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काशी खण्ड · अध्याय 34

ज्ञानवापी-प्रशंसा

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (skanda.4.34.1)

॥ स्कंद उवाच॥ पुनर्ददर्श तन्वंगी चित्रपट्यां घटोद्भव॥ स्वर्गद्वारात्पुरोभागे श्रीमतीं मणिकर्णिकाम्

skaṁda uvāca punardadarśa tanvaṁgī citrapaṭyāṁ ghaṭodbhava svargadvārātpurobhāge śrīmatīṁ maṇikarṇikām

स्कंद ने कहा — हे घटोद्भव! उस कोमलांगी ने चित्रपटिका में फिर से स्वर्गद्वार के आगे स्थित श्रीमती मणिकर्णिका को देखा।

श्लोक 2 (skanda.4.34.2)

संसारसर्पदष्टानां जंतूनां यत्र शंकरः॥ अपसव्येन हस्तेन ब्रूते ब्रह्मस्पृशञ्छ्रुतिम्

saṁsārasarpadaṣṭānāṁ jaṁtūnāṁ yatra śaṁkaraḥ apasavyena hastena brūte brahmaspṛśañchrutim

यह वह स्थान है जहाँ संसार-सर्प से डसे प्राणियों को शंकर अपने बाएँ हाथ से स्पर्श करते हुए ब्रह्म-स्पर्शी श्रुति (तारक मंत्र) कहते हैं।

श्लोक 3 (skanda.4.34.3)

न कापिलेन योगेन न सांख्येन न च व्रतैः॥ या गतिः प्राप्यते पुंभिस्तां दद्यान्मोक्षभूरियम्

na kāpilena yogena na sāṁkhyena na ca vrataiḥ yā gatiḥ prāpyate puṁbhistāṁ dadyānmokṣabhūriyam

कपिल के योग से, सांख्य से अथवा व्रतों से भी जो गति मनुष्यों को प्राप्त नहीं होती, वह गति यह मोक्षभूमि प्रदान करती है।

श्लोक 4 (skanda.4.34.4)

वैकुंठे विष्णुभवने विष्णुभक्तिपरायणाः॥ जपेयुः सततं मुक्त्यै श्रीमतीं मणिकर्णिकाम्

vaikuṁṭhe viṣṇubhavane viṣṇubhaktiparāyaṇāḥ japeyuḥ satataṁ muktyai śrīmatīṁ maṇikarṇikām

वैकुंठ में विष्णु के भवन में विष्णु-भक्ति में तत्पर लोग भी मुक्ति के लिए निरंतर श्रीमती मणिकर्णिका का जप करते हैं।

श्लोक 5 (skanda.4.34.5)

हुत्वाग्निहोत्रमपि च यावज्जीवं द्विजोत्तमाः॥ अंते श्रयंते मुक्त्यै यां सेयं श्रीमणिकर्णिका

hutvāgnihotramapi ca yāvajjīvaṁ dvijottamāḥ aṁte śrayaṁte muktyai yāṁ seyaṁ śrīmaṇikarṇikā

जीवनभर अग्निहोत्र करने वाले श्रेष्ठ द्विज भी अंत में मुक्ति के लिए जिसकी शरण लेते हैं, वह यही श्रीमणिकर्णिका है।

श्लोक 6 (skanda.4.34.6)

वेदान्पठित्वा विधिवद्ब्रह्मयज्ञरता भुवि॥ यां श्रयंति द्विजा मुक्त्यै सेयं श्रीमणिकर्णिका

vedānpaṭhitvā vidhivadbrahmayajñaratā bhuvi yāṁ śrayaṁti dvijā muktyai seyaṁ śrīmaṇikarṇikā

पृथ्वी पर विधिपूर्वक वेद पढ़कर ब्रह्मयज्ञ में रत द्विज भी मुक्ति के लिए जिसकी शरण लेते हैं, वह यही श्रीमणिकर्णिका है।

श्लोक 7 (skanda.4.34.7)

इष्ट्वा क्रतूनपि नृपा बहून्पर्याप्तदक्षिणान्॥ श्रयंते श्रेयसे धन्याः प्रांतेऽधिमणिकर्णिकम्

iṣṭvā kratūnapi nṛpā bahūnparyāptadakṣiṇān śrayaṁte śreyase dhanyāḥ prāṁte'dhimaṇikarṇikam

पर्याप्त दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ करने वाले धन्य राजा भी अंत में कल्याण के लिए मणिकर्णिका की शरण लेते हैं।

श्लोक 8 (skanda.4.34.8)

सीमंतिन्योपि सततं पतिव्रतपरायणाः॥ मुक्त्यै पतिमनुव्रज्य श्रयंति मणिकर्णिकाम्

sīmaṁtinyopi satataṁ pativrataparāyaṇāḥ muktyai patimanuvrajya śrayaṁti maṇikarṇikām

सदा पतिव्रत में तत्पर विवाहित स्त्रियाँ भी मुक्ति के लिए अपने पति का अनुसरण कर मणिकर्णिका की शरण लेती हैं।

श्लोक 9 (skanda.4.34.9)

वैश्या अपि च सेवंते न्यायोपार्जितसंपदः॥ धनानि साधुसात्कृत्वा प्रांते श्रीमणिकर्णिकाम्

vaiśyā api ca sevaṁte nyāyopārjitasaṁpadaḥ dhanāni sādhusātkṛtvā prāṁte śrīmaṇikarṇikām

न्यायपूर्वक अर्जित संपत्ति वाले वैश्य भी धन को सज्जनों को अर्पित कर अंत में श्रीमणिकर्णिका की सेवा करते हैं।

श्लोक 10 (skanda.4.34.10)

त्यक्त्वा पुत्रकलत्रादि सच्छूद्रा न्यायमार्गगाः॥ निर्वाणप्राप्तये चैनां भजेयुर्मणिकर्णिकाम्॥ यावज्जीवं चरंतोपि ब्रह्मचर्य जितेंद्रियाः॥ निःश्रेयसे श्रयंत्येनां श्रीमतीं मणिकार्णकाम्

tyaktvā putrakalatrādi sacchūdrā nyāyamārgagāḥ nirvāṇaprāptaye caināṁ bhajeyurmaṇikarṇikām yāvajjīvaṁ caraṁtopi brahmacarya jiteṁdriyāḥ niḥśreyase śrayaṁtyenāṁ śrīmatīṁ maṇikārṇakām

पुत्र-कलत्र आदि त्यागकर न्याय-मार्ग पर चलने वाले सच्चे शूद्र भी निर्वाण-प्राप्ति के लिए मणिकर्णिका की भक्ति करते हैं। जीवनभर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए जितेंद्रिय भी परम कल्याण के लिए इस श्रीमती मणिकर्णिका की शरण लेते हैं।

श्लोक 11 (skanda.4.34.11)

अतिथीनपि संतर्प्य पंचयज्ञरता अपि॥ गृहस्थाश्रमिणो नेमां त्यजेयुर्मणिकर्णिकाम्

atithīnapi saṁtarpya paṁcayajñaratā api gṛhasthāśramiṇo nemāṁ tyajeyurmaṇikarṇikām

पंचयज्ञों में रत, अतिथियों को संतुष्ट करने वाले गृहस्थ भी इस मणिकर्णिका को कभी नहीं त्यागते।

श्लोक 12 (skanda.4.34.12)

वानप्रस्थाश्रमयुजो ज्ञात्वा निर्वाणसाधनम्॥ सन्नियम्येंद्रियग्रामं मणिकर्णीमुपासते

vānaprasthāśramayujo jñātvā nirvāṇasādhanam sanniyamyeṁdriyagrāmaṁ maṇikarṇīmupāsate

वानप्रस्थाश्रम में स्थित लोग, इसे निर्वाण का साधन जानकर, इंद्रियों के समूह को संयमित कर मणिकर्णिका की उपासना करते हैं।

श्लोक 13 (skanda.4.34.13)

अनन्यसाधनां मुक्तिं ज्ञात्वा शास्त्रैरनेकधा॥ मुमुक्षुभिस्त्वेकदंडैः सेव्यते मणिकर्णिका

ananyasādhanāṁ muktiṁ jñātvā śāstrairanekadhā mumukṣubhistvekadaṁḍaiḥ sevyate maṇikarṇikā

अनेक शास्त्रों से मुक्ति का अनन्य साधन जानकर, एकदंडधारी मुमुक्षुओं द्वारा मणिकर्णिका सेवित होती है।

श्लोक 14 (skanda.4.34.14)

दंडयित्वा मनोवाचं कायं नित्यं त्रिदंडिनः॥ नैःश्रेयसीं श्रियं प्राप्तुं श्रयंते मणिकर्णिकाम्

daṁḍayitvā manovācaṁ kāyaṁ nityaṁ tridaṁḍinaḥ naiḥśreyasīṁ śriyaṁ prāptuṁ śrayaṁte maṇikarṇikām

मन, वाणी और शरीर को दंडित करने वाले त्रिदंडी संन्यासी भी परम मोक्ष की श्री पाने के लिए मणिकर्णिका की शरण लेते हैं।

श्लोक 15 (skanda.4.34.15)

संन्यस्ताखिलकर्माणो दंडयित्वा चलं मनः॥ एकदंडव्रता मुक्त्यै भजेयुर्मणिकर्णिकाम्

saṁnyastākhilakarmāṇo daṁḍayitvā calaṁ manaḥ ekadaṁḍavratā muktyai bhajeyurmaṇikarṇikām

समस्त कर्मों का संन्यास लेकर, चंचल मन को दंडित कर, एकदंड-व्रतधारी भी मुक्ति के लिए मणिकर्णिका की भक्ति करते हैं।

श्लोक 16 (skanda.4.34.16)

शिखी मुंडी जटी वापि कौपीनी वा दिगंबरः॥ मुमुक्षुः को न सेवेत मुक्तिदां मणिकर्णिकाम्

śikhī muṁḍī jaṭī vāpi kaupīnī vā digaṁbaraḥ mumukṣuḥ ko na seveta muktidāṁ maṇikarṇikām

शिखाधारी, मुंडित, जटाधारी, कौपीनधारी अथवा दिगंबर — कौन मुमुक्षु मुक्तिदायिनी मणिकर्णिका की सेवा न करे?

