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काशी खण्ड · अध्याय 30

वाराणसी-महिमावर्णन

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (skanda.4.30.1)

॥ स्कंद उवाच॥ शृण्वगस्त्यमहाभाग स च राजा भगीरथः॥ आराध्य श्रीमहादेवमुद्दिधीर्षुः पितामहान्

skaṁda uvāca śṛṇvagastyamahābhāga sa ca rājā bhagīrathaḥ ārādhya śrīmahādevamuddidhīrṣuḥ pitāmahān

स्कंद ने कहा — हे महाभाग अगस्त्य! सुनो। वह राजा भगीरथ, श्री महादेव की आराधना करके अपने पूर्वजों का उद्धार करने की इच्छा से,

श्लोक 2 (skanda.4.30.2)

ब्रह्मशाप विनिर्दग्धान्सर्वान्राजर्षिसत्तमः॥ महता तपसा भूमिमानिनाय त्रिवर्त्मगाम्

brahmaśāpa vinirdagdhānsarvānrājarṣisattamaḥ mahatā tapasā bhūmimānināya trivartmagām

ब्रह्मशाप से भस्म हुए अपने समस्त पूर्वजों के लिए, उस श्रेष्ठ राजर्षि ने महान तप के द्वारा त्रिपथगा गंगा को पृथ्वी पर उतारा।

श्लोक 3 (skanda.4.30.3)

त्रयाणामपि लोकानां हिताय महते नृपः॥ समानैषीत्ततो गंगां यत्रासीन्मणिकर्णिका

trayāṇāmapi lokānāṁ hitāya mahate nṛpaḥ samānaiṣīttato gaṁgāṁ yatrāsīnmaṇikarṇikā

तीनों लोकों के महान हित के लिए, उस राजा ने फिर गंगा को वहाँ ले जाया जहाँ मणिकर्णिका स्थित थी।

श्लोक 4 (skanda.4.30.4)

आनंदकाननं शंभोश्चक्रपुष्करिणी हरेः॥ परब्रह्मैकसुक्षेत्रं लीलामोक्षसमर्पकम्

ānaṁdakānanaṁ śaṁbhoścakrapuṣkariṇī hareḥ parabrahmaikasukṣetraṁ līlāmokṣasamarpakam

वह शिव का आनंदकानन, विष्णु की चक्रपुष्करिणी, परब्रह्म का एकमात्र पवित्र क्षेत्र तथा लीलामात्र से मोक्ष देने वाला स्थान है।

श्लोक 5 (skanda.4.30.5)

प्रापयामास तां गंगां दैलीपिः पुरतश्चरन्॥ निर्वाणकाशनाद्यत्र काशीति प्रथिता पुरी

prāpayāmāsa tāṁ gaṁgāṁ dailīpiḥ purataścaran nirvāṇakāśanādyatra kāśīti prathitā purī

दिलीप के पुत्र भगीरथ ने आगे-आगे चलकर उस गंगा को वहाँ पहुँचाया, जहाँ निर्वाण के प्रकाशित होने के कारण नगरी 'काशी' नाम से विख्यात हुई।

श्लोक 6 (skanda.4.30.6)

अविमुक्तं महाक्षेत्रं न मुक्तं शंभुना क्वचित॥ प्रागेव हि मुनेऽनर्घ्यं जात्यं जांबूनदं स्वयम्

avimuktaṁ mahākṣetraṁ na muktaṁ śaṁbhunā kvacita prāgeva hi mune'narghyaṁ jātyaṁ jāṁbūnadaṁ svayam

यह महाक्षेत्र 'अविमुक्त' कहलाता है क्योंकि यह शंभु द्वारा कभी नहीं त्यागा जाता। हे मुने! गंगा के आगमन से पहले भी यह स्वयं ही अमूल्य, शुद्ध स्वर्ण के समान था।

श्लोक 7 (skanda.4.30.7)

पुनर्वारितरेणापि हीरेणयदि संगतम्॥ चक्रपुष्करणीतीर्थं प्रागेव श्रेयसांपदम्

punarvāritareṇāpi hīreṇayadi saṁgatam cakrapuṣkaraṇītīrthaṁ prāgeva śreyasāṁpadam

और यदि वह पुनः जल में स्थित हीरे से भी युक्त हो जाए, तो चक्रपुष्करिणी तीर्थ तो पहले से ही कल्याण का धाम था।

श्लोक 8 (skanda.4.30.8)

ततः श्रेष्ठतरं शंभोर्मणिश्रवणभूषणात्॥ आनंदकानने तस्मिन्नविमुक्ते शिवालये

tataḥ śreṣṭhataraṁ śaṁbhormaṇiśravaṇabhūṣaṇāt ānaṁdakānane tasminnavimukte śivālaye

फिर शंभु के कर्णाभूषण मणि से भी श्रेष्ठतर वह उस आनंदकानन में, उस अविमुक्त शिवालय में स्थित हुआ।

श्लोक 9 (skanda.4.30.9)

प्रागेव मुक्तिः संसिद्धा गंगासंगात्ततोधिका॥ यदा प्रभृति सा गंगा मणिकर्ण्यां समागता

prāgeva muktiḥ saṁsiddhā gaṁgāsaṁgāttatodhikā yadā prabhṛti sā gaṁgā maṇikarṇyāṁ samāgatā

वहाँ पहले भी मुक्ति सिद्ध थी, गंगा के संगम से वह और भी अधिक हो गई। जब से वह गंगा मणिकर्णिका में आ मिली,

श्लोक 10 (skanda.4.30.10)

तदाप्रभृति तत्क्षेत्रं दुष्प्रापं त्रिदशैरपि॥ कृत्वा कर्माण्यनेकानि कल्याणानीतराणि वा॥ तानि क्षणात्समुत्क्षिप्य काशीसंस्थोऽमृतोभवेत्॥ तस्यां वेदांतवेद्यस्य निदिध्यासनतो विना

tadāprabhṛti tatkṣetraṁ duṣprāpaṁ tridaśairapi kṛtvā karmāṇyanekāni kalyāṇānītarāṇi vā tāni kṣaṇātsamutkṣipya kāśīsaṁstho'mṛtobhavet tasyāṁ vedāṁtavedyasya nididhyāsanato vinā

तब से वह क्षेत्र देवताओं के लिए भी दुर्लभ हो गया। अनेक कर्म, चाहे शुभ हों या अन्य, उन सबको एक क्षण में त्याग कर, काशी में स्थित मनुष्य अमर हो जाता है — वेदांत से ज्ञातव्य तत्त्व के निदिध्यासन के बिना भी।

श्लोक 11 (skanda.4.30.11)

विना सांख्येन योगेन काश्यां संस्थोऽमृतो भवेत्॥ कर्मनिर्मूलनवता विना ज्ञानेन कुंभज

vinā sāṁkhyena yogena kāśyāṁ saṁstho'mṛto bhavet karmanirmūlanavatā vinā jñānena kuṁbhaja

सांख्य योग के बिना भी काशी में स्थित मनुष्य अमर हो जाता है। हे कुंभज! कर्मों की जड़ उखाड़ने वाले ज्ञान के बिना भी वह अमर हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.4.30.12)

शशिमौलिप्रसादेन काशीसंस्थोऽमृतो भवेत्॥ यत्नतोऽयत्नतो वापि कालात्त्यक्त्वा कलेवरम्

śaśimauliprasādena kāśīsaṁstho'mṛto bhavet yatnato'yatnato vāpi kālāttyaktvā kalevaram

केवल चंद्रशेखर शिव की कृपा से काशी में स्थित मनुष्य अमर हो जाता है — चाहे प्रयत्नपूर्वक हो या बिना प्रयत्न के, समय आने पर शरीर त्यागकर।

श्लोक 13 (skanda.4.30.13)

तारकस्योपदेशेन काशीसंस्थोऽमृतो भवेत्॥ अनेकजन्मसंसिद्धैर्बद्धोऽपि प्राकृतैर्गुणैः

tārakasyopadeśena kāśīsaṁstho'mṛto bhavet anekajanmasaṁsiddhairbaddho'pi prākṛtairguṇaiḥ

तारक मंत्र के उपदेश से काशी में स्थित मनुष्य अमर हो जाता है — भले ही वह अनेक जन्मों से संचित प्राकृतिक गुणों से बँधा हो।

श्लोक 14 (skanda.4.30.14)

असिसंभेद योगेन काशीसंस्थोऽमृतो भवेत्॥ देहत्यागोऽत्र वै दानं देहत्यागोत्र वै तपः

asisaṁbheda yogena kāśīsaṁstho'mṛto bhavet dehatyāgo'tra vai dānaṁ dehatyāgotra vai tapaḥ

असि नदी के संगम पर हुए महायोग से काशी में स्थित मनुष्य अमर हो जाता है। यहाँ शरीर त्यागना ही दान है, यहाँ शरीर त्यागना ही तप है।

श्लोक 15 (skanda.4.30.15)

देहत्यागोऽत्र वै योगः काश्यां निर्वाणसौख्यकृत्॥ प्राप्योत्तरवहां काश्यामतिदुष्कृतवानपि

dehatyāgo'tra vai yogaḥ kāśyāṁ nirvāṇasaukhyakṛt prāpyottaravahāṁ kāśyāmatiduṣkṛtavānapi

यहाँ शरीर त्यागना ही योग है, जो काशी में निर्वाण का सुख देने वाला है। उत्तरवाहिनी गंगा वाली काशी को प्राप्त करके, अत्यंत पापी व्यक्ति भी,

