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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 84

सत्यमंदिर-स्थापन वर्णन

अध्याय 83अध्याय-सूचीअध्याय 85

श्लोक 1 (skanda.3.84.1)

व्यास उवाच । ततश्च रामदूतास्ते नत्वा राममथाब्रुवन् रामराम महाबाहो वरनारी शुभानना

vyāsa uvāca tataś ca rāmadūtās te natvā rāmam athābruvan rāmarāma mahābāho varanārī śubhānanā

व्यास जी ने कहा — तब राम के उन दूतों ने राम को प्रणाम कर कहा — 'हे राम-राम! हे महाबाहो! एक सुंदर मुख वाली श्रेष्ठ स्त्री —'

श्लोक 2 (skanda.3.84.2)

सुवस्त्रभूषाभरणां मृदुवाक्यपरायणाम् एकाकिनीं क्रदमानाम दृष्ट्वा तां विस्मिता वयम्

suvastrabhūṣābharaṇāṁ mṛduvākyaparāyaṇām ekākinīṁ kradamānām dṛṣṭvā tāṁ vismitā vayam

'— सुंदर वस्त्र-आभूषणों से युक्त, कोमल वाणी बोलने वाली, अकेली विलाप करती हुई — उसे देखकर हम विस्मित हो गये।'

श्लोक 3 (skanda.3.84.3)

समीपवर्तिनो भूत्वा पृष्टा सा सुरसुन्दरी का त्वं देवि वरारोहे देवी वा दानवी नु किम्

samīpavartino bhūtvā pṛṣṭā sā surasundarī kā tvaṁ devi varārohe devī vā dānavī nu kim

'— उसके निकट जाकर हमने उस देवसुंदरी से पूछा — हे सुंदरी देवी! तुम कौन हो — देवी हो या दानवी?'

श्लोक 4 (skanda.3.84.4)

रामः पृच्छति देवि त्वां ब्रूहि सर्वं यथातथम् तच्छ्रुत्वा वचनं रामा सोवाच मधुरं वचः

rāmaḥ pṛcchati devi tvāṁ brūhi sarvaṁ yathātatham tac chrutvā vacanaṁ rāmā sovāca madhuraṁ vacaḥ

'हे देवी! राम तुमसे पूछ रहे हैं — सब कुछ यथार्थ बताओ।' यह सुनकर उस स्त्री ने मधुर वचन कहे —

श्लोक 5 (skanda.3.84.5)

रामं प्रेषयत भद्रं वो मम दुःखापहं परम्

rāmaṁ preṣayata bhadraṁ vo mama duḥkhāpahaṁ param

'राम को ही यहाँ भेजो, तुम्हारा कल्याण हो — वे ही मेरे दुःख को दूर करने वाले हैं।'

श्लोक 6 (skanda.3.84.6)

तदाकर्ण्य ततो रामः संभ्रमात्त्वरितो ययौ दृष्ट्वा तां दुःखसंतप्तां स्वयं दुःखमवाप सः उवाच वचनं रामः कृतांजलिपुटस्तदा

tad ākarṇya tato rāmaḥ saṁbhramāt tvarito yayau dṛṣṭvā tāṁ duḥkhasaṁtaptāṁ svayaṁ duḥkham avāpa saḥ uvāca vacanaṁ rāmaḥ kṛtāñjaliputas tadā

यह सुनकर राम व्याकुल होकर शीघ्रता से वहाँ पहुँचे; दुःख से संतप्त उस स्त्री को देखकर वे स्वयं भी दुःखी हो गये; तब राम ने हाथ जोड़कर वचन कहा।

श्लोक 7 (skanda.3.84.7)

श्रीराम उवाच । का त्वं शुभे कस्य परिग्रहो वा केनावधूता विजने निरस्ता मुष्टं धनं केन च तावकीनमाचक्ष्व मातः सकलं ममाग्रे

śrīrāma uvāca kā tvaṁ śubhe kasya parigraho vā kenāvadhūtā vijane nirastā muṣṭaṁ dhanaṁ kena ca tāvakīnam ācakṣva mātaḥ sakalaṁ mamāgre

श्रीराम ने कहा — 'हे शुभे! तुम कौन हो, किसकी अंगीकृत हो, किसने तुम्हें निर्जन में त्याग दिया है? किसने तुम्हारा धन छीन लिया है? हे माता! सब कुछ मेरे सामने कहो।'

श्लोक 8 (skanda.3.84.8)

इत्युक्त्वा चातिदुःखार्तो रामो मतिमतां वरः प्रणामं दंडवच्चक्रे चक्रपाणिरिवापरः

ity uktvā cātiduḥkhārto rāmo matimatāṁ varaḥ praṇāmaṁ daṇḍavac cakre cakrapāṇir ivāparaḥ

यह कहकर, अत्यंत दुःखार्त, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राम ने दण्डवत् प्रणाम किया, मानो वे स्वयं दूसरे चक्रपाणि (विष्णु) हों।

