, तपस्या के लिए ऐसा उत्तम स्थान — जिसकी थाह देवता, मुनि अथवा मनुष्य भी नहीं जानते?'
श्लोक 4 (skanda.3.81.4)
को मयाऽऽराध्यतां देवो हृदि चिंतयते भृशम् इति चिंतयतस्तस्य मतिर्जाता महात्मनः
ko mayārādhyatāṁ devo hṛdi cintayate bhṛśam iti cintayatas tasya matir jātā mahātmanaḥ
'मुझे किस देवता की आराधना करनी चाहिए?' — इस प्रकार वह हृदय में गहन चिंतन करने लगा। इस प्रकार सोचते-सोचते उस महात्मा के मन में एक विचार उत्पन्न हुआ।
श्लोक 5 (skanda.3.81.5)
दधौ गंगां स्वशीर्षेण पुष्पवंतौ च नेत्रयोः हृदा नारायणं देवं ब्रह्माणं कटिमंडले
dadhau gaṅgāṁ svaśīrṣeṇa puṣpavantau ca netrayoḥ hṛdā nārāyaṇaṁ devaṁ brahmāṇaṁ kaṭimaṇḍale
'जो अपने शीश पर गंगा को धारण करते हैं, अपने दोनों नेत्रों में सूर्य-चंद्र को धारण करते हैं, अपने हृदय में देव नारायण को और अपने कटि-प्रदेश में ब्रह्मा को धारण करते हैं —'
श्लोक 6 (skanda.3.81.6)
इंद्राद्या देवताः सर्वे यद्देहे प्रतिबिंबिताः प्रपश्यंति तदात्मानं भास्करः सलिले यथा
indrādyā devatāḥ sarve yaddehe pratibiṁbitāḥ prapaśyanti tadātmānaṁ bhāskaraḥ salile yathā
'— जिनके शरीर में इन्द्र आदि समस्त देवता प्रतिबिंबित होकर अपने-आपको उसी प्रकार देखते हैं जैसे सूर्य जल में स्वयं को देखता है —'
श्लोक 7 (skanda.3.81.7)
तमेवाराधयिष्यामि निरंजनमकल्मषः एवं कृत्वा मतिं दैत्य स्तपस्तेपे सुदुष्करम् भीतो जन्मभयाद्घोराद्दुष्करं यन्महात्मभिः
tam evārādhayiṣyāmi niraṁjanam akalmaṣaḥ evaṁ kṛtvā matiṁ daitya stapas tepe suduṣkaram bhīto janmabhayād ghorād duṣkaraṁ yan mahātmabhiḥ
'— उसी की आराधना मैं करूँगा, जो निष्कलंक और निर्मल है।' इस प्रकार निश्चय कर वह दैत्य, घोर जन्म-भय से भयभीत होकर, अत्यंत कठिन तपस्या करने लगा — ऐसी तपस्या जो महात्माओं के लिए भी दुष्कर है।
श्लोक 8 (skanda.3.81.8)
अंबुभक्षो वायुभक्षः शीर्णपर्णाशनस्तथा दिव्यं वर्षशतं साग्रं यदा तेपे महत्तपः ततस्तुतोष भगवांस्त्रिशूलवरधारकः
aṁbubhakṣo vāyubhakṣaḥ śīrṇaparṇāśanas tathā divyaṁ varṣaśataṁ sāgraṁ yadā tepe mahattapaḥ tatas tutoṣa bhagavāṁs triśūlavaradhārakaḥ
जल पीकर, फिर केवल वायु पीकर, फिर सूखे पत्ते खाकर — इस प्रकार जब उसने सौ से भी अधिक दिव्य वर्षों तक महान् तप किया, तब उत्तम त्रिशूलधारी भगवान संतुष्ट हुए।
श्लोक 9 (skanda.3.81.9)
ईश्वर उवाच । वरं वृणीष्व भद्रं ते मनसा यदभीप्सितम् लोहासुर मया देयं तव नास्ति तपोबलात्
īśvara uvāca varaṁ vṛṇīṣva bhadraṁ te manasā yad abhīpsitam lohāsura mayā deyaṁ tava nāsti tapobalāt
ईश्वर ने कहा — 'वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मन में जो कुछ भी चाहते हो, वह माँगो। हे लोहासुर! तुम्हारे तपोबल के कारण ऐसा कुछ नहीं जो मैं तुम्हें न दे सकूँ।'
श्लोक 10 (skanda.3.81.10)
इत्युक्तो दानवस्तत्र शंकराग्रे वचोऽब्रवीत्
ity ukto dānavas tatra śaṁkarāgre vaco 'bravīt
यह सुनकर वह दानव शंकर के समक्ष यह वचन बोला।
श्लोक 11 (skanda.3.81.11)
लोहासुर उवाच । यदि तुष्टोसि देवेश वरमेकं वृणोम्यहम् शरीरस्याजरत्वं च मा मृत्योरपि मे भयम्
lohāsura uvāca yadi tuṣṭo 'si deveśa varam ekaṁ vṛṇomy aham śarīrasyājaratvaṁ ca mā mṛtyor api me bhayam
लोहासुर ने कहा — 'हे देवेश! यदि आप संतुष्ट हैं, तो मैं एक ही वर माँगता हूँ — मेरी देह कभी जरा को प्राप्त न हो, और मुझे मृत्यु का भी भय न रहे।'
श्लोक 12 (skanda.3.81.12)
जन्मन्यस्मिन्प्रभो भूयात्स्थातव्यं हृदये मम एवमस्तु शिवः प्राह तत्र तं दानवेश्वरम्