श्लोक 16 (skanda.4.30.16)

यायात्स्वं हेलया त्यक्त्वा तद्विष्णोः परमं पदम्॥ यमेंद्राग्निमुखा देवा दृष्ट्वा मुक्तिपथोन्मुखान्

yāyātsvaṁ helayā tyaktvā tadviṣṇoḥ paramaṁ padam yameṁdrāgnimukhā devā dṛṣṭvā muktipathonmukhān

सहजता से अपने शरीर को त्यागकर विष्णु के उस परम पद को प्राप्त हो जाता है। यम, इंद्र, अग्नि आदि देवता मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर आत्माओं को देखकर,

श्लोक 17 (skanda.4.30.17)

सर्वान्सर्वे समालोक्य रक्षां चक्रुः पुरापुरः॥ असिं महासिरूपां च पाप्यसन्मतिखंडनीम्

sarvānsarve samālokya rakṣāṁ cakruḥ purāpuraḥ asiṁ mahāsirūpāṁ ca pāpyasanmatikhaṁḍanīm

सबने मिलकर उस नगरी के चारों ओर रक्षा की व्यवस्था की। उन्होंने पापियों की दुर्बुद्धि को खंडित करने वाली महान तलवार के समान असि नदी बनाई,

श्लोक 18 (skanda.4.30.18)

दुष्टप्रवेशं धुन्वानां धुनीं देवा विनिर्ममुः॥ वरणां च व्यधुस्तत्र क्षेत्रविघ्ननिवारिणीम्

duṣṭapraveśaṁ dhunvānāṁ dhunīṁ devā vinirmamuḥ varaṇāṁ ca vyadhustatra kṣetravighnanivāriṇīm

जो दुष्टों के प्रवेश को हिला डालने वाली धुनी है; और देवताओं ने वहाँ वरणा नदी को भी बनाया, जो क्षेत्र के विघ्नों को दूर करने वाली है।

श्लोक 19 (skanda.4.30.19)

दुर्वृत्तसुप्रवृत्तेश्च निवृत्तिकरणीं सुराः॥ दक्षिणोत्तरदिग्भागे कृत्वाऽसिं वरणां सुराः॥ क्षेत्रस्य मोक्षनिक्षेप रक्षां निर्वृतिमाप्नुयुः॥ क्षेत्रस्य पश्चाद्दिग्भागे तं देहलिविनायकम्

durvṛttasupravṛtteśca nivṛttikaraṇīṁ surāḥ dakṣiṇottaradigbhāge kṛtvā'siṁ varaṇāṁ surāḥ kṣetrasya mokṣanikṣepa rakṣāṁ nirvṛtimāpnuyuḥ kṣetrasya paścāddigbhāge taṁ dehalivināyakam

यह दुराचार को रोककर सदाचार में प्रवृत्त करने वाली है। दक्षिण और उत्तर दिशा में असि और वरणा को स्थापित कर देवताओं ने क्षेत्र में रखी मोक्ष की निधि की रक्षा कर शांति प्राप्त की। क्षेत्र के पश्चिम दिशा भाग में उन्होंने देहली-विनायक को,

श्लोक 20 (skanda.4.30.20)

स्वयं व्यापारयामास रक्षार्थं शशिशेखरः॥ अनुज्ञातप्रवेशानां विश्वेशेन कृपावता

svayaṁ vyāpārayāmāsa rakṣārthaṁ śaśiśekharaḥ anujñātapraveśānāṁ viśveśena kṛpāvatā

रक्षा के लिए स्वयं शशिशेखर (शिव) ने नियुक्त किया। दयालु विश्वेश्वर द्वारा जिन्हें प्रवेश की अनुमति दी जाती है,

श्लोक 21 (skanda.4.30.21)

ते प्रवेशं प्रयच्छंति नान्येषां हि कदाचन॥ इत्यर्थे कथयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम्॥ आश्चर्यकारिपरमं काशीभक्तिप्रवर्धनम्

te praveśaṁ prayacchaṁti nānyeṣāṁ hi kadācana ityarthe kathayiṣye'hamitihāsaṁ purātanam āścaryakāriparamaṁ kāśībhaktipravardhanam

वे ही प्रवेश पाते हैं, अन्य कोई कभी नहीं। इस विषय में मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जो अत्यंत आश्चर्यजनक तथा काशी के प्रति भक्ति को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 22 (skanda.4.30.22)

॥ स्कंद उवाच॥ दक्षिणाब्धितटे कश्चित्सेतुबंधसमीपतः॥ वणिग्धनंजयो नाम मातृभक्तिसमन्वितः

skaṁda uvāca dakṣiṇābdhitaṭe kaścitsetubaṁdhasamīpataḥ vaṇigdhanaṁjayo nāma mātṛbhaktisamanvitaḥ

स्कंद ने कहा — दक्षिण सागर के तट पर, सेतुबंध के निकट, धनंजय नामक एक वैश्य रहता था जो माता की भक्ति से युक्त था।

श्लोक 23 (skanda.4.30.23)

पुण्यमार्गार्जित धनो धनतोषितमार्गणः॥ मार्गणस्फारितयशा यशोदातनयार्चकः

puṇyamārgārjita dhano dhanatoṣitamārgaṇaḥ mārgaṇasphāritayaśā yaśodātanayārcakaḥ

उसने पुण्य मार्ग से धन अर्जित किया और उस धन से याचकों को संतुष्ट किया; उसका यश उन याचकों द्वारा ही फैलाया गया, और वह यशोदानंदन (श्रीकृष्ण) का उपासक था।

श्लोक 24 (skanda.4.30.24)

समुन्नतोपि संपत्त्या विनयानतकंधरः॥ आकरोपि गुणानां हि गुणिष्वाकारगोपकः

samunnatopi saṁpattyā vinayānatakaṁdharaḥ ākaropi guṇānāṁ hi guṇiṣvākāragopakaḥ

संपत्ति से उन्नत होते हुए भी उसकी गर्दन विनय से झुकी रहती थी। गुणों की खान होते हुए भी वह गुणीजनों के बीच अपने गुणों को छिपाता था।

श्लोक 25 (skanda.4.30.25)

रूपसंपदुदारोपि परदारपराङ्मुखः॥ ससंपूर्णकलोप्यासीन्निष्कलंकोदयः सदा

rūpasaṁpadudāropi paradāraparāṅmukhaḥ sasaṁpūrṇakalopyāsīnniṣkalaṁkodayaḥ sadā

रूप-संपदा से उदार होते हुए भी वह परायी स्त्रियों से मुख मोड़ता था। सभी कलाओं में पूर्ण होते हुए भी उसका उत्थान सदा निष्कलंक था।

श्लोक 26 (skanda.4.30.26)

ससत्यानृतवृत्तिश्च प्रायः सत्यप्रियो मुने॥ वर्णेतरोप्यभूल्लोके सुवर्णकृतवर्णनः

sasatyānṛtavṛttiśca prāyaḥ satyapriyo mune varṇetaropyabhūlloke suvarṇakṛtavarṇanaḥ

व्यापार में सत्य और असत्य दोनों का व्यवहार होते हुए भी, हे मुने! वह प्रायः सत्य को ही प्रिय मानता था। निम्न वर्ण का न होते हुए भी वह संसार में स्वर्ण के समान वर्णित होता था।

श्लोक 27 (skanda.4.30.27)

सदाचरणगोप्येष सुखयानचरः कृती॥ अदरिद्रोपि मेधावी सोभूत्पापदरिद्रधीः

sadācaraṇagopyeṣa sukhayānacaraḥ kṛtī adaridropi medhāvī sobhūtpāpadaridradhīḥ

यह सदाचार में छिपा हुआ कुशल पुरुष सुखपूर्वक जीवन बिताता था। दरिद्र न होते हुए भी यह बुद्धिमान केवल पाप से ही दरिद्र-चित्त था।

श्लोक 28 (skanda.4.30.28)

तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित्कालपर्ययात्॥ जननी निधनं प्राप्ता व्याधिताऽतिजरातुरा॥ तया च यौवनं प्राप्य मेघच्छायातिचंचलम्॥ प्रावृण्नदीपूरसमं स्वपतिः परिवंचितः

tasyaivaṁ vartamānasya kadācitkālaparyayāt jananī nidhanaṁ prāptā vyādhitā'tijarāturā tayā ca yauvanaṁ prāpya meghacchāyāticaṁcalam prāvṛṇnadīpūrasamaṁ svapatiḥ parivaṁcitaḥ

इस प्रकार जीवन बिताते हुए एक बार समय के फेर से, व्याधिग्रस्त तथा वृद्धावस्था से पीड़ित उसकी माता की मृत्यु हो गई। और उसकी पत्नी ने, बादल की छाया के समान चंचल तथा वर्षा-काल की बाढ़ी हुई नदी के समान अपना यौवन पाकर, अपने पति को धोखा दिया।

श्लोक 29 (skanda.4.30.29)

दिन त्रिचतुरस्थायि या नारी प्राप्य यौवनम्॥ भर्तारं वंचयेन्मोहात्साऽक्षयं नरकं व्रजेत्

dina tricaturasthāyi yā nārī prāpya yauvanam bhartāraṁ vaṁcayenmohātsā'kṣayaṁ narakaṁ vrajet