श्लोक 9 (skanda.3.84.9)

तयाभिवंदितो रामः प्रगम्य च पुनःपुनः तुष्टया परया प्रीत्या स्तुतो मधुरया गिरा

tayābhivandito rāmaḥ pragamya ca punaḥ punaḥ tuṣṭayā parayā prītyā stuto madhurayā girā

वह उनके निकट बार-बार आती हुई राम को नमन करती हुई, परम प्रसन्नता और प्रेम से मधुर वाणी में उनकी स्तुति करने लगी —

श्लोक 10 (skanda.3.84.10)

परमात्मन्परेशान दुःखहारिन्सनातन यदर्थमवतारस्ते तच्च कार्यं त्वया कृतम्

paramātman pareśāna duḥkhāharin sanātana yadartham avatāras te tac ca kāryaṁ tvayā kṛtam

'हे परमात्मन्! हे परेश! हे दुःखहारी! हे सनातन! जिस उद्देश्य से आपका अवतार हुआ, वह कार्य आपने पूर्ण कर लिया है —'

श्लोक 11 (skanda.3.84.11)

रावणः कुम्भकर्णश्च शक्रजित्प्रमुखास्तथा खरदूषणत्रिशिरोमारीचाक्षकुमारकाः असंख्या निर्जिता रौद्रा राक्षसाः समरांगणे

rāvaṇaḥ kumbhakarṇaś ca śakrajitpramukhās tathā kharadūṣaṇatriśiromārīcākṣakumārakāḥ asaṁkhyā nirjitā raudrā rākṣasāḥ samarāṅgaṇe

'— रावण, कुम्भकर्ण, शक्रजित (इन्द्रजित) आदि, खर, दूषण, त्रिशिरा, मारीच, अक्ष, कुमार, तथा अनगिनत भयंकर राक्षस युद्धभूमि में परास्त किये गये —'

श्लोक 12 (skanda.3.84.12)

किं वच्मि लोकेश सुकीर्त्तिमद्य ते वेधास्त्वदीयांगजपद्मसंभवः विश्वं निविष्टं च ततो ददर्श वटस्य पत्रे हि यथो वटो मतः

kiṁ vacmi lokeśa sukīrtim adya te vedhās tvadīyāṅgajapadmasaṁbhavaḥ viśvaṁ niviṣṭaṁ ca tato dadarśa vaṭasya patre hi yatho vaṭo mataḥ

'हे लोकेश! आज आपकी सुकीर्ति का मैं क्या वर्णन करूँ? विधाता (ब्रह्मा), जो आपके ही अंग से उत्पन्न कमल से जन्मे हैं, उन्होंने ही तो एक वट-पत्र पर समस्त विश्व को समाया देखा था — जैसे वट का बीज ही सब कुछ धारण किये रहता है।'

श्लोक 13 (skanda.3.84.13)

धन्यो दशरथो लोके कौशल्या जननी तव ययोर्जातोसि गोविंद जगदीश परः पुमान्

dhanyo daśaratho loke kauśalyā jananī tava yayor jāto 'si govinda jagadīśa paraḥ pumān

'दशरथ धन्य हैं इस लोक में, और आपकी माता कौशल्या भी धन्य हैं — हे गोविंद! हे जगदीश! उन्हीं से आप, परम पुरुष, उत्पन्न हुए हैं।'

श्लोक 14 (skanda.3.84.14)

धन्यं च तत्कुलं राम यत्र त्वमागतः स्वयम् धन्याऽयोध्यापुरी राम धन्यो लोकस्त्वदाश्रयः

dhanyaṁ ca tat kulaṁ rāma yatra tvam āgataḥ svayam dhanyāyodhyāpurī rāma dhanyo lokas tvadāśrayaḥ

'हे राम! धन्य है वह कुल, जिसमें आप स्वयं अवतरित हुए। हे राम! धन्य है अयोध्यापुरी, और धन्य है वह संसार जो आपके आश्रय में है।'

श्लोक 15 (skanda.3.84.15)

धन्यः सोऽपि हि वाल्मीकिर्येन रामायणं कृतम् कविना विप्रमुख्येभ्य आत्मबुद्ध्या ह्यनागतम्

dhanyaḥ so 'pi hi vālmīkir yena rāmāyaṇaṁ kṛtam kavinā vipramukhyebhya ātmabuddhyā hy anāgatam

'धन्य हैं वाल्मीकि भी, जिन्होंने रामायण की रचना की — उस कवि ने अपनी दिव्य बुद्धि से, इसके घटित होने से पहले ही, श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लिए उसे लिख दिया था।'

श्लोक 16 (skanda.3.84.16)

त्वत्तोऽभवत्कुलं चेदं त्वया देव सुपावितम्।

tvatto 'bhavat kulaṁ cedaṁ tvayā deva supāvitam

'हे देव! यह कुल आपसे ही उत्पन्न हुआ, और आपके ही द्वारा यह भलीभाँति पवित्र हुआ है।'

