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काशी खण्ड · अध्याय 11

वह्निलोकवर्णनम्

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (skanda.4.11.1)

अगस्तिरुवाच । शृणु सुश्रोणि सुभगे वैश्वानरसमुद्भवम् । पुण्यशीलसुशीलाभ्यां यथोक्तं शिवशर्मणे

agastiruvāca śṛṇu suśroṇi subhage vaiśvānarasamudbhavam puṇyaśīlasuśīlābhyāṁ yathoktaṁ śivaśarmaṇe

अगस्त्य जी ने कहा -- हे सुभगे, सुश्रोणि! जैसा पुण्यशील और सुशील (दोनों गणों) ने शिवशर्मा से कहा था, वैसे ही वैश्वानर (अग्नि) की उत्पत्ति की कथा सुनो।

श्लोक 2 (skanda.4.11.2)

अथ कालेन तद्योषिदंतर्वत्नी बभूव ह । विधिवद्विहिते तेन गर्भाधानाख्य कर्मणि

atha kālena tadyoṣidaṁtarvatnī babhūva ha vidhivadvihite tena garbhādhānākhya karmaṇi

फिर समय आने पर उस स्त्री (शुचिष्मती) ने, विधिपूर्वक गर्भाधान नामक संस्कार सम्पन्न होने पर, गर्भ धारण किया।

श्लोक 3 (skanda.4.11.3)

ततः पुंसवनं तेन स्पंदनात्प्राग्विपश्चिता । गृह्योक्तविधिना सम्यक्कृतं पुंस्त्वविवृद्धये

tataḥ puṁsavanaṁ tena spaṁdanātprāgvipaścitā gṛhyoktavidhinā samyakkṛtaṁ puṁstvavivṛddhaye

तत्पश्चात गर्भ में स्पंदन होने से पहले ही, उस विद्वान ने गृह्यसूत्रोक्त विधि से भलीभाँति पुंसवन संस्कार किया, जिससे पुत्रत्व की वृद्धि हो।

श्लोक 4 (skanda.4.11.4)

सीमन्तोथाष्टमे मासि गर्भरूपसमृद्धिकृत् । सुखप्रसव सिद्ध्यै च तेनाकारि क्रियाविदा

sīmantothāṣṭame māsi garbharūpasamṛddhikṛt sukhaprasava siddhyai ca tenākāri kriyāvidā

फिर आठवें मास में सीमंतोन्नयन संस्कार किया गया, जो गर्भ के स्वरूप को समृद्ध करने वाला और सुखपूर्वक प्रसव की सिद्धि के लिए, कर्मकुशल पिता द्वारा सम्पन्न किया गया।

श्लोक 5 (skanda.4.11.5)

अथातः सत्सुतारासु ताराधिप वराननः । केंद्रे गुरौ शुभे लग्ने सुग्रहेष्वयुगेषु च

athātaḥ satsutārāsu tārādhipa varānanaḥ keṁdre gurau śubhe lagne sugraheṣvayugeṣu ca

इसके बाद, जब नक्षत्र शुभ थे, तारापति (चंद्रमा) सुंदर मुखवाला था, गुरु केंद्र में स्थित था, लग्न शुभ था, ग्रह अनुकूल थे और विषम राशियों में स्थित थे --

श्लोक 6 (skanda.4.11.6)

अरिष्टं दीपयन्दीप्त्या सर्वारिष्टविनाशकृत् । तनयो नाम तस्यां तु शुचिष्मत्यां बभूव ह

ariṣṭaṁ dīpayandīptyā sarvāriṣṭavināśakṛt tanayo nāma tasyāṁ tu śuciṣmatyāṁ babhūva ha

-- तब शुचिष्मती के गर्भ से, समस्त अरिष्ट का नाश करने वाला तथा अपनी दीप्ति से अरिष्ट को भी दीप्त कर देने वाला एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 7 (skanda.4.11.7)

सद्यः समस्तसुखदो भूर्भुवःस्वर्निवासिनाम् । गंधवाहागन्धवाहादिग्वधूमुखवासनाः

sadyaḥ samastasukhado bhūrbhuvaḥsvarnivāsinām gaṁdhavāhāgandhavāhādigvadhūmukhavāsanāḥ

वह तत्काल भूः, भुवः और स्वः के निवासियों को समस्त सुख देने वाला हुआ; दिशाओं की वधुओं के मुखों पर सुगंधवाही वायु सुगंध फैलाने लगी;

श्लोक 8 (skanda.4.11.8)

इष्टगन्धप्रसूनौघैर्ववर्षुस्ते घनाघनाः । देवदुन्दुभयो नेदुः प्रसेदुः सर्वतोदिशः

iṣṭagandhaprasūnaughairvavarṣuste ghanāghanāḥ devadundubhayo neduḥ praseduḥ sarvatodiśaḥ

उन घनघोर मेघों ने प्रिय सुगंधित पुष्पों की वर्षा की; देवताओं के दुंदुभि बज उठे; सभी दिशाएँ प्रसन्न हो उठीं।

श्लोक 9 (skanda.4.11.9)

परितः सरितः स्वच्छा भूतानां मानसैः सह ९ । तमोऽताम्यत्तु नितरां रजोपि विरजोभवत्

paritaḥ saritaḥ svacchā bhūtānāṁ mānasaiḥ saha 9 tamo'tāmyattu nitarāṁ rajopi virajobhavat

चारों ओर नदियाँ प्राणियों के मन के समान स्वच्छ हो गईं; अंधकार अत्यंत क्षीण हो गया, और रज भी निर्मल हो गया।

श्लोक 10 (skanda.4.11.10)

सत्त्वाः सत्त्वसमायुक्ता वसुधासीच्छुभा तदा । कल्याणी सर्वतो वाणी प्राणिनः प्रीणयंत्यभूत्

sattvāḥ sattvasamāyuktā vasudhāsīcchubhā tadā kalyāṇī sarvato vāṇī prāṇinaḥ prīṇayaṁtyabhūt

उस समय सभी प्राणी सत्त्वगुण से युक्त हो गए, पृथ्वी शुभ हो उठी, और सर्वत्र एक कल्याणकारी आकाशवाणी प्राणियों को प्रसन्न करने लगी।

श्लोक 11 (skanda.4.11.11)

तिलोत्तमोर्वशीरंभा प्रभा विद्युत्प्रभा शुभा । सुमंगला शुभालापा सुशीलाड्या(?) वरांगनाः

tilottamorvaśīraṁbhā prabhā vidyutprabhā śubhā sumaṁgalā śubhālāpā suśīlāḍyā(?) varāṁganāḥ

तिलोत्तमा, उर्वशी, रंभा, प्रभा, विद्युत्प्रभा, शुभा, सुमंगला, शुभालापा तथा सुशीलाढ्या(?) जैसी श्रेष्ठ अप्सराएँ --

श्लोक 12 (skanda.4.11.12)

क्वणत्कंकण पात्राणि कृत्वा करतलं मुदा । मुक्तमुक्ताफलाढ्यानि यक्षकर्दमवंति च

kvaṇatkaṁkaṇa pātrāṇi kṛtvā karatalaṁ mudā muktamuktāphalāḍhyāni yakṣakardamavaṁti ca

-- हर्ष से खनकते हुए कंकणों वाली अपनी हथेलियों को मानो पात्र बनाकर, मुक्ता-फलों और यक्षकर्दम (सुगंधित लेप) से भरे --

श्लोक 13 (skanda.4.11.13)

वज्रवैदूर्य दीपानि हरिद्रा लेपनानि च । गारुत्मतैकरूपाणि शंखशुक्तिदधीनि च

vajravaidūrya dīpāni haridrā lepanāni ca gārutmataikarūpāṇi śaṁkhaśuktidadhīni ca

-- वज्र और वैदूर्य के दीपकों, हल्दी के लेपों, गारुत्मत (पन्ने) से बने एकरूप आभूषणों, तथा शंख और सीप में रखे दही से --

श्लोक 14 (skanda.4.11.14)

पद्मरागप्रवालाख्यरत्नकुंकुमवंति च । गोमेदपुष्परागेंद्र नीलसन्माल्यभांजि च

padmarāgapravālākhyaratnakuṁkumavaṁti ca gomedapuṣparāgeṁdra nīlasanmālyabhāṁji ca

-- पद्मराग और प्रवाल नामक रत्नों तथा कुंकुम से, और गोमेद, पुष्पराग तथा उत्तम नीलमणि की मालाओं से युक्त वस्तुएँ लिए --

श्लोक 15 (skanda.4.11.15)

विद्याधर्यश्च किन्नर्यस्तथाऽमर्यः सहस्रशः । चामर व्यग्रहस्ताग्र मंगलद्रव्यपाणयः

vidyādharyaśca kinnaryastathā'maryaḥ sahasraśaḥ cāmara vyagrahastāgra maṁgaladravyapāṇayaḥ

विद्याधरियाँ, किन्नरियाँ तथा सहस्रों देवांगनाएँ, अपने हाथों में चंवर लिए, हाथों की उँगलियों में मंगल-द्रव्य धारण किए हुए,

श्लोक 16 (skanda.4.11.16)

गंधर्वोरगयक्षाणां सुवासिन्यः शुभस्वराः । गायंत्यो ललितं गीतं तत्राजग्मुरनेकशः

gaṁdharvoragayakṣāṇāṁ suvāsinyaḥ śubhasvarāḥ gāyaṁtyo lalitaṁ gītaṁ tatrājagmuranekaśaḥ

तथा गंधर्वों, नागों और यक्षों की सुवासिनी, मधुर स्वर वाली पत्नियाँ मधुर गीत गाती हुई, वहाँ अनेक संख्या में आ पहुँचीं।

श्लोक 17 (skanda.4.11.17)

मरीचिरत्रि पुलहः पुलस्त्यः क्रतुरंगिराः । वसिष्ठः कश्यपश्चाहं विभांडो मांडवीसुतः

marīciratri pulahaḥ pulastyaḥ kraturaṁgirāḥ vasiṣṭhaḥ kaśyapaścāhaṁ vibhāṁḍo māṁḍavīsutaḥ

मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप और मैं स्वयं (अगस्त्य), मांडवी-पुत्र विभांडक,

श्लोक 18 (skanda.4.11.18)

लोमशो लोमचरणो भरद्वाजोथ गौतमः । भृगुस्तु गालवो गर्गो जातूकर्ण्यः पराशरः

lomaśo lomacaraṇo bharadvājotha gautamaḥ bhṛgustu gālavo gargo jātūkarṇyaḥ parāśaraḥ

लोमश, लोमचरण, भरद्वाज तथा गौतम, भृगु, गालव, गर्ग, जातूकर्ण्य, पराशर,

श्लोक 19 (skanda.4.11.19)

आपस्तंबो याज्ञवल्क्य दक्षवाल्मीकिमुद्गलाः । शातातपश्च लिखितः शिलादः शंखउंछभुक्

āpastaṁbo yājñavalkya dakṣavālmīkimudgalāḥ śātātapaśca likhitaḥ śilādaḥ śaṁkhauṁchabhuk

आपस्तंब, याज्ञवल्क्य, दक्ष, वाल्मीकि, मुद्गल, शातातप, लिखित, शिलाद तथा शंख (जो केवल गिरे हुए अन्न से जीवनयापन करता था),

श्लोक 20 (skanda.4.11.20)

जमदग्निश्च संवर्तो मतंगो भरतोंशुमान् । व्यासः कात्यायनः कुत्सः शौनकः सुश्रुतः शुकः

jamadagniśca saṁvarto mataṁgo bharatoṁśumān vyāsaḥ kātyāyanaḥ kutsaḥ śaunakaḥ suśrutaḥ śukaḥ

जमदग्नि, संवर्त, मतंग, भरत, अंशुमान, व्यास, कात्यायन, कुत्स, शौनक, सुश्रुत, शुक,

श्लोक 21 (skanda.4.11.21)

ऋष्यशृंगोथ दुर्वासा रुचिर्नारदतुंबुरू । उत्तंको वामदेवश्च च्यवनोसितदेवलौ

ṛṣyaśṛṁgotha durvāsā rucirnāradatuṁburū uttaṁko vāmadevaśca cyavanositadevalau

ऋष्यशृंग, दुर्वासा, रुचि, नारद और तुंबुरु, उत्तंक, वामदेव, च्यवन, असित और देवल,

श्लोक 22 (skanda.4.11.22)

