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काशी खण्ड · अध्याय 29

गंगासहस्रनाम-कथन

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (skanda.4.29.1)

॥ अगस्त्य उवाच॥ विना स्नानेन गंगाया नृणां जन्मनिरथर्कम्॥ उपायांतरमस्त्यन्यद्येन स्नानफलं लभेत्

agastya uvāca vinā snānena gaṁgāyā nṛṇāṁ janmaniratharkam upāyāṁtaramastyanyadyena snānaphalaṁ labhet

अगस्त्य ने कहा — हे षड्वक्त्र! गंगा में स्नान किए बिना मनुष्यों का जन्म निरर्थक है। क्या ऐसा कोई अन्य उपाय है जिससे स्नान का फल प्राप्त हो सके?

श्लोक 2 (skanda.4.29.2)

अशक्तानां च पंगूनामालस्योपहतात्मनाम्॥ दूरदेशांतरस्थानां गंगास्नानं कथं भवेत्

aśaktānāṁ ca paṁgūnāmālasyopahatātmanām dūradeśāṁtarasthānāṁ gaṁgāsnānaṁ kathaṁ bhavet

असमर्थ, पंगु तथा आलस्य से ग्रस्त चित्त वाले, और दूर देशांतर में रहने वाले लोगों के लिए गंगा-स्नान कैसे संभव हो सकता है?

श्लोक 3 (skanda.4.29.3)

दानं वाऽथ व्रतंवाऽथ मंत्रःस्तोत्रजपोऽथवा॥ तीर्थांतराभिषेको वा देवतोपासनं तु वा

dānaṁ vā'tha vrataṁvā'tha maṁtraḥstotrajapo'thavā tīrthāṁtarābhiṣeko vā devatopāsanaṁ tu vā

क्या दान, या व्रत, अथवा मंत्र-स्तोत्र का जप, या किसी अन्य तीर्थ में स्नान, या किसी देवता की उपासना इसका विकल्प हो सकती है?

श्लोक 4 (skanda.4.29.4)

यद्यस्तिकिंचित्षड्वक्त्र गंगास्नानफलप्रदम्॥ विधानांतरमात्रेण तद्वद प्रणताय मे

yadyastikiṁcitṣaḍvaktra gaṁgāsnānaphalapradam vidhānāṁtaramātreṇa tadvada praṇatāya me

हे षड्वक्त्र! यदि गंगा-स्नान का फल देने वाला कोई भी अन्य विधान हो, तो आपके चरणों में प्रणत मुझसे वह कहिए।

श्लोक 5 (skanda.4.29.5)

त्वत्तो न वेदस्कंदान्यो गंगागर्भ समुद्भव॥ परं स्वर्गतरंगिण्या महिमानं महामते

tvatto na vedaskaṁdānyo gaṁgāgarbha samudbhava paraṁ svargataraṁgiṇyā mahimānaṁ mahāmate

हे महामते! गंगा के गर्भ से उत्पन्न स्कंद, आपके सिवा स्वर्गगामिनी गंगा की महिमा को कोई और नहीं जानता।

श्लोक 6 (skanda.4.29.6)

॥ स्कंद उवाच॥ संति पुण्यजलानीह सरांसि सरितो मुने॥ स्थाने स्थाने च तीर्थानि जितात्माध्युषितानि च

skaṁda uvāca saṁti puṇyajalānīha sarāṁsi sarito mune sthāne sthāne ca tīrthāni jitātmādhyuṣitāni ca

स्कंद ने कहा — हे मुने! इस लोक में स्थान-स्थान पर पुण्य जल वाले सरोवर, नदियाँ तथा जितेंद्रिय पुरुषों द्वारा बसे हुए तीर्थ हैं।

श्लोक 7 (skanda.4.29.7)

दृष्टप्रत्ययकारीणि महामहिम भांज्यपि॥ परं स्वर्गतरंगिण्याः कोट्यंशोपि न तत्र वै

dṛṣṭapratyayakārīṇi mahāmahima bhāṁjyapi paraṁ svargataraṁgiṇyāḥ koṭyaṁśopi na tatra vai

वे देखने मात्र से विश्वास उत्पन्न करने वाले तथा महान महिमा से संपन्न हैं, फिर भी उनमें स्वर्गगामिनी गंगा का करोड़वाँ अंश भी नहीं है।

श्लोक 8 (skanda.4.29.8)

अनेनैवानुमानेन बुद्ध्यस्व कलशोद्भव॥ दध्रे गंगोत्तमांगेन देवदेवेन शंभुना

anenaivānumānena buddhyasva kalaśodbhava dadhre gaṁgottamāṁgena devadevena śaṁbhunā

हे कलशोद्भव! इसी अनुमान से समझ लो — देवाधिदेव शंभु ने गंगा को अपने सिर पर धारण किया।

श्लोक 9 (skanda.4.29.9)

स्नानकालेऽन्य तीर्थेषु जप्यते जाह्नवी जनैः॥ विना विष्णुपदीं क्वान्यत्समर्थमघमोचने

snānakāle'nya tīrtheṣu japyate jāhnavī janaiḥ vinā viṣṇupadīṁ kvānyatsamarthamaghamocane

स्नान के समय अन्य तीर्थों में भी लोग जाह्नवी का ही जप करते हैं; विष्णुपदी (गंगा) के बिना पाप से मुक्ति देने में और कौन समर्थ है?

श्लोक 10 (skanda.4.29.10)

गंगास्नानफलं ब्रह्मन्गंगायामेव लभ्यते॥ यथा द्राक्षाफलस्वादो द्राक्षायामेव नान्यतः॥ अस्त्युपाय इह त्वेकः स्याद्येनाविकलं फलम्॥ स्नानस्य देवसरितो महागुह्यतमो मुने

gaṁgāsnānaphalaṁ brahmangaṁgāyāmeva labhyate yathā drākṣāphalasvādo drākṣāyāmeva nānyataḥ astyupāya iha tvekaḥ syādyenāvikalaṁ phalam snānasya devasarito mahāguhyatamo mune

हे ब्रह्मन्! गंगा-स्नान का फल गंगा में ही प्राप्त होता है, जैसे अंगूर का स्वाद अंगूर में ही मिलता है, अन्यत्र नहीं। फिर भी, हे मुने! यहाँ एक उपाय है जिससे देवनदी के स्नान का संपूर्ण फल मिल सकता है — यह एक अत्यंत गोपनीय रहस्य है।

श्लोक 11 (skanda.4.29.11)

शिवभक्ताय शांताय विष्णुभक्तिपराय च॥ श्रद्धालवे त्वास्तिकाय गर्भवासमुपुक्षवे

śivabhaktāya śāṁtāya viṣṇubhaktiparāya ca śraddhālave tvāstikāya garbhavāsamupukṣave

यह शिवभक्त, शांत, विष्णुभक्ति में तत्पर, श्रद्धालु, आस्तिक तथा गर्भवास से मुक्त होने के इच्छुक व्यक्ति को ही बताने योग्य है।

श्लोक 12 (skanda.4.29.12)

कथनीयं न चान्यस्य कस्यचित्केनचित्क्वचित्॥ इदं रहस्यं परमं महापातकनाशनम्

kathanīyaṁ na cānyasya kasyacitkenacitkvacit idaṁ rahasyaṁ paramaṁ mahāpātakanāśanam

यह किसी अन्य को, कहीं भी, किसी के द्वारा भी नहीं बताना चाहिए। यह परम रहस्य महापातकों का नाश करने वाला है।

श्लोक 13 (skanda.4.29.13)

महाश्रेयस्करं पुण्यं मनोरथकरं परम्॥ द्युनदीप्रीतिजनकं शिवसंतोषसंतति

mahāśreyaskaraṁ puṇyaṁ manorathakaraṁ param dyunadīprītijanakaṁ śivasaṁtoṣasaṁtati

यह महाकल्याणकारी, पुण्यमय, मनोरथों को पूर्ण करने वाला, देवनदी के प्रति प्रेम उत्पन्न करने वाला तथा शिव को निरंतर संतुष्ट करने वाला है।

श्लोक 14 (skanda.4.29.14)

नाम्नां सहस्रगंगायाः स्तवराजेषुशो भनम्॥ जप्यानां परमं जप्यं वेदोपनिषदासमम्

nāmnāṁ sahasragaṁgāyāḥ stavarājeṣuśo bhanam japyānāṁ paramaṁ japyaṁ vedopaniṣadāsamam

स्तोत्रों में श्रेष्ठ गंगा के सहस्र नाम शोभायमान हैं; यह जप्य वस्तुओं में परम जप्य है, वेद और उपनिषदों के समान है।

श्लोक 15 (skanda.4.29.15)

जपनीयं प्रयन्नेन मौनिना वाचकं विना॥ शुचिस्थानेषु शुचिना सुस्पष्टाक्षरमेव च

japanīyaṁ prayannena mauninā vācakaṁ vinā śucisthāneṣu śucinā suspaṣṭākṣarameva ca

इसे पवित्र मनुष्य को पवित्र स्थान में, मौन रहकर, बिना उच्च स्वर के, स्पष्ट अक्षरों के साथ, प्रयत्नपूर्वक जपना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.4.29.16)

स्कंद उवाच॥ ॐनमो गंगादेव्यै॥ ॐकाररूपिण्यजराऽतुलाऽनमताऽमृतस्रवा॥ अत्युदाराऽभयाऽशोकाऽलकनंदाऽमृताऽमला

skaṁda uvāca oṁnamo gaṁgādevyai oṁkārarūpiṇyajarā'tulā'namatā'mṛtasravā atyudārā'bhayā'śokā'lakanaṁdā'mṛtā'malā

ॐ, गंगा देवी को नमस्कार। वे ओंकार-स्वरूपा, अजर, अनुपम, अपराजित तथा अमृत बहाने वाली हैं। वे अत्यंत उदार, निर्भय करने वाली, शोकरहित, अलकनंदा, अमृतमयी और निर्मल हैं।

श्लोक 17 (skanda.4.29.17)

अनाथवत्सलाऽमोघाऽपांयोनिरमृतप्रदा॥ अव्यक्तलक्षणाऽक्षोभ्या ऽनवच्छिन्नाऽपराजिता

anāthavatsalā'moghā'pāṁyoniramṛtapradā avyaktalakṣaṇā'kṣobhyā 'navacchinnā'parājitā

वे अनाथों पर स्नेह रखने वाली, अमोघ, समस्त जलों का उद्गम-स्थान तथा अमृत प्रदान करने वाली हैं। वे अव्यक्त-लक्षणा, अक्षोभ्य, असीम और अपराजित हैं।

श्लोक 18 (skanda.4.29.18)

अनाथनाथाऽभीष्टार्थसिद्धिदाऽनंगवर्धिनी॥ अणिमादिगुणाऽधाराग्रगण्याऽलीकहारिणी

anāthanāthā'bhīṣṭārthasiddhidā'naṁgavardhinī aṇimādiguṇā'dhārāgragaṇyā'līkahāriṇī

वे अनाथों की स्वामिनी, इच्छित फलों की सिद्धि देने वाली तथा प्रेम को बढ़ाने वाली हैं। वे अणिमा आदि सिद्धियों का आधार, सबमें अग्रगण्या तथा असत्य का हरण करने वाली हैं।

श्लोक 19 (skanda.4.29.19)

अचिंत्यशक्तिरनघाऽद्भुतरूपाऽघहारिणी॥ अद्रिराजसुताऽष्टांगयोगसिद्धिप्रदाऽच्युता॥ अक्षुण्णशक्तिरसुदाऽनंततीर्थाऽमृतोदका॥ अनंतमहिमाऽपाराऽनंतसौख्यप्रदाऽन्नदा

aciṁtyaśaktiranaghā'dbhutarūpā'ghahāriṇī adrirājasutā'ṣṭāṁgayogasiddhipradā'cyutā akṣuṇṇaśaktirasudā'naṁtatīrthā'mṛtodakā anaṁtamahimā'pārā'naṁtasaukhyapradā'nnadā

वे अचिंत्य शक्ति वाली, निष्पाप, अद्भुत रूप वाली तथा पापों का हरण करने वाली हैं। वे पर्वतराज की पुत्री, अष्टांगयोग की सिद्धि देने वाली तथा अच्युत हैं। वे अक्षुण्ण शक्ति वाली, प्राणदायिनी, अनंत तीर्थों वाली तथा अमृत-जल वाली हैं। वे अनंत महिमा वाली, अपार, नित्य सुख देने वाली तथा अन्नदात्री हैं।

श्लोक 20 (skanda.4.29.20)

अशेषदेवतामूर्तिरघोराऽमृतरूपिणी॥ अविद्याजालशमनी ह्यप्रतर्क्यगतिप्रदा

aśeṣadevatāmūrtiraghorā'mṛtarūpiṇī avidyājālaśamanī hyapratarkyagatipradā

वे समस्त देवताओं का साकार रूप, सौम्य तथा अमृतस्वरूपा हैं। वे अविद्या के जाल को शांत करने वाली तथा तर्क से परे गति प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 21 (skanda.4.29.21)

अशेषविघ्नसंहर्त्री त्वशेषगुणगुंफिता॥ अज्ञानतिमिरज्योतिरनुग्रहपरायणा

aśeṣavighnasaṁhartrī tvaśeṣaguṇaguṁphitā ajñānatimirajyotiranugrahaparāyaṇā

वे समस्त विघ्नों का नाश करने वाली तथा सभी गुणों से युक्त हैं। वे अज्ञान के अंधकार में ज्योति के समान तथा अनुग्रह करने में तत्पर हैं।

श्लोक 22 (skanda.4.29.22)

अभिरामाऽनवद्यांग्यनंतसाराऽकलंकिनी॥ आरोग्यदाऽऽनंदवल्ली त्वापन्नार्तिविनाशिनी

abhirāmā'navadyāṁgyanaṁtasārā'kalaṁkinī ārogyadā''naṁdavallī tvāpannārtivināśinī

वे मनोहर, निर्दोष अंगों वाली, अनंत सार वाली तथा निष्कलंक हैं। वे आरोग्य देने वाली, आनंद की लता तथा संकटग्रस्तों की पीड़ा का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 23 (skanda.4.29.23)

आश्चर्यमूर्तिरायुष्या ह्याढ्याऽऽद्याऽऽप्राऽऽर्यसेविता॥ आप्यायिन्याप्तविद्याऽऽख्यात्वानंदाऽऽश्वासदायिनी

āścaryamūrtirāyuṣyā hyāḍhyā''dyā''prā''ryasevitā āpyāyinyāptavidyā''khyātvānaṁdā''śvāsadāyinī

वे आश्चर्यमय रूप वाली, आयु देने वाली, समृद्ध, आदिस्वरूपा तथा श्रेष्ठजनों द्वारा सेवित हैं। वे तृप्ति देने वाली, सच्चे ज्ञान से युक्त, विख्यात, आनंदमयी तथा सांत्वना देने वाली हैं।

श्लोक 24 (skanda.4.29.24)

आलस्यघ्न्यापदां हंत्री ह्यानंदामृतवर्षिणी॥ इरावतीष्टदात्रीष्टा त्विष्टापूर्तफलप्रदा

ālasyaghnyāpadāṁ haṁtrī hyānaṁdāmṛtavarṣiṇī irāvatīṣṭadātrīṣṭā tviṣṭāpūrtaphalapradā

वे आलस्य का नाश करने वाली, विपत्तियों का हरण करने वाली तथा आनंद-अमृत की वर्षा करने वाली हैं। वे इरावती, इच्छित वस्तु देने वाली, प्रिय तथा इष्टापूर्त कर्मों का फल प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 25 (skanda.4.29.25)

