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काशी खण्ड · अध्याय 37

स्त्रीलक्षणवर्णनम्

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

श्लोक 1 (skanda.4.37.1)

स्कंद उवाच॥ सदा गृही सुखं भुंक्ते स्त्री लक्षणवती यदि॥ अतः सुखसमृद्ध्यर्थमादौ लक्षणमीक्षयेत्

skaṁda uvāca sadā gṛhī sukhaṁ bhuṁkte strī lakṣaṇavatī yadi ataḥ sukhasamṛddhyarthamādau lakṣaṇamīkṣayet

स्कन्द ने कहा -- यदि पत्नी शुभ लक्षणों वाली हो, तो गृहस्थ सदा सुख भोगता है; अतः सुख और समृद्धि के लिए सर्वप्रथम उसके लक्षणों की परीक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.4.37.2)

वपुरावर्तगंधाश्चच्छाया सत्वं स्वरो गतिः॥ वर्णश्चेत्यष्टधा प्रोक्ता बुधैर्लक्षणभूमिका

vapurāvartagaṁdhāścacchāyā satvaṁ svaro gatiḥ varṇaścetyaṣṭadhā proktā budhairlakṣaṇabhūmikā

शरीर की बनावट, रोमावर्त (बालों की भँवरी), सुगन्ध, कान्ति, स्वभाव, स्वर, चाल और वर्ण -- इन आठ आधारों को ही विद्वानों ने लक्षण-परीक्षा की भूमि कहा है।

श्लोक 3 (skanda.4.37.3)

आपादतलमारभ्य यावन्मौलिरुहं क्रमात्॥ शुभाशुभानि वक्ष्यामि लक्षणानि मुने शृणु

āpādatalamārabhya yāvanmauliruhaṁ kramāt śubhāśubhāni vakṣyāmi lakṣaṇāni mune śṛṇu

हे मुने! सुनो, मैं तलवों से लेकर सिर के केशों तक, क्रमशः शुभ और अशुभ लक्षणों का वर्णन करूँगा।

श्लोक 4 (skanda.4.37.4)

आदौ पादतलं रेखास्ततोंगुष्ठांगुली नखाः॥ पृष्ठगुल्फद्वयं पार्ष्णी जंघे रोमाणि जानुनी

ādau pādatalaṁ rekhāstatoṁguṣṭhāṁgulī nakhāḥ pṛṣṭhagulphadvayaṁ pārṣṇī jaṁghe romāṇi jānunī

सर्वप्रथम तलवा और उसकी रेखाएँ, फिर अँगूठा, अँगुलियाँ, नाखून, दोनों टखने, एड़ी, पिंडलियाँ, उनके रोम, और घुटने।

श्लोक 5 (skanda.4.37.5)

ऊरू कटी नितंबस्फिग्भगो जघन बस्तिके॥ नाभिः कुक्षिद्वयं पार्श्वोदरमध्य वलित्रयम्

ūrū kaṭī nitaṁbasphigbhago jaghana bastike nābhiḥ kukṣidvayaṁ pārśvodaramadhya valitrayam

फिर जाँघें, कमर, नितम्ब, गुह्यांग, जघन, मूत्राशय-स्थान, नाभि, दोनों कुक्षि, दोनों पार्श्व, और उदर के मध्य की तीन सलवटें।

श्लोक 6 (skanda.4.37.6)

रोमाली हृदयं वक्षो वक्षोजद्वयचूचुकम्॥ जत्रुस्कंधां सकक्षादोर्मणिबंध करद्वयम्

romālī hṛdayaṁ vakṣo vakṣojadvayacūcukam jatruskaṁdhāṁ sakakṣādormaṇibaṁdha karadvayam

फिर रोमपंक्ति, हृदय, वक्षःस्थल, दोनों स्तन और उनके अग्रभाग, हँसलियाँ, कन्धे, काँख सहित दोनों भुजाएँ, कलाई, और दोनों हाथ।

श्लोक 7 (skanda.4.37.7)

पाणिपृष्ठं पाणितलं रेखांगुष्ठांगुली नखाः॥ पृष्ठिः कृकाटिका कंठे चिबुकं च हनुद्वयम्

pāṇipṛṣṭhaṁ pāṇitalaṁ rekhāṁguṣṭhāṁgulī nakhāḥ pṛṣṭhiḥ kṛkāṭikā kaṁṭhe cibukaṁ ca hanudvayam

फिर हाथ की पीठ, हथेली, उसकी रेखाएँ, अँगूठा, अँगुलियाँ, नाखून, ऊपरी पीठ, गर्दन की ग्रीवा, कण्ठ, ठुड्डी और दोनों जबड़े।

श्लोक 8 (skanda.4.37.8)

कपोलौ वक्त्रमधरोत्तरोष्ठौ द्विजजिह्विकाः॥ घंटिका तालुहसितं नासिकाक्षुतमक्षिणी

kapolau vaktramadharottaroṣṭhau dvijajihvikāḥ ghaṁṭikā tāluhasitaṁ nāsikākṣutamakṣiṇī

फिर दोनों गाल, मुख, नीचे और ऊपर के होंठ, दाँत और जिह्वा, कौआ (घण्टिका), तालु, हँसी, नासिका, छींक, और दोनों नेत्र।

श्लोक 9 (skanda.4.37.9)

पक्ष्म भ्रूकर्णभालानि मौलि सीमंतमौलिजाः॥ षष्टिः षडुत्तरायोषिदंगलक्षणसत्खनिः

pakṣma bhrūkarṇabhālāni mauli sīmaṁtamaulijāḥ ṣaṣṭiḥ ṣaḍuttarāyoṣidaṁgalakṣaṇasatkhaniḥ

फिर पलकें, भौंहें, कान, ललाट, सिर का शिखर, माँग, और सिर के केश -- इस प्रकार छियासठ अंग स्त्री के शुभ लक्षणों की सच्ची खान कहे गए हैं।

श्लोक 10 (skanda.4.37.10)

स्त्रीणां पादतलं स्निग्धं मांसलं मृदुलं समम्॥ अस्वेदमुष्णमरुणं बहुभोगोचितं स्मृतम्॥ रूक्षं विवर्णं परुषं खंडितप्रतिबिंबकम्॥ शूर्पाकारं विशुष्कं च दुःखदौर्भाग्यसूचकम्

strīṇāṁ pādatalaṁ snigdhaṁ māṁsalaṁ mṛdulaṁ samam asvedamuṣṇamaruṇaṁ bahubhogocitaṁ smṛtam rūkṣaṁ vivarṇaṁ paruṣaṁ khaṁḍitapratibiṁbakam śūrpākāraṁ viśuṣkaṁ ca duḥkhadaurbhāgyasūcakam

स्त्री का तलवा यदि चिकना, मांसल, कोमल, सम, स्वेदरहित, गरम और लालिमायुक्त हो, तो वह बहुत भोग्य (सम्पन्न) माना गया है। किन्तु यदि वह रूखा, विवर्ण, कठोर, खण्डित प्रतिबिम्ब वाला, सूप के आकार का और अत्यन्त शुष्क हो, तो वह दुःख और दुर्भाग्य का सूचक है।

श्लोक 11 (skanda.4.37.11)

चक्र स्वस्तिक शंखाब्ज ध्वजमीनातपत्रवत्॥ यस्याः पादतले रेखा सा भवेत्क्षितिपांगना

cakra svastika śaṁkhābja dhvajamīnātapatravat yasyāḥ pādatale rekhā sā bhavetkṣitipāṁganā

जिसके तलवे में चक्र, स्वस्तिक, शंख, कमल, ध्वज, मत्स्य और छत्र के समान रेखा हो, वह राजा की पत्नी बनती है।

श्लोक 12 (skanda.4.37.12)

भवेदखंडभोगायोर्द्ध्वामध्यांगुलिसंगता॥ रेखाखु सर्पकाकाभा दुःखदारिद्र्यसूचिका

bhavedakhaṁḍabhogāyorddhvāmadhyāṁgulisaṁgatā rekhākhu sarpakākābhā duḥkhadāridryasūcikā

जो रेखा अखण्डित होकर ऊपर मध्यमा अँगुली तक पहुँचती है, वह अखण्ड भोग की सूचक है; किन्तु जो रेखा चूहे, सर्प अथवा कौए के समान हो, वह दुःख और दरिद्रता की सूचक है।

श्लोक 13 (skanda.4.37.13)

उन्नतो मांसलोंगुष्ठो वर्तुलोतुलभोगदः॥ वक्रो ह्रस्वश्च चिपिटः सुखसौभाग्यभंजकः

unnato māṁsaloṁguṣṭho vartulotulabhogadaḥ vakro hrasvaśca cipiṭaḥ sukhasaubhāgyabhaṁjakaḥ

जो अँगूठा उठा हुआ, मांसल और गोल हो, वह असीम भोग देने वाला है; किन्तु जो टेढ़ा, छोटा और चपटा हो, वह सुख और सौभाग्य को नष्ट करने वाला है।

श्लोक 14 (skanda.4.37.14)

विधवा विपुलेन स्याद्दीर्घांगुष्ठेन दुर्भगा॥ मृदवोंगुलयः शस्ता घनावृत्ताः समुन्नताः

vidhavā vipulena syāddīrghāṁguṣṭhena durbhagā mṛdavoṁgulayaḥ śastā ghanāvṛttāḥ samunnatāḥ

अत्यन्त बड़े अँगूठे वाली स्त्री विधवा होती है, और अत्यन्त लम्बे अँगूठे वाली दुर्भाग्यशाली होती है। कोमल, घनी, गोल और समुन्नत अँगुलियाँ शुभ मानी जाती हैं।

श्लोक 15 (skanda.4.37.15)

दीर्घांगुलीभिः कुलटा कृशाभिरतिनिर्धना॥ ह्रस्वायुष्या च ह्रस्वाभिर्भुग्नाभिर्भुग्नवर्तिनी

dīrghāṁgulībhiḥ kulaṭā kṛśābhiratinirdhanā hrasvāyuṣyā ca hrasvābhirbhugnābhirbhugnavartinī

लम्बी अँगुलियों वाली कुलटा होती है, दुबली अँगुलियों वाली अत्यन्त निर्धन होती है, छोटी अँगुलियों वाली अल्पायु होती है, और टेढ़ी अँगुलियों वाली टेढ़े मार्ग पर चलने वाली होती है।

श्लोक 16 (skanda.4.37.16)

चिपिटाभिर्भवेद्दासी विरलाभिर्दरिद्रिणी॥ परस्परं समारूढाः पादांगुल्यो भवंति हि

cipiṭābhirbhaveddāsī viralābhirdaridriṇī parasparaṁ samārūḍhāḥ pādāṁgulyo bhavaṁti hi

चपटी अँगुलियों वाली दासी होती है, बिखरी हुई अँगुलियों वाली दरिद्र होती है, और जिसकी पैर की अँगुलियाँ एक-दूसरे पर चढ़ी हुई होती हैं...