शालंकायनहारी तौ विश्वामित्रोथभार्गवः । मृकंडः सह पुत्रेण दाल्भ्य उद्दालकस्तथा

śālaṁkāyanahārī tau viśvāmitrothabhārgavaḥ mṛkaṁḍaḥ saha putreṇa dālbhya uddālakastathā

शालंकायन, दोनों हारी (नामक ऋषि), विश्वामित्र और भार्गव, अपने पुत्र (मार्कंडेय) सहित मृकंड, दाल्भ्य तथा उद्दालक --

श्लोक 23 (skanda.4.11.23)

धौम्योपमन्युवत्साद्या मुनयो मुनिकन्यकाः । तच्छांत्यर्थं समाजग्मुर्धन्यं विश्वानराश्रमम्

dhaumyopamanyuvatsādyā munayo munikanyakāḥ tacchāṁtyarthaṁ samājagmurdhanyaṁ viśvānarāśramam

-- धौम्य, उपमन्यु, वत्स आदि मुनि, तथा मुनि-कन्याएँ भी, उस शांति-कर्म के लिए विश्वानर के उस धन्य आश्रम में एकत्र हुए।

श्लोक 24 (skanda.4.11.24)

ब्रह्मा बृहस्पतियुतो देवो गरुडवाहनः । नंदि भृंगि समायुक्तो गौर्या सह वृषध्वजः

brahmā bṛhaspatiyuto devo garuḍavāhanaḥ naṁdi bhṛṁgi samāyukto gauryā saha vṛṣadhvajaḥ

बृहस्पति सहित ब्रह्मा जी, गरुड़वाहन देव (विष्णु), तथा नंदी और भृंगी सहित गौरी के साथ वृषभध्वज (शिव) भी वहाँ पधारे।

श्लोक 25 (skanda.4.11.25)

महेंद्रमुख्या गीर्वाणा नागाः पातालवासिनः । रत्नान्यादाय बहुशः ससरित्का महाब्धयः

maheṁdramukhyā gīrvāṇā nāgāḥ pātālavāsinaḥ ratnānyādāya bahuśaḥ sasaritkā mahābdhayaḥ

महेंद्र आदि प्रमुख देवगण, पाताल-निवासी नाग बहुत सारे रत्न लेकर, तथा नदियों सहित महासागर भी --

श्लोक 26 (skanda.4.11.26)

स्थावरा जंगमं रूपं धृत्वा याताः सहस्रशः । महामहोत्सवे तस्मिन्बभूवाकालकौमुदी

sthāvarā jaṁgamaṁ rūpaṁ dhṛtvā yātāḥ sahasraśaḥ mahāmahotsave tasminbabhūvākālakaumudī

-- और स्थावर प्राणी भी चर रूप धारण करके सहस्रों की संख्या में वहाँ गए; उस महान उत्सव में मानो असमय ही चाँदनी छा गई।

श्लोक 27 (skanda.4.11.27)

जातकर्म स्वयं चक्रे तस्य देवः पितामहः । श्रुतिं विचार्य तद्रूपां नाम्ना गृहपतिस्त्वयम्

jātakarma svayaṁ cakre tasya devaḥ pitāmahaḥ śrutiṁ vicārya tadrūpāṁ nāmnā gṛhapatistvayam

पितामह देव (ब्रह्मा) ने स्वयं उसका जातकर्म संस्कार किया; श्रुति का विचार करके उन्होंने उसे 'गृहपति' नाम दिया।

श्लोक 28 (skanda.4.11.28)

इति नाम ददौ तस्मै देयमेकादशेहनि । नामकर्मविधानेन तदर्थं श्रुतिमुच्चरन्

iti nāma dadau tasmai deyamekādaśehani nāmakarmavidhānena tadarthaṁ śrutimuccaran

इस प्रकार उन्होंने उसे नामकरण-संस्कार की विधि के अनुसार, ग्यारहवें दिन दिए जाने वाला यह नाम दिया, तथा उसके लिए उपयुक्त श्रुति-मंत्र का उच्चारण किया --

श्लोक 29 (skanda.4.11.29)

अयमग्निर्गृहपतिर्गार्हपत्यः प्रजाया वसुवित्तमः । अग्ने गृहपतेभिद्युम्नमभि सह आयच्छस्व

ayamagnirgṛhapatirgārhapatyaḥ prajāyā vasuvittamaḥ agne gṛhapatebhidyumnamabhi saha āyacchasva

"यह अग्नि गृहपति है, गार्हपत्य है, संतान के लिए धन का सर्वोत्तम प्राप्तकर्ता है। हे अग्नि गृहपते! हमें तेज और बल प्रदान करो।"

श्लोक 30 (skanda.4.11.30)

अग्ने गृहपते स्थित्या परामपि निदर्शयन् । चतुर्निगममंत्रोक्तैराशीर्भिरभिनंद्य च

agne gṛhapate sthityā parāmapi nidarśayan caturnigamamaṁtroktairāśīrbhirabhinaṁdya ca

"हे अग्नि गृहपते! परम स्थिरता को भी दर्शाते हुए" -- इस प्रकार चार वैदिक मंत्रों में कहे गए आशीर्वादों से अभिनंदन करके,

श्लोक 31 (skanda.4.11.31)

कृत्वा बालोचितां रक्षां हरेण हरिणा सह । निर्ययौ हंसमारुह्य सर्वेषां प्रपितामहः

kṛtvā bālocitāṁ rakṣāṁ hareṇa hariṇā saha niryayau haṁsamāruhya sarveṣāṁ prapitāmahaḥ

हर (शिव) और हरि (विष्णु) के साथ मिलकर शिशु के योग्य रक्षा-विधान करने के बाद, सबके प्रपितामह (ब्रह्मा) हंस पर सवार होकर वहाँ से चले गए।

श्लोक 32 (skanda.4.11.32)

अहोरूपमहो तेजस्त्वहो सर्वांगलक्षणम् । अहो शुचिष्मतीभाग्यमाविरासीत्स्वयं हरः

ahorūpamaho tejastvaho sarvāṁgalakṣaṇam aho śuciṣmatībhāgyamāvirāsītsvayaṁ haraḥ

"अहो, कैसा रूप! अहो, कैसा तेज! अहो, सभी अंगों में कैसे शुभ लक्षण! अहो, शुचिष्मती का कैसा सौभाग्य, कि स्वयं हर (शिव) प्रकट हुए!"

श्लोक 33 (skanda.4.11.33)

अथवा किमिदं चित्रं शर्वभक्तजनेष्वहो । आविर्भवेत्स्वयं रुद्रो यतोरुद्रास्तदर्चकाः

athavā kimidaṁ citraṁ śarvabhaktajaneṣvaho āvirbhavetsvayaṁ rudro yatorudrāstadarcakāḥ

"अथवा शर्व (शिव) के भक्तों में यह कौन-सा आश्चर्य है? रुद्र स्वयं प्रकट हो सकते हैं, क्योंकि रुद्रगण भी उन्हीं की पूजा करने वाले हैं।"

श्लोक 34 (skanda.4.11.34)

इति स्तुवंतस्त्वन्योन्यं जग्मुः सर्वे यथागतम् । विश्वानरं समापृच्छ्य संप्रहृष्टतनूरुहाः

iti stuvaṁtastvanyonyaṁ jagmuḥ sarve yathāgatam viśvānaraṁ samāpṛcchya saṁprahṛṣṭatanūruhāḥ

इस प्रकार एक-दूसरे की स्तुति करते हुए, हर्ष से रोमांचित होकर, विश्वानर से विदा लेकर सभी देवगण जिस प्रकार आए थे उसी प्रकार लौट गए।

श्लोक 35 (skanda.4.11.35)

अतः पुत्रं समीहंते गृहस्थाश्रमवासिनः । पुत्रेण लोकाञ्जयति श्रुतिरेषा सनातनी

ataḥ putraṁ samīhaṁte gṛhasthāśramavāsinaḥ putreṇa lokāñjayati śrutireṣā sanātanī

इसीलिए गृहस्थाश्रम में रहने वाले पुत्र की कामना करते हैं; "पुत्र से लोकों को जीता जाता है" -- यह सनातन श्रुति-वचन है।

श्लोक 36 (skanda.4.11.36)

अपुत्रस्य गृहं शून्यमपुत्रस्यार्जनं वृथा । अपुत्रस्यान्वयश्छिन्नो नापवित्रं ह्यपुत्रतः

aputrasya gṛhaṁ śūnyamaputrasyārjanaṁ vṛthā aputrasyānvayaśchinno nāpavitraṁ hyaputrataḥ

पुत्रहीन का घर सूना है, पुत्रहीन का अर्जन व्यर्थ है, पुत्रहीन का वंश छिन्न है; वस्तुतः पुत्रहीनता से बढ़कर कुछ भी अपवित्र नहीं है।

श्लोक 37 (skanda.4.11.37)

न पुत्रात्परमो लाभो न पुत्रात्परमं सुखम् । न पुत्रात्परमं मित्रं परत्रेह च कुत्रचित्

na putrātparamo lābho na putrātparamaṁ sukham na putrātparamaṁ mitraṁ paratreha ca kutracit

पुत्र से बढ़कर कोई लाभ नहीं, पुत्र से बढ़कर कोई सुख नहीं, पुत्र से बढ़कर इस लोक और परलोक में कहीं भी कोई मित्र नहीं है।

श्लोक 38 (skanda.4.11.38)

औरसः क्षेत्रजः क्रीतो दत्तः प्राप्तः सुतासुतः । आपत्सुरक्षितश्चान्यः पुत्राः सप्तात्र कीर्तिताः

aurasaḥ kṣetrajaḥ krīto dattaḥ prāptaḥ sutāsutaḥ āpatsurakṣitaścānyaḥ putrāḥ saptātra kīrtitāḥ

औरस, क्षेत्रज, क्रीत, दत्त, प्राप्त, सुतासुत (पुत्री का पुत्र), तथा आपत्काल में रक्षित -- ये सात प्रकार के पुत्र कहे गए हैं।

श्लोक 39 (skanda.4.11.39)

एषामन्यतमः कार्यो गृहस्थेन विपश्चिता । पूर्वपूर्वः सुतः श्रेयान्हीनःस्यादुत्तरोत्तरः

eṣāmanyatamaḥ kāryo gṛhasthena vipaścitā pūrvapūrvaḥ sutaḥ śreyānhīnaḥsyāduttarottaraḥ

विद्वान गृहस्थ को इनमें से किसी एक को प्राप्त करना चाहिए; पूर्व-पूर्व वाला पुत्र श्रेष्ठ है, उत्तरोत्तर वाला हीन होता जाता है।

श्लोक 40 (skanda.4.11.40)

गणावूचतुः । निष्क्रमोथ चतुर्थेऽस्य मासि पित्राकृतो गृहात् । अन्नप्राशनमब्दार्धे चूडाब्दे चार्थवत्कृता

gaṇāvūcatuḥ niṣkramotha caturthe'sya māsi pitrākṛto gṛhāt annaprāśanamabdārdhe cūḍābde cārthavatkṛtā

दोनों गणों ने कहा -- फिर उसके चौथे मास में पिता ने घर से निष्क्रमण संस्कार कराया; छह मास में अन्नप्राशन तथा एक वर्ष पर चूड़ाकर्म भी सार्थक रूप से सम्पन्न किया गया।

श्लोक 41 (skanda.4.11.41)

कर्णवेधं ततः कृत्वा श्रवणर्क्षे सकर्मवित् । ब्रह्मतेजोभिवृद्ध्यर्थं पंचमेऽब्दे व्रतं ददौ

karṇavedhaṁ tataḥ kṛtvā śravaṇarkṣe sakarmavit brahmatejobhivṛddhyarthaṁ paṁcame'bde vrataṁ dadau

फिर, कर्मों को जानने वाले पिता ने श्रवण नक्षत्र में कर्णवेध संस्कार किया; ब्रह्म-तेज की वृद्धि के लिए पाँचवें वर्ष में उसे उपनयन-व्रत दिया।

श्लोक 42 (skanda.4.11.42)

उपाकर्म ततः कृत्वा वेदानध्यापयत्सुधीः । त्र्यब्दं वेदान्सविधिनाऽध्यैष्ट सांगपदक्रमान्

upākarma tataḥ kṛtvā vedānadhyāpayatsudhīḥ tryabdaṁ vedānsavidhinā'dhyaiṣṭa sāṁgapadakramān

फिर उपाकर्म करके, विद्वान पिता ने उसे वेदों का अध्ययन कराया; उसने तीन वर्षों तक विधिपूर्वक अंगों और पदक्रम सहित वेदों का अध्ययन किया।