जो स्त्री तीन-चार दिन ठहरने वाले यौवन को पाकर मोहवश अपने पति को धोखा देती है, वह अक्षय नरक को प्राप्त होती है।

श्लोक 30 (skanda.4.30.30)

शीलभंगेन नारीणां भर्ताधर्मपरोपि हि॥ पतेद्दुःखार्जितात्स्वर्गाच्छीलं रक्ष्यं ततः स्त्रिया

śīlabhaṁgena nārīṇāṁ bhartādharmaparopi hi patedduḥkhārjitātsvargācchīlaṁ rakṣyaṁ tataḥ striyā

स्त्रियों के शील-भंग से, चाहे पति अधर्मपरायण ही क्यों न हो, वह दुःखपूर्वक अर्जित स्वर्ग से भी गिर जाता है; इसलिए स्त्री को अपना शील अवश्य सुरक्षित रखना चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.4.30.31)

विष्ठागर्ते च निरये स्वयं पतति दुर्मतिः॥ आभूतसंप्लवं यावत्ततः स्याद्ग्रामसूकरी

viṣṭhāgarte ca niraye svayaṁ patati durmatiḥ ābhūtasaṁplavaṁ yāvattataḥ syādgrāmasūkarī

दुर्बुद्धि स्त्री स्वयं नरक के विष्ठा-गर्त में गिरती है, और प्रलय होने तक वहीं रहती है; तत्पश्चात् वह ग्राम-सूकरी होती है।

श्लोक 32 (skanda.4.30.32)

स्वविष्ठापायिनी चाथ वल्गुली वृक्षलंबिनी॥ उलूकी वा दिवांधा स्याद्वृक्षकोटरवासिनी

svaviṣṭhāpāyinī cātha valgulī vṛkṣalaṁbinī ulūkī vā divāṁdhā syādvṛkṣakoṭaravāsinī

फिर वह अपनी ही विष्ठा खाने वाली, वृक्ष से लटकने वाली चमगादड़, अथवा वृक्ष की कोटर में रहने वाली, दिन में अंधी उल्लू बनती है।

श्लोक 33 (skanda.4.30.33)

रक्षणीयं महायत्नादिदं सुकृतभाजनम्॥ वपुः परस्य दुःस्पर्शात्सुखाभासात्मकात्स्त्रिया

rakṣaṇīyaṁ mahāyatnādidaṁ sukṛtabhājanam vapuḥ parasya duḥsparśātsukhābhāsātmakātstriyā

यह पुण्य का पात्र शरीर स्त्री द्वारा बड़े यत्न से सुरक्षित रखने योग्य है — पराए पुरुष के, सुख के आभासमात्र देने वाले दुखद स्पर्श से।

श्लोक 34 (skanda.4.30.34)

अनेनैव शरीरेण भर्तृसाद्विहितेन हि॥ किं सती न च तस्तंभ भानुमुद्यंतमाज्ञया

anenaiva śarīreṇa bhartṛsādvihitena hi kiṁ satī na ca tastaṁbha bhānumudyaṁtamājñayā

क्या सती अनुसूया ने इसी शरीर से, जो पति के प्रति समर्पित था, अपनी आज्ञामात्र से उगते हुए सूर्य को स्तंभित नहीं कर दिया था?

श्लोक 35 (skanda.4.30.35)

अत्रिपत्न्यनसूया किं भर्तृभक्तिप्रभावतः॥ दधार न त्रयीं गर्भे पतिव्रत परायणा

atripatnyanasūyā kiṁ bhartṛbhaktiprabhāvataḥ dadhāra na trayīṁ garbhe pativrata parāyaṇā

क्या अत्रि की पत्नी अनसूया ने, पतिव्रता में तत्पर रहते हुए, पति-भक्ति के प्रभाव से त्रिदेवों को ही अपने गर्भ में धारण नहीं किया था?

श्लोक 36 (skanda.4.30.36)

इह कीर्तिश्च विपुला स्वर्गेवासस्तथाऽक्षयः॥ पातिव्रत्यात्स्त्रिया लभ्यं सखित्वं च श्रिया सह

iha kīrtiśca vipulā svargevāsastathā'kṣayaḥ pātivratyātstriyā labhyaṁ sakhitvaṁ ca śriyā saha

इस लोक में विशाल कीर्ति और स्वर्ग में अक्षय वास — यह सब पातिव्रत्य से स्त्री को प्राप्त होता है, साथ ही लक्ष्मी की सखीता भी।

श्लोक 37 (skanda.4.30.37)

सादुर्वृत्त्या परित्यज्य पतिधर्मं सनातनम्॥ स्वच्छंदचारिणी भूत्वामृतानिरयमुद्ययौ॥ धनंजयोपि च मुने केनचिच्छिवयोगिना॥ सार्धं तपोदयादित्थं सोऽभवद्धर्मतत्परः

sādurvṛttyā parityajya patidharmaṁ sanātanam svacchaṁdacāriṇī bhūtvāmṛtānirayamudyayau dhanaṁjayopi ca mune kenacicchivayoginā sārdhaṁ tapodayāditthaṁ so'bhavaddharmatatparaḥ

किंतु उसने दुराचार से सनातन पत्नी-धर्म का त्याग कर, स्वच्छंदचारिणी बनकर मृत्यु के बाद नरक को प्राप्त किया। और हे मुने! धनंजय भी किसी शिवयोगी के साथ तप के प्रभाव से इस प्रकार धर्मपरायण हो गया।

श्लोक 38 (skanda.4.30.38)

धनंजयोपि धर्मात्मा मातृभक्तिपरायणः॥ आदायास्थीन्यथो मातुर्गंगा मार्गस्थितोऽभवत्

dhanaṁjayopi dharmātmā mātṛbhaktiparāyaṇaḥ ādāyāsthīnyatho māturgaṁgā mārgasthito'bhavat

धर्मात्मा धनंजय, अपनी माता की भक्ति में तत्पर, उसकी अस्थियाँ लेकर गंगा की ओर मार्ग पर चल पड़ा।

श्लोक 39 (skanda.4.30.39)

पंचगव्येन संस्नाप्य ततः पंचामृतेन वै॥ यक्षकर्दमलेपेन लिप्त्वा पुष्पैः प्रपूज्य च

paṁcagavyena saṁsnāpya tataḥ paṁcāmṛtena vai yakṣakardamalepena liptvā puṣpaiḥ prapūjya ca

उसने पंचगव्य से स्नान कराकर, फिर पंचामृत से, फिर यक्ष-कर्दम के लेप से अस्थियों को लिप्त कर पुष्पों से पूजा की,

श्लोक 40 (skanda.4.30.40)

आवेष्ट्य नेत्रवस्त्रेण ततः पट्टांबरेण वै॥ ततः सुरसवस्त्रेण ततो मांजिष्ठवाससा

āveṣṭya netravastreṇa tataḥ paṭṭāṁbareṇa vai tataḥ surasavastreṇa tato māṁjiṣṭhavāsasā

फिर उन्हें बारीक वस्त्र में लपेटकर, फिर रेशमी वस्त्र में, फिर सुगंधित वस्त्र में, फिर मजीठ-रंगे वस्त्र में,

श्लोक 41 (skanda.4.30.41)

नेपालकंबलेनाथ मृदाचाऽथ विशुद्धया॥ ताम्रसंपुटके कृत्वा मातुरंगान्यहो वणिक्

nepālakaṁbalenātha mṛdācā'tha viśuddhayā tāmrasaṁpuṭake kṛtvā māturaṁgānyaho vaṇik

फिर नेपाली कंबल में, फिर शुद्ध मिट्टी में — इस प्रकार उस वैश्य ने अपनी माता के अंगों को ताम्रपात्र में रखा।

श्लोक 42 (skanda.4.30.42)

अस्पृष्टहीनजातिः स शुचिष्मान्स्थंडिलेशयः॥ आनयञ्ज्वरितोप्यासीन्मध्ये मार्गं धनंजयः

aspṛṣṭahīnajātiḥ sa śuciṣmānsthaṁḍileśayaḥ ānayañjvaritopyāsīnmadhye mārgaṁ dhanaṁjayaḥ

किसी अस्पृश्य नीच जाति के व्यक्ति के स्पर्श से रहित, पवित्र, भूमि पर सोने वाला धनंजय, ज्वर से पीड़ित होते हुए भी मार्ग में उसे साथ ले चला।

श्लोक 43 (skanda.4.30.43)

भारवाहः कृतस्तेन कश्चिद्दत्त्वोचितां भृतिम्॥ किं बहूक्तेन घटज काशी प्राप्ताऽथ तेन वै

bhāravāhaḥ kṛtastena kaściddattvocitāṁ bhṛtim kiṁ bahūktena ghaṭaja kāśī prāptā'tha tena vai

उसने उचित मजदूरी देकर एक भारवाहक नियुक्त किया। हे घटज! बहुत कहने से क्या, उसके द्वारा काशी पहुँची गई।

श्लोक 44 (skanda.4.30.44)

धृत्वा संभृतिरक्षार्थं भारवाहं धनंजयः॥ जगामापणमानेतुं किंचिद्वस्त्वशनादिकम्

dhṛtvā saṁbhṛtirakṣārthaṁ bhāravāhaṁ dhanaṁjayaḥ jagāmāpaṇamānetuṁ kiṁcidvastvaśanādikam

सामान की रखवाली के लिए भारवाहक को रखकर धनंजय कुछ वस्त्र और भोजन-सामग्री लेने बाजार गया।