श्लोक 17 (skanda.4.37.17)

हत्वा बहूनपि पतीन्परप्रेष्या तदा भवेत्॥ यस्याः पथि समायांत्या रजोभूमेः समुच्छलेत्

hatvā bahūnapi patīnparapreṣyā tadā bhavet yasyāḥ pathi samāyāṁtyā rajobhūmeḥ samucchalet

...वह अनेक पतियों का नाश करके अन्ततः पराई सेविका बन जाती है। जिसके चलने पर मार्ग में भूमि की धूल ऊपर उठती है...

श्लोक 18 (skanda.4.37.18)

सा पांसुला प्रजायेत कुलत्रयविनाशिनी॥ यस्याः कनिष्ठिका भूमिं न गच्छंत्याः परिस्पृशेत्

sā pāṁsulā prajāyeta kulatrayavināśinī yasyāḥ kaniṣṭhikā bhūmiṁ na gacchaṁtyāḥ parispṛśet

...वह लम्पट स्त्री बनती है और तीन कुलों (मायके, ससुराल, तथा जिस कुल में वह पुनः जाए) का विनाश करने वाली होती है। जिसकी सबसे छोटी अँगुली चलते समय भूमि का स्पर्श नहीं करती...

श्लोक 19 (skanda.4.37.19)

सा निहत्य पतिं योषा द्वितीयं कुरुते पतिम्॥ अनामिका च मध्या च यस्या भूमिं न संस्पृशेत्॥ पतिद्वयं निहंत्याद्या द्वितीया च पतित्रयम्॥ पतिहीनत्वकारिण्यौ हीने ते द्वे इमे यदि

sā nihatya patiṁ yoṣā dvitīyaṁ kurute patim anāmikā ca madhyā ca yasyā bhūmiṁ na saṁspṛśet patidvayaṁ nihaṁtyādyā dvitīyā ca patitrayam patihīnatvakāriṇyau hīne te dve ime yadi

...ऐसी स्त्री अपने पति को खोकर दूसरा पति ग्रहण करती है। जिसकी अनामिका और मध्यमा अँगुली भूमि को स्पर्श नहीं करती, उनमें से पहली दो पतियों का नाश करती है और दूसरी तीन पतियों का; ये दोनों दोषयुक्त अँगुलियाँ पति-वियोग करने वाली होती हैं।

श्लोक 20 (skanda.4.37.20)

प्रदेशिनी भवेद्यस्या अंगुष्ठाव्यतिरेकिणी॥ कन्यैव कुलटा सा स्यादेष एव विनिश्चयः

pradeśinī bhavedyasyā aṁguṣṭhāvyatirekiṇī kanyaiva kulaṭā sā syādeṣa eva viniścayaḥ

जिस स्त्री की तर्जनी अँगूठे से भी अधिक लम्बी हो, वह कन्या-अवस्था से ही कुलटा होती है -- यह निश्चित सिद्धान्त है।

श्लोक 21 (skanda.4.37.21)

स्निग्धाः समुन्नतास्ताम्रा वृत्ताः पादनखाः शुभाः

snigdhāḥ samunnatāstāmrā vṛttāḥ pādanakhāḥ śubhāḥ

पैरों के नाखून यदि चिकने, उभरे हुए, ताम्रवर्ण और गोल हों, तो वे शुभ माने जाते हैं।

श्लोक 22 (skanda.4.37.22)

राज्ञीत्वसूचकं स्त्रीणां पादपृष्ठं समुन्नतम्॥ अस्वेदमशिराढ्यं च मसृणं मृदुमांसलम्

rājñītvasūcakaṁ strīṇāṁ pādapṛṣṭhaṁ samunnatam asvedamaśirāḍhyaṁ ca masṛṇaṁ mṛdumāṁsalam

स्त्री के पैर का ऊपरी भाग यदि समुन्नत, स्वेदरहित, नसों से रहित, चिकना और कोमल-मांसल हो, तो यह उसके रानी बनने का सूचक है।

श्लोक 23 (skanda.4.37.23)

दरिद्रा मध्यनम्रेण शिरालेन सदाध्वगा॥ रोमाढ्येन भवेद्दासी निर्मांसेन च दुर्भगा

daridrā madhyanamreṇa śirālena sadādhvagā romāḍhyena bhaveddāsī nirmāṁsena ca durbhagā

बीच में झुका हुआ पैर-पृष्ठ दरिद्रता का, नसों से भरा हुआ निरन्तर भटकने का, अत्यन्त रोमश दासीपन का, और मांसरहित दुर्भाग्य का सूचक है।

श्लोक 24 (skanda.4.37.24)

गूढौ गुल्फौ शिवायोक्तावशिरालौ सुवर्तुलौ॥ स्थपुटौ शिथिलौ दृश्यौ स्यातां दौर्भाग्यसूचकौ

gūḍhau gulphau śivāyoktāvaśirālau suvartulau sthapuṭau śithilau dṛśyau syātāṁ daurbhāgyasūcakau

शिव ने कहा है कि छिपे हुए, नसरहित और गोल टखने शुभ होते हैं; किन्तु उभरे हुए, ढीले और स्पष्ट दिखने वाले टखने दुर्भाग्य के सूचक होते हैं।

श्लोक 25 (skanda.4.37.25)

समपार्ष्णिः शुभा नारी पृथुपार्ष्णिश्च दुर्भगा॥ कुलटोन्नतपार्ष्णि स्याद्दीर्घपार्ष्णिश्च दुःखभाक्

samapārṣṇiḥ śubhā nārī pṛthupārṣṇiśca durbhagā kulaṭonnatapārṣṇi syāddīrghapārṣṇiśca duḥkhabhāk

सम एड़ी वाली स्त्री शुभ होती है, चौड़ी एड़ी वाली दुर्भाग्यशाली होती है, उभरी हुई एड़ी वाली कुलटा होती है, और लम्बी एड़ी वाली दुःखभागिनी होती है।

श्लोक 26 (skanda.4.37.26)

रोमहीने समे स्निग्धे यज्जंघे क्रमवर्तुले॥ सा राजपत्नी भवति विशिरेसुमनोहरे

romahīne same snigdhe yajjaṁghe kramavartule sā rājapatnī bhavati viśiresumanohare

जिसकी पिंडलियाँ रोमरहित, सम, चिकनी, क्रमशः गोल, नसरहित और अत्यन्त मनोहर हों, वह राजा की पत्नी बनती है।

श्लोक 27 (skanda.4.37.27)

एकरोमा राजपत्नी द्विरोमा च सुखावहा॥ त्रिरोमा रोमकूपेषु भवेद्वैधव्यदुःखभाक्

ekaromā rājapatnī dviromā ca sukhāvahā triromā romakūpeṣu bhavedvaidhavyaduḥkhabhāk

जिसके प्रत्येक रोमकूप में एक ही बाल हो, वह राजपत्नी बनती है; दो बाल वाली सुख देने वाली होती है; और जिसके रोमकूपों में तीन-तीन बाल हों, वह वैधव्य के दुःख को भोगती है।

श्लोक 28 (skanda.4.37.28)

वृत्तं पिशितसंलग्नं जानुयुग्मं प्रशस्यते॥ निर्मांसं स्वैरचारिण्या दरिद्रा याश्च विश्लथम्॥ विशिरैः करभाकारैरूरुभिर्मसृणैर्घनैः॥ सुवृत्तैरोमरहितैर्भवेयुर्भूपवल्लभाः

vṛttaṁ piśitasaṁlagnaṁ jānuyugmaṁ praśasyate nirmāṁsaṁ svairacāriṇyā daridrā yāśca viślatham viśiraiḥ karabhākārairūrubhirmasṛṇairghanaiḥ suvṛttairomarahitairbhaveyurbhūpavallabhāḥ

गोल और मांस से युक्त दोनों घुटने प्रशंसनीय हैं; मांसरहित घुटनों वाली स्त्री स्वेच्छाचारिणी होती है, और शिथिल घुटनों वाली दरिद्र होती है। जिन स्त्रियों की जाँघें नसरहित, हाथी की सूँड के समान, चिकनी, घनी, सुडौल-गोल और रोमरहित हों, वे राजा की प्रियतमा बनती हैं।

श्लोक 29 (skanda.4.37.29)

वैधव्यं रोमशैरुक्तं दौर्भाग्यं चिपिटैरपि॥ मध्यच्छिद्रैर्महादुःखं दारिद्र्यं कठिनत्वचैः

vaidhavyaṁ romaśairuktaṁ daurbhāgyaṁ cipiṭairapi madhyacchidrairmahāduḥkhaṁ dāridryaṁ kaṭhinatvacaiḥ

अत्यन्त रोमश जाँघें वैधव्य की सूचक हैं, चपटी जाँघें दुर्भाग्य की, बीच में खाली रह जाने वाली जाँघें महादुःख की, और कठोर त्वचा वाली जाँघें दरिद्रता की सूचक हैं।

श्लोक 30 (skanda.4.37.30)

चतुर्भिरंगुलैः शस्ता कटिर्विंशतिसंयुतैः॥ समुन्नतनितंबाढ्या चतुरस्रा मृगीदृशाम्

caturbhiraṁgulaiḥ śastā kaṭirviṁśatisaṁyutaiḥ samunnatanitaṁbāḍhyā caturasrā mṛgīdṛśām

मृगनयनी स्त्रियों की कमर यदि चौबीस अँगुल चौड़ी, सम उभरे नितम्बों से युक्त और चतुष्कोण हो, तो वह श्रेष्ठ मानी जाती है।