श्लोक 43 (skanda.4.11.43)

विद्याजातं समस्तं च साक्षिमात्राद्गुरोर्मुखात् । विनयादिगुणानाविष्कुर्वञ्जग्राह शक्तिमान्

vidyājātaṁ samastaṁ ca sākṣimātrādgurormukhāt vinayādiguṇānāviṣkurvañjagrāha śaktimān

उस समर्थ बालक ने विनय आदि गुणों को प्रकट करते हुए, गुरु के मुख से केवल एक बार सुनकर ही समस्त विद्याओं को ग्रहण कर लिया।

श्लोक 44 (skanda.4.11.44)

ततोथ नवमे वर्षे पित्रोः शुश्रूषणे रतम् । वैश्वानरं गृहपतिं दृष्ट्वा कामचरो मुनिः

tatotha navame varṣe pitroḥ śuśrūṣaṇe ratam vaiśvānaraṁ gṛhapatiṁ dṛṣṭvā kāmacaro muniḥ

फिर नौवें वर्ष में, माता-पिता की सेवा में तत्पर, गृहपति वैश्वानर को देखकर, कामचारी मुनि (नारद) --

श्लोक 45 (skanda.4.11.45)

विश्वानरोटजं प्राप्य देवर्षिर्नारदः सुधीः । पप्रच्छ कुशलं तत्र गृहीतार्घासनः क्रमात्

viśvānaroṭajaṁ prāpya devarṣirnāradaḥ sudhīḥ papraccha kuśalaṁ tatra gṛhītārghāsanaḥ kramāt

-- बुद्धिमान देवर्षि नारद विश्वानर की कुटिया में पहुँचे और वहाँ अर्घ्य तथा आसन ग्रहण करके यथाक्रम कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 46 (skanda.4.11.46)

नारद उवाच । विश्वानर महाभाग शुचिष्मति शुभव्रते । कुरुते युवयोर्वाक्यमयं गृहपतिः शिशुः

nārada uvāca viśvānara mahābhāga śuciṣmati śubhavrate kurute yuvayorvākyamayaṁ gṛhapatiḥ śiśuḥ

नारद जी ने कहा -- हे महाभाग विश्वानर, हे शुभव्रता शुचिष्मती! क्या यह शिशु गृहपति तुम दोनों की आज्ञा का पालन करता है?

श्लोक 47 (skanda.4.11.47)

नान्यत्तीर्थं न वा देवो न गुरुर्न च सत्किया । विहाय पित्रोर्वचनं नान्यो धर्मः सुतस्य हि

nānyattīrthaṁ na vā devo na gururna ca satkiyā vihāya pitrorvacanaṁ nānyo dharmaḥ sutasya hi

माता-पिता के वचन का पालन करने के अतिरिक्त पुत्र के लिए न कोई तीर्थ है, न कोई देवता, न कोई गुरु और न ही कोई सत्कर्म; वास्तव में यही पुत्र का धर्म है।

श्लोक 48 (skanda.4.11.48)

न पित्रोरधिकं किंचित्त्रिलोक्यां तनयस्य हि । गर्भधारणपोषाभ्यां पितुर्माता गरीयसी

na pitroradhikaṁ kiṁcittrilokyāṁ tanayasya hi garbhadhāraṇapoṣābhyāṁ piturmātā garīyasī

पुत्र के लिए त्रिलोक में माता-पिता से बढ़कर कुछ भी नहीं है; गर्भ धारण और पोषण के कारण माता पिता से भी अधिक गुरुतर होती है।

श्लोक 49 (skanda.4.11.49)

अंभोभिरभिषिच्यस्वं जननीचरणच्युतैः । प्राप्नुयात्स्वर्धुनीशुद्ध कबंधाधिकशुद्धताम्

aṁbhobhirabhiṣicyasvaṁ jananīcaraṇacyutaiḥ prāpnuyātsvardhunīśuddha kabaṁdhādhikaśuddhatām

माता के चरणों से गिरे हुए जल से अभिषिक्त होकर, पुत्र स्वर्धुनी (गंगा) की मेघ-सी निर्मल पवित्रता से भी अधिक पवित्रता प्राप्त करता है।

श्लोक 50 (skanda.4.11.50)

संन्यस्ताखिलकर्मापि पितुर्वंद्यो हिमस्करी । सर्ववंद्येन यतिना प्रसूर्वंद्या प्रयत्नतः

saṁnyastākhilakarmāpi piturvaṁdyo himaskarī sarvavaṁdyena yatinā prasūrvaṁdyā prayatnataḥ

सभी कर्मों का संन्यास लेने वाला भी हिमकर के समान शीतल व्यक्ति पिता के लिए वंदनीय है; और सबके द्वारा वंदित यति को भी माता को यत्नपूर्वक वंदन करना चाहिए।

श्लोक 51 (skanda.4.11.51)

इदमेव तपोत्युग्रमिदमेवपरं व्रतम् । अयमेव परो धर्मो यत्पित्रोः परितोषणम्

idameva tapotyugramidamevaparaṁ vratam ayameva paro dharmo yatpitroḥ paritoṣaṇam

यही सबसे उग्र तप है, यही सबसे बड़ा व्रत है, यही सबसे बड़ा धर्म है -- अपने माता-पिता को संतुष्ट करना।

श्लोक 52 (skanda.4.11.52)

मन्येमान्यो नाधमस्य तथान्यस्य यथा युवाम् । सुखाकारैर्विनीतस्य शिशोर्गृहपतेरहम्

manyemānyo nādhamasya tathānyasya yathā yuvām sukhākārairvinītasya śiśorgṛhapateraham

मैं किसी और को इतना आदरणीय नहीं मानता, जितना मैं तुम दोनों को मानता हूँ, जो सुखद स्वभाव वाले इस विनम्र शिशु गृहपति के माता-पिता हो।

श्लोक 53 (skanda.4.11.53)

वैश्वानरसमभ्येहि ममोत्संगे निषीद भो । लक्षणानि परीक्षेहं पाणिं दर्शय दक्षिणम्

vaiśvānarasamabhyehi mamotsaṁge niṣīda bho lakṣaṇāni parīkṣehaṁ pāṇiṁ darśaya dakṣiṇam

हे वैश्वानर! मेरे पास आओ, मेरी गोद में बैठो; मैं तुम्हारे लक्षणों की परीक्षा लूँगा -- अपना दायाँ हाथ दिखाओ।

श्लोक 54 (skanda.4.11.54)

इत्युक्तो मुनिना बालः पित्रोराज्ञामवाप्य सः । प्रणम्य नारदं श्रीमान्भक्त्याप्रह्व उपाविशत्

ityukto muninā bālaḥ pitrorājñāmavāpya saḥ praṇamya nāradaṁ śrīmānbhaktyāprahva upāviśat

मुनि के इस प्रकार कहने पर, वह बालक माता-पिता की आज्ञा पाकर, नारद को प्रणाम करके, श्रीमान भक्तिपूर्वक नम्रतापूर्वक बैठ गया।

श्लोक 55 (skanda.4.11.55)

ततो दृष्ट्वास्य सर्वांगं तालुजिह्वाद्विजानपि । आनीय कुंकुमारक्तं सूत्रं च त्रिगुणीकृतम्

tato dṛṣṭvāsya sarvāṁgaṁ tālujihvādvijānapi ānīya kuṁkumāraktaṁ sūtraṁ ca triguṇīkṛtam

तब उसके संपूर्ण शरीर को, तालु, जिह्वा और दाँतों को भी देखकर, नारद जी ने कुंकुम से रंगा हुआ, तिगुना मोटा एक सूत्र मँगवाया,

श्लोक 56 (skanda.4.11.56)

स्मृत्वा शिवौ गणाध्यक्षमूर्ध्वीभूतमुदङ्मुखम् । मुनिः परिममौ बालमापादतलमस्तकम्

smṛtvā śivau gaṇādhyakṣamūrdhvībhūtamudaṅmukham muniḥ parimamau bālamāpādatalamastakam

तथा शिव और गणाध्यक्ष (गणेश) का स्मरण करके, उत्तर मुख करके सीधे खड़े होकर, मुनि ने बालक को उसके पैर के तलवे से लेकर सिर तक नापा।

श्लोक 57 (skanda.4.11.57)

तिर्यगूर्ध्वं समो माने योष्टोत्तरशतांगुलः । स भवेत्पृथिवीपालो बालोऽयं ते यथा द्विज

tiryagūrdhvaṁ samo māne yoṣṭottaraśatāṁgulaḥ sa bhavetpṛthivīpālo bālo'yaṁ te yathā dvija

"आड़ी और खड़ी दोनों दिशाओं में समान माप में, एक सौ आठ अंगुल का जो होता है, वह पृथ्वीपति होता है; हे द्विज, तुम्हारा यह बालक भी वैसा ही है।"

श्लोक 58 (skanda.4.11.58)

पंचसूक्ष्मः पंचदीर्घः सप्तरक्तः षडुन्नतः । त्रिपृथुर्लघुगंभीरो द्वात्रिंशल्लक्षणस्त्विति

paṁcasūkṣmaḥ paṁcadīrghaḥ saptaraktaḥ ṣaḍunnataḥ tripṛthurlaghugaṁbhīro dvātriṁśallakṣaṇastviti

"पाँच सूक्ष्म, पाँच दीर्घ, सात रक्त (लाल), छह उन्नत, तीन विस्तृत, तथा हल्के और गंभीर -- इस प्रकार बत्तीस महापुरुष-लक्षण होते हैं।"

श्लोक 59 (skanda.4.11.59)

पंचदीर्घाणि शस्यानि यथादीर्घायुषोस्य वै । भुजौ नेत्रे हनुर्जानु नासाऽस्य तनयस्य ते

paṁcadīrghāṇi śasyāni yathādīrghāyuṣosya vai bhujau netre hanurjānu nāsā'sya tanayasya te

"जिन पाँच दीर्घ अंगों की प्रशंसा की जाती है, जो दीर्घायु का सूचक है, वे इस तुम्हारे पुत्र के दोनों भुजाएँ, दोनों नेत्र, ठोड़ी, घुटना और नासिका हैं।"

श्लोक 60 (skanda.4.11.60)

ग्रीवाजंघा मेहनैश्च त्रिभिर्ह्रस्वोयमीडितः । स्वरेण सत्त्वनाभिभ्यां त्रिगंभीरः शिशुः शुभः

grīvājaṁghā mehanaiśca tribhirhrasvoyamīḍitaḥ svareṇa sattvanābhibhyāṁ trigaṁbhīraḥ śiśuḥ śubhaḥ

"गर्दन, पिंडली और लिंग -- इन तीनों के छोटे होने से यह प्रशंसित है; स्वर, बल तथा नाभि से यह शुभ शिशु त्रिगंभीर है।"

श्लोक 61 (skanda.4.11.61)

त्वक्केशांगुलिदशनाः पर्वाण्यंगुलिजान्यपि । तथास्य पंचसूक्ष्माणि दिक्पालपदभाग्यथा

tvakkeśāṁgulidaśanāḥ parvāṇyaṁgulijānyapi tathāsya paṁcasūkṣmāṇi dikpālapadabhāgyathā

"त्वचा, केश, अंगुलियाँ, दाँत तथा अंगुलियों की पोरें -- ये उसके पाँच सूक्ष्म अंग हैं, जिनसे वह दिक्पाल का पद प्राप्त करेगा।"

श्लोक 62 (skanda.4.11.62)

वक्षः कुक्ष्यलकं स्कंध करं वक्त्रं षडुन्नतम् । तथाऽत्र दृश्यते बाले महदैश्वर्यभाग्यथा

vakṣaḥ kukṣyalakaṁ skaṁdha karaṁ vaktraṁ ṣaḍunnatam tathā'tra dṛśyate bāle mahadaiśvaryabhāgyathā

"छाती, कुक्षि, ललाट, कंधा, हाथ और मुख -- ये छह उन्नत अंग इस बालक में देखे जाते हैं, जिनसे वह महान ऐश्वर्य प्राप्त करेगा।"

श्लोक 63 (skanda.4.11.63)

पाण्योस्तले च नेत्रांते तालुजिह्वाधरौष्ठकम् । सप्तारुणं च सनखमस्मिन्राज्यसुखप्रदम्

pāṇyostale ca netrāṁte tālujihvādharauṣṭhakam saptāruṇaṁ ca sanakhamasminrājyasukhapradam