janmany asmin prabho bhūyāt sthātavyaṁ hṛdaye mama evam astu śivaḥ prāha tatra taṁ dānaveśvaram
'— और हे प्रभो! इसी जन्म में आप मेरे हृदय में सदा निवास करें।' 'ऐसा ही हो' — शिव ने वहाँ उस दानवेश्वर से कहा।
श्लोक 13 (skanda.3.81.13)
शर्वलब्धवरो दैवात्पुनस्तेपे महत्तपः रम्ये सरस्वतीतीरे तरणाय भवार्णवात्
śarvalabdhavaro daivāt punas tepe mahattapaḥ ramye sarasvatītīre taraṇāya bhavārṇavāt
शिव से वर प्राप्तकर वह भाग्यवश पुनः संसार-सागर से तरने के लिए सरस्वती के रम्य तट पर महान् तप करने लगा।
श्लोक 14 (skanda.3.81.14)
वत्सराणां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च शंकते भगवानिंद्रो भीतस्तस्य तपोबलात्
vatsarāṇāṁ sahasrāṇi prayutāny arbudāni ca śaṅkate bhagavān indro bhītas tasya tapobalāt
हज़ारों, लाखों और करोड़ों वर्षों तक (उसने तप किया); उसके तपोबल से भयभीत होकर भगवान इन्द्र को आशंका होने लगी।
श्लोक 15 (skanda.3.81.15)
मा मे पदच्युतिर्भूयाद्दैत्यल्लोहासुरात्क्वचित् मघवान्गुप्तरूपेण समेत्याश्रमकाननम्
mā me padacyutir bhūyād daityal lohāsurāt kvacit maghavān guptarūpeṇa sametyāśramakānanam
'दैत्य लोहासुर के कारण मुझे कभी अपने पद से च्युत न होना पड़े' — यह सोचकर मघवान (इन्द्र) गुप्त रूप धारण कर उस आश्रम-वन में जा पहुँचे।
श्लोक 16 (skanda.3.81.16)
तपोभंगं प्रकुरुते कंपयित्वा महासुरम् ताडयंति शरीरे तं मुष्टिभिस्तीक्ष्णकर्कशैः
tapobhaṅgaṁ prakurute kaṁpayitvā mahāsuram tāḍayanti śarīre taṁ muṣṭibhis tīkṣṇakarkaśaiḥ
वे उस महान् असुर को कंपाकर उसका तप भंग करने लगे, तीक्ष्ण और कठोर मुक्कों से उसके शरीर पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 17 (skanda.3.81.17)
अथ तेन च दैत्येन ध्यानमुत्सृज्य वीक्षितम् इंद्रेण तत्कृतं सर्वं तपोबलविनाशनम्
atha tena ca daityena dhyānam utsṛjya vīkṣitam indreṇa tat kṛtaṁ sarvaṁ tapobalavināśanam
तब उस दैत्य ने ध्यान त्यागकर देखा कि इन्द्र ने यह सब उसके तपोबल का नाश करने के लिए ही किया है।
श्लोक 18 (skanda.3.81.18)
तस्य तैरभवद्युद्धमिंद्राद्यैरथ कर्क्कशैः एकस्य बहुभिः सार्द्धं देवास्ते तेन संयुगे
tasya tair abhavad yuddham indrādyair atha karkaśaiḥ ekasya bahubhiḥ sārdhaṁ devās te tena saṁyuge
तब उसका इन्द्र आदि उग्र देवताओं के साथ भीषण युद्ध छिड़ गया — उस एक के विरुद्ध वे अनेक देवता उस समर में लड़ने लगे।
श्लोक 19 (skanda.3.81.19)
रुधिराक्लिन्नदेहा वै प्रहारैर्जर्जरीकृताः केशवं शरणं प्राप्ता त्राहि त्राहीति भाषिणः
rudhirākliannadehā vai prahārair jarjarīkṛtāḥ keśavaṁ śaraṇaṁ prāptā trāhi trāhīti bhāṣiṇaḥ
अपने शरीर को रक्त से लथपथ और आघातों से जर्जर पाकर, वे देवगण केशव की शरण में गये और 'रक्षा करो, रक्षा करो' कहने लगे।
श्लोक 20 (skanda.3.81.20)
सूत उवाच । देवानां वाक्यमाकर्ण्य वासुदेवो जनार्दनः युयुधे केशवस्तेन युद्धे वर्षशतं किल
sūta uvāca devānāṁ vākyam ākarṇya vāsudevo janārdanaḥ yuyudhe keśavas tena yuddhe varṣaśataṁ kila
सूत जी ने कहा — देवताओं की पुकार सुनकर वासुदेव जनार्दन स्वयं युद्ध में उतरे; केशव उससे सौ वर्षों तक युद्ध करते रहे, ऐसा कहा जाता है।
श्लोक 21 (skanda.3.81.21)
ततो नारायणं तत्र जिगाय स वरोर्जितः अथ नारायणो देवो जितो लोहासुरेण तु
tato nārāyaṇaṁ tatra jigāya sa varorjitaḥ atha nārāyaṇo devo jito lohāsureṇa tu
तब उस वर से बलशाली दैत्य ने नारायण को भी वहाँ पराजित कर दिया; इस प्रकार देव नारायण लोहासुर से पराजित हो गये।
