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काशी खण्ड · अध्याय 33

ज्ञानवापी-वर्णन

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (skanda.4.33.1)

॥ अगस्त्य उवाच॥ स्कंदज्ञानोदतीर्थस्य माहात्म्यं वद सांप्रतम्॥ ज्ञानवापीं प्रशंसंति यतः स्वर्गौकसोप्यलम्

agastya uvāca skaṁdajñānodatīrthasya māhātmyaṁ vada sāṁpratam jñānavāpīṁ praśaṁsaṁti yataḥ svargaukasopyalam

अगस्त्य ने कहा — हे स्कंद! अब ज्ञानोद तीर्थ की महिमा बताइए, जिसकी ज्ञानवापी की प्रशंसा स्वर्गवासी भी भरपूर करते हैं।

श्लोक 2 (skanda.4.33.2)

॥ स्कंद उवाच॥ घटोद्भव महाप्राज्ञ शृणु पापप्रणोदिनीम्॥ ज्ञानवाप्याः समुत्पत्तिं कथ्यमानां मयाधुना

skaṁda uvāca ghaṭodbhava mahāprājña śṛṇu pāpapraṇodinīm jñānavāpyāḥ samutpattiṁ kathyamānāṁ mayādhunā

स्कंद ने कहा — हे महाप्राज्ञ घटोद्भव! सुनो, अब मैं पापों को दूर करने वाली ज्ञानवापी की उत्पत्ति सुनाता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.4.33.3)

अनादिसिद्धे संसारे पुरा देवयुगे मुने॥ प्राप्तः कुतश्चिदीशानश्चरन्स्वैरमितस्ततः

anādisiddhe saṁsāre purā devayuge mune prāptaḥ kutaścidīśānaścaransvairamitastataḥ

हे मुने! इस अनादिसिद्ध संसार में, पूर्व देवयुग में, ईशान कहीं से आकर इधर-उधर स्वच्छंद विचरण कर रहे थे।

श्लोक 4 (skanda.4.33.4)

न वर्षंति यदाभ्राणि न प्रावर्तंत निम्रगाः॥ जलाभिलाषो न यदा स्नानपानादि कर्मणि

na varṣaṁti yadābhrāṇi na prāvartaṁta nimragāḥ jalābhilāṣo na yadā snānapānādi karmaṇi

जब न बादल बरसते थे, न नदियाँ बहती थीं, जब स्नान-पान आदि कर्मों के लिए जल की कोई कामना ही नहीं थी,

श्लोक 5 (skanda.4.33.5)

क्षारस्वादूदयोरेव यदासीज्जलदर्शनम्॥ प्रथिव्यां नरसंचारे वतर्माने क्वचित्क्वचित्

kṣārasvādūdayoreva yadāsījjaladarśanam prathivyāṁ narasaṁcāre vatarmāne kvacitkvacit

जब खारे और मीठे सागर में ही जल दिखाई देता था, तथापि पृथ्वी पर कहीं-कहीं मनुष्यों का संचार वर्तमान था,

श्लोक 6 (skanda.4.33.6)

निर्वाणकमलाक्षेत्रं श्रीमदानंदकाननम्॥ महाश्मशानं सर्वेषां बीजानां परमूषरम्

nirvāṇakamalākṣetraṁ śrīmadānaṁdakānanam mahāśmaśānaṁ sarveṣāṁ bījānāṁ paramūṣaram

उस समय ईशान उस निर्वाण-कमलाक्षक्षेत्र, श्रीमान आनंदकानन, महाश्मशान — जो समस्त कर्म-बीजों के लिए परम ऊसर भूमि है —

श्लोक 7 (skanda.4.33.7)

महाशयनसुप्तानां जंतूनां प्रतिबोधकम्॥ संसारसागरावर्त पतज्जंतुतरंडकम्

mahāśayanasuptānāṁ jaṁtūnāṁ pratibodhakam saṁsārasāgarāvarta patajjaṁtutaraṁḍakam

जो महानिद्रा में सोए प्राणियों को जगाने वाला, संसार-सागर के भँवर में गिरते प्राणियों के लिए नौका के समान है,

श्लोक 8 (skanda.4.33.8)

यातायातातिसंखिन्न जंतुविश्राममंडपम॥ अनेकजन्मगुणित कर्मसूत्रच्छिदाक्षुरम्

yātāyātātisaṁkhinna jaṁtuviśrāmamaṁḍapama anekajanmaguṇita karmasūtracchidākṣuram

जो आवागमन से अत्यंत थके प्राणियों का विश्राम-मंडप है, अनेक जन्मों से गुणित कर्म-सूत्र को काटने वाला छुरा है,

श्लोक 9 (skanda.4.33.9)

सच्चिदानंदनिलयं परब्रह्मरसायनम्॥ सुखसंतानजनकं मोक्षसाधनसिद्धिदम्

saccidānaṁdanilayaṁ parabrahmarasāyanam sukhasaṁtānajanakaṁ mokṣasādhanasiddhidam

जो सच्चिदानंद का निवास, परब्रह्म का रसायन है, सुख की संतति उत्पन्न करने वाला तथा मोक्ष के साधन में सिद्धि देने वाला है — वहाँ पहुँचे।

श्लोक 10 (skanda.4.33.10)

प्रविश्य क्षेत्रमेतत्स ईशानो जटिलस्तदा॥ लसत्त्रिशूलविमलरश्मिजालसमाकुलः॥ आलुलोके महालिंगं वैकुंठपरमेष्ठिनोः॥ महाहमहमिकायां प्रादुरास यदादितः

praviśya kṣetrametatsa īśāno jaṭilastadā lasattriśūlavimalaraśmijālasamākulaḥ āluloke mahāliṁgaṁ vaikuṁṭhaparameṣṭhinoḥ mahāhamahamikāyāṁ prādurāsa yadāditaḥ

इस क्षेत्र में प्रवेश कर जटाधारी ईशान, जो अपने त्रिशूल की चमकती निर्मल किरणों के जाल से युक्त थे, उस महालिंग को देखते रहे, जो वैकुंठ (विष्णु) और परमेष्ठी (ब्रह्मा) की महान अहमहमिका में सर्वप्रथम प्रकट हुआ था।

श्लोक 11 (skanda.4.33.11)

ज्योतिर्मयीभिर्मालाभिः परितः परिवेष्टितम्॥ वृंदैर्वृंदारकर्षीणां गणानां च निरंतरम्

jyotirmayībhirmālābhiḥ paritaḥ pariveṣṭitam vṛṁdairvṛṁdārakarṣīṇāṁ gaṇānāṁ ca niraṁtaram

वह चारों ओर ज्योतिर्मयी मालाओं से घिरा हुआ, देवताओं तथा गणों के समूहों से निरंतर वेष्टित था।

श्लोक 12 (skanda.4.33.12)

सिद्धानां योगिनां स्तोमैरर्च्यमानं निरंतरम्॥ गीयमानं च गंधर्वैः स्तूयमानं च चारणैः

siddhānāṁ yogināṁ stomairarcyamānaṁ niraṁtaram gīyamānaṁ ca gaṁdharvaiḥ stūyamānaṁ ca cāraṇaiḥ

सिद्धों और योगियों के समूहों द्वारा निरंतर पूजित, गंधर्वों द्वारा गाया जाता तथा चारणों द्वारा स्तुत,

श्लोक 13 (skanda.4.33.13)

अंगहारैरप्सरोभिः सेव्यमानमनेकधा॥ नीराज्यमानं सततं नागीभिर्मणिदीपकैः

aṁgahārairapsarobhiḥ sevyamānamanekadhā nīrājyamānaṁ satataṁ nāgībhirmaṇidīpakaiḥ

अप्सराओं के अंगहार-नृत्य से अनेक प्रकार से सेवित, नागकन्याओं द्वारा मणि-दीपकों से निरंतर आरती किया जाता,

श्लोक 14 (skanda.4.33.14)

विद्याधरीकिन्नरीभिस्त्रिकालं कृतमंडनम्॥ अमरीचमरीराजि वीज्यमानमितस्ततः

vidyādharīkinnarībhistrikālaṁ kṛtamaṁḍanam amarīcamarīrāji vījyamānamitastataḥ

विद्याधरी और किन्नरी स्त्रियों द्वारा तीनों समय अलंकृत, इधर-उधर देवांगनाओं की चँवर-पंक्ति से पंखा किया जाता हुआ।

श्लोक 15 (skanda.4.33.15)

अस्येशानस्य तल्लिंगं दृष्ट्वेच्छेत्यभवत्तदा॥ स्नपयामि महल्लिंगं कलशैः शीतलैर्जलैः

asyeśānasya talliṁgaṁ dṛṣṭvecchetyabhavattadā snapayāmi mahalliṁgaṁ kalaśaiḥ śītalairjalaiḥ

उस लिंग को देखकर ईशान के मन में यह इच्छा हुई — 'मैं शीतल जल के कलशों से इस महालिंग को स्नान कराऊँ।'

श्लोक 16 (skanda.4.33.16)

चखान च त्रिशूलेन दक्षिणाशोपकंठतः॥ कुंडं प्रचंडवेगेन रुद्रोरुद्रवपुर्धरः

cakhāna ca triśūlena dakṣiṇāśopakaṁṭhataḥ kuṁḍaṁ pracaṁḍavegena rudrorudravapurdharaḥ

रुद्रस्वरूप-धारी रुद्र ने त्रिशूल से दक्षिण दिशा के समीप, प्रचंड वेग से एक कुंड खोदा।

श्लोक 17 (skanda.4.33.17)

पृथिव्यावरणांभांसि निष्क्रांतानि तदा मुने॥ भूप्रमाणाद्दशगुणैर्यैरियं वसुधावृता

pṛthivyāvaraṇāṁbhāṁsi niṣkrāṁtāni tadā mune bhūpramāṇāddaśaguṇairyairiyaṁ vasudhāvṛtā

हे मुने! तब पृथ्वी को घेरने वाले जल निकल आए — जो पृथ्वी के प्रमाण से दस गुना अधिक होकर इस वसुधा को घेरे हुए हैं।

श्लोक 18 (skanda.4.33.18)

तैर्जलैः स्नापयांचक्रे त्वत्स्पृष्टैरन्यदेहिभिः॥ तुषारैर्जाड्यविधुरैर्जंजपूकौघहारिभिः

tairjalaiḥ snāpayāṁcakre tvatspṛṣṭairanyadehibhiḥ tuṣārairjāḍyavidhurairjaṁjapūkaughahāribhiḥ

उन जलों से, जो किसी अन्य देहधारी द्वारा स्पर्श न किए गए थे, उन्होंने स्नान कराया — बर्फ जैसे जड़ता-रहित, व्यर्थ बातों के समूह को हरने वाले जल से,

श्लोक 19 (skanda.4.33.19)

सन्मनोभिरिवात्यच्छैरनच्छैर्व्योमवर्त्मवत्॥ ज्योत्स्नावदुज्ज्वलच्छायैः पावनैः शंभुनामवत्॥ पीयूषवत्स्वादुतरैः सुखस्पर्शैर्गवांगवत्॥ निष्पापधीवद्गंभीरैस्तरलैः पापिशर्मवत्

sanmanobhirivātyacchairanacchairvyomavartmavat jyotsnāvadujjvalacchāyaiḥ pāvanaiḥ śaṁbhunāmavat pīyūṣavatsvādutaraiḥ sukhasparśairgavāṁgavat niṣpāpadhīvadgaṁbhīraistaralaiḥ pāpiśarmavat

सज्जन के मन के समान अत्यंत स्वच्छ किंतु आकाश-मार्ग के समान अदृश्य, चांदनी के समान उज्ज्वल छाया वाले, शंभु के नाम के समान पावन, अमृत के समान अति मधुर, गाय के अंग के समान सुखद स्पर्श वाले, निष्पाप बुद्धि के समान गंभीर, फिर भी पापी के सुख के समान चंचल,

श्लोक 20 (skanda.4.33.20)

विजिताब्जमहागंधैः पाटलामोदमोदिभिः॥ अदृष्टपूर्वलोकानां मनोनयनहारिभिः

vijitābjamahāgaṁdhaiḥ pāṭalāmodamodibhiḥ adṛṣṭapūrvalokānāṁ manonayanahāribhiḥ

बड़े-बड़े कमलों की सुगंध को भी जीतने वाले, पाटल पुष्पों की सुगंध से आनंदित, जिन्हें पहले कभी न देखने वाले लोगों के मन और नेत्रों को हरने वाले,