"दोनों हथेलियाँ, नेत्रों के कोने, तालु, जिह्वा, नीचला ओष्ठ तथा नख -- ये सात लाल अंग इसे राज्य-सुख प्रदान करने वाले हैं।"

श्लोक 64 (skanda.4.11.64)

ललाटकटिवक्षोभिस्त्रिविस्तीर्णो यथाह्यसौ । सर्वतेजोतिरैश्वर्यं तथा प्राप्स्यति नान्यथा

lalāṭakaṭivakṣobhistrivistīrṇo yathāhyasau sarvatejotiraiśvaryaṁ tathā prāpsyati nānyathā

"ललाट, कमर और वक्ष से यह त्रिविध विस्तृत है; इसी प्रकार यह निश्चय ही सम्पूर्ण तेज और ऐश्वर्य प्राप्त करेगा, अन्यथा नहीं।"

श्लोक 65 (skanda.4.11.65)

कमठीपृष्ठकठिनावकर्मकरणौ करौ । राज्यहेतू शिशोरस्य पादौ चाध्वनि कोमलौ

kamaṭhīpṛṣṭhakaṭhināvakarmakaraṇau karau rājyahetū śiśorasya pādau cādhvani komalau

"कछुए की पीठ के समान कठोर, परिश्रम के कार्य न करने वाले दोनों हाथ इस शिशु के राज्य-प्राप्ति के कारण हैं; तथा मार्ग में उसके पैर कोमल हैं।"

श्लोक 66 (skanda.4.11.66)

अच्छिन्ना तर्जनीं व्याप्य तथा रेखास्य दृश्यते । कनिष्ठा पृष्ठनिर्याता दीर्घायुष्यं यथार्पयेत्

acchinnā tarjanīṁ vyāpya tathā rekhāsya dṛśyate kaniṣṭhā pṛṣṭhaniryātā dīrghāyuṣyaṁ yathārpayet

"इसकी तर्जनी अंगुली तक फैली हुई एक अखंडित रेखा दिखाई देती है; तथा कनिष्ठिका से पीठ की ओर निकली रेखा दीर्घायु प्रदान करने वाली है।"

श्लोक 67 (skanda.4.11.67)

पादौ सुमांसलौ रक्तौ समौ सूक्ष्मौ सुशौभनौ । समगुल्फौ स्वेदहीनौ स्निग्धावैश्वर्यसूचकौ

pādau sumāṁsalau raktau samau sūkṣmau suśaubhanau samagulphau svedahīnau snigdhāvaiśvaryasūcakau

"इसके दोनों पैर मांसल, लाल, समान, सूक्ष्म तथा सुंदर हैं; समान गुल्फ वाले, पसीना रहित तथा स्निग्ध -- ये ऐश्वर्य के सूचक हैं।"

श्लोक 68 (skanda.4.11.68)

स्वल्पाभिः कररेखाभिरारक्ताभिः सदासुखी । लिंगेन कृशह्रस्वेन राजराजो भविष्यति

svalpābhiḥ kararekhābhirāraktābhiḥ sadāsukhī liṁgena kṛśahrasvena rājarājo bhaviṣyati

"थोड़ी-सी लाल रेखाओं वाली हथेलियों से यह सदा सुखी रहेगा; तथा पतले और छोटे लिंग से यह राजाओं का राजा बनेगा।"

श्लोक 69 (skanda.4.11.69)

उत्कंटासनगुल्फास्फिग्नाभिरस्यापि वर्तुला । दक्षिणावर्तमरुणं महदैश्वर्यसूचिका

utkaṁṭāsanagulphāsphignābhirasyāpi vartulā dakṣiṇāvartamaruṇaṁ mahadaiśvaryasūcikā

"उठी हुई एड़ी, कूल्हे, तथा गोल नाभि -- दाहिनी ओर घूमी हुई और लाल -- यह महान ऐश्वर्य की सूचक है।"

श्लोक 70 (skanda.4.11.70)

धारैका मूत्रयत्यस्मिन्दक्षिणावर्तिनी यदि । गंधश्च मीनमधुनोर्यदि वीर्ये तदा नृपः

dhāraikā mūtrayatyasmindakṣiṇāvartinī yadi gaṁdhaśca mīnamadhunoryadi vīrye tadā nṛpaḥ

"यदि इसकी मूत्र-धारा एक ही हो और दाहिनी ओर घूमती हो, तथा वीर्य में मछली और मधु की गंध हो, तो यह राजा बनेगा।"

श्लोक 71 (skanda.4.11.71)

विस्तीर्णौ मांसलौ स्निग्धौ स्फिचावस्य सुखोचितौ । वामावर्तौ सुप्रलंबौ दोषौ दिग्रक्षणोचितौ

vistīrṇau māṁsalau snigdhau sphicāvasya sukhocitau vāmāvartau supralaṁbau doṣau digrakṣaṇocitau

"इसके दोनों कूल्हे विस्तृत, मांसल, स्निग्ध तथा सुखप्रद हैं; बाईं ओर घूमे हुए, लंबे लटके हुए -- ये लक्षण भी दिशाओं की रक्षा के योग्य हैं।"

श्लोक 72 (skanda.4.11.72)

श्रीवत्सवज्रचक्राब्ज मत्स्यकोदंडदंडभृत् । तथास्य करगा रेखा यथा स्यात्त्रिदिवस्पतिः

śrīvatsavajracakrābja matsyakodaṁḍadaṁḍabhṛt tathāsya karagā rekhā yathā syāttridivaspatiḥ

"इसकी हथेली पर श्रीवत्स, वज्र, चक्र, कमल, मत्स्य, धनुष तथा दंड की रेखाएँ हैं, जिनसे यह त्रिलोक का स्वामी बनेगा।"

श्लोक 73 (skanda.4.11.73)

द्वात्रिंशद्दशनश्चायं करकंबु शिरोधरः । कौंचदुंदुभिहंसाभ्र स्वरः सर्वेश्वराधिकः

dvātriṁśaddaśanaścāyaṁ karakaṁbu śirodharaḥ kauṁcaduṁdubhihaṁsābhra svaraḥ sarveśvarādhikaḥ

"इसके बत्तीस दाँत हैं, गर्दन शंख के समान है, तथा स्वर क्रौंच पक्षी, दुंदुभि, हंस अथवा मेघ के समान है -- जो सबसे बढ़कर है।"

श्लोक 74 (skanda.4.11.74)

मधुपिंगलनेत्रोऽसौ नैनं श्रीस्त्यजति क्वचित् । पंचरेखललाटस्तु तथा सिंहोदरः शुभः।

madhupiṁgalanetro'sau nainaṁ śrīstyajati kvacit paṁcarekhalalāṭastu tathā siṁhodaraḥ śubhaḥ

"इसके नेत्र मधु के समान पिंगल हैं, इसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ेगी; इसका ललाट पाँच रेखाओं वाला और उदर सिंह के समान (पतला) है -- यह शुभ है।"

श्लोक 75 (skanda.4.11.75)

ऊर्ध्वरेखांकितपदो निःश्वसन्पद्मगंधवान् । अच्छिद्रपाणिः सुनखो महालक्षणवानयम्

ūrdhvarekhāṁkitapado niḥśvasanpadmagaṁdhavān acchidrapāṇiḥ sunakho mahālakṣaṇavānayam

"इसके पैरों में ऊपर की ओर रेखाएँ हैं, इसकी श्वास कमल-सुगंधित है, इसकी हथेलियाँ अखंडित तथा नख सुंदर हैं -- यह महालक्षणों से युक्त है।"

श्लोक 76 (skanda.4.11.76)

किंतु सर्वगुणोपेतं सर्वलक्षणलक्षितम् । संपूर्णनिर्मलकलं पातयेद्विधुवद्विधिः

kiṁtu sarvaguṇopetaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam saṁpūrṇanirmalakalaṁ pātayedvidhuvadvidhiḥ

"किंतु सभी गुणों से युक्त, सभी लक्षणों से चिह्नित, पूर्ण और निर्मल कला वाले को भी विधाता चंद्रमा के समान क्षीण करके गिरा सकता है।"

श्लोक 77 (skanda.4.11.77)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयस्त्वसौ शिशुः । गुणोपि दोषतां याति वक्रीभूते विधातरि

tasmātsarvaprayatnena rakṣaṇīyastvasau śiśuḥ guṇopi doṣatāṁ yāti vakrībhūte vidhātari

"इसलिए इस शिशु की सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि विधाता के विपरीत हो जाने पर गुण भी दोष बन जाता है।"

श्लोक 78 (skanda.4.11.78)

शंकेऽस्य द्वादशेवर्षे प्रत्यूहो विद्युदग्नितः । इत्युक्त्वा नारदो धीमान्स जगाम यथागतम्

śaṁke'sya dvādaśevarṣe pratyūho vidyudagnitaḥ ityuktvā nārado dhīmānsa jagāma yathāgatam

"मुझे शंका है कि इसके बारहवें वर्ष में इसे बिजली की अग्नि से कोई बाधा होगी।" यह कहकर बुद्धिमान नारद जिस प्रकार आए थे उसी प्रकार चले गए।

श्लोक 79 (skanda.4.11.79)

विश्वानरः सपत्नीकस्तच्छ्रुत्वा नारदेरितम् । तदैव मन्यमानोभूद्वज्रपातं सुदारुणम्

viśvānaraḥ sapatnīkastacchrutvā nāraderitam tadaiva manyamānobhūdvajrapātaṁ sudāruṇam

विश्वानर ने अपनी पत्नी सहित नारद के इन वचनों को सुनकर उसी क्षण मानो कोई अत्यंत भयंकर वज्रपात हो गया हो, ऐसा माना।

श्लोक 80 (skanda.4.11.80)

हाहतोस्मीति वचसा हृदयं समताडयत् । मूर्च्छामवाप महतीं पुत्रशोकसमाकुलः

hāhatosmīti vacasā hṛdayaṁ samatāḍayat mūrcchāmavāpa mahatīṁ putraśokasamākulaḥ

"हाय, मैं तो मारा गया!" यह कहते हुए उन्होंने अपनी छाती पीट ली, और पुत्र-शोक से व्याकुल होकर वे गहरी मूर्च्छा में चले गए।

श्लोक 81 (skanda.4.11.81)

शुचिष्मत्यपि दुःखार्ता रुरोदातीव दुःसहम् । आर्तस्वरेण हारावैरत्यंत व्याकुलेद्रिया

śuciṣmatyapi duḥkhārtā rurodātīva duḥsaham ārtasvareṇa hārāvairatyaṁta vyākuledriyā

शुचिष्मती भी दुःख से पीड़ित होकर अत्यंत असह्य रूप से रो पड़ी; पीड़ा-भरे स्वर में, अत्यंत व्याकुल इंद्रियों के साथ विलाप करते हुए,

श्लोक 82 (skanda.4.11.82)

हाशिशो हागुणनिधे हा पितुर्वाक्यकारक । हा कुतो मंदभाग्याया जठरे मे समागतः

hāśiśo hāguṇanidhe hā piturvākyakāraka hā kuto maṁdabhāgyāyā jaṭhare me samāgataḥ

"हाय शिशु! हाय गुणों के भंडार! हाय पिता की आज्ञा का पालन करने वाले! हाय, तू अभागिन मेरे गर्भ में कहाँ से आ गया!"

श्लोक 83 (skanda.4.11.83)

त्वदेकपुत्रां हापुत्रकोऽत्र मां त्रायते पुरा । त्वदृते त्वद्गुणोर्म्याढ्ये पतितां शोकसागरे

tvadekaputrāṁ hāputrako'tra māṁ trāyate purā tvadṛte tvadguṇormyāḍhye patitāṁ śokasāgare

"तुझ एकमात्र पुत्र वाली मुझे, हाय, अब कौन बचाएगा? तेरे बिना, तेरे गुणों की लहरों से भरे शोक-सागर में मैं डूब गई हूँ।"

श्लोक 84 (skanda.4.11.84)

हा बाल हा विमल हा कमलायताक्ष हा लोकलोचनचकोर कुरंगलक्ष्मन् । हा तात तात नयनाब्ज मयूखमालिन्हा मातुरुत्सवसहस्रसुखैकहेतो

hā bāla hā vimala hā kamalāyatākṣa hā lokalocanacakora kuraṁgalakṣman hā tāta tāta nayanābja mayūkhamālinhā māturutsavasahasrasukhaikaheto

"हाय बालक! हाय निर्मल! हाय कमल-सी विशाल आँखों वाले! हाय संसार की आँखों के चकोर के लिए चंद्रमा-समान! हाय पिता, पिता, अपने नेत्र-कमलों की किरणों की माला वाले! हाय माता के हजारों उत्सवों और सुखों के एकमात्र कारण!"