श्लोक 17 (skanda.3.84.17)

नरपतिरिति लोकैः स्मर्यते वैष्णवांशः स्वयमसि रमणीयैस्त्वं गुणैर्विष्णुरेव किमपि भुवनकार्यं यद्विचिंत्यावतीर्य तदिह घटयतस्ते वत्स निर्विघ्नमस्तु

narapatir iti lokaiḥ smaryate vaiṣṇavāṁśaḥ svayam asi ramaṇīyais tvaṁ guṇair viṣṇur eva kim api bhuvanakāryaṁ yad vicintyāvatīrya tad iha ghaṭayatas te vatsa nirvighnam astu

'लोग आपको मात्र राजा कहकर याद करते हैं, किंतु आप स्वयं विष्णु के अंश हैं; अपने रमणीय गुणों से आप साक्षात् विष्णु ही हैं। जो भी भुवन-कार्य सोचकर आप यहाँ अवतीर्ण हुए हैं और सम्पन्न कर रहे हैं, हे वत्स! वह निर्विघ्न सिद्ध हो।'

श्लोक 18 (skanda.3.84.18)

स्तुत्वा वाचाथ रामं हि त्वयि नाथे नु सांप्रतम् शून्या वर्ते चिरं कालं यथा दोषस्तथैव हि

stutvā vācātha rāmaṁ hi tvayi nāthe nu sāṁpratam śūnyā varte ciraṁ kālaṁ yathā doṣas tathaiva hi

इस प्रकार वाणी से राम की स्तुति कर वह बोली — 'आप ही मेरे नाथ हैं, अभी मैं दीर्घकाल से शून्य (उजाड़) बनी हुई हूँ — जैसे दोष होता है, वैसा ही यह है।'

श्लोक 19 (skanda.3.84.19)

धर्मारण्यस्य क्षेत्रस्य विद्धि मामधिदेवताम् वर्षाणि द्वादशेहैव जातानि दुःखि तास्म्यहम्

dharmāraṇyasya kṣetrasya viddhi mām adhidevatām varṣāṇi dvādaśehaiva jātāni duḥkhitāsmy aham

'मुझे धर्मारण्य क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी जानिए। यहाँ बारह वर्ष बीत गये हैं, और मैं दुःखी हूँ।'

श्लोक 20 (skanda.3.84.20)

निर्जनत्वं ममाद्य त्वमुद्धरस्व महामते लोहासुरभयाद्राम विप्राः सर्वे दिशो दश

nirjanatvaṁ mamādya tvam uddharasva mahāmate lohāsurabhayād rāma viprāḥ sarve diśo daśa

'हे महामते! आज मेरे इस उजाड़ जन-रहित स्वरूप का उद्धार करो। हे राम! लोहासुर के भय से समस्त ब्राह्मण दसों दिशाओं में —'

श्लोक 21 (skanda.3.84.21)

गताश्च वणिजः सर्वे यथास्थानं सुदुःखिताः स दैत्यो घातितो राम देवैः सुरभयंकरः

gatāś ca vaṇijaḥ sarve yathāsthānaṁ suduḥkhitāḥ sa daityo ghātito rāma devaiḥ surabhayaṁkaraḥ

'— और सारे वणिक भी अत्यंत दुःखी होकर जहाँ-तहाँ चले गये। हे राम! उस देवताओं को भयभीत करने वाले दैत्य को देवताओं ने मार डाला था —'

श्लोक 22 (skanda.3.84.22)

आक्रम्यात्र महामायो दुराधर्षो दुरत्ययः न ते जनाः समायांति तद्भयादति शंकिताः

ākramyātra mahāmāyo durādharṣo duratyayaḥ na te janāḥ samāyānti tadbhayād ati śaṅkitāḥ

'— किंतु उस अजेय, दुर्धर्ष, माया से भरे दैत्य ने यहाँ आक्रमण किया था, और उसी भय से वे लोग अत्यंत भयभीत होकर अब यहाँ नहीं लौटते।'

श्लोक 23 (skanda.3.84.23)

अद्य वै द्वादश समाः शून्यागारमनाथवत् यस्माच्च दीर्घिकायां मे स्नानदानोद्यतो जनः

adya vai dvādaśa samāḥ śūnyāgāram anāthavat yasmāc ca dīrghikāyāṁ me snānadānodyato janaḥ

'आज बारह वर्षों से मेरा घर अनाथ के समान शून्य पड़ा है। जिस दीर्घिका (जलाशय) में लोग पहले स्नान और दान में तत्पर रहते थे —'

श्लोक 24 (skanda.3.84.24)

राम तस्यां दीर्घिकायां निपतंति च शूकराः यत्रांगना भर्तृयुता जलक्रीडापरायणाः

rāma tasyāṁ dīrghikāyāṁ nipatanti ca śūkarāḥ yatrāṅganā bhartṛyutā jalakrīḍāparāyaṇāḥ

