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काशी खण्ड · अध्याय 21

ध्रुवस्तुतिः

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (skanda.4.21.1)

ध्रुव उवाच । नमो हिरण्यगर्भाय सर्वसृष्टिविधायिने । हिरण्यरेतसे तुभ्यं सुहिरण्यप्रदायिने

dhruva uvāca namo hiraṇyagarbhāya sarvasṛṣṭividhāyine hiraṇyaretase tubhyaṁ suhiraṇyapradāyine

ध्रुव ने कहा -- "सम्पूर्ण सृष्टि के विधाता हिरण्यगर्भ को नमस्कार; हिरण्यरेता तथा उत्तम स्वर्ण के दाता आपको नमस्कार।"

श्लोक 2 (skanda.4.21.2)

नमो हरस्वरूपाय भूतसंहारकारिणे । महाभूतात्मभूताय भूतानां पतये नमः

namo harasvarūpāya bhūtasaṁhārakāriṇe mahābhūtātmabhūtāya bhūtānāṁ pataye namaḥ

"हरस्वरूप, प्राणियों का संहार करने वाले, महाभूतों के आत्मस्वरूप, समस्त भूतों के स्वामी आपको नमस्कार।"

श्लोक 3 (skanda.4.21.3)

नमः स्थितिकृते तुभ्यं विष्णवे प्रभविष्णवे । तृष्णाहराय कृष्णाय महाभार सहिष्णवे

namaḥ sthitikṛte tubhyaṁ viṣṇave prabhaviṣṇave tṛṣṇāharāya kṛṣṇāya mahābhāra sahiṣṇave

"स्थिति करने वाले, सामर्थ्यवान् विष्णु को नमस्कार; तृष्णा को हरने वाले, संसार के महाभार को सहन करने वाले कृष्ण को नमस्कार।"

श्लोक 4 (skanda.4.21.4)

नमो दैत्यमहारण्य दाववह्निस्वरूपिणे । दैत्यद्रुमकुठाराय नमस्ते शार्ङ्गपाणये

namo daityamahāraṇya dāvavahnisvarūpiṇe daityadrumakuṭhārāya namaste śārṅgapāṇaye

"दैत्यरूपी महावन के लिए दावानल के समान, दैत्यरूपी वृक्ष के लिए कुठार के समान, शार्ङ्गधनुर्धारी आपको नमस्कार।"

श्लोक 5 (skanda.4.21.5)

नमः कौमोदकीव्यग्र कराग्राय गदाधर । महादनुजनाशाय नमो नंदकधारिणे

namaḥ kaumodakīvyagra karāgrāya gadādhara mahādanujanāśāya namo naṁdakadhāriṇe

"कौमोदकी गदा को हाथों के अग्रभाग में धारण करने वाले हे गदाधर! महान दानवों के संहारक, नन्दक खड्गधारी आपको नमस्कार।"

श्लोक 6 (skanda.4.21.6)

नमः श्रीपतये तुभ्यं नमश्चक्रधराय च । धराधराय वाराह रूपिणे परमात्मने

namaḥ śrīpataye tubhyaṁ namaścakradharāya ca dharādharāya vārāha rūpiṇe paramātmane

"श्रीपति को नमस्कार, चक्रधारी को नमस्कार; पृथ्वी को धारण करने वाले वराहरूपी परमात्मा को नमस्कार।"

श्लोक 7 (skanda.4.21.7)

नमः कमलहस्ताय कमलावल्लभाय ते । नमो मत्स्यादिरूपाय नमः कौस्तुभवक्षसे

namaḥ kamalahastāya kamalāvallabhāya te namo matsyādirūpāya namaḥ kaustubhavakṣase

"कमल हाथ में धारण करने वाले, कमला के प्रियतम को नमस्कार; मत्स्य आदि रूपों को नमस्कार; कौस्तुभमणिधारी वक्षस्थल वाले को नमस्कार।"

श्लोक 8 (skanda.4.21.8)

नमो वेदांतवेद्याय नमः श्रीवत्सधारिणे । नमो गुणस्वरूपाय गुणिने गुणवर्जिते

namo vedāṁtavedyāya namaḥ śrīvatsadhāriṇe namo guṇasvarūpāya guṇine guṇavarjite

"वेदांत से जानने योग्य, श्रीवत्स-धारी को नमस्कार; गुणस्वरूप, गुणी होते हुए भी गुणों से रहित आपको नमस्कार।"

श्लोक 9 (skanda.4.21.9)

नमस्ते पद्मनाभाय पांचजन्यधराय च । वासुदेव नमस्तुभ्यं देवकीनंदनाय च

namaste padmanābhāya pāṁcajanyadharāya ca vāsudeva namastubhyaṁ devakīnaṁdanāya ca

"पद्मनाभ, पांचजन्य शंखधारी को नमस्कार; हे वासुदेव! देवकीनन्दन आपको नमस्कार।"

श्लोक 10 (skanda.4.21.10)

प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः । नमः कंसविनाशाय नमश्चाणूरमर्दिने

pradyumnāya namastubhyamaniruddhāya te namaḥ namaḥ kaṁsavināśāya namaścāṇūramardine

"प्रद्युम्न को नमस्कार, अनिरुद्ध को नमस्कार; कंस के संहारक को नमस्कार, चाणूर के मर्दक को नमस्कार।"

श्लोक 11 (skanda.4.21.11)

दामोदरहृषीकेश गोर्विदाच्युतमाधव । उपेंद्रकैटभाऽराते मधुहंतरधोक्षज

dāmodarahṛṣīkeśa gorvidācyutamādhava upeṁdrakaiṭabhā'rāte madhuhaṁtaradhokṣaja

"हे दामोदर, हृषीकेश, गोविन्द, अच्युत, माधव! हे उपेंद्र, कैटभ के शत्रु, मधुसूदन, अधोक्षज!..."

श्लोक 12 (skanda.4.21.12)

नारायणाय नरकहारिणे पापहारिणे । वामनाय नमस्तुभ्यं हरये शौरये नमः

nārāyaṇāya narakahāriṇe pāpahāriṇe vāmanāya namastubhyaṁ haraye śauraye namaḥ

"...नारायण, नरकासुर के संहारक, पापहारक को नमस्कार; वामन को नमस्कार, हरि को नमस्कार, शौरि को नमस्कार।"

श्लोक 13 (skanda.4.21.13)

अनंताय नमस्तुभ्यमनंतशयनाय च । रुक्मिणीपतये तुभ्यं रुक्मिप्रमथनाय च

anaṁtāya namastubhyamanaṁtaśayanāya ca rukmiṇīpataye tubhyaṁ rukmipramathanāya ca

"अनंत को नमस्कार, शेषशायी को नमस्कार; रुक्मिणीपति को नमस्कार, रुक्मी के संहारक को नमस्कार।"

श्लोक 14 (skanda.4.21.14)

चैद्यहंत्रे नमस्तुभ्यं दानवारेसुरारये । मुकुंदपरमानंद नंदगोपप्रियाय च

caidyahaṁtre namastubhyaṁ dānavāresurāraye mukuṁdaparamānaṁda naṁdagopapriyāya ca

"चेदिराज के संहारक, दानवों और असुरों के शत्रु को नमस्कार; हे मुकुन्द, परमानन्द, नन्द गोप के प्रिय!"

श्लोक 15 (skanda.4.21.15)

नमस्ते पुंडरीकाक्ष दनुजेंद्र निषूदिने । नमो गोपालरूपाय वेणुवादनकारिणे

namaste puṁḍarīkākṣa danujeṁdra niṣūdine namo gopālarūpāya veṇuvādanakāriṇe

"हे पुंडरीकाक्ष! दानवेन्द्र के संहारक को नमस्कार; गोपालरूपधारी, वेणुवादक को नमस्कार।"

श्लोक 16 (skanda.4.21.16)

गोपीप्रियाय केशिघ्ने गोवर्धनधराय च । रामाय रघुनाथाय राघवाय नमोनमः

gopīpriyāya keśighne govardhanadharāya ca rāmāya raghunāthāya rāghavāya namonamaḥ

"गोपियों के प्रिय, केशी के संहारक, गोवर्धनधारी को नमस्कार; राम, रघुनाथ, राघव को बारम्बार नमस्कार।"

श्लोक 17 (skanda.4.21.17)

रावणारे नमस्तुभ्यं विभीषणशरण्यद । अजाय जयरूपाय रणांगणविचक्षण

rāvaṇāre namastubhyaṁ vibhīṣaṇaśaraṇyada ajāya jayarūpāya raṇāṁgaṇavicakṣaṇa

"रावण के शत्रु, विभीषण को शरण देने वाले को नमस्कार; अजन्मा, विजयस्वरूप, रणांगण में निपुण आपको नमस्कार।"

श्लोक 18 (skanda.4.21.18)

क्षणादि कालरूपाय नानारूपाय शार्ङ्गिणे । गदिने चक्रिणे तुभ्यं दैत्यचक्रविमर्दिने

kṣaṇādi kālarūpāya nānārūpāya śārṅgiṇe gadine cakriṇe tubhyaṁ daityacakravimardine