श्लोक 17 (skanda.4.34.17)

तपःकर्तुं न शक्ता ये दानं वा दातुमक्षमाः॥ योगाभ्यास विहीना ये तेषामेषा विमुक्तिदा ॥ १-॥ संत्युपायाः सहस्रं तु मुक्तये न तथा मुने॥ हेलयैषा यथा दद्यान्निर्वाणं मणिकर्णिका

tapaḥkartuṁ na śaktā ye dānaṁ vā dātumakṣamāḥ yogābhyāsa vihīnā ye teṣāmeṣā vimuktidā 1- saṁtyupāyāḥ sahasraṁ tu muktaye na tathā mune helayaiṣā yathā dadyānnirvāṇaṁ maṇikarṇikā

जो तप करने में असमर्थ हैं, जो दान देने में अक्षम हैं, जो योगाभ्यास से रहित हैं, उनके लिए यही मुक्ति देने वाली है। हे मुने! मुक्ति के हजारों उपाय हैं, किंतु कोई भी उतनी सहजता से निर्वाण नहीं देता जितनी सहजता से यह मणिकर्णिका देती है।

श्लोक 18 (skanda.4.34.18)

अनशनव्रतभृते त्रिकालाभ्यवहारिणे॥ प्रांते दद्यात्समां मुक्तिमुभाभ्यां मणिकर्णिका॥ यथोक्तमाचरेदेको निष्ठा पाशुपतंव्रतम्॥ निरंतरं स्मरेदेको हृद्येनां मणिकर्णिकाम्

anaśanavratabhṛte trikālābhyavahāriṇe prāṁte dadyātsamāṁ muktimubhābhyāṁ maṇikarṇikā yathoktamācaredeko niṣṭhā pāśupataṁvratam niraṁtaraṁ smaredeko hṛdyenāṁ maṇikarṇikām

उपवास-व्रत धारण करने वाले तथा तीनों समय भोजन करने वाले, दोनों को ही मणिकर्णिका अंत में समान मुक्ति देती है। एक व्यक्ति यथोक्त विधि से पाशुपत व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करे, और दूसरा केवल निरंतर हृदय में इस मणिकर्णिका का स्मरण करे —

श्लोक 19 (skanda.4.34.19)

दृष्टात्र वपुषः पाते द्वयोश्च सदृशी गतिः॥ तस्मात्सर्वविहायाशु सेव्यैषा मणिकर्णिका

dṛṣṭātra vapuṣaḥ pāte dvayośca sadṛśī gatiḥ tasmātsarvavihāyāśu sevyaiṣā maṇikarṇikā

यहाँ शरीर छूटने पर दोनों की गति समान देखी जाती है। अतः सब कुछ त्यागकर शीघ्र इसी मणिकर्णिका की सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 20 (skanda.4.34.20)

स्वर्गद्वारे विशेयुर्ये विगाह्य मणिकर्णिकाम्॥ तेषां विधूतपापानां कापि स्वर्गो न दूरतः

svargadvāre viśeyurye vigāhya maṇikarṇikām teṣāṁ vidhūtapāpānāṁ kāpi svargo na dūrataḥ

मणिकर्णिका में स्नान कर स्वर्गद्वार में प्रवेश करने वालों के लिए, पाप धुल जाने पर, स्वर्ग कहीं भी दूर नहीं रहता।

श्लोक 21 (skanda.4.34.21)

स्वर्गद्वाः स्वर्गभूरेषा मोक्षभूर्मणिकर्णिका॥ स्वर्गापवर्गावत्रैव नोपरिष्टान्न चाप्यधः

svargadvāḥ svargabhūreṣā mokṣabhūrmaṇikarṇikā svargāpavargāvatraiva nopariṣṭānna cāpyadhaḥ

यह स्वर्गद्वार है, यह स्वर्गभूमि है, मणिकर्णिका मोक्षभूमि है। स्वर्ग और मोक्ष यहीं हैं, न ऊपर हैं, न नीचे।

श्लोक 22 (skanda.4.34.22)

दत्त्वा दानान्यनेकानि विगाह्य मणिकर्णिकाम्॥ स्वर्गद्वारं प्रविष्टा ये न ते निरयगामिनः

dattvā dānānyanekāni vigāhya maṇikarṇikām svargadvāraṁ praviṣṭā ye na te nirayagāminaḥ

अनेक दान देकर मणिकर्णिका में स्नान करके जो स्वर्गद्वार में प्रवेश करते हैं, वे नरक नहीं जाते।

श्लोक 23 (skanda.4.34.23)

स्वर्गापवर्गयोरर्थः कोविदैश्च निरूपितः॥ स्वर्गः सुखं समुद्दिष्टमपवर्गो महासुखम्

svargāpavargayorarthaḥ kovidaiśca nirūpitaḥ svargaḥ sukhaṁ samuddiṣṭamapavargo mahāsukham

स्वर्ग और मोक्ष का अर्थ विद्वानों ने इस प्रकार निरूपित किया है — स्वर्ग को सुख कहा गया है, मोक्ष को महासुख।

श्लोक 24 (skanda.4.34.24)

मणिकर्ण्युपविष्टस्य यत्सुखं जायते सतः॥ सिंहासनोपविष्टस्य तत्सुखं क्व शतक्रतोः

maṇikarṇyupaviṣṭasya yatsukhaṁ jāyate sataḥ siṁhāsanopaviṣṭasya tatsukhaṁ kva śatakratoḥ

मणिकर्णिका पर बैठे हुए सज्जन को जो सुख होता है, वह सुख सिंहासन पर बैठे इंद्र को भी कहाँ मिलता है?

श्लोक 25 (skanda.4.34.25)

महासुखं यदुद्दिष्टं समाधौ विस्मृतात्मनाम्॥ श्रीमत्यां मणिकर्ण्यां तत्सहजेनैव जायते

mahāsukhaṁ yaduddiṣṭaṁ samādhau vismṛtātmanām śrīmatyāṁ maṇikarṇyāṁ tatsahajenaiva jāyate

स्वयं को भूले हुए समाधिस्थ योगियों के लिए जो महासुख बताया गया है, वह श्रीमती मणिकर्णिका में सहज ही उत्पन्न हो जाता है।

श्लोक 26 (skanda.4.34.26)

स्वर्गद्वारात्पुरोभागे देवनद्याश्च पश्चिमे॥ सौभाग्यभाग्यैकनिधिः काचिदेका महास्थली

svargadvārātpurobhāge devanadyāśca paścime saubhāgyabhāgyaikanidhiḥ kācidekā mahāsthalī

स्वर्गद्वार के आगे तथा देवनदी के पश्चिम में, सौभाग्य की एकमात्र निधि, कोई एक महान स्थली है।

श्लोक 27 (skanda.4.34.27)

यावंतो भास्वतः स्पर्शाद्भासंते सैकताः कणाः॥ तावंतो द्रुहिणा जग्मुर्नैत्येषा मणिकर्णिका॥ संति तीर्थानि तावंति परितो मणिकर्णिकाम्॥ यावद्भिस्तिलमात्रापि न भूमिर्विरलीकृता

yāvaṁto bhāsvataḥ sparśādbhāsaṁte saikatāḥ kaṇāḥ tāvaṁto druhiṇā jagmurnaityeṣā maṇikarṇikā saṁti tīrthāni tāvaṁti parito maṇikarṇikām yāvadbhistilamātrāpi na bhūmirviralīkṛtā

सूर्य के स्पर्श से जितने बालू के कण चमकते हैं, उतने ब्रह्मा आ-जा चुके, किंतु यह मणिकर्णिका सदा वैसी की वैसी रहती है। मणिकर्णिका के चारों ओर इतने तीर्थ हैं कि तिल के बराबर भी भूमि खाली नहीं छूटी।