श्लोक 21 (skanda.4.33.21)

अज्ञानतापसंतप्त प्राणिप्राणैकरक्षिभिः॥ पंचामृतानां कलशैः स्नपनातिफलप्रदैः

ajñānatāpasaṁtapta prāṇiprāṇaikarakṣibhiḥ paṁcāmṛtānāṁ kalaśaiḥ snapanātiphalapradaiḥ

अज्ञान के ताप से संतप्त प्राणियों के प्राणों के एकमात्र रक्षक, तथा पंचामृत के कलशों से स्नान का अत्यधिक फल देने वाले,

श्लोक 22 (skanda.4.33.22)

श्रद्धोपस्पर्शि दृदयलिंग त्रितयहेतुभिः॥ अज्ञानतिमिरार्काभैर्ज्ञानदान निदायकैः

śraddhopasparśi dṛdayaliṁga tritayahetubhiḥ ajñānatimirārkābhairjñānadāna nidāyakaiḥ

श्रद्धा से हृदय, लिंग तथा त्रिविध हेतु का स्पर्श करने वाले, अज्ञान के अंधकार में सूर्य के समान, ज्ञान के दान की निधि देने वाले,

श्लोक 23 (skanda.4.33.23)

विश्वभर्तुरुमास्पर्शसुखातिसुखकारिभिः॥ महावभृथसुस्नान महाशुद्धिविधायिभिः

viśvabharturumāsparśasukhātisukhakāribhiḥ mahāvabhṛthasusnāna mahāśuddhividhāyibhiḥ

विश्वभर्ता को उमा के स्पर्श के सुख से भी अधिक सुख देने वाले, महाअवभृथ स्नान की तरह महान शुद्धि करने वाले —

श्लोक 24 (skanda.4.33.24)

सहस्रधारैः कलशैः स ईशानो घटोद्भव॥ सहस्रकृत्वः स्नपयामास संहृष्टमानसः

sahasradhāraiḥ kalaśaiḥ sa īśāno ghaṭodbhava sahasrakṛtvaḥ snapayāmāsa saṁhṛṣṭamānasaḥ

हे घटोद्भव! उन हजार धाराओं वाले कलशों से, प्रसन्न मन से, ईशान ने उस लिंग को हजार बार स्नान कराया।

श्लोक 25 (skanda.4.33.25)

ततः प्रसन्नो भगवान्विश्वात्मा विश्वलोचनः॥ तमुवाच तदेशानं रुद्रं रुद्रवपुर्धरम्

tataḥ prasanno bhagavānviśvātmā viśvalocanaḥ tamuvāca tadeśānaṁ rudraṁ rudravapurdharam

तब विश्वात्मा, विश्व के नेत्र-स्वरूप भगवान प्रसन्न होकर, रुद्र-स्वरूपधारी उस ईशान से बोले —

श्लोक 26 (skanda.4.33.26)

तव प्रसन्नोस्मीशान कर्मणानेन सुव्रत॥ गुरुणानन्यपूर्वेण ममातिप्रीतिकारिणा

tava prasannosmīśāna karmaṇānena suvrata guruṇānanyapūrveṇa mamātiprītikāriṇā

'हे ईशान, हे सुव्रत! तुम्हारे इस अनुपम कर्म से, जिससे मुझे अत्यंत प्रीति हुई है, मैं प्रसन्न हूँ।'

श्लोक 27 (skanda.4.33.27)

ततस्त्वं जटिलेशान वरं ब्रूहि तपोधन॥ अदेयं न तवास्त्यद्य महोद्यमपरायण

tatastvaṁ jaṭileśāna varaṁ brūhi tapodhana adeyaṁ na tavāstyadya mahodyamaparāyaṇa

'अतः हे जटाधारी ईशान, हे तपोधन! वर माँगो। हे महान उद्यमशील! आज तुम्हें कुछ भी अदेय नहीं है।'

श्लोक 28 (skanda.4.33.28)

॥ ईशान उवाच॥ यदि प्रसन्नो देवेश वरयोग्योस्म्यहं यदि॥ तदेतदतुलं तीर्थं तव नाम्नास्तु शंकर॥ ॥विश्वेश्वर उवाच॥ त्रिलोक्यां यानि तीर्थानि भूर्भुवःस्वः स्थितान्यपि॥ तेभ्योखिलेभ्यस्तीर्थेभ्यः शिवतीर्थमिदं परम्

īśāna uvāca yadi prasanno deveśa varayogyosmyahaṁ yadi tadetadatulaṁ tīrthaṁ tava nāmnāstu śaṁkara viśveśvara uvāca trilokyāṁ yāni tīrthāni bhūrbhuvaḥsvaḥ sthitānyapi tebhyokhilebhyastīrthebhyaḥ śivatīrthamidaṁ param

ईशान ने कहा — 'हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि मैं वर के योग्य हूँ, तो हे शंकर! यह अनुपम तीर्थ आपके ही नाम से हो।' विश्वेश्वर ने कहा — 'त्रिलोक में जितने भी तीर्थ हैं, भू, भुवः और स्वः में स्थित, उन समस्त तीर्थों से यह शिव-तीर्थ श्रेष्ठ होगा।'

श्लोक 29 (skanda.4.33.29)

शिवज्ञानमिति ब्रूयुः शिवशब्दार्थचिंतकाः॥ तच्च ज्ञानं द्रवीभूतमिह मे महिमोदयात्

śivajñānamiti brūyuḥ śivaśabdārthaciṁtakāḥ tacca jñānaṁ dravībhūtamiha me mahimodayāt

'शिव' शब्द के अर्थ पर विचार करने वाले इसे शिवज्ञान कहते हैं; और वह ज्ञान ही मेरी महिमा के उदय से यहाँ द्रव-रूप हो गया है।

श्लोक 30 (skanda.4.33.30)

अतो ज्ञानोद नामैतत्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ अस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते

ato jñānoda nāmaitattīrthaṁ trailokyaviśrutam asya darśanamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate

इसलिए यह त्रैलोक्य-विख्यात तीर्थ 'ज्ञानोद' नाम से जाना जाएगा। इसके दर्शनमात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 31 (skanda.4.33.31)

ज्ञानोदतीर्थसंस्पर्शादश्वमेधफलं लभेत्॥ स्पर्शनाचमनाभ्यां च राजसूयाश्वमेधयोः

jñānodatīrthasaṁsparśādaśvamedhaphalaṁ labhet sparśanācamanābhyāṁ ca rājasūyāśvamedhayoḥ

ज्ञानोद तीर्थ के स्पर्श से अश्वमेध का फल मिलता है; इसके स्पर्श और आचमन से राजसूय तथा अश्वमेध दोनों का फल मिलता है।

श्लोक 32 (skanda.4.33.32)

फल्गुतीर्थे नरः स्नात्वा संतर्प्य च पितामहान्॥ यत्फलं समवाप्नोति तदत्र श्राद्धकर्मणा

phalgutīrthe naraḥ snātvā saṁtarpya ca pitāmahān yatphalaṁ samavāpnoti tadatra śrāddhakarmaṇā

फल्गु तीर्थ में स्नान कर पितरों का तर्पण करने से मनुष्य जो फल पाता है, वह फल यहाँ श्राद्ध-कर्म से प्राप्त होता है।

श्लोक 33 (skanda.4.33.33)

गुरुपुष्यासिताष्टम्यां व्यतीपातो यदा भवेत्॥ तदात्र श्राद्धकरणाद्गयाकोटिगुणं भवेत्

gurupuṣyāsitāṣṭamyāṁ vyatīpāto yadā bhavet tadātra śrāddhakaraṇādgayākoṭiguṇaṁ bhavet

जब गुरुवार को पुष्य नक्षत्र वाली कृष्ण अष्टमी को व्यतीपात योग हो, तब यहाँ श्राद्ध करने से गया से करोड़ गुना अधिक फल मिलता है।

श्लोक 34 (skanda.4.33.34)

यत्फलं समवाप्नोति पितॄन्संतर्प्य पुष्करे॥ तत्फलं कोटिगुणितं ज्ञानतीर्थे तिलोदकैः

yatphalaṁ samavāpnoti pitṝnsaṁtarpya puṣkare tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ jñānatīrthe tilodakaiḥ

पुष्कर में पितरों का तर्पण करने से जो फल मिलता है, वह फल यहाँ ज्ञान-तीर्थ में तिल-जल अर्पण करने से करोड़ गुना हो जाता है।

श्लोक 35 (skanda.4.33.35)

सन्निहत्यां कुरुक्षेत्रे तमोग्रस्ते विवस्वति॥ यत्फलं पिंडदानेन तज्ज्ञानोदे दिने दिने

sannihatyāṁ kurukṣetre tamograste vivasvati yatphalaṁ piṁḍadānena tajjñānode dine dine

सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र की सन्निहत्या में पिंडदान से जो फल मिलता है, वही फल यहाँ ज्ञानोद में प्रतिदिन प्राप्त होता है।

श्लोक 36 (skanda.4.33.36)

पिंडनिर्वपणं येषां ज्ञानतीर्थे सुतैः कृतम्॥ मोदंते शिवलोके ते यावदाभूतसंप्लवम्

piṁḍanirvapaṇaṁ yeṣāṁ jñānatīrthe sutaiḥ kṛtam modaṁte śivaloke te yāvadābhūtasaṁplavam

जिनके पुत्रों ने ज्ञान-तीर्थ में पिंडदान किया है, वे प्रलय होने तक शिवलोक में आनंदित रहते हैं।

श्लोक 37 (skanda.4.33.37)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः॥ प्रातः स्नात्वाथ पीतांभस्त्वंतर्लिंगमयो भवेत्॥ एकादश्यामुपोष्यात्र प्राश्नाति चुलुकत्रयम्॥ हृदये तस्य जायंते त्रीणि लिंगान्यसंशयम्

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāmupavāsī narottamaḥ prātaḥ snātvātha pītāṁbhastvaṁtarliṁgamayo bhavet ekādaśyāmupoṣyātra prāśnāti culukatrayam hṛdaye tasya jāyaṁte trīṇi liṁgānyasaṁśayam

अष्टमी और चतुर्दशी को उपवास करने वाला श्रेष्ठ मनुष्य प्रातः स्नान कर उसका जल पीकर, अंतर्लिंगमय हो जाता है। एकादशी को उपवास करके यहाँ तीन अंजलि जल पीने वाले के हृदय में निःसंदेह तीन लिंग प्रकट हो जाते हैं।

श्लोक 38 (skanda.4.33.38)

ईशानतीर्थे यः स्नात्वा विशेषात्सोमवासरे॥ संतर्प्य देवर्षि पितॄन्दत्त्वा दानम स्वशक्तितः

īśānatīrthe yaḥ snātvā viśeṣātsomavāsare saṁtarpya devarṣi pitṝndattvā dānama svaśaktitaḥ

ईशान-तीर्थ में स्नान करने वाला, विशेष रूप से सोमवार को, देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण कर अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर,

श्लोक 39 (skanda.4.33.39)

ततः समर्च्य श्रीलिंगं महासंभारविस्तरैः॥ अत्रापि दत्त्वा नानार्थान्कृतकृत्योभवेन्नरः

tataḥ samarcya śrīliṁgaṁ mahāsaṁbhāravistaraiḥ atrāpi dattvā nānārthānkṛtakṛtyobhavennaraḥ

फिर महान सामग्रियों के विस्तार से श्रीलिंग की पूजा कर, यहाँ भी नाना प्रकार के दान देकर, मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 40 (skanda.4.33.40)

उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काललोपजम्॥ क्षणेन तदपाकृत्य ज्ञानवाञ्जायते द्विजः

upāsya saṁdhyāṁ jñānode yatpāpaṁ kālalopajam kṣaṇena tadapākṛtya jñānavāñjāyate dvijaḥ

काल के दोष से उत्पन्न जो पाप हो, ज्ञानोद में संध्या-उपासना करके, उसे क्षणभर में दूर कर द्विज ज्ञानवान हो जाता है।

श्लोक 41 (skanda.4.33.41)

शिवतीर्थमिदं प्रोक्तं ज्ञानतीर्थमिदं शुभम्॥ तारकाख्यमिदं तीर्थं मोक्षतीर्थमिदं धुवम्

śivatīrthamidaṁ proktaṁ jñānatīrthamidaṁ śubham tārakākhyamidaṁ tīrthaṁ mokṣatīrthamidaṁ dhuvam