'— हे राम! अब उसी दीर्घिका में सूअर आ गिरते हैं। जिस जलाशय में पति सहित स्त्रियाँ जल-क्रीड़ा में रत रहती थीं —'

श्लोक 25 (skanda.3.84.25)

चिक्रीडुस्तत्र महिषा निपतंति जलाशये यत्र स्थाने सुपुष्पाणां प्रकरः प्रचुरोऽभवत्

cikrīḍus tatra mahiṣā nipatanti jalāśaye yatra sthāne supuṣpāṇāṁ prakaraḥ pracuro 'bhavat

'— वहाँ अब भैंसें आ गिरती हैं। जिस स्थान पर पहले सुंदर पुष्पों का बाहुल्य था —'

श्लोक 26 (skanda.3.84.26)

तद्रुद्धं कंटकैर्वृक्षैः सिंहव्याघ्रसमाकुलैः संचिक्रीडुः कुमाराश्च यस्यां भूमौ निरंतरम्

tad ruddhaṁ kaṇṭakair vṛkṣaiḥ siṁhavyāghrasamākulaiḥ saṁcikrīḍuḥ kumārāś ca yasyāṁ bhūmau nirantaram

'— वह अब कंटीले वृक्षों से भरा और सिंह-व्याघ्रों से आक्रांत हो गया है। जिस भूमि पर बच्चे निरंतर खेला करते थे —'

श्लोक 27 (skanda.3.84.27)

कुमार्यश्चित्रकाणां च तत्र क्रीडं ति हर्षिताः अकुर्वन्वाडवा यत्र वेदगानं तिरंतरम्

kumāryaś citrakāṇāṁ ca tatra krīḍanti harṣitāḥ akurvan vāḍavā yatra vedagānaṁ nirantaram

'— वहाँ अब गीदड़ों की मादाएँ प्रसन्नतापूर्वक खेलती हैं। जहाँ ब्राह्मण निरंतर वेद-गान किया करते थे —'

श्लोक 28 (skanda.3.84.28)

शिवानां तत्र फेत्काराः श्रूयंतेऽतिभयंकराः यत्र धूमोऽग्निहोत्राणां दृश्यते वै गृहेगृहे

śivānāṁ tatra phetkārāḥ śrūyante 'tibhayaṁkarāḥ yatra dhūmo 'gnihotrāṇāṁ dṛśyate vai gṛhegṛhe

'— वहाँ अब सियारों की अति भयंकर हुँआ-हुँआ सुनायी देती है। जहाँ हर घर में अग्निहोत्र का धुआँ दिखायी देता था —'

श्लोक 29 (skanda.3.84.29)

तत्र दावाः सधूमाश्च दृश्यंतेऽत्युल्बणा भृशम् नृत्यंते नर्त्तका यत्र हर्षिता हि द्विजाग्रतः

tatra dāvāḥ sadhūmāś ca dṛśyante 'tyulbaṇā bhṛśam nṛtyante narttakā yatra harṣitā hi dvijāgrataḥ

'— वहाँ अब धुआँ उठाती हुई भीषण दावाग्नियाँ दिखायी देती हैं। जहाँ नर्तक प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणों के आगे नृत्य करते थे —'

श्लोक 30 (skanda.3.84.30)

तत्रैव भूतवेताला प्रेताः नृत्यंति मोहिताः नृपा यत्र सभायां तु न्यषीदन्मंत्रतत्पराः

tatraiva bhūtavetālā pretā nṛtyanti mohitāḥ nṛpā yatra sabhāyāṁ tu nyaṣīdan mantratatparāḥ

'— वहाँ अब भूत-वेताल और प्रेत मोहित होकर नाचते हैं। जिस सभा में राजा मंत्र-विचार में तत्पर होकर बैठते थे —'

श्लोक 31 (skanda.3.84.31)

तस्मिन्स्थाने निषीदंति गवया ऋक्षशल्लकाः आवासा यत्र दृश्यन्ते द्विजानां वणिजां तथा

tasmin sthāne niṣīdanti gavayā ṛkṣaśallakāḥ āvāsā yatra dṛśyante dvijānāṁ vaṇijāṁ tathā

'— उसी स्थान पर अब जंगली भैंसें, भालू और साही निवास करते हैं। जहाँ ब्राह्मणों और वणिकों के घर दिखायी देते थे —'

श्लोक 32 (skanda.3.84.32)

कुट्टिमप्रतिमा राम दृश्यंतेत्र बिलानि वै कोटराणीह वृक्षाणां गवाक्षाणीह सर्वतः

kuṭṭimapratimā rāma dṛśyante tra bilāni vai koṭarāṇīha vṛkṣāṇāṁ gavākṣāṇīha sarvataḥ