श्लोक 28 (skanda.4.34.28)

यदन्वये कोपि मुक्तः संप्राप्य मणिकर्णिकाम्॥ तद्वंश्यास्तत्प्रभावेण मान्याः स्वर्गौकसामपि

yadanvaye kopi muktaḥ saṁprāpya maṇikarṇikām tadvaṁśyāstatprabhāveṇa mānyāḥ svargaukasāmapi

जिस वंश में कोई भी मणिकर्णिका पाकर मुक्त हुआ हो, उस वंश के लोग उस प्रभाव से स्वर्गवासियों द्वारा भी सम्मानित होते हैं।

श्लोक 29 (skanda.4.34.29)

तर्पिताः पितरो येन संप्राप्य मणिकर्णिकाम्॥ सप्तसप्त तथा सप्त पूर्वजास्तेन तारिताः

tarpitāḥ pitaro yena saṁprāpya maṇikarṇikām saptasapta tathā sapta pūrvajāstena tāritāḥ

जिसने मणिकर्णिका पाकर पितरों का तर्पण किया, उसने सात, फिर सात, फिर सात — इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियों के पूर्वजों को तार दिया।

श्लोक 30 (skanda.4.34.30)

आमध्याद्देवसरित आ हरिश्चंद्रमडपात्॥ आ गंगा केशवादा च स्वर्द्वारान्मणिकर्णिका

āmadhyāddevasarita ā hariścaṁdramaḍapāt ā gaṁgā keśavādā ca svardvārānmaṇikarṇikā

देवनदी के मध्य से लेकर हरिश्चंद्र-मंडप तक, गंगा-केशव तक, और स्वर्गद्वार तक — यह सब मणिकर्णिका है।

श्लोक 31 (skanda.4.34.31)

एतद्रजःकणतुलां त्रिलोक्यपि न गच्छति॥ एतत्प्राप्त्यै प्रयतते त्रिलोकस्थोऽखिलो भवी

etadrajaḥkaṇatulāṁ trilokyapi na gacchati etatprāptyai prayatate trilokastho'khilo bhavī

इसके रज-कण की तुलना तीनों लोक भी नहीं कर सकते। तीनों लोकों में स्थित संसारी प्राणी इसकी प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 32 (skanda.4.34.32)

कलावती चित्रपटीं पश्यंतीत्थं मुहुर्मुहुः॥ ज्ञानवापीं ददर्शाथ श्रीविश्वेश्वरदक्षिणे

kalāvatī citrapaṭīṁ paśyaṁtītthaṁ muhurmuhuḥ jñānavāpīṁ dadarśātha śrīviśveśvaradakṣiṇe

इस प्रकार बार-बार चित्रपटिका को देखती हुई कलावती ने श्रीविश्वेश्वर के दक्षिण में ज्ञानवापी को देखा।

श्लोक 33 (skanda.4.34.33)

यदंबुसततं रक्षेद्दुर्वृत्ताद्दंडनायकः॥ संभ्रमो विभ्रमश्चासौ दत्त्वा भ्रातिं गरीयसीम्

yadaṁbusatataṁ rakṣeddurvṛttāddaṁḍanāyakaḥ saṁbhramo vibhramaścāsau dattvā bhrātiṁ garīyasīm

इसके जल की सतत रक्षा दंडनायक करते हैं, जो दुष्टों को संभ्रम और विभ्रम देकर उन्हें महान भ्रम में डाल देते हैं।

श्लोक 34 (skanda.4.34.34)

योष्टमूर्तिर्महादेवः पुराणे परिपठ्यते॥ तस्यैषांबुमयी मूर्तिर्ज्ञानदा ज्ञानवापिका

yoṣṭamūrtirmahādevaḥ purāṇe paripaṭhyate tasyaiṣāṁbumayī mūrtirjñānadā jñānavāpikā

पुराण में जिन्हें अष्टमूर्ति महादेव कहा गया है, उन्हीं की यह जलमयी मूर्ति ज्ञान देने वाली ज्ञानवापिका है।

श्लोक 35 (skanda.4.34.35)

नेत्रयोरतिथीकृत्य ज्ञानवापी कलावती॥ कदंबकुसुमाकारां बभार क्षणतस्तनुम्

netrayoratithīkṛtya jñānavāpī kalāvatī kadaṁbakusumākārāṁ babhāra kṣaṇatastanum

ज्ञानवापी को नेत्रों का अतिथि बनाते ही कलावती के शरीर ने क्षणभर में कदंब पुष्प जैसी रोमांच-आकृति धारण कर ली।

श्लोक 36 (skanda.4.34.36)

अंगानि वेपथुं प्रापुः स्विन्ना भालस्थली भृशम्॥ हर्षवाष्पांबुकलिले जाते तस्या विलोचने॥ तस्तंभ गात्रलतिका मुखवैवर्ण्यमाप च॥ स्वरोथ गद्गदो जातो व्यभ्रंशत्तत्करात्पटी

aṁgāni vepathuṁ prāpuḥ svinnā bhālasthalī bhṛśam harṣavāṣpāṁbukalile jāte tasyā vilocane tastaṁbha gātralatikā mukhavaivarṇyamāpa ca svarotha gadgado jāto vyabhraṁśattatkarātpaṭī

उसके अंग काँपने लगे, ललाट अत्यंत पसीने से भर गया; उसके नेत्र हर्ष के आँसुओं से भर गए। उसकी लता-सी काया स्तब्ध हो गई, मुख का रंग उड़ गया; स्वर गद्गद हो गया, और उसके हाथ से चित्रपटिका गिर पड़ी।

श्लोक 37 (skanda.4.34.37)

साक्षणं स्वं विसस्मार काहं क्वाहं न वेत्ति च॥ सौषुप्तायां दशायां च परमात्मेव निश्चला

sākṣaṇaṁ svaṁ visasmāra kāhaṁ kvāhaṁ na vetti ca sauṣuptāyāṁ daśāyāṁ ca paramātmeva niścalā

उस क्षण वह स्वयं को भूल गई — मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ, उसे कुछ भी ज्ञात न रहा; परमात्मा के समान निश्चल, गहरी निद्रा की अवस्था में।

श्लोक 38 (skanda.4.34.38)

अथ तत्परिचारिण्यस्त्वरमाणा इतस्ततः॥ किं किं किमेतदेतत्किं पृच्छंति स्म परस्परम्

atha tatparicāriṇyastvaramāṇā itastataḥ kiṁ kiṁ kimetadetatkiṁ pṛcchaṁti sma parasparam

तब उसकी परिचारिकाएँ इधर-उधर व्याकुल होकर एक-दूसरे से बार-बार पूछने लगीं — 'यह क्या हुआ, यह क्या हुआ?'

श्लोक 39 (skanda.4.34.39)

तदवस्थां समालोक्य तां ताश्चतुरचेतसः॥ विज्ञाय सात्त्विकैर्भावैरिदमूचूः परस्परम्

tadavasthāṁ samālokya tāṁ tāścaturacetasaḥ vijñāya sāttvikairbhāvairidamūcūḥ parasparam

उसकी उस अवस्था को देखकर, चतुर बुद्धि वाली वे सखियाँ इसे सात्त्विक भाव समझकर आपस में कहने लगीं —

श्लोक 40 (skanda.4.34.40)

भवांतरे प्रेमपात्रमेतयैक्षितु किंचन॥ चिरात्तेन च संगत्य सुखमूर्च्छामवाप ह

bhavāṁtare premapātrametayaikṣitu kiṁcana cirāttena ca saṁgatya sukhamūrcchāmavāpa ha

'इसने किसी पूर्वजन्म के प्रेमपात्र को देखा होगा; और चिरकाल बाद उससे मिलकर आनंद-मूर्च्छा को प्राप्त हुई होगी।'

श्लोक 41 (skanda.4.34.41)

अथनेत्थं कथमियमकांडात्पर्यमूमुहत्॥ प्रेक्षमाणा रहश्चित्रपटीमति पटीयसीम्

athanetthaṁ kathamiyamakāṁḍātparyamūmuhat prekṣamāṇā rahaścitrapaṭīmati paṭīyasīm

'अन्यथा इतनी चतुर यह अचानक इस प्रकार क्यों मोहित हो जाती, एकांत में केवल एक चित्रपटिका को देखते हुए?'