श्लोक 22 (skanda.3.81.22)
मंत्रयामास रुद्रेण ब्रह्मणा च पुनःपुनः मीमांसित्वा त्रयो देवाः पुनर्युद्धसमुद्यमम्
mantrayāmāsa rudreṇa brahmaṇā ca punaḥ punaḥ mīmāṁsitvā trayo devāḥ punaryuddhasamudyamam
उन्होंने रुद्र और ब्रह्मा के साथ बार-बार परामर्श किया; तीनों देवों ने विचार-विमर्श कर पुनः युद्ध का उद्यम करने का निश्चय किया।
श्लोक 23 (skanda.3.81.23)
लोहासुरस्य दैत्यस्य वपुर्दृष्ट्वा पुनर्नवम् महदासीत्पुनर्युद्धं दैत्यकेशवयोस्ततः
lohāsurasya daityasya vapur dṛṣṭvā punarnavam mahad āsīt punaryuddhaṁ daityakeśavayos tataḥ
दैत्य लोहासुर के शरीर को पुनः नवीन पाकर, दैत्य और केशव के बीच पुनः एक महान् युद्ध हुआ।
श्लोक 24 (skanda.3.81.24)
न ममार यदा दैत्यो विष्णुना प्रभविष्णुना तरसा तं केशवोऽपि पातयामास भूतले
na mamāra yadā daityo viṣṇunā prabhaviṣṇunā tarasā taṁ keśavo 'pi pātayāmāsa bhūtale
जब प्रभावशाली विष्णु के हाथों भी वह दैत्य मरा नहीं, तब केशव ने बलपूर्वक उसे धरती पर पटक दिया।
श्लोक 25 (skanda.3.81.25)
उत्तानं पतितं दृष्ट्वा पिनाकी परमेश्वरः दधार हृदये तस्य स्वरूपं रूपवर्जितः
uttānaṁ patitaṁ dṛṣṭvā pinākī parameśvaraḥ dadhāra hṛdaye tasya svarūpaṁ rūpavarjitaḥ
उसे चित्त पड़ा देखकर पिनाकधारी परमेश्वर, यद्यपि स्वयं रूपरहित हैं, फिर भी अपने रूप को उसके हृदय में धारण कर लिया।
श्लोक 26 (skanda.3.81.26)
कण्ठे तस्थौ ततो ब्रह्मा तस्य लोहासुरस्य च चरणौ पीडयामास स्वस्थित्या पुरुषोत्तमः
kaṇṭhe tasthau tato brahmā tasya lohāsurasya ca caraṇau pīḍayāmāsa svasthityā puruṣottamaḥ
फिर ब्रह्मा उस लोहासुर के कंठ में जा बैठे, और पुरुषोत्तम विष्णु ने अपनी स्थिति के द्वारा उसके दोनों चरणों को दबाये रखा।
श्लोक 27 (skanda.3.81.27)
अथ दैत्यः समुत्तस्थौ भृशं बद्धोपि भूतले दृष्ट्वोत्थितं ततो दैत्यं पातयंतं सुरोत्तमान् उवाच दिव्यया वाचा विरंचिः कमलासनः
atha daityaḥ samuttasthau bhṛśaṁ baddho 'pi bhūtale dṛṣṭvotthitaṁ tato daityaṁ pātayantaṁ surottamān uvāca divyayā vācā viraṁciḥ kamalāsanaḥ
फिर भी वह दैत्य, धरती पर इतना दृढ़ता से रोके जाने पर भी, फिर उठ खड़ा हुआ। उठकर देवश्रेष्ठों को पछाड़ते हुए दैत्य को देखकर, कमलासन ब्रह्मा दिव्य वाणी में बोल उठे —
श्लोक 28 (skanda.3.81.28)
ब्रह्मोवाच । लोहासुर सदा रक्ष वाचोधर्ममभीक्ष्णशः त्वया यत्प्रार्थितं रुद्रात्तदेव समुपस्थितम्
brahmovāca lohāsura sadā rakṣa vāco dharmam abhīkṣṇaśaḥ tvayā yat prārthitaṁ rudrāt tad eva samupasthitam
ब्रह्मा ने कहा — 'हे लोहासुर! सदा वाणी के धर्म की रक्षा करो। तुमने रुद्र से जो कुछ माँगा था, वही अब पूरा हुआ है —'
श्लोक 29 (skanda.3.81.29)
अहं विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयोऽमी सुरसत्तमाः त्वद्देहमुपवेक्ष्यामो यावदाभूतसंप्लवम्
ahaṁ viṣṇuś ca rudraś ca trayo 'mī surasattamāḥ tvaddeham upavekṣyāmo yāvad ābhūtasaṁplavam
'— मैं, विष्णु और रुद्र — हम तीनों श्रेष्ठ देव — प्रलय होने तक तुम्हारे शरीर में निवास करेंगे।'
श्लोक 30 (skanda.3.81.30)
दानवेश शिवप्राप्तिर्भावभक्त्यैव जायते शिवं चालयितुं बुद्धिः कथं तव भविष्यति
dānaveśa śivaprāptir bhāvabhaktyaiva jāyate śivaṁ cālayituṁ buddhiḥ kathaṁ tava bhaviṣyati
'हे दानवेश! शिव की प्राप्ति केवल भावपूर्ण भक्ति से ही होती है। तुम्हारे मन में शिव को हिलाने की बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई?'
