Skip to main content

ब्रह्म खण्ड · अध्याय 89

ब्राह्मणानां प्रत्यागमन वर्णन

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90

श्लोक 1 (skanda.3.89.1)

व्यास उवाच । ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे प्रत्यूचुः पवनात्मजम्। अधुना सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्

vyāsa uvāca tataste brāhmaṇāḥ sarve pratyūcuḥ pavanātmajam adhunā saphalaṁ janma jīvitaṁ ca sujīvitam

व्यास जी ने कहा — तब उन सभी ब्राह्मणों ने पवनपुत्र से कहा — 'अब हमारा जन्म सफल हुआ, और जीवन सुजीवन बन गया —'

श्लोक 2 (skanda.3.89.2)

अद्य नो मोढलोकानां धन्यो धर्मश्च वै गृहाः। धन्या च सकला पृथ्वी यज्ञधर्मा ह्यनेकशः

adya no moḍhalokānāṁ dhanyo dharmaś ca vai gṛhāḥ dhanyā ca sakalā pṛthvī yajñadharmā hy anekaśaḥ

'— आज हम मोढ लोगों का धर्म धन्य है, और हमारे घर भी धन्य हैं; समस्त पृथ्वी धन्य है, जो अनेकानेक यज्ञ-धर्मों से युक्त है।'

श्लोक 3 (skanda.3.89.3)

नमः श्रीराम भक्ताय अक्षविध्वंसनाय च । नमो रक्षःपुरीदाहकारिणे वज्रधारिणे ।

namaḥ śrīrāma bhaktāya akṣavidhvaṁsanāya ca namo rakṣaḥpurīdāhakāriṇe vajradhāriṇe

'नमन है श्रीराम के भक्त को, अक्ष (कुमार) के विध्वंसक को; नमन है राक्षस-पुरी को जलाने वाले, वज्र-धारण करने वाले को।'

श्लोक 4 (skanda.3.89.4)

जानकीहृदयत्राणकारिणे करुणात्मने । सीताविरह तप्तस्य श्रीरामस्य प्रियाय च ।

jānakīhṛdayatrāṇakāriṇe karuṇātmane sītāviraha taptasya śrīrāmasya priyāya ca

'नमन है जानकी के हृदय की रक्षा करने वाले, करुणामय आत्मा को; सीता-विरह से संतप्त श्रीराम के प्रियजन को।'

श्लोक 5 (skanda.3.89.5)

नमोऽस्तु ते महावीर रक्षास्मान्मज्जतः क्षितौ । नमो ब्राह्मणदेवाय वायुपुत्राय ते नमः ।

namo 'stu te mahāvīra rakṣāsmān majjataḥ kṣitau namo brāhmaṇadevāya vāyuputrāya te namaḥ

'हे महावीर! आपको नमन हो, पृथ्वी में डूबते हुए हमारी रक्षा करें; ब्राह्मणों के देवता वायुपुत्र को आपको नमन है।'

श्लोक 6 (skanda.3.89.6)

नमोऽस्तु राम भक्ताय गोब्राह्मणहिताय च । नमोस्तु रुद्ररूपाय कृष्णवक्त्राय ते तमः ।

namo 'stu rāma bhaktāya gobrāhmaṇahitāya ca namo 'stu rudrarūpāya kṛṣṇavaktrāya te namaḥ

'नमन है राम-भक्त को, गौ-ब्राह्मणों के हितैषी को; नमन है रुद्र-स्वरूप, कृष्ण-मुख वाले आपको।'

श्लोक 7 (skanda.3.89.7)

अंजनीसूनवे नित्यं सर्वव्याधिहराय च । नागयज्ञोपवीताय प्रबलाय नमोऽस्तु ते ।

añjanīsūnave nityaṁ sarvavyādhiharāya ca nāgayajñopavītāya prabalāya namo 'stu te

'अंजनी-पुत्र को, सदा सभी व्याधियों को हरने वाले को; सर्प का जनेऊ धारण करने वाले, बलशाली आपको नमन हो।'

श्लोक 8 (skanda.3.89.8)

स्वयं समुद्रतीर्णाय सेतुबंधनकारिणे ।

svayaṁ samudratīrṇāya setubandhanakāriṇe

'स्वयं सागर को पार करने वाले, सेतु-बंधन करने वाले को नमन।'

श्लोक 9 (skanda.3.89.9)

व्यास उवाच । स्तोत्रेणैवामुना तुष्टो वायुपुत्रोऽब्रवीद्वचः । शृणुध्वं हि वरं विप्रा यद्वो मनसि रोचते ।

vyāsa uvāca stotreṇaivāmunā tuṣṭo vāyuputro 'bravīd vacaḥ śṛṇudhvaṁ hi varaṁ viprā yad vo manasi rocate

व्यास जी ने कहा — इसी स्तोत्र से संतुष्ट होकर वायुपुत्र ने कहा — 'हे विप्रो! सुनो, जो भी वर तुम्हारे मन को भाये, वह माँगो।'

श्लोक 10 (skanda.3.89.10)

विप्रा ऊचुः । यदि तुष्टोऽसि देवेश रामाज्ञापालक प्रभो । स्वरूपं दर्शयस्वाद्य लंकायां यत्कृतं हरे ।

viprā ūcuḥ yadi tuṣṭo 'si deveśa rāmājñāpālaka prabho svarūpaṁ darśayasvādya laṅkāyāṁ yat kṛtaṁ hare

ब्राह्मणों ने कहा — हे देवेश! हे प्रभु, राम की आज्ञा के पालक! यदि आप संतुष्ट हैं, तो आज हमें अपना वह स्वरूप दिखाइए, जो आपने लंका में धारण किया था —