श्लोक 31 (skanda.4.37.31)

विनता चिपिटा दीर्घा निर्मांसासंकटाकटिः॥ ह्रस्वा रोमयुता नार्या दुःखवैधव्यसूचिका

vinatā cipiṭā dīrghā nirmāṁsāsaṁkaṭākaṭiḥ hrasvā romayutā nāryā duḥkhavaidhavyasūcikā

झुकी हुई, चपटी, लम्बी, मांसरहित, संकुचित, छोटी अथवा रोमयुक्त कमर -- ये सब स्त्री के लिए दुःख और वैधव्य की सूचक हैं।

श्लोक 32 (skanda.4.37.32)

नितंबबिंबो नारीणामुन्नतो मांसलः पृथुः॥ महाभोगाय संप्रोक्तस्तदन्योऽशर्मणे मतः

nitaṁbabiṁbo nārīṇāmunnato māṁsalaḥ pṛthuḥ mahābhogāya saṁproktastadanyo'śarmaṇe mataḥ

स्त्रियों के नितम्ब यदि उभरे हुए, मांसल और चौड़े हों, तो वे महान् भोग-समृद्धि के सूचक कहे गए हैं; इनसे भिन्न होने पर वे अकल्याण के सूचक माने गए हैं।

श्लोक 33 (skanda.4.37.33)

कपित्थफलवद्वृत्तौ मृदुलौ मांसलौ घनौ॥ स्फिचौ वलिविनिर्मुक्तौ रतिसौख्यविवर्धनौ

kapitthaphalavadvṛttau mṛdulau māṁsalau ghanau sphicau valivinirmuktau ratisaukhyavivardhanau

कैथ के फल के समान गोल, कोमल, मांसल, सुदृढ़ और सलवटों से रहित दोनों चूतड़ रति-सुख की वृद्धि करने वाले होते हैं।

श्लोक 34 (skanda.4.37.34)

शुभः कमठपृष्ठाभो गजस्कंधोपमो भगः॥ वामोन्नतस्तु कन्याजः पुत्रजो दक्षिणोन्नतः

śubhaḥ kamaṭhapṛṣṭhābho gajaskaṁdhopamo bhagaḥ vāmonnatastu kanyājaḥ putrajo dakṣiṇonnataḥ

कच्छप की पीठ अथवा हाथी के कन्धे के समान उभरा हुआ गुह्यांग शुभ माना गया है। जिसका बायाँ भाग उन्नत हो वह कन्या को जन्म देता है, और जिसका दायाँ भाग उन्नत हो वह पुत्र को जन्म देता है।

श्लोक 35 (skanda.4.37.35)

आखुरोमा गूढमणिः सुश्लिष्टः संहतः पृथुः॥ तुंगः कमलपर्णाभः शुभोश्वत्थदलाकृतिः

ākhuromā gūḍhamaṇiḥ suśliṣṭaḥ saṁhataḥ pṛthuḥ tuṁgaḥ kamalaparṇābhaḥ śubhośvatthadalākṛtiḥ

जिसके सूक्ष्म रोम हों, जिसका मणि (भगशेफ) छिपा हुआ हो, जो सुसंश्लिष्ट, सुदृढ़, चौड़ा, उन्नत, कमल-पत्र के समान कान्तिमान और पीपल-पत्र के आकार का हो -- ऐसा गुह्यांग शुभ माना गया है।

श्लोक 36 (skanda.4.37.36)

कुरंगखुररूपोयश्चुल्लिकोदरसन्निभः॥ रोमशो विवृतास्यश्च दृश्यनासोतिदुर्भगः

kuraṁgakhurarūpoyaścullikodarasannibhaḥ romaśo vivṛtāsyaśca dṛśyanāsotidurbhagaḥ

जो मृग के खुर के आकार का हो, चूल्हे के भीतरी भाग के समान हो, अत्यन्त रोमश हो, जिसका मुख खुला रहता हो, और जिसका अग्रभाग स्पष्ट दिखाई देता हो -- ऐसा गुह्यांग अत्यन्त अशुभ है।

श्लोक 37 (skanda.4.37.37)

शंखावर्तो भगो यस्याः सा गर्भमिह नेच्छति॥ चिपिटः खर्पराकारः किंकरी पददो भगः॥ वंशवेतसपत्राभो गजरोमोच्चनासिकः॥ विकटः कुटिलाकारो लंबगल्लस्तथाऽशुभः

śaṁkhāvarto bhago yasyāḥ sā garbhamiha necchati cipiṭaḥ kharparākāraḥ kiṁkarī padado bhagaḥ vaṁśavetasapatrābho gajaromoccanāsikaḥ vikaṭaḥ kuṭilākāro laṁbagallastathā'śubhaḥ

जिसका गुह्यांग शंख के समान घुमावदार हो, वह गर्भ धारण नहीं कर पाती। जो चपटा और ठीकरे के समान हो, वह दासीपन देता है। जो बाँस अथवा बेंत के पत्ते के समान, हाथी के रोम जैसे कठोर बालों वाला, ऊँचे अग्रभाग वाला, विकृत और टेढ़े आकार का तथा लटकती हुई तह वाला हो -- वह भी अशुभ है।

श्लोक 38 (skanda.4.37.38)

भगस्य भालं जघनं विस्तीर्णं तुंगमांसलम्॥ मृदुलं मृदुलोमाढ्यं दक्षिणावर्तमीडितम्

bhagasya bhālaṁ jaghanaṁ vistīrṇaṁ tuṁgamāṁsalam mṛdulaṁ mṛdulomāḍhyaṁ dakṣiṇāvartamīḍitam

गुह्यांग के ऊपरी भाग अर्थात् जघन-प्रदेश यदि विस्तृत, उन्नत, मांसल, कोमल, मृदु रोम से युक्त और दाहिनी ओर घूमा हुआ हो, तो वह प्रशंसनीय है।

श्लोक 39 (skanda.4.37.39)

वामावर्तं च निर्मांसं भुग्नवैधव्यसूचकम्॥ संकटस्थपुटं रूक्षं जघनं दुःखदं सदा

vāmāvartaṁ ca nirmāṁsaṁ bhugnavaidhavyasūcakam saṁkaṭasthapuṭaṁ rūkṣaṁ jaghanaṁ duḥkhadaṁ sadā

किन्तु बाईं ओर घूमा हुआ, मांसरहित और झुका हुआ जघन-प्रदेश वैधव्य का सूचक है; और संकुचित तथा रूखा जघन सदा दुःख देने वाला होता है।

श्लोक 40 (skanda.4.37.40)

बस्तिः प्रशस्ता विपुला मृद्वीस्तोकसमुन्नता॥ रोमशा च शिराला च रेखांका नैव शोभना

bastiḥ praśastā vipulā mṛdvīstokasamunnatā romaśā ca śirālā ca rekhāṁkā naiva śobhanā

निचला उदर-प्रदेश विस्तृत, कोमल और कुछ उन्नत होने पर प्रशंसनीय है; किन्तु अत्यन्त रोमश, नसों से युक्त और रेखाओं से चिह्नित होने पर वह सुन्दर नहीं माना जाता।

श्लोक 41 (skanda.4.37.41)

गंभीरा दक्षिणावर्ता नाभी स्यात्सुखसंपदे॥ वामावर्ता समुत्ताना व्यक्तग्रंथिर्न शोभना

gaṁbhīrā dakṣiṇāvartā nābhī syātsukhasaṁpade vāmāvartā samuttānā vyaktagraṁthirna śobhanā

गहरी और दाहिनी ओर घूमी हुई नाभि सुख-सम्पत्ति की सूचक होती है; किन्तु बाईं ओर घूमी हुई, उभरी हुई अथवा स्पष्ट गाँठ वाली नाभि शोभा नहीं देती।

श्लोक 42 (skanda.4.37.42)

सूते सुतान्बहून्नारी पृथुकुक्षिः सुखास्पदम्॥ क्षितीशं जनयेत्पुत्रं मंडूकाभेन कुक्षिणा

sūte sutānbahūnnārī pṛthukukṣiḥ sukhāspadam kṣitīśaṁ janayetputraṁ maṁḍūkābhena kukṣiṇā

चौड़े कुक्षि-प्रदेश वाली स्त्री, जो सुख का स्थान होती है, अनेक पुत्रों को जन्म देती है; और मेंढक के समान उदर वाली स्त्री ऐसे पुत्र को जन्म देती है जो राजा बनता है।

श्लोक 43 (skanda.4.37.43)

उन्नतेन वलीभाजा सावर्तेनापि कुक्षिणा॥ वंध्या प्रव्रजिता दासी क्रमाद्योषा भवेदिह

unnatena valībhājā sāvartenāpi kukṣiṇā vaṁdhyā pravrajitā dāsī kramādyoṣā bhavediha

अत्यधिक उभरा हुआ, सलवटों से भरा हुआ, अथवा भँवरदार कुक्षि-प्रदेश हो, तो स्त्री क्रमशः बाँझ, संन्यासिनी अथवा दासी बनती है।

श्लोक 44 (skanda.4.37.44)

समैः समांसैर्मृदुभिर्योषिन्मग्नास्थिभिः शुभैः॥ पार्श्वेः सौभाग्यसुखयोर्निधानं स्यादसंशयम्

samaiḥ samāṁsairmṛdubhiryoṣinmagnāsthibhiḥ śubhaiḥ pārśveḥ saubhāgyasukhayornidhānaṁ syādasaṁśayam

जिस स्त्री के दोनों पार्श्व सम, सम-मांस वाले, कोमल, हड्डियों को न दिखाने वाले और शुभ हों, वह निःसन्देह सौभाग्य और सुख की निधि होती है।

श्लोक 45 (skanda.4.37.45)

यस्यादृश्य शिरे पार्श्वे उन्नते रोमसंयुते॥ निरपत्या च दुःशीला सा भवेद्दुःखशेवधिः

yasyādṛśya śire pārśve unnate romasaṁyute nirapatyā ca duḥśīlā sā bhavedduḥkhaśevadhiḥ

जिसके दोनों पार्श्व नसों से रहित न दिखने वाले, उभरे हुए और रोमों से युक्त हों, वह सन्तानहीन और दुराचारिणी होकर दुःख की भण्डार बनती है।