"क्षण आदि कालस्वरूप, नानारूपधारी, शार्ङ्गधारी, गदाधारी, चक्रधारी, दैत्यसमूह के संहारक आपको नमस्कार।"

श्लोक 19 (skanda.4.21.19)

बलाय बलभद्राय बलारातिप्रियाय च । बलियज्ञप्रमथन नमो भक्तवरप्रद

balāya balabhadrāya balārātipriyāya ca baliyajñapramathana namo bhaktavaraprada

"बल को, बलभद्र को, बलारि के प्रिय को नमस्कार; हे बलि के यज्ञ को नष्ट करने वाले, भक्तों को उत्तम वर देने वाले, नमस्कार।"

श्लोक 20 (skanda.4.21.20)

हिरण्यकशिपोर्वक्षो विदारण रणप्रिय । नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च

hiraṇyakaśiporvakṣo vidāraṇa raṇapriya namo brahmaṇyadevāya gobrāhmaṇahitāya ca

"हिरण्यकशिपु के वक्षस्थल को विदीर्ण करने वाले, युद्धप्रिय; ब्राह्मणों के हितैषी देव, गौ-ब्राह्मणों के हितकारी को नमस्कार।"

श्लोक 21 (skanda.4.21.21)

नमस्ते धर्मरूपाय नमः सत्त्वगुणाय च । नमः सहस्रशिरसे पुरुषाय पराय च

namaste dharmarūpāya namaḥ sattvaguṇāya ca namaḥ sahasraśirase puruṣāya parāya ca

"धर्मस्वरूप को नमस्कार, सत्त्वगुण को नमस्कार; सहस्रशीर्ष पुरुष, परम पुरुष को नमस्कार।"

श्लोक 22 (skanda.4.21.22)

सहस्राक्ष सहस्रांघ्रे सहस्रकिरणाय च । सहस्रमूर्ते श्रीकांत नमस्ते यज्ञपूरुष

sahasrākṣa sahasrāṁghre sahasrakiraṇāya ca sahasramūrte śrīkāṁta namaste yajñapūruṣa

"हे सहस्राक्ष, सहस्रचरण, सहस्रकिरण, सहस्रमूर्ति, श्रीकांत! हे यज्ञपुरुष! आपको नमस्कार।"

श्लोक 23 (skanda.4.21.23)

वेदवेद्यस्वरूपाय नमो वेदप्रियाय च। वेदाय वेदगदिने सदाचाराध्वगामिने

vedavedyasvarūpāya namo vedapriyāya ca vedāya vedagadine sadācārādhvagāmine

"वेदों से जानने योग्य, वेदप्रिय; स्वयं वेद-स्वरूप, वेद के वक्ता, सदाचार के मार्ग पर चलने वाले को नमस्कार।"

श्लोक 24 (skanda.4.21.24)

वैकुंठाय नमस्तुभ्यं नमो वैकुंठवासिने। विष्टरश्रवसे तुभ्यं नमो गरुडगामिने

vaikuṁṭhāya namastubhyaṁ namo vaikuṁṭhavāsine viṣṭaraśravase tubhyaṁ namo garuḍagāmine

"वैकुण्ठ को नमस्कार, वैकुण्ठवासी को नमस्कार; विष्टरश्रवा, गरुड़वाहन को नमस्कार।"

श्लोक 25 (skanda.4.21.25)

विष्वक्सेन नमस्तुभ्यं जगन्मय जनार्दन। त्रिविक्रमाय सत्याय नमः सत्यप्रियाय च

viṣvaksena namastubhyaṁ jaganmaya janārdana trivikramāya satyāya namaḥ satyapriyāya ca

"हे विष्वक्सेन, जगन्मय जनार्दन! त्रिविक्रम, सत्यस्वरूप, सत्यप्रिय को नमस्कार।"

श्लोक 26 (skanda.4.21.26)

केशवाय नमस्तुभ्यं मायिने ब्रह्मागायिने। तपोरूपाय तपसां नमस्ते फलदायिने

keśavāya namastubhyaṁ māyine brahmāgāyine taporūpāya tapasāṁ namaste phaladāyine

"हे केशव! मायापति, ब्रह्मा द्वारा गाये जाने वाले, तपस्याओं के तपस्वरूप, फलदाता आपको नमस्कार।"

श्लोक 27 (skanda.4.21.27)

स्तुत्याय स्तुतिरूपाय भक्तस्तुतिरताय च । नमस्ते श्रुतिरूपाय श्रुत्याचार प्रियाय च

stutyāya stutirūpāya bhaktastutiratāya ca namaste śrutirūpāya śrutyācāra priyāya ca

"स्तुति के योग्य, स्तुतिस्वरूप, भक्तों की स्तुति में रत आपको नमस्कार; श्रुतिस्वरूप, श्रुति के आचार को प्रिय मानने वाले को नमस्कार।"

श्लोक 28 (skanda.4.21.28)

अंडजाय नमस्तुभ्यं स्वेदजाय नमोस्तु ते । जरायुज स्वरूपाय नम उद्भिज्जरूपिणे

aṁḍajāya namastubhyaṁ svedajāya namostu te jarāyuja svarūpāya nama udbhijjarūpiṇe

"अंडज-रूप को नमस्कार, स्वेदज-रूप को नमस्कार; जरायुज-रूप को नमस्कार, उद्भिज्ज-रूप को नमस्कार।"

श्लोक 29 (skanda.4.21.29)

देवानामिंद्ररूपोसि ग्रहाणामसि भानुमान् । लोकानां सत्यलोकोऽसि सिंधूनां क्षीरसागरः

devānāmiṁdrarūposi grahāṇāmasi bhānumān lokānāṁ satyaloko'si siṁdhūnāṁ kṣīrasāgaraḥ

"देवताओं में आप इन्द्ररूप हैं, ग्रहों में सूर्य हैं; लोकों में सत्यलोक हैं, समुद्रों में क्षीरसागर हैं।"

श्लोक 30 (skanda.4.21.30)

सुरापगाऽसि सरितां सरसां मानसं सरः । हिमवानसि शैलानां धेनूनां कामधुग्भवान्

surāpagā'si saritāṁ sarasāṁ mānasaṁ saraḥ himavānasi śailānāṁ dhenūnāṁ kāmadhugbhavān

"नदियों में आप गंगा हैं, सरोवरों में मानसरोवर हैं; पर्वतों में हिमवान हैं, गौओं में कामधेनु हैं।"

श्लोक 31 (skanda.4.21.31)

धातूनां हाटकमसि स्फटिकश्चोपलेष्वसि । नीलोत्पलं प्रसूनेषु वृक्षेषु तुलसी भवान्

dhātūnāṁ hāṭakamasi sphaṭikaścopaleṣvasi nīlotpalaṁ prasūneṣu vṛkṣeṣu tulasī bhavān

"धातुओं में आप स्वर्ण हैं, पत्थरों में स्फटिक हैं; पुष्पों में नीलकमल हैं, वृक्षों में तुलसी हैं।"

श्लोक 32 (skanda.4.21.32)

सर्वपूज्यशिलानां वै शालग्राम शिला भवान् । मुक्तिक्षेत्रेषु काशी त्वं प्रयागस्तीर्थपंक्तिषु

sarvapūjyaśilānāṁ vai śālagrāma śilā bhavān muktikṣetreṣu kāśī tvaṁ prayāgastīrthapaṁktiṣu

"समस्त पूज्य शिलाओं में आप शालग्राम शिला हैं; मुक्तिक्षेत्रों में काशी हैं, तीर्थों की पंक्ति में प्रयाग हैं।"

श्लोक 33 (skanda.4.21.33)

वर्णेषु श्वेतवर्णोऽसि द्विपदां ब्राह्मणो भवान् । गरुडोस्यंडजेष्वीश व्यवहारेषु वाग्भवान्

varṇeṣu śvetavarṇo'si dvipadāṁ brāhmaṇo bhavān garuḍosyaṁḍajeṣvīśa vyavahāreṣu vāgbhavān

"वर्णों में आप श्वेतवर्ण हैं, द्विपदों में ब्राह्मण हैं; हे ईश! अंडजों में गरुड़ हैं, व्यवहारों में वाणी हैं।"

श्लोक 34 (skanda.4.21.34)

वेदेषूपनिषद्रूपा मंत्राणां प्रणवोह्यसि । अक्षराणामकारोसि यज्वनां सोमरूपधृक्

vedeṣūpaniṣadrūpā maṁtrāṇāṁ praṇavohyasi akṣarāṇāmakārosi yajvanāṁ somarūpadhṛk

"वेदों में आप उपनिषद्-स्वरूप हैं, मंत्रों में प्रणव हैं; अक्षरों में अकार हैं, यज्ञकर्ताओं में सोमरूपधारी हैं।"

श्लोक 35 (skanda.4.21.35)

प्रतापिनामग्निरसि क्षमाऽसि त्वं क्षमावताम् । दातॄणामसि पर्जन्यः पवित्राणां परोह्यसि

pratāpināmagnirasi kṣamā'si tvaṁ kṣamāvatām dātṝṇāmasi parjanyaḥ pavitrāṇāṁ parohyasi