यह शिव-तीर्थ कहा गया है, यह शुभ ज्ञान-तीर्थ है; यह तारक नाम का तीर्थ है, यह निश्चित मोक्ष-तीर्थ है।

श्लोक 42 (skanda.4.33.42)

स्मरणादपि पापौघो ज्ञानोदस्य क्षयेद्ध्रुवम्॥ दर्शनात्स्पर्शनात्स्नानात्पानाद्धर्मादिसंभवः

smaraṇādapi pāpaugho jñānodasya kṣayeddhruvam darśanātsparśanātsnānātpānāddharmādisaṁbhavaḥ

स्मरणमात्र से ही ज्ञानोद के पापों का प्रवाह निश्चय ही क्षीण हो जाता है; दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से तो धर्म आदि उत्पन्न ही होते हैं।

श्लोक 43 (skanda.4.33.43)

डाकिनीशाकिनी भूतप्रेतवेतालराक्षसाः॥ ग्रहाः कूष्मांडझोटिंगाः कालकर्णी शिशुग्रहाः

ḍākinīśākinī bhūtapretavetālarākṣasāḥ grahāḥ kūṣmāṁḍajhoṭiṁgāḥ kālakarṇī śiśugrahāḥ

डाकिनी, शाकिनी, भूत, प्रेत, वेताल, राक्षस, ग्रह, कूष्मांड, झोटिंग, कालकर्णी तथा शिशुओं को पकड़ने वाले ग्रह —

श्लोक 44 (skanda.4.33.44)

ज्वरापस्मारविस्फोटद्वितीयकचतुर्थकाः॥ सर्वे प्रशममायांति शिवर्तार्थजलेक्षणात्

jvarāpasmāravisphoṭadvitīyakacaturthakāḥ sarve praśamamāyāṁti śivartārthajalekṣaṇāt

ज्वर, अपस्मार, विस्फोटक, द्वितीयक और चतुर्थक ज्वर — ये सब शिव-तीर्थ के जल के दर्शनमात्र से शांत हो जाते हैं।

श्लोक 45 (skanda.4.33.45)

ज्ञानोदतीर्थपानीयैर्लिंगं यः स्नापयेत्सुधीः॥ सर्वतीर्थोदकैस्तेन ध्रुवं संस्नापितं भवेत्

jñānodatīrthapānīyairliṁgaṁ yaḥ snāpayetsudhīḥ sarvatīrthodakaistena dhruvaṁ saṁsnāpitaṁ bhavet

जो बुद्धिमान ज्ञानोद तीर्थ के जल से लिंग को स्नान कराता है, उसने निश्चय ही समस्त तीर्थों के जल से लिंग को स्नान करा दिया है।

श्लोक 46 (skanda.4.33.46)

ज्ञानरूपोह मेवात्र द्रवमूर्तिं विधाय च॥ जाड्यविध्वंसनं कुर्यां कुर्यां ज्ञानोपदेशनम्॥ कृतकृत्यमिवात्मानं सोप्यमंस्तत्रिशूलभृत्

jñānarūpoha mevātra dravamūrtiṁ vidhāya ca jāḍyavidhvaṁsanaṁ kuryāṁ kuryāṁ jñānopadeśanam kṛtakṛtyamivātmānaṁ sopyamaṁstatriśūlabhṛt

'मैं यहाँ स्वयं ज्ञान-स्वरूप होकर, द्रव-मूर्ति धारण कर, जड़ता का विध्वंस करूँगा तथा ज्ञान का उपदेश दूँगा।' ऐसा कहकर त्रिशूलधारी ईशान ने स्वयं को कृतकृत्य माना।

श्लोक 47 (skanda.4.33.47)

ईशानो जटिलो रुद्रस्तत्प्राश्य परमोदकम्॥ अवाप्तवान्परं ज्ञानं येन निर्वृतिमाप्तवान्

īśāno jaṭilo rudrastatprāśya paramodakam avāptavānparaṁ jñānaṁ yena nirvṛtimāptavān

जटाधारी रुद्र ईशान ने उस परम जल को पीकर परम ज्ञान प्राप्त किया, जिससे उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई।

श्लोक 48 (skanda.4.33.48)

॥ स्कंद उवाच॥ कलशोद्भव चित्रार्थमितिहासं पुरातनम्॥ ज्ञानवाप्यां हि यद्वृत्तं तदाख्यामि निशामय

skaṁda uvāca kalaśodbhava citrārthamitihāsaṁ purātanam jñānavāpyāṁ hi yadvṛttaṁ tadākhyāmi niśāmaya

स्कंद ने कहा — हे कलशोद्भव! अब मैं ज्ञानवापी में घटित एक अद्भुत प्राचीन कथा सुनाता हूँ, सुनो।

श्लोक 49 (skanda.4.33.49)

हरिस्वामीति विख्यातः काश्यामासीद्विजः पुरा॥ तस्यैका तनया जाता रूपेणाऽप्रतिमा भुवि

harisvāmīti vikhyātaḥ kāśyāmāsīdvijaḥ purā tasyaikā tanayā jātā rūpeṇā'pratimā bhuvi

पूर्वकाल में काशी में हरिस्वामी नामक एक विख्यात ब्राह्मण रहता था। उसकी एक पुत्री हुई, जो पृथ्वी पर रूप में अद्वितीय थी।

श्लोक 50 (skanda.4.33.50)

न समा शीलसंपत्त्या तस्या काचन भूतले॥ कलाकलापकुशला स्वरेणजितकोकिला

na samā śīlasaṁpattyā tasyā kācana bhūtale kalākalāpakuśalā svareṇajitakokilā

शील-संपत्ति में पृथ्वी पर उसके समान कोई न था; वह समस्त कलाओं में निपुण थी, उसका स्वर कोयल को भी जीतता था।

श्लोक 51 (skanda.4.33.51)

न नारी तादृगस्तीह ना भरी किन्नरी न च॥ विद्याधरी न नो नागी गंधर्वी नासुरी न च

na nārī tādṛgastīha nā bharī kinnarī na ca vidyādharī na no nāgī gaṁdharvī nāsurī na ca

उसके समान न कोई अप्सरा थी, न किन्नरी, न विद्याधरी, न नागकन्या, न गंधर्वी, न असुर-कन्या।

श्लोक 52 (skanda.4.33.52)

सर्वसौंदर्यनिलया सर्वलक्षणसत्खनिः॥ अधिशेते ध्रुवं ध्वांतं तन्मौलिं ब्रध्न साध्वसात्

sarvasauṁdaryanilayā sarvalakṣaṇasatkhaniḥ adhiśete dhruvaṁ dhvāṁtaṁ tanmauliṁ bradhna sādhvasāt

वह समस्त सौंदर्य का निवास तथा समस्त शुभ लक्षणों की सच्ची खान थी। मुझे लगता है, सूर्य के भय से अंधकार सदा उसके मस्तक पर ही बसता होगा।

श्लोक 53 (skanda.4.33.53)

तदास्य शरणं यातो मन्ये दर्शभयाच्छशी॥ दिवापि न त्यजेत्तां तु त्रस्तश्चंडमरीचितः

tadāsya śaraṇaṁ yāto manye darśabhayācchaśī divāpi na tyajettāṁ tu trastaścaṁḍamarīcitaḥ

अमावस्या के भय से चंद्रमा भी शायद इसी की शरण में गया होगा; और प्रचंड सूर्य से भयभीत होकर वह दिन में भी इसे नहीं छोड़ता होगा।

श्लोक 54 (skanda.4.33.54)

तद्भ्रूर्भ्रमरराजीव गंडपत्रलतांतरे॥ उदंचन्न्यंचदुड्डीन गतेरभ्यासभाजिनी

tadbhrūrbhramararājīva gaṁḍapatralatāṁtare udaṁcannyaṁcaduḍḍīna gaterabhyāsabhājinī

उसकी भौंहें, गाल की लताओं के बीच भ्रमरों की पंक्ति के समान, ऊपर उठने-गिरने और उड़ने की गति का बार-बार अभ्यास करती थीं।

श्लोक 55 (skanda.4.33.55)

तच्चारुलोचनक्षेत्रे विचरंतौ च खंजनौ॥ सदैव शारदीं प्रीतिं निर्विशेते निजेच्छया॥ सुदत्या रदनश्रेणी छेदेषु विषमेषुणा॥ विहिता कांचनी रेखा क्वेंदावेतावती कला

taccārulocanakṣetre vicaraṁtau ca khaṁjanau sadaiva śāradīṁ prītiṁ nirviśete nijecchayā sudatyā radanaśreṇī chedeṣu viṣameṣuṇā vihitā kāṁcanī rekhā kveṁdāvetāvatī kalā

उसके सुंदर नेत्रों के क्षेत्र में विचरण करती एक जोड़ी खंजन पक्षी सदा अपनी इच्छा से शरद ऋतु का सुख भोगते थे। उसकी सुंदर दंत-पंक्ति के अंतराल में मदन ने मानो सुनहरी रेखा बना दी हो — भला चंद्रमा में ऐसी कला कहाँ?

श्लोक 56 (skanda.4.33.56)

प्रायो मदन भूपाल हर्म्य रत्नांतरे शुभे॥ जितप्रवालसुच्छाये तस्या रदनवाससी

prāyo madana bhūpāla harmya ratnāṁtare śubhe jitapravālasucchāye tasyā radanavāsasī

उसके प्रवाल की कांति को भी जीतने वाले वे दोनों ओठ मानो मदन-राजा के महल की सुंदर रत्नमय पर्दे-कुटीर ही थे।

श्लोक 57 (skanda.4.33.57)

स्वर्गे मर्त्ये च पाताले नैषा रेखा क्वचित्स्त्रियाम्॥ तत्कंठरेखात्रितय व्याजेन शपते स्मरः

svarge martye ca pātāle naiṣā rekhā kvacitstriyām tatkaṁṭharekhātritaya vyājena śapate smaraḥ

स्वर्ग, मृत्युलोक अथवा पाताल में किसी भी स्त्री में ऐसी रेखा कहीं नहीं है; उसके कंठ की उन तीन रेखाओं के बहाने कामदेव स्वयं शपथ लेता है।

श्लोक 58 (skanda.4.33.58)

शंके चित्त भुवो राज्ञो लसत्पटकुटीद्वयम्॥ अनर्घ्यरत्नकोशाढ्यं तम्या वक्षोरुहद्वयम्

śaṁke citta bhuvo rājño lasatpaṭakuṭīdvayam anarghyaratnakośāḍhyaṁ tamyā vakṣoruhadvayam

मुझे लगता है, उसके दोनों वक्षस्थल कामराज के मन-नगर के अनमोल रत्न-कोष से भरे दो शोभित तंबू ही हैं।

श्लोक 59 (skanda.4.33.59)

अनंगभू नियमतोऽदृश्ये मध्ये नतभ्रुवः॥ रोमालीलक्षिकामूर्ध्वामिव यष्टिं विधिर्व्यधात्

anaṁgabhū niyamato'dṛśye madhye natabhruvaḥ romālīlakṣikāmūrdhvāmiva yaṣṭiṁ vidhirvyadhāt

निश्चित ही विधाता ने उस झुकी-भौंहों वाली के मध्य भाग में, अनंग (कामदेव) के अदृश्य जन्मस्थान को, रोम-रेखा के रूप में एक पतली छड़ी के समान चिह्नित किया है।

श्लोक 60 (skanda.4.33.60)

तस्या नाभीदरीं प्राप्य कंदर्पोऽनंगता गतः॥ पुनः प्राप्तुमिवांगानि तप्यते परमं तपः

tasyā nābhīdarīṁ prāpya kaṁdarpo'naṁgatā gataḥ punaḥ prāptumivāṁgāni tapyate paramaṁ tapaḥ

उसकी नाभि की गहराई में पहुँचकर ही कामदेव अनंग (शरीररहित) हुआ था; अब वह मानो पुनः अपने अंगों को पाने के लिए वहीं परम तप कर रहा है।

श्लोक 61 (skanda.4.33.61)

गुरुणैतन्नितंबेन महामन्मथ दीक्षया॥ भुवि के के युवानो न स्वाधीना प्रापितादृशाम्

guruṇaitannitaṁbena mahāmanmatha dīkṣayā bhuvi ke ke yuvāno na svādhīnā prāpitādṛśām

उसके भारी नितंब से, महान मन्मथ की दीक्षा से, पृथ्वी पर कौन-कौन युवा उसके वश में नहीं हुआ?