श्लोक 46 (skanda.4.37.46)

उदरेणातितुच्छेन विशिरेण मृदुत्वचा॥ योषिद्भवति भोगाढ्या नित्यं मिष्टान्नसेविनी॥ कुंभाकारं दरिद्राया जठरं च मृदंगवत्॥ कूष्मांडाभं यवाभं च दुष्पूरं जायते स्त्रियाः

udareṇātitucchena viśireṇa mṛdutvacā yoṣidbhavati bhogāḍhyā nityaṁ miṣṭānnasevinī kuṁbhākāraṁ daridrāyā jaṭharaṁ ca mṛdaṁgavat kūṣmāṁḍābhaṁ yavābhaṁ ca duṣpūraṁ jāyate striyāḥ

अत्यन्त छोटे, नसरहित और कोमल त्वचा वाले उदर से युक्त स्त्री सम्पन्न बनकर सदा मिष्टान्न का भोग करती है। घड़े के समान उदर दरिद्रता देता है, मृदंग के समान उदर भी अशुभ है, और कुम्हड़े अथवा जौ के दाने के समान उदर वाली स्त्री सदा असन्तुष्ट ही बनी रहती है।

श्लोक 47 (skanda.4.37.47)

सुविशालोदरी नारी निरपत्या च दुर्भगा॥ प्रलंबजठरा हंति श्वशुरं चापि देवरम्

suviśālodarī nārī nirapatyā ca durbhagā pralaṁbajaṭharā haṁti śvaśuraṁ cāpi devaram

अत्यन्त विशाल उदर वाली स्त्री सन्तानहीन और दुर्भाग्यशाली होती है, और लटकते हुए उदर वाली अपने ससुर तथा देवर दोनों के लिए मृत्युकारक होती है।

श्लोक 48 (skanda.4.37.48)

मध्यक्षामा च सुभगा भोगाढ्या सवलित्रया॥ ऋज्वी तन्वी च रोमाली यस्याः सा शर्मनर्मभूः

madhyakṣāmā ca subhagā bhogāḍhyā savalitrayā ṛjvī tanvī ca romālī yasyāḥ sā śarmanarmabhūḥ

जिसकी कमर पतली, जो सौभाग्यशाली, भोग-सम्पन्न, उदर की तीन सलवटों से युक्त हो, और जिसकी रोमपंक्ति सीधी और महीन हो -- वह स्त्री साक्षात् सुख और आनन्द की भूमि है।

श्लोक 49 (skanda.4.37.49)

कपिला कुटिला स्थूला विच्छिन्ना रोमराजिका॥ चौर वैधव्य दौर्भाग्यं विदध्यादिह योषिताम्

kapilā kuṭilā sthūlā vicchinnā romarājikā caura vaidhavya daurbhāgyaṁ vidadhyādiha yoṣitām

किन्तु जिसकी रोमपंक्ति भूरे रंग की, टेढ़ी, मोटी अथवा टूटी हुई हो, वह स्त्रियों के लिए चोर से सम्बन्ध, वैधव्य और दुर्भाग्य को जन्म देती है।

श्लोक 50 (skanda.4.37.50)

निर्लोमहृदयं यस्याः समं निम्नत्व वर्जितम्॥ ऐश्वर्यं चाप्यवैधव्यं प्रियप्रेम च सा लभेत्

nirlomahṛdayaṁ yasyāḥ samaṁ nimnatva varjitam aiśvaryaṁ cāpyavaidhavyaṁ priyaprema ca sā labhet

जिसका हृदय-स्थल रोमरहित, सम और गड्ढेरहित हो, वह ऐश्वर्य, अवैधव्य तथा अपने प्रियतम का प्रेम प्राप्त करती है।

श्लोक 51 (skanda.4.37.51)

विस्तीर्णहृदया योषा पुंश्चली निर्दया तथा॥ उद्भिन्नरोमहृदया पतिं हंति विनिश्चितम्

vistīrṇahṛdayā yoṣā puṁścalī nirdayā tathā udbhinnaromahṛdayā patiṁ haṁti viniścitam

अत्यन्त विस्तृत हृदय-स्थल वाली स्त्री कुलटा और निर्दय होती है, और जिसके हृदय-स्थल पर रोम उग आए हों, वह निश्चय ही अपने पति के लिए मृत्युकारक होती है।

श्लोक 52 (skanda.4.37.52)

अष्टादशांगुलततमुरः पीवरमुन्नतम्॥ सुखाय दुःखाय भवेद्रोमशं विषमं पृथु

aṣṭādaśāṁgulatatamuraḥ pīvaramunnatam sukhāya duḥkhāya bhavedromaśaṁ viṣamaṁ pṛthu

अठारह अँगुल विस्तार वाला, भरा हुआ और उन्नत वक्षःस्थल सुख देने वाला है; किन्तु रोमश, असमान अथवा अत्यन्त चौड़ा वक्षःस्थल दुःखदायी होता है।

श्लोक 53 (skanda.4.37.53)

घनौ वृत्तौ दृढौ पीनौ समौ शस्तौ पयोधरौ॥ स्थूलाग्रौ विरलौ शुष्कौ वामोरूणां न शर्मदौ

ghanau vṛttau dṛḍhau pīnau samau śastau payodharau sthūlāgrau viralau śuṣkau vāmorūṇāṁ na śarmadau

जो स्तन घने, गोल, दृढ़, भरे हुए और सम हों, वे प्रशंसनीय माने गए हैं; किन्तु मोटे अग्रभाग वाले, दूर-दूर स्थित और सूखे हुए स्तन सुन्दरी स्त्रियों के लिए सुखदायक नहीं होते।

श्लोक 54 (skanda.4.37.54)

दक्षिणोन्नत वक्षोजा पुत्रिणी त्वग्रणीर्मता॥ वामोन्नतकुचा सूते कन्यां सौभाग्यसुंदरीम्

dakṣiṇonnata vakṣojā putriṇī tvagraṇīrmatā vāmonnatakucā sūte kanyāṁ saubhāgyasuṁdarīm

जिसका दाहिना स्तन अधिक उन्नत हो, वह पुत्र प्राप्त करने में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है; और जिसका बायाँ स्तन अधिक उन्नत हो, वह सौभाग्यवती और सुन्दर कन्या को जन्म देती है।

श्लोक 55 (skanda.4.37.55)

अरघट्टघटीतुल्यौ कुचौ दौःशील्यसूचकौ॥ पीवरास्यौ सांतरालौ पृथूपांतौ न शोभनौ॥ मूले स्थूलौ क्रमकृशावग्रे तीक्ष्णौ पयोधरौ॥ सुखदौ पूर्वकाले तु पश्चादत्यंत दुःखदौ

araghaṭṭaghaṭītulyau kucau dauḥśīlyasūcakau pīvarāsyau sāṁtarālau pṛthūpāṁtau na śobhanau mūle sthūlau kramakṛśāvagre tīkṣṇau payodharau sukhadau pūrvakāle tu paścādatyaṁta duḥkhadau

जल-चक्र की बाल्टियों के समान स्तन दुराचार के सूचक हैं। भरे हुए मुख वाले किन्तु दूर-दूर स्थित, चौड़े किनारों वाले स्तन भी शोभा नहीं देते। जो स्तन जड़ में मोटे और क्रमशः पतले होते हुए अग्रभाग में नुकीले हों, वे प्रारम्भ में सुख देते हैं किन्तु बाद में अत्यन्त दुःख देते हैं।

श्लोक 56 (skanda.4.37.56)

सुदृढं चूचुकयुगं शस्तं श्यामं सुवर्तुलम्॥ अंतर्मग्नं च दीर्घं च कृशं क्लेशाय जायते

sudṛḍhaṁ cūcukayugaṁ śastaṁ śyāmaṁ suvartulam aṁtarmagnaṁ ca dīrghaṁ ca kṛśaṁ kleśāya jāyate

दृढ़, श्यामवर्ण और सुगोल स्तनाग्र-युगल प्रशंसनीय है; किन्तु भीतर धँसा हुआ, लम्बा अथवा पतला स्तनाग्र क्लेश उत्पन्न करता है।

श्लोक 57 (skanda.4.37.57)

पीवराभ्यां च जत्रुभ्यां धनधान्यनिधिर्वधूः॥ श्लथास्थिभ्यां च निम्नाभ्यां विषमाभ्यां दरिद्रिणी

pīvarābhyāṁ ca jatrubhyāṁ dhanadhānyanidhirvadhūḥ ślathāsthibhyāṁ ca nimnābhyāṁ viṣamābhyāṁ daridriṇī

भरी हुई हँसलियों से युक्त वधू धन-धान्य की निधि बनती है; किन्तु शिथिल-हड्डी वाली, धँसी हुई अथवा असमान हँसलियों वाली वधू दरिद्र होती है।

श्लोक 58 (skanda.4.37.58)

अबद्धावनतौ स्कंधावदीर्घावकृशौ शुभौ॥ वक्रौ स्थूलौ च रोमाढ्यौ प्रेष्य वैधव्यसूचकौ

abaddhāvanatau skaṁdhāvadīrghāvakṛśau śubhau vakrau sthūlau ca romāḍhyau preṣya vaidhavyasūcakau

स्वतन्त्र, झुके हुए, न अधिक लम्बे और न पतले कन्धे शुभ माने जाते हैं; किन्तु टेढ़े, अत्यन्त मोटे और रोमश कन्धे क्रमशः सेवावृत्ति और वैधव्य के सूचक हैं।

श्लोक 59 (skanda.4.37.59)

निगूढसंधी स्रस्ताग्रौ शुभावंसौ सुसंहतौ॥ वैधव्यदौ समुच्चाग्रौ निर्मांसावतिदुःखदौ

nigūḍhasaṁdhī srastāgrau śubhāvaṁsau susaṁhatau vaidhavyadau samuccāgrau nirmāṁsāvatiduḥkhadau

गुप्त सन्धियों वाले, ढलके हुए अग्रभाग वाले, सुदृढ़ और सुगठित कन्धे शुभ हैं; किन्तु ऊँचे अग्रभाग वाले कन्धे वैधव्य देते हैं, और मांसरहित कन्धे अत्यन्त दुःख देते हैं।

श्लोक 60 (skanda.4.37.60)