"प्रतापियों में आप अग्नि हैं, क्षमावानों में क्षमा हैं; दानियों में पर्जन्य हैं, पवित्र वस्तुओं में सर्वोत्तम हैं।"

श्लोक 36 (skanda.4.21.36)

चापोसि सर्वशस्त्राणां वातो वेगवतामसि । मनोसींद्रियवर्गेषु निर्भयाणां करोह्यसि

cāposi sarvaśastrāṇāṁ vāto vegavatāmasi manosīṁdriyavargeṣu nirbhayāṇāṁ karohyasi

"सर्व शस्त्रों में आप धनुष हैं, वेगवानों में वायु हैं; इन्द्रियों में मन हैं, निर्भयों में हाथ हैं।"

श्लोक 37 (skanda.4.21.37)

व्योमव्याप्तिमतां त्वं वै परमात्माऽसि चात्मनाम् । संध्योपास्तिर्भवान्देव सर्वनित्येषु कर्मसु

vyomavyāptimatāṁ tvaṁ vai paramātmā'si cātmanām saṁdhyopāstirbhavāndeva sarvanityeṣu karmasu

"व्यापक वस्तुओं में आप आकाश हैं, आत्माओं में परमात्मा हैं; हे देव! नित्य कर्मों में संध्योपासना हैं।"

श्लोक 38 (skanda.4.21.38)

क्रतूनामश्वमेधोसि दानानामभयं भवान् । लाभानां पुत्रलाभोसि वसंतस्त्वमृतुष्वहो

kratūnāmaśvamedhosi dānānāmabhayaṁ bhavān lābhānāṁ putralābhosi vasaṁtastvamṛtuṣvaho

"यज्ञों में आप अश्वमेध हैं, दानों में अभयदान हैं; लाभों में पुत्रलाभ हैं, ऋतुओं में वसंत हैं।"

श्लोक 39 (skanda.4.21.39)

युगानां प्रथमोसि त्वं तिथीनां त्वं कुहूर्ह्यसि । पुष्योसि नक्षत्रगणे संक्रमः सर्वपर्वसु

yugānāṁ prathamosi tvaṁ tithīnāṁ tvaṁ kuhūrhyasi puṣyosi nakṣatragaṇe saṁkramaḥ sarvaparvasu

"युगों में आप प्रथम हैं, तिथियों में अमावस्या हैं; नक्षत्रों में पुष्य हैं, समस्त पर्वों में संक्रांति हैं।"

श्लोक 40 (skanda.4.21.40)

योगेषु व्यतिपातस्त्वं तृणेषु हि कुशो भवान् । उद्यमानां हि सर्वेषां निर्वाणं त्वमसि प्रभो

yogeṣu vyatipātastvaṁ tṛṇeṣu hi kuśo bhavān udyamānāṁ hi sarveṣāṁ nirvāṇaṁ tvamasi prabho

"योगों में आप व्यतीपात हैं, तृणों में कुश हैं; हे प्रभो! समस्त उद्यमों में निर्वाण आप ही हैं।"

श्लोक 41 (skanda.4.21.41)

सर्वासामिह बुद्धीनां धर्मबुद्धिर्भवानज । अश्वत्थः सर्ववृक्षेषु सोमवल्ली लतासु च

sarvāsāmiha buddhīnāṁ dharmabuddhirbhavānaja aśvatthaḥ sarvavṛkṣeṣu somavallī latāsu ca

"समस्त बुद्धियों में आप धर्मबुद्धि हैं, हे अज! समस्त वृक्षों में अश्वत्थ हैं, लताओं में सोमलता हैं।"

श्लोक 42 (skanda.4.21.42)

प्राणायामोसि सर्वेपु साधनेषु शुचिष्वहो । सर्वदः सर्वलिंगेषु श्रीमान्विश्वेश्वरो भवान्

prāṇāyāmosi sarvepu sādhaneṣu śuciṣvaho sarvadaḥ sarvaliṁgeṣu śrīmānviśveśvaro bhavān

"समस्त पवित्र साधनों में आप प्राणायाम हैं; समस्त चिह्नों में सर्वदाता, श्रीमान् विश्वेश्वर आप ही हैं।"

श्लोक 43 (skanda.4.21.43)

मित्राणां हि कलत्रं त्वं धर्मस्त्वं सर्वबंधुषु । त्वत्तो नान्यज्जगत्यस्मिन्नारायण चराचरे

mitrāṇāṁ hi kalatraṁ tvaṁ dharmastvaṁ sarvabaṁdhuṣu tvatto nānyajjagatyasminnārāyaṇa carācare

"मित्रों में आप पत्नी हैं, समस्त बन्धुओं में धर्म हैं। हे नारायण! इस चराचर जगत में आपसे भिन्न कुछ भी नहीं है।"

श्लोक 44 (skanda.4.21.44)

त्वमेव माता त्वं तातस्त्वं सुतस्त्वं महाधनम् । त्वमेव सौख्यसंपत्तिस्त्वमायुर्जीवनेश्वरः

tvameva mātā tvaṁ tātastvaṁ sutastvaṁ mahādhanam tvameva saukhyasaṁpattistvamāyurjīvaneśvaraḥ

"आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही पुत्र हैं, आप ही महाधन हैं; आप ही सुख-सम्पत्ति हैं, आप ही आयु हैं, हे जीवनेश्वर!"

श्लोक 45 (skanda.4.21.45)

सा कथा यत्र ते नाम तन्मनो यत्त्वदर्पितम् । तत्कर्म यत्त्वदर्थं वै तत्तपो यद्भवत्स्मृतिः

sā kathā yatra te nāma tanmano yattvadarpitam tatkarma yattvadarthaṁ vai tattapo yadbhavatsmṛtiḥ

"वही कथा सच्ची है जिसमें आपका नाम हो; वही मन सच्चा है जो आपको समर्पित हो; वही कर्म सच्चा है जो आपके लिए किया जाए; वही तप सच्चा है जो आपका स्मरण हो।"

श्लोक 46 (skanda.4.21.46)

तद्धनं धनिनां शुद्धं यत्त्वदर्थे व्ययीकृतम् । स एव सकलः कालो यस्मिञ्जिष्णो त्वमर्च्यसे

taddhanaṁ dhanināṁ śuddhaṁ yattvadarthe vyayīkṛtam sa eva sakalaḥ kālo yasmiñjiṣṇo tvamarcyase

"वही धनिकों का शुद्ध धन है जो आपके लिए व्यय किया जाए; हे जिष्णो! वही सम्पूर्ण काल सार्थक है जिसमें आपकी पूजा हो।"

श्लोक 47 (skanda.4.21.47)

तावच्च जीवितं श्रेयो यावत्त्वं हृदि वर्तसे । रोगाः प्रशममायांति त्वत्पादोदक सेवनात्

tāvacca jīvitaṁ śreyo yāvattvaṁ hṛdi vartase rogāḥ praśamamāyāṁti tvatpādodaka sevanāt

"जब तक आप हृदय में विराजमान हैं, तभी तक जीवन कल्याणकारी है। आपके चरणोदक के सेवन से रोग शांत हो जाते हैं।"

श्लोक 48 (skanda.4.21.48)

महापापानि गोविंद बहुजन्मार्जितान्यपि । सद्यो विलयमायांति वासुदेवेति कीर्तनात्

mahāpāpāni goviṁda bahujanmārjitānyapi sadyo vilayamāyāṁti vāsudeveti kīrtanāt

"हे गोविन्द! अनेक जन्मों में अर्जित महापाप भी 'वासुदेव' इस नाम के कीर्तन मात्र से तत्काल नष्ट हो जाते हैं।"

श्लोक 49 (skanda.4.21.49)

अहो पुंसां महामोहस्त्वहो पुंसां प्रमादता । वासुदेवमनादृत्य यदन्यत्र कृतश्रमाः

aho puṁsāṁ mahāmohastvaho puṁsāṁ pramādatā vāsudevamanādṛtya yadanyatra kṛtaśramāḥ

"अहो! मनुष्यों का कितना बड़ा मोह है, अहो! कितनी बड़ी उनकी प्रमादशीलता है, कि वासुदेव का अनादर कर वे अन्यत्र परिश्रम करते हैं!"