श्लोक 42 (skanda.4.34.42)

तन्मोहस्य निदानं ताःसम्यगेव विचार्य च॥ उपचेरुर्महाशांतैरुपचारैरनाकुलम्

tanmohasya nidānaṁ tāḥsamyageva vicārya ca upacerurmahāśāṁtairupacārairanākulam

उसके मोह के कारण को भलीभाँति विचार कर, वे अत्यंत शांत उपचारों से बिना किसी व्याकुलता के उसकी सेवा करने लगीं।

श्लोक 43 (skanda.4.34.43)

काचित्तां वीजयांचक्रे कदलीतालवृंतकैः॥ बिसिनीवलयैरन्या धन्यां तां पर्यभूषयत्

kācittāṁ vījayāṁcakre kadalītālavṛṁtakaiḥ bisinīvalayairanyā dhanyāṁ tāṁ paryabhūṣayat

किसी ने केले और ताड़ के पत्तों से उसे पंखा किया; किसी अन्य ने उस भाग्यशालिनी को कमल-नाल के कंगन पहनाए।

श्लोक 44 (skanda.4.34.44)

अमंदैश्चंदनरसैरभ्यषिंचदमुं परा॥ अशोकपल्लवैरस्याः काचिच्छोकमनीनशत्

amaṁdaiścaṁdanarasairabhyaṣiṁcadamuṁ parā aśokapallavairasyāḥ kācicchokamanīnaśat

किसी ने भरपूर चंदन-रस से उसका अभिषेक किया; किसी ने अशोक की कोमल पत्तियों से उसका शोक दूर करने का प्रयास किया।

श्लोक 45 (skanda.4.34.45)

धारामंडपधारांबुसीकरैस्तत्तनूलताम्॥ इष्टार्थविरहग्लानां सिंचयामास काचन॥ जलार्द्रवाससा काचिदेतस्यास्तनुमावृणोत्॥ कर्पूरक्षोदजालेपैरन्यास्तामन्वलेपयन्

dhārāmaṁḍapadhārāṁbusīkaraistattanūlatām iṣṭārthavirahaglānāṁ siṁcayāmāsa kācana jalārdravāsasā kācidetasyāstanumāvṛṇot karpūrakṣodajālepairanyāstāmanvalepayan

किसी ने फव्वारे-मंडप की जलधारा के छींटों से उसकी उस इष्ट-वियोग से म्लान लता-सी काया को सींचा। किसी ने जल में भीगे वस्त्र से उसके शरीर को ढका; अन्यों ने कपूर के बुरादे के लेप से उसे लेपित किया।

श्लोक 46 (skanda.4.34.46)

पद्मिनीदलशय्या च काचित्यरचयन्मृदुम्॥ काचित्कुलिशनेपथ्यं दूरीकृत्य तदंगतः

padminīdalaśayyā ca kācityaracayanmṛdum kācitkuliśanepathyaṁ dūrīkṛtya tadaṁgataḥ

किसी ने कमल-पत्रों की कोमल शय्या बनाई; किसी ने उसके अंगों से भारी आभूषण दूर हटा दिए।

श्लोक 47 (skanda.4.34.47)

मुक्ताकलापं रचयांचक्रे वक्षोजमंडले॥ काचिच्छशिमुखी तां तु चंद्रकांतशिलातले

muktākalāpaṁ racayāṁcakre vakṣojamaṁḍale kācicchaśimukhī tāṁ tu caṁdrakāṁtaśilātale

किसी ने उसके वक्षस्थल पर मोतियों की माला सजाई; और किसी चंद्रमुखी ने उसे चंद्रकांत शिला पर,

श्लोक 48 (skanda.4.34.48)

स्वापयामास तन्वंगीं स्रवच्छीतांबुशीतले॥ दृष्ट्वोपचार्यमाणां तामित्थं बुद्धिशरीरिणी

svāpayāmāsa tanvaṁgīṁ sravacchītāṁbuśītale dṛṣṭvopacāryamāṇāṁ tāmitthaṁ buddhiśarīriṇī

बहते शीतल जल से ठंडी, वहाँ सुला दिया। उसे इस प्रकार सेवा की जाती देखकर, बुद्धिमती एक सखी ने,

श्लोक 49 (skanda.4.34.49)

अतितापपरीतांगी ताः सखीः प्रत्यभाषत॥ एतस्यास्तापशांत्यर्थं जानेहं परमौषधम्

atitāpaparītāṁgī tāḥ sakhīḥ pratyabhāṣata etasyāstāpaśāṁtyarthaṁ jānehaṁ paramauṣadham

अत्यंत ताप से पीड़ित होकर उन सखियों से कहा — 'इसके ताप को शांत करने का परम औषध मैं जानती हूँ।'

श्लोक 50 (skanda.4.34.50)

उपचारानिमान्सवार्न्दूरी कुरुत मा चिरम्॥ अपतापां करोम्येनां सद्यः पश्यत कौतुकम्

upacārānimānsavārndūrī kuruta mā ciram apatāpāṁ karomyenāṁ sadyaḥ paśyata kautukam

'ये सारे उपचार शीघ्र हटा दो। मैं इसे तुरंत तापरहित कर देती हूँ, देखो यह कौतुक।'

श्लोक 51 (skanda.4.34.51)

दृष्ट्वा चित्रपटीमेषा सद्यो विह्वलतामगात्॥ अत्रैव काचिदेतस्याः प्रेमभूरस्ति निश्चितम्

dṛṣṭvā citrapaṭīmeṣā sadyo vihvalatāmagāt atraiva kācidetasyāḥ premabhūrasti niścitam

'यह चित्रपटिका देखकर ही तुरंत विह्वल हो गई थी। निश्चय ही इसी में इसके प्रेम का कोई स्रोत है।'

श्लोक 52 (skanda.4.34.52)

अतश्चित्रपटीस्पर्शात्परितापं विहास्यति॥ वाक्याद्बुद्धिशरीरिण्यास्ततस्तत्परिचारिकाः

ataścitrapaṭīsparśātparitāpaṁ vihāsyati vākyādbuddhiśarīriṇyāstatastatparicārikāḥ

'अतः चित्रपटिका के स्पर्श से ही यह अपना संताप त्याग देगी।' उस बुद्धिमती सखी के वचन सुनकर, फिर उसकी परिचारिकाओं ने,

श्लोक 53 (skanda.4.34.53)

निधाय तत्पुरः प्रोचुः पटीं पश्य कलावति॥ तवानंदकरी यत्र काचिदस्तीष्टदेवता

nidhāya tatpuraḥ procuḥ paṭīṁ paśya kalāvati tavānaṁdakarī yatra kācidastīṣṭadevatā

उसके सामने चित्रपटिका रखकर कहा — 'हे कलावति! इस चित्र को देखो, जिसमें तुम्हें आनंद देने वाली कोई इष्ट देवता है।'

श्लोक 54 (skanda.4.34.54)

सापीष्टदेवतानाम्ना तत्पटीदर्शनेन च॥ सुधासेकमिव प्राप्य मूर्छां हित्वोत्थिता द्रुतम्॥ अवग्रहपरिम्लाना वर्षासारैरिवौषधीः॥ पुनरालोकयांचक्रे ज्ञानदां ज्ञानवापिकाम्

sāpīṣṭadevatānāmnā tatpaṭīdarśanena ca sudhāsekamiva prāpya mūrchāṁ hitvotthitā drutam avagrahaparimlānā varṣāsārairivauṣadhīḥ punarālokayāṁcakre jñānadāṁ jñānavāpikām

वह इष्ट देवता के नाम और उस चित्र के दर्शन मात्र से, मानो अमृत-सिंचन पाकर, मूर्च्छा त्यागकर तुरंत उठ बैठी — जैसे अकाल से मुरझाई औषधियाँ वर्षा की धारा से पुनर्जीवित हो जाती हैं — और फिर से ज्ञान देने वाली ज्ञानवापिका को देखने लगी।

श्लोक 55 (skanda.4.34.55)

स्पृष्ट्वा कलावती तां तु वापीं चित्रगतामपि॥ लेभे भवांतरज्ञानं यथासीत्पूर्वर्जन्मनि

spṛṣṭvā kalāvatī tāṁ tu vāpīṁ citragatāmapi lebhe bhavāṁtarajñānaṁ yathāsītpūrvarjanmani

कलावती ने चित्र में उस वापी का स्पर्श करते ही, अपने पूर्वजन्म का ज्ञान उसी प्रकार प्राप्त कर लिया जैसा वह पूर्वजन्म में था।

श्लोक 56 (skanda.4.34.56)

पुनर्विचारयांचक्रे वापी माहात्म्यमुत्तमम्॥ अहो चित्रगतापीयं संस्पृष्टा ज्ञानवापिका

punarvicārayāṁcakre vāpī māhātmyamuttamam aho citragatāpīyaṁ saṁspṛṣṭā jñānavāpikā

उसने फिर से उस वापी की उत्तम महिमा पर विचार किया — 'अहो! यह ज्ञानवापिका, चित्र में स्पर्श किए जाने पर भी,'

श्लोक 57 (skanda.4.34.57)

ज्ञानं मे जनयामास भवांतर समुद्भवम्॥ अथ तासां पुरो हृष्टा कथयामास सुंदरी

jñānaṁ me janayāmāsa bhavāṁtara samudbhavam atha tāsāṁ puro hṛṣṭā kathayāmāsa suṁdarī

'मुझे पूर्वजन्म का ज्ञान करा दिया!' तब वह सुंदरी प्रसन्न होकर उन सखियों के सामने,