श्लोक 11 (skanda.3.89.11)

तथा विध्वंसवाद्य त्वं राजानं पापकारिणम् । दुष्टं कुमारपालं हि आमं चैव न संशयः ।

tathā vidhvaṁsavādya tvaṁ rājānaṁ pāpakāriṇam duṣṭaṁ kumārapālaṁ hi āmaṁ caiva na saṁśayaḥ

'— तथा आज ही पापी राजा — दुष्ट कुमारपाल और आमो, दोनों को — विध्वस्त कर दीजिए, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 12 (skanda.3.89.12)

वृत्तिलोपफलं सद्यः प्राप्नुयात्त्वं तथा कुरु । प्रतीत्यर्थं महाबाहो किं विलंबं वदस्व नः ।

vṛttilopaphalaṁ sadyaḥ prāpnuyāt tvaṁ tathā kuru pratītyartham mahābāho kiṁ vilaṁbaṁ vadasva naḥ

'वह तुरंत वृत्ति-लोप का फल पाये, ऐसा कीजिए। हे महाबाहो! प्रमाण के लिए इतना विलंब क्यों करते हो, हमें बताइए।'

श्लोक 13 (skanda.3.89.13)

त्वयि चित्तेन दत्तेन स राजा पुण्यभाग्भवेत् । प्रत्यये दर्शिते वीर शासनं पालयिष्यति ।

tvayi cittena dattena sa rājā puṇyabhāg bhavet pratyaye darśite vīra śāsanaṁ pālayiṣyati

'यदि उसका मन आप पर लग जाए, तो वह राजा पुण्यभागी बन जायेगा। हे वीर! प्रमाण दिखाये जाने पर वह शासन का पालन करेगा।'

श्लोक 14 (skanda.3.89.14)

त्रयीधर्म्मः पृथिव्यां तु विस्तारं प्रापयिष्यति । धर्मधीर महावीर स्वरूपं दर्शयस्व नः ।

trayīdharmaḥ pṛthivyāṁ tu vistāraṁ prāpayiṣyati dharmadhīra mahāvīra svarūpaṁ darśayasva naḥ

'तब त्रयी-धर्म पृथ्वी पर विस्तार को प्राप्त होगा। हे धर्मधीर! हे महावीर! हमें अपना स्वरूप दिखाइए।'

श्लोक 15 (skanda.3.89.15)

हनुमानुवाच । मत्स्वरूपं महाकायं न चक्षुर्विषयं कलौ । तेजोराशिमयं दिव्यमिति जानंतु वाडवाः ।

hanumān uvāca matsvarūpaṁ mahākāyaṁ na cakṣurviṣayaṁ kalau tejorāśimayaṁ divyam iti jānantu vāḍavāḥ

हनुमान ने कहा — मेरा विशालकाय स्वरूप कलियुग में नेत्रों का विषय नहीं बन सकता; वह दिव्य तेज-राशि से युक्त है — यह ब्राह्मण जान लें।

श्लोक 16 (skanda.3.89.16)

तथापि परया भक्त्या प्रसन्नोऽहं स्तवादिभिः । वसनांतरितं रूपं दर्शयिष्यामि पश्यत ।

tathāpi parayā bhaktyā prasanno 'haṁ stavādibhiḥ vasanāntaritaṁ rūpaṁ darśayiṣyāmi paśyata

तथापि, तुम्हारी परम भक्ति और स्तुति से प्रसन्न होकर, मैं वस्त्र के आवरण में ढका हुआ रूप तुम्हें दिखाऊँगा — देखो।

श्लोक 17 (skanda.3.89.17)

एवमुक्तास्तदा विप्राः सर्वकार्यसमुत्सुकाः । महारूपं महाकायं महापुच्छसमाकुलम् ।

evam uktās tadā viprāḥ sarvakāryasamutsukāḥ mahārūpaṁ mahākāyaṁ mahāpucchasamākulam

यह सुनकर ब्राह्मण, अपने कार्य की सिद्धि के लिए अत्यंत उत्सुक होकर, उस महारूप, महाकाय, विशाल पूँछ वाले रूप को —

श्लोक 18 (skanda.3.89.18)

दृष्ट्वा दिव्यस्वरूपं तं हनुमंतं जहर्षिरे । कथंचिद्धैर्यमालंब्य विप्राः प्रोचुः शनैः शनैः ।

dṛṣṭvā divyasvarūpaṁ taṁ hanumantaṁ jaharṣire kathaṁcid dhairyam ālaṁbya viprāḥ procuḥ śanaiḥ śanaiḥ

— देखकर, उस दिव्य-स्वरूप हनुमान को देखकर वे हर्षित हुए; किसी प्रकार धैर्य धारण कर ब्राह्मण धीरे-धीरे बोलने लगे —

श्लोक 19 (skanda.3.89.19)

यथोक्तं तु पुराणेषु तत्तथैव हि दृश्यते । उवाच स हि तान्सर्वांश्चक्षुः प्रच्छाद्य संस्थितान् ।

yathoktaṁ tu purāṇeṣu tat tathaiva hi dṛśyate uvāca sa hi tān sarvāṁś cakṣuḥ pracchādya saṁsthitān

'जैसा पुराणों में कहा गया है, वह ठीक वैसा ही दिखायी देता है।' फिर हनुमान ने अपने नेत्रों को ढककर, उन खड़े हुए सबसे यह कहा —

श्लोक 20 (skanda.3.89.20)