इतिहासश्रुतीड्यार्था त्विहामुत्रशुभप्रदा॥ इज्याशीलसमिज्येष्ठा त्विंद्रादिपरिवंदिता

itihāsaśrutīḍyārthā tvihāmutraśubhapradā ijyāśīlasamijyeṣṭhā tviṁdrādiparivaṁditā

वे इतिहास और श्रुति में स्तुत्य, सार्थक तथा इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण देने वाली हैं। वे यज्ञशील स्वभाव वाली, पूजनीयों में श्रेष्ठ तथा इंद्र आदि देवताओं द्वारा वंदित हैं।

श्लोक 26 (skanda.4.29.26)

इलालंकारमालेद्धा त्विंदिरारम्यमंदिरा॥ इदिंदिरादिसंसेव्या त्वीश्वरीश्वरवल्लभा

ilālaṁkāramāleddhā tviṁdirāramyamaṁdirā idiṁdirādisaṁsevyā tvīśvarīśvaravallabhā

वे पृथ्वी को अलंकृत करने वाली माला से देदीप्यमान, लक्ष्मी के लिए रमणीय धाम, लक्ष्मी आदि देवियों द्वारा सेवित तथा ईश्वर (शिव) की परम प्रिया हैं।

श्लोक 27 (skanda.4.29.27)

ईतिभीतिहरेड्या च त्वीडनीय चरित्रभृत्॥ उत्कृष्टशक्तिरुत्कृष्टोडुपमंडलचारिणी

ītibhītihareḍyā ca tvīḍanīya caritrabhṛt utkṛṣṭaśaktirutkṛṣṭoḍupamaṁḍalacāriṇī

वे ईति (अकाल आदि उपद्रवों) के भय का नाश करने वाली, स्तुत्य तथा प्रशंसनीय चरित्र वाली हैं। वे उत्कृष्ट शक्ति वाली तथा श्रेष्ठ नक्षत्रमंडल में विचरण करने वाली हैं।

श्लोक 28 (skanda.4.29.28)

उदितांबरमार्गोस्रोरगलोकविहारिणी॥ उक्षोर्वरोत्पलोत्कुंभा उपेंद्रचरणद्रवा॥ उदन्वत्पूर्तिहेतुश्चोदारोत्साहप्रवर्धिनी॥ उद्वेगघ्न्युष्णशमनी उष्णरश्मिसुता प्रिया

uditāṁbaramārgosroragalokavihāriṇī ukṣorvarotpalotkuṁbhā upeṁdracaraṇadravā udanvatpūrtihetuścodārotsāhapravardhinī udvegaghnyuṣṇaśamanī uṣṇaraśmisutā priyā

वे उदित आकाश-मार्ग में विचरण करने वाली तथा नागलोक में विहार करने वाली हैं। वे उत्तम कमलों से भरे कलश धारण करने वाली तथा भगवान उपेंद्र (विष्णु) के चरण से प्रवाहित होने वाली हैं। वे समुद्र को भरने का कारण तथा उदार उत्साह बढ़ाने वाली हैं। वे उद्वेग शांत करने वाली, ताप शांत करने वाली तथा सूर्यपुत्री-सम प्रिया हैं।

श्लोक 29 (skanda.4.29.29)

उत्पत्ति स्थिति संहारकारिण्युपरिचारिणी॥ ऊर्जं वहंत्यूर्जधरोर्जावती चोर्मिमालिनी

utpatti sthiti saṁhārakāriṇyuparicāriṇī ūrjaṁ vahaṁtyūrjadharorjāvatī cormimālinī

वे सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली तथा ऊपर विचरण करने वाली हैं। वे ऊर्जा को धारण करने वाली, बल की आधार, ओजस्विनी तथा तरंगों की माला पहनने वाली हैं।

श्लोक 30 (skanda.4.29.30)

ऊर्ध्वरेतःप्रियोर्ध्वाध्वा ह्यूर्मिलोर्ध्वगतिप्रदा॥ ऋषिवृंदस्तुतर्द्धिश्च ऋणत्रयविनाशिनी

ūrdhvaretaḥpriyordhvādhvā hyūrmilordhvagatipradā ṛṣivṛṁdastutarddhiśca ṛṇatrayavināśinī

वे शिव की प्रिया, ऊर्ध्वगामिनी, तरंगमयी तथा ऊर्ध्वगति (मोक्ष) प्रदान करने वाली हैं। वे ऋषिसमूहों द्वारा स्तुत, समृद्धिस्वरूपा तथा देव-ऋषि-पितृ इन तीनों ऋणों का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 31 (skanda.4.29.31)

ऋतंभरर्द्धिदात्री च ऋक्स्वरूपा ऋजुप्रिया॥ ऋक्षमार्गवहर्क्षार्चिर्ऋजुमार्गप्रदर्शिनी

ṛtaṁbhararddhidātrī ca ṛksvarūpā ṛjupriyā ṛkṣamārgavaharkṣārcirṛjumārgapradarśinī

वे ऋत को धारण करने वाली तथा समृद्धि देने वाली हैं। वे ऋग्वेद-स्वरूपा तथा सरलता की प्रिय हैं। वे नक्षत्रों के मार्ग को धारण करने वाली, नक्षत्रों-सी दीप्तिमान तथा सीधा मार्ग दिखाने वाली हैं।

श्लोक 32 (skanda.4.29.32)

एधिताऽखिलधर्मार्थात्वेकैकामृतदायिनी॥ एधनीयस्वभावैज्या त्वेजिता शेषपातका

edhitā'khiladharmārthātvekaikāmṛtadāyinī edhanīyasvabhāvaijyā tvejitā śeṣapātakā

वे संपूर्ण धर्म और अर्थ को बढ़ाने वाली तथा प्रत्येक प्राणी को अमृत देने वाली हैं। वे स्वभाव से वृद्धिकारिणी, यज्ञ में पूज्य तथा समस्त पापों को कंपा कर दूर करने वाली हैं।

श्लोक 33 (skanda.4.29.33)

ऐश्वर्यदैश्वर्यरूपा ह्यैतिह्यं ह्यैंदवी द्युतिः॥ ओजस्विन्योषधीक्षेत्रमोजोदौदनदायिनी

aiśvaryadaiśvaryarūpā hyaitihyaṁ hyaiṁdavī dyutiḥ ojasvinyoṣadhīkṣetramojodaudanadāyinī

वे ऐश्वर्य देने वाली, ऐश्वर्य-स्वरूपा, परंपरा-स्वरूपा तथा चंद्रमा-सी कांति वाली हैं। वे ओजस्विनी, औषधियों का क्षेत्र, ओज देने वाली तथा अन्न प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 34 (skanda.4.29.34)

ओष्ठामृतौन्नत्यदात्री त्वौषधं भवरोगिणाम्॥ औदार्यचंचुरौपेंद्री त्वौग्रीह्यौमेयरूपिणी

oṣṭhāmṛtaunnatyadātrī tvauṣadhaṁ bhavarogiṇām audāryacaṁcuraupeṁdrī tvaugrīhyaumeyarūpiṇī

वे मानो अमृत-रस से ओठों को तृप्त करने वाली तथा संसार-रोग से ग्रस्त जीवों की औषधि हैं। वे उदारता से परिपूर्ण, विष्णुसंबंधिनी, उग्ररूपा तथा उमा-स्वरूपा हैं।

श्लोक 35 (skanda.4.29.35)

अंबराध्ववहांऽवष्ठां वरमालांबुजेक्षणा॥ अंबिकांबुमहायोनिरंधोदांधकहारिणी

aṁbarādhvavahāṁ'vaṣṭhāṁ varamālāṁbujekṣaṇā aṁbikāṁbumahāyoniraṁdhodāṁdhakahāriṇī

वे आकाश-मार्ग को धारण करने वाली, सदा स्थिर, सुंदर माला वाली तथा कमल-नयनी हैं। वे अंबिका (जगज्जननी), जल की महान उत्पत्ति-स्थली तथा अंधकार का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 36 (skanda.4.29.36)

अंशुमालाह्यंशुमती त्वंगीकृतषडानना॥ अंधतामिस्रहंत्र्यंधुरं जनाह्यंजनावती

aṁśumālāhyaṁśumatī tvaṁgīkṛtaṣaḍānanā aṁdhatāmisrahaṁtryaṁdhuraṁ janāhyaṁjanāvatī

वे किरणों की माला वाली, तेजस्विनी तथा छह मुख वाले स्कंद को अपनाने वाली हैं। वे घोर अंधकार का नाश करने वाली तथा अंजन-सी कांति वाली हैं।

श्लोक 37 (skanda.4.29.37)

कल्याणकारिणी काम्या कमलोत्पलगंधिनी॥ कुमुद्वती कमलिनी कांतिः कल्पितदायिनी॥ कांचनाक्षी कामधेनुः कीर्तिकृत्क्लेशनाशिनी॥ क्रतुश्रेष्ठा क्रतुफला कर्मबंधविभेदिनी

kalyāṇakāriṇī kāmyā kamalotpalagaṁdhinī kumudvatī kamalinī kāṁtiḥ kalpitadāyinī kāṁcanākṣī kāmadhenuḥ kīrtikṛtkleśanāśinī kratuśreṣṭhā kratuphalā karmabaṁdhavibhedinī

वे कल्याण करने वाली, मनोहर, कमल एवं नीलकमल की सुगंध वाली, कुमुद से भरी, कमलिनी, कांति-स्वरूपा तथा इच्छित फल देने वाली हैं। वे स्वर्णनयनी, कामधेनु-स्वरूपा, कीर्ति करने वाली तथा क्लेशों का नाश करने वाली हैं। वे यज्ञों में श्रेष्ठ, यज्ञ का फल तथा कर्मबंधन को तोड़ने वाली हैं।

श्लोक 38 (skanda.4.29.38)

कमलाक्षी क्लमहरा कृशानुतपनद्युतिः॥ करुणार्द्रा च कल्याणी कलिकल्मषनाशिनी

kamalākṣī klamaharā kṛśānutapanadyutiḥ karuṇārdrā ca kalyāṇī kalikalmaṣanāśinī

वे कमलनयनी, थकान हरने वाली, अग्नि और सूर्य-सी दीप्ति वाली, करुणा से आर्द्र, कल्याणमयी तथा कलियुग के पापों का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 39 (skanda.4.29.39)

कामरूपाक्रियाशक्तिः कमलोत्पलमालिनी॥ कूटस्था करुणाकांता कर्मयाना कलावती

kāmarūpākriyāśaktiḥ kamalotpalamālinī kūṭasthā karuṇākāṁtā karmayānā kalāvatī

वे इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, क्रियाशक्ति-स्वरूपा तथा कमल-माला पहनने वाली हैं। वे सदा एकरस, करुणा से प्रिय, कर्म का मार्ग तथा कलाओं में निपुण हैं।

श्लोक 40 (skanda.4.29.40)

कमलाकल्पलतिका कालीकलुषवैरिणी॥ कमनीयजलाकम्रा कपर्दिसुकपर्दगा

kamalākalpalatikā kālīkaluṣavairiṇī kamanīyajalākamrā kapardisukapardagā

वे लक्ष्मी की कल्पलतिका, कलियुग के मल की शत्रु, मनोहर जल वाली तथा रमणीय हैं। वे शिव की जटाओं में सुंदर रूप से बसने वाली हैं।

श्लोक 41 (skanda.4.29.41)

कालकृटप्रशमनी कदंबकुसुमप्रिया॥ कालिंदी केलिललिता कलकल्लोलमालिका

kālakṛṭapraśamanī kadaṁbakusumapriyā kāliṁdī kelilalitā kalakallolamālikā

वे कालकूट विष को शांत करने वाली, कदंब पुष्पों की प्रिय, कालिंदी-सम तथा क्रीड़ा में ललित हैं। वे कलकल ध्वनि करती तरंगों की माला वाली हैं।

श्लोक 42 (skanda.4.29.42)

क्रांतलोकत्रयाकंडूः कंडूतनयवत्सला॥ खड्गिनी खड्गधाराभा खगा खंडेंदुधारिणी

krāṁtalokatrayākaṁḍūḥ kaṁḍūtanayavatsalā khaḍginī khaḍgadhārābhā khagā khaṁḍeṁdudhāriṇī

वे तीनों लोकों में व्याप्त तथा अपनी संतान पर स्नेह रखने वाली हैं। वे खड्ग धारण करने वाली, खड्ग की धार-सी कांति वाली, आकाशचारिणी तथा अर्धचंद्र धारण करने वाली हैं।

श्लोक 43 (skanda.4.29.43)

खेखेलगामिनी खस्था खंडेंदुतिलकप्रिया॥ खेचरीखेचरीवंद्या ख्यातिः ख्यातिप्रदायिनी

khekhelagāminī khasthā khaṁḍeṁdutilakapriyā khecarīkhecarīvaṁdyā khyātiḥ khyātipradāyinī

वे आकाश में क्रीड़ा करती हुई गति वाली, आकाशस्थ, अर्धचंद्र-तिलक की प्रिय, आकाशचारिणी, सिद्धों द्वारा वंदित, ख्याति-स्वरूपा तथा यश देने वाली हैं।

श्लोक 44 (skanda.4.29.44)

खंडितप्रणताघौघा खलबुद्धिविनाशिनी॥ खातैनः कंदसंदोहा खड्गखट्वांग खेटिनी

khaṁḍitapraṇatāghaughā khalabuddhivināśinī khātainaḥ kaṁdasaṁdohā khaḍgakhaṭvāṁga kheṭinī

वे अपने चरणों में झुके हुए भक्तों के पापसमूह को नष्ट करने वाली तथा दुष्ट बुद्धि का नाश करने वाली हैं। वे पाप की जड़ को उखाड़ फेंकने वाली तथा खड्ग, खट्वांग आदि शिव के आयुध धारण करने वाली हैं।

श्लोक 45 (skanda.4.29.45)

खरसंतापशमनी खनिः पीयूषपाथसाम्॥ गंगा गंधवती गौरी गंधर्वनगरप्रिया

kharasaṁtāpaśamanī khaniḥ pīyūṣapāthasām gaṁgā gaṁdhavatī gaurī gaṁdharvanagarapriyā

वे उग्र संताप को शांत करने वाली तथा अमृत-सम जलों की खान हैं।

श्लोक 46 (skanda.4.29.46)

गंभीरांगी गुणमयी गतातंका गतिप्रिया॥ गणनाथांबिका गीता गद्यपद्यपरिष्टुता॥ गांधारी गर्भशमनी गतिभ्रष्टगतिप्रदा॥ गोमती गुह्यविद्यागौर्गोप्त्री गगनगामिनी

gaṁbhīrāṁgī guṇamayī gatātaṁkā gatipriyā gaṇanāthāṁbikā gītā gadyapadyapariṣṭutā gāṁdhārī garbhaśamanī gatibhraṣṭagatipradā gomatī guhyavidyāgaurgoptrī gaganagāminī

वे स्वयं गंगा, सुगंधित, गौरवर्णा तथा गंधर्वनगर की प्रिय हैं। वे गंभीर स्वरूपा, गुणों से भरी, निर्भय तथा गति की प्रिय हैं। वे गणपति की माता, गीतों में गाई गई तथा गद्य-पद्य में स्तुत हैं। वे गांधारी, गर्भ की रक्षा करने वाली तथा भटकों को मार्ग दिखाने वाली हैं। वे गोमती, गुह्य विद्या, प्रकाश-स्वरूपा, रक्षिका तथा आकाशगामिनी हैं।

श्लोक 47 (skanda.4.29.47)

गोत्रप्रवर्धिनी गुण्या गुणातीता गुणाग्रणीः॥ गुहांबिका गिरिसुता गोविंदांघ्रिसमुद्भवा

gotrapravardhinī guṇyā guṇātītā guṇāgraṇīḥ guhāṁbikā girisutā goviṁdāṁghrisamudbhavā