श्लोक 85 (skanda.4.11.85)

हा पूर्णचंद्रमुख हा सुनखांगुलीक हा चाटुकारवचनामृतवीचिपूर । दुःखैः कियद्भिरहहां गमयात्वमाप्तः किं किं कृतं गृहपते न मया त्वदाप्त्यै

hā pūrṇacaṁdramukha hā sunakhāṁgulīka hā cāṭukāravacanāmṛtavīcipūra duḥkhaiḥ kiyadbhirahahāṁ gamayātvamāptaḥ kiṁ kiṁ kṛtaṁ gṛhapate na mayā tvadāptyai

"हाय पूर्णचंद्र-मुख! हाय सुंदर नखों और अंगुलियों वाले! हाय मीठी-मीठी बातों की अमृत-लहरों से भरे! कितने दुखों को सहकर, हाय, मैंने तुझे पाया था? हे गृहपते, तुझे पाने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया?"

श्लोक 86 (skanda.4.11.86)

नोप्तो बलिर्न बत कासु च देवता सुतीर्थानि कानि न मयाध्युषितानि वत्स । के के मया न नियमौषधमंत्रयंत्राः संसाधितास्तव कृते सुकृतैकलभ्य

nopto balirna bata kāsu ca devatā sutīrthāni kāni na mayādhyuṣitāni vatsa ke ke mayā na niyamauṣadhamaṁtrayaṁtrāḥ saṁsādhitāstava kṛte sukṛtaikalabhya

"किस देवता को बलि नहीं चढ़ाई? कौन-से पवित्र तीर्थों में मैं नहीं रही, हे वत्स? कौन-से नियम, औषधि, मंत्र और यंत्र मैंने तेरे लिए सिद्ध नहीं किए, हे पुण्य से ही प्राप्त होने वाले?"

श्लोक 87 (skanda.4.11.87)

संसारसागरतरे हर दुःखभारं सारं मुखेंदुमभिदर्शय सौख्यसिंधो । पुन्नामतीव्रनरकार्णव वाडवाग्नेस्संजीवयस्व पितरं निजवाक्सुधोक्षैः

saṁsārasāgaratare hara duḥkhabhāraṁ sāraṁ mukheṁdumabhidarśaya saukhyasiṁdho punnāmatīvranarakārṇava vāḍavāgnessaṁjīvayasva pitaraṁ nijavāksudhokṣaiḥ

"हे संसार-सागर से पार उतारने वाले! हमारे दुःख का भार हर लो; हे सुख के सागर! अपना चंद्रमुख दिखाओ; हे नरक-सागर की अग्नि को शांत करने वाले पुत्र! अपने अमृत-वचनों से पिता को पुनर्जीवित करो।"

श्लोक 88 (skanda.4.11.88)

किंदेवता अहह जन्ममहोत्सवेऽस्य ज्ञात्वेति भाविमिलिता युगपत्समस्ताः । एकस्थ सर्वगुण शील कलाकलाप सौंदर्यलक्षणपरीक्षणपूर्णहर्षाः

kiṁdevatā ahaha janmamahotsave'sya jñātveti bhāvimilitā yugapatsamastāḥ ekastha sarvaguṇa śīla kalākalāpa sauṁdaryalakṣaṇaparīkṣaṇapūrṇaharṣāḥ

"अहो, इसके जन्म-महोत्सव में यह जानकर कि कौन-सी देवियाँ यहाँ हैं, मानो वे सभी एक साथ मिल गई हों -- एक ही स्थान पर सभी गुण, शील, कलाएँ, सौंदर्य और लक्षण देखकर हम पूर्ण हर्ष से भर गए थे।"

श्लोक 89 (skanda.4.11.89)

शंभो महेश करुणाकर शूलपाणे मृत्युंजयस्त्वमिति वेदविदो वदंति । त्वद्दत्त बालतनये यदि कालकालः स्यादेवमत्र वद कस्य भवेन्न पातः

śaṁbho maheśa karuṇākara śūlapāṇe mṛtyuṁjayastvamiti vedavido vadaṁti tvaddatta bālatanaye yadi kālakālaḥ syādevamatra vada kasya bhavenna pātaḥ

"हे शंभो, महेश, करुणाकर, शूलपाणि! वेद के ज्ञाता तुम्हें मृत्युंजय कहते हैं; यदि तुम्हारे ही दिए हुए बालक-पुत्र पर काल का काल भी प्रभावी हो जाए, तो बताओ, फिर किसका पतन नहीं होगा?"

श्लोक 90 (skanda.4.11.90)

हा हंतहंतभवता भव तापहारी कस्माद्विधेऽत्र विदधे बहुभिः प्रयत्नैः । बालो विशालगुणसिंधुमगाधमध्यं सद्रत्नसारमखिलं सविधं विधाय

hā haṁtahaṁtabhavatā bhava tāpahārī kasmādvidhe'tra vidadhe bahubhiḥ prayatnaiḥ bālo viśālaguṇasiṁdhumagādhamadhyaṁ sadratnasāramakhilaṁ savidhaṁ vidhāya

"हाय हाय! हे भव, संताप हरने वाले! हे विधाता, तुमने इतने प्रयत्नों से यह क्यों रचा -- विशाल गुणों के अगाध सागर, समस्त सद्रत्नों के सार वाले इस बालक को?"

श्लोक 91 (skanda.4.11.91)

हा कालबालकवती किमुतेन राज्ञी त्वत्कालतां न हृतवान्नसुताननेंदुः । बालेति कोमलमृणाल लतांगलीलं दंभोलिनिष्ठुरकठोरकुठारदंष्ट्रः

hā kālabālakavatī kimutena rājñī tvatkālatāṁ na hṛtavānnasutānaneṁduḥ bāleti komalamṛṇāla latāṁgalīlaṁ daṁbholiniṣṭhurakaṭhorakuṭhāradaṁṣṭraḥ

"हाय काल! तू तो बालकों को हर लेने वाला है, तुझे किसी और साम्राज्ञी की क्या आवश्यकता? कमल-नाल के समान कोमल अंगों वाले, केवल 'बालक' कहलाने वाले इस पुत्र पर, हे वज्र समान निष्ठुर और कठोर दाढ़ों वाले, तेरी क्रूरता क्यों?"

श्लोक 92 (skanda.4.11.92)

इत्थं विलप्य बहुशो नयनांबुधारासंपातजात तटिनी शतमुत्तरंगम् । सा तोकशोकजनितानल तापतप्ता प्रोच्छ्वस्यदीर्घविपुलोष्णमहो शुशोष

itthaṁ vilapya bahuśo nayanāṁbudhārāsaṁpātajāta taṭinī śatamuttaraṁgam sā tokaśokajanitānala tāpataptā procchvasyadīrghavipuloṣṇamaho śuśoṣa

इस प्रकार बार-बार विलाप करते हुए, उसके नेत्रों से गिरती अश्रु-धाराओं से सैकड़ों लहरों वाली नदी-सी बन गई; पुत्र-शोक से उत्पन्न अग्नि के ताप से संतप्त वह लंबी, गहरी और उष्ण साँसें लेते-लेते सूख गई।

श्लोक 93 (skanda.4.11.93)

आकर्ण्य तत्करुणवत्परिदेवितानि तानि द्रुमा व्रततयः कुसुमाश्रुपातैः । प्रायो रुदंति पततां विरुतार्तरावैरालोल्यमौलिमसकृत्पवनच्छलेन

ākarṇya tatkaruṇavatparidevitāni tāni drumā vratatayaḥ kusumāśrupātaiḥ prāyo rudaṁti patatāṁ virutārtarāvairālolyamaulimasakṛtpavanacchalena

उसके करुणापूर्ण विलाप को सुनकर, वृक्ष और लताएँ भी फूलों के अश्रु गिराते हुए मानो रोने लगे; पवन के बहाने बार-बार उनकी चोटियाँ हिलतीं, मानो पीड़ा-भरे रुदन के साथ।

श्लोक 94 (skanda.4.11.94)

रुण्णं तया किल तथा बहुमुक्तकंठमार्तस्वरैः प्रतिरवच्छलतो यथोच्चैः । तद्दुःखतोनुरुरुदुर्गिरिकंदरास्याः सर्वा दिशः स्थगितपत्रिमृगागमा हि

ruṇṇaṁ tayā kila tathā bahumuktakaṁṭhamārtasvaraiḥ pratiravacchalato yathoccaiḥ tadduḥkhatonururudurgirikaṁdarāsyāḥ sarvā diśaḥ sthagitapatrimṛgāgamā hi

उसने इतने ऊँचे स्वर में, गला फाड़कर पीड़ा भरे स्वरों में विलाप किया कि उसी दुःख से पर्वतों की गुफा-रूपी मुखों से प्रतिध्वनि करती हुई सभी दिशाएँ भी रो उठीं, और पक्षियों तथा पशुओं का आना-जाना सर्वत्र थम गया।

श्लोक 95 (skanda.4.11.95)

श्रुत्वार्तनादमिति विश्वनरोपि मोहं हित्वोत्थितः किमिति किंत्विति किंकिमेतत् । उच्चैर्वदन्गृहपतिः क्व समे बहिस्थः प्राणोंतरात्मनिलयः सकलेंद्रियेशः

śrutvārtanādamiti viśvanaropi mohaṁ hitvotthitaḥ kimiti kiṁtviti kiṁkimetat uccairvadangṛhapatiḥ kva same bahisthaḥ prāṇoṁtarātmanilayaḥ sakaleṁdriyeśaḥ

यह पीड़ाभरा विलाप सुनकर विश्वानर भी मोह त्यागकर उठ बैठे, और ऊँचे स्वर में "क्या हुआ, क्या हुआ, यह क्या है" कहते हुए गृहपति (अपने प्राण) को पुकारने लगे -- मानो समस्त इंद्रियों का स्वामी उनका प्राण, अंतरात्मा में रहने वाला होते हुए भी, बाहर चला गया हो।

श्लोक 96 (skanda.4.11.96)

अगस्त्य उवाच । ततो दृष्ट्वा स पितरौ बहुशोकसमावृतौ । स्मित्वोवाच ततो मातस्त्रासस्त्वीदृक्कुतो हि वाम्

agastya uvāca tato dṛṣṭvā sa pitarau bahuśokasamāvṛtau smitvovāca tato mātastrāsastvīdṛkkuto hi vām

अगस्त्य जी ने कहा -- तब अपने माता-पिता को अत्यंत शोक से घिरा देखकर, उस बालक ने मुस्कुराते हुए कहा, "माँ, तुम्हें ऐसा भय किस कारण से हो रहा है?"

श्लोक 97 (skanda.4.11.97)

न मांकृत वपुस्त्राणं भवच्चरणरेणुभिः । कालः कलयितुं शक्तो वराकी चंचलाल्पिका

na māṁkṛta vapustrāṇaṁ bhavaccaraṇareṇubhiḥ kālaḥ kalayituṁ śakto varākī caṁcalālpikā

"आपके चरणों की धूल से रक्षित मेरे शरीर को, वह अभागा, चंचल और तुच्छ काल छू भी नहीं सकता।"

श्लोक 98 (skanda.4.11.98)

प्रतिज्ञां शृणुतं तातौ यदि वां तनयो ह्यहम् । करिष्येहं तथा तेन विद्युन्मत्तस्त्रसिष्यति

pratijñāṁ śṛṇutaṁ tātau yadi vāṁ tanayo hyaham kariṣyehaṁ tathā tena vidyunmattastrasiṣyati

"हे माता-पिता, मेरी यह प्रतिज्ञा सुनो -- यदि मैं वास्तव में तुम्हारा पुत्र हूँ, तो मैं ऐसा करूँगा कि बिजली से उन्मत्त (इंद्र) भी भयभीत हो जाएगा।"

श्लोक 99 (skanda.4.11.99)

मृत्युंजयं समाराध्य सर्वज्ञं सर्वदं सताम् । कालकालं महाकालं कालकूटविषादिनम्

mṛtyuṁjayaṁ samārādhya sarvajñaṁ sarvadaṁ satām kālakālaṁ mahākālaṁ kālakūṭaviṣādinam

"मृत्युंजय, सर्वज्ञ, सज्जनों को सब कुछ देने वाले, काल के भी काल, महाकाल, कालकूट विष का पान करने वाले (शिव) की आराधना करके।"

श्लोक 100 (skanda.4.11.100)

इति श्रुत्वा वचस्तस्य जरितौ द्विजदंपती । अकालामृतवर्षौघ शांततापौ तदोचतुः

iti śrutvā vacastasya jaritau dvijadaṁpatī akālāmṛtavarṣaugha śāṁtatāpau tadocatuḥ

उसके इस वचन को सुनकर, वृद्ध द्विज-दंपती मानो असमय अमृत-वर्षा से शांत हो गए, और तब उन्होंने कहा --

श्लोक 101 (skanda.4.11.101)

अपयोदपयोवृष्टिरदुग्धाब्धिः सुधोदयः । अनिंदुः कौमुदीकांतिः कुतो नौ सुखयत्यलम्

apayodapayovṛṣṭiradugdhābdhiḥ sudhodayaḥ aniṁduḥ kaumudīkāṁtiḥ kuto nau sukhayatyalam

"बिना बादल के वर्षा, बिना क्षीरसागर के मंथन के अमृत की उत्पत्ति, बिना चंद्रमा के चाँदनी की कांति -- ये हमें पूर्ण सुख कैसे दे सकते हैं?"