श्लोक 62 (skanda.4.33.62)

ऊरुस्तंभेन चैतस्याः स्तंभवत्कस्यनो मनः॥ तस्तंभेन मुने वापि सुवृत्तेन सुवर्तनम्

ūrustaṁbhena caitasyāḥ staṁbhavatkasyano manaḥ tastaṁbhena mune vāpi suvṛttena suvartanam

हे मुने! उसकी जंघा के स्तंभ से किसका मन स्तंभित नहीं हुआ, उसके सुगोल स्तंभ से किसका सुंदर आचरण भी उसी के इर्द-गिर्द नहीं घूमने लगा?

श्लोक 63 (skanda.4.33.63)

पादांगुष्ठनखज्योतिः प्रभया कस्य न प्रभा॥ विवेकजनिताऽध्वंसि मुने तस्या मृगीदृशः

pādāṁguṣṭhanakhajyotiḥ prabhayā kasya na prabhā vivekajanitā'dhvaṁsi mune tasyā mṛgīdṛśaḥ

हे मुने! उसके पैर के अंगूठे के नख की ज्योति की प्रभा से किसकी बुद्धि प्रकाशित नहीं हुई? उस मृगनयनी के इस विवेक-नाशक सौंदर्य से कौन बच सका?

श्लोक 64 (skanda.4.33.64)

सा प्रत्यहं ज्ञानवाप्यां स्नायं स्नायं शिवालये॥ संमार्जनादि कर्माणि कुरुतेऽनन्यमानसा॥ तत्पादप्रतिबिंबेषु रेखा शष्पांकुरं चरन्॥ नान्यद्वनांतरं याति काश्यां यूनां मनोमृगः

sā pratyahaṁ jñānavāpyāṁ snāyaṁ snāyaṁ śivālaye saṁmārjanādi karmāṇi kurute'nanyamānasā tatpādapratibiṁbeṣu rekhā śaṣpāṁkuraṁ caran nānyadvanāṁtaraṁ yāti kāśyāṁ yūnāṁ manomṛgaḥ

वह प्रतिदिन ज्ञानवापी में स्नान करके, शिवालय में झाड़ू-बुहारी आदि कार्य एकाग्र मन से करती थी। उसके चरण-प्रतिबिंब में उगे घास के अंकुर पर मानो चरते हुए, काशी के युवकों का मृग-मन किसी अन्य वन में नहीं जाता था।

श्लोक 65 (skanda.4.33.65)

तदास्य पंकजं हित्वा यूनां नेत्रालिमालया॥ न लतांतरमासेवि अप्यामोदप्रसूनयुक्

tadāsya paṁkajaṁ hitvā yūnāṁ netrālimālayā na latāṁtaramāsevi apyāmodaprasūnayuk

उसके मुख-कमल को छोड़कर, युवकों के नेत्र-रूपी भ्रमर-माला किसी अन्य सुगंधित लता की सेवा नहीं करती थी।

श्लोक 66 (skanda.4.33.66)

सुलोचनापि सा कन्या प्रेक्षेतास्यं न कस्यचित्॥ सुश्रवा अपि सा बाला नादत्ते कस्यचिद्वचः

sulocanāpi sā kanyā prekṣetāsyaṁ na kasyacit suśravā api sā bālā nādatte kasyacidvacaḥ

सुंदर नेत्रों वाली वह कन्या किसी का मुख नहीं देखती थी; अच्छे कानों वाली वह बालिका किसी की भी बात नहीं सुनती थी।

श्लोक 67 (skanda.4.33.67)

सुशीला शीलसंपन्ना रहस्तद्विरहातुरैः॥ प्रार्थितापि सुरूपाढ्यैर्नाभिलाषं बबंध सा

suśīlā śīlasaṁpannā rahastadvirahāturaiḥ prārthitāpi surūpāḍhyairnābhilāṣaṁ babaṁdha sā

शीलसंपन्ना वह सुशीला, उसके विरह में व्याकुल सुंदर-रूप युवकों द्वारा एकांत में प्रार्थना किए जाने पर भी, कभी उनके प्रति अभिलाषा नहीं रखती थी।

श्लोक 68 (skanda.4.33.68)

धनैस्तस्याजनेतापि युवभिः प्रार्थितो बहु॥ नाशकत्तां सुलीलां सदातुं शीलोर्जितश्रियम्

dhanaistasyājanetāpi yuvabhiḥ prārthito bahu nāśakattāṁ sulīlāṁ sadātuṁ śīlorjitaśriyam

युवकों ने उसके पिता से भी धन देकर बहुत प्रार्थना की, फिर भी वह उस शीलशालिनी सुलीला को किसी को भी नहीं दे सका।

श्लोक 69 (skanda.4.33.69)

ज्ञानोदतीर्थभजनात्सा सुशीला कुमाग्किा॥ बहिरंतस्तदाऽद्राक्षीत्सर्वलिंगमयं जगत

jñānodatīrthabhajanātsā suśīlā kumāgkiā bahiraṁtastadā'drākṣītsarvaliṁgamayaṁ jagata

ज्ञानोद तीर्थ की भक्ति से वह सुशीला कुमारी बाहर और भीतर, सारे जगत को लिंगमय देखने लगी थी।

श्लोक 70 (skanda.4.33.70)

कदाचिदेकदा तां तु प्रसुप्तां सदनांगणे॥ मोहितो रूपसंपत्त्या कश्चिद्विद्याधरोऽहरत्

kadācidekadā tāṁ tu prasuptāṁ sadanāṁgaṇe mohito rūpasaṁpattyā kaścidvidyādharo'harat

एक दिन घर के आँगन में सोई हुई उसे, उसके रूप-सौंदर्य से मोहित होकर, एक विद्याधर हर ले गया।

श्लोक 71 (skanda.4.33.71)

व्योमवर्त्मनितां रात्रौ यावन्मलयपर्वतम्॥ स निनीषति तावच्च विद्युन्माली समागतः

vyomavartmanitāṁ rātrau yāvanmalayaparvatam sa ninīṣati tāvacca vidyunmālī samāgataḥ

रात्रि में आकाश-मार्ग से जब तक वह उसे मलय पर्वत तक ले जाने को हुआ, तब तक विद्युन्माली आ पहुँचा —

श्लोक 72 (skanda.4.33.72)

राक्षसो भीषणवपुः कपालकृतकुंडलः॥ वसारुधिरलिप्तांगः श्मश्रुलः पिंगलोचनः

rākṣaso bhīṣaṇavapuḥ kapālakṛtakuṁḍalaḥ vasārudhiraliptāṁgaḥ śmaśrulaḥ piṁgalocanaḥ

एक भयंकर आकृति वाला राक्षस, जो कपाल के कुंडल पहने, चर्बी-रक्त से लिप्त शरीर वाला, दाढ़ी-मूँछ वाला तथा पिंगल नेत्रों वाला था।

श्लोक 73 (skanda.4.33.73)

राक्षस उवाच॥ ममदृग्गोचरं यातो विद्याधरकुमारक॥ अद्य त्वामेतया सार्धं प्रेषयामि यमालयम्॥ चकंपेऽतीव संभीता कदलीदलवन्मुहुः

rākṣasa uvāca mamadṛggocaraṁ yāto vidyādharakumāraka adya tvāmetayā sārdhaṁ preṣayāmi yamālayam cakaṁpe'tīva saṁbhītā kadalīdalavanmuhuḥ

राक्षस ने कहा — 'हे विद्याधर-कुमार! अब तू मेरी दृष्टि में आ गया है; आज मैं तुझे इसके साथ यमलोक भेज दूँगा।' यह सुनकर वह अत्यंत भयभीत, केले के पत्ते की भाँति बार-बार काँपने लगी।

श्लोक 74 (skanda.4.33.74)

निजघान त्रिशूलेन रक्षो विद्याधरं च तम्॥ विद्याधरकुमारोपि नितरां मधुराकृतिः

nijaghāna triśūlena rakṣo vidyādharaṁ ca tam vidyādharakumāropi nitarāṁ madhurākṛtiḥ

राक्षस ने त्रिशूल से विद्याधर पर प्रहार किया; किंतु अत्यंत मधुर आकृति वाला वह महाबली विद्याधर-कुमार,

श्लोक 75 (skanda.4.33.75)

तद्भीषणत्रिशूलेन भिन्नोस्को महाबलः॥ जघान मुष्टिघातेन वज्रपातोपमेन तम्

tadbhīṣaṇatriśūlena bhinnosko mahābalaḥ jaghāna muṣṭighātena vajrapātopamena tam

उस भयंकर त्रिशूल से अपनी छाती बिंधने पर भी, वज्रपात के समान मुट्ठी के प्रहार से उस पर वार किया।

श्लोक 76 (skanda.4.33.76)

नरमांसवसामत्तं विद्युन्मालिनमाहवे॥ चूर्णितो मुष्टिपातेन सोऽपतद्वसुधातले

naramāṁsavasāmattaṁ vidyunmālinamāhave cūrṇito muṣṭipātena so'patadvasudhātale

मनुष्य-मांस-चर्बी से मत्त वह विद्युन्माली, मुट्ठी के प्रहार से चूर्ण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 77 (skanda.4.33.77)

राक्षसो मृत्युवशगो वज्रेणेव महीधरः॥ विद्याधरोपि तच्छूलघातेन विकलीकृतः

rākṣaso mṛtyuvaśago vajreṇeva mahīdharaḥ vidyādharopi tacchūlaghātena vikalīkṛtaḥ

वह राक्षस मृत्यु के वश हो गया, जैसे वज्र से कोई पर्वत गिर पड़े। विद्याधर भी उस त्रिशूल के प्रहार से अत्यंत विकल हो चुका था।

श्लोक 78 (skanda.4.33.78)

उवाच गद्गदं वाक्यं विघूर्णित विलोचनः॥ प्रिये मुधा समानीता सुशित्यर्धोक्तिमुच्चरन्

uvāca gadgadaṁ vākyaṁ vighūrṇita vilocanaḥ priye mudhā samānītā suśityardhoktimuccaran

आँखें घूमती हुई, गद्गद वाणी में, आधा वाक्य बोलते हुए उसने कहा — 'हे प्रिये! व्यर्थ ही मैं तुम्हें ले आया...'

श्लोक 79 (skanda.4.33.79)

जहौ प्राणान्रणे वीरस्तां प्रियां परितः स्मरन्

jahau prāṇānraṇe vīrastāṁ priyāṁ paritaḥ smaran

और वह वीर, युद्ध में अपनी प्रिया का स्मरण करते हुए ही प्राण त्याग गया।

श्लोक 80 (skanda.4.33.80)

अनन्यपूर्वसंस्पर्श सुखं समनुभूय सा॥ तमेव च पतिं मत्वा चक्रे शोकाग्निसात्तनुम्

ananyapūrvasaṁsparśa sukhaṁ samanubhūya sā tameva ca patiṁ matvā cakre śokāgnisāttanum

उस अनुपम स्पर्श-सुख का अनुभव कर, तथा उसी को अपना पति मानकर, वह उसके शोक की अग्नि में अपना शरीर समर्पित कर बैठी।

श्लोक 81 (skanda.4.33.81)

लिंगत्रयशरीरिण्यास्तस्याः सान्निध्यतः स हि॥ दिव्यं वपुः समासाद्य राक्षसस्त्रिदिवं ययौ

liṁgatrayaśarīriṇyāstasyāḥ sānnidhyataḥ sa hi divyaṁ vapuḥ samāsādya rākṣasastridivaṁ yayau

त्रिविध-लिंगमय शरीर वाली उस कन्या के सामीप्य मात्र से वह राक्षस दिव्य शरीर पाकर स्वर्ग को गया।

श्लोक 82 (skanda.4.33.82)

रणे पणीकृतप्राणो विद्याधरसुतोपि सः॥ अंते प्रियां स्मरन्प्राप जनुर्मलयकेतुतः॥ ध्यायंती सापि तं बाला विद्याधरकुमारकम्॥ विरहाग्नौ विसृष्टासुः कर्णाटे जन्मभागभूत्

raṇe paṇīkṛtaprāṇo vidyādharasutopi saḥ aṁte priyāṁ smaranprāpa janurmalayaketutaḥ dhyāyaṁtī sāpi taṁ bālā vidyādharakumārakam virahāgnau visṛṣṭāsuḥ karṇāṭe janmabhāgabhūt