वे कुल को बढ़ाने वाली, गुणवती, गुणों से परे तथा गुणों में अग्रगण्या हैं। वे गुहा (स्कंद) की माता, पर्वत की पुत्री तथा गोविंद के चरण से उत्पन्न हैं।

श्लोक 48 (skanda.4.29.48)

गुणनीयचरित्रा च गायत्री गिरिशप्रिया॥ गूढरूपा गुणवती गुर्वी गौरववर्धिनी

guṇanīyacaritrā ca gāyatrī giriśapriyā gūḍharūpā guṇavatī gurvī gauravavardhinī

वे प्रशंसनीय आचरण वाली, गायत्री-स्वरूपा तथा गिरीश शिव की प्रिय हैं। वे गूढ़ रूप वाली, गुणवती, वंदनीय तथा गौरव को बढ़ाने वाली हैं।

श्लोक 49 (skanda.4.29.49)

ग्रहपीडाहरा गुंद्रा गरघ्नी गानवत्सला॥ घर्महंत्री घृतवती घृततुष्टिप्रदायिनी

grahapīḍāharā guṁdrā garaghnī gānavatsalā gharmahaṁtrī ghṛtavatī ghṛtatuṣṭipradāyinī

वे ग्रहों की पीड़ा हरने वाली, गंभीर, विष का नाश करने वाली तथा गान की प्रिय हैं। वे ताप का नाश करने वाली, घृत से पूर्ण तथा घृत के अर्पण से संतोष देने वाली हैं।

श्लोक 50 (skanda.4.29.50)

घंटारवप्रिया घोराऽघौघविध्वंसकारिणी॥ घ्राणतुष्टिकरी घोषा घनानंदा घनप्रिया

ghaṁṭāravapriyā ghorā'ghaughavidhvaṁsakāriṇī ghrāṇatuṣṭikarī ghoṣā ghanānaṁdā ghanapriyā

वे घंटा-ध्वनि की प्रिय तथा भयंकर पापसमूह का विध्वंस करने वाली हैं। वे घ्राण को तृप्त करने वाली, गूँजती हुई, आनंद से घनी तथा मेघों की प्रिय हैं।

श्लोक 51 (skanda.4.29.51)

घातुका घृर्णितजला घृष्टपातकसंततिः॥ घटकोटिप्रपीतापा घटिताशेषमंगला

ghātukā ghṛrṇitajalā ghṛṣṭapātakasaṁtatiḥ ghaṭakoṭiprapītāpā ghaṭitāśeṣamaṁgalā

वे दुष्टता का नाश करने वाली, हिलोरें लेते जल वाली तथा पापों की परंपरा को घिस डालने वाली हैं। वे करोड़ों घड़ों से पी जाने पर भी अक्षय तथा समस्त मंगल की रचयिता हैं।

श्लोक 52 (skanda.4.29.52)

घृणावती घृणनिधिर्घस्मरा घूकनादिनी॥ घुसृणा पिंजरतनुर्घर्घरा घर्घरस्वना

ghṛṇāvatī ghṛṇanidhirghasmarā ghūkanādinī ghusṛṇā piṁjaratanurghargharā ghargharasvanā

वे करुणामयी, करुणा की निधि, पापों को निगल जाने वाली तथा उल्लू के समान (अपनी लहरों में) ध्वनि करने वाली हैं। वे केसर के समान वर्ण वाली, गौर शरीर वाली तथा गरजती हुई गंभीर स्वर वाली हैं।

श्लोक 53 (skanda.4.29.53)

चंद्रिका चंद्रकांतांबुश्चंचदापा चलद्युतिः॥ चिन्मयी चितिरूपा च चंद्रायुतशनानना

caṁdrikā caṁdrakāṁtāṁbuścaṁcadāpā caladyutiḥ cinmayī citirūpā ca caṁdrāyutaśanānanā

वे चांदनी-सम, चंद्रमणि के समान जल वाली, चंचल जल वाली तथा चंचल कांति वाली हैं। वे चेतना-स्वरूपा, चित्-स्वरूपा तथा दस हजार चंद्रमाओं से भी उज्ज्वल मुख वाली हैं।

श्लोक 54 (skanda.4.29.54)

चांपेयलोचना चारुश्चार्वंगी चारुगामिनी॥ चार्या चारित्रनिलया चित्रकृच्चित्ररूपिणी

cāṁpeyalocanā cāruścārvaṁgī cārugāminī cāryā cāritranilayā citrakṛccitrarūpiṇī

वे चंपा-सी नेत्र वाली, सुंदर, सुंदर अंगों वाली तथा मनोहर गति वाली हैं। वे पूजनीय, सदाचार की निवासस्थली, अद्भुत रचयिता तथा अद्भुत रूप वाली हैं।

श्लोक 55 (skanda.4.29.55)

चंपश्चंदनशुच्यंबुश्चर्चनीया चिरस्थिरा॥ चारुचंपकमालाढ्या चमिताशेष दुष्कुता॥ चिदाकाशवहाचिंत्या चंचच्चामरवीजिता॥ चोरिताशेषवृजिना चरिताशेषमंडला

caṁpaścaṁdanaśucyaṁbuścarcanīyā cirasthirā cārucaṁpakamālāḍhyā camitāśeṣa duṣkutā cidākāśavahāciṁtyā caṁcaccāmaravījitā coritāśeṣavṛjinā caritāśeṣamaṁḍalā

वे चंपा और चंदन-सी सुगंध वाले पवित्र जल वाली, पूजनीय तथा चिरस्थायी हैं। वे चंपक की मालाओं से समृद्ध तथा समस्त दुष्कर्मों को शांत करने वाली हैं। वे चित् के आकाश को धारण करने वाली, अचिंत्य तथा चँवर-सी लहराती हुई हैं। वे समस्त पापों को चुरा लेने वाली तथा हर क्षेत्र में विचरण करने वाली हैं।

श्लोक 56 (skanda.4.29.56)

छेदिताखिलपापौघा छद्मघ्नी छलहारिणी॥ छन्नत्रिविष्टप तला छोटिताशेषबंधना

cheditākhilapāpaughā chadmaghnī chalahāriṇī channatriviṣṭapa talā choṭitāśeṣabaṁdhanā

वे समस्त पापों के प्रवाह को काट डालने वाली, छल का नाश करने वाली तथा कपट का हरण करने वाली हैं। वे तीनों लोकों को अपने भीतर छिपाए रखने वाली तथा समस्त बंधनों को तोड़ देने वाली हैं।

श्लोक 57 (skanda.4.29.57)

छुरितामृतधारौघा छिन्नैनाश्छंदगामिनी॥ छत्रीकृतमरालौघा छटीकृतनिजामृता

churitāmṛtadhāraughā chinnaināśchaṁdagāminī chatrīkṛtamarālaughā chaṭīkṛtanijāmṛtā

वे अमृत की धाराओं से युक्त, पापों को काट देने वाली तथा स्वच्छंद गति वाली हैं। वे हंसों के झुंड से मानो छत्रयुक्त तथा अपने ही अमृत से चमकती हुई हैं।

श्लोक 58 (skanda.4.29.58)

जाह्नवी ज्या जगन्माता जप्या जंघालवीचिका॥ जया जनार्दनप्रीता जुषणीया जगद्धिता

jāhnavī jyā jaganmātā japyā jaṁghālavīcikā jayā janārdanaprītā juṣaṇīyā jagaddhitā

वे जाह्नवी, धनुष की डोरी-सम, जगत की माता, जप के योग्य तथा तीव्र तरंगों वाली हैं। वे विजयशालिनी, जनार्दन (विष्णु) की प्रिय, भक्ति के योग्य तथा जगत का हित करने वाली हैं।

श्लोक 59 (skanda.4.29.59)

जीवनं जीवनप्राणा जगज्ज्येष्ठा जगन्मयी॥ जीवजीवातुलतिका जन्मिजन्मनिबर्हिणी

jīvanaṁ jīvanaprāṇā jagajjyeṣṭhā jaganmayī jīvajīvātulatikā janmijanmanibarhiṇī

वे जीवन-स्वरूपा, जीवन का प्राण, जगत की ज्येष्ठा तथा जगत में व्याप्त हैं। वे प्राणियों के लिए जीवनदायिनी औषधि-सम तथा जन्म-मृत्यु के चक्र को नष्ट करने वाली हैं।

श्लोक 60 (skanda.4.29.60)

जाड्यविध्वंसनकरी जगद्योनिर्जलाविला॥ जगदानंदजननी जलजा जलजेक्षणा

jāḍyavidhvaṁsanakarī jagadyonirjalāvilā jagadānaṁdajananī jalajā jalajekṣaṇā

वे जड़ता का नाश करने वाली, जगत की योनि तथा जल से भरी हुई हैं। वे जगत के आनंद की जननी, कमल से उत्पन्न तथा कमल-नयनी हैं।

श्लोक 61 (skanda.4.29.61)

जनलोचनपीयूषा जटातटविहारिणी॥ जयंती जंजपूकघ्नी जनितज्ञानविग्रहा

janalocanapīyūṣā jaṭātaṭavihāriṇī jayaṁtī jaṁjapūkaghnī janitajñānavigrahā

वे मनुष्यों के नेत्रों के लिए अमृत-सम तथा शिव की जटाओं के तट पर विहार करने वाली हैं। वे विजयशालिनी, निंदा का नाश करने वाली तथा ज्ञान को जन्म देने वाली हैं।

श्लोक 62 (skanda.4.29.62)

झल्लरी वाद्यकुशला झलज्झालजलावृता॥ झिंटीशवंद्या झांकारकारिणी झर्झरावती

jhallarī vādyakuśalā jhalajjhālajalāvṛtā jhiṁṭīśavaṁdyā jhāṁkārakāriṇī jharjharāvatī

वे झांझ बजाने में निपुण तथा झलमलाते जल से आवृत हैं। वे वंदनीया, झंकार करने वाली तथा झरझर ध्वनि से गूँजने वाली हैं।

श्लोक 63 (skanda.4.29.63)

टीकिताशेषपाताला टंकिकैनोद्रिपाटने॥ टंकारनृत्यत्कल्लोला टीकनीयमहातटा

ṭīkitāśeṣapātālā ṭaṁkikainodripāṭane ṭaṁkāranṛtyatkallolā ṭīkanīyamahātaṭā

वे समस्त पातालों तक व्याप्त, पाप-रूपी पर्वत को चीर डालने वाली छेनी के समान हैं। वे झंकार करती नाचती तरंगों वाली तथा जिनके महान तट पर मनन करने योग्य है।

श्लोक 64 (skanda.4.29.64)

डंबरप्रवहाडीन राजहंसकुलाकुला॥ डमड्डमरुहस्ता च डामरोक्त महांडका॥ ढौकिताशेषनिर्वाणा ढक्कानादचलज्जला॥ ढुंढिविघ्नेशजननी ढणड्ढुणितपातका

ḍaṁbarapravahāḍīna rājahaṁsakulākulā ḍamaḍḍamaruhastā ca ḍāmarokta mahāṁḍakā ḍhaukitāśeṣanirvāṇā ḍhakkānādacalajjalā ḍhuṁḍhivighneśajananī ḍhaṇaḍḍhuṇitapātakā

वे महान वेग से बहने वाली तथा उड़ते राजहंसों के समूहों से भरी हैं। वे डमरू धारण करने वाली तथा महिमा में विशाल हैं। वे सभी प्राणियों को निर्वाण के समीप लाने वाली तथा ढक्का-नाद से हिलते जल वाली हैं। वे विघ्नहर्ता गणेश की जननी तथा गर्जना से पापों को चूर करने वाली हैं।

श्लोक 65 (skanda.4.29.65)

तर्पणीतीर्थतीर्था च त्रिपथा त्रिदशेश्वरी॥ त्रिलोकगोप्त्री तोयेशी त्रैलोक्यपरिवंदिता

tarpaṇītīrthatīrthā ca tripathā tridaśeśvarī trilokagoptrī toyeśī trailokyaparivaṁditā

वे तीर्थों में तीर्थ तथा तृप्ति देने वाली, त्रिपथगा तथा देवताओं की स्वामिनी हैं। वे त्रिलोक की रक्षिका, जलों की अधीश्वरी तथा तीनों लोकों में वंदित हैं।

श्लोक 66 (skanda.4.29.66)

तापत्रितयसंहर्त्री तेजोबलविवर्धिनी॥ त्रिलक्ष्या तारणी तारा तारापतिकरार्चिता

tāpatritayasaṁhartrī tejobalavivardhinī trilakṣyā tāraṇī tārā tārāpatikarārcitā

वे तीनों प्रकार के तापों का नाश करने वाली तथा तेज एवं बल बढ़ाने वाली हैं। वे त्रिविध लक्ष्य वाली, भवसागर से पार उतारने वाली, तारा-स्वरूपा तथा चंद्रमा द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 67 (skanda.4.29.67)

त्रैलोक्यपावनी पुण्या तुष्टिदा तुष्टिरूपिणी॥ तृष्णाछेत्त्री तीर्थमाता त्त्रिविक्रमपदोद्भवा

trailokyapāvanī puṇyā tuṣṭidā tuṣṭirūpiṇī tṛṣṇāchettrī tīrthamātā ttrivikramapadodbhavā

वे तीनों लोकों को पवित्र करने वाली, पुण्यमयी, संतोष देने वाली तथा संतोष-स्वरूपा हैं। वे तृष्णा का छेदन करने वाली, तीर्थों की माता तथा त्रिविक्रम भगवान के चरण से उत्पन्न हैं।

श्लोक 68 (skanda.4.29.68)

तपोमयी तपोरूपा तपःस्तोम फलप्रदा॥ त्रैलोक्यव्यापिनी तृप्तिस्तृप्तिकृत्तत्त्वरूपिणी

tapomayī taporūpā tapaḥstoma phalapradā trailokyavyāpinī tṛptistṛptikṛttattvarūpiṇī

वे तपोमयी, तपस्या-स्वरूपा तथा संचित तप के फल की दाता हैं। वे तीनों लोकों में व्याप्त, तृप्ति-स्वरूपा, तृप्ति देने वाली तथा तत्त्व-स्वरूपा हैं।

श्लोक 69 (skanda.4.29.69)

त्रैलोक्यसुंदरी तुर्या तुर्यातीतपदप्रदा॥ त्रैलोक्यलक्ष्मीस्त्रिपदी तथ्यातिमिरचंद्रिका

trailokyasuṁdarī turyā turyātītapadapradā trailokyalakṣmīstripadī tathyātimiracaṁdrikā

वे त्रिलोक की सुंदरी, तुरीय अवस्था-स्वरूपा तथा तुरीय से भी परे पद प्रदान करने वाली हैं। वे त्रिलोक की लक्ष्मी, त्रिपथगा तथा सत्य की चंद्रिका के समान अंधकार का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 70 (skanda.4.29.70)

तेजोगर्भा तपःसारा त्रिपुरारि शिरोगृहा॥ त्रयीस्वरूपिणी तन्वी तपनांगजभीतिनुत्

tejogarbhā tapaḥsārā tripurāri śirogṛhā trayīsvarūpiṇī tanvī tapanāṁgajabhītinut

वे तेज को गर्भ में धारण करने वाली, तप का सार तथा त्रिपुरारि शिव के मस्तक पर निवास करने वाली हैं। वे तीनों वेदों की स्वरूपा, कोमलांगी तथा सूर्यपुत्र (यम) के भय को दूर करने वाली हैं।

श्लोक 71 (skanda.4.29.71)

तरिस्तरणिजामित्रं तर्पिताशेषपूर्वजा॥ तुलाविरहिता तीव्रपापतूलतनूनपात्

taristaraṇijāmitraṁ tarpitāśeṣapūrvajā tulāvirahitā tīvrapāpatūlatanūnapāt

वे भवसागर पार कराने वाली नौका, सूर्य की सखी तथा समस्त पूर्वजों को तृप्त करने वाली हैं। वे अतुलनीय तथा घोर पापों की रूई को भस्म करने वाली अग्नि के समान हैं।