कक्षेसु सूक्ष्मरोमे तु तुंगे स्निग्धे च मांसले॥ शस्तेन शस्ते गंभीरे शिराले स्वेदमेदुरे

kakṣesu sūkṣmarome tu tuṁge snigdhe ca māṁsale śastena śaste gaṁbhīre śirāle svedamedure

जिसकी काँखें सूक्ष्म रोम वाली, उभरी हुई, चिकनी और मांसल हों, वे प्रशंसनीय हैं; किन्तु गहरी, नसों से युक्त और अत्यधिक पसीने से युक्त काँखें दोषपूर्ण मानी जाती हैं।

श्लोक 61 (skanda.4.37.61)

स्यातां दोषौ सुनिर्दोषौ गूढास्थि ग्रंथिकोमलौ॥ विशिरौ च विरोमाणौ सरलौ हरिणीदृशाम्

syātāṁ doṣau sunirdoṣau gūḍhāsthi graṁthikomalau viśirau ca viromāṇau saralau hariṇīdṛśām

इस प्रकार जो दोष कहे गए, वे तभी दोषरहित बनते हैं जब काँखें हड्डी को छिपाए हुए, जोड़ में कोमल, नसरहित, अतिरिक्त रोम से रहित और सीधी हों -- मृगनयनी स्त्री के लिए यही श्रेष्ठ है।

श्लोक 62 (skanda.4.37.62)

वैधव्यं स्थूलरोमाणौ ह्रस्वौ दौर्भाग्यसूचकौ॥ परिक्लेशाय नारीणां परिदृश्यशिरौ भुजौ

vaidhavyaṁ sthūlaromāṇau hrasvau daurbhāgyasūcakau parikleśāya nārīṇāṁ paridṛśyaśirau bhujau

अत्यन्त रोमश भुजाएँ वैधव्य की सूचक हैं, छोटी भुजाएँ दुर्भाग्य की, और जिन भुजाओं में नसें स्पष्ट दिखाई देती हैं, वे स्त्रियों के लिए क्लेश का कारण बनती हैं।

श्लोक 63 (skanda.4.37.63)

अंभोज मुकुलाकारमंगुष्ठांगुलिसंमुखम्॥ हस्तद्वयं मृगाक्षीणां बहुभोगाय जायते

aṁbhoja mukulākāramaṁguṣṭhāṁgulisaṁmukham hastadvayaṁ mṛgākṣīṇāṁ bahubhogāya jāyate

जिसके दोनों हाथ कमल की अधखिली कली के समान हों और जिसका अँगूठा अँगुलियों के सम्मुख झुका हो, ऐसी मृगनयनी स्त्री के हाथ महान् भोग-सम्पदा प्रदान करते हैं।

श्लोक 64 (skanda.4.37.64)

मृदुमध्योन्नतं रक्तं तलं पाण्योररंध्रकम्॥ प्रशस्तं शस्तरेखाढ्यमल्परेखं शुभश्रियम्॥ विधवा बहुरेखेण विरेखेण दरिद्रिणी॥ भिक्षुकी सुशिराढ्येन नारी करतलेन वै

mṛdumadhyonnataṁ raktaṁ talaṁ pāṇyoraraṁdhrakam praśastaṁ śastarekhāḍhyamalparekhaṁ śubhaśriyam vidhavā bahurekheṇa virekheṇa daridriṇī bhikṣukī suśirāḍhyena nārī karatalena vai

जो हथेली कोमल, बीच में उभरी, लाल और छिद्ररहित हो, वह प्रशंसनीय है; और जिसमें शुभ रेखाएँ किन्तु कम संख्या में हों, वह सौभाग्यदायिनी है। जिस स्त्री की हथेली में रेखाएँ अत्यधिक हों, वह विधवा बनती है; जिसमें बिल्कुल रेखा न हो, वह दरिद्र बनती है; और जिसकी हथेली नसों से भरी हो, वह भिखारिन बनती है।

श्लोक 65 (skanda.4.37.65)

विरोम विशिरं शस्तं पाणिपृष्ठंसमुन्नतम्॥ वैधव्यहेतुरोमाढ्यं निर्मांसं स्नायुमत्त्यजेत्

viroma viśiraṁ śastaṁ pāṇipṛṣṭhaṁsamunnatam vaidhavyaheturomāḍhyaṁ nirmāṁsaṁ snāyumattyajet

हाथ की पीठ रोमरहित, नसरहित और सम उभरी हुई हो, तो वह प्रशंसनीय है; जो अत्यन्त रोमश हो वह वैधव्य का कारण बनती है, और जो मांसरहित तथा नसों-शिराओं से भरी हो, उसे त्याग देना चाहिए।

श्लोक 66 (skanda.4.37.66)

रक्ता व्यक्ता गभीरा च स्निग्धा पूर्णा च वर्तुला॥ कररेखांगना याः स्याच्छुभा भाग्यानुसारतः

raktā vyaktā gabhīrā ca snigdhā pūrṇā ca vartulā kararekhāṁganā yāḥ syācchubhā bhāgyānusārataḥ

जो हाथ की रेखाएँ लाल, स्पष्ट, गहरी, चिकनी, अखण्डित और गोलाकार हों, वे स्त्री के भाग्य के अनुसार शुभ फल देने वाली होती हैं।

श्लोक 67 (skanda.4.37.67)

मत्स्येन सुभगा नारी स्वस्तिकेन वसुप्रदा॥ पद्मेन भूपतेः पत्नी जनयेद्भूपतिं सुतम्

matsyena subhagā nārī svastikena vasupradā padmena bhūpateḥ patnī janayedbhūpatiṁ sutam

हाथ में मत्स्य के आकार का चिह्न सौभाग्य देता है, स्वस्तिक का चिह्न धन देता है, और कमल का चिह्न होने पर स्त्री राजा की पत्नी बनकर ऐसे पुत्र को जन्म देती है जो स्वयं राजा बनता है।

श्लोक 68 (skanda.4.37.68)

चक्रवर्तिस्त्रियाः पाणौ नंद्यावर्तः प्रदक्षिणः॥ शंखातपत्रक मठा नृपमातृत्वसूचकाः

cakravartistriyāḥ pāṇau naṁdyāvartaḥ pradakṣiṇaḥ śaṁkhātapatraka maṭhā nṛpamātṛtvasūcakāḥ

दाहिनी ओर घूमे हुए नन्द्यावर्त का चिह्न सम्राट् की पत्नी के हाथ में होता है; और शंख, छत्र अथवा मठ के आकार के चिह्न स्त्री के राजमाता बनने की सूचना देते हैं।

श्लोक 69 (skanda.4.37.69)

तुलामानाकृतीरेखे वणिक्पत्नीत्वहेतुके॥ गजवाजिवृषाकाराः करे वामे मृगीदृशाम्

tulāmānākṛtīrekhe vaṇikpatnītvahetuke gajavājivṛṣākārāḥ kare vāme mṛgīdṛśām

तराजू अथवा मापने के पात्र के आकार की रेखाएँ स्त्री के वणिक्-पत्नी बनने का कारण हैं; और मृगनयनी स्त्री के बाएँ हाथ में हाथी, घोड़े अथवा बैल के आकार के चिह्न शुभ माने जाते हैं।

श्लोक 70 (skanda.4.37.70)

रेखा प्रासादवज्राभा ब्रूयुस्तीर्थकरं सुतम्॥ कृषीवलस्य पत्नी स्याच्छकटेन युगेन वा

rekhā prāsādavajrābhā brūyustīrthakaraṁ sutam kṛṣīvalasya patnī syācchakaṭena yugena vā

प्रासाद अथवा वज्र के आकार की रेखा यह बताती है कि उसका पुत्र तीर्थंकर के समान महान् गुरु होगा; और गाड़ी अथवा जुए के आकार की रेखा होने पर वह किसान की पत्नी बनती है।

श्लोक 71 (skanda.4.37.71)

चामरांकुशकोदंडै राजपत्नी भवेद्ध्रुवम्॥ अंगुष्ठमूलान्निर्गत्य रेखा याति कनिष्ठिकाम्

cāmarāṁkuśakodaṁḍai rājapatnī bhaveddhruvam aṁguṣṭhamūlānnirgatya rekhā yāti kaniṣṭhikām

चँवर, अंकुश अथवा धनुष के आकार के चिह्नों से स्त्री निश्चय ही राजा की पत्नी बनती है; और शुभ रेखा वह होती है जो अँगूठे के मूल से निकलकर सबसे छोटी अँगुली तक पहुँचती है।

श्लोक 72 (skanda.4.37.72)

यदि सा पतिहंत्री स्याद्दूरतस्तां त्यजेत्सुधीः॥ त्रिशूलासिगदाशक्ति दुंदुभ्याकृति रेखया॥ नितंबिनी कीर्तिमती त्यागेन पृथिवीतले

yadi sā patihaṁtrī syāddūratastāṁ tyajetsudhīḥ triśūlāsigadāśakti duṁdubhyākṛti rekhayā nitaṁbinī kīrtimatī tyāgena pṛthivītale

किन्तु यदि यही रेखा पति के लिए घातक बन जाए, तो बुद्धिमान् पुरुष दूर से ही उस स्त्री का त्याग कर दे। त्रिशूल, तलवार, गदा, शक्ति अथवा नगाड़े के आकार की रेखा वाली स्त्री अपने उदार त्याग के कारण पृथ्वी पर कीर्तिमती होती है।

श्लोक 73 (skanda.4.37.73)

कंक जंबूक मंडूक वृक वृश्चिक भोगिनः॥ रासभोष्ट्र बिडालाः स्युः करस्था दुःखदाः स्त्रियाः॥ शुभदः सरलोंगुष्ठो वृत्तो वृत्तनखो मृदुः

kaṁka jaṁbūka maṁḍūka vṛka vṛścika bhoginaḥ rāsabhoṣṭra biḍālāḥ syuḥ karasthā duḥkhadāḥ striyāḥ śubhadaḥ saraloṁguṣṭho vṛtto vṛttanakho mṛduḥ

बगुला, सियार, मेंढक, भेड़िया, बिच्छू, सर्प, गधा, ऊँट अथवा बिल्ली के आकार के चिह्न हाथ में होने पर स्त्री को दुःख देते हैं। सीधा, गोल, गोल नाखून वाला और कोमल अँगूठा शुभ फल देने वाला होता है।