'— हे राम! जहाँ चमकते फर्श थे, अब वहाँ केवल बिल दिखायी देते हैं; झरोखों के स्थान पर सर्वत्र अब वृक्षों की खोखली कोटरें हैं।'

श्लोक 33 (skanda.3.84.33)

चतुष्का यज्ञवेदिर्हि सोच्छ्राया ह्यभवत्पुरा तेऽत्र वल्मीकनिचयैर्दृश्यंते परिवेष्टिताः

catuṣkā yajñavedir hi socchrāyā hy abhavat purā te 'tra valmīkanicayair dṛśyante pariveṣṭitāḥ

'जो ऊँची यज्ञ-वेदियाँ पहले चारों ओर खड़ी थीं, वे अब यहाँ दीमकों के ढेरों से घिरी हुई दिखायी देती हैं।'

श्लोक 34 (skanda.3.84.34)

एवंविधं निवासं मे विद्धि राम नृपोत्तम शून्यं तु सर्वतो यस्मान्निवासाय द्विजा गताः

evaṁvidhaṁ nivāsaṁ me viddhi rāma nṛpottama śūnyaṁ tu sarvato yasmān nivāsāya dvijā gatāḥ

'हे राम! हे नृपोत्तम! मेरे निवास की यही दशा जानिए — यह सर्वथा उजाड़ हो गया है, क्योंकि ब्राह्मण दूसरे स्थानों में जाकर बस गये हैं।'

श्लोक 35 (skanda.3.84.35)

तेन मे सुमहद्दुःखं तस्मात्त्राहि नरेश्वर एतच्छ्रुत्वा वचो राम उवाच वदतां वरः

tena me sumahad duḥkhaṁ tasmāt trāhi nareśvara etac chrutvā vaco rāma uvāca vadatāṁ varaḥ

'इसी कारण मुझे अत्यंत महान् दुःख है — हे नरेश्वर! मेरी रक्षा करो।' यह वचन सुनकर वक्ताओं में श्रेष्ठ राम ने कहा —

श्लोक 36 (skanda.3.84.36)

श्रीराम उवाच । न जाने तावकान्विप्रांश्चतुर्दिक्षु समाश्रितान् न तेषां वेद्म्यहं संख्यां नामगोत्रे द्विजन्मनाम्

śrīrāma uvāca na jāne tāvakān viprāṁś caturdikṣu samāśritān na teṣāṁ vedmy ahaṁ saṁkhyāṁ nāmagotre dvijanmanām

श्रीराम ने कहा — मैं नहीं जानता कि तुम्हारे ब्राह्मण चारों दिशाओं में कहाँ जा बसे हैं; न ही मुझे उनकी संख्या, नाम या गोत्र का ज्ञान है।

श्लोक 37 (skanda.3.84.37)

यथा ज्ञातिर्यथा गोत्रं याथातथ्यं निवेदय तत आनीय तान्सर्वान्स्वस्थाने वासयाम्यहम्

yathā jñātir yathā gotraṁ yāthātathyaṁ nivedaya tata ānīya tān sarvān svasthāne vāsayāmy aham

जैसी उनकी जाति और जैसा उनका गोत्र हो, वह यथार्थ रूप में मुझे बताओ; तब मैं उन सबको ला कर पुनः उनके अपने स्थान में बसाऊँगा।

श्लोक 38 (skanda.3.84.38)

श्रीमातोवाच । ब्रह्मविष्णुमहेशैश्च स्थापिता ये नरेश्वर अष्टादश सहस्राणि ब्राह्मणा वेदपारगाः

śrīmātovāca brahmaviṣṇumaheśaiś ca sthāpitā ye nareśvara aṣṭādaśa sahasrāṇi brāhmaṇā vedapāragāḥ

श्रीमाता ने कहा — हे नरेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने जिन अठारह हज़ार वेदपारंगत ब्राह्मणों को यहाँ स्थापित किया था —

श्लोक 39 (skanda.3.84.39)

त्रयीविद्यासु विख्याता लोकेऽस्मिन्नमितद्युते चतुष्षष्टिकगोत्राणां वाडवा ये प्रतिष्ठिताः

trayīvidyāsu vikhyātā loke 'sminn amitadyute catuḥṣaṣṭikagotrāṇāṁ vāḍavā ye pratiṣṭhitāḥ

— वे तीनों वेदों की विद्या में विख्यात हैं, हे अपार तेजस्वी! वे ब्राह्मण चौंसठ गोत्रों में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 40 (skanda.3.84.40)

श्रीमातादात्त्रयीविद्यां लोके सर्वे द्विजोत्तमाः षट्त्रिंशच्च सहस्राणि वैश्या धर्मपरायणाः

śrīmātādāt trayīvidyāṁ loke sarve dvijottamāḥ ṣaṭtriṁśac ca sahasrāṇi vaiśyā dharmaparāyaṇāḥ