श्लोक 72 (skanda.4.29.72)

दारिद्र्यदमनी दक्षा दुष्प्रेक्षा दिव्यमंडना॥ दीक्षावतीदुरावाप्या द्राक्षामधुरवारिभृत्

dāridryadamanī dakṣā duṣprekṣā divyamaṁḍanā dīkṣāvatīdurāvāpyā drākṣāmadhuravāribhṛt

वे दरिद्रता का दमन करने वाली, कुशल, दुर्निरीक्ष्य तेजस्विनी तथा दिव्य आभूषणों वाली हैं। वे दीक्षायुक्त, कठिनता से प्राप्य तथा अंगूर-सी मधुर जलधारा वाली हैं।

श्लोक 73 (skanda.4.29.73)

दर्शितानेककुतुका दुष्टदुर्जयदुःखहृत्॥ दैन्यहृद्दुरितघ्नी च दानवारि पदाब्जजा॥ दंदशूकविषघ्री च दारिताघौघसंततिः॥ द्रुतादेव द्रुमच्छन्ना दुर्वाराघविघातिनी

darśitānekakutukā duṣṭadurjayaduḥkhahṛt dainyahṛdduritaghnī ca dānavāri padābjajā daṁdaśūkaviṣaghrī ca dāritāghaughasaṁtatiḥ drutādeva drumacchannā durvārāghavighātinī

वे अनेक अद्भुत लीलाएँ दिखाने वाली तथा दुष्ट एवं अजेय शत्रुओं से उत्पन्न दुःख का हरण करने वाली हैं। वे दीनता हरने वाली, पापनाशिनी तथा दानवारि विष्णु के चरणकमल से उत्पन्न हैं। वे सर्पों के विष का नाश करने वाली तथा पापों की परंपरा को चीर देने वाली हैं। वे वृक्षों से आच्छादित तथा दुर्निवार पापों का विनाश करने वाली दिव्य देवी हैं।

श्लोक 74 (skanda.4.29.74)

दमग्राह्या देवमाता देवलोकप्रदर्शिनी॥ देवदेवप्रियादेवी दिक्पालपददायिनी

damagrāhyā devamātā devalokapradarśinī devadevapriyādevī dikpālapadadāyinī

वे संयम से ही प्राप्त होने वाली, देवताओं की माता तथा देवलोक दिखाने वाली हैं। वे देवाधिदेव की प्रिया, देवी तथा दिक्पालों का पद प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 75 (skanda.4.29.75)

दीर्घायुःकारिणी दीर्घा दोग्ध्री दूषणवर्जिता॥ दुग्धांबुवाहिनी दोह्या दिव्या दिव्यगतिप्रदा

dīrghāyuḥkāriṇī dīrghā dogdhrī dūṣaṇavarjitā dugdhāṁbuvāhinī dohyā divyā divyagatipradā

वे दीर्घायु देने वाली, विशाल, कामधेनु-सम तथा दोषरहित हैं। वे दुग्ध-सम श्वेत जल की वाहिनी, दोहन योग्य, दिव्य तथा दिव्य गति प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 76 (skanda.4.29.76)

द्युनदी दीनशरणं देहिदेहनिवारिणी॥ द्राघीयसी दाघहंत्री दितपातकसंततिः

dyunadī dīnaśaraṇaṁ dehidehanivāriṇī drāghīyasī dāghahaṁtrī ditapātakasaṁtatiḥ

वे स्वर्ग की नदी, दीनों की शरण तथा जीवों को बार-बार शरीर धारण करने से रोकने वाली हैं। वे दूर तक विस्तृत, संताप का नाश करने वाली तथा पापों की परंपरा को काट देने वाली हैं।

श्लोक 77 (skanda.4.29.77)

दूरदेशांतरचरी दुर्गमा देववल्लभा॥ दुर्वृत्तघ्नी दुर्विगाह्या दयाधारा दयावती

dūradeśāṁtaracarī durgamā devavallabhā durvṛttaghnī durvigāhyā dayādhārā dayāvatī

वे दूर देशांतर में विचरण करने वाली, दुर्गम तथा देवताओं की प्रिय हैं। वे दुराचारियों का नाश करने वाली, अगम्य, करुणा की धारा तथा दयालु हैं।

श्लोक 78 (skanda.4.29.78)

दुरासदा दानशीला द्राविणी द्रुहिणस्तुता॥ दैत्यदानवसंशुद्धिकर्त्री दुर्बुद्धिहारिणी

durāsadā dānaśīlā drāviṇī druhiṇastutā daityadānavasaṁśuddhikartrī durbuddhihāriṇī

वे दुर्जेय, दानशील, पाप को गला देने वाली तथा ब्रह्मा द्वारा स्तुत हैं। वे दैत्य-दानवों को भी शुद्ध करने वाली तथा दुर्बुद्धि का हरण करने वाली हैं।

श्लोक 79 (skanda.4.29.79)

दानसारा दयासारा द्यावाभूमिविगाहिनी॥ दृष्टादृष्टफलप्राप्तिर्देवतावृंदवंदिता

dānasārā dayāsārā dyāvābhūmivigāhinī dṛṣṭādṛṣṭaphalaprāptirdevatāvṛṁdavaṁditā

वे दान का सार, दया का सार तथा स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में व्याप्त हैं। वे दृष्ट और अदृष्ट फल की प्राप्ति कराने वाली तथा देवताओं के समूह द्वारा वंदित हैं।

श्लोक 80 (skanda.4.29.80)

दीर्घव्रता दीर्घदृष्टिर्दीप्ततोया दुरालभा॥ दंडयित्री दंडनीतिर्दुष्टदंडधरार्चिता

dīrghavratā dīrghadṛṣṭirdīptatoyā durālabhā daṁḍayitrī daṁḍanītirduṣṭadaṁḍadharārcitā

वे दीर्घ व्रत वाली, दूरदर्शी, दीप्तिमान जल वाली तथा कठिनता से प्राप्य हैं। वे दंड देने वाली, दंडनीति-स्वरूपा तथा दुष्टों को दंड देने वालों द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 81 (skanda.4.29.81)

दुरोदरघ्नी दावार्चिर्द्रवद्रव्यैकशेवधिः॥ दीनसंतापशमनी दात्री दवथुवैरिणी

durodaraghnī dāvārcirdravadravyaikaśevadhiḥ dīnasaṁtāpaśamanī dātrī davathuvairiṇī

वे जुए के दोष का नाश करने वाली, दावाग्नि-सी ज्वाला तथा प्रवाहित वस्तुओं में एकमात्र निधि हैं। वे दीनों के संताप को शांत करने वाली, दाता तथा शोक की शत्रु हैं।

श्लोक 82 (skanda.4.29.82)

दरीविदारणपरा दांता दांतजनप्रिया॥ दारिताद्रितटा दुर्गा दुर्गारण्यप्रचारिणी॥ धर्मद्रवा धर्मधुरा धेनुर्धीरा धृतिर्ध्रुवा॥ धेनुदानफलस्पर्शा धर्मकामार्थमोक्षदा

darīvidāraṇaparā dāṁtā dāṁtajanapriyā dāritādritaṭā durgā durgāraṇyapracāriṇī dharmadravā dharmadhurā dhenurdhīrā dhṛtirdhruvā dhenudānaphalasparśā dharmakāmārthamokṣadā

वे पर्वतों की गुफाओं को चीरने में तत्पर, संयमित तथा संयमी जनों की प्रिय हैं। वे पर्वत के ढालों को विदीर्ण करने वाली, दुर्गा-स्वरूपा तथा दुर्गम वनों में विचरण करने वाली हैं। वे धर्म से बहने वाली, धर्म का भार वहन करने वाली, कामधेनु-सम, धीर तथा अटल हैं। वे गौदान के फल का स्पर्श कराने वाली तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 83 (skanda.4.29.83)

धर्मोर्मिवाहिनी धुर्या धात्री धात्रीविभूषणम्॥ धर्मिणी धर्मशीला च धन्विकोटिकृतावना

dharmormivāhinī dhuryā dhātrī dhātrīvibhūṣaṇam dharmiṇī dharmaśīlā ca dhanvikoṭikṛtāvanā

वे धर्म की तरंगों को वहन करने वाली, भार वहन करने में सक्षम, धात्री तथा पृथ्वी का आभूषण हैं। वे धर्मपरायण, धर्मशील तथा करोड़ों धनुर्धरों द्वारा रक्षित हैं।

श्लोक 84 (skanda.4.29.84)

ध्यातृपापहरा ध्येया धावनी धूतकल्मषा॥ धर्मधारा धर्मसारा धनदा धनवर्धिनी

dhyātṛpāpaharā dhyeyā dhāvanī dhūtakalmaṣā dharmadhārā dharmasārā dhanadā dhanavardhinī

वे ध्यान करने वालों के पापों को हरने वाली, ध्यान के योग्य, स्वच्छंद गति वाली तथा पापरहित हैं। वे धर्म की धारा, धर्म का सार, धन देने वाली तथा धन बढ़ाने वाली हैं।

श्लोक 85 (skanda.4.29.85)

धर्माधर्मगुणच्छेत्त्री धत्तूरकुसुमप्रिया॥ धर्मेशी धर्मशास्त्रज्ञा धनधान्यसमृद्धिकृत्

dharmādharmaguṇacchettrī dhattūrakusumapriyā dharmeśī dharmaśāstrajñā dhanadhānyasamṛddhikṛt

वे धर्म और अधर्म के गुणों को छिन्न करने वाली तथा धतूरे के पुष्प की प्रिय हैं। वे धर्म की स्वामिनी, धर्मशास्त्र की ज्ञाता तथा धन-धान्य से समृद्धि करने वाली हैं।

श्लोक 86 (skanda.4.29.86)

धर्मलभ्या धर्मजला धर्मप्रसवधर्मिणी॥ ध्यानगम्यस्वरूपा च धरणी धातृपूजिता

dharmalabhyā dharmajalā dharmaprasavadharmiṇī dhyānagamyasvarūpā ca dharaṇī dhātṛpūjitā

वे धर्म से प्राप्त होने वाली, धर्म-जल वाली तथा धर्म को जन्म देने वाली धर्मपरायण हैं। वे ध्यान से जानी जाने वाली, पृथ्वी-स्वरूपा तथा ब्रह्मा द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 87 (skanda.4.29.87)

धूर्धूर्जटिजटासंस्था धन्या धीर्धारणावती॥ नंदा निर्वाणजननी नंदिनी नुन्नपातका

dhūrdhūrjaṭijaṭāsaṁsthā dhanyā dhīrdhāraṇāvatī naṁdā nirvāṇajananī naṁdinī nunnapātakā

वे धुरा-सम, शिव की जटाओं में निवास करने वाली, धन्य तथा धैर्यशालिनी हैं। वे आनंदमयी, मोक्ष की जननी, प्रिय पुत्री-सम तथा पापों को दूर भगाने वाली हैं।

श्लोक 88 (skanda.4.29.88)

निषिद्धविघ्ननिचया निजानंदप्रकाशिनी॥ नभोंगणचरी नूतिर्नम्या नारायणीनुता

niṣiddhavighnanicayā nijānaṁdaprakāśinī nabhoṁgaṇacarī nūtirnamyā nārāyaṇīnutā

वे विघ्नों के समूह को रोकने वाली तथा अपने आनंद को प्रकट करने वाली हैं। वे आकाश में विचरण करने वाली, स्तुति-स्वरूपा, वंदनीय तथा नारायणी द्वारा स्तुत हैं।

श्लोक 89 (skanda.4.29.89)

निर्मला निर्मलाख्याना नाशिनीतापसंपदाम्॥ नियता नित्यसुखदा नानाश्चर्यमहानिधिः

nirmalā nirmalākhyānā nāśinītāpasaṁpadām niyatā nityasukhadā nānāścaryamahānidhiḥ

वे निर्मल, अपनी निर्मलता के लिए विख्यात तथा संताप की संपत्ति का नाश करने वाली हैं। वे नियमबद्ध, नित्य सुख देने वाली तथा अनेक आश्चर्यों की महान निधि हैं।

श्लोक 90 (skanda.4.29.90)

नदीनदसरोमाता नायिका नाकदीर्घिका॥ नष्टोद्धरणधीरा च नंदनानंददायिनी

nadīnadasaromātā nāyikā nākadīrghikā naṣṭoddharaṇadhīrā ca naṁdanānaṁdadāyinī

वे नदी-नदों तथा सरोवरों की माता, नायिका तथा स्वर्ग की दीर्घिका हैं। वे खोए हुओं का उद्धार करने में धीर तथा नंदनवन-सा आनंद देने वाली हैं।

श्लोक 91 (skanda.4.29.91)

निर्णिक्ताशेषभुवना निःसंगा निरुपद्रवा॥ निरालंबा निष्प्रपंचा निर्णाशितमहामला॥ निर्मलज्ञानजननी निःशेषप्राणितापहृत्॥ नित्योत्सवा नित्यतृप्ता नमस्कार्या निरंजना

nirṇiktāśeṣabhuvanā niḥsaṁgā nirupadravā nirālaṁbā niṣprapaṁcā nirṇāśitamahāmalā nirmalajñānajananī niḥśeṣaprāṇitāpahṛt nityotsavā nityatṛptā namaskāryā niraṁjanā

वे समस्त लोकों को शुद्ध करने वाली, अनासक्त तथा उपद्रवरहित हैं। वे निराधार, संसार से परे तथा महामल का नाश करने वाली हैं। वे निर्मल ज्ञान की जननी तथा समस्त प्राणियों के संताप का हरण करने वाली हैं। वे नित्य उत्सवमयी, सदा तृप्त, वंदनीय तथा निष्कलंक हैं।

श्लोक 92 (skanda.4.29.92)

निष्ठावती निरातंका निर्लेपा निश्चलात्मिका॥ निरवद्या निरीहा च नीललोहितमूर्धगा

niṣṭhāvatī nirātaṁkā nirlepā niścalātmikā niravadyā nirīhā ca nīlalohitamūrdhagā

वे भक्ति में स्थिर, निर्भय, अलिप्त तथा अचल स्वभाव वाली हैं। वे निर्दोष, इच्छारहित तथा नीलकंठ शिव के मस्तक पर विराजमान हैं।

श्लोक 93 (skanda.4.29.93)

नंदिभृंगिगणस्तुत्या नागानंदा नगात्मजा॥ निष्प्रत्यूहा नाकनदी निरयार्णवदीर्घनौः

naṁdibhṛṁgigaṇastutyā nāgānaṁdā nagātmajā niṣpratyūhā nākanadī nirayārṇavadīrghanauḥ

वे नंदी और भृंगी के गणों द्वारा स्तुत, पर्वतों की आनंददायिनी तथा पर्वत की पुत्री हैं। वे अबाधित, स्वर्ग की नदी तथा नरक के सागर से पार कराने वाली विशाल नौका हैं।

श्लोक 94 (skanda.4.29.94)

पुण्यप्रदा पुण्यगर्भा पुण्या पुण्यतरंगिणी॥ पृथुः पृथुफला पूर्णा प्रणतार्तिप्रभंजिनी

puṇyapradā puṇyagarbhā puṇyā puṇyataraṁgiṇī pṛthuḥ pṛthuphalā pūrṇā praṇatārtiprabhaṁjinī

वे पुण्य देने वाली, पुण्य से गर्भित, पवित्र तथा पुण्य-तरंगिणी हैं। वे विशाल, प्रचुर फलों वाली, संपूर्ण तथा उसके शरण में आए हुओं की पीड़ा को नष्ट करने वाली हैं।