श्लोक 45 (skanda.4.30.45)

भारवाह्यंतरं प्राप्य तस्य संभृतिमध्यतः॥ ताम्रसंपुटमादाय धनं ज्ञात्वा गृहं ययौ

bhāravāhyaṁtaraṁ prāpya tasya saṁbhṛtimadhyataḥ tāmrasaṁpuṭamādāya dhanaṁ jñātvā gṛhaṁ yayau

भारवाहक अकेला पाकर उस सामान में से ताम्रपात्र निकालकर, उसे धन समझकर अपने घर चला गया।

श्लोक 46 (skanda.4.30.46)

वासस्थानमथागत्य तमदृष्ट्वा धनंजयः॥ त्वरावान्संभृतिं वीक्ष्य ताम्रसंपुटवर्जिताम्॥ हाहेत्याताड्य हृदयं चक्रंद बहुशो भृशम्॥ इतस्ततस्तमालोक्य गतस्तदनुसारतः

vāsasthānamathāgatya tamadṛṣṭvā dhanaṁjayaḥ tvarāvānsaṁbhṛtiṁ vīkṣya tāmrasaṁpuṭavarjitām hāhetyātāḍya hṛdayaṁ cakraṁda bahuśo bhṛśam itastatastamālokya gatastadanusārataḥ

निवास-स्थान पर लौटकर उसे न पाकर, धनंजय शीघ्रता से सामान देखने लगा; ताम्रपात्र रहित सामान देखकर 'हाय-हाय' कहकर छाती पीटते हुए वह बार-बार जोर से रोया। इधर-उधर उसे खोजते हुए उसके पीछे चल पड़ा।

श्लोक 47 (skanda.4.30.47)

अकृत्वा जाह्नवीस्नानमनवेक्ष्य जगत्पतिम्॥ तस्य संवसथं प्राप्तो भारवोढुर्धनंजयः

akṛtvā jāhnavīsnānamanavekṣya jagatpatim tasya saṁvasathaṁ prāpto bhāravoḍhurdhanaṁjayaḥ

गंगा में स्नान किए बिना, जगत्पति के दर्शन किए बिना, भारवाहक धनंजय उसके निवास तक पहुँच गया।

श्लोक 48 (skanda.4.30.48)

भारवाडप्यरण्यान्यां ताम्रसंपुटमध्यतः॥ दृष्ट्वास्थीनि विनिःश्वस्य तानि त्यक्त्वा गृहं ययौ

bhāravāḍapyaraṇyānyāṁ tāmrasaṁpuṭamadhyataḥ dṛṣṭvāsthīni viniḥśvasya tāni tyaktvā gṛhaṁ yayau

भारवाहक ने भी वन में ताम्रपात्र के भीतर हड्डियाँ देखकर आह भरी, और उन्हें फेंककर अपने घर चला गया।

श्लोक 49 (skanda.4.30.49)

वणिक्च तद्गृहं प्राप्य शुष्ककंठोष्ठतालुकः॥ दृष्ट्वाऽथ चैलशकलं तृणकुट्यंतरे तदा

vaṇikca tadgṛhaṁ prāpya śuṣkakaṁṭhoṣṭhatālukaḥ dṛṣṭvā'tha cailaśakalaṁ tṛṇakuṭyaṁtare tadā

और वैश्य उस घर पहुँचकर, सूखे कंठ, होंठ तथा तालु के साथ, घास की झोंपड़ी के भीतर वस्त्र का एक टुकड़ा देखकर,

श्लोक 50 (skanda.4.30.50)

आशया किंचिदाश्वस्य तत्पत्नीं परिपृष्टवान्॥ सत्यं ब्रूहि न भेतव्यं दास्याम्यन्यदपि ध्रुवम्

āśayā kiṁcidāśvasya tatpatnīṁ paripṛṣṭavān satyaṁ brūhi na bhetavyaṁ dāsyāmyanyadapi dhruvam

कुछ आशा से आश्वस्त होकर उसकी पत्नी से पूछा — 'सच बताओ, डरो मत, मैं और भी अवश्य दूँगा।'

श्लोक 51 (skanda.4.30.51)

वसु क्व ते गतो भर्ता मातुरस्थीनिमेऽर्पय॥ वयं कार्पटिका भद्रे भवामो न च दुःखदाः

vasu kva te gato bhartā māturasthīnime'rpaya vayaṁ kārpaṭikā bhadre bhavāmo na ca duḥkhadāḥ

'तुम्हारे पति धन लेकर कहाँ गए? मेरी माता की अस्थियाँ मुझे लौटा दो। हम गरीब यात्री हैं, भद्रे, हम दुःख नहीं देंगे।'

श्लोक 52 (skanda.4.30.52)

अज्ञात्वा लोभवशतस्तेन नीतोऽस्थिसंपुटः॥ तस्यैष दोषो नो भद्रे मातुर्मे कर्म तादृशम्

ajñātvā lobhavaśatastena nīto'sthisaṁpuṭaḥ tasyaiṣa doṣo no bhadre māturme karma tādṛśam

'न जानते हुए, लोभवश उसने अस्थियों का पात्र ले लिया। इसमें उसका कोई दोष नहीं, भद्रे, यह मेरी ही माता के कर्मों का फल है।'

श्लोक 53 (skanda.4.30.53)

अथवा न प्रसू दोषो मंदभाग्योऽस्मि तत्सुतः॥ सुतेनकृत्यं यत्कृत्यं तत्प्राप्तिर्नास्ति भिल्लि मे

athavā na prasū doṣo maṁdabhāgyo'smi tatsutaḥ sutenakṛtyaṁ yatkṛtyaṁ tatprāptirnāsti bhilli me

'अथवा माता का भी दोष नहीं, मैं ही अभागा हूँ, उसका पुत्र। पुत्र को जो कर्तव्य करना चाहिए, वह प्राप्ति मुझे नहीं हुई, हे भिल्लिनी!'

श्लोक 54 (skanda.4.30.54)

उद्यमं कृतवानस्मि न सिद्ध्येन्मंदभाग्यतः॥ आयातु सत्यवाक्यान्मे मा बिभेतु वनेचरः

udyamaṁ kṛtavānasmi na siddhyenmaṁdabhāgyataḥ āyātu satyavākyānme mā bibhetu vanecaraḥ

'मैंने प्रयत्न तो किया, पर मेरे दुर्भाग्य से सिद्ध नहीं हुआ। मेरे सत्यवचन से वह वनेचर लौट आए, उसे डरने की आवश्यकता नहीं है।'

श्लोक 55 (skanda.4.30.55)

अस्थीनि दर्शयत्वाशु धनं दास्येऽधिकं ततः॥ इत्युक्ता तेन सा भिल्ली व्याजहार निजं पतिम्॥ लज्जानम्रशिराःसोऽथ वृत्तांतं विनिवेद्य च॥ निनाय तामरण्यानीं शबरस्तं धनंजयम्

asthīni darśayatvāśu dhanaṁ dāsye'dhikaṁ tataḥ ityuktā tena sā bhillī vyājahāra nijaṁ patim lajjānamraśirāḥso'tha vṛttāṁtaṁ vinivedya ca nināya tāmaraṇyānīṁ śabarastaṁ dhanaṁjayam

'वह अस्थियाँ शीघ्र दिखा दे, मैं उसे और भी अधिक धन दूँगा।' ऐसा कहे जाने पर उस भिल्लिनी ने अपने पति को बुलाया। लज्जा से सिर झुकाए उसने सारा वृत्तांत बताकर, शबर ने धनंजय को वन में ले जाया।

श्लोक 56 (skanda.4.30.56)

वनेचरोऽथ तत्स्थानं दैवाद्विस्मृतवान्मुने॥ दिग्भ्रांतिं समवाप्याथ परिबभ्राम कानने

vanecaro'tha tatsthānaṁ daivādvismṛtavānmune digbhrāṁtiṁ samavāpyātha paribabhrāma kānane

किंतु दैवयोग से वह वनेचर उस स्थान को भूल गया, हे मुने! दिशा-भ्रम को प्राप्त होकर वह वन में भटकने लगा।

श्लोक 57 (skanda.4.30.57)

इतोरण्यात्ततो याति ततोरण्यादितो व्रजेत्॥ वनाद्वनांतरं भ्रांत्वा खिन्नः सोपि वनेचरः

itoraṇyāttato yāti tatoraṇyādito vrajet vanādvanāṁtaraṁ bhrāṁtvā khinnaḥ sopi vanecaraḥ

इस वन से उस ओर जाता, फिर उस वन से इस ओर आता — इस प्रकार एक वन से दूसरे वन में भटकते हुए वह वनेचर भी थक गया।

श्लोक 58 (skanda.4.30.58)

विहाय मध्येऽरण्यानि तं ययौ च स्वपक्कणम्॥ द्वित्राण्यहानि संभ्रम्य स कार्पटिकसत्तमः

vihāya madhye'raṇyāni taṁ yayau ca svapakkaṇam dvitrāṇyahāni saṁbhramya sa kārpaṭikasattamaḥ

वनों के बीच खोज छोड़कर वह अपने गाँव लौट गया। और वह श्रेष्ठ यात्री (धनंजय) दो-तीन दिन भटककर,

श्लोक 59 (skanda.4.30.59)