श्रीमाता ने इस लोक में सभी उत्तम द्विजों को त्रयी-विद्या प्रदान की; तथा छत्तीस हज़ार धर्मपरायण वैश्य भी यहाँ हैं —

श्लोक 41 (skanda.3.84.41)

आर्यवृत्तास्तु विज्ञेया द्विजशुश्रूषणे रताः बहुलार्को नृपो यत्र संज्ञया सह राजते

āryavṛttās tu vijñeyā dvijaśuśrūṣaṇe ratāḥ bahulārko nṛpo yatra saṁjñayā sahā rājate

— जिन्हें आर्य-वृत्ति वाले, ब्राह्मणों की सेवा में रत जानना चाहिए; जहाँ 'बहुलार्क' नामक राजा अपने नाम सहित राज्य करता है।

श्लोक 42 (skanda.3.84.42)

कुमारावश्विनौ देवौ धनदो व्ययपूरकः अधिष्ठात्री त्वहं राम नाम्ना भट्टारिका स्मृता

kumārāv aśvinau devau dhanado vyayapūrakaḥ adhiṣṭhātrī tv ahaṁ rāma nāmnā bhaṭṭārikā smṛtā

अश्विनीकुमार दोनों देव यहाँ के कुमार-देवता हैं, धनद (कुबेर) व्यय की पूर्ति करने वाले हैं; और हे राम! मैं ही यहाँ की अधिष्ठात्री देवी हूँ, जिसे भट्टारिका नाम से जाना जाता है।

श्लोक 43 (skanda.3.84.43)

श्रीसूत उवाच । स्थानाचाराश्च ये केचित्कुलाचारास्तथैव च श्रीमात्रा कथितं सर्वं रामस्याग्रे पुरातनम्

śrīsūta uvāca sthānācārāś ca ye kecit kulācārās tathaiva ca śrīmātrā kathitaṁ sarvaṁ rāmasyāgre purātanam

श्री सूत जी ने कहा — जो भी स्थान-आचार और कुल-आचार थे, वे सभी प्राचीन नियम श्रीमाता ने राम के समक्ष कह सुनाये।

श्लोक 44 (skanda.3.84.44)

तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा रामो मुदमवाप ह सत्यंसत्यं पुनः सत्यं सत्यं हि भाषितं त्वया

tasyās tu vacanaṁ śrutvā rāmo mudam avāpa ha satyaṁ satyaṁ punaḥ satyaṁ satyaṁ hi bhāṣitaṁ tvayā

उसके वचन सुनकर राम प्रसन्न हो गये — 'सत्य है, सत्य है, फिर से सत्य है — तुमने जो कहा वह निश्चय ही सत्य है।'

श्लोक 45 (skanda.3.84.45)

यस्मात्सत्यं त्वया प्रोक्तं तन्नाम्ना नगरं शुभम् वासयामि जगन्मातः सत्यमंदिरमेव च

yasmāt satyaṁ tvayā proktaṁ tan nāmnā nagaraṁ śubham vāsayāmi jaganmātaḥ satyamandiram eva ca

'क्योंकि तुमने सत्य कहा है, इसलिए हे जगन्माता! मैं इसी नाम पर 'सत्यमंदिर' नामक शुभ नगर बसाऊँगा।'

श्लोक 46 (skanda.3.84.46)

त्रैलोक्ये ख्यातिमाप्नोतु सत्यमंदिरमु त्तमम्

trailokye khyātim āpnotu satyamandiram uttamam

'यह उत्तम सत्यमंदिर त्रिलोक में ख्याति प्राप्त करे।'

श्लोक 47 (skanda.3.84.47)

एतदुक्त्वा ततो रामः सहस्रशतसंख्यया स्वभृत्यान्प्रेषयामास विप्रानयनहेतवे

etad uktvā tato rāmaḥ sahasraśatasaṁkhyayā svabhṛtyān preṣayāmāsa viprānayanahetave

यह कहकर राम ने अपने एक लाख सेवकों को ब्राह्मणों को वापस लाने के लिए भेजा।

श्लोक 48 (skanda.3.84.48)

यस्मिन्देशे प्रदेशे वा वने वा सरि तस्तटे पर्यंते वा यथास्थाने ग्रामे वा तत्रतत्र च

yasmin deśe pradeśe vā vane vā saritas taṭe paryante vā yathāsthāne grāme vā tatra tatra ca

'जिस भी देश में, प्रदेश में, वन में, नदी-तट पर, सीमांत में, अथवा किसी भी गाँव में —'

श्लोक 49 (skanda.3.84.49)

धर्मारण्यनिवासाश्च याता यत्र द्विजोत्तमाः अर्घपाद्यैः पूजयित्वा शीघ्रमानयतात्र तान्

dharmāraṇyanivāsāś ca yātā yatra dvijottamāḥ argapādyaiḥ pūjayitvā śīghram ānayatātra tān