श्लोक 50 (skanda.4.21.50)

इदमेव हि मांगल्यमिदमेव धनार्जनम् । जीवितस्य फलं चैतद्यद्दामोदरकीर्तनम्

idameva hi māṁgalyamidameva dhanārjanam jīvitasya phalaṁ caitadyaddāmodarakīrtanam

"यही वास्तविक मंगल है, यही धनार्जन है, यही जीवन का फल है, कि दामोदर का कीर्तन किया जाए।"

श्लोक 51 (skanda.4.21.51)

अधोक्षजात्परोधर्मो नार्थो नारायणात्परः । न कामः केशवादन्यो नापवर्गो हरिं विना

adhokṣajātparodharmo nārtho nārāyaṇātparaḥ na kāmaḥ keśavādanyo nāpavargo hariṁ vinā

"अधोक्षज से बढ़कर कोई धर्म नहीं, नारायण से बढ़कर कोई अर्थ नहीं, केशव से भिन्न कोई काम नहीं, हरि के बिना कोई मोक्ष नहीं।"

श्लोक 52 (skanda.4.21.52)

इयमेव परा हानिरुपसर्गो यमेवहि । अभाग्यं परमं चैतद्वासुदेवं न यत्स्मरेत्

iyameva parā hānirupasargo yamevahi abhāgyaṁ paramaṁ caitadvāsudevaṁ na yatsmaret

"यही परम हानि है, यही यम की उपसर्ग है, यही परम दुर्भाग्य है कि वासुदेव का स्मरण न किया जाए।"

श्लोक 53 (skanda.4.21.53)

हरेराराधनं पुंसां किं किं न कुरुते बत । पुत्रमित्रकलत्रार्थ राज्यस्वर्गापवर्गदम्

harerārādhanaṁ puṁsāṁ kiṁ kiṁ na kurute bata putramitrakalatrārtha rājyasvargāpavargadam

"अहो! हरि की आराधना मनुष्यों के लिए क्या-क्या नहीं करती? यह पुत्र, मित्र, पत्नी, धन, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष तक प्रदान करती है।"

श्लोक 54 (skanda.4.21.54)

हरत्यघं ध्वंसयति व्याधीनाधीन्नियच्छति । धर्मं विवर्धयेत्क्षिप्रं प्रयच्छति मनोरथम्

haratyaghaṁ dhvaṁsayati vyādhīnādhīnniyacchati dharmaṁ vivardhayetkṣipraṁ prayacchati manoratham

"यह पाप को हरती है, व्याधियों को नष्ट करती है, मानसिक पीड़ाओं का नियंत्रण करती है, शीघ्र ही धर्म को बढ़ाती है और मनोरथ को पूर्ण करती है।"

श्लोक 55 (skanda.4.21.55)

भगवच्चरणद्वंद्वं निर्द्द्वंद्व ध्यानमुत्तमम् । पापिनापि प्रसंगेन विहितं स्वहितं परम्

bhagavaccaraṇadvaṁdvaṁ nirddvaṁdva dhyānamuttamam pāpināpi prasaṁgena vihitaṁ svahitaṁ param

"भगवान के निर्द्वन्द्व चरणयुगल का ध्यान उत्तम है; यह पापी द्वारा प्रसंगवश किये जाने पर भी उसका परम हित कर देता है।"

श्लोक 56 (skanda.4.21.56)

पापिनां यानि पापानि महोपपदभांज्यपि । सुलीनध्यानसंपन्नो नामोच्चारो हरेर्हरेत्

pāpināṁ yāni pāpāni mahopapadabhāṁjyapi sulīnadhyānasaṁpanno nāmoccāro harerharet

"पापियों के जो-जो पाप हों, चाहे वे महापातकों से भी संयुक्त हों, तल्लीन ध्यान से युक्त हरिनाम का उच्चारण उन्हें हर लेता है।"

श्लोक 57 (skanda.4.21.57)

प्रमादादपि संस्पृष्टो यथाऽनलकणो दहेत् । तथौष्ठपुटसंस्पृष्ट हरिनाम हरेदघम्

pramādādapi saṁspṛṣṭo yathā'nalakaṇo dahet tathauṣṭhapuṭasaṁspṛṣṭa harināma haredagham

"जैसे प्रमादवश स्पर्श किया गया अग्निकण भी जला देता है, वैसे ही ओष्ठपुट से स्पर्श किया गया हरिनाम पाप को हर लेता है।"

श्लोक 58 (skanda.4.21.58)

नितांतं कमलाकांते शांतचित्तं विधाय यः । संशीलयेत्क्षणं नूनं कमला तत्र निश्चला

nitāṁtaṁ kamalākāṁte śāṁtacittaṁ vidhāya yaḥ saṁśīlayetkṣaṇaṁ nūnaṁ kamalā tatra niścalā

"जो व्यक्ति अपने चित्त को पूर्णतया शांत कर कमलापति की क्षणभर भी भलीभाँति सेवा करता है, उसमें निश्चय ही कमला स्थिर होकर निवास करती हैं।"

श्लोक 59 (skanda.4.21.59)

अयमेव परोधर्मस्त्विदमेव परं तपः । इदमेव परं तीर्थं विष्णुपादांबु यत्पिबेत

ayameva parodharmastvidameva paraṁ tapaḥ idameva paraṁ tīrthaṁ viṣṇupādāṁbu yatpibeta

"यही सर्वोच्च धर्म है, यही सर्वोच्च तप है, यही सर्वोच्च तीर्थ है -- विष्णु के चरणोदक का पान करना।"

श्लोक 60 (skanda.4.21.60)

तवोपहारं भक्त्याय सेवते यजपूरुष । सेवितस्तेन नियतं पुरोडाशो महाधिया

tavopahāraṁ bhaktyāya sevate yajapūruṣa sevitastena niyataṁ puroḍāśo mahādhiyā

"हे यज्ञपुरुष! जो भक्तिपूर्वक आपके उपहार की सेवा करता है, उसने निश्चय ही महान बुद्धि से पुरोडाश की भी सेवा कर ली।"

श्लोक 61 (skanda.4.21.61)

स चैवावभृथस्नातः स च गंगाजलाप्लुतः । विष्णुपादोदकं कृत्वा शंखे यः स्नाति मानवः

sa caivāvabhṛthasnātaḥ sa ca gaṁgājalāplutaḥ viṣṇupādodakaṁ kṛtvā śaṁkhe yaḥ snāti mānavaḥ

"जो मनुष्य शंख में विष्णु के चरणोदक को रखकर स्नान करता है, उसने अवभृथ स्नान भी कर लिया और गंगाजल में भी स्नान कर लिया।"

श्लोक 62 (skanda.4.21.62)

शालग्राम शिला येन पूजिता तुलसी दलैः । स पारिजातमालाभिः पूज्यते सुरसद्मनि

śālagrāma śilā yena pūjitā tulasī dalaiḥ sa pārijātamālābhiḥ pūjyate surasadmani

"जिसने तुलसीदलों से शालग्राम शिला की पूजा की, वह देवलोक में पारिजात-मालाओं से पूजित होता है।"

श्लोक 63 (skanda.4.21.63)

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा यदि वेतरः । विष्णुभक्ति समायुक्तो ज्ञेयः सर्वोत्तमश्च सः

brāhmaṇaḥ kṣatriyo vaiśyaḥ śūdro vā yadi vetaraḥ viṣṇubhakti samāyukto jñeyaḥ sarvottamaśca saḥ

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा इनसे भी अन्य कोई हो, जो विष्णुभक्ति से युक्त है, वही सबमें सर्वश्रेष्ठ जानने योग्य है।"

श्लोक 64 (skanda.4.21.64)

शंखचक्रांकिततनुः शिरसां मंजरीधरः । गोपीचंदनलिप्तांगो दृष्टश्चेत्तदघं कुतः

śaṁkhacakrāṁkitatanuḥ śirasāṁ maṁjarīdharaḥ gopīcaṁdanaliptāṁgo dṛṣṭaścettadaghaṁ kutaḥ

"जिसका शरीर शंख-चक्र से अंकित है, जो सिर पर तुलसी-मंजरी धारण किये है, जिसके अंग गोपीचन्दन से लिप्त हैं -- उसे देखने मात्र से पाप कहाँ रह सकता है?"

श्लोक 65 (skanda.4.21.65)

प्रत्यहं द्वादशशिलाः शालग्रामस्य योऽर्चयेत् । द्वारवत्याः शिलायुक्तः स वैकुंठे महीयते

pratyahaṁ dvādaśaśilāḥ śālagrāmasya yo'rcayet dvāravatyāḥ śilāyuktaḥ sa vaikuṁṭhe mahīyate

"जो प्रतिदिन शालग्राम की बारह शिलाओं की, द्वारका की शिला सहित, पूजा करता है, वह वैकुण्ठ में महिमामंडित होता है।"

श्लोक 66 (skanda.4.21.66)

तुलसी यस्य भवने प्रत्यहं परिपूज्यते । तद्गृहं नोपसर्पंति कदाचिद्यमकिंकराः

tulasī yasya bhavane pratyahaṁ paripūjyate tadgṛhaṁ nopasarpaṁti kadācidyamakiṁkarāḥ

"जिसके घर में प्रतिदिन तुलसी की समुचित पूजा होती है, उस घर में यमदूत कभी प्रवेश नहीं करते।"

श्लोक 67 (skanda.4.21.67)

हरिनामाक्षरमुखं भाले गोपीमृदांकितम् । तुलसीमालितोरस्कं स्पृशेयुर्नयमानुगाः

harināmākṣaramukhaṁ bhāle gopīmṛdāṁkitam tulasīmālitoraskaṁ spṛśeyurnayamānugāḥ

"जिसके मुख पर हरिनाम के अक्षर हों, जिसके ललाट पर गोपी-मृत्तिका का तिलक हो, जिसका वक्ष तुलसीमाला से सुशोभित हो, उसे यमदूत भी स्पर्श करने का साहस नहीं करते।"

श्लोक 68 (skanda.4.21.68)

गोपीमृत्तुलसी शंखः शालग्रामः सचक्रकः । गृहेपि यस्य पंचैते तस्य पापभयं कुत.

gopīmṛttulasī śaṁkhaḥ śālagrāmaḥ sacakrakaḥ gṛhepi yasya paṁcaite tasya pāpabhayaṁ kuta.