क्षुत्क्षामः शुष्ककंठोष्ठो हाहेति परिदेवयन्॥ पुनः काशीपुरीं प्राप्तः परिम्लानमुखो वणिक् ॥८ ६५॥ तन्मंदभाग्यतां श्रुत्वा लोकात्कार्पटिको मुने॥ कृत्वा गयां प्रयागं च ततः स्वविषयं ययौ

kṣutkṣāmaḥ śuṣkakaṁṭhoṣṭho hāheti paridevayan punaḥ kāśīpurīṁ prāptaḥ parimlānamukho vaṇik 8 65 tanmaṁdabhāgyatāṁ śrutvā lokātkārpaṭiko mune kṛtvā gayāṁ prayāgaṁ ca tataḥ svaviṣayaṁ yayau

भूख से क्षीण, सूखे कंठ-होंठ लिए, 'हाय-हाय' विलाप करते हुए, म्लान मुख वाला वैश्य पुनः काशीपुरी पहुँचा। हे मुने! उसके दुर्भाग्य की बात लोगों से सुनकर वह यात्री गया और प्रयाग के तीर्थ करके अपने देश लौट गया।

श्लोक 60 (skanda.4.30.60)

काश्यां प्रवेशं प्राप्यापि तदस्थीनि घटोद्भव॥ विना वैश्वेश्वरीमाज्ञां बहिर्यातानि तत्क्षणात्

kāśyāṁ praveśaṁ prāpyāpi tadasthīni ghaṭodbhava vinā vaiśveśvarīmājñāṁ bahiryātāni tatkṣaṇāt

हे घटोद्भव! काशी में प्रवेश पाकर भी वे अस्थियाँ, विश्वेश्वरी की आज्ञा के बिना, उसी क्षण बाहर निकाल दी गईं।

श्लोक 61 (skanda.4.30.61)

एवं काश्यां प्रविश्यापि पापी धर्मानुषंगतः॥ न क्षेत्रफलमाप्नोति बहिर्भवति तत्क्षणात्

evaṁ kāśyāṁ praviśyāpi pāpī dharmānuṣaṁgataḥ na kṣetraphalamāpnoti bahirbhavati tatkṣaṇāt

इस प्रकार काशी में प्रवेश करके भी, जो पापी केवल दिखावे से धर्म से जुड़ा हो, वह क्षेत्र का फल नहीं पाता, उसी क्षण बाहर हो जाता है।

श्लोक 62 (skanda.4.30.62)

तस्माद्विश्वेश्वराज्ञैव काशीवासेऽत्र कारणम्॥ असिश्च वरणा यत्र क्षेत्ररक्षाकृतौ कृते

tasmādviśveśvarājñaiva kāśīvāse'tra kāraṇam asiśca varaṇā yatra kṣetrarakṣākṛtau kṛte

अतः यहाँ काशी-वास का कारण विश्वेश्वर की आज्ञा ही है। जहाँ क्षेत्र की रक्षा हेतु असि और वरणा को बनाया गया,

श्लोक 63 (skanda.4.30.63)

वाराणसीति विख्याता तदारभ्य महामुने॥ असेश्च वरणायाश्च संगमं प्राप्य काशिका॥ वाराणसीह करुणामयदिव्यमूर्तिरुत्सृज्य यत्र तु तनुं तनुभृत्सुखेन॥ विश्वेशदृङ्महसि यत्सहसा प्रविश्य रूपेण तां वितनुतां पदवीं दधाति

vārāṇasīti vikhyātā tadārabhya mahāmune aseśca varaṇāyāśca saṁgamaṁ prāpya kāśikā vārāṇasīha karuṇāmayadivyamūrtirutsṛjya yatra tu tanuṁ tanubhṛtsukhena viśveśadṛṅmahasi yatsahasā praviśya rūpeṇa tāṁ vitanutāṁ padavīṁ dadhāti

हे महामुने! तब से वह नगरी 'वाराणसी' नाम से विख्यात हुई। असि और वरणा के संगम को पाकर काशिका 'वाराणसी' बनी। यहाँ जो भी देहधारी करुणामय दिव्यमूर्ति शिव को पाकर सुखपूर्वक अपने शरीर को त्याग देता है, और अचानक विश्वेश की दृष्टि की तेजस्विता में प्रवेश कर, अपने रूप से वही उच्च पद प्राप्त करता है।

श्लोक 64 (skanda.4.30.64)

जातो मृतो बहुषु तीर्थवरेषु रे त्वं जंतो न जातु तव शांतिरभून्निमज्य॥ वाराणसी निगदतीह मृतोऽमृतत्वं प्राप्याधुना मम बलात्स्मरशासनः स्याः

jāto mṛto bahuṣu tīrthavareṣu re tvaṁ jaṁto na jātu tava śāṁtirabhūnnimajya vārāṇasī nigadatīha mṛto'mṛtatvaṁ prāpyādhunā mama balātsmaraśāsanaḥ syāḥ

'हे प्राणी! तूने अनेक श्रेष्ठ तीर्थों में जन्म लिया और मरण पाया, किंतु उनमें डूबकर भी तुझे कभी शांति नहीं मिली।' — ऐसा वाराणसी कहती है — 'यहाँ मरकर अमरत्व पाकर, अब मेरे बल से तू कामदेव पर शासन करने वाला (शिव-सम) बन जा।'

श्लोक 65 (skanda.4.30.65)

अन्यत्र तीर्थ सलिले पतितोद्विजन्मा देवादिभावमयते न तथा तु काश्याम्॥ चित्रं यदत्र पतितः पुनरुत्थितिं न प्राप्नोति पुल्कसजनोपि किमग्र जन्मा

anyatra tīrtha salile patitodvijanmā devādibhāvamayate na tathā tu kāśyām citraṁ yadatra patitaḥ punarutthitiṁ na prāpnoti pulkasajanopi kimagra janmā

अन्य तीर्थ के जल में गिरा हुआ द्विजन्मा भी वहाँ देवत्व को प्राप्त नहीं होता, जैसा वह काशी में होता है। यह आश्चर्य है कि यहाँ गिरा हुआ मनुष्य, चाहे नीच जाति का ही क्यों न हो, पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता — फिर उच्च जन्म वाले की तो बात ही क्या!

श्लोक 66 (skanda.4.30.66)

नैषा पुरी संसृतिरूपपारावारस्य पारं पुरहा पुरारिः॥ यस्यां परं पौरुषमर्थमिच्छन्सिद्धिं नयेत्पौरपरंपरांसः

naiṣā purī saṁsṛtirūpapārāvārasya pāraṁ purahā purāriḥ yasyāṁ paraṁ pauruṣamarthamicchansiddhiṁ nayetpauraparaṁparāṁsaḥ

यह नगरी केवल संसार-सागर का पार-भाग नहीं है — पुरों के शत्रु पुरारि शिव स्वयं यहाँ हैं, जिसमें अपने पुरुषार्थ से सिद्धि चाहने वाला नागरिकों की परंपरा को सिद्धि तक ले जाता है।

श्लोक 67 (skanda.4.30.67)

तीर्थांतराणि मनुजः परितोऽवगाह्य हित्वा तनुं कलुषितां दिवि दैवतं स्यात्॥ वाराणसीपरिसरे तु विसृज्य देहं संदेहभाग्भवति देहदशाप्तयेपि

tīrthāṁtarāṇi manujaḥ parito'vagāhya hitvā tanuṁ kaluṣitāṁ divi daivataṁ syāt vārāṇasīparisare tu visṛjya dehaṁ saṁdehabhāgbhavati dehadaśāptayepi

अन्य तीर्थों में भलीभाँति स्नान करके, अपने मलिन शरीर को त्यागकर मनुष्य स्वर्ग में देवता बनता है। किंतु वाराणसी के परिसर में शरीर त्यागने पर वह पुनः देह धारण करने की संभावना से भी परे हो जाता है।

श्लोक 68 (skanda.4.30.68)

वाराणसी समरसीकरणादृतेपि योगादयोगिजनतां जनतापहंत्री॥ तत्तारकं श्रवणगोचरतां नयंती तद्बह्मदर्शयति येन पुनर्भवो न

vārāṇasī samarasīkaraṇādṛtepi yogādayogijanatāṁ janatāpahaṁtrī tattārakaṁ śravaṇagocaratāṁ nayaṁtī tadbahmadarśayati yena punarbhavo na

वाराणसी, लोगों की पीड़ा हरने वाली, समरसता के योग के बिना भी अयोगी जनों को योगी बना देती है। वह तारक मंत्र को श्रवणगोचर बनाकर, उस ब्रह्म को दर्शाती है जिससे पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 69 (skanda.4.30.69)

वाराणसी परिसरे तनुमिष्टदात्रीं धर्मार्थकामनिलयामहहाविसृज्य॥ इष्टं पदं किमपि हृष्टतरोभिलष्य लाभोस्तुमूलमपि नो यदवाप शून्यम्

vārāṇasī parisare tanumiṣṭadātrīṁ dharmārthakāmanilayāmahahāvisṛjya iṣṭaṁ padaṁ kimapi hṛṣṭatarobhilaṣya lābhostumūlamapi no yadavāpa śūnyam

हाय! वाराणसी के परिसर में, इच्छित वस्तु देने वाले, धर्म-अर्थ-काम के निवासस्थान इस शरीर को त्यागकर, कोई और इच्छित पद पाने की उतावली में लगे रहने वाला व्यक्ति कुछ भी नहीं पाता, वह शून्य ही रह जाता है।

श्लोक 70 (skanda.4.30.70)