युद्ध में प्राणों की बाजी लगाने वाला वह विद्याधर-पुत्र भी, अंत तक अपनी प्रिया का स्मरण करते हुए, मलयकेतु के पुत्र के रूप में जन्मा। और वह बालिका भी उस विद्याधर-कुमार का ध्यान करते हुए, विरह की अग्नि में प्राण त्यागकर कर्णाट देश में जन्म को प्राप्त हुई।

श्लोक 83 (skanda.4.33.83)

सुतो मलयकेतोस्तां कालेन परिणीतवान्॥ माल्यकेतुरनंगश्रीः पित्रा दत्तां कलावतीम्

suto malayaketostāṁ kālena pariṇītavān mālyaketuranaṁgaśrīḥ pitrā dattāṁ kalāvatīm

समय आने पर मलयकेतु के पुत्र, कामदेव-समान अनंगश्री माल्यकेतु ने, पिता द्वारा दी गई उस कलावती से विवाह किया।

श्लोक 84 (skanda.4.33.84)

सापि प्राग्वासनायोगाल्लिंगार्चनरता सती॥ हित्वा मलयजक्षोदं विभूतिं बह्वमंस्त वै

sāpi prāgvāsanāyogālliṁgārcanaratā satī hitvā malayajakṣodaṁ vibhūtiṁ bahvamaṁsta vai

वह भी पूर्वजन्म के संस्कारवश लिंग-पूजा में रत रहती हुई, चंदन के लेप की अपेक्षा विभूति को कहीं अधिक महत्त्व देती थी।

श्लोक 85 (skanda.4.33.85)

मुक्ता वैदूर्य माणिक्य पुष्परागेभ्य एव सा॥ मेने रुद्राक्षनेपध्यमनर्घ्यं गर्भसुंदरी

muktā vaidūrya māṇikya puṣparāgebhya eva sā mene rudrākṣanepadhyamanarghyaṁ garbhasuṁdarī

जन्म से ही सुंदरी वह मोती, वैडूर्य, माणिक्य और पुष्पराग से भी अधिक अमूल्य रुद्राक्ष के आभूषण को मानती थी।

श्लोक 86 (skanda.4.33.86)

कलावती माल्यकेतुं पतिं प्राप्य पतिव्रता॥ अपत्यत्रितयं लेभे दिव्यभोगसमृद्धिभाक्

kalāvatī mālyaketuṁ patiṁ prāpya pativratā apatyatritayaṁ lebhe divyabhogasamṛddhibhāk

पतिव्रता कलावती ने पति के रूप में माल्यकेतु को पाकर तीन संतानें प्राप्त कीं तथा दिव्य भोगों की समृद्धि पाई।

श्लोक 87 (skanda.4.33.87)

एकदा कश्चिदौदीच्यो माल्यकेतुं नरेश्वरम्॥ चित्रकृच्चित्रपटिकां चित्रां दर्शितवानथ

ekadā kaścidaudīcyo mālyaketuṁ nareśvaram citrakṛccitrapaṭikāṁ citrāṁ darśitavānatha

एक बार किसी उत्तर देश के चित्रकार ने राजा माल्यकेतु को एक अद्भुत चित्रपटिका दिखाई।

श्लोक 88 (skanda.4.33.88)

तां तु चित्रपटीं राजा कलावत्यै समर्पयत्॥ साथ चित्रपटीं रम्यां संप्रहृष्टतनूरुहा

tāṁ tu citrapaṭīṁ rājā kalāvatyai samarpayat sātha citrapaṭīṁ ramyāṁ saṁprahṛṣṭatanūruhā

उस चित्रपटिका को राजा ने कलावती को अर्पित किया। वह उस सुंदर चित्रपटिका को देखकर रोमांचित हो उठी,

श्लोक 89 (skanda.4.33.89)

मुहुर्मुहुः प्रपश्यंती रहसि प्राणदेवताम्॥ विसस्मार स्वमपि च समाधिस्थेव योगिनी

muhurmuhuḥ prapaśyaṁtī rahasi prāṇadevatām visasmāra svamapi ca samādhistheva yoginī

बार-बार एकांत में उस प्राणदेवता को देखती हुई, समाधिस्थ योगिनी की भाँति स्वयं को भी भूल गई।

श्लोक 90 (skanda.4.33.90)

क्षणमुन्मील्य नयने कृत्वा नेत्रातिथिं पटीम्॥ तर्जन्यग्रमथोत्क्षिप्य स्वात्मानं समबोधयत्

kṣaṇamunmīlya nayane kṛtvā netrātithiṁ paṭīm tarjanyagramathotkṣipya svātmānaṁ samabodhayat

क्षणभर आँखें खोलकर, उस चित्र को नेत्रों का अतिथि बनाकर, फिर तर्जनी की नोक उठाकर उसने स्वयं को सचेत किया।

श्लोक 91 (skanda.4.33.91)

संभेदोयमसे रम्य उपलोलार्कमग्रतः॥ उपश्रीकेशवपदं वरणैषा सरिद्वरा॥ स्वगें प्रार्थितसंस्पर्शा सैषा स्वर्गतरंगिणी॥ उदग्वहाभिलष्यंति यां दिवोद्युसदः सदा

saṁbhedoyamase ramya upalolārkamagrataḥ upaśrīkeśavapadaṁ varaṇaiṣā saridvarā svageṁ prārthitasaṁsparśā saiṣā svargataraṁgiṇī udagvahābhilaṣyaṁti yāṁ divodyusadaḥ sadā

'यह वह रमणीय संगम स्थल है, चंचल सूर्य-प्रतिमा के समीप; यह श्रीकेशव-तीर्थ के पास की श्रेष्ठ वरणा नदी है। यह वही स्वर्गतरंगिणी है, जिसके स्पर्श की स्वर्ग में भी कामना की जाती है, जिसे उत्तरवाहिनी होकर बहती देख स्वर्गवासी सदा अभिलाषा करते हैं।'

श्लोक 92 (skanda.4.33.92)

अलक्ष्यामोक्षलक्ष्मी र्या वेदांते परिपठ्यते॥ विमुक्तये सतां सैषा श्रीमती मणिकर्णिका

alakṣyāmokṣalakṣmī ryā vedāṁte paripaṭhyate vimuktaye satāṁ saiṣā śrīmatī maṇikarṇikā

'यह वह श्रीमती मणिकर्णिका है, जो वेदांत में अलक्ष्य मोक्ष-लक्ष्मी के रूप में वर्णित है, सज्जनों की मुक्ति के लिए।'

श्लोक 93 (skanda.4.33.93)

मरणं मंगलं यत्र सफलं यत्र जीवितम्॥ स्वर्गस्तृणायते यत्र सैषा श्रीमणिकर्णिका

maraṇaṁ maṁgalaṁ yatra saphalaṁ yatra jīvitam svargastṛṇāyate yatra saiṣā śrīmaṇikarṇikā

'यह वह श्रीमणिकर्णिका है, जहाँ मृत्यु मंगलमय है, जहाँ जीवन सफल है, जहाँ स्वर्ग भी तिनके के समान तुच्छ प्रतीत होता है।'

श्लोक 94 (skanda.4.33.94)

यत्र संपत्तिसंभारान्विश्राण्य निधनेच्छया॥ यतिव्रतं समालंब्य तिष्ठते मूलकंदभुक्

yatra saṁpattisaṁbhārānviśrāṇya nidhanecchayā yativrataṁ samālaṁbya tiṣṭhate mūlakaṁdabhuk

'जहाँ मृत्यु की इच्छा से संपत्ति का सारा भंडार त्यागकर, यति-व्रत धारण कर मूल-कंद खाकर मनुष्य रहता है।'

श्लोक 95 (skanda.4.33.95)

यत्र त्रिमार्गं गांगं गां मार्गमाणोमृतान्हरः॥ स्वमौलिबालचंद्रेण मुक्तिमार्गं प्रदर्शयन्

yatra trimārgaṁ gāṁgaṁ gāṁ mārgamāṇomṛtānharaḥ svamaulibālacaṁdreṇa muktimārgaṁ pradarśayan

'जहाँ हर, त्रिपथगा गंगा के द्वारा मृतकों को मार्ग दिखाते हुए, अपने मस्तक की बालचंद्रकला से मुक्ति का मार्ग प्रदर्शित करते हैं।'

श्लोक 96 (skanda.4.33.96)

संसारं यत्र दुर्वारं प्रतारयति शंकरः॥ मृता अप्यमृतायंते कर्णधाराद्यतो नराः

saṁsāraṁ yatra durvāraṁ pratārayati śaṁkaraḥ mṛtā apyamṛtāyaṁte karṇadhārādyato narāḥ

'जहाँ शंकर दुर्वार संसार से पार उतारते हैं, जिससे मृत मनुष्य भी उस कर्णधार के द्वारा अमर हो जाते हैं।'

श्लोक 97 (skanda.4.33.97)

संसारासारपदवी यत्र स्याददवीयसी॥ कर्णे जपान्महेशानात्करुणा वरुणालयात्

saṁsārāsārapadavī yatra syādadavīyasī karṇe japānmaheśānātkaruṇā varuṇālayāt

'जहाँ करुणासागर महेशान के कान में जपे गए मंत्र से संसार का असार मार्ग अत्यंत दूर हो जाता है।'

श्लोक 98 (skanda.4.33.98)

अनेक भवसंभूत प्रभूत सुकृतैर्नराः॥ कर्णे जपं भवं यत्र लभंते ते भवापहम्

aneka bhavasaṁbhūta prabhūta sukṛtairnarāḥ karṇe japaṁ bhavaṁ yatra labhaṁte te bhavāpaham

'जहाँ मनुष्य अनेक जन्मों में अर्जित प्रचुर पुण्यों से, कान में जपे गए उस संसार-नाशक मंत्र को प्राप्त करते हैं।'

श्लोक 99 (skanda.4.33.99)

स्वीकृत्य क्षेत्रसंन्यासं यद्बलेन महाधियः॥ तृणं कृतातं मन्यंते सेयं श्रीमणिकर्णिका

svīkṛtya kṣetrasaṁnyāsaṁ yadbalena mahādhiyaḥ tṛṇaṁ kṛtātaṁ manyaṁte seyaṁ śrīmaṇikarṇikā

'जिसके प्रभाव से क्षेत्र-संन्यास लेकर महान बुद्धि वाले लोग स्वर्ण को भी तिनके के समान मानते हैं — यह वही श्रीमणिकर्णिका है।'

श्लोक 100 (skanda.4.33.100)

तृणीकृत्य निजं देहं यत्र राजर्षिसत्तमः॥ हरिश्चंद्रः सपत्नीको व्यक्रीणाद्भूरयं हि सा॥ अभिलष्यंति यत्रत्यमपि वैकुण्ठवासिनः॥ सैकतं मृदुलं तल्पं सैषा श्रीमणिकर्णिका

tṛṇīkṛtya nijaṁ dehaṁ yatra rājarṣisattamaḥ hariścaṁdraḥ sapatnīko vyakrīṇādbhūrayaṁ hi sā abhilaṣyaṁti yatratyamapi vaikuṇṭhavāsinaḥ saikataṁ mṛdulaṁ talpaṁ saiṣā śrīmaṇikarṇikā

'जहाँ राजर्षिश्रेष्ठ हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी सहित अपने शरीर को तिनके के समान मानकर स्वयं को बेच दिया — यह वही स्थान है। यह वही श्रीमणिकर्णिका है, जिसके मृदु बालू-शयन की कामना वैकुंठवासी भी करते हैं।'

श्लोक 101 (skanda.4.33.101)

अनेक जन्म जनित कर्मसूत्रनियंत्रणम्॥ उन्मुच्य यत्र मुक्ताः स्युः सैषा श्रीमणिकर्णिका

aneka janma janita karmasūtraniyaṁtraṇam unmucya yatra muktāḥ syuḥ saiṣā śrīmaṇikarṇikā

'जहाँ अनेक जन्मों में उत्पन्न कर्म-सूत्र के बंधन से मुक्त होकर प्राणी मुक्त हो जाते हैं — यह वही श्रीमणिकर्णिका है।'

श्लोक 102 (skanda.4.33.102)

सत्यलोकेऽपि ये लोकास्तेऽर्थयंति निरंतरम्॥ यामहो दीर्घनिद्रायै सेयं श्रीमणिकर्णिका

satyaloke'pi ye lokāste'rthayaṁti niraṁtaram yāmaho dīrghanidrāyai seyaṁ śrīmaṇikarṇikā