श्लोक 74 (skanda.4.37.74)

अंगुल्यश्च सुपर्वाणो दीर्घावृत्ताः क्रमात्कृशाः॥ चिपिटाःस्थपुटा रूक्षाः पृष्ठरोमयुजोऽशुभाः

aṁgulyaśca suparvāṇo dīrghāvṛttāḥ kramātkṛśāḥ cipiṭāḥsthapuṭā rūkṣāḥ pṛṣṭharomayujo'śubhāḥ

जिन अँगुलियों के पोर सुडौल हों, जो लम्बी, गोल और क्रमशः पतली होती जाएँ, वे शुभ हैं; किन्तु चपटी, गँठीली, रूखी अथवा पीठ पर रोमों से युक्त अँगुलियाँ अशुभ हैं।

श्लोक 75 (skanda.4.37.75)

अतिह्रस्वाः कृशा वक्रा विरला रोगहेतुकाः॥ दुःखायांगुलयः स्त्रीणां बहुपर्वसमन्विताः

atihrasvāḥ kṛśā vakrā viralā rogahetukāḥ duḥkhāyāṁgulayaḥ strīṇāṁ bahuparvasamanvitāḥ

अत्यन्त छोटी, पतली, टेढ़ी और दूर-दूर स्थित अँगुलियाँ रोग का कारण बनती हैं; और अत्यधिक पोरों वाली अँगुलियाँ स्त्रियों के लिए दुःखदायी होती हैं।

श्लोक 76 (skanda.4.37.76)

अरुणाः सशिखास्तुंगाः करजाः सुदृशांशुभाः॥ निम्ना विवर्णाः शुक्त्याभाः पीता दारिद्र्यदायकाः

aruṇāḥ saśikhāstuṁgāḥ karajāḥ sudṛśāṁśubhāḥ nimnā vivarṇāḥ śuktyābhāḥ pītā dāridryadāyakāḥ

सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री के लिए लालिमायुक्त, नुकीले और उभरे हुए नाखून शुभ हैं; किन्तु धँसे हुए, विवर्ण, सीप के समान अथवा पीले नाखून दरिद्रता देने वाले होते हैं।

श्लोक 77 (skanda.4.37.77)

नखेषु बिंदवः श्वेताः प्रायः स्युः स्वैरिणी स्त्रियाः॥ पुरुषा अपि जायंते दुःखिनः पुष्पितैर्नखैः

nakheṣu biṁdavaḥ śvetāḥ prāyaḥ syuḥ svairiṇī striyāḥ puruṣā api jāyaṁte duḥkhinaḥ puṣpitairnakhaiḥ

जिनके नाखूनों पर श्वेत बिन्दु हों, वे स्त्रियाँ प्रायः स्वेच्छाचारिणी होती हैं, और ऐसे "फूल-भरे" नाखूनों वाले पुरुष भी दुःखी होते हैं।

श्लोक 78 (skanda.4.37.78)

अंतर्निमग्नवंशास्थिः पृष्ठिः स्यान्मांसला शुभा॥ पृष्ठेन रोमयुक्तेन वैधव्यं लभते ध्रुवम्

aṁtarnimagnavaṁśāsthiḥ pṛṣṭhiḥ syānmāṁsalā śubhā pṛṣṭhena romayuktena vaidhavyaṁ labhate dhruvam

जिसकी रीढ़ की हड्डी भीतर धँसी हुई हो और पीठ मांसल हो, वह शुभ मानी जाती है; किन्तु रोमों से भरी हुई पीठ वाली स्त्री निश्चय ही वैधव्य को प्राप्त होती है।

श्लोक 79 (skanda.4.37.79)

भुग्नेन विनतेनापि सशिरेणापि दुःखिता॥ ऋज्वी कृकाटिका श्रेष्ठा समांसा च समुन्नता

bhugnena vinatenāpi saśireṇāpi duḥkhitā ṛjvī kṛkāṭikā śreṣṭhā samāṁsā ca samunnatā

पीठ के झुके, दबे अथवा नसों से युक्त होने पर स्त्री दुःखी होती है; सीधी, सम मांस वाली और समान रूप से उभरी हुई ग्रीवा श्रेष्ठ मानी जाती है।

श्लोक 80 (skanda.4.37.80)

शुष्का शिराला रोमाढ्या विशाला कुटिलाशुभा॥ मांसलो वर्तुलः कंठः प्रशस्तश्चतुरंगुलः

śuṣkā śirālā romāḍhyā viśālā kuṭilāśubhā māṁsalo vartulaḥ kaṁṭhaḥ praśastaścaturaṁgulaḥ

सूखी, नसों से युक्त, अत्यन्त रोमश, अत्यन्त विशाल अथवा टेढ़ी ग्रीवा अशुभ है; मांसल, गोल और चार अँगुल परिमाण वाला कण्ठ प्रशंसनीय है।

श्लोक 81 (skanda.4.37.81)

शस्ता ग्रीवा त्रिरेखांका त्वव्यक्तास्थिः सुसंहता॥ निर्मांसा चिपिटा दीर्घास्थपुटा न शुभप्रदा

śastā grīvā trirekhāṁkā tvavyaktāsthiḥ susaṁhatā nirmāṁsā cipiṭā dīrghāsthapuṭā na śubhapradā

तीन रेखाओं से चिह्नित, हड्डी को न दिखाने वाली, सुगठित ग्रीवा प्रशंसनीय है; किन्तु मांसरहित, चपटी, अत्यन्त लम्बी अथवा गँठीली ग्रीवा शुभ फल नहीं देती।

श्लोक 82 (skanda.4.37.82)

स्थूलग्रीवा च विधवा वक्रग्रीवा च किंकरी॥ वंध्या द्विचिपिटग्रीवा ह्रस्वग्रीवा च निःसुता॥ चिबुकंद्वयंगुलं शस्तं वृत्तं पीनं सुकोमलम्॥ स्थूलं द्विधा संविभक्तमायतं रोमशं त्यजेत्

sthūlagrīvā ca vidhavā vakragrīvā ca kiṁkarī vaṁdhyā dvicipiṭagrīvā hrasvagrīvā ca niḥsutā cibukaṁdvayaṁgulaṁ śastaṁ vṛttaṁ pīnaṁ sukomalam sthūlaṁ dvidhā saṁvibhaktamāyataṁ romaśaṁ tyajet

मोटी ग्रीवा वाली स्त्री विधवा होती है, टेढ़ी ग्रीवा वाली सेविका बनती है, दोनों ओर से चपटी ग्रीवा वाली बाँझ होती है, और छोटी ग्रीवा वाली सन्तानहीन होती है। दो अँगुल परिमाण वाली, गोल, भरी हुई और अत्यन्त कोमल ठुड्डी प्रशंसनीय है; किन्तु मोटी, दो भागों में बँटी हुई, लम्बी अथवा रोमश ठुड्डी का त्याग कर देना चाहिए।

श्लोक 83 (skanda.4.37.83)

हनुश्चिबुकसंलग्ना निर्लोमा सुघनाशुभा॥ वक्रा स्थूला कृशा ह्रस्वा रोमशा न शुभप्रदा

hanuścibukasaṁlagnā nirlomā sughanāśubhā vakrā sthūlā kṛśā hrasvā romaśā na śubhapradā

ठुड्डी से सुगठित रूप से जुड़ा हुआ, रोमरहित और सुडौल जबड़ा शुभ है; किन्तु टेढ़ा, मोटा, पतला, छोटा अथवा रोमश जबड़ा शुभ फल नहीं देता।

श्लोक 84 (skanda.4.37.84)

शस्तौ कपोलौ वामाक्ष्याः पीनौ वृत्तौ समुन्नतौ॥ रोमशौ परुषौ निम्नौ निर्मांसौ परिवर्जयेत्

śastau kapolau vāmākṣyāḥ pīnau vṛttau samunnatau romaśau paruṣau nimnau nirmāṁsau parivarjayet

सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री के भरे हुए, गोल और समान रूप से उभरे हुए कपोल प्रशंसनीय हैं; रोमश, कठोर, धँसे हुए अथवा मांसरहित कपोलों का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 85 (skanda.4.37.85)

समं समांसं सुस्निग्धं स्वामोदं वर्तुलं मुखम्॥ जनेतृवदनच्छायं धन्यानामिह जायते

samaṁ samāṁsaṁ susnigdhaṁ svāmodaṁ vartulaṁ mukham janetṛvadanacchāyaṁ dhanyānāmiha jāyate

सम, सम-मांस वाला, अत्यन्त कोमल, स्वाभाविक सुगन्ध वाला, गोल और अपनी माता के मुख-सौन्दर्य जैसा मुख केवल भाग्यशाली स्त्रियों को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 86 (skanda.4.37.86)

पाटलो वर्तुलः स्निग्धो लेखाभूषितमध्यभूः॥ सीमंतिनी नामधरो धराजानि प्रियो भवेत्

pāṭalo vartulaḥ snigdho lekhābhūṣitamadhyabhūḥ sīmaṁtinī nāmadharo dharājāni priyo bhavet

गुलाबी रंग का, गोल, चिकना और जिसके बीच का भाग सुन्दर रेखाओं से अलंकृत हो -- ऐसे मुख वाली स्त्री राजा को प्रिय होती है।

श्लोक 87 (skanda.4.37.87)

कृशः प्रलंबः स्फुटितो रूक्षो दौर्भाग्यसूचकः॥ श्यावः स्थूलोऽधरोष्ठः स्याद्वैधव्य कलहप्रदः

kṛśaḥ pralaṁbaḥ sphuṭito rūkṣo daurbhāgyasūcakaḥ śyāvaḥ sthūlo'dharoṣṭhaḥ syādvaidhavya kalahapradaḥ

पतला, लटका हुआ, फटा हुआ अथवा रूखा निचला होंठ दुर्भाग्य का सूचक है; और गहरे रंग का, मोटा निचला होंठ वैधव्य तथा कलह देने वाला होता है।

श्लोक 88 (skanda.4.37.88)