आःकाशिवासिजनता ननु वंचिताभूद्भाले विलोचनवतावनितार्धभाजा॥ आदाय यत्सन्ध्यकृतभाजनमिष्टदेहं निर्वाणमात्रमपवर्जयतापुनर्भु

āḥkāśivāsijanatā nanu vaṁcitābhūdbhāle vilocanavatāvanitārdhabhājā ādāya yatsandhyakṛtabhājanamiṣṭadehaṁ nirvāṇamātramapavarjayatāpunarbhu

आह! काशीवासी लोग निश्चय ही धोखा नहीं खाते, जिन्होंने ललाट पर नेत्र धारण करने वाले, आधे अंग में स्त्री को धारण करने वाले शिव द्वारा संध्या-काल में गढ़े गए इस इच्छित शरीर को पाकर, इसे केवल निर्वाण के लिए अर्पित कर, पुनर्जन्म से सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 71 (skanda.4.30.71)

वाराणसी स्फुरदसीमगुणैकभूमिर्यत्र स्थितास्तनुभृतःशशिभृत्प्रभावात्॥ सर्वे गले गरलिनोऽक्षियुजो ललाटे वामार्धवामतनवोऽतनवस्ततोंऽते

vārāṇasī sphuradasīmaguṇaikabhūmiryatra sthitāstanubhṛtaḥśaśibhṛtprabhāvāt sarve gale garalino'kṣiyujo lalāṭe vāmārdhavāmatanavo'tanavastatoṁ'te

वाराणसी असीम, देदीप्यमान गुणों की एकमात्र भूमि है, जहाँ स्थित प्राणी चंद्रधारी शिव के प्रभाव से — सब के सब कंठ में विष धारण करने वाले, ललाट पर तीसरा नेत्र रखने वाले, अपने बाएँ अंग में प्रिया को धारण करने वाले तथा अंत में देहरहित हो जाते हैं।

श्लोक 72 (skanda.4.30.72)

आनंदकाननमिदं सुखदं पुरैव तत्त्रापि चक्रसरसी मणिकर्णिकाऽथ॥ स्वः सिंधुसंगतिरथो परमास्पदं च विश्वेशितुः किमिह तन्न विमुक्तये यत्॥ वाराणसीह वरणासि सरिद्वरिष्ठा संभेदखेदजननी द्युनदी लसच्छ्रीः॥ विश्रामभूमिरचलाऽमलमोक्षलक्ष्म्याहैनां विहाय किमुसीदति मूढजंतुः

ānaṁdakānanamidaṁ sukhadaṁ puraiva tattrāpi cakrasarasī maṇikarṇikā'tha svaḥ siṁdhusaṁgatiratho paramāspadaṁ ca viśveśituḥ kimiha tanna vimuktaye yat vārāṇasīha varaṇāsi saridvariṣṭhā saṁbhedakhedajananī dyunadī lasacchrīḥ viśrāmabhūmiracalā'malamokṣalakṣmyāhaināṁ vihāya kimusīdati mūḍhajaṁtuḥ

यह आनंदकानन पूर्वकाल से ही सुखदायक रहा है, वहीं चक्रसरोवर, मणिकर्णिका, स्वर्गनदी का संगम तथा विश्वेश्वर का परम धाम है — यहाँ ऐसा क्या है जो मुक्ति के लिए न हो? वाराणसी यहाँ असि और वरणा नदियों का संगम है, नदियों में श्रेष्ठ, विरह के दुःख को दूर करने वाली, शोभायुक्त स्वर्गनदी है — यह अचल, निर्मल मोक्षलक्ष्मी की विश्रामभूमि है; हाय, मूर्ख प्राणी इसे त्यागकर क्यों दुःखी होता है?

श्लोक 73 (skanda.4.30.73)

किं विस्मृतं त्वहहगर्भजमामनस्यं कार्तांतदूतकृतबंधन ताडनं च॥ शंभोरनुग्रह परिग्रह लभ्य काशीं मूढो विहाय किमु याति करस्थ मुक्तिम्

kiṁ vismṛtaṁ tvahahagarbhajamāmanasyaṁ kārtāṁtadūtakṛtabaṁdhana tāḍanaṁ ca śaṁbhoranugraha parigraha labhya kāśīṁ mūḍho vihāya kimu yāti karastha muktim

क्या उसने गर्भ की पीड़ा तथा यमदूतों द्वारा किए गए बंधन और ताड़न को भूल दिया है? शंभु के अनुग्रह से मिली इस काशी को पाकर भी वह मूर्ख हाथ में आई मुक्ति को त्यागकर क्यों जाता है?

श्लोक 74 (skanda.4.30.74)

तीर्थांतराणि कलुषाणि हरति सद्यः श्रेयो ददत्यपि बहु त्रिदिवं नयंति॥ पानावगाहनविधानतनुप्रहाणैर्वाराणसी तु कुरुते बत मूलनाशम्

tīrthāṁtarāṇi kaluṣāṇi harati sadyaḥ śreyo dadatyapi bahu tridivaṁ nayaṁti pānāvagāhanavidhānatanuprahāṇairvārāṇasī tu kurute bata mūlanāśam

अन्य तीर्थ तुरंत मल दूर करते हैं, बहुत कल्याण देते हैं और स्वर्ग तक ले जाते हैं। किंतु वाराणसी तो वहाँ के जल-पान, स्नान-विधि तथा शरीर-त्याग से पाप का मूल से ही नाश कर देती है।

श्लोक 75 (skanda.4.30.75)

काशीपुरी परिसरे मणिकर्णिकायां त्यक्त्वा तनुं तनुभृतस्तनुमाप्नुवंति॥ भाले विलोचनवतीं गलनीललक्ष्मीं वामार्धबंधुरवधूं विधुरावरोधाः

kāśīpurī parisare maṇikarṇikāyāṁ tyaktvā tanuṁ tanubhṛtastanumāpnuvaṁti bhāle vilocanavatīṁ galanīlalakṣmīṁ vāmārdhabaṁdhuravadhūṁ vidhurāvarodhāḥ

काशीपुरी के परिसर में मणिकर्णिका पर शरीर त्यागकर देहधारी नया शरीर प्राप्त करते हैं — ललाट पर नेत्र, कंठ में नीलकांति तथा बाएँ अंग में सुंदर प्रिया के साथ।

श्लोक 76 (skanda.4.30.76)

ज्ञात्वा प्रभावमतुलं मणिकर्णिकायां यः पुद्गलं त्यजति चाशुचिपूयगंधि॥ स्वात्मावबोधमहसा सहसा मिलित्वा कल्पांतरेष्वपि स नैव पृथक्त्वमेति

jñātvā prabhāvamatulaṁ maṇikarṇikāyāṁ yaḥ pudgalaṁ tyajati cāśucipūyagaṁdhi svātmāvabodhamahasā sahasā militvā kalpāṁtareṣvapi sa naiva pṛthaktvameti

जो व्यक्ति इस अतुलनीय प्रभाव को जानकर मणिकर्णिका पर इस अशुद्ध, दुर्गंधयुक्त शरीर को त्यागता है, वह आत्मज्ञान के तेज से एकत्व को प्राप्त होकर, कल्पांतर में भी पृथक्ता को नहीं पाता।

श्लोक 77 (skanda.4.30.77)

रागादिदोषपरिपूर मनो हृषीकाः काशीपुरीमतुलदिव्यमहाप्रभावाम्॥ ये कल्पयंत्यपरतीर्थसमां समंतात्ते पापिनो न सह तैः परिभाषणीयम्

rāgādidoṣaparipūra mano hṛṣīkāḥ kāśīpurīmatuladivyamahāprabhāvām ye kalpayaṁtyaparatīrthasamāṁ samaṁtātte pāpino na saha taiḥ paribhāṣaṇīyam

राग आदि दोषों से भरे मन और इंद्रियों वाले जो लोग अतुलनीय दिव्य महाप्रभाव वाली काशीपुरी को अन्य तीर्थों के समान मानते हैं, वे पापी हैं — उनसे बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 78 (skanda.4.30.78)

वाराणसीं स्मरहरप्रियराजधानीं त्यक्त्वा कुतो व्रजसि मूढ दिगंतरेषु॥ प्राप्याप्यजाद्यसुलभांस्थिरमोक्षलक्ष्मीं लक्ष्मीं स्वभावचपलां किमु कामयेथाः

vārāṇasīṁ smaraharapriyarājadhānīṁ tyaktvā kuto vrajasi mūḍha digaṁtareṣu prāpyāpyajādyasulabhāṁsthiramokṣalakṣmīṁ lakṣmīṁ svabhāvacapalāṁ kimu kāmayethāḥ

हे मूर्ख! कामदेव के शत्रु शिव की प्रिय राजधानी वाराणसी को त्यागकर तू अन्य दिशाओं में कहाँ जाता है? ब्रह्मा आदि के लिए भी दुर्लभ स्थिर मोक्ष-लक्ष्मी को पाकर, तू स्वभाव से चंचल लक्ष्मी की इच्छा क्यों करता है?