"गोपी-मृत्तिका, तुलसी, शंख, चक्रसहित शालग्राम -- जिसके घर में ये पाँचों हैं, उसे पाप का भय कहाँ?"

श्लोक 69 (skanda.4.21.69)

ये मुहूर्ताः क्षणा ये च या काष्ठा ये निमेषकाः । ऋते विष्णुस्मृतेर्यातास्तेषु मुष्टो यमेन सः

ye muhūrtāḥ kṣaṇā ye ca yā kāṣṭhā ye nimeṣakāḥ ṛte viṣṇusmṛteryātāsteṣu muṣṭo yamena saḥ

"जो मुहूर्त, जो क्षण, जो काष्ठा, जो निमेष विष्णु के स्मरण के बिना बीत जाते हैं, उनके लिए मनुष्य यम द्वारा लूट लिया जाता है।"

श्लोक 70 (skanda.4.21.70)

क्व द्वयक्षरं हरेर्नाम स्फुलिंगसदृशं ज्वलेत । महती पातकानां च राशिस्तूलोपमा क्व च

kva dvayakṣaraṁ harernāma sphuliṁgasadṛśaṁ jvaleta mahatī pātakānāṁ ca rāśistūlopamā kva ca

"कहाँ हरि का द्वयक्षर नाम, जो अग्निकण के समान प्रज्वलित होता है, और कहाँ पापों की महान राशि, जो रुई के समान है -- दोनों की तुलना कहाँ?"

श्लोक 71 (skanda.4.21.71)

गोविंद परमानंदं मुकुंदं मधुसूदनम । त्यक्त्वान्यं नैव जानामि न भजामि स्मरामि न

goviṁda paramānaṁdaṁ mukuṁdaṁ madhusūdanama tyaktvānyaṁ naiva jānāmi na bhajāmi smarāmi na

"गोविन्द, परमानन्द, मुकुन्द, मधुसूदन को छोड़कर मैं और किसी को नहीं जानता, न भजता हूँ, न स्मरण करता हूँ।"

श्लोक 72 (skanda.4.21.72)

न नमामि न च स्तौमि न पश्यामीह चक्षुषा । न स्पृशामि न वायामि गायामि न न हरिं विना

na namāmi na ca staumi na paśyāmīha cakṣuṣā na spṛśāmi na vāyāmi gāyāmi na na hariṁ vinā

"मैं हरि के अतिरिक्त किसी और को न प्रणाम करता हूँ, न स्तुति करता हूँ, न नेत्रों से देखता हूँ; न स्पर्श करता हूँ, न श्वास लेता हूँ, न गाता हूँ।"

श्लोक 73 (skanda.4.21.73)

जले स्थले च पातालेप्यनिले चानलेऽचले । विद्याधरासुरसुरे किं नरे वानरे नरे

jale sthale ca pātālepyanile cānale'cale vidyādharāsurasure kiṁ nare vānare nare

"जल में, स्थल में, पाताल में, वायु में, अग्नि में, पर्वत में; विद्याधरों, असुरों, देवताओं में; तथा वानर और मनुष्यों में भी..."

श्लोक 74 (skanda.4.21.74)

तृणेस्त्रैणे च पाषाणे तरुगुल्मलतासु च । सर्वत्र श्यामलतनुं वीक्षे श्रीवत्सवक्षसम्

tṛṇestraiṇe ca pāṣāṇe tarugulmalatāsu ca sarvatra śyāmalatanuṁ vīkṣe śrīvatsavakṣasam

"...तिनकों में, पत्थरों में, वृक्ष-झाड़ी-लताओं में -- सर्वत्र मैं उस श्यामल शरीर वाले, श्रीवत्स-अंकित वक्षस्थल वाले भगवान को ही देखता हूँ।"

श्लोक 75 (skanda.4.21.75)

सर्वेषां हृदयावासः साक्षात्साक्षी त्वमेव हि । बहिरंतर्विना त्वां तु नह्यन्यं वेद्मि सर्वगम्

sarveṣāṁ hṛdayāvāsaḥ sākṣātsākṣī tvameva hi bahiraṁtarvinā tvāṁ tu nahyanyaṁ vedmi sarvagam

"आप ही सबके हृदय के निवासी हैं, आप ही साक्षात् साक्षी हैं। बाहर और भीतर, आपके बिना मैं किसी अन्य सर्वव्यापी को नहीं जानता।"

श्लोक 76 (skanda.4.21.76)

इत्युक्त्वा विररामासौ शिवशर्मन्ध्रुवस्तदा । देवोपि भगवान्विष्णुस्तमुवाच प्रसन्नदृक्

ityuktvā virarāmāsau śivaśarmandhruvastadā devopi bhagavānviṣṇustamuvāca prasannadṛk

हे शिवशर्मन्! ऐसा कहकर ध्रुव मौन हो गया; तब देव भगवान विष्णु ने, प्रसन्न दृष्टि से, उससे कहा।

श्लोक 77 (skanda.4.21.77)

श्रीभगवानुवाच । अपि बाल विशालाक्ष ध्रुव ध्रुवमतेऽनघ । परिज्ञातो मया सम्यक्तवहृत्स्थो मनोरथः

śrībhagavānuvāca api bāla viśālākṣa dhruva dhruvamate'nagha parijñāto mayā samyaktavahṛtstho manorathaḥ

श्री भगवान ने कहा -- "हे विशाल नेत्रों वाले बालक! हे निष्पाप, दृढ़-मति ध्रुव! मैंने तेरे हृदय में स्थित मनोरथ को भलीभाँति जान लिया है।"

श्लोक 78 (skanda.4.21.78)

अन्नाद्भवंति भूतानि वृष्टेरन्नसमुद्भवः । तद्वृष्टेः कारणं सूर्यः सूर्याधारो ध्रुवैधि भोः

annādbhavaṁti bhūtāni vṛṣṭerannasamudbhavaḥ tadvṛṣṭeḥ kāraṇaṁ sūryaḥ sūryādhāro dhruvaidhi bhoḥ

"अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है; वर्षा का कारण सूर्य है, और हे ध्रुव! तू सूर्य का आधार बन जा।"

श्लोक 79 (skanda.4.21.79)

ज्योतिश्चक्रस्य सर्वस्य ग्रहर्क्षादेः समंततः । गगने भ्रमतो नित्यं त्वमाधारो भविष्यसि

jyotiścakrasya sarvasya graharkṣādeḥ samaṁtataḥ gagane bhramato nityaṁ tvamādhāro bhaviṣyasi

"तू समस्त ज्योतिश्चक्र का, ग्रह-नक्षत्र आदि का, जो आकाश में नित्य घूमते रहते हैं, आधार बनेगा।"

श्लोक 80 (skanda.4.21.80)

मेढीभूतस्तु वै सर्वान्वायुपाशैर्नियंत्रितान् । आकल्पं तत्पदं तिष्ठ भ्रामयञ्ज्योतिषांगणान्

meḍhībhūtastu vai sarvānvāyupāśairniyaṁtritān ākalpaṁ tatpadaṁ tiṣṭha bhrāmayañjyotiṣāṁgaṇān

"मेढी बनकर, वायुरूपी पाशों से बँधे हुए समस्त ज्योतिर्गणों को घुमाते हुए, तू कल्पपर्यन्त उस पद पर स्थित रह।"

श्लोक 81 (skanda.4.21.81)

आराध्य श्री महादेवं पुरापदमिदं मया । आसादियत्तदेतत्ते तपसा प्रतिपादितम्

ārādhya śrī mahādevaṁ purāpadamidaṁ mayā āsādiyattadetatte tapasā pratipāditam

"यह पद मैंने भी पूर्वकाल में श्री महादेव की आराधना करके प्राप्त किया था; वही पद अब तुझे तेरे तप से प्रदान किया गया है।"

श्लोक 82 (skanda.4.21.82)

केचिच्चतुर्युगं यावत्केचिन्मन्वंतरं ध्रुव । तिष्ठंति त्वं तु वै कल्पं पदमेतत्प्रशास्यसि

keciccaturyugaṁ yāvatkecinmanvaṁtaraṁ dhruva tiṣṭhaṁti tvaṁ tu vai kalpaṁ padametatpraśāsyasi

"कुछ लोग ऐसे पद पर केवल चार युगों तक, कुछ एक मन्वंतर तक स्थित रहते हैं, हे ध्रुव! किन्तु तू इस पद पर पूरे एक कल्प तक शासन करेगा।"

श्लोक 83 (skanda.4.21.83)

मनुनापि न यत्प्रापि किमन्यैर्मानवैर्ध्रुव । तत्पदं विहितं त्वत्साच्छक्राद्यैरपि दुर्लभम्

manunāpi na yatprāpi kimanyairmānavairdhruva tatpadaṁ vihitaṁ tvatsācchakrādyairapi durlabham