'जिसे सत्यलोक के निवासी भी दीर्घ निद्रा के लिए निरंतर प्रार्थना करते हैं — यह वही श्रीमणिकर्णिका है।'

श्लोक 103 (skanda.4.33.103)

अयं हि स कुलस्तंभो यत्र श्रीकालभैरवः॥ क्षेत्रपापकृतः शास्ति दर्शयंस्तीव्रयातनाम्

ayaṁ hi sa kulastaṁbho yatra śrīkālabhairavaḥ kṣetrapāpakṛtaḥ śāsti darśayaṁstīvrayātanām

यह वही कुल का स्तंभ है, जहाँ श्रीकालभैरव क्षेत्र में पाप करने वालों को तीव्र यातना दिखाकर दंडित करते हैं।

श्लोक 104 (skanda.4.33.104)

अन्यत्र विहितं पापं नश्येत्काशीनिरीक्षणात्॥ काश्यां कृतानां पापानां दारुणेयं तु यातना

anyatra vihitaṁ pāpaṁ naśyetkāśīnirīkṣaṇāt kāśyāṁ kṛtānāṁ pāpānāṁ dāruṇeyaṁ tu yātanā

अन्यत्र किया गया पाप काशी के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाता है; किंतु काशी में किए गए पापों की यह भयंकर यातना है।

श्लोक 105 (skanda.4.33.105)

कपालमोचनं तीर्थमेतत्तदपि पावनम्॥ कपालं पतितं यत्र विधेर्भैरवपाणितः

kapālamocanaṁ tīrthametattadapi pāvanam kapālaṁ patitaṁ yatra vidherbhairavapāṇitaḥ

यह वह पवित्र कपालमोचन तीर्थ है, जहाँ भैरव के हाथ से ब्रह्मा का कपाल गिर गया था।

श्लोक 106 (skanda.4.33.106)

ऋणत्रयाद्विमुच्यंते यत्र स्नाता नरोतमाः॥ तीर्थं विशुद्धिजनकं तदेतदृणमोचनम्

ṛṇatrayādvimucyaṁte yatra snātā narotamāḥ tīrthaṁ viśuddhijanakaṁ tadetadṛṇamocanam

जहाँ स्नान करने वाले श्रेष्ठ मनुष्य तीनों ऋणों से मुक्त हो जाते हैं — यह वह शुद्धिकारक ऋणमोचन तीर्थ है।

श्लोक 107 (skanda.4.33.107)

प्रणवाख्यं परंब्रह्म यत्र नित्यं प्रकाशते॥ सपंचायतनोपेत ॐकारेशोयमद्भुतः

praṇavākhyaṁ paraṁbrahma yatra nityaṁ prakāśate sapaṁcāyatanopeta oṁkāreśoyamadbhutaḥ

जहाँ प्रणव नाम का परब्रह्म नित्य प्रकाशित होता है — यह वह अद्भुत ओंकारेश्वर है, पंच-आयतनों सहित।

श्लोक 108 (skanda.4.33.108)

अश्च उश्च मकारश्च नादोबिंदुश्च पंचमः॥ पंचात्मकं परंब्रह्म यत्र नित्यं प्रकाशते

aśca uśca makāraśca nādobiṁduśca paṁcamaḥ paṁcātmakaṁ paraṁbrahma yatra nityaṁ prakāśate

अ, उ और म्, फिर नाद, और पाँचवाँ बिंदु — इन पाँच अंगों वाला परब्रह्म यहाँ नित्य प्रकाशित होता है।

श्लोक 109 (skanda.4.33.109)

एषा मत्स्योदरी रम्या यत्स्नातो मानवोत्तमः॥ मातुर्जातूदरदरीं न विशेदेष निश्चयः॥ त्रिलोचनोयं भगवान्कुर्यादेव त्रिलोचनम्॥ निजभक्तं कृपायुक्तस्त्वपि देशातंर स्थितम्

eṣā matsyodarī ramyā yatsnāto mānavottamaḥ māturjātūdaradarīṁ na viśedeṣa niścayaḥ trilocanoyaṁ bhagavānkuryādeva trilocanam nijabhaktaṁ kṛpāyuktastvapi deśātaṁra sthitam

यह वह रमणीय मत्स्योदरी है, जहाँ स्नान कर श्रेष्ठ मनुष्य निश्चय ही फिर कभी माता के गर्भ में प्रवेश नहीं करता। यह वह भगवान त्रिलोचन हैं, जो कृपायुक्त होकर दूर देश में स्थित अपने भक्त को भी त्रिलोचन बना देते हैं।

श्लोक 110 (skanda.4.33.110)

असौ कामेश्वरो देवो यः कामान्पूरयेत्सताम्॥ दुर्वासा अपि यत्राप निजकाममहोदयम्

asau kāmeśvaro devo yaḥ kāmānpūrayetsatām durvāsā api yatrāpa nijakāmamahodayam

यह देव कामेश्वर हैं, जो सज्जनों की कामनाएँ पूर्ण करते हैं — जहाँ दुर्वासा को भी अपनी कामना की महान सिद्धि मिली।

श्लोक 111 (skanda.4.33.111)

स्वयं लीनो महेशोत्र भक्तकामसमृद्धये॥ तस्मात्स्वर्लीनसंज्ञास्य देवदेवस्य शूलिनः

svayaṁ līno maheśotra bhaktakāmasamṛddhaye tasmātsvarlīnasaṁjñāsya devadevasya śūlinaḥ

यहाँ स्वयं महेश भक्तों की कामनाओं की समृद्धि के लिए लीन हो गए; इसीलिए इस त्रिशूलधारी देवाधिदेव का नाम स्वर्लीन पड़ा।

श्लोक 112 (skanda.4.33.112)

वाराणस्यां महादेवो यः पुराणेषु पठ्यते॥ क्षेत्राभिमानी भगवांस्तत्प्रासादोयमद्भुतः

vārāṇasyāṁ mahādevo yaḥ purāṇeṣu paṭhyate kṣetrābhimānī bhagavāṁstatprāsādoyamadbhutaḥ

यह वही अद्भुत मंदिर है वाराणसी के महादेव का, जिन्हें पुराणों में क्षेत्र के अभिमानी भगवान कहा गया है।

श्लोक 113 (skanda.4.33.113)

असौ स्कंदेश्वरो देवः श्रद्धया यद्विलोकनात्॥ आजन्मब्रह्मचर्यस्य फलमाप्नोति मानवः

asau skaṁdeśvaro devaḥ śraddhayā yadvilokanāt ājanmabrahmacaryasya phalamāpnoti mānavaḥ

यह देव स्कंदेश्वर हैं, जिनके श्रद्धापूर्ण दर्शन से मनुष्य जन्म से लेकर आजीवन ब्रह्मचर्य पालन का फल पाता है।

श्लोक 114 (skanda.4.33.114)

विनायकेश्वरश्चायं सर्वसिद्धि प्रदायकः॥ यत्सेवया प्रणश्यंति नृणां सर्वे विनायकाः

vināyakeśvaraścāyaṁ sarvasiddhi pradāyakaḥ yatsevayā praṇaśyaṁti nṛṇāṁ sarve vināyakāḥ

और यह विनायकेश्वर हैं, समस्त सिद्धियाँ देने वाले, जिनकी सेवा से मनुष्यों के सभी विघ्न नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 115 (skanda.4.33.115)

इयं वाराणसी देवी साक्षान्मूर्त्तिमयी शुभा॥ यस्या विलोकनात्पुंसां भूयो नो गर्भसंभवः

iyaṁ vārāṇasī devī sākṣānmūrttimayī śubhā yasyā vilokanātpuṁsāṁ bhūyo no garbhasaṁbhavaḥ

यह वाराणसी देवी हैं, साक्षात मूर्तिमयी, शुभ; जिनके दर्शन से मनुष्य फिर कभी गर्भ में जन्म नहीं लेते।

श्लोक 116 (skanda.4.33.116)

पार्वतीश्वरलिंगस्य महदायतनं त्विदम्॥ यत्र नित्यं महेशानो गौर्या सह विमुक्तिदः

pārvatīśvaraliṁgasya mahadāyatanaṁ tvidam yatra nityaṁ maheśāno gauryā saha vimuktidaḥ

यह पार्वतीश्वर लिंग का महान मंदिर है, जहाँ महेशान गौरी के साथ सदा मुक्ति देते हैं।

श्लोक 117 (skanda.4.33.117)

एष भृंगीश्वरः श्रीमान्महापातकनाशनः॥ जीवन्मुक्तोऽभवद्भृंगी यस्य लिंगस्य सेवया

eṣa bhṛṁgīśvaraḥ śrīmānmahāpātakanāśanaḥ jīvanmukto'bhavadbhṛṁgī yasya liṁgasya sevayā

यह श्रीमान भृंगीश्वर हैं, महापातकों का नाश करने वाले, जिनके लिंग की सेवा से भृंगी जीवनमुक्त हुए थे।

श्लोक 118 (skanda.4.33.118)

चतुर्वेदेश्वरश्चैष चतुर्वेदधरो विधिः॥ लभेद्यद्वीक्षणाद्विप्रो वेदाध्ययनजं फलम्॥ यज्ञैः संस्थापितं चैतल्लिंगं यज्ञेश्वराभिधम्॥ यदर्चनाल्लभेन्मर्त्यः सर्वयागफलं महत्

caturvedeśvaraścaiṣa caturvedadharo vidhiḥ labhedyadvīkṣaṇādvipro vedādhyayanajaṁ phalam yajñaiḥ saṁsthāpitaṁ caitalliṁgaṁ yajñeśvarābhidham yadarcanāllabhenmartyaḥ sarvayāgaphalaṁ mahat

यह चतुर्वेदेश्वर हैं, जिनके सामने ब्रह्मा ने चारों वेद धारण किए — जिनके दर्शन से विप्र वेदाध्ययन का फल पाता है। यह लिंग यज्ञों द्वारा स्थापित होने के कारण 'यज्ञेश्वर' कहलाता है, जिसकी पूजा से मर्त्य मनुष्य समस्त यज्ञों का महान फल पाता है।

श्लोक 119 (skanda.4.33.119)

पुराणेश्वर नामैतल्लिंगमष्टादशांगुलम्॥ अष्टादशानां विद्यानां स्यादाधारो यदीक्षणात्

purāṇeśvara nāmaitalliṁgamaṣṭādaśāṁgulam aṣṭādaśānāṁ vidyānāṁ syādādhāro yadīkṣaṇāt

यह अठारह अंगुल का लिंग 'पुराणेश्वर' नाम से जाना जाता है, जिसके दर्शन से मनुष्य अठारह विद्याओं का आधार बन जाता है।

श्लोक 120 (skanda.4.33.120)

धर्मशास्त्रेश्वरश्चायं स्मृतिभिश्च प्रतिष्ठितः॥ स्मृत्यध्ययनजं पुण्यं यद्विलोकनतो भवेत्

dharmaśāstreśvaraścāyaṁ smṛtibhiśca pratiṣṭhitaḥ smṛtyadhyayanajaṁ puṇyaṁ yadvilokanato bhavet

यह धर्मशास्त्रेश्वर हैं, स्मृतियों द्वारा प्रतिष्ठित; जिनके दर्शन से स्मृति-अध्ययन का पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 121 (skanda.4.33.121)

सारस्वतमिदं लिंगं सर्वजाड्यविनाशकृत्॥ सर्वतीर्थेश्वरं लिंगमेतत्सद्यो विशुद्धिदम्

sārasvatamidaṁ liṁgaṁ sarvajāḍyavināśakṛt sarvatīrtheśvaraṁ liṁgametatsadyo viśuddhidam

यह सारस्वत लिंग है, समस्त जड़ता का नाश करने वाला; यह सर्वतीर्थेश्वर लिंग है, तत्काल पूर्ण शुद्धि देने वाला।

श्लोक 122 (skanda.4.33.122)

शैलेश्वरस्य लिंगस्य मंडपोयं महाद्भुतः॥ सर्वेषां रत्नजातानां यो बिभर्ति परां श्रियम्

śaileśvarasya liṁgasya maṁḍapoyaṁ mahādbhutaḥ sarveṣāṁ ratnajātānāṁ yo bibharti parāṁ śriyam

यह शैलेश्वर लिंग का अत्यंत अद्भुत मंडप है, जो समस्त प्रकार के रत्नों की परम शोभा धारण करता है।

श्लोक 123 (skanda.4.33.123)