मसृणो मत्तकाशिन्याश्चोत्तरोष्ठः सुभोगदः॥ किंचिन्मध्योन्नतोऽरोमा विपरीतो विरुद्धकृत्

masṛṇo mattakāśinyāścottaroṣṭhaḥ subhogadaḥ kiṁcinmadhyonnato'romā viparīto viruddhakṛt

उन्मादिनी सुन्दरी का ऊपरी होंठ यदि चिकना, बीच में कुछ उभरा हुआ और रोमरहित हो, तो वह महान् भोग देने वाला है; इससे विपरीत होने पर वह प्रतिकूल फल देता है।

श्लोक 89 (skanda.4.37.89)

गोक्षीरसन्निभाः स्निग्धा द्वात्रिंशद्दशनाः शुभाः॥ अधस्तादुपरिष्टाच्च समाः स्तोकसमुन्नताः

gokṣīrasannibhāḥ snigdhā dvātriṁśaddaśanāḥ śubhāḥ adhastādupariṣṭācca samāḥ stokasamunnatāḥ

गाय के दूध के समान श्वेत, चिकने बत्तीस दाँत, जो नीचे और ऊपर समान रूप से पंक्तिबद्ध और कुछ उभरे हुए हों, शुभ माने जाते हैं।

श्लोक 90 (skanda.4.37.90)

पीताः श्यावाश्च दशनाः स्थूलादीर्घाद्विपंक्तयः॥ शुक्त्याकाराश्च विरला दुःखदौर्भाग्यकारणम्

pītāḥ śyāvāśca daśanāḥ sthūlādīrghādvipaṁktayaḥ śuktyākāraśca viralā duḥkhadaurbhāgyakāraṇam

पीले अथवा गहरे रंग के, मोटे, लम्बे, दोनों पंक्तियों में असमान, सीप के आकार के अथवा दूर-दूर बिखरे हुए दाँत दुःख और दुर्भाग्य के कारण बनते हैं।

श्लोक 91 (skanda.4.37.91)

अधस्तादधिकैर्दंतैर्मातरं भक्षयेत्स्फुटम्॥ पतिहीना च विकटैः कुलटा विरलैर्भवेत्॥ जिह्वेष्टमिष्टभोक्त्री स्याच्छोणामृद्वी तथासिता॥ दुःखाय मध्यसंकीर्णा पुरोभागसविस्तरा

adhastādadhikairdaṁtairmātaraṁ bhakṣayetsphuṭam patihīnā ca vikaṭaiḥ kulaṭā viralairbhavet jihveṣṭamiṣṭabhoktrī syācchoṇāmṛdvī tathāsitā duḥkhāya madhyasaṁkīrṇā purobhāgasavistarā

जिस स्त्री के नीचे के दाँत ऊपर वालों से अधिक हों, वह स्पष्टतः अपनी माता के लिए अशुभ सिद्ध होती है। विकृत दाँतों वाली पतिहीन होती है, और दूर-दूर के दाँतों वाली कुलटा होती है। जिह्वा यदि लाल, कोमल और श्याम हो, तो उसकी स्वामिनी स्वादिष्ट भोजन की भोक्त्री बनती है; किन्तु बीच में संकुचित और आगे से विस्तृत जिह्वा दुःखदायी होती है।

श्लोक 92 (skanda.4.37.92)

सितया तोयमरणं श्यामया कलहप्रिया॥ दरिद्रिणी मांसलया लंबयाऽभक्ष्यभक्षिणी

sitayā toyamaraṇaṁ śyāmayā kalahapriyā daridriṇī māṁsalayā laṁbayā'bhakṣyabhakṣiṇī

श्वेत जिह्वा वाली स्त्री की मृत्यु जल में होती है, श्याम जिह्वा वाली कलहप्रिय होती है, अत्यन्त मांसल जिह्वा वाली दरिद्र होती है, और लम्बी जिह्वा वाली अभक्ष्य वस्तुओं का भी भक्षण कर लेती है।

श्लोक 93 (skanda.4.37.93)

विशालया रसनया प्रमदातिप्रमादभाक्॥ स्निग्धं कोकनदाभासं प्रशस्तं तालुकोमलम्

viśālayā rasanayā pramadātipramādabhāk snigdhaṁ kokanadābhāsaṁ praśastaṁ tālukomalam

अत्यन्त विस्तृत जिह्वा वाली स्त्री अत्यन्त प्रमादशील बन जाती है। चिकना, लाल कमल की आभा वाला और कोमल तालु प्रशंसनीय है।

श्लोक 94 (skanda.4.37.94)

सिते तालुनि वैधव्यं पीते प्रव्रजिता भवेत्॥ कृष्णेऽपत्यवियोगार्ता रूक्षे भूरिकुटुंबिनी

site tāluni vaidhavyaṁ pīte pravrajitā bhavet kṛṣṇe'patyaviyogārtā rūkṣe bhūrikuṭuṁbinī

श्वेत तालु वैधव्य देता है, पीला तालु स्त्री को संन्यासिनी बना देता है, काला तालु सन्तान-वियोग का दुःख देता है, और रूखा तालु उसे विशाल परिवार की स्वामिनी बना देता है।

श्लोक 95 (skanda.4.37.95)

कंठे स्थूला सुवृत्ता च क्रमतीक्ष्णा सुलोहिता॥ अप्रलंबा शुभा घंटी स्थूला कृष्णा च दुःखदा

kaṁṭhe sthūlā suvṛttā ca kramatīkṣṇā sulohitā apralaṁbā śubhā ghaṁṭī sthūlā kṛṣṇā ca duḥkhadā

कण्ठ में जो घंटिका (कौआ) मूल में मोटी, गोल, धीरे-धीरे नुकीली होती हुई, गहरे लाल रंग की और अधिक लम्बी न हो, वह शुभ है; किन्तु मोटी और काली घंटिका दुःखदायी होती है।

श्लोक 96 (skanda.4.37.96)

अलक्षितद्विजं किंचित्किंचित्फुल्ल कपोलकम्॥ स्मितं प्रशस्तं सुदृशामनिमीलितलोचनम्

alakṣitadvijaṁ kiṁcitkiṁcitphulla kapolakam smitaṁ praśastaṁ sudṛśāmanimīlitalocanam

जो मुस्कान दाँतों को बहुत कम दिखाए, गालों को कुछ खिला दे, और नेत्रों को बन्द न करे, वह सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री की श्रेष्ठ मुस्कान कही जाती है।

श्लोक 97 (skanda.4.37.97)

समवृत्तपुटानासा लघुच्छिद्रा शुभावहा॥ स्थूलाग्रा मध्यनम्रा च न प्रशस्ता समुन्नता

samavṛttapuṭānāsā laghucchidrā śubhāvahā sthūlāgrā madhyanamrā ca na praśastā samunnatā

जिस नासिका के दोनों पंख समान रूप से गोल और छिद्र छोटे हों, वह शुभ है; किन्तु मोटे अग्रभाग वाली अथवा बीच में झुकी हुई नासिका प्रशंसनीय नहीं है, जबकि समान रूप से उठी हुई नासिका उत्तम है।

श्लोक 98 (skanda.4.37.98)

आकुंचितारुणाग्रा च वैधव्यक्लेशदायिनी॥ परप्रेष्या च चिपिटा ह्रस्वा दीर्घा कलिप्रिया

ākuṁcitāruṇāgrā ca vaidhavyakleśadāyinī parapreṣyā ca cipiṭā hrasvā dīrghā kalipriyā

जिसकी नासिका का अग्रभाग मुड़ा हुआ और लाल हो, वह वैधव्य के क्लेश की सूचक है; चपटी नासिका वाली पराई सेविका बनती है, और अत्यन्त छोटी अथवा लम्बी नासिका वाली कलहप्रिय होती है।

श्लोक 99 (skanda.4.37.99)

दीर्घायुः कृत्क्षुतं दीर्घं युगपद्द्वित्रिपिंडितम्॥ ललना लोचने शस्ते रक्तांते कृष्णतारके

dīrghāyuḥ kṛtkṣutaṁ dīrghaṁ yugapaddvitripiṁḍitam lalanā locane śaste raktāṁte kṛṣṇatārake

जिसकी छींक लम्बी हो अथवा एक साथ दो-तीन बार आए, वह दीर्घायु का सूचक है। स्त्री के लिए वे नेत्र प्रशंसनीय माने गए हैं जिनके कोने लाल और तारे काले हों।

श्लोक 100 (skanda.4.37.100)

गोक्षीरवर्णविशदे सुस्निग्धे कृष्णपक्ष्मणी॥ उन्नताक्षी न दीर्घायुर्वृत्ताक्षी कुलटा भवेत्॥ मेषाक्षीमहिषाक्षी च केकराक्षी न शोभना॥ कामगृहीला नितरां गोपिंगाक्षी सुदुर्वृता

gokṣīravarṇaviśade susnigdhe kṛṣṇapakṣmaṇī unnatākṣī na dīrghāyurvṛttākṣī kulaṭā bhavet meṣākṣīmahiṣākṣī ca kekarākṣī na śobhanā kāmagṛhīlā nitarāṁ gopiṁgākṣī sudurvṛtā

गाय के दूध के समान श्वेत और स्वच्छ, अत्यन्त चिकने तथा काली पलकों वाले नेत्र श्रेष्ठ हैं। उभरी हुई आँखों वाली दीर्घायु नहीं होती, गोल आँखों वाली कुलटा बनती है। भेड़ जैसी, भैंस जैसी और तिरछी आँखों वाली सुन्दर नहीं मानी जातीं, तथा गाय के समान भूरी आँखों वाली स्त्री कामातुर और अत्यन्त दुराचारिणी होती है।

श्लोक 101 (skanda.4.37.101)

पारावताक्षी दुःशीला रक्ताक्षी भर्तृघातिनी॥ कोटरा नयना दुष्टा गजनेत्रा न शोभना

pārāvatākṣī duḥśīlā raktākṣī bhartṛghātinī koṭarā nayanā duṣṭā gajanetrā na śobhanā

कबूतर जैसी आँखों वाली दुराचारिणी होती है, लाल आँखों वाली अपने पति की हत्यारिन होती है, गड्ढेदार आँखों वाली दुष्ट होती है, और हाथी जैसी आँखों वाली सुन्दर नहीं मानी जाती।

श्लोक 102 (skanda.4.37.102)