फलानीमानि गृह्णीध्वं भक्षणार्थमृषीश्वराः । एभिस्तु भक्षितैर्विप्रा ह्यतितृप्तिर्भविष्यति । धर्मारण्यं विना वाद्य क्षुधा वः शाम्यति धुवम् ।

phalānīmāni gṛhṇīdhvaṁ bhakṣaṇārtham ṛṣīśvarāḥ ebhis tu bhakṣitair viprā hy atitṛptir bhaviṣyati dharmāraṇyaṁ vinā vādya kṣudhā vaḥ śāmyati dhruvam

'हे ऋषिश्वरो! इन फलों को खाने के लिए ग्रहण करो; इन्हें खाने से, हे विप्रो! तुम्हें अत्यंत तृप्ति मिलेगी। धर्मारण्य पहुँचे बिना भी आज तुम्हारी भूख निश्चय ही शांत हो जाएगी।'

श्लोक 21 (skanda.3.89.21)

व्यास उवाच । क्षुधाक्रांतैस्तदा विप्रैः कृतं वै फलभक्षणम् । अमृतप्राशनमिव तृप्तिस्तेषामजायत ।

vyāsa uvāca kṣudhākrāntais tadā viprai kṛtaṁ vai phalabhakṣaṇam amṛtaprāśanam iva tṛptis teṣām ajāyata

व्यास जी ने कहा — भूख से पीड़ित उन ब्राह्मणों ने तब फलों का भक्षण किया; उन्हें अमृत-पान के समान तृप्ति प्राप्त हुई।

श्लोक 22 (skanda.3.89.22)

न तृषा नैव क्षुच्चैव विप्राः संक्लिष्टमानसाः । अभवन्सहसा राजन्विस्मयाविष्टचेतसः ।

na tṛṣā naiva kṣuc caiva viprāḥ saṁkliṣṭamānasāḥ abhavan sahasā rājan vismayāviṣṭacetasaḥ

उन कष्ट-भरे मन वाले ब्राह्मणों की न प्यास रही, न भूख; हे राजन्! वे सहसा विस्मय से भर गये।

श्लोक 23 (skanda.3.89.23)

ततः प्राहांजनीपुत्रः संप्राप्ते हि कलौ द्विजाः । नागमिष्याम्यहं तत्र मुक्त्वा रामेश्वरं शिवम् ।

tataḥ prāhāñjanīputraḥ saṁprāpte hi kalau dvijāḥ nāgamiṣyāmy ahaṁ tatra muktvā rāmeśvaraṁ śivam

तब अंजनी-पुत्र ने कहा — हे द्विजो! अब जब कलियुग आ चुका है, मैं रामेश्वर शिव को छोड़कर वहाँ नहीं आऊँगा —

श्लोक 24 (skanda.3.89.24)

अभिज्ञानं मया दत्तं गृहीत्वा तत्र गच्छत । तथ्यमेतत्प्रतीयेत तस्य राज्ञो न संशयः ।

abhijñānaṁ mayā dattaṁ gṛhītvā tatra gaccheta tathyam etat pratīyeta tasya rājño na saṁśayaḥ

— किंतु तुम मेरे दिये हुए पहचान-चिह्न को लेकर वहाँ जाओ; इससे राजा को इस सत्य का प्रमाण अवश्य मिल जायेगा, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 25 (skanda.3.89.25)

इत्युक्त्वा बाहुमुद्धृत्य भुजयोरुभयोरपि । पृथग्रोमाणि संगृह्य चकार पुटिकाद्वयम् ।

ity uktvā bāhum uddhṛtya bhujayor ubhayor api pṛthag romāṇi saṁgṛhya cakāra puṭikādvayam

यह कहकर उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं को उठाकर, अलग-अलग रोम एकत्र कर दो पुड़ियाँ बनायीं।

श्लोक 26 (skanda.3.89.26)

भूर्जपत्रेण संवेष्ट्य ते अदाद्विप्रकक्षयोः । वामे तु वामकक्षोत्थां दक्षिणोत्थां तु दक्षिणे ।

bhūrjapatreṇa saṁveṣṭya te adād viprakakṣayoḥ vāme tu vāmakakṣotthāṁ dakṣiṇotthāṁ tu dakṣiṇe

भोजपत्र में लपेटकर उन्होंने वे ब्राह्मण को उसकी दोनों काँखों में दीं — बायीं काँख में बायीं ओर के रोमों वाली, दाहिनी काँख में दाहिनी ओर के रोमों वाली।

श्लोक 27 (skanda.3.89.27)

कामदां रामभक्तस्य अन्येषां क्षयकारिणीम् । उवाच च यदा राजा ब्रूते चिह्नं प्रदीयताम् ।

kāmadāṁ rāmabhaktasya anyeṣāṁ kṣayakāriṇīm uvāca ca yadā rājā brūte cihnaṁ pradīyatām

यह राम-भक्त के लिए कामनापूर्ति करने वाली, और अन्यों के लिए विनाशकारी है। उन्होंने कहा — 'जब राजा प्रमाण-चिह्न माँगे —'

श्लोक 28 (skanda.3.89.28)

तदा प्रदीयतां शीघ्रं वामकक्षोद्भवा पुटी । अथवा तस्य राज्ञस्तु द्वारे तु पुटिकां क्षिप ।

tadā pradīyatāṁ śīghraṁ vāmakakṣodbhavā puṭī athavā tasya rājñas tu dvāre tu puṭikāṁ kṣipa

'— तब बायीं काँख से निकली पुड़िया तुरंत दे देना; अथवा उस राजा के द्वार पर वह पुड़िया फेंक देना —'