'— जहाँ भी धर्मारण्य के निवासी उत्तम ब्राह्मण गये हों, अर्घ्य-पाद्य से उनकी पूजा कर शीघ्र उन्हें यहाँ लाओ।'

श्लोक 50 (skanda.3.84.50)

अहमत्र तदा भोक्ष्ये यदा द्रक्ष्ये द्विजोत्तमान्

aham atra tadā bhokṣye yadā drakṣye dvijottamān

'मैं तभी यहाँ भोजन ग्रहण करूँगा जब उत्तम ब्राह्मणों को यहाँ देख लूँगा।'

श्लोक 51 (skanda.3.84.51)

विमान्य च द्विजानेतानागमिष्यति यो नरः स मे वध्यश्च दंड्यश्च निर्वास्यो विषयाद्बहिः

vimānya ca dvijān etān āgamiṣyati yo naraḥ sa me vadhyaś ca daṇḍyaś ca nirvāsyo viṣayād bahiḥ

'जो भी मनुष्य इन ब्राह्मणों का अपमान कर लौटेगा, वह मेरे लिए वध्य, दण्डनीय और मेरे राज्य से बहिष्कृत होगा।'

श्लोक 52 (skanda.3.84.52)

तच्छ्रुत्वा दारुणं वाक्यं दुःसहं दुःप्रधर्षणम् रामाज्ञाकारिणो दूता गताः सर्वे दिशो दश

tac chrutvā dāruṇaṁ vākyaṁ duḥsahaṁ duḥpradharṣaṇam rāmājñākāriṇo dūtā gatāḥ sarve diśo daśa

यह कठोर, असहनीय और अत्यंत निर्णायक वचन सुनकर राम की आज्ञा का पालन करने वाले सभी दूत दसों दिशाओं में चले गये।

श्लोक 53 (skanda.3.84.53)

शोधिता वाडवाः सर्वे लब्धाः सर्वे सुहर्षिताः यथोक्तेन विधानेन अर्घपाद्यैरपूजयन्

śodhitā vāḍavāḥ sarve labdhāḥ sarve suharṣitāḥ yathoktena vidhānena arghapādyair apūjayan

उन्होंने खोज कर सभी ब्राह्मणों को पा लिया, सब अत्यंत प्रसन्न हुए, और यथोक्त विधि से अर्घ्य-पाद्य द्वारा उनकी पूजा की।

श्लोक 54 (skanda.3.84.54)

स्तुतिं चक्रुश्च विधिवद्विनयाचारपूर्वकम् आमंत्र्य च द्विजान्सर्वान्रामवाक्यं प्रकाशयन्

stutiṁ cakruś ca vidhivad vinayācārapūrvakam āmantrya ca dvijān sarvān rāmavākyaṁ prakāśayan

विधिपूर्वक और विनयाचारपूर्वक उनकी स्तुति की, और सभी ब्राह्मणों को आमंत्रित कर राम का संदेश उन्हें सुनाया।

श्लोक 55 (skanda.3.84.55)

ततस्ते वाडवाः सर्वे द्विजाः सेवकसंयुताः गमनायोद्यताः सर्वे वेदशास्त्रपरायणाः

tataste vāḍavāḥ sarve dvijāḥ sevakasaṁyutāḥ gamanāyodyatāḥ sarve vedaśāstraparāyaṇāḥ

तब वे सभी वेद-शास्त्र-परायण ब्राह्मण, अपने सेवकों सहित, वापस जाने को तैयार हो गये।

श्लोक 56 (skanda.3.84.56)

आगता रामपार्श्वं च बहुमानपुरःसराः समागतान्द्विजान्दृष्ट्वा रोमांचिततनूरुहः

āgatā rāmapārśvaṁ ca bahumānapuraḥsarāḥ samāgatān dvijān dṛṣṭvā romāñcitatanūruhaḥ

अत्यंत सम्मानपूर्वक वे राम के पास पहुँचे; उन ब्राह्मणों को आया देखकर राम का शरीर रोमांचित हो उठा।

श्लोक 57 (skanda.3.84.57)

कृतकृत्यमिवात्मानं मेने दाशरथिर्नृपः स संभ्रमात्समुत्थाय पदातिः प्रययौ पुरः

kṛtakṛtyam ivātmānaṁ mene dāśarathir nṛpaḥ sa saṁbhramāt samutthāya padātiḥ prayayau puraḥ

राजा दाशरथि ने स्वयं को कृतकृत्य समझा; वे व्याकुल होकर उठे और पैदल ही उनके सामने बढ़े।

श्लोक 58 (skanda.3.84.58)

करसंपुटकं कृत्वा हर्षाश्रु प्रतिमुञ्चयन् जानुभ्यामवनिं गत्वा इदं वचनमब्रवीत्

karasaṁpuṭakaṁ kṛtvā harṣāśru pratimuñcayan jānubhyām avaniṁ gatvā idaṁ vacanam abravīt