श्लोक 102 (skanda.4.11.102)

पुनर्ब्रूहिपुनर्ब्रूहि कीदृक्कीदृक्पुनःपुनः । कालः कलयितुं नालं वराकी चंचलाल्पिका

punarbrūhipunarbrūhi kīdṛkkīdṛkpunaḥpunaḥ kālaḥ kalayituṁ nālaṁ varākī caṁcalālpikā

"फिर से कहो, फिर से कहो -- कैसे, कैसे, बार-बार -- वह अभागा, चंचल और तुच्छ काल तुम्हें छूने में समर्थ नहीं है?"

श्लोक 103 (skanda.4.11.103)

आवयोस्तापनाशाय महोपायस्त्वयेरितः । मृत्युंजयस्य देवस्य समाराधनलक्षणः।

āvayostāpanāśāya mahopāyastvayeritaḥ mṛtyuṁjayasya devasya samārādhanalakṣaṇaḥ

"तुमने हमारे संताप को दूर करने के लिए एक महान उपाय बताया है -- वह है मृत्युंजय देव की आराधना का लक्षण।"

श्लोक 104 (skanda.4.11.104)

तद्गच्छ शरणं तात नातः परतरं हितम् । मनोरथपथातीत कारिणः कालहारिणः

tadgaccha śaraṇaṁ tāta nātaḥ parataraṁ hitam manorathapathātīta kāriṇaḥ kālahāriṇaḥ

"तो हे पुत्र, उनकी शरण में जाओ; इससे बढ़कर कोई हित नहीं है -- जो मनोरथ के मार्ग से परे कार्य करने वाले और काल को भी हर लेने वाले हैं।"

श्लोक 105 (skanda.4.11.105)

किं न श्रुतं त्वया तात श्वेतकेतु यथा पुरा । पाशितं कालपाशेन ररक्ष त्रिपुरांतकः

kiṁ na śrutaṁ tvayā tāta śvetaketu yathā purā pāśitaṁ kālapāśena rarakṣa tripurāṁtakaḥ

"क्या तुमने नहीं सुना, हे वत्स, कि पूर्वकाल में त्रिपुरांतक (शिव) ने कालपाश से बंधे श्वेतकेतु की रक्षा कैसे की थी?"

श्लोक 106 (skanda.4.11.106)

शिलादतनयं मृत्युग्रस्तमष्टाब्दमर्भकम् । शिवो निजजनं चक्रे नंदिनं विश्वनंदिनम्

śilādatanayaṁ mṛtyugrastamaṣṭābdamarbhakam śivo nijajanaṁ cakre naṁdinaṁ viśvanaṁdinam

"शिव ने शिलाद के आठ वर्ष के पुत्र को, जिसे मृत्यु ने पकड़ लिया था, अपना निजजन बना लिया था -- विश्व को आनंदित करने वाला नंदी।"

श्लोक 107 (skanda.4.11.107)

क्षीरोदमथनोद्भूतप्रलयानलसंनिभम् । पीत्वा हालाहलं घोरमरक्षद्भुवनत्रयम्

kṣīrodamathanodbhūtapralayānalasaṁnibham pītvā hālāhalaṁ ghoramarakṣadbhuvanatrayam

"क्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न, प्रलय की अग्नि के समान भयंकर हलाहल विष का पान करके उन्होंने तीनों लोकों की रक्षा की थी।"

श्लोक 108 (skanda.4.11.108)

जालंधरं महादर्पं हृतत्रैलोक्यसंपदम् । चरणांगुष्ठरेखोत्थचक्रेणनिजघानयः

jālaṁdharaṁ mahādarpaṁ hṛtatrailokyasaṁpadam caraṇāṁguṣṭharekhotthacakreṇanijaghānayaḥ

"अत्यंत अहंकारी जालंधर को, जिसने तीनों लोकों की संपत्ति हर ली थी, उन्होंने अपने पैर के अंगूठे की रेखा से उत्पन्न चक्र से मार डाला था।"

श्लोक 109 (skanda.4.11.109)

य एकेषु निपातोत्थ ज्वलनैस्त्रिपुरं पुरा । विधाय पत्रिणं विष्णुं ज्वालयामास धूर्जटिः

ya ekeṣu nipātottha jvalanaistripuraṁ purā vidhāya patriṇaṁ viṣṇuṁ jvālayāmāsa dhūrjaṭiḥ

"जिन्होंने एक ही बार में गिरी हुई अग्नियों से त्रिपुर को, विष्णु को ही बाण बनाकर, पहले जला डाला था -- वे धूर्जटि (शिव) ही हैं।"

श्लोक 110 (skanda.4.11.110)

अंधकं यस्त्रिशूलाग्रप्रोतं वर्षायुतं पुरा । त्रैलोक्यैश्वर्यसंमूढं शोषयामास भानुना

aṁdhakaṁ yastriśūlāgraprotaṁ varṣāyutaṁ purā trailokyaiśvaryasaṁmūḍhaṁ śoṣayāmāsa bhānunā

"जिन्होंने त्रिलोक के ऐश्वर्य से मोहित अंधक को दस हजार वर्षों तक त्रिशूल की नोक पर बींधे रखकर सूर्य से सुखा दिया था।"

श्लोक 111 (skanda.4.11.111)

कामं दृष्टिनिपातेन त्रैलोक्यविजयोर्जितम् । निनायानंगपदवीं वीक्षमाणेष्वजादिषु

kāmaṁ dṛṣṭinipātena trailokyavijayorjitam nināyānaṁgapadavīṁ vīkṣamāṇeṣvajādiṣu

"जिन्होंने ब्रह्मा आदि के देखते-देखते, केवल एक दृष्टिपात से, तीनों लोकों को जीतने में समर्थ कामदेव को अनंग (शरीर-रहित) बना दिया था।"

श्लोक 112 (skanda.4.11.112)

तं ब्रह्माद्येककर्तारं मेघवाहनमच्युतम् । प्रयाहि पुत्र शरणं विश्वरक्षामणिं शिवम्

taṁ brahmādyekakartāraṁ meghavāhanamacyutam prayāhi putra śaraṇaṁ viśvarakṣāmaṇiṁ śivam

"हे पुत्र, उन्हीं ब्रह्मा आदि के एकमात्र कर्ता, मेघ-वाहन, अच्युत, विश्व की रक्षा करने वाले मणि-स्वरूप शिव की शरण में जाओ।"

श्लोक 113 (skanda.4.11.113)

पित्रोरनुज्ञां प्राप्येति प्रणम्य चरणौ तयोः । प्रदक्षिणमुपावृत्य बह्वाश्वास्य विनिर्ययौ

pitroranujñāṁ prāpyeti praṇamya caraṇau tayoḥ pradakṣiṇamupāvṛtya bahvāśvāsya viniryayau

माता-पिता की आज्ञा पाकर, उनके दोनों चरणों में प्रणाम करके, प्रदक्षिणा करके, तथा उन्हें बहुत समझा-बुझाकर, वह वहाँ से निकल पड़ा।

श्लोक 114 (skanda.4.11.114)

स प्राप्य काशीं दुष्प्रापां ब्रह्मनारायणादिभिः । महासंवर्तसंवृत्त तापाद्विश्वेशपालिताम्

sa prāpya kāśīṁ duṣprāpāṁ brahmanārāyaṇādibhiḥ mahāsaṁvartasaṁvṛtta tāpādviśveśapālitām

ब्रह्मा और नारायण आदि के लिए भी दुष्प्राप्य, महाप्रलय के संताप से विश्वेश द्वारा सुरक्षित काशी को प्राप्त करके --

श्लोक 115 (skanda.4.11.115)

फिरस्वर्धुन्या हारयष्ट्येव राजितां कंठभूमिषु । विचित्रगुणशालिन्याहारनीहारगौरया

phirasvardhunyā hārayaṣṭyeva rājitāṁ kaṁṭhabhūmiṣu vicitraguṇaśālinyāhāranīhāragaurayā

-- जो अपने कंठ-प्रदेशों पर स्वर्धुनी (गंगा) को मानो हार की लड़ी के समान धारण किए हुए शोभायमान थी, विचित्र गुणों से युक्त, कोहरे के समान गौरवर्ण वाली --

श्लोक 116 (skanda.4.11.116)

बहुसंसारसंतापसंतप्तजनतोद्भवम् । वारयंतीं वरणया छिंदंतीमसिधारया

bahusaṁsārasaṁtāpasaṁtaptajanatodbhavam vārayaṁtīṁ varaṇayā chiṁdaṁtīmasidhārayā

-- जो संसार के अनेक तापों से संतप्त जनता से उत्पन्न दुःख को अपनी सीमा से रोकती और तलवार की धार से काट देती थी --

श्लोक 117 (skanda.4.11.117)

यल्लभ्यते च कैवल्यं सुदृढाष्टांगयोगतः । विकासयंतीं तत्सम्यक्काशिकांयांजगुर्बुधाः ।

yallabhyate ca kaivalyaṁ sudṛḍhāṣṭāṁgayogataḥ vikāsayaṁtīṁ tatsamyakkāśikāṁyāṁjagurbudhāḥ

-- जो दृढ़ अष्टांग योग से प्राप्त होने वाली उस कैवल्य-मुक्ति को भलीभाँति प्रकट करती थी -- जिसे विद्वानों ने काशिका कहा है --

श्लोक 118 (skanda.4.11.118)

संसारतापतप्ताभ्यां लोचनाभ्यां स दृष्टवान् । कर्णाकर्णप्रकीर्णाभ्यां प्राग्ययौ मणिकर्णिकाम्

saṁsāratāpataptābhyāṁ locanābhyāṁ sa dṛṣṭavān karṇākarṇaprakīrṇābhyāṁ prāgyayau maṇikarṇikām

-- उसे संसार के ताप से संतप्त, कानों तक फैली अश्रुधाराओं से भरी अपनी दोनों आँखों से देखकर, वह पहले मणिकर्णिका गया।

श्लोक 119 (skanda.4.11.119)

तत्र स्नात्वा विधानेन दृष्ट्वा विश्वेश्वरं विभुम् । त्रैलोक्यप्राणिसंत्राणकारिणं प्रणनाम ह

tatra snātvā vidhānena dṛṣṭvā viśveśvaraṁ vibhum trailokyaprāṇisaṁtrāṇakāriṇaṁ praṇanāma ha

वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके, त्रिलोक के प्राणियों की रक्षा करने वाले विभु विश्वेश्वर के दर्शन करके, उसने प्रणाम किया।

श्लोक 120 (skanda.4.11.120)

आलोक्यालोक्य तल्लिंगं तुतोष हृदये बहु । परमानंदकंदाख्यं स्फुटमेतन्न संशयः

ālokyālokya talliṁgaṁ tutoṣa hṛdaye bahu paramānaṁdakaṁdākhyaṁ sphuṭametanna saṁśayaḥ

उस लिंग को बार-बार देखकर उसका हृदय अत्यंत संतुष्ट हो गया -- "यह निश्चय ही स्पष्ट रूप से परमानंद का मूल है, इसमें कोई संदेह नहीं।"

श्लोक 121 (skanda.4.11.121)

अहो न मत्तो धन्योस्ति त्रैलोक्ये सचराचरे । यदद्राक्षिषमद्याहं श्रीमद्विश्वेश्वरं विभुम्

aho na matto dhanyosti trailokye sacarācare yadadrākṣiṣamadyāhaṁ śrīmadviśveśvaraṁ vibhum

"अहो, चराचर त्रिलोक में मुझसे बढ़कर कोई धन्य नहीं है, कि मैंने आज इस श्रीमान विश्वेश्वर विभु के दर्शन किए हैं।"

श्लोक 122 (skanda.4.11.122)

त्रिलोकीसारसर्वस्वं पिंडीभूतमिदं किल । किं वा पीयूषपिंडोयमुद्गतः क्षीरनीरधेः

trilokīsārasarvasvaṁ piṁḍībhūtamidaṁ kila kiṁ vā pīyūṣapiṁḍoyamudgataḥ kṣīranīradheḥ

"क्या यह त्रिलोक के सार और सर्वस्व का पिंडीभूत रूप है? या यह क्षीरसागर से निकला हुआ अमृत का पिंड है?"