श्लोक 29 (skanda.3.89.29)

ज्वालयति च तत्सैन्यं गृहं कोशं तथैव च । महिष्यः पुत्रकाः सर्वं ज्वलमानं भविष्यति ।

jvālayati ca tat sainyaṁ gṛhaṁ kośaṁ tathaiva ca mahiṣyaḥ putrakāḥ sarvaṁ jvalamānaṁ bhaviṣyati

'— यह उसकी सेना, उसके घर तथा कोष को जला देगी; उसकी रानियाँ, पुत्र — सब कुछ जलता हुआ हो जायेगा।'

श्लोक 30 (skanda.3.89.30)

यदा तु वृत्तिं ग्रामांश्च वणिजानां बलिं तथा । पूर्वं स्थितं तु यत्किंचित्तत्तद्दास्यति वाडवाः ।

yadā tu vṛttiṁ grāmāṁś ca vaṇijānāṁ baliṁ tathā pūrvaṁ sthitaṁ tu yat kiṁcit tat tad dāsyati vāḍavāḥ

'हे ब्राह्मणो! जब वह तुम्हें तुम्हारी वृत्ति, गाँव और वणिकों के अधीन जो कुछ भी पहले से नियत था — वह सब लौटा दे —'

श्लोक 31 (skanda.3.89.31)

लिखित्वा निश्चयं कृत्वाप्यथ दद्यात्स पूर्ववत् । करसंपुटकं कृत्वा प्रणमेच्च यदा नृपः ।

likhitvā niścayaṁ kṛtvāpy atha dadyāt sa pūrvavat karasaṁpuṭakaṁ kṛtvā praṇamec ca yadā nṛpaḥ

'— लिखित रूप में निश्चय कर उसे पूर्ववत् प्रदान करे; और जब राजा हाथ जोड़कर प्रणाम करे —'

श्लोक 32 (skanda.3.89.32)

संप्राप्य च पुरा वृत्तिं रामदत्तां द्विजोत्तमाः । ततो दक्षिणकक्षास्थकेशानां पुटिका त्वियम् ।

saṁprāpya ca purā vṛttiṁ rāmadattāṁ dvijottamāḥ tato dakṣiṇakakṣāsthakeśānāṁ puṭikā tv iyam

'— और हे उत्तम द्विजो! तुम अपनी पूर्व वाली, राम-दत्त वृत्ति फिर से प्राप्त करो — तब यह दाहिनी काँख के रोमों वाली पुड़िया —'

श्लोक 33 (skanda.3.89.33)

प्रक्षिप्यतां तदा सैन्यं पुरावच्च भविष्यति । गृहाणि च तथा कोशः पुत्रपौत्रादयस्तथा ।

prakṣipyatāṁ tadā sainyaṁ purāvac ca bhaviṣyati gṛhāṇi ca tathā kośaḥ putrapautrādayas tathā

'— तब फेंकी जाए; उससे उसकी सेना पहले जैसी हो जायेगी, उसके घर, कोष, पुत्र-पौत्र आदि भी सुरक्षित हो जायेंगे।'

श्लोक 34 (skanda.3.89.34)

वह्निना मुच्यमानास्ते दृश्यंते तत्क्षणादिति । श्रुत्वाऽमृतमयं वाक्यं हनुमंतोदितं परम् ।

vahninā mucyamānās te dṛśyante tatkṣaṇād iti śrutvāmṛtamayaṁ vākyaṁ hanumantoditaṁ param

'वे उसी क्षण अग्नि से मुक्त हुए दिखायी देंगे।' हनुमान द्वारा कहे गये इस परम अमृतमय वचन को सुनकर —

श्लोक 35 (skanda.3.89.35)

अलभन्त मुदं विप्रा ननृतुः प्रजगुर्भृशम् । जयं चोदैरयन्केऽपि प्रहसन्ति परस्परम् ।

alabhanta mudaṁ viprā nanṛtuḥ prajaguḥ bhṛśam jayaṁ codairayan ke 'pi prahasanti parasparam

— ब्राह्मणों को अत्यंत हर्ष प्राप्त हुआ; वे नाचने और गाने लगे; कुछ जयकार करने लगे, तथा आपस में हँसने लगे।

श्लोक 36 (skanda.3.89.36)

पुलकांकितसर्वाङ्गाः स्तुवन्ति च मुहुर्मुहुः । पुच्छं तस्य च संगृह्य चुचुंबुः केचिदुत्सुकाः ।

pulakāṅkitasarvāṅgāḥ stuvanti ca muhur muhuḥ pucchaṁ tasya ca saṁgṛhya cucuṁbuḥ kecid utsukāḥ

उनके सब अंग रोमांचित हो उठे, वे बार-बार स्तुति करने लगे; कुछ उत्सुक होकर उनकी पूँछ पकड़कर उसे चूमने लगे।

श्लोक 37 (skanda.3.89.37)

ब्रूतेऽन्यो मम यत्नेन कार्यं नियतमेव हि । अन्यो ब्रूते महाभाग मयेदं कृतमित्युत ।

brūte 'nyo mama yatnena kāryaṁ niyatam eva hi anyo brūte mahābhāga mayedaṁ kṛtam ity uta

एक कहता — 'मेरे ही प्रयत्न से यह कार्य निश्चय ही सिद्ध हुआ है'; दूसरा कहता — 'हे महाभाग! यह तो मैंने ही किया है।'

श्लोक 38 (skanda.3.89.38)