"जिस पद को मनु ने भी प्राप्त नहीं किया, हे ध्रुव! अन्य मनुष्यों की तो बात ही क्या -- इन्द्र आदि के लिए भी दुर्लभ वह पद तुझे प्रदान किया गया है।"

श्लोक 84 (skanda.4.21.84)

अन्यान्वरान्प्रयच्छामि स्तवेनानेन तोषितः । सुनीतिरपि ते माता त्वत्समीपे चरिष्यति

anyānvarānprayacchāmi stavenānena toṣitaḥ sunītirapi te mātā tvatsamīpe cariṣyati

"इस स्तुति से संतुष्ट होकर मैं तुझे अन्य वर भी देता हूँ: तेरी माता सुनीति भी सदा तेरे समीप निवास करेगी।"

श्लोक 85 (skanda.4.21.85)

इदं स्तोत्रवरं यस्तु पठिष्यति समाहितः । त्रिसंध्यं मनुजस्तस्य पापं यास्यति संक्षयम्

idaṁ stotravaraṁ yastu paṭhiṣyati samāhitaḥ trisaṁdhyaṁ manujastasya pāpaṁ yāsyati saṁkṣayam

"जो मनुष्य इस उत्तम स्तोत्र को एकाग्रचित्त होकर त्रिसंध्या पढ़ेगा, उसका पाप पूर्णतया नष्ट हो जाएगा।"

श्लोक 86 (skanda.4.21.86)

न तस्य सदनं लक्ष्मीः परित्यक्ष्यत्यसंशयम् । न जनन्या वियोगश्च न बंधुकलहोदयः

na tasya sadanaṁ lakṣmīḥ parityakṣyatyasaṁśayam na jananyā viyogaśca na baṁdhukalahodayaḥ

"उसके घर को लक्ष्मी निःसंदेह कभी नहीं त्यागेंगी; उसे माता का वियोग और बन्धुओं में कलह भी नहीं होगा।"

श्लोक 87 (skanda.4.21.87)

ध्रुवस्तुतिरियं पुण्या महापातकनाशिनी । ब्रह्महापि विशुद्ध्येत का कथेतर पापिनाम्

dhruvastutiriyaṁ puṇyā mahāpātakanāśinī brahmahāpi viśuddhyeta kā kathetara pāpinām

"यह पुण्यमयी ध्रुवस्तुति महापातकों का भी नाश करने वाली है; ब्रह्महत्यारा भी इससे विशुद्ध हो जाता है, फिर अन्य पापियों की तो बात ही क्या।"

श्लोक 88 (skanda.4.21.88)

महापुण्यस्य जननी महासंपत्तिदायिनी । महोपसर्गशमनी महाव्याधिविनाशिनी

mahāpuṇyasya jananī mahāsaṁpattidāyinī mahopasargaśamanī mahāvyādhivināśinī

"यह महान पुण्य की जननी है, महान सम्पत्ति की दात्री है, महान उपद्रवों को शांत करने वाली है, महान व्याधियों का नाश करने वाली है।"

श्लोक 89 (skanda.4.21.89)

यस्याऽस्तिपरमा भक्तिर्मयि निर्मलचेतसः । ध्रुवस्तुतिरियं तेन जप्या मत्प्रीतिकारिणी

yasyā'stiparamā bhaktirmayi nirmalacetasaḥ dhruvastutiriyaṁ tena japyā matprītikāriṇī

"जिस निर्मल-चित्त व्यक्ति की मुझमें परम भक्ति है, उसे मुझे प्रसन्न करने वाली इस ध्रुवस्तुति का जप करना चाहिए।"

श्लोक 90 (skanda.4.21.90)

समस्त तीर्थस्नानेन यत्फलं लभते नरः । तत्फलं सम्यगाप्नोति जपन्स्तुत्यानया मुदा

samasta tīrthasnānena yatphalaṁ labhate naraḥ tatphalaṁ samyagāpnoti japanstutyānayā mudā

"समस्त तीर्थों में स्नान करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वही फल इस स्तुति का हर्षपूर्वक जप करने से पूर्णतया प्राप्त हो जाता है।"

श्लोक 91 (skanda.4.21.91)

संति स्तोत्राण्यनेकानि मम प्रीतिकराणि च । ध्रुवस्तुतेर्न चैतस्याः कलामर्हंति षोडशीम्

saṁti stotrāṇyanekāni mama prītikarāṇi ca dhruvastuterna caitasyāḥ kalāmarhaṁti ṣoḍaśīm

"मुझे प्रसन्न करने वाले अनेक स्तोत्र हैं, किन्तु वे इस ध्रुवस्तुति के सोलहवें अंश के भी योग्य नहीं हैं।"

श्लोक 92 (skanda.4.21.92)

श्रुत्वापीमां स्तुतिं मर्त्यः श्रद्धया परया मुदा । पातकैर्मुच्यते सद्यो महत्पुण्यमवाप्नुयात्

śrutvāpīmāṁ stutiṁ martyaḥ śraddhayā parayā mudā pātakairmucyate sadyo mahatpuṇyamavāpnuyāt

"इस स्तुति को केवल परम श्रद्धा और हर्ष से सुनने मात्र से भी मनुष्य तत्काल पापों से मुक्त हो जाता है और महान पुण्य प्राप्त करता है।"

श्लोक 93 (skanda.4.21.93)

अपुत्रः पुत्रमाप्नोति निर्धनो धनमाप्नुयात् । अभक्तो भक्तिमाप्नोति कीर्तनाच्च ध्रुवस्तुतेः

aputraḥ putramāpnoti nirdhano dhanamāpnuyāt abhakto bhaktimāpnoti kīrtanācca dhruvastuteḥ

"पुत्रहीन पुत्र पाता है, निर्धन धन पाता है, भक्तिहीन भक्ति पाता है -- यह सब ध्रुवस्तुति के कीर्तन से होता है।"

श्लोक 94 (skanda.4.21.94)

दत्त्वा दानान्यनेकानि कृत्वा नाना व्रतानि च । यथालाभानवाप्नोति तथा स्तुत्याऽनया नरः

dattvā dānānyanekāni kṛtvā nānā vratāni ca yathālābhānavāpnoti tathā stutyā'nayā naraḥ

"अनेक दान देकर और अनेक व्रत करके मनुष्य जो-जो फल प्राप्त करता है, वही फल इस स्तुति से भी प्राप्त कर लेता है।"

श्लोक 95 (skanda.4.21.95)

त्यक्त्वा सर्वाणि कार्याणि त्यक्त्वा जप्यान्यनेकशः । ध्रुवस्तुतिरियं जप्या सर्वकामप्रदायिनी

tyaktvā sarvāṇi kāryāṇi tyaktvā japyānyanekaśaḥ dhruvastutiriyaṁ japyā sarvakāmapradāyinī

"समस्त अन्य कार्यों को त्यागकर, अनेक जपों को त्यागकर, सर्वकामनाओं को देने वाली इस ध्रुवस्तुति का ही जप करना चाहिए।"

श्लोक 96 (skanda.4.21.96)

श्रीभगवानुवाच । ध्रुवावधेहि वक्ष्यामि हितं तव महामते । येन ते निश्चलं सम्यक्पदमेतद्भविष्यति

śrībhagavānuvāca dhruvāvadhehi vakṣyāmi hitaṁ tava mahāmate yena te niścalaṁ samyakpadametadbhaviṣyati

श्री भगवान ने कहा -- "हे ध्रुव, हे महामते! ध्यान से सुन, मैं तेरे हित की बात कहता हूँ, जिससे तेरा यह पद पूर्णतया निश्चल हो जाएगा।"

श्लोक 97 (skanda.4.21.97)

अहं जिगमिषुस्त्वासं पुरीं वाराणसीं शुभाम् । साक्षाद्विश्वेश्वरो यत्र तिष्ठते मोक्षकारणम्

ahaṁ jigamiṣustvāsaṁ purīṁ vārāṇasīṁ śubhām sākṣādviśveśvaro yatra tiṣṭhate mokṣakāraṇam

"मैं स्वयं उस शुभ नगरी वाराणसी में जाना चाहता हूँ, जहाँ साक्षात् मोक्ष के कारणभूत विश्वेश्वर स्वयं निवास करते हैं।"

श्लोक 98 (skanda.4.21.98)

विपन्नानां च जंतूनां यत्र विश्वेश्वरः स्वयम् । कर्णे जापं प्रकुरुते कर्मनिर्मूलन क्षमम्

vipannānāṁ ca jaṁtūnāṁ yatra viśveśvaraḥ svayam karṇe jāpaṁ prakurute karmanirmūlana kṣamam

"जहाँ मरणासन्न प्राणियों के कान में स्वयं विश्वेश्वर उस मंत्र का जाप करते हैं, जो समस्त कर्मों को समूल नष्ट करने में समर्थ है।"

श्लोक 99 (skanda.4.21.99)

अस्य संसारदुःखस्य सर्वोपद्रवदायिनः । उपाय एक एवास्ति काशिकानंदभूमिका

asya saṁsāraduḥkhasya sarvopadravadāyinaḥ upāya eka evāsti kāśikānaṁdabhūmikā

"इस संसार-दुःख का, जो समस्त उपद्रवों का दाता है, एक ही उपाय है -- आनन्दभूमि काशी।"

श्लोक 100 (skanda.4.21.100)

इदं रम्यमिदं नेति बीजं दुःखमहातरोः । तस्मिन्काश्यग्निना दग्धे दुःखस्यावसरः कुतः

idaṁ ramyamidaṁ neti bījaṁ duḥkhamahātaroḥ tasminkāśyagninā dagdhe duḥkhasyāvasaraḥ kutaḥ

"'यह सुखद है, यह नहीं' यही भेदबुद्धि दुःखरूपी महावृक्ष का बीज है; उस बीज के काशीरूपी अग्नि से जल जाने पर दुःख को अवसर ही कहाँ रहता है?"