सप्तसागरसंज्ञं वै लिंगमेतन्मनोहरम्॥ यद्वीक्षणाल्लभेन्मर्त्यः सप्ताब्धिस्नानजं फलम्

saptasāgarasaṁjñaṁ vai liṁgametanmanoharam yadvīkṣaṇāllabhenmartyaḥ saptābdhisnānajaṁ phalam

यह सप्तसागर नाम का मनोहर लिंग है, जिसके दर्शन से मर्त्य मनुष्य सातों सागरों में स्नान का फल पाता है।

श्लोक 124 (skanda.4.33.124)

असौ मंत्रेश्वरः श्रीमान्मंत्रजाप्यफलप्रदः॥ सप्तकोटिमहामंत्रैः स्थापितो यः पुरा युगे

asau maṁtreśvaraḥ śrīmānmaṁtrajāpyaphalapradaḥ saptakoṭimahāmaṁtraiḥ sthāpito yaḥ purā yuge

यह श्रीमान मंत्रेश्वर हैं, मंत्र-जप का फल देने वाले, जो पूर्वयुग में सत्तर करोड़ महामंत्रों से स्थापित हुए थे।

श्लोक 125 (skanda.4.33.125)

त्रिपुरेशस्य लिंगस्य पुरः कुंडमिदं महत्॥ त्रिपुरैः खानितं पूर्वं त्रिपुरारिप्रियं परम्

tripureśasya liṁgasya puraḥ kuṁḍamidaṁ mahat tripuraiḥ khānitaṁ pūrvaṁ tripurāripriyaṁ param

यह त्रिपुरेश लिंग के सामने का महान कुंड है, जो पूर्वकाल में त्रिपुरासुरों द्वारा खोदा गया, त्रिपुरारि को अत्यंत प्रिय।

श्लोक 126 (skanda.4.33.126)

इदं वाणेश्वरं लिंगं सहस्रभुजपूजितम्॥ द्विभुजस्यापि बाणस्य सहस्रभुजहेतुकम्

idaṁ vāṇeśvaraṁ liṁgaṁ sahasrabhujapūjitam dvibhujasyāpi bāṇasya sahasrabhujahetukam

यह वाणेश्वर लिंग है, सहस्रभुज (बाणासुर) द्वारा पूजित; यह दो भुजाओं वाले बाणासुर की सहस्रभुज प्राप्ति का कारण है।

श्लोक 127 (skanda.4.33.127)

वैरोचनेश्वरश्चैष पुरः प्रह्लादकेशवात्॥ बलिकेशवनामासावेष नारदकेशवः॥ आदिकेशव पूर्वेण त्वयमादित्यकेशवः॥ भीष्मकेशवनामासौ दत्तात्रेयेश्वरस्त्वयम्

vairocaneśvaraścaiṣa puraḥ prahlādakeśavāt balikeśavanāmāsāveṣa nāradakeśavaḥ ādikeśava pūrveṇa tvayamādityakeśavaḥ bhīṣmakeśavanāmāsau dattātreyeśvarastvayam

यह वैरोचनेश्वर है, प्रह्लाद-केशव के सामने; यह बलि-केशव नाम का है, यह नारद-केशव है। आदि-केशव के पूर्व में यह आदित्य-केशव है; यह भीष्म-केशव नाम का है, और यह दत्तात्रेयेश्वर है।

श्लोक 128 (skanda.4.33.128)

दत्तात्रेयेश्वरात्पूर्वमेष आदि गदाधरः॥ भृगुकेशवनामासावेष वामनकेशवः

dattātreyeśvarātpūrvameṣa ādi gadādharaḥ bhṛgukeśavanāmāsāveṣa vāmanakeśavaḥ

दत्तात्रेयेश्वर के पूर्व में यह आदि-गदाधर है; यह भृगु-केशव नाम का है, यह वामन-केशव है।

श्लोक 129 (skanda.4.33.129)

नरनारायणावेतौ यज्ञवाराहकेशवः॥ विदारनारसिंहोयं गोपीगोविंद एष ह

naranārāyaṇāvetau yajñavārāhakeśavaḥ vidāranārasiṁhoyaṁ gopīgoviṁda eṣa ha

यह नर और नारायण हैं, यह यज्ञ-वराह-केशव है; यह विदार-नृसिंह है, और यह वास्तव में गोपी-गोविंद है।

श्लोक 130 (skanda.4.33.130)

एष लक्ष्मीनृसिंहस्य प्रासादो रत्नकेतनः॥ यस्य प्रसादात्प्रह्लादः पदमैंद्रमवाप्तवान्

eṣa lakṣmīnṛsiṁhasya prāsādo ratnaketanaḥ yasya prasādātprahlādaḥ padamaiṁdramavāptavān

यह लक्ष्मी-नृसिंह का रत्न-मंदिर है, जिनकी कृपा से प्रह्लाद ने इंद्र का पद प्राप्त किया।

श्लोक 131 (skanda.4.33.131)

अखर्वसिद्धिदः पुंसामेष खर्वविनायकः॥ शेषमाधवनामासौ शेषेण स्थापितः पुरा

akharvasiddhidaḥ puṁsāmeṣa kharvavināyakaḥ śeṣamādhavanāmāsau śeṣeṇa sthāpitaḥ purā

यह खर्व-विनायक हैं, मनुष्यों को अखर्व (पूर्ण) सिद्धि देने वाले; यह शेष-माधव नाम का है, पूर्वकाल में शेष द्वारा स्थापित।

श्लोक 132 (skanda.4.33.132)

यस्य भक्ता न दह्यंते त्वपि संवर्तवह्निना॥ शंखमाधवनामासौ शंखं हत्वात्र संस्थितः

yasya bhaktā na dahyaṁte tvapi saṁvartavahninā śaṁkhamādhavanāmāsau śaṁkhaṁ hatvātra saṁsthitaḥ

जिनके भक्त प्रलय की अग्नि से भी नहीं जलते। यह शंख-माधव नाम का है, शंखासुर का वध करने के बाद यहाँ स्थापित हुआ।

श्लोक 133 (skanda.4.33.133)

इदं सारस्वतं स्रोतः परं ब्रह्मरसायनम्॥ सरस्वत्या महानद्याः संगमो यत्र गंगया

idaṁ sārasvataṁ srotaḥ paraṁ brahmarasāyanam sarasvatyā mahānadyāḥ saṁgamo yatra gaṁgayā

यह सारस्वत स्रोत है, परब्रह्म का रसायन, जहाँ महानदी सरस्वती गंगा से मिलती है।

श्लोक 134 (skanda.4.33.134)

यत्राप्लुता नरा भूयः संभवंति न भूतले॥ श्रीबिंदुमाधवस्त्वेष साक्षाल्लक्ष्मीपतिः परः

yatrāplutā narā bhūyaḥ saṁbhavaṁti na bhūtale śrībiṁdumādhavastveṣa sākṣāllakṣmīpatiḥ paraḥ

जिसमें स्नान करने वाले मनुष्य फिर कभी इस पृथ्वी पर जन्म नहीं लेते। यह श्रीबिंदुमाधव हैं, साक्षात लक्ष्मीपति, सर्वोच्च।

श्लोक 135 (skanda.4.33.135)

श्रद्धया यं नमन्मर्त्यो न वसेद्गर्भवेश्मनि॥ न दारिद्र्यमवाप्नोति व्याधिभिर्नाभिभूयते

śraddhayā yaṁ namanmartyo na vasedgarbhaveśmani na dāridryamavāpnoti vyādhibhirnābhibhūyate

जिन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करने वाला मनुष्य फिर गर्भ-गृह में नहीं रहता, दरिद्रता नहीं पाता, व्याधियों से पराजित नहीं होता।

श्लोक 136 (skanda.4.33.136)

बिंदुमाधवभक्तो यस्तं यमोपि नमस्यति॥ प्रणवात्मा य एकोऽस्ति नादबिंदु स्वरूपधृक्॥ अमूर्तं यत्परं ब्रह्म बिंदुमाधव एव सः॥ एतत्पंचनदं तीर्थं पंचब्रह्मात्मसंज्ञकम्

biṁdumādhavabhakto yastaṁ yamopi namasyati praṇavātmā ya eko'sti nādabiṁdu svarūpadhṛk amūrtaṁ yatparaṁ brahma biṁdumādhava eva saḥ etatpaṁcanadaṁ tīrthaṁ paṁcabrahmātmasaṁjñakam

जो बिंदुमाधव का भक्त है, उसे यम भी नमस्कार करते हैं। जो एकमात्र प्रणव-स्वरूप हैं, नाद-बिंदु-स्वरूप को धारण करने वाले, वह अमूर्त परब्रह्म ही बिंदुमाधव हैं। यह पंचनद तीर्थ है, पंचब्रह्म-आत्मा नाम से संज्ञित।

श्लोक 137 (skanda.4.33.137)

यत्र स्नातो न गृह्णीयाच्छरीरं पांचभौतिकम्॥ एषा सा मंगलागौरी काश्यां परममंगलम्

yatra snāto na gṛhṇīyāccharīraṁ pāṁcabhautikam eṣā sā maṁgalāgaurī kāśyāṁ paramamaṁgalam

जिसमें स्नान करने वाला फिर कभी पंचभौतिक शरीर धारण नहीं करता। यह मंगला गौरी हैं, काशी का परम मंगल-स्वरूप।

श्लोक 138 (skanda.4.33.138)

यत्प्रसादादवाप्नोति नरोऽत्र च परत्र च॥ मयूखादित्यसंज्ञोयं रश्मिमाली तमोपहः

yatprasādādavāpnoti naro'tra ca paratra ca mayūkhādityasaṁjñoyaṁ raśmimālī tamopahaḥ

जिनकी कृपा से मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में सुख पाता है। यह मयूखादित्य हैं, 'रश्मिमाली' नाम से जाने जाते, अंधकार को दूर करने वाले।

श्लोक 139 (skanda.4.33.139)

गभस्तीशो महालिंगमेतद्दिव्यमहःप्रदम्॥ मृकंडुसूनुनाप्यत्र तपस्तप्तं पुरा महत्

gabhastīśo mahāliṁgametaddivyamahaḥpradam mṛkaṁḍusūnunāpyatra tapastaptaṁ purā mahat

यह गभस्तीश महालिंग है, दिव्य तेज देने वाला। यहाँ मृकंडु-पुत्र (मार्कंडेय) ने भी पूर्वकाल में महान तप किया था।

श्लोक 140 (skanda.4.33.140)

लिंगं संस्थाप्य परमं स्वनाम्नायुःप्रदं परम्॥ किरणेश्वरनामैतल्लिंगं त्रैलोक्यविश्रुतम्

liṁgaṁ saṁsthāpya paramaṁ svanāmnāyuḥpradaṁ param kiraṇeśvaranāmaitalliṁgaṁ trailokyaviśrutam

उस परम लिंग को स्थापित कर, अपने ही नाम से दीर्घायु देने वाला यह 'किरणेश्वर' नाम का लिंग त्रैलोक्य-विख्यात है।

श्लोक 141 (skanda.4.33.141)

सकृन्न तमिदं लोकं नयेत्किरणमालिनः॥ धौतपापेश्वरं लिंगमेतत्पातकधावनम्

sakṛnna tamidaṁ lokaṁ nayetkiraṇamālinaḥ dhautapāpeśvaraṁ liṁgametatpātakadhāvanam

किरणमाली का एक बार दर्शन ही मनुष्य को फिर इस लोक में नहीं लाता। यह धौतपापेश्वर लिंग है, पापों को धो डालने वाला।

श्लोक 142 (skanda.4.33.142)

निर्वाणनरसिंहोयं भक्तनिर्वाणकारणम्॥ मणिप्रदीपनागोयं महामणिविभूषणः

nirvāṇanarasiṁhoyaṁ bhaktanirvāṇakāraṇam maṇipradīpanāgoyaṁ mahāmaṇivibhūṣaṇaḥ

यह निर्वाण-नृसिंह हैं, भक्तों की मुक्ति के कारण। यह मणिप्रदीप नाग है, महान मणि से विभूषित।

श्लोक 143 (skanda.4.33.143)

यदर्चनान्नरो जातु न नागैः परिभूयते॥ कपिलेशमिदं लिंगं कपिलेन प्रतिष्ठितम्

yadarcanānnaro jātu na nāgaiḥ paribhūyate kapileśamidaṁ liṁgaṁ kapilena pratiṣṭhitam