ततः प्रोवाच हनुमांस्त्रिरात्रं स्थीयतामिह । रामतीर्थस्य च फलं यथा प्राप्स्यथ वाडवाः ।

tataḥ provāca hanumāṁs trirātraṁ sthīyatām iha rāmatīrthasya ca phalaṁ yathā prāpsyatha vāḍavāḥ

तब हनुमान ने कहा — 'यहाँ तीन रात्रि ठहरो, ताकि हे ब्राह्मणो! तुम्हें राम-तीर्थ का फल भी प्राप्त हो जाए।'

श्लोक 39 (skanda.3.89.39)

तथेत्युक्त्वाथ ते विप्रा ब्रह्मयज्ञं प्रचक्रिरे । ब्रह्मघोषेण महता तद्वनं बधिरं कृतम् ।

tathety uktvātha te viprā brahmayajñaṁ pracakrire brahmaghoṣeṇa mahatā tad vanaṁ badhiraṁ kṛtam

'ऐसा ही हो' कहकर उन ब्राह्मणों ने ब्रह्म-यज्ञ (वेद-पाठ) आरंभ किया; उनके महान् वेद-घोष से वह वन गूँज उठा।

श्लोक 40 (skanda.3.89.40)

स्थित्वा त्रिरात्रं ते विप्रा गमने कृतबुद्धयः । रात्रौ हनुमतोऽग्रे त इदमूचुः सुभक्तितः ।

sthitvā trirātraṁ te viprā gamane kṛtabuddhayaḥ rātrau hanumato 'gre ta idam ūcuḥ subhaktitaḥ

तीन रात्रि रहकर, जाने का निश्चय कर, वे ब्राह्मण रात्रि में हनुमान के समक्ष अत्यंत भक्तिपूर्वक यह बोले —

श्लोक 41 (skanda.3.89.41)

ब्राह्मणा ऊचुः । वयं प्रातर्गमिष्यामो धर्मारण्यं सुनिर्मलम् । न विस्मार्या वयं तात क्षम्यतां क्षम्यतामिति ।

brāhmaṇā ūcuḥ vayaṁ prātar gamiṣyāmo dharmāraṇyaṁ sunirmalam na vismāryā vayaṁ tāta kṣamyatāṁ kṣamyatām iti

ब्राह्मणों ने कहा — हम प्रातःकाल अत्यंत निर्मल धर्मारण्य को चले जायेंगे। हे तात! हमें भुलाना मत; हमें क्षमा करें, क्षमा करें।

श्लोक 42 (skanda.3.89.42)

ततो वायुसुतो राजन्पर्वतान्महतीं शिलाम् । बृहतीं च चतुःशालां दशयोजनमायतीम् ।

tato vāyusuto rājan parvatān mahatīṁ śilām bṛhatīṁ ca catuḥśālāṁ daśayojanam āyatīm

तब, हे राजन्! वायुपुत्र ने पर्वत से एक विशाल शिला — दस योजन विस्तृत, चार-कक्षों वाली — तोड़ ली,

श्लोक 43 (skanda.3.89.43)

आस्तीर्य प्राह तान्विप्राञ्छिलायां द्विजसत्तमाः । रक्ष्यमाणा मया विप्राः शयीध्वं विगतज्वराः ।

āstīrya prāha tān viprāñ chilāyāṁ dvijasattamāḥ rakṣyamāṇā mayā viprāḥ śayīdhvaṁ vigatajvarāḥ

और उसे बिछाकर, उन उत्तम ब्राह्मणों से बोले — 'मेरी सुरक्षा में, हे विप्रो! तुम इस शिला पर निश्चिंत होकर सो जाओ।'

श्लोक 44 (skanda.3.89.44)

इति श्रुत्वा ततः सर्वे निद्रामापुः सुखप्रदाम् । एवं ते कृतकृत्यास्तु भूत्वा सुप्ता निशामुखे ।

iti śrutvā tataḥ sarve nidrām āpuḥ sukhapradām evaṁ te kṛtakṛtyās tu bhūtvā suptā niśāmukhe

यह सुनकर सभी सुखदायी निद्रा में सो गये; इस प्रकार अपना कार्य पूर्ण मानकर वे रात्रि के आरंभ में ही सो गये।

श्लोक 45 (skanda.3.89.45)

कृपालुः स च रुद्रात्मा रामशासनपालकः । रक्षणार्थं हि विप्राणामतिष्ठच्च धरातले ।

kṛpāluḥ sa ca rudrātmā rāmaśāsanapālakaḥ rakṣaṇārthaṁ hi viprāṇām atiṣṭhac ca dharātale

वह करुणामय, रुद्र-आत्मा, राम-शासन के रक्षक, ब्राह्मणों की रक्षा के लिए वहीं पृथ्वी पर खड़े रहे।

श्लोक 46 (skanda.3.89.46)

व्यास उवाच । अर्द्धरात्रे तु संप्राप्ते सर्वे निद्रामुपागताः । तातं संप्रार्थयामास कृतानुग्रहको भवान् ।

vyāsa uvāca ardharātre tu saṁprāpte sarve nidrām upāgatāḥ tātaṁ saṁprārthayāmāsa kṛtānugrahako bhavān

व्यास जी ने कहा — आधी रात होने पर, जब सब निद्रा में लीन थे, उन्होंने (हनुमान ने) अपने पिता (वायुदेव) से प्रार्थना की — 'आप मुझ पर अनुग्रह करें —'

श्लोक 47 (skanda.3.89.47)