श्लोक 58 (skanda.4.34.58)

निजं प्राग्भव वृत्तांतं ज्ञानवापीप्रभावजम्॥ ॥ कलावत्युवाच॥ एतस्माज्जन्मनः पूर्वमहं ब्राह्मणकन्यका

nijaṁ prāgbhava vṛttāṁtaṁ jñānavāpīprabhāvajam kalāvatyuvāca etasmājjanmanaḥ pūrvamahaṁ brāhmaṇakanyakā

ज्ञानवापी के प्रभाव से उत्पन्न अपना पूर्वजन्म का वृत्तांत कहने लगी। कलावती ने कहा — 'इस जन्म से पहले मैं एक ब्राह्मण की पुत्री थी।'

श्लोक 59 (skanda.4.34.59)

उपविश्वेश्वरं काश्यां ज्ञानवाप्यां रमे मुदा॥ जनको मे हरिस्वामी जनयित्री प्रियंवदा

upaviśveśvaraṁ kāśyāṁ jñānavāpyāṁ rame mudā janako me harisvāmī janayitrī priyaṁvadā

'काशी में विश्वेश्वर के समीप ज्ञानवापी पर मैं आनंदपूर्वक रहती थी। मेरे पिता हरिस्वामी और माता प्रियंवदा थीं।'

श्लोक 60 (skanda.4.34.60)

आख्या मम सुशीलेति मां च विद्याधरोऽहरत्॥ मध्येमार्गं निशीथेथ तदोप मलयाचलम्

ākhyā mama suśīleti māṁ ca vidyādharo'harat madhyemārgaṁ niśīthetha tadopa malayācalam

'मेरा नाम सुशीला था। मुझे एक विद्याधर हर ले गया; रात्रि में मार्ग के बीच ही वह मलय पर्वत पहुँचा।'

श्लोक 61 (skanda.4.34.61)

रक्षसा सहतो वीरो राक्षसं स जघानह॥ रक्षोपि मुक्तं शापात्तु दिव्यवपुरवाप ह

rakṣasā sahato vīro rākṣasaṁ sa jaghānaha rakṣopi muktaṁ śāpāttu divyavapuravāpa ha

'एक राक्षस के साथ लड़ते हुए उस वीर ने राक्षस को मार डाला; और वह राक्षस भी शाप से मुक्त होकर दिव्य शरीर पा गया।'

श्लोक 62 (skanda.4.34.62)

अवाप जन्मगंधर्वस्त्वसौ मलयकेतुतः॥ कर्णाटनृपतेः कन्या बभूवाहं कलावती

avāpa janmagaṁdharvastvasau malayaketutaḥ karṇāṭanṛpateḥ kanyā babhūvāhaṁ kalāvatī

'वह मलयकेतु के पुत्र के रूप में गंधर्व-जन्म पाकर उत्पन्न हुआ; और मैं कर्णाट के राजा की पुत्री कलावती बनी।'

श्लोक 63 (skanda.4.34.63)

ताश्च तत्परिचारिण्यः प्रहृष्टास्यास्तदाऽभवन्॥ प्रोचुस्तां प्रणिपत्याथ पुण्यशीलां कलावतीम्

tāśca tatparicāriṇyaḥ prahṛṣṭāsyāstadā'bhavan procustāṁ praṇipatyātha puṇyaśīlāṁ kalāvatīm

उसकी परिचारिकाएँ भी तब अत्यंत हर्षित हो गईं, और प्रणाम कर उस पुण्यशील कलावती से बोलीं —

श्लोक 64 (skanda.4.34.64)

अहो कथं हि सा लभ्या यत्प्रभावोयमीदृशः॥ धिग्जन्म तेषां मर्त्येऽस्मिन्यैर्नैक्षि ज्ञानवापिका

aho kathaṁ hi sā labhyā yatprabhāvoyamīdṛśaḥ dhigjanma teṣāṁ martye'sminyairnaikṣi jñānavāpikā

'अहो! ऐसा प्रभाव वाली यह वापी भला कैसे प्राप्त हो? धिक्कार है उन लोगों के जन्म को इस मर्त्यलोक में, जिन्होंने ज्ञानवापी को कभी नहीं देखा!'

श्लोक 65 (skanda.4.34.65)

कलावति नमस्तुभ्यं कुरुनोपि समीहितम्॥ जनिं सफलयास्माकं नय नः प्रार्थ्य भूपतिम्

kalāvati namastubhyaṁ kurunopi samīhitam janiṁ saphalayāsmākaṁ naya naḥ prārthya bhūpatim

'हे कलावति! तुम्हें नमस्कार। हमारी भी इच्छा पूर्ण करो। हमारे जन्म को सफल करो, राजा से प्रार्थना कर हमें भी वहाँ ले चलो।'

श्लोक 66 (skanda.4.34.66)

अयं च नियमोस्माकमद्यारभ्य कलावति॥ निर्वेक्ष्यामो महाभोगान्दृष्ट्वा तां ज्ञानवापिकाम्

ayaṁ ca niyamosmākamadyārabhya kalāvati nirvekṣyāmo mahābhogāndṛṣṭvā tāṁ jñānavāpikām

'और हे कलावति! आज से हमारा यह नियम है कि उस ज्ञानवापिका को देखकर ही हम महाभोगों का त्याग करेंगी।'

श्लोक 67 (skanda.4.34.67)

अवश्यं ज्ञानवापी सा नाम्ना भवितुमर्हति॥ चित्रं चित्रगतापीह या तव ज्ञानदायिनी

avaśyaṁ jñānavāpī sā nāmnā bhavitumarhati citraṁ citragatāpīha yā tava jñānadāyinī

'निश्चय ही उस वापी का नाम ज्ञानवापी होना उचित ही है। आश्चर्य है कि चित्र में स्थित होकर भी यह तुम्हें ज्ञान देने वाली बनी!'

श्लोक 68 (skanda.4.34.68)

ॐकृत्य तासां वाक्यं सा स्वाकारं परिगोप्य च॥ प्रियाणि कृत्वा भूभर्तुः प्रस्तावज्ञा व्यजिज्ञपत्

oṁkṛtya tāsāṁ vākyaṁ sā svākāraṁ parigopya ca priyāṇi kṛtvā bhūbhartuḥ prastāvajñā vyajijñapat

उनके वचन को स्वीकार कर, अपनी अवस्था को छिपाकर, राजा को प्रसन्न कर, अवसर की जानकार वह कलावती ने अपनी बात कही।

श्लोक 69 (skanda.4.34.69)

कलावत्युवाच॥ जीवितेश न मे त्वत्तः किंचित्प्रियतरं क्वचित्॥ त्वामासाद्य पतिं राजन्प्राप्ताः सर्वे मनोरथाः

kalāvatyuvāca jīviteśa na me tvattaḥ kiṁcitpriyataraṁ kvacit tvāmāsādya patiṁ rājanprāptāḥ sarve manorathāḥ

कलावती ने कहा — 'हे प्राणनाथ! मुझे आपसे बढ़कर कहीं कुछ भी प्रिय नहीं है। हे राजन्! आपको पति के रूप में पाकर मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गए।'

श्लोक 70 (skanda.4.34.70)

एको मनोरथः प्रार्थ्यो ममास्त्यत्रार्यपुत्रक॥ विचारपथमापन्नस्तवापि स महाहितः

eko manorathaḥ prārthyo mamāstyatrāryaputraka vicārapathamāpannastavāpi sa mahāhitaḥ

'फिर भी, हे आर्यपुत्र! मुझे एक मनोरथ प्रार्थना करना है, जो विचार करने पर आपके लिए भी अत्यंत हितकर है।'

श्लोक 71 (skanda.4.34.71)

मम तु त्वदधीनायाः सुदुष्प्रापतरो महान्॥ तव स्वाधीनवृत्तेस्तु सिद्धप्रायो मनोरथः

mama tu tvadadhīnāyāḥ suduṣprāpataro mahān tava svādhīnavṛttestu siddhaprāyo manorathaḥ

'आपके अधीन मुझ जैसी के लिए वह अत्यंत दुष्प्राप्य महान इच्छा है; किंतु स्वाधीन आचरण वाले आपके लिए वह मनोरथ लगभग सिद्ध ही है।'

श्लोक 72 (skanda.4.34.72)

प्राणेश किं बहूक्तेन यदि प्राणैः प्रयोजनम्॥ तदाभिलषितं देहि प्राणा यास्यंत्यथान्यथा॥ प्राणेभ्योपि गरीयस्यास्तस्या वाक्यं निशम्य सः॥ उवाच वचनं राजा तस्याः स्वस्यापि च प्रियम्

prāṇeśa kiṁ bahūktena yadi prāṇaiḥ prayojanam tadābhilaṣitaṁ dehi prāṇā yāsyaṁtyathānyathā prāṇebhyopi garīyasyāstasyā vākyaṁ niśamya saḥ uvāca vacanaṁ rājā tasyāḥ svasyāpi ca priyam