हाथ जोड़कर, हर्ष के आँसू बहाते हुए, दोनों घुटनों के बल भूमि पर गिरकर उन्होंने यह वचन कहे —

श्लोक 59 (skanda.3.84.59)

विप्रप्रसादात्कमलावरोऽहं विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम् विप्रप्रसादाज्जगतीपतिश्च विप्रप्रसादान्मम रामनाम

vipraprasādāt kamalāvaro 'haṁ vipraprasādād dharaṇīdharo 'ham vipraprasādāj jagatīpatiś ca vipraprasādān mama rāmanāma

'ब्राह्मणों की कृपा से ही मैं लक्ष्मी का पति हूँ, ब्राह्मणों की कृपा से ही मैं पृथ्वी का धारक हूँ; ब्राह्मणों की कृपा से ही मैं जगत् का स्वामी हूँ, और ब्राह्मणों की कृपा से ही मेरा नाम राम है।'

श्लोक 60 (skanda.3.84.60)

इत्येवमुक्ता रामेण वाड वास्ते प्रहर्षिताः जयाशीर्भिः प्रपूज्याथ दीर्घायुरिति चाब्रुवन्

ity evam uktā rāmeṇa vāḍavās te praharṣitāḥ jayāśīrbhiḥ prapūjyātha dīrghāyur iti cābruvan

राम द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे ब्राह्मण अत्यंत हर्षित हुए; जय-आशीर्वाद देकर उन्होंने राम की स्तुति की और 'दीर्घायु हो' कहा।

श्लोक 61 (skanda.3.84.61)

आवर्जितास्ते रामेण पाद्यार्घ्यविष्टरादिभिः स्तुतिं चकार विप्राणां दण्डवत्प्रणिपत्य च

āvarjitās te rāmeṇa pādyārghyaviṣṭarādibhiḥ stutiṁ cakāra viprāṇāṁ daṇḍavat praṇipatya ca

राम ने पाद्य, अर्घ्य और आसन आदि से उन्हें प्रसन्न किया; और दण्डवत् प्रणाम कर ब्राह्मणों की स्तुति की।

श्लोक 62 (skanda.3.84.62)

कृतांजलिपुटः स्थित्वा चक्रे पादाभिवंदनम् आसनानि विचित्राणि हैमान्याभरणानि च

kṛtāñjaliputaḥ sthitvā cakre pādābhivandanam āsanāni vicitrāṇi haimāny ābharaṇāni ca

हाथ जोड़कर खड़े होकर उन्होंने ब्राह्मणों के चरण-वंदन किये; तथा विविध आसन और स्वर्ण-आभूषण —

श्लोक 63 (skanda.3.84.63)

समर्पयामास ततो रामो दशरथात्मजः अंगुलीयकवासांसि उपवीतानि कर्णकान्

samarpayāmāsa tato rāmo daśarathātmajaḥ aṅgulīyakavāsāṁsi upavītāni karṇakān

— फिर दशरथ-पुत्र राम ने उन्हें अंगूठियाँ, वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा कर्णाभूषण भी अर्पित किये।

श्लोक 64 (skanda.3.84.64)

प्रददौ विप्रमुख्येभ्यो नानावर्णाश्च धेनवः एकैकशत संख्याका घटोध्नीश्च सवत्सकाः

pradadau vipramukhyebhyo nānāvarṇāś ca dhenavaḥ ekaikaśatasaṁkhyākā ghaṭodhnīś ca savatsakāḥ

उन्होंने प्रमुख ब्राह्मणों को नाना वर्णों की गायें भी दान कीं — प्रत्येक को सौ-सौ की संख्या में, घड़े भर दूध देने वाली, बछड़ों सहित —

श्लोक 65 (skanda.3.84.65)

सवस्त्रा बद्धघंटाश्च हेमशृंगविभूषिताः रूप्यखुरास्ताम्रपृष्ठीः कांस्यपात्रसमन्विताः इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे पूर्वभागे धर्मारण्यमाहात्म्ये ब्रह्मनारदसंवादे सत्यमंदिरस्थापनवर्णनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः

savastrā baddhaghaṇṭāś ca hemaśṛṅgavibhūṣitāḥ rūpyakhurās tāmrapṛṣṭhīḥ kāṁsyapātrasamanvitāḥ iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe pūrvabhāge dharmāraṇyamāhātmye brahmanāradasaṁvāde satyamandirasthāpanavarṇanaṁ nāma dvātriṁśo 'dhyāyaḥ

— वस्त्रों से सज्जित, घंटियाँ बाँधी हुई, सुनहरे सींगों से अलंकृत, चाँदी के खुरों वाली, ताम्र-वर्ण पीठ वाली, तथा काँसे के पात्रों सहित। इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एक लाख इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड के पूर्वभाग में, धर्मारण्य-माहात्म्य के अंतर्गत, ब्रह्म-नारद संवाद में सत्यमंदिर-स्थापन-वर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

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