श्लोक 95 (skanda.4.29.95)

प्राणदा प्राणिजननी प्राणेशी प्राणरूपिणी॥ पद्मालया पराशक्तिः पुरजित्परमप्रिया

prāṇadā prāṇijananī prāṇeśī prāṇarūpiṇī padmālayā parāśaktiḥ purajitparamapriyā

वे प्राण देने वाली, प्राणियों की जननी, प्राण की स्वामिनी तथा प्राण-स्वरूपा हैं। वे लक्ष्मी के निवास-स्थान, परा शक्ति तथा त्रिपुरनाशक शिव की परम प्रिया हैं।

श्लोक 96 (skanda.4.29.96)

परापरफलप्राप्तिः पावनी च पयस्विनी॥ परानंदा प्रकृष्टार्था प्रतिष्ठापालनी परा

parāparaphalaprāptiḥ pāvanī ca payasvinī parānaṁdā prakṛṣṭārthā pratiṣṭhāpālanī parā

वे उच्च और निम्न दोनों प्रकार के फलों की प्राप्ति कराने वाली तथा पावन एवं जलमयी हैं। वे परम आनंद-स्वरूपा, उत्कृष्ट प्रयोजन वाली, प्रतिष्ठा की रक्षिका तथा सर्वोच्च हैं।

श्लोक 97 (skanda.4.29.97)

पुराणपठिता प्रीता प्रणवाक्षररूपिणी॥ पार्वतीप्रेमसंपन्ना पशुपाशविमोचनी

purāṇapaṭhitā prītā praṇavākṣararūpiṇī pārvatīpremasaṁpannā paśupāśavimocanī

वे पुराणों में पठित, प्रिय तथा प्रणव (ॐ) के अक्षर-स्वरूपा हैं। वे पार्वती के प्रेम से संपन्न तथा पशुओं (जीवों) को बंधन से मुक्त करने वाली हैं।

श्लोक 98 (skanda.4.29.98)

परमात्मस्वरूपा च परब्रह्मप्रकाशिनी॥ परमानंदनिष्पंदा प्रायश्चित्तस्वरूपिणी

paramātmasvarūpā ca parabrahmaprakāśinī paramānaṁdaniṣpaṁdā prāyaścittasvarūpiṇī

वे परमात्मा-स्वरूपा तथा परब्रह्म को प्रकट करने वाली हैं। वे परमानंद में स्थिर तथा प्रायश्चित्त-स्वरूपा हैं।

श्लोक 99 (skanda.4.29.99)

पानीयरूपनिर्वाणा परित्राणपरायणा॥ पापेंधनदवज्वाला पापारिः पापनामनुत्

pānīyarūpanirvāṇā paritrāṇaparāyaṇā pāpeṁdhanadavajvālā pāpāriḥ pāpanāmanut

वे जल के रूप में मोक्ष प्रदान करने वाली तथा रक्षा करने में तत्पर हैं। वे पाप-रूपी ईंधन के लिए दावाग्नि, पाप की शत्रु तथा पाप के नाम को भी मिटाने वाली हैं।

श्लोक 100 (skanda.4.29.100)

परमैश्वर्यजननी प्रज्ञा प्राज्ञा परापरा॥ प्रत्यक्षलक्ष्मीः पद्माक्षी परव्योमामृतस्रवा॥ प्रसन्नरूपा प्रणिधिः पूता प्रत्यक्षदेवता॥ पिनाकिपरमप्रीता पग्मेष्ठिकमंडलुः

paramaiśvaryajananī prajñā prājñā parāparā pratyakṣalakṣmīḥ padmākṣī paravyomāmṛtasravā prasannarūpā praṇidhiḥ pūtā pratyakṣadevatā pinākiparamaprītā pagmeṣṭhikamaṁḍaluḥ

वे परम ऐश्वर्य की जननी, प्रज्ञा-स्वरूपा, प्राज्ञा तथा परा और अपरा दोनों हैं। वे साक्षात लक्ष्मी, कमलनयनी तथा परम आकाश से बहने वाली अमृतधारा हैं। वे प्रसन्न रूप वाली, ध्यान-स्वरूपा, पवित्र तथा साक्षात देवता हैं। वे शिव की परम प्रिय तथा ब्रह्मा के कमंडलु-स्वरूपा हैं।

श्लोक 101 (skanda.4.29.101)

पद्मनाभपदार्घ्येण प्रसूता पद्ममालिनी॥ परर्द्धिदा पुष्टिकरी पथ्या पूर्तिः प्रभावती

padmanābhapadārghyeṇa prasūtā padmamālinī pararddhidā puṣṭikarī pathyā pūrtiḥ prabhāvatī

वे पद्मनाभ (विष्णु) के चरण-अर्घ्य से उत्पन्न तथा कमल-माला वाली हैं। वे परम समृद्धि देने वाली, पुष्टि करने वाली, हितकारी, पूर्णता-स्वरूपा तथा प्रभावशालिनी हैं।

श्लोक 102 (skanda.4.29.102)

पुनाना पीतगर्भघ्नी पापपर्वतनाशिनी॥ फलिनी फलहस्ता च फुल्लांबुजविलोचना

punānā pītagarbhaghnī pāpaparvatanāśinī phalinī phalahastā ca phullāṁbujavilocanā

वे पवित्र करने वाली, गर्भ-संबंधी पापों का नाश करने वाली तथा पाप-रूपी पर्वत का विनाश करने वाली हैं। वे फलदायिनी, हाथ में फल धारण करने वाली तथा खिले हुए कमल-सी नयनों वाली हैं।

श्लोक 103 (skanda.4.29.103)

फालितैनोमहाक्षेत्रा फणिलोकविभूषणम्॥ फेनच्छलप्रणुन्नैनाः फुल्लकैरवगंधिनी

phālitainomahākṣetrā phaṇilokavibhūṣaṇam phenacchalapraṇunnaināḥ phullakairavagaṁdhinī

वे पाप को चीरने वाला महाक्षेत्र तथा नागलोक की आभूषण हैं। वे फेन के बहाने पापों को दूर करने वाली तथा खिले हुए श्वेत कमलों की सुगंध वाली हैं।

श्लोक 104 (skanda.4.29.104)

फेनिलाच्छांबुधाराभा फुडुच्चाटितपातका॥ फाणितस्वादुसलिला फांटपथ्यजलाविला

phenilācchāṁbudhārābhā phuḍuccāṭitapātakā phāṇitasvādusalilā phāṁṭapathyajalāvilā

वे फेनयुक्त स्वच्छ जलधाराओं से दीप्तिमान तथा पापों को पूर्णतः दूर भगाने वाली हैं। वे गुड़ के समान मधुर जल वाली तथा हितकर किंतु प्रबल जल वाली हैं।

श्लोक 105 (skanda.4.29.105)

विश्वमाता च विश्वेशी विश्वा विश्वेश्वरप्रिया॥ ब्रह्मण्या ब्रह्मकृद्ब्राह्मी ब्रह्मिष्ठा विमलोदका

viśvamātā ca viśveśī viśvā viśveśvarapriyā brahmaṇyā brahmakṛdbrāhmī brahmiṣṭhā vimalodakā

वे विश्व की माता, विश्व की स्वामिनी, विश्व-स्वरूपा तथा विश्वेश्वर की प्रिया हैं। वे ब्रह्म में भक्ति रखने वाली, ब्रह्मा-स्वरूपा, ब्राह्मी, ब्रह्म में सर्वाधिक निष्ठ तथा निर्मल जल वाली हैं।

श्लोक 106 (skanda.4.29.106)

विभावरी च विरजा विक्रांतानेकविष्टपा॥ विश्वमित्रं विष्णुपदी वैष्णवी वैष्णवप्रिया

vibhāvarī ca virajā vikrāṁtānekaviṣṭapā viśvamitraṁ viṣṇupadī vaiṣṇavī vaiṣṇavapriyā

वे रात्रि-सी दीप्तिमान, वासनारहित तथा अनेक लोकों को पराक्रम से जीतने वाली हैं। वे विश्व की सखी, विष्णु के चरण से उत्पन्न, वैष्णवी तथा वैष्णवों की प्रिय हैं।

श्लोक 107 (skanda.4.29.107)

विरूपाक्षप्रियकरी विभूतिर्विश्वतोमुखी॥ विपाशा वैबुधी वेद्या वेदाक्षररसस्रवा

virūpākṣapriyakarī vibhūtirviśvatomukhī vipāśā vaibudhī vedyā vedākṣararasasravā

वे विरूपाक्ष शिव को प्रिय लगने वाली, ऐश्वर्य-स्वरूपा तथा सब ओर मुख वाली हैं। वे बंधनरहित, विद्वानों की देवी, ज्ञेय तथा वेद के अक्षरों के रस को बहाने वाली हैं।

श्लोक 108 (skanda.4.29.108)

विद्यावेगवती वंद्या बृंहणी ब्रह्मवादिनी॥ वरदा विप्रकृष्टा च वरिष्ठा च विशोधनी

vidyāvegavatī vaṁdyā bṛṁhaṇī brahmavādinī varadā viprakṛṣṭā ca variṣṭhā ca viśodhanī

वे विद्या के वेग वाली, वंदनीय, पोषण करने वाली तथा ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाली हैं। वे वर देने वाली, दूर तक विस्तृत, सर्वश्रेष्ठ तथा शुद्ध करने वाली हैं।

श्लोक 109 (skanda.4.29.109)

विद्याधरी विशोका च वयोवृंदनिषेविता॥ बहूदका बलवती व्योमस्था विबुधप्रिया॥ वाणी वेदवती वित्ता ब्रह्मविद्यातरंगिणी॥ ब्रह्मांडकोटिव्याप्तांबुर्ब्रह्महत्यापहारिणी

vidyādharī viśokā ca vayovṛṁdaniṣevitā bahūdakā balavatī vyomasthā vibudhapriyā vāṇī vedavatī vittā brahmavidyātaraṁgiṇī brahmāṁḍakoṭivyāptāṁburbrahmahatyāpahāriṇī

वे विद्या धारण करने वाली, शोकरहित तथा सभी आयु के लोगों द्वारा सेवित हैं। वे प्रचुर जल वाली, बलवती, आकाश में निवास करने वाली तथा विद्वानों की प्रिय हैं। वे वाणी-स्वरूपा, वेदयुक्त, ख्यातिमयी तथा ब्रह्मविद्या की तरंगिणी हैं। वे करोड़ों ब्रह्मांडों में व्याप्त जल वाली तथा ब्रह्महत्या के पाप का हरण करने वाली हैं।

श्लोक 110 (skanda.4.29.110)

ब्रह्मेशविष्णुरूपा च बुद्धिर्विभववर्धिनी॥ विलासिसुखदा वैश्या व्यापिनी च वृषारणिः

brahmeśaviṣṇurūpā ca buddhirvibhavavardhinī vilāsisukhadā vaiśyā vyāpinī ca vṛṣāraṇiḥ

वे ब्रह्मा, शिव और विष्णु के रूप वाली, बुद्धि-स्वरूपा तथा वैभव को बढ़ाने वाली हैं। वे विलासमय सुख देने वाली, सर्वव्यापी तथा धर्म की उत्पत्ति-भूमि हैं।

श्लोक 111 (skanda.4.29.111)

वृषांकमौलिनिलया विपन्नार्तिप्रभंजिनी॥ विनीता विनता ब्रध्नतनया विनयान्विता

vṛṣāṁkamaulinilayā vipannārtiprabhaṁjinī vinītā vinatā bradhnatanayā vinayānvitā

वे शिव के मस्तक पर निवास करने वाली तथा विपत्तिग्रस्तों की पीड़ा को नष्ट करने वाली हैं। वे विनम्र, झुकी हुई, सूर्य की पुत्री तथा विनय से युक्त हैं।

श्लोक 112 (skanda.4.29.112)

विपंचीवाद्यकुशला वेणुश्रुतिविचक्षणा॥ वर्चस्करी बलकरी वलोन्मूलितकल्मषा

vipaṁcīvādyakuśalā veṇuśrutivicakṣaṇā varcaskarī balakarī valonmūlitakalmaṣā

वे वीणा बजाने में निपुण तथा बांसुरी की स्वर-लहरियों में प्रवीण हैं। वे तेज देने वाली, बल देने वाली तथा अपने वेग से पाप को उखाड़ फेंकने वाली हैं।

श्लोक 113 (skanda.4.29.113)

विपाप्मा विगतातंका विकल्पपरिवर्जिता॥ वृष्टिकर्त्री वृष्टिजला विधिर्विच्छिन्नबंधना

vipāpmā vigatātaṁkā vikalpaparivarjitā vṛṣṭikartrī vṛṣṭijalā vidhirvicchinnabaṁdhanā

वे पापरहित, भयरहित तथा संशय और द्वैत से परे हैं। वे वर्षा करने वाली, वर्षा के जल वाली, विधान-स्वरूपा तथा समस्त बंधनों को काटने वाली हैं।

श्लोक 114 (skanda.4.29.114)

व्रतरूपा वित्तरूपा बहुविघ्नविनाशकृत्॥ वसुधारा वसुमती विचित्रांगी विभावसुः

vratarūpā vittarūpā bahuvighnavināśakṛt vasudhārā vasumatī vicitrāṁgī vibhāvasuḥ

वे व्रत-स्वरूपा, धन-स्वरूपा तथा अनेक विघ्नों का नाश करने वाली हैं। वे धन की धारा, धन से समृद्ध, विचित्र रूप वाली तथा अग्नि-सी तेजस्वी हैं।

श्लोक 115 (skanda.4.29.115)

विजया विश्वबीजं च वामदेवी वरप्रदा॥ वृषाश्रिता विषघ्नी च विज्ञानोर्म्यंशुमालिनी

vijayā viśvabījaṁ ca vāmadevī varapradā vṛṣāśritā viṣaghnī ca vijñānormyaṁśumālinī

वे विजयशालिनी, विश्व का बीज, वामदेव-सी सौम्य तथा वर देने वाली हैं। वे शिव (वृष) के आश्रय में रहने वाली, विष का नाश करने वाली तथा ज्ञान की तरंगों की किरणों से मालाबद्ध हैं।

श्लोक 116 (skanda.4.29.116)

भव्या भोगवती भद्रा भवानी भूतभाविनी॥ भूतधात्री भयहरा भक्तदारिद्र्यघातिनी

bhavyā bhogavatī bhadrā bhavānī bhūtabhāvinī bhūtadhātrī bhayaharā bhaktadāridryaghātinī

वे भव्य, भोगों से समृद्ध, कल्याणकारी, भवानी तथा भूत-भविष्य की सृष्टिकर्त्री हैं। वे प्राणियों की पालनकर्त्री, भय हरने वाली तथा भक्तों की दरिद्रता का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 117 (skanda.4.29.117)

भुक्तिमुक्तिप्रदाभेशी भक्तस्वर्गापवर्गदा॥ भागीरथी भानुमती भाग्यभोगवती भृतिः

bhuktimuktipradābheśī bhaktasvargāpavargadā bhāgīrathī bhānumatī bhāgyabhogavatī bhṛtiḥ

वे भोग और मोक्ष दोनों देने वाली, रोगनाशिनी तथा भक्तों को स्वर्ग एवं मुक्ति दोनों देने वाली हैं। वे भागीरथी, सूर्य-सी तेजस्विनी, सौभाग्य से समृद्ध तथा सबका भरण-पोषण करने वाली हैं।

श्लोक 118 (skanda.4.29.118)