श्लोक 79 (skanda.4.30.79)

विद्या धनानि सदनानि गजाश्वभृत्याः स्रक्चंदनानि वनिताश्च नितांत रम्याः॥ स्वर्गोप्यगम्य इह नोद्यमभाजिपुंसि वाराणसीत्वसुलभा शलभादिमुक्तिः॥ धात्रा धृतानि तुलया तुलनामवैतुं वैकुंठमुख्यभुवनानि च काशिका च॥ तान्युद्ययुर्लघुतयान्यगियं गुरुत्वात्तस्थौ पुरीह पुरुषार्थचतुष्टयस्य

vidyā dhanāni sadanāni gajāśvabhṛtyāḥ srakcaṁdanāni vanitāśca nitāṁta ramyāḥ svargopyagamya iha nodyamabhājipuṁsi vārāṇasītvasulabhā śalabhādimuktiḥ dhātrā dhṛtāni tulayā tulanāmavaituṁ vaikuṁṭhamukhyabhuvanāni ca kāśikā ca tānyudyayurlaghutayānyagiyaṁ gurutvāttasthau purīha puruṣārthacatuṣṭayasya

विद्या, धन, घर, हाथी-घोड़े, सेवक, माला-चंदन तथा अत्यंत रमणीय स्त्रियाँ — यहाँ तक कि स्वर्ग भी — प्रयत्नशील पुरुष के लिए दुर्गम नहीं है; किंतु वाराणसी के बिना, तुच्छ प्राणी के लिए भी मुक्ति सुलभ नहीं है। जब ब्रह्मा ने वैकुंठ आदि प्रमुख लोकों तथा काशिका को तराजू पर तौलकर उनकी तुलना जाननी चाही, तो वे सब हल्के होने के कारण उठ गए, और यह नगरी अपने गुरुत्व (महत्त्व) के कारण स्थिर रही — क्योंकि यह पुरुषार्थ-चतुष्टय की सच्ची सीट है।

श्लोक 80 (skanda.4.30.80)

काशी पुरीमधिवसन्द्रिनरोनरोपिह्मारोप्यमाणइहमान्यहवैकरुद्रः॥ नानोपसर्गजनिसर्गजदुःखभारैःकर्मापनुद्यसविशेत्परमेशधाम्नि॥ स्थिरापायं कायं जननमरणक्लेशनिलयं विहायास्यां काश्यामहहपरिगृह्णीत न कुतः॥ वपुस्तेजोरूपं स्थिरतरपरानंदसदनं विमूढोऽसौ जंतुः स्फुटितमिवकांम्यं विनिमयन्

kāśī purīmadhivasandrinaronaropihmāropyamāṇaihamānyahavaikarudraḥ nānopasargajanisargajaduḥkhabhāraiḥkarmāpanudyasaviśetparameśadhāmni sthirāpāyaṁ kāyaṁ jananamaraṇakleśanilayaṁ vihāyāsyāṁ kāśyāmahahaparigṛhṇīta na kutaḥ vapustejorūpaṁ sthirataraparānaṁdasadanaṁ vimūḍho'sau jaṁtuḥ sphuṭitamivakāṁmyaṁ vinimayan

काशी नगरी में निवास करने वाला मनुष्य, चाहे साधारण ही क्यों न हो, यहाँ साक्षात् रुद्र के समान माननीय माना जाता है; जन्म और विपत्ति से उत्पन्न अनेक दुःखों के भार से मुक्त होकर वह परमेश्वर के धाम में प्रवेश करता है। हाय! स्थिर रूप से नष्ट होने वाले, जन्म-मृत्यु की पीड़ा के निवासस्थान इस शरीर को त्यागकर, यहाँ काशी में मनुष्य परम आनंद के स्थिर धाम, तेजोमय शरीर को क्यों नहीं ग्रहण करता? यह विमूढ़ प्राणी उसे मानो टूटी-फूटी वस्तु के बदले में देकर, कुछ और ही अपना लेता है।

श्लोक 81 (skanda.4.30.81)

अहो लोकः शोकं किमिह सहते हंतहतधीर्विपद्भारैः सारैर्नियतनिधनैर्ध्वसित धनैः॥ क्षितौ सत्यां काश्यां कथयति शिवो यत्र निधने श्रुतौ किंचिद्भूयः प्रविशति न येनोदरदरीम्

aho lokaḥ śokaṁ kimiha sahate haṁtahatadhīrvipadbhāraiḥ sārairniyatanidhanairdhvasita dhanaiḥ kṣitau satyāṁ kāśyāṁ kathayati śivo yatra nidhane śrutau kiṁcidbhūyaḥ praviśati na yenodaradarīm

आह! लोग यहाँ शोक क्यों सहते हैं, बुद्धि खोकर, विपत्तियों के भार से, अवश्यंभावी मृत्यु से तथा नष्ट होते धन से पीड़ित होकर — जबकि काशी नामक पृथ्वी सचमुच विद्यमान है, जहाँ शिव मृत्यु के समय ऐसा कुछ कहते हैं जिसे सुनकर मनुष्य फिर कभी माता के गर्भ की गुफा में प्रवेश नहीं करता?

श्लोक 82 (skanda.4.30.82)

काशिवासिनिजने वनेचरेद्वित्रिभुज्यपि समीरभोजने॥ स्वैरचारिणि जितेंद्रियेप्यहो काशिवासिनि जने विशिष्टता

kāśivāsinijane vanecaredvitribhujyapi samīrabhojane svairacāriṇi jiteṁdriyepyaho kāśivāsini jane viśiṣṭatā

काशीवासी व्यक्ति चाहे वनवासी होकर दो-तीन ग्रास खाकर या केवल हवा पर जीवित रहकर रहे, चाहे स्वच्छंद विचरण करे या जितेंद्रिय हो — आह, काशीवासी होने में ही उसकी विशेषता है।

श्लोक 83 (skanda.4.30.83)

नास्तीह दुष्कृतकृतां सुकृतात्मनां वा काचिद्विशेषगतिरंतकृतां हि काश्याम्॥ बीजानि कर्मजनितानि यदूषरायां नांकूरंयति हरदृग्ज्वलितानितेषाम्

nāstīha duṣkṛtakṛtāṁ sukṛtātmanāṁ vā kācidviśeṣagatiraṁtakṛtāṁ hi kāśyām bījāni karmajanitāni yadūṣarāyāṁ nāṁkūraṁyati haradṛgjvalitāniteṣām

यहाँ पापकर्मियों और पुण्यात्माओं के अंतिम फल में कोई भेद नहीं रहता, काशी में मरने वालों के लिए। कर्मों से उत्पन्न बीज, शिव के नेत्र की अग्नि से जले हुए, उस ऊसर भूमि में अंकुरित नहीं होते।

श्लोक 84 (skanda.4.30.84)

शशका मशका बकाः शुकाः कलविंकाश्च वृकाः सजंबुकाः॥ तुरगोरग वानरानरा गिरिजे काशिमृताः परामृतम्

śaśakā maśakā bakāḥ śukāḥ kalaviṁkāśca vṛkāḥ sajaṁbukāḥ turagoraga vānarānarā girije kāśimṛtāḥ parāmṛtam

हे पर्वतपुत्री! खरगोश, मच्छर, बगुले, तोते, गौरैया, भेड़िए, सियार, घोड़े, सर्प, वानर और मनुष्य — काशी में मरने वाले सभी परम अमृत को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 85 (skanda.4.30.85)

अरुद्ररुद्राक्षफणींद्रभूषणास्त्रिपुंड्रचंद्रार्धधराधरागताः॥ निरंतरं काशिनिवासिनोजना गिरींद्रजे पारिषदा मता मम

arudrarudrākṣaphaṇīṁdrabhūṣaṇāstripuṁḍracaṁdrārdhadharādharāgatāḥ niraṁtaraṁ kāśinivāsinojanā girīṁdraje pāriṣadā matā mama

रुद्राक्ष और सर्प के आभूषण धारण करने वाले, त्रिपुंड्र तथा अर्धचंद्र धारण करने वाले, काशी में सतत निवास करने वाले लोग — हे गिरिजा! मैं उन्हें अपने ही पार्षद मानता हूँ।

श्लोक 86 (skanda.4.30.86)

यावंत एव निवसंति च जंतवोऽत्र काश्यां जलस्थलचरा झषजंबुकाद्याः॥ तावंत एव मदनुग्रह रुद्रदेहा देहावसानमधिगम्य मयि प्रविष्टाः

yāvaṁta eva nivasaṁti ca jaṁtavo'tra kāśyāṁ jalasthalacarā jhaṣajaṁbukādyāḥ tāvaṁta eva madanugraha rudradehā dehāvasānamadhigamya mayi praviṣṭāḥ

यहाँ काशी में जल और स्थल में विचरने वाले जितने भी प्राणी — मछली, सियार आदि — निवास करते हैं, वे सब मेरी कृपा से रुद्र-देह पाकर, देहावसान होने पर मुझमें प्रवेश करते हैं।

श्लोक 87 (skanda.4.30.87)

ये तु वर्षेषवोरुद्रा दिवि देवि प्रकीर्तिताः॥ वातेषवोंऽतरिक्षे ये ये भुव्यन्नेषवः प्रिये

ye tu varṣeṣavorudrā divi devi prakīrtitāḥ vāteṣavoṁ'tarikṣe ye ye bhuvyanneṣavaḥ priye

हे देवी! वर्षा के जो रुद्र (बाण-रूप) स्वर्ग में कहे गए हैं, अंतरिक्ष में जो वायु के तथा हे प्रिये! पृथ्वी पर जो अन्न के रुद्र कहे गए हैं,

श्लोक 88 (skanda.4.30.88)