श्लोक 31 (skanda.3.81.31)
अचलांश्चालयेद्यस्तु प्रासादान्ब्राह्मणान्पुरान् अचिरेणैव कालेन पातकेनैव लिप्यते
acalāṁś cālayed yas tu prāsādān brāhmaṇān purān acireṇaiva kālena pātakenaiva lipyate
'जो कोई अचल वस्तुओं को — मंदिरों, ब्राह्मणों, नगरों को — डिगाने का प्रयत्न करता है, वह शीघ्र ही पाप से लिप्त हो जाता है।'
श्लोक 32 (skanda.3.81.32)
श्मशानवत्परित्याज्यः सत्यधर्मबहिष्कृतः सत्यवागसि भद्रं ते मा विचालय देवताः
śmaśānavat parityājyaḥ satyadharmabahiṣkṛtaḥ satyavāg asi bhadraṁ te mā vicālaya devatāḥ
'ऐसा व्यक्ति श्मशान के समान त्याज्य होता है, सत्य-धर्म से बहिष्कृत हो जाता है। तुम सत्यवादी हो, तुम्हारा कल्याण हो — देवताओं को मत डिगाओ।'
श्लोक 33 (skanda.3.81.33)
येन यातास्तु पितरो येन याताः पितामहाः तेन मार्गेण गंतव्यं न चोल्लंघ्या सतां गतिः
yena yātās tu pitaro yena yātāḥ pitāmahāḥ tena mārgeṇa gantavyaṁ na collaṅghyā satāṁ gatiḥ
'जिस मार्ग से पिता गये और जिस मार्ग से पितामह गये, उसी मार्ग से चलना चाहिए; सज्जनों की गति का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।'
श्लोक 34 (skanda.3.81.34)
दानवेश पिता ते हि ददौ लोकत्रयं हरेः वाक्पाशबद्धः पाताले राज्यं चक्रे महीपतिः
dānaveśa pitā te hi dadau lokatrayaṁ hareḥ vākpāśabaddhaḥ pātāle rājyaṁ cakre mahīpatiḥ
'हे दानवेश! तुम्हारे ही पिता ने हरि को तीनों लोक दान कर दिए थे; अपने ही वचन के बंधन में बंधकर उस राजा ने पाताल में राज्य किया।'
श्लोक 35 (skanda.3.81.35)
तथा त्वमसि वाक्पाशाच्छिवभक्तिसमन्वितः भूतले तिष्ठ दैत्येंद्र मा वाग्वैकल्प्यमाप्नुहि
tathā tvam asi vākpāśāc chivabhaktisamanvitaḥ bhūtale tiṣṭha daityendra mā vāgvaikalpyam āpnuhi
'उसी प्रकार तुम भी वचन के बंधन में बंधे हो, शिवभक्ति से युक्त — हे दैत्येंद्र! भूतल पर ही रहो, अपनी वाणी से कभी विचलित न होओ।'
श्लोक 36 (skanda.3.81.36)
वरांस्ते च प्रदास्यामो मा विचाल्या हि देवताः
varāṁs te ca pradāsyāmo mā vicālyā hi devatāḥ
'और हम तुम्हें वर प्रदान करेंगे — केवल देवताओं को डिगाने का प्रयत्न मत करो।'
श्लोक 37 (skanda.3.81.37)
व्यास उवाच । तच्छ्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं संतुष्टो दानवेश्वरः प्राह प्रसन्नया वाचा ब्रह्माणं केशवं हरम्
vyāsa uvāca tac chrutvā brahmaṇo vākyaṁ saṁtuṣṭo dānaveśvaraḥ prāha prasannayā vācā brahmāṇaṁ keśavaṁ haram
व्यास जी ने कहा — ब्रह्मा का यह वचन सुनकर संतुष्ट होकर दानवेश्वर ने प्रसन्न वाणी में ब्रह्मा, केशव और हर को संबोधित किया।
श्लोक 38 (skanda.3.81.38)
लोहासुर उवाच । वाक्पाशबद्धस्तिष्ठामि न पुनर्भवतां बले ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयोऽमी सुरसत्तमाः
lohāsura uvāca vākpāśabaddhas tiṣṭhāmi na punar bhavatāṁ bale brahmā viṣṇuś ca rudraś ca trayo 'mī surasattamāḥ
लोहासुर ने कहा — 'मैं अपने वचन के बंधन में बंधकर रहूँगा, अब आपके बल के विरुद्ध नहीं जाऊँगा। यदि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र — ये तीनों देवश्रेष्ठ —'
श्लोक 39 (skanda.3.81.39)
स्थास्यंति चेच्छरीरे मे किं न लब्धं मया ततः इदं कलेवरं मे हि समारूढं त्रिभिः सुरैः
sthāsyanti cec charīre me kiṁ na labdhaṁ mayā tataḥ idaṁ kalevaraṁ me hi samārūḍhaṁ tribhiḥ suraiḥ
'— मेरे शरीर में निवास करें, तो फिर मैंने क्या नहीं पा लिया? मेरा यह शरीर तीनों देवताओं द्वारा अधिष्ठित हो चुका है —'
श्लोक 40 (skanda.3.81.40)
भूम्यां भवतु विख्यातं मत्प्रभावात्सुरोत्तमाः
bhūmyāṁ bhavatu vikhyātaṁ matprabhāvāt surottamāḥ
'— हे देवश्रेष्ठो! मेरे प्रभाव से यह पृथ्वी पर विख्यात हो जाए।'
श्लोक 41 (skanda.3.81.41)
लोहासुरस्य वाक्येन हर्षिता स्त्रिदशास्त्रयः ददुः प्रत्युत्तरं तस्मै ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः
lohāsurasya vākyena harṣitā stridaśās trayaḥ daduḥ pratyuttaraṁ tasmai brahmaviṣṇumaheśvarāḥ
लोहासुर के इन वचनों से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर — तीनों देवों ने उसे प्रत्युत्तर दिया।
श्लोक 42 (skanda.3.81.42)
सत्यवाक्पाशतो दैत्यो न सत्याच्चलितो यतः तेन सत्येन संतुष्टा दास्या मस्ते मनीप्सितम्
satyavākpāśato daityo na satyāc calito yataḥ tena satyena saṁtuṣṭā dāsyāmas te manīpsitam
'चूँकि यह दैत्य सत्य-वचन के बंधन से कभी सत्य से विचलित नहीं हुआ, इसी सत्यनिष्ठा से संतुष्ट होकर हम तुम्हें मनोवांछित फल प्रदान करेंगे।'
श्लोक 43 (skanda.3.81.43)
ब्रह्मोवाच । यथा स्नानं ब्रह्मज्ञानं देहत्यागो गयातले धर्मारण्ये तथा दैत्य धर्म्मेश्वरपुरः स्थिते
brahmovāca yathā snānaṁ brahmajñānaṁ dehatyāgo gayātale dharmāraṇye tathā daitya dharmeśvarapuraḥ sthite
ब्रह्मा ने कहा — 'जैसे गया में स्नान ब्रह्मज्ञान के समान है और वहाँ देह-त्याग मुक्तिदायक है, हे दैत्य! उसी प्रकार धर्मारण्य में, धर्मेश्वर के आगे —'
श्लोक 44 (skanda.3.81.44)
कूपे तर्प्पणकं श्राद्धं शंसंति पितरो दिवि संतुष्टा पिंडदानेन गयायां पितरो यथा
kūpe tarpaṇakaṁ śrāddhaṁ śaṁsanti pitaro divi saṁtuṣṭā piṇḍadānena gayāyāṁ pitaro yathā
'— जैसे गया में पिण्डदान से संतुष्ट होकर पितर स्वर्ग में उसकी प्रशंसा करते हैं, वैसे ही यहाँ भी कूप में किया गया तर्पण और श्राद्ध पितरों द्वारा सराहा जाएगा —'
श्लोक 45 (skanda.3.81.45)
वांछंति तर्प्पणं कूपे धर्मारण्ये विशुद्धये दानवेन्द्र शरीरं तु तीर्थं तव भविष्यति
vāñchanti tarpaṇaṁ kūpe dharmāraṇye viśuddhaye dānavendra śarīraṁ tu tīrthaṁ tava bhaviṣyati
'— पितर धर्मारण्य के कूप में तर्पण की कामना करेंगे, अपनी विशुद्धि के लिए। हे दानवेन्द्र! तुम्हारा शरीर स्वयं एक तीर्थ बन जाएगा।'
श्लोक 46 (skanda.3.81.46)
एकविंशतिवारांस्तु गयायां तर्प्पणे कृते पितॄणां या परा तृप्तिर्जायते दानवाधिप
ekaviṁśativārāṁs tu gayāyāṁ tarpaṇe kṛte pitṝṇāṁ yā parā tṛptir jāyate dānavādhipa
'हे दानवाधिप! गया में इक्कीस बार तर्पण करने से पितरों को जो परम तृप्ति मिलती है —'
श्लोक 47 (skanda.3.81.47)
धर्मेश्वर पुरस्तात्सा त्वेकदा पितृतर्पणात् स्याद्वै दशगुणा तृप्तिः सत्यमेव न संशयः
dharmeśvara purastāt sā tv ekadā pitṛtarpaṇāt syād vai daśaguṇā tṛptiḥ satyam eva na saṁśayaḥ
'— वही तृप्ति, दस गुनी होकर, धर्मेश्वर के आगे एक ही बार पितृ-तर्पण करने से प्राप्त होगी — यह सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 48 (skanda.3.81.48)
पितॄणां पिंडदानेन अक्षय्या तृप्तिरस्त्विह शिवरूपांतराले वै धर्मारण्ये धरातले
pitṝṇāṁ piṇḍadānena akṣayyā tṛptir astv iha śivarūpāntarāle vai dharmāraṇye dharātale
'यहाँ पिण्डदान से पितरों को अक्षय तृप्ति प्राप्त हो — यहाँ, धर्मारण्य की इस भूमि पर, शिव-स्वरूप के मध्य में।'
श्लोक 49 (skanda.3.81.49)
श्रद्धयैव हि कर्त्तव्याः श्राद्धपिंडोदकक्रियाः तथांतराले चास्माकं श्राद्धपिंडौ विशेषतः
śraddhayaiva hi kartavyāḥ śrāddhapiṇḍodakakriyāḥ tathāntarāle cāsmākaṁ śrāddhapiṇḍau viśeṣataḥ
'श्राद्ध, पिण्ड और जल की क्रियाएँ श्रद्धापूर्वक ही करनी चाहिए; विशेषकर हम तीनों के मध्य किया गया श्राद्ध और पिण्डदान विशेष फलदायी होगा।'
श्लोक 50 (skanda.3.81.50)
तथा शरीरे क्वापिस्तांचिंता सत्योऽसि सुव्रत। त्रिषु लोकेषु दुष्प्रापं सत्यं ते दिवि संस्थितम्
tathā śarīre kvāpi stāṁ cintā satyo 'si suvrata triṣu lokeṣu duṣprāpaṁ satyaṁ te divi saṁsthitam
'तुम्हारे शरीर में हम कहीं भी रहें, यह चिंता का विषय न हो — तुम सत्यनिष्ठ हो, हे उत्तम-व्रत! तीनों लोकों में दुर्लभ तुम्हारा यह सत्य स्वर्ग में भी प्रतिष्ठित है।'
श्लोक 51 (skanda.3.81.51)
अस्मद्वाक्येन सत्येन तत्तथाऽसुरसत्तम गयासमधिकं तीर्थं तव जातं धरातले