भवप्रिया भवद्वेष्टी भूतिदा भूतिभूषणा॥ भाललोचनभावज्ञा भूतभव्यभवत्प्रभुः॥ भ्रांतिज्ञानप्रशमनी भिन्नब्रह्मांडमंडपा॥ भूरिदा भक्तिसुलभा भाग्यवद्दृष्टिगोचरी

bhavapriyā bhavadveṣṭī bhūtidā bhūtibhūṣaṇā bhālalocanabhāvajñā bhūtabhavyabhavatprabhuḥ bhrāṁtijñānapraśamanī bhinnabrahmāṁḍamaṁḍapā bhūridā bhaktisulabhā bhāgyavaddṛṣṭigocarī

वे शिव की प्रिया, संसार-बंधन की शत्रु, ऐश्वर्य देने वाली तथा भस्म से विभूषित हैं। वे शिव के हृदय को जानने वाली तथा भूत, भविष्य और वर्तमान की स्वामिनी हैं। वे भ्रांतिपूर्ण ज्ञान को शांत करने वाली तथा अनेक ब्रह्मांडों में फैली हुई हैं। वे प्रचुर दान देने वाली, भक्ति से सुलभ तथा केवल भाग्यशालियों को ही दृष्टिगोचर होने वाली हैं।

श्लोक 119 (skanda.4.29.119)

भंजितोपप्लवकुला भक्ष्यभोज्यसुखप्रदा॥ भिक्षणीया भिक्षुमाता भावाभावस्वरूपिणी

bhaṁjitopaplavakulā bhakṣyabhojyasukhapradā bhikṣaṇīyā bhikṣumātā bhāvābhāvasvarūpiṇī

वे विपत्तियों के समूह को तोड़ने वाली तथा खाने-पीने के सुख को देने वाली हैं। वे याचना के योग्य, भिक्षुओं की माता तथा सत् और असत् दोनों की स्वरूपा हैं।

श्लोक 120 (skanda.4.29.120)

मंदाकिनी महानंदा माता मुक्तितंरगिणी॥ महोदया मधुमती महापुण्या मुदाकरी

maṁdākinī mahānaṁdā mātā muktitaṁragiṇī mahodayā madhumatī mahāpuṇyā mudākarī

वे मंदाकिनी, महान आनंद वाली, माता तथा मुक्ति की तरंगिणी हैं। वे महान उदय वाली, मधु-सम मधुर, महापुण्यमयी तथा आनंद देने वाली हैं।

श्लोक 121 (skanda.4.29.121)

मुनिस्तुता मोहहंत्री महातीर्था मधुस्रवा॥ माधवी मानिनी मान्या मनोरथपथातिगा

munistutā mohahaṁtrī mahātīrthā madhusravā mādhavī māninī mānyā manorathapathātigā

वे मुनियों द्वारा स्तुत, मोह का नाश करने वाली, महातीर्थ तथा मधु बहाने वाली हैं। वे विष्णु से संबंधित, मानिनी, सम्मान के योग्य तथा मनोरथों के मार्ग से भी परे हैं।

श्लोक 122 (skanda.4.29.122)

मोक्षदा मतिदा मुख्या महाभाग्यजनाश्रिता॥ महावेगवतीमेध्या महामहिमभूषणा

mokṣadā matidā mukhyā mahābhāgyajanāśritā mahāvegavatīmedhyā mahāmahimabhūṣaṇā

वे मोक्ष देने वाली, बुद्धि देने वाली, प्रमुख तथा महाभाग्यशाली जनों द्वारा आश्रित हैं। वे महावेगवती, यज्ञ के योग्य पवित्र तथा महान महिमा से विभूषित हैं।

श्लोक 123 (skanda.4.29.123)

महाप्रभावा महती मीनचंचललोचना॥ महाकारुण्यसंपूर्णा महर्द्धिश्च महोत्पला

mahāprabhāvā mahatī mīnacaṁcalalocanā mahākāruṇyasaṁpūrṇā maharddhiśca mahotpalā

वे महान प्रभाव वाली, विशाल तथा मछली-सी चंचल नेत्रों वाली हैं। वे महान करुणा से परिपूर्ण, महान समृद्धि तथा विशाल नील कमलों से भरी हैं।

श्लोक 124 (skanda.4.29.124)

मूर्तिमन्मुक्तिरमणी मणिमाणिक्यभूषणा॥ मुक्ताकलापनेपथ्या मनोनयननंदिनी

mūrtimanmuktiramaṇī maṇimāṇikyabhūṣaṇā muktākalāpanepathyā manonayananaṁdinī

वे साक्षात मुक्ति की रमणी तथा मणि-माणिक्यों से विभूषित हैं। वे मुक्ताओं की माला धारण करने वाली तथा मन और नेत्र दोनों को आनंद देने वाली हैं।

श्लोक 125 (skanda.4.29.125)

महापातकराशिघ्नी महादेवार्धहारिणी॥ महोर्मिमालिनी मुक्ता महादेवी मनोन्मनी

mahāpātakarāśighnī mahādevārdhahāriṇī mahormimālinī muktā mahādevī manonmanī

वे महापातकों के समूह का नाश करने वाली तथा महादेव के आधे स्वरूप को धारण करने वाली हैं। वे विशाल तरंगों की माला वाली, मुक्त, महादेवी तथा मन से भी परे मन वाली हैं।

श्लोक 126 (skanda.4.29.126)

महापुण्योदयप्राप्या मायातिमिरचंद्रिका॥ महाविद्या महामाया महामेधा महौषधम्

mahāpuṇyodayaprāpyā māyātimiracaṁdrikā mahāvidyā mahāmāyā mahāmedhā mahauṣadham

वे महान पुण्य के उदय से प्राप्त होने वाली तथा माया के अंधकार में चंद्रिका-सम हैं। वे महाविद्या, महामाया, महाबुद्धि तथा महान औषधि-स्वरूपा हैं।

श्लोक 127 (skanda.4.29.127)

मालाधरी महोपाया महोरगविभूषणा॥ महामोहप्रशमनी महामंगलमंगलम्॥ मार्तंडमंडलचरी महालक्ष्मीर्मदोज्झिता॥ यशस्विनी यशोदा च योग्या युक्तात्मसेविता

mālādharī mahopāyā mahoragavibhūṣaṇā mahāmohapraśamanī mahāmaṁgalamaṁgalam mārtaṁḍamaṁḍalacarī mahālakṣmīrmadojjhitā yaśasvinī yaśodā ca yogyā yuktātmasevitā

वे माला धारण करने वाली, मुक्ति का महान उपाय तथा महान सर्पों से विभूषित हैं। वे महामोह को शांत करने वाली तथा समस्त मंगलों की भी मंगलस्वरूपा हैं। वे सूर्यमंडल में विचरण करने वाली, महालक्ष्मी-स्वरूपा तथा मदरहित हैं। वे यशस्विनी, यश देने वाली, योग्य तथा संयमी आत्माओं द्वारा सेवित हैं।

श्लोक 128 (skanda.4.29.128)

योगसिद्धिप्रदा याज्या यज्ञेशपरिपूरिता॥ यज्ञेशी यज्ञफलदा यजनीया यशस्करी

yogasiddhipradā yājyā yajñeśaparipūritā yajñeśī yajñaphaladā yajanīyā yaśaskarī

वे योग-सिद्धि प्रदान करने वाली, यज्ञ के योग्य तथा यज्ञेश्वर से परिपूर्ण हैं। वे यज्ञ की स्वामिनी, यज्ञ का फल देने वाली, पूजनीय तथा यश करने वाली हैं।

श्लोक 129 (skanda.4.29.129)

यमिसेव्या योगयोनिर्योगिनी युक्तबुद्धिदा॥ योगज्ञानप्रदा युक्ता यमाद्यष्टांगयोगयुक्

yamisevyā yogayoniryoginī yuktabuddhidā yogajñānapradā yuktā yamādyaṣṭāṁgayogayuk

वे संयमी जनों द्वारा सेवित, योग की योनि, योगिनी तथा संयमित बुद्धि देने वाली हैं। वे योग-ज्ञान देने वाली, अनुशासित तथा यम आदि अष्टांगयोग से युक्त हैं।

श्लोक 130 (skanda.4.29.130)

यंत्रिताघौघसंचारा यमलोकनिवारिणी॥ यातायातप्रशमनी यातनानामकृंतनी

yaṁtritāghaughasaṁcārā yamalokanivāriṇī yātāyātapraśamanī yātanānāmakṛṁtanī

वे पापों की बाढ़ को नियंत्रित करने वाली तथा यमलोक को रोकने वाली हैं। वे आवागमन (जन्म-मृत्यु) को शांत करने वाली तथा यातनाओं का उच्छेद करने वाली हैं।

श्लोक 131 (skanda.4.29.131)

यामिनीशहिमाच्छोदा युगधर्मविवर्जिता॥ रेवतीरतिकृद्रम्या रत्नगर्भा रमा रतिः

yāminīśahimācchodā yugadharmavivarjitā revatīratikṛdramyā ratnagarbhā ramā ratiḥ

वे चंद्रमा की रात्रि के हिम-सम शीतल जल वाली तथा युगों के बदलते धर्म से परे हैं। वे रेवती-सी आनंद देने वाली, रमणीय, रत्नगर्भा, लक्ष्मी तथा प्रेम-स्वरूपा हैं।

श्लोक 132 (skanda.4.29.132)

रत्नाकरप्रेमपात्रं रसज्ञा रसरूपिणी॥ रत्नप्रासादगर्भा च रमणीयतरंगिणी

ratnākarapremapātraṁ rasajñā rasarūpiṇī ratnaprāsādagarbhā ca ramaṇīyataraṁgiṇī

वे समुद्र की प्रिय निधि, रस की ज्ञाता तथा रस-स्वरूपा हैं। वे रत्नजड़ित महलों को अपने गर्भ में धारण करने वाली तथा रमणीय तरंगों वाली हैं।

श्लोक 133 (skanda.4.29.133)

रत्नार्ची रुद्ररमणी रागद्वेषविनाशिनी॥ रमा रामा रम्यरूपा रोगिजीवातुरूपिणी

ratnārcī rudraramaṇī rāgadveṣavināśinī ramā rāmā ramyarūpā rogijīvāturūpiṇī

वे रत्नों-सी दीप्तिमान, रुद्र की प्रिया तथा राग-द्वेष का नाश करने वाली हैं। वे लक्ष्मी-सम, सुंदरी, रमणीय रूप वाली तथा रोगियों के लिए जीवनदायी औषधि-स्वरूपा हैं।

श्लोक 134 (skanda.4.29.134)

रुचिकृद्रोचनी रम्या रुचिरा रोगहारिणी॥ राजहंसा रत्नवती राजत्कल्लोलराजिका

rucikṛdrocanī ramyā rucirā rogahāriṇī rājahaṁsā ratnavatī rājatkallolarājikā

वे आनंद देने वाली, दीप्तिमान, रमणीय, मनोहर तथा रोगों का हरण करने वाली हैं। वे राजहंस-स्वरूपा, रत्नों से युक्त तथा चमकती हुई तरंगों की पंक्ति वाली हैं।

श्लोक 135 (skanda.4.29.135)

रामणीयकरेखा च रुजारी रोगरोषिणी॥ राकारंकार्तिशमनी रम्या रोलंबराविणी

rāmaṇīyakarekhā ca rujārī rogaroṣiṇī rākāraṁkārtiśamanī ramyā rolaṁbarāviṇī

वे सौंदर्य की रेखा तथा रोगों की शत्रु एवं रोग पर क्रुद्ध रहने वाली हैं। वे पूर्णिमा के दिन की पीड़ा को शांत करने वाली, रमणीय तथा भ्रमरों की गुंजार से गूँजने वाली हैं।

श्लोक 136 (skanda.4.29.136)

रागिणीरंजितशिवा रूपलावण्यशेवधिः॥ लोकप्रसूर्लोकवंद्या लोलत्कल्लोलमालिनी॥ लीलावती लोकभूमिर्लोकलोचनचंद्रिका॥ लेखस्रवंती लटभा लघुवेगा लघुत्वहृत्

rāgiṇīraṁjitaśivā rūpalāvaṇyaśevadhiḥ lokaprasūrlokavaṁdyā lolatkallolamālinī līlāvatī lokabhūmirlokalocanacaṁdrikā lekhasravaṁtī laṭabhā laghuvegā laghutvahṛt

वे शिव को अनुरागपूर्वक प्रसन्न करने वाली तथा रूप-लावण्य की निधि हैं। वे संसार को जन्म देने वाली, लोक-वंदित तथा लहराती तरंगों की माला वाली हैं। वे लीलामयी, संसार की भूमि तथा जगत के नेत्रों की चंद्रिका हैं। वे रेखाओं के समान प्रवाहित होने वाली, मनोहर, तीव्रगामिनी तथा क्षुद्रता को दूर करने वाली हैं।

श्लोक 137 (skanda.4.29.137)

लास्यत्तरंगहस्ता च ललिता लयभंगिगा॥ लोकबंधुर्लोकधात्री लोकोत्तरगुणोर्जिता

lāsyattaraṁgahastā ca lalitā layabhaṁgigā lokabaṁdhurlokadhātrī lokottaraguṇorjitā

वे नृत्य करती तरंगों को हाथों-सम धारण करने वाली, ललित तथा प्रलय की लयबद्ध गति वाली हैं। वे संसार की सखी, संसार की पालनकर्त्री तथा लोकोत्तर गुणों से युक्त हैं।

श्लोक 138 (skanda.4.29.138)

लोकत्रयहिता लोका लक्ष्मीर्लक्षणलक्षिता॥ लीलालक्षितनिर्वाणा लावण्यामृतवर्षिणी

lokatrayahitā lokā lakṣmīrlakṣaṇalakṣitā līlālakṣitanirvāṇā lāvaṇyāmṛtavarṣiṇī

वे तीनों लोकों का हित करने वाली, स्वयं लोक-स्वरूपा, लक्ष्मी तथा शुभ लक्षणों से चिह्नित हैं। वे अपनी लीला से ही निर्वाण को प्रकट करने वाली तथा लावण्य के अमृत की वर्षा करने वाली हैं।

श्लोक 139 (skanda.4.29.139)

वैश्वानरी वासवेड्या वंध्यत्वपरिहारिणी॥ वासुदेवांघ्रिरेणुघ्नी वज्रिवज्रनिवारिणी

vaiśvānarī vāsaveḍyā vaṁdhyatvaparihāriṇī vāsudevāṁghrireṇughnī vajrivajranivāriṇī

वे सर्वव्यापी अग्नि-सी, इंद्र द्वारा स्तुत तथा बांझपन को दूर करने वाली हैं। वे वासुदेव के चरणों की धूलि से पाप का हरण करने वाली तथा इंद्र के वज्र को भी रोकने वाली हैं।

श्लोक 140 (skanda.4.29.140)

शुभावती शुभफला शांतिः शांतनुवल्लभा॥ शूलिनी शैशववयाः शीतलाऽमृतवाहिनी

śubhāvatī śubhaphalā śāṁtiḥ śāṁtanuvallabhā śūlinī śaiśavavayāḥ śītalā'mṛtavāhinī

वे शुभ, शुभ फल देने वाली, शांति-स्वरूपा तथा शांतनु की प्रिया हैं। वे त्रिशूल धारण करने वाली, सदा युवा, शीतल तथा अमृत बहाने वाली हैं।

श्लोक 141 (skanda.4.29.141)

शोभावती शीलवती शोषिताशेषकिल्बिषा॥ शरण्या शिवदा शिष्टा शरजन्मप्रसूः शिवा

śobhāvatī śīlavatī śoṣitāśeṣakilbiṣā śaraṇyā śivadā śiṣṭā śarajanmaprasūḥ śivā

वे शोभायमान, सुशील तथा समस्त पापों को सुखा देने वाली हैं। वे शरणदायिनी, कल्याण देने वाली, अनुशासित, सरकंडों में जन्मे स्कंद की माता तथा मंगलमयी हैं।

श्लोक 142 (skanda.4.29.142)