श्लोक 101 (skanda.4.21.101)

प्राप्य संप्राप्यते येन न भूयो येन शोच्यते । परायानिर्वृतेः स्थानं यत्तदानंदकाननम्

prāpya saṁprāpyate yena na bhūyo yena śocyate parāyānirvṛteḥ sthānaṁ yattadānaṁdakānanam

"जिसे प्राप्त कर लेने पर फिर कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता और जिसके कारण फिर शोक नहीं होता, वही परम शांति का स्थान आनन्दकानन है।"

श्लोक 102 (skanda.4.21.102)

अमृतायनमुत्सृज्य पुरुषोन्यत्र यो वसेत् । आनंदकाननं शंभोः कुतस्तस्य सुखोदयः

amṛtāyanamutsṛjya puruṣonyatra yo vaset ānaṁdakānanaṁ śaṁbhoḥ kutastasya sukhodayaḥ

"शम्भु के आनन्दकानन को छोड़कर जो पुरुष अन्यत्र निवास करता है, उसे सुख की उत्पत्ति कहाँ से हो सकती है?"

श्लोक 103 (skanda.4.21.103)

वरं शरावहस्तस्य चांडालागारवीथिषु । भिक्षार्थमटनं काश्यां राज्यं नान्यत्र नीरिषु

varaṁ śarāvahastasya cāṁḍālāgāravīthiṣu bhikṣārthamaṭanaṁ kāśyāṁ rājyaṁ nānyatra nīriṣu

"काशी में हाथ में भिक्षापात्र लिये चांडालों के घरों की गलियों में भिक्षाटन करना भी उत्तम है, बजाय इसके कि अन्यत्र समृद्ध राज्य का उपभोग किया जाए।"

श्लोक 104 (skanda.4.21.104)

वैकुंठनगरात्काशीं नित्यं विश्वेशमर्चितुम् । अहमायामि नियमाज्जगदर्च्यं तदर्चिताम्

vaikuṁṭhanagarātkāśīṁ nityaṁ viśveśamarcitum ahamāyāmi niyamājjagadarcyaṁ tadarcitām

"मैं वैकुण्ठ नगर से नित्य नियमपूर्वक उस काशी में विश्वेश्वर की पूजा करने आता हूँ, जो स्वयं जगत्पूज्य होकर भी काशी द्वारा पूजित है।"

श्लोक 105 (skanda.4.21.105)

मयि या परमा शक्तिस्त्रिलोक्या रक्षणक्षमा । तत्र हेतुर्महेशानः स सुदर्शनचक्रदः

mayi yā paramā śaktistrilokyā rakṣaṇakṣamā tatra heturmaheśānaḥ sa sudarśanacakradaḥ

"मुझमें जो परम शक्ति है, जो त्रिलोकी की रक्षा करने में समर्थ है, उसका कारण महेशान ही हैं, जिन्होंने मुझे सुदर्शन चक्र प्रदान किया।"

श्लोक 106 (skanda.4.21.106)

पुरा जालंधरं दैत्यं ममापि परिकंपनम् । पादांगुष्ठाग्ररेखोत्थं चक्रं सृष्ट्वा हरोऽहरत्

purā jālaṁdharaṁ daityaṁ mamāpi parikaṁpanam pādāṁguṣṭhāgrarekhotthaṁ cakraṁ sṛṣṭvā haro'harat

"पूर्वकाल में जब जालंधर नामक दैत्य ने मुझे भी कंपित कर दिया था, तब हर ने अपने पैर के अंगूठे की रेखा से चक्र उत्पन्न कर उसका संहार किया।"

श्लोक 107 (skanda.4.21.107)

तच्च चक्रं मया लब्धं नेत्रपद्मार्चनाद्विभोः । एतत्सुदर्शनाख्यं वै दैत्यचक्रप्रमर्दनम्

tacca cakraṁ mayā labdhaṁ netrapadmārcanādvibhoḥ etatsudarśanākhyaṁ vai daityacakrapramardanam

"वही चक्र मैंने विभु की अपने नेत्ररूपी कमल से पूजा करके प्राप्त किया था; यही सुदर्शन नामक चक्र दैत्यों के समूह को नष्ट करने वाला है।"

श्लोक 108 (skanda.4.21.108)

तन्मया तव रक्षार्थं भूतविद्रावणं परम् । तावत्प्रणुन्नं पुरतस्ततश्चाहमिहागतः

tanmayā tava rakṣārthaṁ bhūtavidrāvaṇaṁ param tāvatpraṇunnaṁ puratastataścāhamihāgataḥ

"वही चक्र, जो भूतों को भगाने में सर्वश्रेष्ठ है, मैंने तुम्हारी रक्षा के लिए आगे भेज दिया था; उसी के बाद मैं स्वयं यहाँ आया।"

श्लोक 109 (skanda.4.21.109)

काशीमिदानीं यास्यामि विश्वेश्वर विलोकने। अद्य यात्राऽस्ति महती कार्तिक्यां बहुपुण्यदा

kāśīmidānīṁ yāsyāmi viśveśvara vilokane adya yātrā'sti mahatī kārtikyāṁ bahupuṇyadā

"अब मैं विश्वेश्वर के दर्शन हेतु काशी जाऊँगा; आज कार्तिकी पूर्णिमा को अत्यंत पुण्यदायिनी महान यात्रा है।"

श्लोक 110 (skanda.4.21.110)

कार्तिकस्य चतुर्दश्यां विश्वेशं यो विलोकयेत् । स्नात्वा चोत्तरवाहिन्यां न तस्य पुनरागतिः

kārtikasya caturdaśyāṁ viśveśaṁ yo vilokayet snātvā cottaravāhinyāṁ na tasya punarāgatiḥ

"जो कार्तिक की चतुर्दशी को उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान कर विश्वेश का दर्शन करता है, उसका पुनरागमन नहीं होता।"

श्लोक 111 (skanda.4.21.111)

इत्युक्त्वा तार्क्ष्यमारोप्य ध्रुवमानंदमेदुरम् । क्षणाद्वाराणसीं प्राप हरिः स्मरहरोषिताम्

ityuktvā tārkṣyamāropya dhruvamānaṁdameduram kṣaṇādvārāṇasīṁ prāpa hariḥ smaraharoṣitām

ऐसा कहकर हरि ने आनन्द से पूरित ध्रुव को गरुड़ पर बिठाकर क्षणभर में ही स्मरहर (शिव) की प्रिय नगरी वाराणसी को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 112 (skanda.4.21.112)

पंचक्रोश्याश्च सीमानं प्राप्य देवो जनार्दनः । वैनतेयादवारुह्य करे धृत्वा ध्रुवं ततः

paṁcakrośyāśca sīmānaṁ prāpya devo janārdanaḥ vainateyādavāruhya kare dhṛtvā dhruvaṁ tataḥ

पंचक्रोशी की सीमा पर पहुँचकर देव जनार्दन गरुड़ से उतरे और ध्रुव को हाथ से पकड़कर...