asmadvākyena satyena tat tathāsurasattama gayāsamadhikaṁ tīrthaṁ tava jātaṁ dharātale
'हे असुरश्रेष्ठ! हमारे इस सत्य-वचन से ऐसा ही होगा — तुम्हारा शरीर पृथ्वी पर गया से भी बढ़कर एक तीर्थ बन गया है।'
श्लोक 52 (skanda.3.81.52)
अस्माकं स्थितिरव्यग्रा तव देहे न संशयः सत्यपाशेन बद्धाः स्म दृढमेव त्वयाऽनघ
asmākaṁ sthitir avyagrā tava dehe na saṁśayaḥ satyapāśena baddhāḥ sma dṛḍham eva tvayānagha
'हे निष्पाप! तुम्हारे शरीर में हमारा स्थिर निवास निःसंदेह होगा; हम तुम्हारे सत्य-बंधन से ही दृढ़तापूर्वक बंधे हैं।'
श्लोक 53 (skanda.3.81.53)
विष्णुरुवाच । गयाप्रयाग कस्याऽपि फलं समधिकं स्मृतम् चतुर्द्दश्याममावास्यां लोहयष्ट्यां पिंडदानतः
viṣṇur uvāca gayāprayāga kasyāpi phalaṁ samadhikaṁ smṛtam caturddaśyām amāvāsyāṁ lohayaṣṭyāṁ piṇḍadānataḥ
विष्णु ने कहा — गया और प्रयाग से भी अधिक फल, चतुर्दशी और अमावस्या को लोहयष्टि में किये गये पिण्डदान से प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है।
श्लोक 54 (skanda.3.81.54)
बलिपुत्रस्य सत्येन महती तृप्तिरत्र हि मा कुरुष्वात्र संदेहं तव देहे स्थिता स्वयम्
baliputrasya satyena mahatī tṛptir atra hi mā kuruṣvātra saṁdehaṁ tava dehe sthitā svayam
बलि के पुत्र की सत्यनिष्ठा के कारण यहाँ महान् तृप्ति प्राप्त होगी; इसमें संदेह मत करो — हम स्वयं तुम्हारे शरीर में निवास करते हैं।
श्लोक 55 (skanda.3.81.55)
सरस्वती पुण्यतोया ब्रह्मलोकात्प्रयात्युत प्लावयिष्यंति देहांगं मया सह सुसंगता
sarasvatī puṇyatoyā brahmalokāt prayāty uta plāvayiṣyanti dehāṅgaṁ mayā saha susaṁgatā
पुण्य-जल वाली सरस्वती ब्रह्मलोक से यहाँ प्रवाहित होती हैं; मेरे साथ मिलकर वे तुम्हारे शरीर के अंग-अंग को स्नान कराएँगी।
श्लोक 56 (skanda.3.81.56)
यथो वै द्वारका वासो देवस्तत्र महेश्वरः विरंचिर्यत्र तीर्थानि त्रीण्येतानि धरातले
yatho vai dvārakā vāso devas tatra maheśvaraḥ viraṁcir yatra tīrthāni trīṇy etāni dharātale
जैसे द्वारका मेरा निवास-स्थान है, वहाँ महेश्वर भी विराजते हैं, और ब्रह्मा भी — पृथ्वी पर ये तीन तीर्थ यहाँ विद्यमान हैं।
श्लोक 57 (skanda.3.81.57)
भविष्यति च पाताले स्वर्गलोके यमक्षये विख्यातान्यसुरश्रेष्ठ पि तॄणां तृप्तिहेतवे
bhaviṣyati ca pātāle svargaloke yamakṣaye vikhyātāny asuraśreṣṭha pitṝṇāṁ tṛptihetave
हे असुरश्रेष्ठ! ये पाताल में, स्वर्गलोक में, तथा यमलोक में भी विख्यात होंगे, पितरों की तृप्ति के हेतु।
श्लोक 58 (skanda.3.81.58)
अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि गाथां पितृकृतां पराम् आज्ञारूपां हि पुत्राणां तां शृणुष्व ममानघ
athānyat saṁpravakṣyāmi gāthāṁ pitṛkṛtāṁ parām ājñārūpāṁ hi putrāṇāṁ tāṁ śṛṇuṣva mamānagha
हे निष्पाप! अब मैं एक और श्रेष्ठ गाथा सुनाऊँगा जो स्वयं पितरों द्वारा रची गई है, जो पुत्रों के लिए आदेश-रूप है — उसे मुझसे सुनो।
श्लोक 59 (skanda.3.81.59)
पितर ऊचुः । शंकरस्याग्रतः स्थानं रुद्रलोकप्रदं नृणाम् पापदेहविशुद्ध्यर्थं पापेनोपहतात्मनाम्
pitara ūcuḥ śaṁkarasyāgrataḥ sthānaṁ rudralokapradaṁ nṛṇām pāpadehaviśuddhyarthaṁ pāpenopahatātmanām
पितरों ने कहा — शंकर के आगे यह स्थान मनुष्यों को रुद्रलोक प्रदान करने वाला है; यह पापों से आहत आत्मा वालों की पापमयी देह की शुद्धि के लिए है।
श्लोक 60 (skanda.3.81.60)
तस्मिंस्तिलोदकेनापि सद्गतिं यांति तर्पिताः पितरो नरकाद्वा पि सुपुत्रेण सुमेधसा
tasmiṁs tilodakenāpi sadgatiṁ yānti tarpitāḥ pitaro narakād vāpi suputreṇa sumedhasā
वहाँ केवल तिल-जल से भी तर्पित पितर सद्गति को प्राप्त होते हैं, यहाँ तक कि एक सुयोग्य और बुद्धिमान पुत्र द्वारा नरक से भी पितर उद्धार पा जाते हैं।
श्लोक 61 (skanda.3.81.61)
गोप्रदानं प्रशंसंति तत्तत्र पितृमुक्तये पित्रादिकान्समुद्दिश्य दृष्ट्वा रुद्रं च केशवम् तिलपिण्याकपिंडेन तृप्तिं यास्यामहे पराम्