जिनकी पूजा से मनुष्य कभी सर्पों से पराजित नहीं होता। यह कपिलेश लिंग है, महर्षि कपिल द्वारा स्थापित।

श्लोक 144 (skanda.4.33.144)

मुच्यंते कपयोप्यस्य दर्शनात्किमु मानवाः॥ प्रियव्रतेश्वरं लिंगं महदेतत्प्रकाशते

mucyaṁte kapayopyasya darśanātkimu mānavāḥ priyavrateśvaraṁ liṁgaṁ mahadetatprakāśate

जिसके दर्शन से वानर भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या! यह महान प्रियव्रतेश्वर लिंग यहाँ प्रकाशित होता है।

श्लोक 145 (skanda.4.33.145)

यस्यार्चनाल्लभेज्जंतुः प्रियत्वं सर्वजन्तुषु॥ इदमायतनं श्रेष्ठं मणिमाणिक्यनिर्मितम्॥ श्रीमतः कालराजस्य कलिकालार्तिहारिणः॥ निजभक्तं जनं पाति यः पापात्पापभक्षणः

yasyārcanāllabhejjaṁtuḥ priyatvaṁ sarvajantuṣu idamāyatanaṁ śreṣṭhaṁ maṇimāṇikyanirmitam śrīmataḥ kālarājasya kalikālārtihāriṇaḥ nijabhaktaṁ janaṁ pāti yaḥ pāpātpāpabhakṣaṇaḥ

जिनकी पूजा से प्राणी समस्त प्राणियों में प्रियता पाता है। यह मणि-माणिक्यों से निर्मित श्रेष्ठ मंदिर है, कलिकाल की पीड़ा हरने वाले श्रीमान कालराज का, जो अपने भक्तजनों को पाप से बचाने वाले 'पापभक्षण' हैं,

श्लोक 146 (skanda.4.33.146)

क्षेत्रविघ्नकरान्पापान्यातयन्यातना शतैः॥ इयं मंदाकिनी रम्या तपस्तप्तुमिहागता

kṣetravighnakarānpāpānyātayanyātanā śataiḥ iyaṁ maṁdākinī ramyā tapastaptumihāgatā

क्षेत्र में विघ्न करने वाले पापियों को सैकड़ों यातनाओं से दंडित करते हुए। यह रमणीय मंदाकिनी है, जो यहाँ तप करने आई थी।

श्लोक 147 (skanda.4.33.147)

काशीवाससुखं प्राप्य नाद्यापि दिवमीहते॥ स्नात्वात्र संतर्प्य पितॄञ्छ्राद्धं कृत्वा विधानतः

kāśīvāsasukhaṁ prāpya nādyāpi divamīhate snātvātra saṁtarpya pitṝñchrāddhaṁ kṛtvā vidhānataḥ

काशी-वास का सुख पाकर वह आज भी स्वर्ग की कामना नहीं करती। यहाँ स्नान कर, पितरों का तर्पण कर, विधिपूर्वक श्राद्ध करके,

श्लोक 148 (skanda.4.33.148)

नरो न नरकं पश्येदपि दुष्कृतकर्मकृत्॥ यानि कानि च लिंगानि काश्यां संति सहस्रशः

naro na narakaṁ paśyedapi duṣkṛtakarmakṛt yāni kāni ca liṁgāni kāśyāṁ saṁti sahasraśaḥ

मनुष्य, चाहे उसने दुष्कर्म ही क्यों न किए हों, नरक नहीं देखता। काशी में जो हजारों लिंग हैं,

श्लोक 149 (skanda.4.33.149)

रत्नभूतमिदं तेषु लिंगं रत्नेश्वराभिधम्॥ रत्नेश्वरप्रसादेन भुक्त्वा रत्नान्यनेकशः

ratnabhūtamidaṁ teṣu liṁgaṁ ratneśvarābhidham ratneśvaraprasādena bhuktvā ratnānyanekaśaḥ

उनमें यह रत्नेश्वर नाम का लिंग मानो रत्न-स्वरूप है। रत्नेश्वर की कृपा से अनेक रत्नों का भोग कर,

श्लोक 150 (skanda.4.33.150)

पुरुषार्थमहारत्नं निर्वाणं को न लब्धवान्॥ कृत्तिवासेश्वरस्यैषा महाप्रासादनिर्मितिः

puruṣārthamahāratnaṁ nirvāṇaṁ ko na labdhavān kṛttivāseśvarasyaiṣā mahāprāsādanirmitiḥ

पुरुषार्थ के महारत्न मोक्ष को किसने नहीं पाया? यह कृत्तिवासेश्वर का महान मंदिर-निर्माण है,

श्लोक 151 (skanda.4.33.151)

यां दृष्ट्वापि नरो दूरात्कृत्तिवासः पदं लभेत्॥ सर्वेषामपि लिंगानां मौलित्वं कृत्तिवाससः

yāṁ dṛṣṭvāpi naro dūrātkṛttivāsaḥ padaṁ labhet sarveṣāmapi liṁgānāṁ maulitvaṁ kṛttivāsasaḥ

जिसे दूर से देखकर भी मनुष्य कृत्तिवास का पद पाता है। समस्त लिंगों में कृत्तिवास का ही मुकुट-स्थान है।

श्लोक 152 (skanda.4.33.152)

ॐकारेशः शिखा ज्ञेया लोचनानि त्रिलोचनः॥ गोकर्णभारभूतेशौ तत्कर्णौ परिकीर्तितौ

oṁkāreśaḥ śikhā jñeyā locanāni trilocanaḥ gokarṇabhārabhūteśau tatkarṇau parikīrtitau

ओंकारेश्वर को उनकी शिखा जानना चाहिए, त्रिलोचन को नेत्र। गोकर्ण और भारभूतेश उनके दोनों कान कहे गए हैं।

श्लोक 153 (skanda.4.33.153)

विश्वेश्वराविमुक्तौ च द्वावेतौ दक्षिणौ करौ॥ धर्मेशमणिकर्णेशौ द्वौ करौ दक्षिणेतरौ

viśveśvarāvimuktau ca dvāvetau dakṣiṇau karau dharmeśamaṇikarṇeśau dvau karau dakṣiṇetarau

विश्वेश्वर और अविमुक्तेश्वर, ये दोनों उनके दक्षिण हाथ हैं; धर्मेश और मणिकर्णेश उनके अन्य दो हाथ हैं।

श्लोक 154 (skanda.4.33.154)

कालेश्वरकपर्दीशौ चरणावतिनिर्मलौ॥ ज्येष्ठेश्वरो नितंबश्च नाभिर्वै मध्यमेश्वरः॥ कपर्दोस्य महादेवः शिरोभूषा श्रुतीश्वरः॥ चंद्रेशो हृदयं तस्य आत्मा वीरेश्वरः परः

kāleśvarakapardīśau caraṇāvatinirmalau jyeṣṭheśvaro nitaṁbaśca nābhirvai madhyameśvaraḥ kapardosya mahādevaḥ śirobhūṣā śrutīśvaraḥ caṁdreśo hṛdayaṁ tasya ātmā vīreśvaraḥ paraḥ

कालेश्वर और कपर्दीश उनके दोनों अत्यंत निर्मल चरण हैं; ज्येष्ठेश्वर नितंब हैं, तथा मध्यमेश्वर वास्तव में नाभि हैं। महादेव उनकी जटा हैं, श्रुतीश्वर मस्तक का आभूषण; चंद्रेश उनका हृदय हैं, और वीरेश्वर परम आत्मा।

श्लोक 155 (skanda.4.33.155)

लिंगं तस्य तु केदारः शुक्रं शुक्रेश्वरं विदुः॥ अन्यानि यानि लिंगानि परः कोटि शतानि च

liṁgaṁ tasya tu kedāraḥ śukraṁ śukreśvaraṁ viduḥ anyāni yāni liṁgāni paraḥ koṭi śatāni ca

उनका लिंग केदार है, शुक्रेश्वर को उनका वीर्य माना जाता है। अन्य जो भी लिंग हैं, सैकड़ों करोड़ों की संख्या में,

श्लोक 156 (skanda.4.33.156)

ज्ञेयानि नखलोमानि वपुषो भूषणान्यपि॥ यावेतौ दक्षिणौ हस्तौ नित्यनिर्वाणदौ हि तौ

jñeyāni nakhalomāni vapuṣo bhūṣaṇānyapi yāvetau dakṣiṇau hastau nityanirvāṇadau hi tau

उन्हें उनके शरीर के नख-रोम तथा आभूषण जानना चाहिए। ये जो दोनों दक्षिण हाथ हैं, वे सदा मुक्ति देने वाले हैं,

श्लोक 157 (skanda.4.33.157)

जंतूनामभयं दत्त्वा पततां मोहसागरे॥ इयं दुर्गा भगवती पितृलिंगमिदं परम्

jaṁtūnāmabhayaṁ dattvā patatāṁ mohasāgare iyaṁ durgā bhagavatī pitṛliṁgamidaṁ param

मोह-सागर में गिरते प्राणियों को अभय देते हुए। यह भगवती दुर्गा हैं; यह परम पितृ-लिंग है।

श्लोक 158 (skanda.4.33.158)

इयं हि चित्रघंटेशी घंटाकर्ण ह्रदस्त्वयम्॥ इयं सा ललिता गौरी विशालाक्षीयमद्भुता

iyaṁ hi citraghaṁṭeśī ghaṁṭākarṇa hradastvayam iyaṁ sā lalitā gaurī viśālākṣīyamadbhutā

यह चित्रघंटेशी हैं; यह घंटाकर्ण का ह्रद है। यह वही ललिता गौरी हैं; यह अद्भुत विशालाक्षी हैं।

श्लोक 159 (skanda.4.33.159)

आशाविनायकस्त्वेष धर्मकूपोयमद्भुतः॥ यत्र पिंडान्नरो दत्त्वा पितॄन्ब्रह्मपदं नयेत्

āśāvināyakastveṣa dharmakūpoyamadbhutaḥ yatra piṁḍānnaro dattvā pitṝnbrahmapadaṁ nayet

यह आशाविनायक हैं; यह अद्भुत धर्मकूप है, जहाँ पिंडदान करके मनुष्य पितरों को ब्रह्मा के पद तक पहुँचाता है।

श्लोक 160 (skanda.4.33.160)

एषा विश्वभुजा देवी विश्वैकजननी परा॥ असौ बंदी महादेवी नित्यं त्रैलोक्यवंदिता

eṣā viśvabhujā devī viśvaikajananī parā asau baṁdī mahādevī nityaṁ trailokyavaṁditā

यह विश्वभुजा देवी हैं, विश्व की एकमात्र परम जननी। यह महादेवी बंदी हैं, त्रिलोक द्वारा नित्य वंदित,

श्लोक 161 (skanda.4.33.161)

निगडस्थानपि जनान्पाशान्मोचयति स्मृता॥ दशाश्वमेधिकं तीर्थमेतत्त्रैलोक्यवंदितम्

nigaḍasthānapi janānpāśānmocayati smṛtā daśāśvamedhikaṁ tīrthametattrailokyavaṁditam

जिनका स्मरण मात्र से बेड़ियों में जकड़े लोगों को भी बंधनों से मुक्ति मिल जाती है। यह त्रैलोक्य-वंदित दशाश्वमेधिक तीर्थ है,

श्लोक 162 (skanda.4.33.162)

यत्राहुतित्रयेणापि अग्निहोत्रफलं लभेत्॥ प्रयागाख्यमिदं स्रोतः सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम्

yatrāhutitrayeṇāpi agnihotraphalaṁ labhet prayāgākhyamidaṁ srotaḥ sarvatīrthottamottamam

जहाँ केवल तीन आहुतियों से ही अग्निहोत्र का फल मिल जाता है। यह प्रयाग नाम का स्रोत है, समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ।

श्लोक 163 (skanda.4.33.163)

अशोकाख्यमिदं तीर्थं गंगाकेशव एष वै॥ मोक्षद्वारमिदं श्रेष्ठं स्वर्ग द्वारमिदं विदुः

aśokākhyamidaṁ tīrthaṁ gaṁgākeśava eṣa vai mokṣadvāramidaṁ śreṣṭhaṁ svarga dvāramidaṁ viduḥ

यह अशोक नाम का तीर्थ है, और यह वास्तव में गंगा-केशव है। यह मोक्ष का श्रेष्ठ द्वार है, इसे स्वर्ग का द्वार भी जाना जाता है।

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