'हे प्राणेश! अधिक कहने से क्या लाभ? यदि आपको मेरे प्राणों से कुछ प्रयोजन है, तो वह अभिलषित वस्तु दीजिए, अन्यथा मेरे प्राण चले जाएँगे।' प्राणों से भी अधिक प्रिय उसकी यह बात सुनकर राजा ने उससे तथा स्वयं को भी प्रिय लगने वाला वचन कहा।

श्लोक 73 (skanda.4.34.73)

राजोवाच॥ नाहं प्रिये तवादेयमिह पश्यामि भामिनि॥ प्राणा अपि मम क्रीतास्त्वया शीलकलागुणैः

rājovāca nāhaṁ priye tavādeyamiha paśyāmi bhāmini prāṇā api mama krītāstvayā śīlakalāguṇaiḥ

राजा ने कहा — 'हे प्रिये, हे भामिनि! मुझे यहाँ ऐसा कुछ नहीं दिखता जो तुम्हें न देने योग्य हो। मेरे प्राण भी तुम्हारे शील, कला और गुणों से खरीदे जा चुके हैं।'

श्लोक 74 (skanda.4.34.74)

अविलंबितमाचक्ष्व कृतं विद्धि कलावति॥ भवद्विधानां साध्वीनामन्येऽप्राप्यं न किंचन

avilaṁbitamācakṣva kṛtaṁ viddhi kalāvati bhavadvidhānāṁ sādhvīnāmanye'prāpyaṁ na kiṁcana

'बिना विलंब किए कहो, हे कलावति, जान लो कि वह हो चुका। तुम्हारे जैसी साध्वियों के लिए और कुछ भी अप्राप्य नहीं है।'

श्लोक 75 (skanda.4.34.75)

कः प्रार्थ्यः प्रार्थनीयं किं को वा प्रार्थयिता प्रिये॥ न पृथग्जनवत्किंचिद्वर्तनं नौ कलावति

kaḥ prārthyaḥ prārthanīyaṁ kiṁ ko vā prārthayitā priye na pṛthagjanavatkiṁcidvartanaṁ nau kalāvati

'कौन प्रार्थनीय है, क्या प्रार्थना करनी है, या कौन प्रार्थना करने वाला है, हे प्रिये? हे कलावति! हम दोनों के बीच साधारण जनों जैसा कोई व्यवहार नहीं है।'

श्लोक 76 (skanda.4.34.76)

देशः कोशो बलं दुर्गं यदन्यदपि भामिनि॥ तत्त्वदीयं न मे किंचित्स्वाम्यमात्रमिहास्ति मे

deśaḥ kośo balaṁ durgaṁ yadanyadapi bhāmini tattvadīyaṁ na me kiṁcitsvāmyamātramihāsti me

'हे भामिनि! देश, कोष, सेना, दुर्ग तथा जो कुछ भी और है, वह सब तुम्हारा ही है; मेरा तो यहाँ केवल स्वामित्व-मात्र का नाम है।'

श्लोक 77 (skanda.4.34.77)

तच्च स्वाम्यं ममान्यत्र त्वदृते जीवितेश्वरि॥ राज्यं त्यजेयं त्वद्वाक्यात्तृणीकृत्यापि मानिनि

tacca svāmyaṁ mamānyatra tvadṛte jīviteśvari rājyaṁ tyajeyaṁ tvadvākyāttṛṇīkṛtyāpi mānini

'और हे जीवितेश्वरि! वह स्वामित्व भी तुम्हारे बिना मेरे लिए कहीं कुछ नहीं है। हे मानिनि! तुम्हारे वचन से मैं राज्य को तिनके के समान त्याग सकता हूँ।'

श्लोक 78 (skanda.4.34.78)

माल्पकेतोर्महीजानेरिति वाक्यं निशम्य सा॥ प्राह गंभीरया वाचा वचश्चारु कलावती

mālpaketormahījāneriti vākyaṁ niśamya sā prāha gaṁbhīrayā vācā vacaścāru kalāvatī

पृथ्वीपति माल्यकेतु की यह बात सुनकर, कलावती ने गंभीर वाणी से सुंदर वचन कहा।

श्लोक 79 (skanda.4.34.79)

कलावत्युवाच॥ नाथ प्रजासृजापूर्वं सृष्टा नानाविधाः प्रजाः॥ प्रजाहिताय संसृष्टं पुरुषार्थचतुष्टयम्

kalāvatyuvāca nātha prajāsṛjāpūrvaṁ sṛṣṭā nānāvidhāḥ prajāḥ prajāhitāya saṁsṛṣṭaṁ puruṣārthacatuṣṭayam

कलावती ने कहा — 'हे नाथ! प्रजापति ने पहले नाना प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि की, और प्रजा के हित के लिए ही पुरुषार्थ-चतुष्टय की रचना हुई।'

श्लोक 80 (skanda.4.34.80)

तद्विहीनाजनिरपि जल बुद्बुदवन्मुधा॥ तस्मादेकोपि संसाध्यः परत्रेह च शर्मणे

tadvihīnājanirapi jala budbudavanmudhā tasmādekopi saṁsādhyaḥ paratreha ca śarmaṇe

'उससे रहित जन्म जल के बुलबुले के समान व्यर्थ है। अतः इस लोक और परलोक के सुख के लिए इनमें से एक को भी सिद्ध करना चाहिए।'

श्लोक 81 (skanda.4.34.81)

यत्रानुकूल्यं दंपत्योस्त्रिवर्गस्तत्र वर्धते॥ यदुच्यते पुराविद्भिरिति तत्तथ्यमीक्षितम्॥ मद्विधाना तु दासीनां शतं तेऽस्तीह मंदिरे॥ तथापि नितरां प्रेम स्वामिनो मयि दृश्यते

yatrānukūlyaṁ daṁpatyostrivargastatra vardhate yaducyate purāvidbhiriti tattathyamīkṣitam madvidhānā tu dāsīnāṁ śataṁ te'stīha maṁdire tathāpi nitarāṁ prema svāmino mayi dṛśyate

'जहाँ दंपति के बीच अनुकूलता होती है, वहीं त्रिवर्ग बढ़ता है — प्राचीन विद्वानों का यह कथन हमने भी सत्य पाया है। मेरे जैसी सैकड़ों दासियाँ इस महल में आपकी हैं, फिर भी स्वामी का सर्वाधिक प्रेम मुझ पर ही दिखता है।'

श्लोक 82 (skanda.4.34.82)

तव दास्यपि भोगाढ्या किमुतांकस्थलीचरी॥ तत्राप्यनन्यसंपत्तिस्तत्र स्वाधीनभर्तृता

tava dāsyapi bhogāḍhyā kimutāṁkasthalīcarī tatrāpyananyasaṁpattistatra svādhīnabhartṛtā

'आपकी दासी भी भोग-समृद्ध होती है, फिर आपकी गोद में बैठने वाली की तो बात ही क्या! उसमें भी अनुपम संपत्ति है, अपने पति का स्वाधीन होना।'

श्लोक 83 (skanda.4.34.83)

विपश्चित्संचयेदर्थानिष्टापूर्ताय कर्मणे॥ तपोर्थमायुर्निर्विघ्नं दारांश्चापत्यलब्धये

vipaścitsaṁcayedarthāniṣṭāpūrtāya karmaṇe taporthamāyurnirvighnaṁ dārāṁścāpatyalabdhaye

'बुद्धिमान पुरुष इष्टापूर्त कर्म के लिए धन संचित करता है, तप के लिए निर्विघ्न आयु चाहता है, तथा संतान-प्राप्ति के लिए पत्नी चाहता है।'

श्लोक 84 (skanda.4.34.84)

तवैतत्सर्वमस्तीह विश्वेशानुग्रहात्प्रिय॥ पूरणीयोऽभिलाषो मे यदि तद्वचम्यहं शृणु

tavaitatsarvamastīha viśveśānugrahātpriya pūraṇīyo'bhilāṣo me yadi tadvacamyahaṁ śṛṇu

'हे प्रिय! विश्वेश की कृपा से आपके पास यह सब कुछ है। यदि आप मेरी अभिलाषा पूर्ण करना चाहें तो सुनिए, मैं वह कहती हूँ।'

श्लोक 85 (skanda.4.34.85)

तूर्णं प्रहिणु मां नाथ विश्वनाथपुरीं प्रति॥ प्राणाः प्रयाता प्रागेव वपुः शेषास्मि केवलम्

tūrṇaṁ prahiṇu māṁ nātha viśvanāthapurīṁ prati prāṇāḥ prayātā prāgeva vapuḥ śeṣāsmi kevalam

'हे नाथ! मुझे शीघ्र विश्वनाथपुरी की ओर भेज दीजिए। मेरे प्राण तो पहले ही वहाँ चले गए हैं, यहाँ केवल शरीर ही शेष है।'

श्लोक 86 (skanda.4.34.86)

माल्यकेतुः कलावत्या इत्याकर्ण्य वचः स्फुटम्॥ क्षणं विचार्य स्वहृदि राजा प्रोवाच तां प्रियाम्

mālyaketuḥ kalāvatyā ityākarṇya vacaḥ sphuṭam kṣaṇaṁ vicārya svahṛdi rājā provāca tāṁ priyām

कलावती के इस स्पष्ट वचन को सुनकर माल्यकेतु ने अपने हृदय में क्षणभर विचार कर उस प्रिया से कहा —

श्लोक 87 (skanda.4.34.87)

प्रिये कलावति यदि तव गंतव्यमेव हि॥ राज्यलक्ष्म्यानया किं मे चलया त्वद्विहीनया

priye kalāvati yadi tava gaṁtavyameva hi rājyalakṣmyānayā kiṁ me calayā tvadvihīnayā

'हे प्रिय कलावति! यदि तुम्हें अवश्य ही जाना है, तो तुम्हारे बिना इस चंचल राज्यलक्ष्मी से मुझे क्या लाभ?'