gopradānaṁ praśaṁsanti tat tatra pitṛmuktaye pitrādikān samuddiśya dṛṣṭvā rudraṁ ca keśavam tilapiṇyākapiṇḍena tṛptiṁ yāsyāmahe parām
वहाँ पितरों की मुक्ति के लिए वे गो-दान की प्रशंसा करते हैं। 'अपने पिता आदि पूर्वजों को लक्ष्य कर, रुद्र और केशव का दर्शन कर, हम तिल-खली के पिण्ड से परम तृप्ति को प्राप्त होंगे' —
श्लोक 62 (skanda.3.81.62)
चतुर्द्दश्याममावास्यां तथा च पितृतर्पणम् अज्ञातगोत्रजन्मानस्तेभ्यः पिंडांस्तु निर्वपेत्
caturdaśyām amāvāsyāṁ tathā ca pitṛtarpaṇam ajñātagotrajanmānas tebhyaḥ piṇḍāṁs tu nirvapet
— इसी प्रकार चतुर्दशी और अमावस्या को पितृ-तर्पण करना चाहिए; तथा जिनका गोत्र अज्ञात हो, उन्हें भी पिण्ड अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 63 (skanda.3.81.63)
तेऽपि यांति दिवं सर्वे ये दत्त इति श्रुतिः
te 'pi yānti divaṁ sarve ye datta iti śrutiḥ
जिन सबको यह पिण्ड दिया जाता है, वे सब भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं — ऐसा श्रुति कहती है।
श्लोक 64 (skanda.3.81.64)
सर्वकार्याणि संत्यज्य मानवैः पुण्यमीप्सुभिः प्राप्ते भाद्रपदे मासे गंतव्या लोहयिष्टका अज्ञातगोत्रनाम्ना तु पिंड मंत्रमिमं शृणु
sarvakāryāṇi saṁtyajya mānavaiḥ puṇyam īpsubhiḥ prāpte bhādrapade māse gantavyā lohayaṣṭikā ajñātagotranāmnā tu piṇḍa mantram imaṁ śṛṇu
अन्य सब कार्यों को त्यागकर, पुण्यार्थी मनुष्यों को भाद्रपद मास आने पर लोहयष्टिका जाना चाहिए। अज्ञात-गोत्र के नाम पर दिये जाने वाले पिण्ड का यह मंत्र सुनो —
श्लोक 65 (skanda.3.81.65)
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च अतीतगोत्रजास्तेभ्यः पिंडोऽयमुपतिष्ठतु
pitṛvaṁśe mṛtā ye ca mātṛvaṁśe tathaiva ca atītagotrajās tebhyaḥ piṇḍo 'yam upatiṣṭhatu
'जो पितृ-वंश में और जो मातृ-वंश में भी मृत हुए हैं, उन अतीत-गोत्रज पितरों के लिए यह पिण्ड उपस्थित हो।'
श्लोक 66 (skanda.3.81.66)
विष्णुरुवाच । अनेनैव तु मंत्रेण ममाग्रे सुरसत्तम क्षीणे चंद्रे चतुर्द्दश्यां नभस्ये पिंडमाहरेत्
viṣṇur uvāca anenaiva tu mantreṇa mamāgre surasattama kṣīṇe candre caturddaśyāṁ nabhasye piṇḍam āharet
विष्णु ने कहा — हे देवश्रेष्ठ! इसी मंत्र के साथ, मेरे समक्ष, भाद्रपद (नभस्य) मास के कृष्ण-पक्ष की चतुर्दशी को क्षीण चन्द्रमा के समय पिण्ड अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 67 (skanda.3.81.67)
पितॄणामक्षया तृप्तिर्भविष्यति न संशयः तिलपिण्याकपिंडेन पितरो मोक्षमाप्नुयुः
pitṝṇām akṣayā tṛptir bhaviṣyati na saṁśayaḥ tilapiṇyākapiṇḍena pitaro mokṣam āpnuyuḥ
इससे पितरों को अक्षय तृप्ति प्राप्त होगी, इसमें संदेह नहीं; तिल-खली के पिण्ड से पितर मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे।
श्लोक 68 (skanda.3.81.68)
क्षणत्रयविनिर्मुक्ता मानवा जगतीतले भविष्यंति न संदेहो लोहयष्ट्या तिलतर्पणे
kṣaṇatrayavinirmuktā mānavā jagatītale bhaviṣyanti na saṁdeho lohayaṣṭyā tilatarpaṇe
लोहयष्टिका में तिल-तर्पण करने से पृथ्वी के मनुष्य तीनों (ऋणों) से मुक्त हो जाएँगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 69 (skanda.3.81.69)
स्नात्वा यः कुरुते चात्र पितृपिंडोदकक्रियाः पितरस्तस्य तृप्यंति यावद्ब्रह्मदिवानिशम्
snātvā yaḥ kurute cātra pitṛpiṇḍodakakriyāḥ pitaras tasya tṛpyanti yāvad brahmadivāniśam
जो यहाँ स्नान कर पितृ-पिण्ड और जलदान की क्रियाएँ सम्पन्न करता है, उसके पितर ब्रह्मा के दिन-रात्रि पर्यंत तृप्त रहते हैं।
श्लोक 70 (skanda.3.81.70)
अमावास्यादिनं प्राप्य मासि भाद्रपदे सरः ब्रह्मणो यष्टिकायां तु यः कुर्यात्पितृतर्पणम्
amāvāsyādinaṁ prāpya māsi bhādrapade saraḥ brahmaṇo yaṣṭikāyāṁ tu yaḥ kuryāt pitṛtarpaṇam
जो भाद्रपद मास में अमावस्या के दिन ब्रह्मा की यष्टिका में पितृ-तर्पण करता है —
श्लोक 71 (skanda.3.81.71)