समीरण द्विजानेतान्स्थानं स्वं प्रापयस्व भोः । ततो निद्राभिभूतांस्तान्वायुपुत्रप्रणोदितः ।

samīraṇa dvijān etān sthānaṁ svaṁ prāpayasva bhoḥ tato nidrābhibhūtāṁs tān vāyuputrapraṇoditaḥ

'— हे समीरण! इन द्विजों को उनके स्वस्थान तक पहुँचा दीजिए।' तब वायुपुत्र द्वारा प्रेरित होकर, निद्रा में डूबे उन ब्राह्मणों को —

श्लोक 48 (skanda.3.89.48)

समुद्धृत्य शिलां तां तु पिता पुत्रेण भारत । विशिष्टो यापयामास स्वस्थानं द्विजसत्तमान् ।

samuddhṛtya śilāṁ tāṁ tu pitā putreṇa bhārata viśiṣṭo yāpayāmāsa svasthānaṁ dvijasattamān

— हे भारत! उस पिता (वायु) ने पुत्र (हनुमान) के अनुरोध से उस शिला सहित उन ब्राह्मणों को उठा लिया, और विशेष रूप से उन्हें उनके स्वस्थान पहुँचा दिया।

श्लोक 49 (skanda.3.89.49)

षड्भिर्मासैश्च यः पन्था अतिक्रांतो द्विजातिभिः । त्रिभिरेव मुहूर्त्तैस्तु धर्मारण्यमवाप्तवान् ।

ṣaḍbhir māsaiś ca yaḥ panthā atikrānto dvijātibhiḥ tribhir eva muhūrtais tu dharmāraṇyam avāptavān

जिस मार्ग को तय करने में उन द्विजों को छह महीने लगे थे, उसे केवल तीन मुहूर्तों में ही पार करके वे धर्मारण्य पहुँच गये।

श्लोक 50 (skanda.3.89.50)

भ्रममाणां शिलां ज्ञात्वा विप्र एको द्विजाग्रतः । वात्स्यगोत्रसमुत्पन्नो लोकान्संगीतवान्कलम् ।

bhramamāṇāṁ śilāṁ jñātvā vipra eko dvijāgrataḥ vātsyagotrasamutpanno lokān saṁgītavān kalam

उस उड़ती हुई शिला को जानकर, वात्स्य गोत्र में उत्पन्न, द्विजों में अग्रणी एक ब्राह्मण ने मधुर स्वर में गीत गाना आरंभ कर दिया,

श्लोक 51 (skanda.3.89.51)

गीतानि गायनोक्तानि श्रुत्वा विस्मयमाययुः । प्रभाते सुप्रसन्ने तु उदतिष्ठन्परस्परम् ।

gītāni gāyanoktāni śrutvā vismayam āyayuḥ prabhāte suprasanne tu udatiṣṭhan parasparam

और उस गायक द्वारा गाये गये गीतों को सुनकर वे सब विस्मित हो गये; प्रसन्न प्रभात-काल में वे एक-दूसरे से उठकर बैठ गये।

श्लोक 52 (skanda.3.89.52)

ऊचुस्ते विस्मिताः सर्वे स्वप्नोऽयं वाथ विभ्रमः । ससंभ्रमाः समुत्थाय ददृशुः सत्यमंदिरम् ।

ūcus te vismitāḥ sarve svapno 'yaṁ vātha vibhramaḥ sasaṁbhramāḥ samutthāya dadṛśuḥ satyamandiram

सभी विस्मित होकर बोले — 'क्या यह स्वप्न है, अथवा भ्रम?' घबराकर उठते ही उन्होंने सत्यमंदिर को देखा।

श्लोक 53 (skanda.3.89.53)

अंतर्बुद्ध्या समालोक्य प्रभावो वायुजस्य च । श्रुत्वा वेदध्वनिं विप्राः परं हर्षमुपागताः ।

antarbuddhyā samālokya prabhāvo vāyujasya ca śrutvā vedadhvaniṁ viprāḥ paraṁ harṣam upāgatāḥ

अपने अंतर्ज्ञान से यह समझते हुए कि यह वायुपुत्र का ही प्रभाव है, तथा वेद-ध्वनि सुनकर, ब्राह्मण परम हर्ष को प्राप्त हुए।

श्लोक 54 (skanda.3.89.54)

ग्रामीणाश्च ततो लोका दृष्ट्वा तु महतीं शिलाम् । अद्भुतं मेनिरे सर्वे किमिदं किमिदं त्विति ।

grāmīṇāś ca tato lokā dṛṣṭvā tu mahatīṁ śilām adbhutaṁ menire sarve kim idaṁ kim idaṁ tv iti

उस विशाल शिला को देखकर गाँव के लोग भी अद्भुत मानने लगे — 'यह क्या है, यह क्या है?' — ऐसा कहते हुए।

श्लोक 55 (skanda.3.89.55)

गृहेगृहे हि ते लोकाः प्रवदंति तथाद्भुतम् । ब्राह्मणैः पूर्यमाणा सा शिला च महती शुभा ।

gṛhe gṛhe hi te lokāḥ pravadanti tathādbhutam brāhmaṇaiḥ pūryamāṇā sā śilā ca mahatī śubhā

हर घर में लोग इस अद्भुत घटना की चर्चा करने लगे — कि ब्राह्मणों से भरी वह विशाल, शुभ शिला —

श्लोक 56 (skanda.3.89.56)

अशुभा वा शुभा वापि न जानीमो वयं किल । संवदंते ततो लोकाः परस्परमिदं वचः ।

aśubhā vā śubhā vāpi na jānīmo vayaṁ kila saṁvadante tato lokāḥ parasparam idaṁ vacaḥ

'— हम नहीं जानते कि यह अशुभ है अथवा शुभ।' तब लोग आपस में यह वचन कहने लगे।

श्लोक 57 (skanda.3.89.57)

व्यास उवाच । ततो द्विजानां ते पुत्राः पौत्राश्चैव समागताः । ऊचुस्ते दिष्ट्या भो विप्राः आगताः पथिका द्विजाः ।

vyāsa uvāca tato dvijānāṁ te putrāḥ pautrāś caiva samāgatāḥ ūcus te diṣṭyā bho viprāḥ āgatāḥ pathikā dvijāḥ

व्यास जी ने कहा — तब उन द्विजों के पुत्र और पौत्र एकत्रित होकर आये और कहने लगे — 'हे विप्रो! सौभाग्य से यात्री द्विज लौट आये हैं!'