श्लोक 88 (skanda.4.34.88)

न राज्यं राज्यमित्याहू राज्यश्रीः प्रेयसी ध्रुवम्॥ सप्तांगमपि तद्राज्यं तया हीनं तृणायते

na rājyaṁ rājyamityāhū rājyaśrīḥ preyasī dhruvam saptāṁgamapi tadrājyaṁ tayā hīnaṁ tṛṇāyate

'कहते हैं कि राज्यश्री के बिना राज्य, राज्य नहीं है, वह वास्तव में प्रिय ही है। सप्तांग राज्य भी उसके बिना तिनके के समान लगता है।'

श्लोक 89 (skanda.4.34.89)

निःसपत्नं कृतं राज्यं भुक्त्वा भोगान्निरंतरम्॥ हृषीकार्थाः कृतार्थाश्च विधृता आधृतिः प्रिये

niḥsapatnaṁ kṛtaṁ rājyaṁ bhuktvā bhogānniraṁtaram hṛṣīkārthāḥ kṛtārthāśca vidhṛtā ādhṛtiḥ priye

'मैंने राज्य को शत्रु-रहित बनाकर निरंतर भोगों का उपभोग किया, हे प्रिये! इंद्रियों के सभी विषय पूर्ण हुए, और धैर्य भी सदा बनाए रखा।'

श्लोक 90 (skanda.4.34.90)

अपत्यान्यपि जातानि किं कर्तव्यमिहास्ति मे॥ अवश्यमेव गंतव्याऽऽवाभ्यां वाराणसी पुरी॥ माल्यकेतुः प्रियामित्थमाश्वास्य कृतनिश्चयः॥ समाहूय च देवज्ञान्प्रकृतीः परिपूज्य च

apatyānyapi jātāni kiṁ kartavyamihāsti me avaśyameva gaṁtavyā''vābhyāṁ vārāṇasī purī mālyaketuḥ priyāmitthamāśvāsya kṛtaniścayaḥ samāhūya ca devajñānprakṛtīḥ paripūjya ca

'संतानें भी उत्पन्न हो चुकी हैं, अब यहाँ मेरे लिए क्या शेष कर्तव्य है? हम दोनों को अवश्य ही वाराणसी नगरी जाना चाहिए।' माल्यकेतु ने इस प्रकार अपनी प्रिया को आश्वस्त कर निश्चय किया, ज्योतिषियों को बुलाया तथा मंत्रियों को सम्मानित किया,

श्लोक 91 (skanda.4.34.91)

पुत्रे राज्यं निधायाथ राजा काशीं प्रतस्थिवान्॥ रत्नजातं कियदपि पुत्रादर्थं प्रगृह्य च

putre rājyaṁ nidhāyātha rājā kāśīṁ pratasthivān ratnajātaṁ kiyadapi putrādarthaṁ pragṛhya ca

और राज्य को पुत्र को सौंपकर, राजा पुत्र से कुछ रत्न-राशि भी लेकर काशी की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 92 (skanda.4.34.92)

दृष्ट्वा विश्वेश्वरपुरीं हृष्टरोमा नरेश्वरः॥ मेने कृतार्थमात्मानं संसारांबुधिपारगम्

dṛṣṭvā viśveśvarapurīṁ hṛṣṭaromā nareśvaraḥ mene kṛtārthamātmānaṁ saṁsārāṁbudhipāragam

विश्वेश्वर की नगरी को देखकर वह राजा रोमांचित हो उठा, और स्वयं को कृतार्थ, संसार-सागर से पार गया हुआ मानने लगा।

श्लोक 93 (skanda.4.34.93)

प्राग्जन्मवासनायोगात्सापि राज्ञी कलावती॥ ग्रामांतरादागतेव पुरीमार्गानवैत्स्वयम

prāgjanmavāsanāyogātsāpi rājñī kalāvatī grāmāṁtarādāgateva purīmārgānavaitsvayama

पूर्वजन्म के संस्कारवश वह रानी कलावती भी, मानो किसी और गाँव से आई हुई भी, स्वयं ही नगरी के मार्गों को जानती थी।

श्लोक 94 (skanda.4.34.94)

मणिकर्ण्यामथस्नात्वा भूरि दत्त्वा ततो वसु॥ विश्वेशमर्चयित्वाथ रत्नजातैरनेकशः

maṇikarṇyāmathasnātvā bhūri dattvā tato vasu viśveśamarcayitvātha ratnajātairanekaśaḥ

मणिकर्णिका में स्नान कर, वहाँ भरपूर धन देकर, अनेक रत्नों से विश्वेश की पूजा कर,

श्लोक 95 (skanda.4.34.95)

दत्त्वा तत्रापि रत्नानि गजानश्वान्गवां व्रजम्॥ दुकूलानि विचित्राणि पूजोपकरणानि च

dattvā tatrāpi ratnāni gajānaśvāngavāṁ vrajam dukūlāni vicitrāṇi pūjopakaraṇāni ca

वहाँ भी रत्न, हाथी, घोड़े, गायों के झुंड, विचित्र रेशमी वस्त्र तथा पूजा की सामग्री देकर,

श्लोक 96 (skanda.4.34.96)

सुवर्णरूप्यकलशान्दीपी दर्पण चामरान्॥ ध्वजस्तंभ पताकाश्च विचित्रोल्लोचकानि च

suvarṇarūpyakalaśāndīpī darpaṇa cāmarān dhvajastaṁbha patākāśca vicitrollocakāni ca

सोने-चाँदी के कलश, दीप, दर्पण, चँवर, ध्वजस्तंभ, पताकाएँ तथा विचित्र चंदोवे देकर,

श्लोक 97 (skanda.4.34.97)

अथ प्रदक्षिणीकृत्य मुक्तिमंडपमाविशत्॥ तत्र धर्मकथां श्रुत्वा दत्त्वा तत्रापि सद्धनम्

atha pradakṣiṇīkṛtya muktimaṁḍapamāviśat tatra dharmakathāṁ śrutvā dattvā tatrāpi saddhanam

फिर प्रदक्षिणा कर मुक्ति-मंडप में प्रवेश किया। वहाँ धर्म-कथा सुनकर, वहाँ भी उत्तम धन देकर,

श्लोक 98 (skanda.4.34.98)

सायंतनीं महापूजां पुनः कृत्वा क्षितीश्वरः॥ तत्र जागरणं कृत्वा तौर्यत्रिक महोत्सवैः

sāyaṁtanīṁ mahāpūjāṁ punaḥ kṛtvā kṣitīśvaraḥ tatra jāgaraṇaṁ kṛtvā tauryatrika mahotsavaiḥ

उस राजा ने पुनः सायंकालीन महापूजा की, वहाँ जागरण किया तथा नृत्य-गीत-वाद्य के महोत्सवों से रात्रि व्यतीत की।

श्लोक 99 (skanda.4.34.99)

अथ प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचाचमक्रियाम्॥ राज्ञ्या विनिर्दिष्टपथा ज्ञानवापीं नृपो ययौ॥ नृपः सार्धं कलावत्या तत्र सस्नौ प्रहृष्टवत्॥ अथ पिंडान्सनिर्वाप्य संतर्प्य श्रद्धया पितॄन्

atha prātaḥ samutthāya kṛtvā śaucācamakriyām rājñyā vinirdiṣṭapathā jñānavāpīṁ nṛpo yayau nṛpaḥ sārdhaṁ kalāvatyā tatra sasnau prahṛṣṭavat atha piṁḍānsanirvāpya saṁtarpya śraddhayā pitṝn

फिर प्रातः उठकर शौच और आचमन कर, रानी द्वारा बताए मार्ग से राजा ज्ञानवापी गया। राजा ने कलावती के साथ वहाँ अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक स्नान किया। फिर पिंडदान कर, श्रद्धापूर्वक पितरों का तर्पण कर,

श्लोक 100 (skanda.4.34.100)