श्लोक 123 (skanda.4.11.123)

आत्मावबोधमहसः किमसौ प्रथमांकुरः । ब्रह्मानंद सुकंदो वा किमु ब्रह्मरसायनम्

ātmāvabodhamahasaḥ kimasau prathamāṁkuraḥ brahmānaṁda sukaṁdo vā kimu brahmarasāyanam

"क्या यह आत्मबोध के तेज का प्रथम अंकुर है? अथवा ब्रह्मानंद का सुंदर मूल है? या फिर यह ब्रह्म-रसायन ही है?"

श्लोक 124 (skanda.4.11.124)

योगिहृत्पद्मनिलयं यदनाकारमुच्यते । तदाकारत्वमापेदे किमिदं लिंगकैतवात्

yogihṛtpadmanilayaṁ yadanākāramucyate tadākāratvamāpede kimidaṁ liṁgakaitavāt

"योगियों के हृदय-कमल में निवास करने वाला, जिसे निराकार कहा जाता है, क्या वह लिंग के बहाने इस साकार रूप को प्राप्त हुआ है?"

श्लोक 125 (skanda.4.11.125)

ब्रह्मांडभांडमथवा नाना रत्नौघपूरितम् । अथवा मोक्षवृक्षस्य फलमेतन्नसंशयः

brahmāṁḍabhāṁḍamathavā nānā ratnaughapūritam athavā mokṣavṛkṣasya phalametannasaṁśayaḥ

"अथवा क्या यह विविध रत्नों के समूह से भरा हुआ ब्रह्मांड-रूपी पात्र है? या फिर निःसंदेह यह मोक्षरूपी वृक्ष का फल ही है?"

श्लोक 126 (skanda.4.11.126)

निर्वाणलक्ष्म्याः किमथ केशपाशः सुपुष्पयुक । कैवल्यमल्लीवल्ल्याः किंस्तबकः स्तावकार्थदः

nirvāṇalakṣmyāḥ kimatha keśapāśaḥ supuṣpayuka kaivalyamallīvallyāḥ kiṁstabakaḥ stāvakārthadaḥ

"क्या यह निर्वाण-लक्ष्मी के सुंदर पुष्पों से युक्त केशपाश है? अथवा कैवल्य-रूपी मल्लिका-लता का वह गुच्छा है, जो स्तुति करने वालों को अर्थ प्रदान करता है?"

श्लोक 127 (skanda.4.11.127)

निःश्रेयसश्रियः किंवाऽऽनंदक्रीडनकंदुकः । अपवर्गो दयाद्रेः किमुदियाय सुधाकरः

niḥśreyasaśriyaḥ kiṁvā''naṁdakrīḍanakaṁdukaḥ apavargo dayādreḥ kimudiyāya sudhākaraḥ

"अथवा क्या यह मोक्ष-लक्ष्मी के आनंद-क्रीड़ा का गेंद है? क्या दया के पर्वत से मोक्ष-रूपी चंद्रमा उदित हुआ है?"

श्लोक 128 (skanda.4.11.128)

संसारमोहतिमिरभिदुरःकिमसौ रविः । किमु कल्याणरमणीरम्यशृंगारदर्पणः

saṁsāramohatimirabhiduraḥkimasau raviḥ kimu kalyāṇaramaṇīramyaśṛṁgāradarpaṇaḥ

"क्या यह संसार के मोह-अंधकार को भेदने वाला सूर्य है? या फिर कल्याणकारिणी सुंदरी (लक्ष्मी) के श्रृंगार का मनोहर दर्पण है?"

श्लोक 129 (skanda.4.11.129)

आज्ञातं नभवेदन्यत्सर्वेषां देहधारिणाम् । अनेककर्मबीजानां बीजपूरोऽयमद्भुतः

ājñātaṁ nabhavedanyatsarveṣāṁ dehadhāriṇām anekakarmabījānāṁ bījapūro'yamadbhutaḥ

"सभी देहधारियों के अनेक कर्म-बीजों में से कुछ भी इससे अज्ञात नहीं है; यह उन बीजों को समेटने वाला अद्भुत पात्र है।"

श्लोक 130 (skanda.4.11.130)

विश्वेषां विश्वबीजानां कर्माख्यानां लयो यतः । अस्मिन्निर्वाणदे लिंगे विश्वलिंगमिदं ततः

viśveṣāṁ viśvabījānāṁ karmākhyānāṁ layo yataḥ asminnirvāṇade liṁge viśvaliṁgamidaṁ tataḥ

"चूँकि इसी मुक्तिदायक लिंग में समस्त विश्व के, कर्म नामक सभी बीजों का लय होता है, इसीलिए यह विश्व-लिंग है।"

श्लोक 131 (skanda.4.11.131)

मम भाग्योदयेनैव नारदेन महर्षिणा । तदागत्य तथोक्तं यत्कृतकृत्योस्म्यहं ततः

mama bhāgyodayenaiva nāradena maharṣiṇā tadāgatya tathoktaṁ yatkṛtakṛtyosmyahaṁ tataḥ

"मेरे ही सौभाग्य के उदय से महर्षि नारद आए और मुझसे ऐसा कहा; इसलिए अब मैं कृतकृत्य हो गया हूँ।"

श्लोक 132 (skanda.4.11.132)

इत्यानंदामृतरसैर्विधायसहि पारणम् । ततःशुभेऽह्नि संस्थाप्य लिंगं सर्वहितप्रदम्

ityānaṁdāmṛtarasairvidhāyasahi pāraṇam tataḥśubhe'hni saṁsthāpya liṁgaṁ sarvahitapradam

इस प्रकार आनंद के अमृत-रस से पारणा करके, फिर एक शुभ दिन सभी का हित करने वाले उस लिंग को स्थापित करके,

श्लोक 133 (skanda.4.11.133)

जग्राह नियमान्घोरान्दुष्करानकृतात्मनाम् । अष्टोत्तरशतैः कुंभैः पूर्णैर्गंगामृतोद्रवैः

jagrāha niyamānghorānduṣkarānakṛtātmanām aṣṭottaraśataiḥ kuṁbhaiḥ pūrṇairgaṁgāmṛtodravaiḥ

उसने अनियंत्रित मन वालों के लिए दुष्कर, घोर नियमों का पालन किया -- गंगा के अमृत-तुल्य जल से भरे एक सौ आठ कलशों से --

श्लोक 134 (skanda.4.11.134)

संस्नाप्य वाससा पूतैः पूतात्मा प्रत्यहं शिवम् । नीलोत्पलमयीं मालां समर्पयति सोऽन्वहम्

saṁsnāpya vāsasā pūtaiḥ pūtātmā pratyahaṁ śivam nīlotpalamayīṁ mālāṁ samarpayati so'nvaham

पवित्र वस्त्रों से (लिंग को) स्नान कराकर, पवित्र आत्मा वाला वह प्रतिदिन शिव को नीलकमलों की माला अर्पित करता था,

श्लोक 135 (skanda.4.11.135)

अष्टाधिकसहस्रैस्तु सुमनोभिर्विनिर्मिताम् । सपक्षार्धेन षण्मासं कंदमूलफलाशनः

aṣṭādhikasahasraistu sumanobhirvinirmitām sapakṣārdhena ṣaṇmāsaṁ kaṁdamūlaphalāśanaḥ

जो एक हज़ार आठ फूलों से बनाई जाती थी; आधे पक्ष सहित छह मास तक वह केवल कंद, मूल और फल खाकर रहा,

श्लोक 136 (skanda.4.11.136)

शीर्णपर्णाशनः पक्षे त्वाषण्मासं बभूव सः । षण्मासं वायुभक्षोभूत्षण्मासं जलबिंदुभुक्

śīrṇaparṇāśanaḥ pakṣe tvāṣaṇmāsaṁ babhūva saḥ ṣaṇmāsaṁ vāyubhakṣobhūtṣaṇmāsaṁ jalabiṁdubhuk

एक पक्ष तक झरे हुए पत्ते खाकर वह छह मास तक ऐसे ही रहा; छह मास वह केवल वायु का आहार करता रहा, और छह मास केवल जल की बूँदों का।

श्लोक 137 (skanda.4.11.137)

एवं वर्षद्वयं तस्य व्यतिक्रांतं तथा सतः । जन्मतो द्वादशे वर्षे तद्वचो नारदेरितम्

evaṁ varṣadvayaṁ tasya vyatikrāṁtaṁ tathā sataḥ janmato dvādaśe varṣe tadvaco nāraderitam

इस प्रकार उसके दो वर्ष बीत गए; जन्म से बारहवें वर्ष में वह समय आ पहुँचा, जिसकी बात नारद ने कही थी।

श्लोक 138 (skanda.4.11.138)

सत्यं करिष्यन्निवतमभ्यगात्कुलिशायुधः । उवाच च वरं ब्रूहि दद्मि तन्मनसि स्थितम्

satyaṁ kariṣyannivatamabhyagātkuliśāyudhaḥ uvāca ca varaṁ brūhi dadmi tanmanasi sthitam

(नारद की बात) सत्य करने के लिए मानो, वज्रधारी (इंद्र) उसके पास आए और बोले, "वर माँगो; जो तुम्हारे मन में है, मैं वह दूँगा।"

श्लोक 139 (skanda.4.11.139)

अहं शतक्रतुर्विप्र प्रसन्नोस्मि शुभव्रतैः । इत्याकर्ण्य महेंद्रस्य वाक्यं मुनिकुमारकः

ahaṁ śatakraturvipra prasannosmi śubhavrataiḥ ityākarṇya maheṁdrasya vākyaṁ munikumārakaḥ

"मैं शतक्रतु (इंद्र) हूँ, हे विप्र, तुम्हारे शुभ व्रतों से प्रसन्न हूँ।" महेंद्र के इस वचन को सुनकर उस मुनि-पुत्र ने --

श्लोक 140 (skanda.4.11.140)

उवाच मधुरं धीरः कीरवन्मधुराक्षरम्। मघवन्वृत्रशत्रो त्वां जाने कुलिशपाणिनम्

uvāca madhuraṁ dhīraḥ kīravanmadhurākṣaram maghavanvṛtraśatro tvāṁ jāne kuliśapāṇinam

-- कोयल के समान मधुर स्वर में, धैर्यपूर्वक मधुर शब्दों में उत्तर दिया, "हे मघवन, वृत्रशत्रो! मैं तुम्हें वज्रपाणि के रूप में जानता हूँ।"

श्लोक 141 (skanda.4.11.141)

नाहं वृणे वरं त्वत्तः शंकरो वरदोस्ति मे

nāhaṁ vṛṇe varaṁ tvattaḥ śaṁkaro varadosti me

"मैं तुमसे कोई वर नहीं माँगता; शंकर ही मेरे वरदाता हैं।"

श्लोक 142 (skanda.4.11.142)

इंद्र उवाच । न मत्तः शंकरोस्त्वन्यो देवदेवोस्म्यहं शिशो । विहाय बालिशत्वं त्वं वरयाचस्व मां वरम्

iṁdra uvāca na mattaḥ śaṁkarostvanyo devadevosmyahaṁ śiśo vihāya bāliśatvaṁ tvaṁ varayācasva māṁ varam

इंद्र ने कहा -- "मुझसे बढ़कर कोई और शंकर नहीं है, हे शिशु; मैं ही देवताओं का देवता हूँ। अपनी बालकता छोड़कर मुझसे वर माँगो।"

श्लोक 143 (skanda.4.11.143)