शक्तिः शशांकविमला शमनस्वसृसंमता॥ शमा शमनमार्गघ्नी शितिकंठमहाप्रिया

śaktiḥ śaśāṁkavimalā śamanasvasṛsaṁmatā śamā śamanamārgaghnī śitikaṁṭhamahāpriyā

वे शक्ति-स्वरूपा, चंद्रमा-सी निर्मल तथा यम की बहन के समान सम्मानित हैं। वे शांति-स्वरूपा, यम के मार्ग को रोकने वाली तथा नीलकंठ शिव की परम प्रिया हैं।

श्लोक 143 (skanda.4.29.143)

शुचिः शुचिकरी शेषा शेषशायिपदोद्भवा॥ श्रीनिवास श्रुतिः श्रद्धा श्रीमती श्रीः शुभव्रता

śuciḥ śucikarī śeṣā śeṣaśāyipadodbhavā śrīnivāsa śrutiḥ śraddhā śrīmatī śrīḥ śubhavratā

वे पवित्र, पवित्र करने वाली, अनंत तथा शेषशायी विष्णु के चरण से उत्पन्न हैं। वे लक्ष्मी का निवास, वेद-स्वरूपा, श्रद्धा, शोभामयी, लक्ष्मी-स्वरूपा तथा शुभ व्रत वाली हैं।

श्लोक 144 (skanda.4.29.144)

शुद्धविद्या शुभावर्ता श्रुतानंदा श्रुतिस्तुतिः॥ शिवेतरघ्नी शबरी शांबरीरूपधारिणी

śuddhavidyā śubhāvartā śrutānaṁdā śrutistutiḥ śivetaraghnī śabarī śāṁbarīrūpadhāriṇī

वे शुद्ध विद्या, शुभ मार्ग वाली, शास्त्रों में आनंददायिनी तथा शास्त्रों में स्तुत हैं। वे अमंगल का नाश करने वाली, विनम्र शबरी-सम तथा अद्भुत माया-रूप धारण करने वाली हैं।

श्लोक 145 (skanda.4.29.145)

श्मशानशोधनी शांता शश्वच्छतधृतिष्टुता॥ शालिनी शालिशोभाढ्या शिखिवाहनगर्भभृत्॥ शंसनीयचरित्रा च शातिताशेषपातका॥ षड्गुणैश्वर्यसंपन्ना षडंगश्रुतिरूपिणी

śmaśānaśodhanī śāṁtā śaśvacchatadhṛtiṣṭutā śālinī śāliśobhāḍhyā śikhivāhanagarbhabhṛt śaṁsanīyacaritrā ca śātitāśeṣapātakā ṣaḍguṇaiśvaryasaṁpannā ṣaḍaṁgaśrutirūpiṇī

वे श्मशान को भी पवित्र करने वाली, शांत तथा सैकड़ों व्रतधारियों द्वारा सदा स्तुत हैं। वे धान्य से समृद्ध, शालि-शोभा से युक्त तथा मयूरवाहन स्कंद को गर्भ में धारण करने वाली हैं। वे प्रशंसनीय चरित्र वाली तथा समस्त पापों को क्षीण करने वाली हैं। वे षड्गुण ऐश्वर्य से संपन्न तथा षडंग वेद-स्वरूपा हैं।

श्लोक 146 (skanda.4.29.146)

षंढताहारि सलिलाष्ट्यायन्नदनदीशता॥ सरिद्वरा च सुरसा सुप्रभा सुरदीर्घिका

ṣaṁḍhatāhāri salilāṣṭyāyannadanadīśatā saridvarā ca surasā suprabhā suradīrghikā

वे नपुंसकता को दूर करने वाली, सैकड़ों नदियों और नदों से समृद्ध, नदियों में श्रेष्ठ, उत्तम रस वाली, तेजस्विनी तथा दिव्य दीर्घिका हैं।

श्लोक 147 (skanda.4.29.147)

स्वःसिंधुः सर्वदुःखघ्नी सर्वव्याधिमहौषधम्॥ सेव्यासिद्धिः सती सूक्तिः स्कंदसूश्च सरस्वती

svaḥsiṁdhuḥ sarvaduḥkhaghnī sarvavyādhimahauṣadham sevyāsiddhiḥ satī sūktiḥ skaṁdasūśca sarasvatī

वे स्वर्ग की नदी, समस्त दुःखों का नाश करने वाली तथा सभी व्याधियों की महौषधि हैं। वे सेवा के योग्य, सिद्धि-स्वरूपा, सती, सुभाषित-स्वरूपा, स्कंद की माता तथा सरस्वती हैं।

श्लोक 148 (skanda.4.29.148)

संपत्तरंगिणी स्तुत्या स्थाणुमौलिकृतालया॥ स्थैर्यदा सुभगा सौख्या स्त्रीषु सौभाग्यदायिनी

saṁpattaraṁgiṇī stutyā sthāṇumaulikṛtālayā sthairyadā subhagā saukhyā strīṣu saubhāgyadāyinī

वे संपत्ति की तरंगिणी, स्तुति के योग्य तथा स्थाणु (शिव) के मस्तक पर निवास करने वाली हैं। वे स्थिरता देने वाली, सुभगा, सुख देने वाली तथा स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं।

श्लोक 149 (skanda.4.29.149)

स्वर्गनिःश्रेणिका सूक्ष्मा स्वधा स्वाहा सुधाजला॥ समुद्ररूपिणी स्वर्ग्या सर्वपातकवैरिणी

svarganiḥśreṇikā sūkṣmā svadhā svāhā sudhājalā samudrarūpiṇī svargyā sarvapātakavairiṇī

वे स्वर्ग की सीढ़ी, सूक्ष्म, स्वधा-स्वरूपा, स्वाहा-स्वरूपा तथा अमृत-जल वाली हैं। वे समुद्र-स्वरूपा, स्वर्गीय तथा समस्त पापों की शत्रु हैं।

श्लोक 150 (skanda.4.29.150)

स्मृताघहारिणी सीता संसाराब्धितरंडिका॥ सौभाग्यसुंदरी संध्या सर्वसारसमन्विता

smṛtāghahāriṇī sītā saṁsārābdhitaraṁḍikā saubhāgyasuṁdarī saṁdhyā sarvasārasamanvitā

वे स्मरण करते ही पापों का हरण करने वाली, सीता तथा संसार-सागर से पार कराने वाली नौका हैं। वे सौभाग्य से सुंदर, संध्या-स्वरूपा तथा समस्त सार से युक्त हैं।

श्लोक 151 (skanda.4.29.151)

हरप्रिया हृपीकेशी हंसरूपा हिरण्मयी॥ हृताघसंघा हितकृद्धेला हेलाघगर्वहृत्

harapriyā hṛpīkeśī haṁsarūpā hiraṇmayī hṛtāghasaṁghā hitakṛddhelā helāghagarvahṛt

वे शिव की प्रिया, हृषीकेश-स्वरूपा, हंस-रूपा तथा स्वर्ण के समान कांतिमयी हैं। वे समस्त पापों के समूह का हरण करने वाली, हितकारिणी तथा लीलामात्र से पाप के अहंकार को नष्ट करने वाली हैं।

श्लोक 152 (skanda.4.29.152)

क्षेमदा क्षालिताघौघा क्षुद्रविद्राविणी क्षमा॥ कीर्तयित्वा नरः सम्यग्गंगास्नानफलं लभेत्

kṣemadā kṣālitāghaughā kṣudravidrāviṇī kṣamā kīrtayitvā naraḥ samyaggaṁgāsnānaphalaṁ labhet

वे कल्याण देने वाली, समस्त पापों के प्रवाह को धो डालने वाली, क्षुद्र कष्टों को दूर भगाने वाली तथा क्षमा-स्वरूपा हैं। जो मनुष्य इन नामों का भलीभाँति कीर्तन करता है, वह गंगा-स्नान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 153 (skanda.4.29.153)

सर्वपापप्रशमनं सर्वविघ्न विनाशनम्॥ सर्वस्तोत्रजपाच्छ्रेष्ठं सर्वपावनपावनम्

sarvapāpapraśamanaṁ sarvavighna vināśanam sarvastotrajapācchreṣṭhaṁ sarvapāvanapāvanam

यह स्तोत्र समस्त पापों को शांत करने वाला तथा समस्त विघ्नों का नाश करने वाला है। यह सभी स्तोत्रों के जप में श्रेष्ठ तथा पवित्रों को भी पवित्र करने वाला है।

श्लोक 154 (skanda.4.29.154)

श्रद्धयाभीष्टफलदं चतुर्वर्गसमृद्धिकृत्॥ सकृज्जपादवाप्नोति ह्येकक्रतुफलंमुने॥ सर्वतीर्थेषु यः स्नातः सर्वयज्ञेषु दीक्षितः॥ तस्य यत्फलमुद्दिष्टं त्रिकालपठनाच्च तत्

śraddhayābhīṣṭaphaladaṁ caturvargasamṛddhikṛt sakṛjjapādavāpnoti hyekakratuphalaṁmune sarvatīrtheṣu yaḥ snātaḥ sarvayajñeṣu dīkṣitaḥ tasya yatphalamuddiṣṭaṁ trikālapaṭhanācca tat

श्रद्धापूर्वक जपने पर यह अभीष्ट फल देने वाला तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चारों वर्गों की समृद्धि करने वाला है। हे मुनि! केवल एक बार जप करने से ही मनुष्य एक यज्ञ का फल पा लेता है। जो फल समस्त तीर्थों में स्नान करने वाले तथा समस्त यज्ञों में दीक्षित व्यक्ति को कहा गया है, वही फल इसे तीनों समय पढ़ने से प्राप्त होता है।

श्लोक 155 (skanda.4.29.155)

सर्वव्रतेषु यत्पुण्यं सम्यक्चीर्णेषु वाडव॥ तत्फलं समवाप्नोति त्रिसंध्यं नियतः पठन्

sarvavrateṣu yatpuṇyaṁ samyakcīrṇeṣu vāḍava tatphalaṁ samavāpnoti trisaṁdhyaṁ niyataḥ paṭhan

हे विप्र! समस्त व्रतों को भली-भाँति पालन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही फल नियमपूर्वक तीनों संध्याओं में इसका पाठ करने वाले को मिलता है।

श्लोक 156 (skanda.4.29.156)

स्नानकाले पठेद्यस्तु यत्रकुत्र जलाशये॥ तत्र सन्निहिता नूनं गंगा त्रिपथगा मुने

snānakāle paṭhedyastu yatrakutra jalāśaye tatra sannihitā nūnaṁ gaṁgā tripathagā mune

जो व्यक्ति स्नान के समय किसी भी जलाशय में इसका पाठ करता है, हे मुनि! वहाँ त्रिपथगा गंगा निश्चय ही उपस्थित हो जाती हैं।

श्लोक 157 (skanda.4.29.157)

श्रेयोर्थी लभते श्रेयो धनार्थी लभते धनम्॥ कामी कामानवाप्नोति मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्

śreyorthī labhate śreyo dhanārthī labhate dhanam kāmī kāmānavāpnoti mokṣārthī mokṣamāpnuyāt

कल्याण चाहने वाला कल्याण पाता है, धन चाहने वाला धन पाता है, भोग चाहने वाला भोग पाता है तथा मोक्ष चाहने वाला मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 158 (skanda.4.29.158)

वर्षं त्रिकालपठनाच्छ्रद्धया शुचिमानसः॥ ऋतुकालाभिगमनादपुत्रः पुत्रवान्भवेत्

varṣaṁ trikālapaṭhanācchraddhayā śucimānasaḥ ṛtukālābhigamanādaputraḥ putravānbhavet

एक वर्ष तक श्रद्धापूर्वक शुद्ध मन से तीनों समय इसका पाठ करने तथा ऋतुकाल में पत्नी के पास जाने से निःसंतान पुरुष भी पुत्रवान हो जाता है।

श्लोक 159 (skanda.4.29.159)

नाकालमरणं तस्य नाग्निचोराहि साध्वसम्॥ नाम्नां सहस्रं गंगाया यो जपेच्छ्रद्धया मुने

nākālamaraṇaṁ tasya nāgnicorāhi sādhvasam nāmnāṁ sahasraṁ gaṁgāyā yo japecchraddhayā mune

हे मुनि! जो श्रद्धापूर्वक गंगा के इन सहस्र नामों का जप करता है, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती तथा उसे अग्नि, चोर और सर्प का भय नहीं रहता।

श्लोक 160 (skanda.4.29.160)

गंगा नाम सहस्रं तु जप्त्वा ग्रामांतरं व्रजेत्॥ कार्यसिद्धिमवाप्नोति निर्विघ्नो गेहमाविशेत्

gaṁgā nāma sahasraṁ tu japtvā grāmāṁtaraṁ vrajet kāryasiddhimavāpnoti nirvighno gehamāviśet

गंगा के सहस्र नामों का जप करके जो अन्य ग्राम की ओर प्रस्थान करता है, वह अपने कार्य में सिद्धि पाता है तथा निर्विघ्न रूप से घर लौट आता है।

श्लोक 161 (skanda.4.29.161)

तिथिवारर्क्षयोगानां न दोषः प्रभवेत्तदा॥ यदा जप्त्वा व्रजेदेतत्स्तोत्रं ग्रामांतरं नरः

tithivārarkṣayogānāṁ na doṣaḥ prabhavettadā yadā japtvā vrajedetatstotraṁ grāmāṁtaraṁ naraḥ

जब मनुष्य इस स्तोत्र का जप करके अन्य ग्राम की ओर प्रस्थान करता है, तब तिथि, वार, नक्षत्र अथवा योग का कोई दोष उसे प्रभावित नहीं करता।

श्लोक 162 (skanda.4.29.162)

आयुरारोग्यजननं सर्वोपद्रवनाशनम्॥ सर्वसिद्धिकरं पुंसां गंगानामसहस्रकम्

āyurārogyajananaṁ sarvopadravanāśanam sarvasiddhikaraṁ puṁsāṁ gaṁgānāmasahasrakam

गंगा का यह सहस्रनाम आयु और आरोग्य को उत्पन्न करने वाला, समस्त उपद्रवों का नाश करने वाला तथा मनुष्यों को सभी सिद्धियाँ देने वाला है।

श्लोक 163 (skanda.4.29.163)

जन्मांतर सहस्रेषु यत्पापं सम्यगर्जितम्॥ गंगानामसहस्रस्य जपनात्तत्क्षयं व्रजेत्॥ ब्रह्मघ्नो मद्यपः स्वर्णस्तेयी च गुरुतल्पगः॥ तत्संयोगी भ्रूणहंता मातृहा पितृहा मुने

janmāṁtara sahasreṣu yatpāpaṁ samyagarjitam gaṁgānāmasahasrasya japanāttatkṣayaṁ vrajet brahmaghno madyapaḥ svarṇasteyī ca gurutalpagaḥ tatsaṁyogī bhrūṇahaṁtā mātṛhā pitṛhā mune

हजारों पूर्वजन्मों में अर्जित किया गया पाप भी गंगा के सहस्रनाम के जप से क्षीण हो जाता है। हे मुनि! ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, स्वर्णचोर, गुरुपत्नीगामी, ऐसे व्यक्ति का साथ देने वाला, गर्भहत्यारा, मातृहंता तथा पितृहंता —

श्लोक 164 (skanda.4.29.164)

विश्वासघाती गरदः कृतघ्नो मित्रघातकः॥ अग्निदो गोवधकरो गुरुद्रव्यापहारकः

viśvāsaghātī garadaḥ kṛtaghno mitraghātakaḥ agnido govadhakaro gurudravyāpahārakaḥ

विश्वासघाती, विषदाता, कृतघ्न, मित्रघातक, अग्निदाता (घर जलाने वाला), गोवधकर्ता तथा गुरु की संपत्ति का अपहरण करने वाला —