तत्र रूप्य सुवर्णादि पात्रेभ्यः प्रतिपाद्य च॥ दीनांध कृपणानाथान्महार्है रत्नजातकैः

tatra rūpya suvarṇādi pātrebhyaḥ pratipādya ca dīnāṁdha kṛpaṇānāthānmahārhai ratnajātakaiḥ

वहाँ चाँदी-सोने आदि के पात्र योग्यजनों को देकर, दीन, अंधे, दरिद्र, अनाथों को अमूल्य रत्नों से संतुष्ट कर,

श्लोक 101 (skanda.4.34.101)

प्रीणयित्वा नरपतिः पारणां कृतवांस्ततः॥ संस्कार्य रत्नसोपानैर्ज्ञानवापी कलावती

prīṇayitvā narapatiḥ pāraṇāṁ kṛtavāṁstataḥ saṁskārya ratnasopānairjñānavāpī kalāvatī

राजा ने तब उपवास का पारण किया। कलावती ने ज्ञानवापी को रत्न-सोपानों से सुसज्जित कराया,

श्लोक 102 (skanda.4.34.102)

आबबंध रतिं तत्र सह भर्त्रा तपस्विनी॥ एकांतरोपवासैश्च कदाचिच्च त्र्यहोव्रतैः

ābabaṁdha ratiṁ tatra saha bhartrā tapasvinī ekāṁtaropavāsaiśca kadācicca tryahovrataiḥ

और तपस्विनी बनकर वहाँ पति के साथ अपना अनुराग बाँध लिया — कभी एक दिन छोड़कर उपवास से, कभी तीन दिन के व्रत से,

श्लोक 103 (skanda.4.34.103)

षडहोभोजनैश्चापि पक्षार्धनियमैरथ॥ पक्षांतरोपवासैश्च मासोपवसनादिभिः

ṣaḍahobhojanaiścāpi pakṣārdhaniyamairatha pakṣāṁtaropavāsaiśca māsopavasanādibhiḥ

छह दिन में एक बार भोजन से, आधे पक्ष के नियमों से, दूसरे पक्ष में उपवास से, महीनेभर के उपवास आदि से,

श्लोक 104 (skanda.4.34.104)

चांद्रायणव्रतैः कृच्छ्रैर्भर्तुः शुश्रूषणैरपि॥ निनाय क्षणवत्कालमायुःशेषस्य सानघा

cāṁdrāyaṇavrataiḥ kṛcchrairbhartuḥ śuśrūṣaṇairapi nināya kṣaṇavatkālamāyuḥśeṣasya sānaghā

कठोर चांद्रायण व्रतों से तथा पति की सेवा से — उस निष्पाप स्त्री ने अपनी शेष आयु का समय क्षणभर के समान बिता दिया।

श्लोक 105 (skanda.4.34.105)

एकदा ज्ञानवाप्यां तु प्रातः स्नात्वोपविष्टयोः॥ आगत्य जटिलः कश्चिद्विभूतिं दत्तवान्करे

ekadā jñānavāpyāṁ tu prātaḥ snātvopaviṣṭayoḥ āgatya jaṭilaḥ kaścidvibhūtiṁ dattavānkare

एक दिन ज्ञानवापी में प्रातः स्नान कर बैठे हुए उन दोनों के पास, एक जटाधारी आकर, उनके हाथ में विभूति रख दी,

श्लोक 106 (skanda.4.34.106)

उवाच च प्रसन्नास्य आशीर्भिरभिनद्य च॥ उत्तिष्ठतं प्रकुरुतं महानेपथ्यमद्य वै

uvāca ca prasannāsya āśīrbhirabhinadya ca uttiṣṭhataṁ prakurutaṁ mahānepathyamadya vai

और प्रसन्न मुख से आशीर्वाद देते हुए कहा — 'उठो, आज ही महान वेश धारण करो —'

श्लोक 107 (skanda.4.34.107)

तारकोदय संप्राप्तिर्भवित्री वां क्षणादिह॥ यावदित्थं समाचष्ट जटिलोऽग्रे तयोर्वचः

tārakodaya saṁprāptirbhavitrī vāṁ kṣaṇādiha yāvaditthaṁ samācaṣṭa jaṭilo'gre tayorvacaḥ

'तुम दोनों को यहाँ क्षणभर में तारक-मंत्र की प्राप्ति होगी।' जटाधारी अभी उनके सामने यह कह ही रहा था कि,

श्लोक 108 (skanda.4.34.108)

तावद्विमानमापन्नं सक्वणत्किंकिणीगणम्॥ पश्यतां सर्वलोकानां चन्द्रमौलिरथोरथात्॥ उत्तीर्य तच्छ्रुतिपुटे किमपि स्वयमादिशत्॥ अनाख्यं यत्परंज्योतिरुच्चक्राम च तत्क्षणात्

tāvadvimānamāpannaṁ sakvaṇatkiṁkiṇīgaṇam paśyatāṁ sarvalokānāṁ candramaulirathorathāt uttīrya tacchrutipuṭe kimapi svayamādiśat anākhyaṁ yatparaṁjyotiruccakrāma ca tatkṣaṇāt

उसी क्षण एक विमान वहाँ आ पहुँचा, जिसकी छोटी घंटियाँ रुनझुन बज रही थीं। सभी लोगों के देखते-देखते, चंद्रमौलि उस रथ से उतरकर, उनके कानों में स्वयं कुछ उपदेश दिया — और उसी क्षण वह अनाम परम ज्योति ऊपर उठ गई।

श्लोक 109 (skanda.4.34.109)

उद्योतयन्नभोवर्त्म देवोपि स्वालयं ययौ॥ ॥ स्कन्द उवाच॥ तदा प्रभृति लोकेऽत्र ज्ञानवापी विशिष्यते

udyotayannabhovartma devopi svālayaṁ yayau skanda uvāca tadā prabhṛti loke'tra jñānavāpī viśiṣyate

आकाश-मार्ग को प्रकाशित करते हुए देव भी अपने धाम को लौट गए। स्कंद ने कहा — तब से इस लोक में ज्ञानवापी विशिष्ट मानी जाती है।

श्लोक 110 (skanda.4.34.110)

सर्वेभ्यस्तीर्थर्मुख्येभ्यः प्रत्यक्ष ज्ञानदा मुने॥ सर्वज्ञानमयी चैषा सर्वलिंगमयी शुभा

sarvebhyastīrtharmukhyebhyaḥ pratyakṣa jñānadā mune sarvajñānamayī caiṣā sarvaliṁgamayī śubhā

हे मुने! समस्त प्रमुख तीर्थों से बढ़कर यह साक्षात ज्ञान देने वाली है; यह सर्वज्ञानमयी तथा सर्वलिंगमयी शुभ है।

श्लोक 111 (skanda.4.34.111)

साक्षाच्छिवमयी मूर्तिर्ज्ञानकृज्ज्ञानवापिका॥ सन्ति तीर्थान्यनेकानि सद्यः शुचिकराण्यपि

sākṣācchivamayī mūrtirjñānakṛjjñānavāpikā santi tīrthānyanekāni sadyaḥ śucikarāṇyapi

ज्ञानवापिका साक्षात शिवमयी मूर्ति है, ज्ञान करने वाली है। अनेक तीर्थ हैं जो तुरंत पवित्र करने वाले भी हैं,

श्लोक 112 (skanda.4.34.112)

परंतु ज्ञानवाप्या हि कलां नार्हंति षोडशीम्॥ ज्ञानवाप्याः समुत्पत्तिं यः श्रोष्यति समाहितः॥ न तस्य ज्ञानविभ्रंशो मरणे जायते क्वचित्

paraṁtu jñānavāpyā hi kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm jñānavāpyāḥ samutpattiṁ yaḥ śroṣyati samāhitaḥ na tasya jñānavibhraṁśo maraṇe jāyate kvacit

किंतु वे ज्ञानवापी की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। जो एकाग्रचित्त होकर ज्ञानवापी की उत्पत्ति सुनेगा, उसका मृत्यु के समय ज्ञान कभी भ्रष्ट नहीं होगा।

श्लोक 113 (skanda.4.34.113)

महाख्यानमिदं पुण्यं महापातकनाशनम्॥ महादेवस्य गौर्याश्च महाप्रीतिविवर्धनम्

mahākhyānamidaṁ puṇyaṁ mahāpātakanāśanam mahādevasya gauryāśca mahāprītivivardhanam

यह महान पवित्र आख्यान महापातकों का नाश करने वाला तथा महादेव और गौरी की महान प्रीति को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 114 (skanda.4.34.114)

पठित्वा पाठयित्वा वा श्रुत्वा वा श्रद्धयान्वितः॥ ज्ञानवाप्याः शुभाख्यानं शिवलोके महीयते

paṭhitvā pāṭhayitvā vā śrutvā vā śraddhayānvitaḥ jñānavāpyāḥ śubhākhyānaṁ śivaloke mahīyate

श्रद्धापूर्वक पढ़कर, पढ़ाकर अथवा सुनकर, ज्ञानवापी के इस शुभ आख्यान से मनुष्य शिवलोक में महिमामंडित होता है।

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