श्लोक 113 (skanda.4.21.113)

मणिकर्ण्यां परिस्नाय विश्वेशमभिपूज्य च । ध्रुवं बभाषे भगवान्हितं तस्य चिकीर्षयन्

maṇikarṇyāṁ parisnāya viśveśamabhipūjya ca dhruvaṁ babhāṣe bhagavānhitaṁ tasya cikīrṣayan

...मणिकर्णिका में स्नान किया, विश्वेश की पूजा की, और उसके हित की इच्छा से भगवान ध्रुव से बोले।

श्लोक 114 (skanda.4.21.114)

लिंगं स्थापय यत्नेन क्षेत्रेऽत्रैवाविमुक्तके । त्रैलोक्यस्थापनं पुण्यं यथा भवति तेऽक्षयम्

liṁgaṁ sthāpaya yatnena kṣetre'traivāvimuktake trailokyasthāpanaṁ puṇyaṁ yathā bhavati te'kṣayam

"इसी अविमुक्त क्षेत्र में यत्नपूर्वक शिवलिंग की स्थापना कर, जिससे तेरे लिए त्रैलोक्य-स्थापना का पुण्य अक्षय हो जाए।"

श्लोक 115 (skanda.4.21.115)

नियुतं यत्परिस्थाप्य लिंगानि फलमाप्यते । अन्यत्र तदिहैकेन लिंगेन परिलभ्यते

niyutaṁ yatparisthāpya liṁgāni phalamāpyate anyatra tadihaikena liṁgena parilabhyate

"अन्यत्र दस लाख लिंगों की स्थापना से जो फल प्राप्त होता है, वही फल यहाँ एक ही लिंग से प्राप्त हो जाता है।"

श्लोक 116 (skanda.4.21.116)

कालेन भंगमापन्नं जीर्णोद्धारं करोति यः । इह तस्य फलस्यांतः प्रलयेपि न जायते

kālena bhaṁgamāpannaṁ jīrṇoddhāraṁ karoti yaḥ iha tasya phalasyāṁtaḥ pralayepi na jāyate

"जो काल के प्रभाव से जीर्ण-शीर्ण हुए लिंग का जीर्णोद्धार करता है, उसके उस फल का अंत प्रलयकाल में भी नहीं होता।"

श्लोक 117 (skanda.4.21.117)

वित्तशाठ्यं परित्यज्य प्रासादं योऽत्र कारयेत् । तेन दत्तो भवेत्सर्वो मेरुर्नियुतयोजनः

vittaśāṭhyaṁ parityajya prāsādaṁ yo'tra kārayet tena datto bhavetsarvo merurniyutayojanaḥ

"जो धन की कंजूसी त्यागकर यहाँ मंदिर बनवाता है, उसने मानो दस लाख योजन विस्तार वाले सम्पूर्ण मेरु पर्वत का ही दान कर दिया।"

श्लोक 118 (skanda.4.21.118)

कूपवापीतडागानि शक्त्या योऽत्र तु कारयेत् । अन्यत्र करणात्तस्य पुण्यं कोटिगुणाधिकम्

kūpavāpītaḍāgāni śaktyā yo'tra tu kārayet anyatra karaṇāttasya puṇyaṁ koṭiguṇādhikam

"जो अपनी शक्ति के अनुसार यहाँ कुआँ, बावली और तालाब बनवाता है, उसका पुण्य अन्यत्र निर्माण करने की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक होता है।"

श्लोक 119 (skanda.4.21.119)

इज्यार्थमत्र यः कुर्यात्सुरम्यां पुष्पवाटिकाम् । पुष्पेपुष्पे फलं तस्य सुवर्णकुसुमाधिकम्

ijyārthamatra yaḥ kuryātsuramyāṁ puṣpavāṭikām puṣpepuṣpe phalaṁ tasya suvarṇakusumādhikam

"जो पूजा के लिए यहाँ सुरम्य पुष्पवाटिका लगवाता है, उसके प्रत्येक पुष्प का फल स्वर्णपुष्प से भी अधिक होता है।"

श्लोक 120 (skanda.4.21.120)

अत्र ब्रह्मपुरीं कृत्वा यो विप्रेभ्यः प्रयच्छति । वर्षाशनेन संयुक्तां तस्य पुण्यफलं शृणु

atra brahmapurīṁ kṛtvā yo viprebhyaḥ prayacchati varṣāśanena saṁyuktāṁ tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

"जो यहाँ ब्रह्मपुरी बनवाकर, वर्षभर के भोजन सहित, ब्राह्मणों को प्रदान करता है, उसके पुण्यफल को सुनो।"

श्लोक 121 (skanda.4.21.121)

क्षीयंते सलिलान्यब्धेर्भौमाश्च त्रसरेणवः । क्षयो न तस्य पुण्यस्य शिवलोके समासतः

kṣīyaṁte salilānyabdherbhaumāśca trasareṇavaḥ kṣayo na tasya puṇyasya śivaloke samāsataḥ

"समुद्र का जल भी क्षीण हो सकता है, पृथ्वी के रजकण भी नष्ट हो सकते हैं, किन्तु शिवलोक में निवास करने वाले उस व्यक्ति के पुण्य का कभी क्षय नहीं होता।"

श्लोक 122 (skanda.4.21.122)

मठानपि तपस्विभ्यः कारयित्वाऽत्र योर्पयेत् । जीवनोपायसंयुक्तान्सोपि पूर्वफलाश्रयः

maṭhānapi tapasvibhyaḥ kārayitvā'tra yorpayet jīvanopāyasaṁyuktānsopi pūrvaphalāśrayaḥ

"जो यहाँ तपस्वियों के लिए मठ बनवाकर, जीवन-निर्वाह के साधनों सहित, उन्हें अर्पित करता है, वह भी पूर्वोक्त फल का ही भागी होता है।"

श्लोक 123 (skanda.4.21.123)

कृत्वा महांति पुण्यानि योऽत्र विश्वेश्वरेऽर्पयेत् । न तस्य पुनरावृरत्ति घोरे संसारसागरे

kṛtvā mahāṁti puṇyāni yo'tra viśveśvare'rpayet na tasya punarāvṛratti ghore saṁsārasāgare

"जो महान पुण्यकर्म करके उन्हें यहाँ विश्वेश्वर को अर्पित करता है, उसका इस भयंकर संसार-सागर में पुनरागमन नहीं होता।"

श्लोक 124 (skanda.4.21.124)

अनंत इति वादोयं मयिलोकेऽत्र गीयते । परं काशी गुणानां हि मयाप्यंतो न लभ्यते

anaṁta iti vādoyaṁ mayiloke'tra gīyate paraṁ kāśī guṇānāṁ hi mayāpyaṁto na labhyate

"'अनंत' -- यह शब्द इस लोक में मेरे विषय में गाया जाता है; परन्तु काशी के गुणों का अंत तो मुझे भी नहीं मिलता।"

श्लोक 125 (skanda.4.21.125)

तस्मात्प्रयत्नतः काश्यां धुव श्रेयः समाश्रयेत् । काशी श्रेयः फलं पुंसामक्षया योपजायते

tasmātprayatnataḥ kāśyāṁ dhuva śreyaḥ samāśrayet kāśī śreyaḥ phalaṁ puṁsāmakṣayā yopajāyate

"अतः हे ध्रुव! प्रयत्नपूर्वक काशी में ही कल्याण का आश्रय लेना चाहिए; काशी ही मनुष्यों के लिए अक्षय कल्याण-फल के रूप में उत्पन्न होती है।"

श्लोक 126 (skanda.4.21.126)

गणावूचतुः । ध्रुवमित्युपदिश्याथ जगाम गरुडध्वजः । ध्रुवोपि लिंगं संस्थाप्य वैद्यनाथसमीपतः

gaṇāvūcatuḥ dhruvamityupadiśyātha jagāma garuḍadhvajaḥ dhruvopi liṁgaṁ saṁsthāpya vaidyanāthasamīpataḥ

दोनों गणों ने कहा -- "ध्रुव को इस प्रकार उपदेश देकर गरुड़ध्वज भगवान चले गये; और ध्रुव ने भी वैद्यनाथ के समीप शिवलिंग की स्थापना कर..."

श्लोक 127 (skanda.4.21.127)

प्रासादं सुमहत्क्रृत्वा कृत्वा कुंडं तदग्रतः । विश्वेश्वरं समभ्यर्च्य कृतकृत्यो गृहं ययौ

prāsādaṁ sumahatkrṛtvā kṛtvā kuṁḍaṁ tadagrataḥ viśveśvaraṁ samabhyarcya kṛtakṛtyo gṛhaṁ yayau

"...एक विशाल मंदिर बनवाया, उसके सामने एक कुंड बनवाया, विश्वेश्वर की पूजा की, और कृतकृत्य होकर अपने घर लौट गया।"

श्लोक 128 (skanda.4.21.128)

ध्रुवेश्वरं समभ्यर्च्य ध्रुवकुंडे कृतोदकः । ध्रुवलोकमवाप्नोति नरो भोगसमन्वितः

dhruveśvaraṁ samabhyarcya dhruvakuṁḍe kṛtodakaḥ dhruvalokamavāpnoti naro bhogasamanvitaḥ

"जो ध्रुवेश्वर की पूजा कर ध्रुवकुंड में तर्पण करता है, वह भोगसंपन्न होकर ध्रुवलोक को प्राप्त करता है।"

श्लोक 129 (skanda.4.21.129)

ध्रुवस्य परमाख्यानं यः पठेत्पाठयेदपि । स विष्णुलोकमासाद्य जायते विष्णुवल्लभः

dhruvasya paramākhyānaṁ yaḥ paṭhetpāṭhayedapi sa viṣṇulokamāsādya jāyate viṣṇuvallabhaḥ

"जो ध्रुव के इस परम आख्यान को पढ़ता है अथवा दूसरों से पढ़वाता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त कर विष्णु का प्रिय बनता है।"

श्लोक 130 (skanda.4.21.130)

नरो ध्रुवस्य चरितं प्रसंगेन स्मरन्नपि । न पापैरभिभूयेत महत्पुण्यमवाप्नुयात्

naro dhruvasya caritaṁ prasaṁgena smarannapi na pāpairabhibhūyeta mahatpuṇyamavāpnuyāt

"जो मनुष्य ध्रुव के इस चरित्र का प्रसंगवश स्मरण भी करता है, वह पापों से अभिभूत नहीं होता और महान पुण्य को प्राप्त करता है।"

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