श्लोक 58 (skanda.3.89.58)

ते तु संतुष्टमनसा सन्मुखाः प्रययुर्मुदा । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां परिरंभणकं तथा ।

te tu saṁtuṣṭamanasā sanmukhāḥ prayayur mudā pratyutthānābhivādābhyāṁ pariraṁbhaṇakaṁ tathā

वे संतुष्ट मन से, हर्षपूर्वक उनके सामने गये; उठकर अभिवादन करते हुए और आलिंगन करते हुए —

श्लोक 59 (skanda.3.89.59)

आघ्राणकादींश्च कृत्वा यथायोग्यं प्रपूज्य च । सर्वं विस्तार्य कथितं शीघ्रमागममात्मनः ।

āghrāṇakādīṁś ca kṛtvā yathāyogyaṁ prapūjya ca sarvaṁ vistārya kathitaṁ śīghram āgamam ātmanaḥ

— माथा सूँघने आदि विधियों से यथायोग्य पूजा कर, उन्होंने सबको विस्तार से अपने शीघ्र लौट आने की कथा सुनायी।

श्लोक 60 (skanda.3.89.60)

ततः संपूज्य तत्सर्वान्गंधतांबूलकुंकुमैः । शांतिपाठं पठंतस्ते हृष्टा निजगृहान्ययुः ।

tataḥ saṁpūjya tat sarvān gandhatāṁbūlakuṁkumaiḥ śāntipāṭhaṁ paṭhantas te hṛṣṭā nijagṛhān yayuḥ

तब चंदन, पान और कुंकुम से उन सबकी पूजा कर, शांतिपाठ पढ़ते हुए, प्रसन्न होकर वे अपने-अपने घरों को गये।

श्लोक 61 (skanda.3.89.61)

आनंदाया महापीठे प्रातः पांथाः समुत्थिताः । ददृशुस्ते महास्थानं सोत्कंठा हर्षपूरिताः ।

ānaṁdāyā mahāpīṭhe prātaḥ pānthāḥ samutthitāḥ dadṛśus te mahāsthānaṁ sotkaṇṭhā harṣapūritāḥ

आनंदा देवी के महापीठ पर सुबह ही वे यात्री उठे; उत्कंठा और हर्ष से भरकर उन्होंने उस महान् स्थान को देखा।

श्लोक 62 (skanda.3.89.62)

आश्चर्यं परमं प्रापुः किमेतत्स्थानमुत्तमम् । अयं तु दक्षिण द्वारे शांतिपाठोऽत्र पठ्यते ।

āścaryaṁ paramaṁ prāpuḥ kim etat sthānam uttamam ayaṁ tu dakṣiṇa dvāre śāntipāṭho 'tra paṭhyate

उन्हें परम आश्चर्य हुआ — 'यह कौन-सा उत्तम स्थान है?' यहाँ दक्षिण द्वार पर शांतिपाठ पढ़ा जा रहा था —

श्लोक 63 (skanda.3.89.63)

गृहा रम्याः प्रदृश्यंते शचीपतिगृहोपमाः । प्रासादाः कुलमातॄणां दृश्यंते चाग्निशोभनाः ।

gṛhā ramyāḥ pradṛśyante śacīpatigṛhopamāḥ prāsādāḥ kulamātṝṇāṁ dṛśyante cāgniśobhanāḥ

रमणीय घर दिखायी दे रहे थे, इन्द्र के भवन के समान; कुलमाताओं के मंदिर भी अग्नि-सी शोभा से दृश्यमान थे।

श्लोक 64 (skanda.3.89.64)

एवं ब्रुवत्सु विप्रेषु महाशक्तिप्रपूजने । आगतो ब्राह्मणोऽपश्यत्तत्र विप्रकदंबकम् ।

evaṁ bruvatsu vipreṣu mahāśaktiprapūjane āgato brāhmaṇo 'paśyat tatra viprakadaṁbakam

इस प्रकार बातें करते हुए ब्राह्मण महाशक्ति की पूजा के स्थान पर पहुँचे; वहाँ आये एक ब्राह्मण ने उस ब्राह्मण-समूह को देखा।

श्लोक 65 (skanda.3.89.65)

हर्षितो भावितस्तत्र यत्र विप्राः सभासदः । उवाव दिष्ट्या भो विप्राः ह्यागताः पथिका द्विजाः ।

harṣito bhāvitas tatra yatra viprāḥ sabhāsadaḥ uvāva diṣṭyā bho viprāḥ hy āgatāḥ pathikā dvijāḥ

प्रसन्न और भावुक होकर, जहाँ ब्राह्मण सभासद थे, वहाँ जाकर उसने कहा — 'हे विप्रो! सौभाग्य से यात्री द्विज लौट आये हैं!'