रुद्रा दश दश प्राच्यवाची प्रत्यगुदक्स्थिताः॥ ऊर्ध्वदिक्स्थाश्च ये रुद्राः पठ्यंते वेदवादिभिः

rudrā daśa daśa prācyavācī pratyagudaksthitāḥ ūrdhvadiksthāśca ye rudrāḥ paṭhyaṁte vedavādibhiḥ

पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर में स्थित दस-दस रुद्र, तथा ऊर्ध्व दिशा में स्थित जो रुद्र वेदवेत्ताओं द्वारा कहे जाते हैं,

श्लोक 89 (skanda.4.30.89)

असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूतले॥ तत्सर्वेभ्योऽधिका काश्यां जंतवो रुद्ररूपिणः॥ रुद्रावासस्ततः प्रोक्तमविमुक्तं घटोद्भव॥ तस्मात्समर्च्य काशिस्थान्वर्णान्वर्णेतराश्रमान्

asaṁkhyātāḥ sahasrāṇi ye rudrā adhibhūtale tatsarvebhyo'dhikā kāśyāṁ jaṁtavo rudrarūpiṇaḥ rudrāvāsastataḥ proktamavimuktaṁ ghaṭodbhava tasmātsamarcya kāśisthānvarṇānvarṇetarāśramān

तथा पृथ्वी पर स्थित असंख्य हजारों रुद्र — इन सबसे भी अधिक काशी के प्राणी हैं, जो सब रुद्र-रूप हैं। इसलिए, हे घटोद्भव! अविमुक्त को रुद्र का निवास कहा गया है। अतः काशी में स्थित सभी वर्णों तथा आश्रमों के लोगों की पूजा करके,

श्लोक 90 (skanda.4.30.90)

श्रद्धयेश्वरबुद्ध्या च रुद्रार्चा फलभाङ्नरः

śraddhayeśvarabuddhyā ca rudrārcā phalabhāṅnaraḥ

श्रद्धापूर्वक ईश्वर-बुद्धि से; क्योंकि रुद्र समझकर उनकी अर्चना करने वाला मनुष्य उसका फल पाता है।

श्लोक 91 (skanda.4.30.91)

श्म शब्देन शवः प्रोक्तः शानं शयनमुच्यते॥ निर्वचंति श्मशानार्थं मुने शब्दार्थकोविदाः

śma śabdena śavaḥ proktaḥ śānaṁ śayanamucyate nirvacaṁti śmaśānārthaṁ mune śabdārthakovidāḥ

'श्म' शब्द से शव कहा गया है, 'शान' शब्द शयन का वाचक है। हे मुने! शब्दार्थ के जानकार इसी प्रकार 'श्मशान' शब्द का निर्वचन करते हैं।

श्लोक 92 (skanda.4.30.92)

महांत्यपि च भूतानि प्रलये समुपस्थिते॥ शेरतेऽत्र शवा भूत्वा श्मशानं तु ततो महत्

mahāṁtyapi ca bhūtāni pralaye samupasthite śerate'tra śavā bhūtvā śmaśānaṁ tu tato mahat

प्रलय आने पर महान भूत भी शव बनकर यहाँ शयन करते हैं, इसीलिए इसे महान श्मशान कहा जाता है।

श्लोक 93 (skanda.4.30.93)

अप्सु भूरिह लये लयं व्रजेदाप और्ववदनोग्रकंदरे॥ मातरिश्वनि महातनूनपाद्व्योम्नि संक्षयति वै सदागतिः

apsu bhūriha laye layaṁ vrajedāpa aurvavadanograkaṁdare mātariśvani mahātanūnapādvyomni saṁkṣayati vai sadāgatiḥ

प्रलय में पृथ्वी जल में लीन होती है, जल और्व अग्नि के भयंकर मुख-कंदरा में लीन होता है, वह वायु में लीन होता है, और वायु आकाश में लीन हो जाता है।

श्लोक 94 (skanda.4.30.94)

व्योम चापि लयमेत्यहंकृतौ सापि षोडशविकारसंयुता॥ लीयते महति बुद्धिसंज्ञकेहा महान्प्रकृतिमध्यगो भवेत्

vyoma cāpi layametyahaṁkṛtau sāpi ṣoḍaśavikārasaṁyutā līyate mahati buddhisaṁjñakehā mahānprakṛtimadhyago bhavet

आकाश भी सोलह विकारों सहित अहंकार में लीन होता है; वह महान बुद्धि-तत्त्व में लीन हो जाता है, और महत्तत्त्व प्रकृति में समा जाता है।

श्लोक 95 (skanda.4.30.95)

सा गुणत्रयमयी च निर्गुणं तं पुमांसमवगुह्य तिष्ठति॥ पंचविंशतितमः परः पुमान्देहगेहपतिरेष जीवकः

sā guṇatrayamayī ca nirguṇaṁ taṁ pumāṁsamavaguhya tiṣṭhati paṁcaviṁśatitamaḥ paraḥ pumāndehagehapatireṣa jīvakaḥ

वह त्रिगुणमयी प्रकृति निर्गुण पुरुष को अपने भीतर समेटे रहती है। पच्चीसवाँ परम पुरुष यही शरीर-रूपी घर का स्वामी जीव है।

श्लोक 96 (skanda.4.30.96)

प्राकृतः प्रलय एष उच्यते हंसयान हरि रुद्रवर्जितः॥ कालमूर्तिरथ तं च पूरुषं हेलया कलयतीश्वरः परः

prākṛtaḥ pralaya eṣa ucyate haṁsayāna hari rudravarjitaḥ kālamūrtiratha taṁ ca pūruṣaṁ helayā kalayatīśvaraḥ paraḥ

यही प्राकृत प्रलय कहलाता है — हंस, विष्णु तथा रुद्र से रहित। और उस पुरुष को, काल-रूप में, परम ईश्वर सहजता से ग्रहण कर लेता है।

श्लोक 97 (skanda.4.30.97)

स वै महाविष्णुरितीर्यते बुधैस्तं वै महादेवमुदाहरंति॥ सोंऽतादिमध्यैः परिवर्जितः शिवः स श्रीपतिः सोपि हि पार्वतीपतिः

sa vai mahāviṣṇuritīryate budhaistaṁ vai mahādevamudāharaṁti soṁ'tādimadhyaiḥ parivarjitaḥ śivaḥ sa śrīpatiḥ sopi hi pārvatīpatiḥ

उसे ही विद्वान महाविष्णु कहते हैं, उसे ही महादेव भी कहा जाता है। वह आदि-मध्य-अंत से रहित शिव है, वह लक्ष्मीपति है, और वही पार्वतीपति भी है।

श्लोक 98 (skanda.4.30.98)

दैनंदिनेऽथ प्रलये त्रिशूलकोटौ समुत्क्षिप्य पुरीं हरः स्वाम्॥ बिभर्ति संवर्त महास्थिभूषणस्ततो हि काशी कलिकालवर्जिता॥ ॥ स्कंद उवाच॥ वाराणसीति काशीति रुद्रावास इति द्विज॥ महाश्मशानमित्येवं प्रोक्तमानंदकाननम्

dainaṁdine'tha pralaye triśūlakoṭau samutkṣipya purīṁ haraḥ svām bibharti saṁvarta mahāsthibhūṣaṇastato hi kāśī kalikālavarjitā skaṁda uvāca vārāṇasīti kāśīti rudrāvāsa iti dvija mahāśmaśānamityevaṁ proktamānaṁdakānanam

प्रतिदिन के प्रलय में हर अपनी नगरी को त्रिशूल की नोक पर उठाकर, संवर्तक (प्रलय की) महाअस्थियों से विभूषित होकर धारण करते हैं — इसीलिए काशी कलिकाल से भी अछूती रहती है। स्कंद ने कहा — हे द्विज! इस आनंदकानन को वाराणसी, काशी, रुद्रावास तथा महाश्मशान कहा गया है।

श्लोक 99 (skanda.4.30.99)

यथाविष्णोः पुराख्यातं तथैव च मया श्रुतम्॥ तच्च त्वदग्रे कथितं रहस्यं काशिजं महत्

yathāviṣṇoḥ purākhyātaṁ tathaiva ca mayā śrutam tacca tvadagre kathitaṁ rahasyaṁ kāśijaṁ mahat

जैसा विष्णु द्वारा पूर्वकाल में कहा गया था, वैसा ही मैंने सुना है; और वह महान रहस्य, काशी से उत्पन्न, मैंने तुम्हारे सामने कह दिया।

श्लोक 100 (skanda.4.30.100)

जप्त्वाध्यायमिमं पुण्यं महापातकनाशनम्॥ श्रावयित्वा द्विजान्सम्यक्छिवलोके महीयते

japtvādhyāyamimaṁ puṇyaṁ mahāpātakanāśanam śrāvayitvā dvijānsamyakchivaloke mahīyate

इस पवित्र, महापातकों का नाश करने वाले अध्याय का जप करके तथा ब्राह्मणों को भलीभाँति सुनाकर मनुष्य शिवलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 101 (skanda.4.30.101)

अतः परं कलशज किं शुश्रूषसि तद्वद॥ काशीकथा कथ्यमाना ममापि परितोषकृत्

ataḥ paraṁ kalaśaja kiṁ śuśrūṣasi tadvada kāśīkathā kathyamānā mamāpi paritoṣakṛt

हे कलशज! इससे आगे और क्या सुनना चाहते हो, बताओ। काशी की कथा कही जाते हुए मुझे भी संतोष होता है।

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