ब्राह्मण उवाच । गच्छाहल्यापतेऽसाधो गोत्रारे पाकशासन । न प्रार्थये पशुपतेरन्यदेवांतरं स्फुटम्

brāhmaṇa uvāca gacchāhalyāpate'sādho gotrāre pākaśāsana na prārthaye paśupateranyadevāṁtaraṁ sphuṭam

ब्राह्मण (बालक) ने कहा -- "हे अहल्या के दुष्ट पति, हे गोत्र के शत्रु, हे पाकशासन! जाओ; मैं स्पष्ट रूप से पशुपति के अतिरिक्त किसी और देवता की प्रार्थना नहीं करता।"

श्लोक 144 (skanda.4.11.144)

इति तस्य वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः । उद्यम्य कुलिशं घोरं भीषयामास बालकम्

iti tasya vacaḥ śrutvā krodhasaṁraktalocanaḥ udyamya kuliśaṁ ghoraṁ bhīṣayāmāsa bālakam

उसके इन वचनों को सुनकर, क्रोध से लाल आँखों वाले (इंद्र) ने भयंकर वज्र उठाकर बालक को डराने का प्रयत्न किया।

श्लोक 145 (skanda.4.11.145)

स दृष्ट्वा बालको वज्रं विद्युज्ज्वालाशताकुलम् । स्मरन्नारदवाक्यं च मुमूर्च्छ भयविह्वलः

sa dṛṣṭvā bālako vajraṁ vidyujjvālāśatākulam smarannāradavākyaṁ ca mumūrccha bhayavihvalaḥ

सैकड़ों बिजलियों की ज्वालाओं से भरे उस वज्र को देखकर, बालक नारद के वचनों का स्मरण करते हुए भय से विह्वल होकर मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 146 (skanda.4.11.146)

अथ गौरीपतिः शंभुराविरासीत्तमोनुदः । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते स्पर्शैः संजीवयन्निव

atha gaurīpatiḥ śaṁbhurāvirāsīttamonudaḥ uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṁ te sparśaiḥ saṁjīvayanniva

तब अंधकार का नाश करने वाले गौरीपति शंभु प्रकट हुए, और मानो अपने स्पर्श से उसे पुनर्जीवित करते हुए बोले, "उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो।"

श्लोक 147 (skanda.4.11.147)

उन्मील्य नेत्रकमले सुप्ते इव दिवाक्षये । अपश्यदग्रे चोत्थाय शंभुमर्कशताधिकम्

unmīlya netrakamale supte iva divākṣaye apaśyadagre cotthāya śaṁbhumarkaśatādhikam

दिन के अंत में सोए हुए के समान अपने कमल-नेत्र खोलकर और उठकर, उसने अपने सामने सैकड़ों सूर्यों से अधिक तेजस्वी शंभु को देखा --

श्लोक 148 (skanda.4.11.148)

भाले लोचनमालोक्य कंठे कालं वृषध्वजम् । वामांगसंनिविष्टाद्रितनयं चं द्रशेखरम्

bhāle locanamālokya kaṁṭhe kālaṁ vṛṣadhvajam vāmāṁgasaṁniviṣṭādritanayaṁ caṁ draśekharam

-- उनके ललाट पर नेत्र, कंठ पर काला (विष का चिह्न), वृषभध्वज, बाईं ओर पर्वत-पुत्री (पार्वती) को बैठाए हुए, चंद्रशेखर,

श्लोक 149 (skanda.4.11.149)

कपर्देन विराजंतं त्रिशूलाजगवायुधम् । स्फुरत्कर्पूरगौरांगं परिणद्ध गजाजिनम्

kapardena virājaṁtaṁ triśūlājagavāyudham sphuratkarpūragaurāṁgaṁ pariṇaddha gajājinam

-- जटाओं से सुशोभित, त्रिशूल और अजगव धनुष धारण किए हुए, कपूर के समान चमकते गौरवर्ण शरीर वाले, गजचर्म धारण किए हुए,

श्लोक 150 (skanda.4.11.150)

परिज्ञाय महादेवं गुरुवाक्यत आगमात् । हर्ष बाष्पाकुलः सन्न कठो रोमांचकंचुकः

parijñāya mahādevaṁ guruvākyata āgamāt harṣa bāṣpākulaḥ sanna kaṭho romāṁcakaṁcukaḥ

-- गुरु के वचन और अपने ही अनुभव से महादेव को पहचानकर, हर्ष के आँसुओं से भरा हुआ, कठोरता समाप्त, रोमांच से मानो कंचुक पहने हुए,

श्लोक 151 (skanda.4.11.151)

क्षणंस्थगितवत्तस्थौ चित्रकृत्रिमपुत्रकः । यथातथा सुसंपन्नो विस्मृत्यात्मानमेव च

kṣaṇaṁsthagitavattasthau citrakṛtrimaputrakaḥ yathātathā susaṁpanno vismṛtyātmānameva ca

-- वह एक क्षण के लिए मानो स्तब्ध, किसी अद्भुत बनावटी पुतले के समान, अपने-आप को भी भूलकर खड़ा रह गया,

श्लोक 152 (skanda.4.11.152)

न स्तोतुं न नमस्कर्तुं किंचिद्विज्ञप्तुमेव च । यदासनशशाकालं तदा स्मित्वाऽऽह शंकरः

na stotuṁ na namaskartuṁ kiṁcidvijñaptumeva ca yadāsanaśaśākālaṁ tadā smitvā''ha śaṁkaraḥ

-- न स्तुति कर सका, न प्रणाम कर सका, न कुछ निवेदन ही कर सका। जब वह इस दशा में बैठा हुआ था, तब शंकर मुस्कुराते हुए बोले --

श्लोक 153 (skanda.4.11.153)

ईश्वर उवाच । शिशो गृहपते शक्राद्वज्रोद्यतपरादहो । ज्ञातो भीतोसि मा भैषीर्जिज्ञासा ते कृता मया

īśvara uvāca śiśo gṛhapate śakrādvajrodyataparādaho jñāto bhītosi mā bhaiṣīrjijñāsā te kṛtā mayā

ईश्वर ने कहा -- "हे शिशु गृहपते! शक्र द्वारा उठाए गए वज्र से डरकर तुम पहचान लिए गए हो; भय मत करो, यह तो मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी।"

श्लोक 154 (skanda.4.11.154)

मम भक्तस्य नो शक्रो न वज्रं नांतकोपि वा । प्रभवेदिंद्ररूपेण मयैव त्वं हि भाषितः

mama bhaktasya no śakro na vajraṁ nāṁtakopi vā prabhavediṁdrarūpeṇa mayaiva tvaṁ hi bhāṣitaḥ

"मेरे भक्त पर न शक्र का, न वज्र का, और न ही अंतक (मृत्यु) का कोई वश चलता है; इंद्र के रूप में तुमसे मैंने स्वयं ही बात की थी।"

श्लोक 155 (skanda.4.11.155)

वरं ददामि ते भद्र त्वमग्निपदभाग्भव । सर्वेषामेव देवानां वदनं त्वं भविष्यसि

varaṁ dadāmi te bhadra tvamagnipadabhāgbhava sarveṣāmeva devānāṁ vadanaṁ tvaṁ bhaviṣyasi

"हे भद्र, मैं तुम्हें वर देता हूँ -- तुम अग्नि-पद के भागी बनो; तुम सभी देवताओं के मुख बनोगे।"

श्लोक 156 (skanda.4.11.156)

सर्वेषामेव भूतानां त्वमग्नेंऽतश्चरो भव । धर्मराजेंद्रयोर्मध्ये दिगीशो राज्यमाप्नुहि

sarveṣāmeva bhūtānāṁ tvamagneṁ'taścaro bhava dharmarājeṁdrayormadhye digīśo rājyamāpnuhi

"तुम सभी प्राणियों की अग्नि के भीतर विचरण करने वाले बनो; धर्मराज और इंद्र के मध्य, दिशा के स्वामी के रूप में राज्य प्राप्त करो।"

श्लोक 157 (skanda.4.11.157)

त्वयेदं स्थापितं लिंगं तव नाम्ना भविष्यति । अग्नीश्वरं इति ख्यातं सर्वतेजोभिबृंहणम्

tvayedaṁ sthāpitaṁ liṁgaṁ tava nāmnā bhaviṣyati agnīśvaraṁ iti khyātaṁ sarvatejobhibṛṁhaṇam

"तुम्हारे द्वारा स्थापित यह लिंग तुम्हारे ही नाम से जाना जाएगा -- 'अग्नीश्वर' के नाम से प्रसिद्ध, समस्त तेज को बढ़ाने वाला।"

श्लोक 158 (skanda.4.11.158)

अग्नीश्वरस्य भक्तानां न भयं विद्युदग्निजम् । अग्निमांद्य भयं नैव नाकालमरणं क्वचित्

agnīśvarasya bhaktānāṁ na bhayaṁ vidyudagnijam agnimāṁdya bhayaṁ naiva nākālamaraṇaṁ kvacit

"अग्नीश्वर के भक्तों को बिजली की अग्नि का भय नहीं होता; न अग्निमांद्य (जठराग्नि की मंदता) का भय होता है और न कभी अकाल-मृत्यु का।"

श्लोक 159 (skanda.4.11.159)

अग्नीश्वरं समभ्यर्च्य काश्यां सर्वसमृद्धिदम् । अन्यत्रापि मृतो दैवादग्निलोके महीयते

agnīśvaraṁ samabhyarcya kāśyāṁ sarvasamṛddhidam anyatrāpi mṛto daivādagniloke mahīyate

"काशी में सर्वसमृद्धि देने वाले अग्नीश्वर की पूजा करके, यदि कोई दैवयोग से अन्यत्र भी मर जाए, तो भी वह अग्निलोक में प्रतिष्ठित होता है।"

श्लोक 160 (skanda.4.11.160)

ततः काशीं पुनः प्राप्य कल्पांते मोक्षमाप्नुयात् । वीरेश्वरस्य पूर्वेण गंगायाः पश्चिमे तटे

tataḥ kāśīṁ punaḥ prāpya kalpāṁte mokṣamāpnuyāt vīreśvarasya pūrveṇa gaṁgāyāḥ paścime taṭe

"फिर कल्प के अंत में काशी को पुनः प्राप्त करके वह मोक्ष पाता है -- यह लिंग वीरेश्वर के पूर्व में, गंगा के पश्चिमी तट पर है।"

श्लोक 161 (skanda.4.11.161)

अग्नीश्वरं समाराध्य वह्निलोके वसेन्नरः । पितृभ्यां स्वजनैः सार्धं मित्रबंधुसमायुतः

agnīśvaraṁ samārādhya vahniloke vasennaraḥ pitṛbhyāṁ svajanaiḥ sārdhaṁ mitrabaṁdhusamāyutaḥ

"अग्नीश्वर की आराधना करके मनुष्य पितरों तथा स्वजनों के साथ, मित्रों और बांधवों से युक्त होकर वह्निलोक में निवास करता है।"

श्लोक 162 (skanda.4.11.162)

विमानमिदमारुह्य प्रयाह्येव दिशःपते । इत्युक्त्वानीय तद्बंधून् पित्रोश्च परिपश्यतोः । दिक्पतित्वेऽभिषिच्याग्निं तत्र लिंगे शिवोविशत्

vimānamidamāruhya prayāhyeva diśaḥpate ityuktvānīya tadbaṁdhūn pitrośca paripaśyatoḥ dikpatitve'bhiṣicyāgniṁ tatra liṁge śivoviśat

"'इस विमान पर चढ़कर जाओ, हे दिशा के स्वामी!' यह कहकर, उसके बंधुजनों को लाकर, तथा माता-पिता के देखते-देखते, दिक्पति के पद पर अग्नि का अभिषेक करके, शिव वहीं उस लिंग में समा गए।"

श्लोक 163 (skanda.4.11.163)

गणावूचतुः । इत्थमग्निस्वरूपं ते शिवशर्मन्प्रवर्णितम् । किमन्यच्छ्रोतुकामोसि कथयावस्तदीरय

gaṇāvūcatuḥ itthamagnisvarūpaṁ te śivaśarmanpravarṇitam kimanyacchrotukāmosi kathayāvastadīraya

दोनों गणों ने कहा -- "इस प्रकार, हे शिवशर्मन, तुम्हें अग्नि का यह स्वरूप विस्तार से वर्णित किया गया। और क्या सुनना चाहते हो? कहो, हम उसे भी कहेंगे।"

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