श्लोक 66 (skanda.3.89.66)

प्रत्युत्तस्थुस्ततो विप्राः पूजां गृहीत्वा समागताः । प्रत्युत्थानाभिवादौ चाकुर्वंस्ते च परस्परम् ।

pratyuttasthus tato viprāḥ pūjāṁ gṛhītvā samāgatāḥ pratyutthānābhivādau cākurvaṁs te ca parasparam

तब ब्राह्मण उठे और पूजा-सामग्री लेकर उनके पास आये; उन्होंने आपस में उठकर अभिवादन किया।

श्लोक 67 (skanda.3.89.67)

तेते संपूज्य वेगात्तु यथायोग्यं यथाविधि । हरीश्वरस्य यद्वृत्तं विप्राग्रे संप्रकाशितम् ।

te te saṁpūjya vegāt tu yathāyogyaṁ yathāvidhi harīśvarasya yad vṛttaṁ viprāgre saṁprakāśitam

यथायोग्य विधिपूर्वक शीघ्रता से एक-दूसरे की पूजा कर, हरीश्वर (हनुमान) से जो कुछ हुआ था, वह सब ब्राह्मणों के समक्ष प्रकट किया गया।

श्लोक 68 (skanda.3.89.68)

पथिकानां वचः श्रुत्वा हर्षपूर्णा द्विजोत्तमाः । शांतिपाठं पठन्तस्ते हृष्टा निजगृहान्ययुः ।

pathikānāṁ vacaḥ śrutvā harṣapūrṇā dvijottamāḥ śāntipāṭhaṁ paṭhantas te hṛṣṭā nijagṛhān yayuḥ

उन यात्रियों के वचन सुनकर, हर्ष से भरे उत्तम द्विज शांतिपाठ पढ़ते हुए प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरों को गये।

श्लोक 69 (skanda.3.89.69)

विमृश्य मिलिताः प्रातर्ज्योतिर्विद्भिः प्रतिष्ठिताः । ब्राह्मे मूहूर्ते चोत्थाय कान्यकुब्जं गता द्विजाः ।

vimṛśya militāḥ prātar jyotirvidbhiḥ pratiṣṭhitāḥ brāhme mūhūrte cotthāya kānyakubjaṁ gatā dvijāḥ

विचार-विमर्श कर, ज्योतिषियों द्वारा निश्चित समय पर प्रातःकाल एकत्रित होकर, ब्राह्ममुहूर्त में उठकर वे द्विज कान्यकुब्ज की ओर चल पड़े।

श्लोक 70 (skanda.3.89.70)

दोलाभिर्वाहिताः केचित्केचिदश्वै रथैस्तथा । केचित्तु शिबिकारूढा नानावाहनगाश्च ते ।

dolābhir vāhitāḥ kecit kecid aśvai rathais tathā kecit tu śibikārūḍhā nānāvāhanagāś ca te

कुछ पालकियों में सवार होकर, कुछ घोड़ों और रथों से, कुछ पालकी पर चढ़कर — वे नाना प्रकार के वाहनों से गये।

श्लोक 71 (skanda.3.89.71)

तत्पुरं तु समासाद्य गंगायाः शोभने तटे । अकुर्वन्वसतिं वीराः स्नानदानादिकर्म्म च ।

tatpuraṁ tu samāsādya gaṅgāyāḥ śobhane taṭe akurvan vasatiṁ vīrāḥ snānadānādikarma ca

उस नगर में पहुँचकर, गंगा के सुंदर तट पर उन वीरों ने निवास किया, तथा स्नान-दान आदि कर्म भी सम्पन्न किये।

श्लोक 72 (skanda.3.89.72)

चरेण केनचिद्दृष्टाः कथिता नृपसन्निधौ । अश्वाश्च बहुशो दोला रथाश्च बहुशो वृषाः ।

careṇa kenacid dṛṣṭāḥ kathitā nṛpasannidhau aśvāś ca bahuśo dolā rathāś ca bahuśo vṛṣāḥ

किसी गुप्तचर ने उन्हें देखा और राजा के समक्ष सूचना दी — 'अनेक घोड़े, पालकियाँ, रथ और बैलगाड़ियाँ —

श्लोक 73 (skanda.3.89.73)

विप्राणामिह दृश्यंते धर्मारण्यनिवासिनाम् । नूनं ते च समायाता नृपेणोक्तं ममाग्रतः ।

viprāṇām iha dṛśyante dharmāraṇyanivāsinām nūnaṁ te ca samāyātā nṛpeṇoktaṁ mamāgrataḥ

यहाँ धर्मारण्य-निवासी ब्राह्मणों के दिखायी दे रहे हैं; निश्चय ही वे लौट आये हैं।' राजा ने मेरे समक्ष यह कहा —

श्लोक 74 (skanda.3.89.74)

अभिज्ञापय मे पूर्वं प्रेषिताः कपिसंनिधौ । इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे पूर्वभागे धर्मारण्यमाहात्म्ये ब्राह्मणानां प्रत्यागमन वर्णनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः

abhijñāpaya me pūrvaṁ preṣitāḥ kapisaṁnidhau iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe pūrvabhāge dharmāraṇyamāhātmye brāhmaṇānāṁ pratyāgamanavarṇanaṁ nāma saptatriṁśo 'dhyāyaḥ

'— मुझे पहले सूचित करो — जो ब्राह्मण वानर (हनुमान) के पास भेजे गये थे, क्या वे ही लौटे हैं?' इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एक लाख इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड के पूर्वभाग में, धर्मारण्य-माहात्म्य के अंतर्गत, ब्राह्मणों के प्रत्यागमन-वर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90