श्लोक 165 (skanda.4.29.165)

महापातकयुक्तोपि संयुक्तोप्युपपातकैः॥ मुच्यते श्रद्धया जप्त्वा गंगा नाम सहस्रकम्

mahāpātakayuktopi saṁyuktopyupapātakaiḥ mucyate śraddhayā japtvā gaṁgā nāma sahasrakam

— ऐसा व्यक्ति भी, चाहे महापातकों से युक्त हो अथवा उपपातकों से भी संयुक्त हो, श्रद्धापूर्वक गंगा के सहस्रनाम का जप करके मुक्त हो जाता है।

श्लोक 166 (skanda.4.29.166)

आधिव्याधिपरिक्षिप्तो घोर ताप परिप्लुतः॥ मुच्यते सर्वदुःखेभ्यः स्तवस्यास्यानुकीर्तनात्

ādhivyādhiparikṣipto ghora tāpa pariplutaḥ mucyate sarvaduḥkhebhyaḥ stavasyāsyānukīrtanāt

मानसिक और शारीरिक व्याधियों से घिरा हुआ तथा घोर संताप में डूबा हुआ व्यक्ति भी इस स्तोत्र के अनुकीर्तन से समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 167 (skanda.4.29.167)

संवत्सरेण युक्तात्मा पठन्भक्तिपरायणः॥ अभीप्सितां लभेत्सिद्धिं सर्वैः पापैः प्रमुच्यते

saṁvatsareṇa yuktātmā paṭhanbhaktiparāyaṇaḥ abhīpsitāṁ labhetsiddhiṁ sarvaiḥ pāpaiḥ pramucyate

एक वर्ष तक संयमित चित्त से भक्तिपूर्वक इसका पाठ करने वाला अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 168 (skanda.4.29.168)

संशयाविष्टचित्तस्य धर्मविद्वेषिणोपि च॥ दांभिकस्यापि हिंस्रस्य चेतो धर्मपरं भवेत्

saṁśayāviṣṭacittasya dharmavidveṣiṇopi ca dāṁbhikasyāpi hiṁsrasya ceto dharmaparaṁ bhavet

संशयग्रस्त चित्त वाले, धर्म से द्वेष करने वाले, दांभिक तथा हिंसक व्यक्ति का भी मन इससे धर्मपरायण हो जाता है।

श्लोक 169 (skanda.4.29.169)

वर्णाश्रमपथीनस्तु कामक्रोधविवर्जितः॥ यत्फलं लभते ज्ञानी तदाप्नोत्यस्य कीर्तनात्

varṇāśramapathīnastu kāmakrodhavivarjitaḥ yatphalaṁ labhate jñānī tadāpnotyasya kīrtanāt

वर्णाश्रम के मार्ग पर चलने वाला, काम-क्रोध से रहित ज्ञानी पुरुष जो फल प्राप्त करता है, वही फल इसके कीर्तन से प्राप्त होता है।

श्लोक 170 (skanda.4.29.170)

गायत्र्ययुतजप्येन यत्फलं समुपार्जितम्॥ सकृत्पठनतः सम्यक्तदशेषमवाप्नुयात्

gāyatryayutajapyena yatphalaṁ samupārjitam sakṛtpaṭhanataḥ samyaktadaśeṣamavāpnuyāt

गायत्री के दस हजार जप से जो फल अर्जित होता है, वह संपूर्ण फल इसके एक बार पाठ करने से ही प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 171 (skanda.4.29.171)

गां दत्त्वा वेदविदुषे यत्फलं लभते कृती॥ तत्पुण्यं सम्यगाख्यातं स्तवराजसकृज्जपात्

gāṁ dattvā vedaviduṣe yatphalaṁ labhate kṛtī tatpuṇyaṁ samyagākhyātaṁ stavarājasakṛjjapāt

वेदविद्वान को गौ दान करने से पुण्यात्मा को जो फल मिलता है, वही पुण्य इस स्तवराज के एक बार जप से भलीभाँति प्राप्त होता है।

श्लोक 172 (skanda.4.29.172)

गुरुशुश्रूषणं कुर्वन्यावज्जीवं नरोत्तमः॥ यत्पुण्यमर्जयेत्तद्भाग्वर्षं त्रिषवणं जपन्॥ वेदपारायणात्पुण्यं यदत्र परिपठ्यते॥ तत्षण्मासेन लभते त्रिसंध्यं परिकीर्तनात्

guruśuśrūṣaṇaṁ kurvanyāvajjīvaṁ narottamaḥ yatpuṇyamarjayettadbhāgvarṣaṁ triṣavaṇaṁ japan vedapārāyaṇātpuṇyaṁ yadatra paripaṭhyate tatṣaṇmāsena labhate trisaṁdhyaṁ parikīrtanāt

आजीवन गुरु की सेवा करने वाला श्रेष्ठ पुरुष जो पुण्य अर्जित करता है, वही पुण्य एक वर्ष तक तीनों समय इसका जप करने वाला प्राप्त करता है। संपूर्ण वेद के पारायण से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह छह महीने तक तीनों संध्याओं में इसका कीर्तन करने से मिल जाता है।

श्लोक 173 (skanda.4.29.173)

गंगायाः स्तवराजस्य प्रत्यहं परिशीलनात्॥ शिवभक्तिमवाप्नोति विष्णुभक्तोऽथवा भवेत्

gaṁgāyāḥ stavarājasya pratyahaṁ pariśīlanāt śivabhaktimavāpnoti viṣṇubhakto'thavā bhavet

गंगा के इस स्तवराज का प्रतिदिन अभ्यास करने से मनुष्य शिवभक्ति प्राप्त करता है, अथवा विष्णुभक्त बन जाता है।

श्लोक 174 (skanda.4.29.174)

यः कीर्तयेदनुदिनं गंगानामसहस्रकम्॥ तत्समीपे सहचरी गंगादेवी सदा भवेत्

yaḥ kīrtayedanudinaṁ gaṁgānāmasahasrakam tatsamīpe sahacarī gaṁgādevī sadā bhavet

जो प्रतिदिन गंगा के सहस्रनाम का कीर्तन करता है, उसके निकट देवी गंगा सदा सहचरी के रूप में रहती हैं।

श्लोक 175 (skanda.4.29.175)

सर्वत्र पूज्यो भवति सर्वत्र विजयी भवेत्॥ सर्वत्र सुखमाप्नोति जाह्नवीस्तोत्रपाठतः

sarvatra pūjyo bhavati sarvatra vijayī bhavet sarvatra sukhamāpnoti jāhnavīstotrapāṭhataḥ

जाह्नवी के इस स्तोत्र के पाठ से मनुष्य सर्वत्र पूजनीय बनता है, सर्वत्र विजयी होता है तथा सर्वत्र सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 176 (skanda.4.29.176)

सदाचारी स विज्ञेयः सशुचिस्तु सदैव हि॥ कृतसर्वसुरार्चः स कीर्तयेद्य इमां स्तुतिम्

sadācārī sa vijñeyaḥ saśucistu sadaiva hi kṛtasarvasurārcaḥ sa kīrtayedya imāṁ stutim

जो इस स्तुति का कीर्तन करता है, वह सदाचारी, सदा पवित्र तथा मानो समस्त देवताओं का पूजक जानना चाहिए।

श्लोक 177 (skanda.4.29.177)

तस्मिंस्तृप्ते भवेत्तृप्ता जाह्नवी नात्र संशयः॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गंगाभक्तं समर्चयेत्

tasmiṁstṛpte bhavettṛptā jāhnavī nātra saṁśayaḥ tasmātsarvaprayatnena gaṁgābhaktaṁ samarcayet

उसके तृप्त होने पर जाह्नवी स्वयं तृप्त होती हैं, इसमें कोई संशय नहीं। अतः पूर्ण प्रयत्न से गंगा-भक्त का सम्मान करना चाहिए।

श्लोक 178 (skanda.4.29.178)

स्तवराजमिमं गांगं शृणुयाद्यश्च वै पठेत्॥ श्रावयेदथ तद्भक्तान्दंभलोभ विवर्जितः

stavarājamimaṁ gāṁgaṁ śṛṇuyādyaśca vai paṭhet śrāvayedatha tadbhaktāndaṁbhalobha vivarjitaḥ

जो इस गांगेय स्तवराज को सुनता है अथवा पढ़ता है, तथा दंभ और लोभ से रहित होकर गंगा-भक्तों को सुनाता है —

श्लोक 179 (skanda.4.29.179)

मुच्यते त्रिविधैः पापैर्मनोवाक्काय संभवैः॥ क्षणान्निष्पापतामेति पितॄणां च प्रियो भवेत्

mucyate trividhaiḥ pāpairmanovākkāya saṁbhavaiḥ kṣaṇānniṣpāpatāmeti pitṝṇāṁ ca priyo bhavet

— वह मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न तीनों प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है, क्षणभर में निष्पाप हो जाता है तथा अपने पितरों का प्रिय बन जाता है।

श्लोक 180 (skanda.4.29.180)

सर्वदेवप्रियश्चापि सर्वर्षिगणसंमतः॥ अंते विमानमारुह्य दिव्यस्त्रीशतसंवृतः

sarvadevapriyaścāpi sarvarṣigaṇasaṁmataḥ aṁte vimānamāruhya divyastrīśatasaṁvṛtaḥ

वह सभी देवताओं का प्रिय तथा समस्त ऋषिगणों द्वारा सम्मानित होता है। अंत में दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, सैकड़ों दिव्य स्त्रियों से घिरा हुआ —

श्लोक 181 (skanda.4.29.181)

दिव्याभरणसंपन्नो दिव्यभोगसमन्वितः॥ नंदनादिवने स्वैरं देववत्स प्रमोदते॥ भुज्यमानेषु विप्रेषु श्राद्धकाले विशेषतः॥ जपन्निदं महास्तोत्रं पितॄणां तृप्तिकारकम्

divyābharaṇasaṁpanno divyabhogasamanvitaḥ naṁdanādivane svairaṁ devavatsa pramodate bhujyamāneṣu vipreṣu śrāddhakāle viśeṣataḥ japannidaṁ mahāstotraṁ pitṝṇāṁ tṛptikārakam

— दिव्य आभूषणों से सुसज्जित तथा दिव्य भोगों से युक्त होकर, वह देवपुत्र के समान नंदनवन आदि में स्वच्छंद विहार करता है। विशेष रूप से श्राद्ध के समय, जब ब्राह्मण भोजन कर रहे हों, तब इस महास्तोत्र का जप पितरों को तृप्ति देने वाला होता है।

श्लोक 182 (skanda.4.29.182)

यावंति तत्र सिक्थानि यावंतोंऽबुकणाः स्थिताः॥ तावंत्येव हि वर्षाणि मोदंते स्वः पितामहाः

yāvaṁti tatra sikthāni yāvaṁtoṁ'bukaṇāḥ sthitāḥ tāvaṁtyeva hi varṣāṇi modaṁte svaḥ pitāmahāḥ

उस श्राद्ध में जितने अन्न-कण तथा जितनी जल-बूँदें होती हैं, उतने ही वर्षों तक स्वर्गस्थ पितर आनंदित रहते हैं।

श्लोक 183 (skanda.4.29.183)

यथा प्रीणंति पितरो गंगायां पिंडदानतः॥ तथैव तृप्नुयुः श्राद्धे स्तवस्यास्यानुसंश्रवात्

yathā prīṇaṁti pitaro gaṁgāyāṁ piṁḍadānataḥ tathaiva tṛpnuyuḥ śrāddhe stavasyāsyānusaṁśravāt

जिस प्रकार गंगा में पिंडदान करने से पितर प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार श्राद्ध में इस स्तोत्र के श्रवण से भी वे तृप्त हो जाते हैं।

श्लोक 184 (skanda.4.29.184)

एतत्स्तोत्रं गृहे यस्य लिखितं परिपूज्यते॥ तत्र पापभयं नास्ति शुचि तद्भवनं सदा

etatstotraṁ gṛhe yasya likhitaṁ paripūjyate tatra pāpabhayaṁ nāsti śuci tadbhavanaṁ sadā

जिसके घर में लिखित यह स्तोत्र भलीभाँति पूजा जाता है, वहाँ पाप का भय नहीं रहता तथा वह घर सदा पवित्र रहता है।

श्लोक 185 (skanda.4.29.185)

अगस्ते किंबहूक्तेन शृणु मे निश्चितं वचः॥ संशयो नात्र कर्तव्यः संदिग्धेरफलं नहि

agaste kiṁbahūktena śṛṇu me niścitaṁ vacaḥ saṁśayo nātra kartavyaḥ saṁdigdheraphalaṁ nahi

हे अगस्त्य! बहुत कहने से क्या लाभ, तुम मेरा निश्चित वचन सुनो। इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए, क्योंकि संदेह करने पर फल नहीं मिलता।

श्लोक 186 (skanda.4.29.186)

यावंति मर्त्ये स्तोत्राणि मंत्रजालान्यनेकशः॥ तावंति स्तवराजस्य गांगेयस्य समानि न

yāvaṁti martye stotrāṇi maṁtrajālānyanekaśaḥ tāvaṁti stavarājasya gāṁgeyasya samāni na

मृत्युलोक में जितने भी स्तोत्र और अनेक प्रकार के मंत्र-समूह हैं, वे सब मिलकर भी गंगा के इस स्तवराज के समान नहीं हैं।

श्लोक 187 (skanda.4.29.187)

यावज्जन्म जपेद्यस्तु नाम्नामेतत्सहस्रकम्॥ स कीकटेष्वपि मृतो न पुनर्गर्भमाविशेत्

yāvajjanma japedyastu nāmnāmetatsahasrakam sa kīkaṭeṣvapi mṛto na punargarbhamāviśet

जो व्यक्ति जीवनभर इन सहस्र नामों का जप करता है, वह कीकट देश में मरने पर भी पुनः गर्भ में प्रवेश नहीं करता।

श्लोक 188 (skanda.4.29.188)

नित्यं नियमवानेतद्यो जपेत्स्तोत्रमुत्तमम्॥ अन्यत्रापि विपन्नः स गंगातीरे मृतो भवेत्

nityaṁ niyamavānetadyo japetstotramuttamam anyatrāpi vipannaḥ sa gaṁgātīre mṛto bhavet

जो नियमपूर्वक प्रतिदिन इस उत्तम स्तोत्र का जप करता है, वह अन्यत्र मरने पर भी मानो गंगा तट पर ही मृत्यु को प्राप्त हुआ समझा जाता है।

श्लोक 189 (skanda.4.29.189)

एतत्स्तोत्रवरं रम्यं पुरा प्रोक्तं पिनाकिना॥ विष्णवे निजभक्ताय मुक्तिबीजाक्षरास्पदम्

etatstotravaraṁ ramyaṁ purā proktaṁ pinākinā viṣṇave nijabhaktāya muktibījākṣarāspadam

यह श्रेष्ठ एवं रमणीय स्तोत्र पूर्वकाल में पिनाकी शिव द्वारा अपने भक्त विष्णु को कहा गया था, जो मुक्ति के बीजाक्षरों का आश्रय है।

श्लोक 190 (skanda.4.29.190)

गंगास्नानप्रतिनिधिः स्तोत्रमेतन्मयेरितम्॥ सिस्नासुर्जाह्नवीं तस्मादेतत्स्तोत्रं जपेत्सुधीः

gaṁgāsnānapratinidhiḥ stotrametanmayeritam sisnāsurjāhnavīṁ tasmādetatstotraṁ japetsudhīḥ

यह स्तोत्र मैंने गंगा-स्नान के प्रतिनिधि रूप में कहा है। अतः जाह्नवी में स्नान करने का इच्छुक बुद्धिमान पुरुष इस स्तोत्र का जप करे।

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