पितरस्तस्य तृप्ताः स्युर्यावदाभूतसंप्लवम् तेषां प्रसन्नो भगवानादिदेवो महेश्वरः
pitaras tasya tṛptāḥ syur yāvad ābhūtasaṁplavam teṣāṁ prasanno bhagavān ādidevo maheśvaraḥ
— उसके पितर प्रलय होने तक तृप्त रहते हैं, और आदिदेव भगवान महेश्वर भी उन पर प्रसन्न हो जाते हैं।
श्लोक 72 (skanda.3.81.72)
अस्य तीर्थस्य यात्रायां मतिर्येषां भविष्यति गोक्षीरेण तिलैः श्वेतैः स्नात्वा सारस्वते जले
asya tīrthasya yātrāyāṁ matir yeṣāṁ bhaviṣyati gokṣīreṇa tilaiḥ śvetaiḥ snātvā sārasvate jale
जिनके मन में इस तीर्थ की यात्रा करने का संकल्प उठेगा, वे सरस्वती के जल में स्नान कर, गोदुग्ध और श्वेत तिलों से —
श्लोक 73 (skanda.3.81.73)
तर्पयेदक्षया तृप्तिः पितॄणां तस्य जायते श्राद्धं चैव प्रकु र्वीत सक्तुभिः पयसा सह
tarpayed akṣayā tṛptiḥ pitṝṇāṁ tasya jāyate śrāddhaṁ caiva prakurvīta saktubhiḥ payasā saha
— तर्पण करें, जिससे उसके पितरों को अक्षय तृप्ति मिलती है; और सत्तू तथा दूध के साथ श्राद्ध भी करें।
श्लोक 74 (skanda.3.81.74)
अमावास्यादिनं प्राप्य पितॄणां मोदमिच्छुकः रुद्रतीर्थे ततो धेनुं दयाद्वस्त्राणि यमतीर्थके
amāvāsyādinaṁ prāpya pitṝṇāṁ modam icchukaḥ rudratīrthe tato dhenuṁ dayād vastrāṇi yamatīrthake
अमावस्या के दिन आने पर, पितरों के आनंद की कामना करने वाला व्यक्ति रुद्र-तीर्थ में गाय का दान करे, और यम-तीर्थ में वस्त्रों का दान करे।
श्लोक 75 (skanda.3.81.75)
विष्णुतीर्थे हिरण्यं च पितॄणां मोक्षमिच्छुकः विनाक्षतैर्विना दर्भैर्विना चासनमेव च वारिमात्राल्लोहयष्ट्यां गयाश्राद्धफलं लभेत्
viṣṇutīrthe hiraṇyaṁ ca pitṝṇāṁ mokṣam icchukaḥ vinākṣatair vinā darbhair vinā cāsanam eva ca vārimātrāl lohayaṣṭyāṁ gayāśrāddhaphalaṁ labhet
पितरों की मुक्ति चाहने वाला विष्णु-तीर्थ में स्वर्ण का दान करे। बिना अक्षत के, बिना कुशा के, बिना आसन के भी — लोहयष्टिका में केवल जल से गया-श्राद्ध का फल प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 76 (skanda.3.81.76)
सूत उवाच । एतद्वः कथितं विप्रा लोहासुरविचेष्टितम् यच्छ्रुत्वा ब्रह्महा गोघ्नो मुच्यते सर्वपातकैः
sūta uvāca etad vaḥ kathitaṁ viprā lohāsuraviceṣṭitam yac chrutvā brahmahā goghno mucyate sarvapātakaiḥ
सूत जी ने कहा — हे विप्रो! यह मैंने तुम्हें लोहासुर का सम्पूर्ण चरित्र सुनाया; इसे सुनकर ब्रह्महत्यारा और गोहत्यारा भी समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 77 (skanda.3.81.77)
एकविंशतिवारन्तु गयायां पिंड पातने तत्फलं समवाप्नोति सकृदस्मिञ्छ्रुते सति
ekaviṁśativāran tu gayāyāṁ piṇḍapātane tatphalaṁ samavāpnoti sakṛd asmiñ chrute sati
गया में इक्कीस बार पिण्डदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह इस माहात्म्य को केवल एक बार सुनने से ही प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 78 (skanda.3.81.78)
चतुःष्कोटि द्विलक्षं च सहस्रं शतमेव च धेनवस्तेन दत्ताः स्युर्माहात्म्यं शृणु यात्तु यः इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे पूर्वभागे धर्मारण्यमाहात्म्ये लोहासुरमाहात्म्यसंपूर्तिर्नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः
catuḥṣkoṭi dvilakṣaṁ ca sahasraṁ śatam eva ca dhenavas tena dattāḥ syur māhātmyaṁ śṛṇuyāt tu yaḥ iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe pūrvabhāge dharmāraṇyamāhātmye lohāsuramāhātmyasaṁpūrtir nāmaikonatriṁśo 'dhyāyaḥ
जो कोई इस माहात्म्य को सुनता है, मानो उसने चार करोड़ दो लाख एक हज़ार एक सौ गायों का दान कर दिया हो। इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एक लाख इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड के पूर्वभाग में, धर्मारण्य-माहात्म्य के अंतर्गत, लोहासुर-माहात्म्य-सम्पूर्ति नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।