पुंश्चली वामकाणाक्षी वंध्या दक्षिणकाणिका॥ मधुपिंगाक्षी रमणी धनधान्यसमृद्धिभाक्

puṁścalī vāmakāṇākṣī vaṁdhyā dakṣiṇakāṇikā madhupiṁgākṣī ramaṇī dhanadhānyasamṛddhibhāk

बाईं आँख से काणी स्त्री कुलटा होती है, दाहिनी आँख से काणी बाँझ होती है, और मधु के समान भूरी आँखों वाली सुन्दरी धन-धान्य की समृद्धि पाती है।

श्लोक 103 (skanda.4.37.103)

पक्ष्मभिः सुघनैः स्निग्धैः कृष्णैः सूक्ष्मैः सुभाग्यभाक्॥ कपिलैर्विरलैः स्थूलैर्निंद्या भवति भामिनी

pakṣmabhiḥ sughanaiḥ snigdhaiḥ kṛṣṇaiḥ sūkṣmaiḥ subhāgyabhāk kapilairviralaiḥ sthūlairniṁdyā bhavati bhāminī

घनी, चिकनी, काली और महीन पलकों से स्त्री सुभाग्य पाती है; किन्तु भूरी, विरल और मोटी पलकों वाली स्त्री निन्दा की पात्र बनती है।

श्लोक 104 (skanda.4.37.104)

भ्रुवौ सुवर्तुले तन्व्याः स्निग्धे कृष्णे असंहते॥ प्रशस्ते मृदुरोमाणौ सुभ्रुवः कार्मुकाकृती

bhruvau suvartule tanvyāḥ snigdhe kṛṣṇe asaṁhate praśaste mṛduromāṇau subhruvaḥ kārmukākṛtī

सुन्दर भौंहों वाली सुकुमारी स्त्री की भौंहें यदि सुडौल, चिकनी, काली, परस्पर न मिली हुई और कोमल रोमों से युक्त होकर धनुष के समान आकार की हों, तो वे प्रशंसनीय हैं।

श्लोक 105 (skanda.4.37.105)

खररोमा च पृथुला विकीर्णा सरला स्त्रियाः॥ न भ्रूः प्रशस्ता मिलिता दीर्घरोमा च पिंगला

khararomā ca pṛthulā vikīrṇā saralā striyāḥ na bhrūḥ praśastā militā dīrgharomā ca piṁgalā

स्त्री की भौंहें यदि कठोर रोमों वाली, अत्यन्त चौड़ी, बिखरी हुई अथवा एकदम सीधी हों, तो वे प्रशंसनीय नहीं हैं; और जो भौंहें आपस में मिली हुई, लम्बे रोमों वाली अथवा भूरी हों, वे भी शुभ नहीं मानी जातीं।

श्लोक 106 (skanda.4.37.106)

लंबौ कर्णौ शुभावर्तौ सुखदौ च शुभप्रदौ॥ शष्कुलीरहितौ निंद्यौ शिरालौ कुटिलौ कृशौ

laṁbau karṇau śubhāvartau sukhadau ca śubhapradau śaṣkulīrahitau niṁdyau śirālau kuṭilau kṛśau

लटकते हुए, शुभ भँवर वाले दोनों कान सुख और शुभ फल देने वाले होते हैं; किन्तु कर्णपाली से रहित, नसों से युक्त, टेढ़े अथवा पतले कान निन्दनीय हैं।

श्लोक 107 (skanda.4.37.107)

भालः शिराविरहितो निर्लोमार्धेंदु सन्निभः॥ अनिम्नस्त्र्यंगुलो नार्याः सौभाग्यारोग्यकारणम्

bhālaḥ śirāvirahito nirlomārdheṁdu sannibhaḥ animnastryaṁgulo nāryāḥ saubhāgyārogyakāraṇam

जो ललाट नसों से रहित, रोमरहित, अर्धचन्द्र के समान, गड्ढेरहित और तीन अँगुल परिमाण का हो, वह स्त्री के सौभाग्य और आरोग्य का कारण बनता है।

श्लोक 108 (skanda.4.37.108)

व्यक्त स्वस्तिकरेखं च ललाटं राज्यसंपदे॥ प्रलंबं मस्तकं यस्या देवरं हन्ति सा ध्रुवम्

vyakta svastikarekhaṁ ca lalāṭaṁ rājyasaṁpade pralaṁbaṁ mastakaṁ yasyā devaraṁ hanti sā dhruvam

ललाट पर स्पष्ट स्वस्तिक-रेखा राजसी सम्पदा देती है; किन्तु जिसका मस्तक अत्यन्त लम्बा हो, वह निश्चय ही अपने देवर के लिए मृत्युकारक होती है।

श्लोक 109 (skanda.4.37.109)

रोमशेन शिरालेन प्रांशुना रोगिणी मता॥ सीमन्तः सरलः शस्तो मौलिः शस्तः समुन्नतः॥ गजकुंभनिभावृत्तैः सौभाग्यैश्वर्यसूचकैः

romaśena śirālena prāṁśunā rogiṇī matā sīmantaḥ saralaḥ śasto mauliḥ śastaḥ samunnataḥ gajakuṁbhanibhāvṛttaiḥ saubhāgyaiśvaryasūcakaiḥ

अत्यन्त रोमश, नसों से युक्त और ऊँचे ललाट वाली स्त्री रोगिणी मानी जाती है। सीधी माँग प्रशंसनीय है, और हाथी के मस्तक-कुम्भ के समान गोल तथा समान रूप से उभरा हुआ मस्तक-शिखर सौभाग्य और ऐश्वर्य का सूचक कहा गया है।

श्लोक 110 (skanda.4.37.110)

स्थूलमूर्धा च विधवा दीर्घशीर्षा च बंधकी॥ विशालेनापि शिरसा भवेद्दौर्भाग्यभाजनम्

sthūlamūrdhā ca vidhavā dīrghaśīrṣā ca baṁdhakī viśālenāpi śirasā bhaveddaurbhāgyabhājanam

मोटे सिर के शिखर वाली स्त्री विधवा होती है, लम्बे सिर वाली वेश्या बनती है, और अत्यन्त विशाल सिर वाली भी दुर्भाग्य की पात्र बनती है।

श्लोक 111 (skanda.4.37.111)

केशा अलिकुलच्छायाः सूक्ष्माः स्निग्धाः सुकोमलाः॥ किंचिदाकुंचिताग्राश्च कुटिलाश्चातिशोभनाः

keśā alikulacchāyāḥ sūkṣmāḥ snigdhāḥ sukomalāḥ kiṁcidākuṁcitāgrāśca kuṭilāścātiśobhanāḥ

भ्रमर-समूह के समान काली आभा वाले, महीन, चिकने, अत्यन्त कोमल, सिरों पर कुछ घुँघराले और लहरदार केश अत्यन्त शोभा देने वाले होते हैं।

श्लोक 112 (skanda.4.37.112)

परुषाः स्फुटिताग्राश्च विरलाश्च शिरोरुहाः॥ पिंगला लघवो रूक्षा दुःखदारिद्र्यबंधदाः

paruṣāḥ sphuṭitāgrāśca viralāśca śiroruhāḥ piṁgalā laghavo rūkṣā duḥkhadāridryabaṁdhadāḥ

कठोर, दोमुँहे, विरल, भूरे, पतले अथवा रूखे केश दुःख, दरिद्रता और बन्धन लाने वाले होते हैं।

श्लोक 113 (skanda.4.37.113)

भ्रुवोरन्तर्ललाटे वा मशको राज्यसूचकः॥ वामे कपोले मशकः शोणो मिष्टान्नदः स्त्रियाः

bhruvorantarlalāṭe vā maśako rājyasūcakaḥ vāme kapole maśakaḥ śoṇo miṣṭānnadaḥ striyāḥ

भौंहों के बीच अथवा ललाट पर तिल राज्य-प्राप्ति का सूचक है; और बाएँ गाल पर लाल तिल स्त्री को स्वादिष्ट भोजन की प्रचुरता देता है।

श्लोक 114 (skanda.4.37.114)

तिलकं लांछनं वापि हृदि सौभाग्यकारणम्॥ यस्या दक्षिणवक्षोजे शोणे तिलकलांछने

tilakaṁ lāṁchanaṁ vāpi hṛdi saubhāgyakāraṇam yasyā dakṣiṇavakṣoje śoṇe tilakalāṁchane

हृदय-स्थल पर तिल अथवा जन्मचिह्न सौभाग्य का कारण है। जिस स्त्री के दाहिने स्तन पर लाल तिल अथवा जन्मचिह्न हो...

श्लोक 115 (skanda.4.37.115)

कन्या चतुष्टयं सूते सूते सा च सुतत्रयम्॥ तिलकं लांछनं शोणं यस्या वामे कुचे भवेत्

kanyā catuṣṭayaṁ sūte sūte sā ca sutatrayam tilakaṁ lāṁchanaṁ śoṇaṁ yasyā vāme kuce bhavet

...वह पहले चार कन्याओं को जन्म देती है और उसके पश्चात् तीन पुत्रों को। जिसके बाएँ स्तन पर लाल तिल अथवा जन्मचिह्न हो...

श्लोक 116 (skanda.4.37.116)

एकं पुत्रं प्रसूयादौ ततः सा विधवा भवेत्॥ गुह्यस्य दक्षिणे भागे तिलकं यदि योषितः

ekaṁ putraṁ prasūyādau tataḥ sā vidhavā bhavet guhyasya dakṣiṇe bhāge tilakaṁ yadi yoṣitaḥ

...वह पहले एक पुत्र को जन्म देती है और उसके बाद विधवा हो जाती है। यदि किसी स्त्री के गुह्यांग के दाहिने भाग में तिल हो...

श्लोक 117 (skanda.4.37.117)

तदा क्षितिपतेः पत्नी सूते वा क्षितिपं सुतम्॥ नासाग्रे मशकः शोणो महिष्या एव जायते

tadā kṣitipateḥ patnī sūte vā kṣitipaṁ sutam nāsāgre maśakaḥ śoṇo mahiṣyā eva jāyate

...तो वह राजा की पत्नी बनती है अथवा राजा बनने वाले पुत्र को जन्म देती है। नाक की नोक पर लाल तिल केवल महारानी में ही पाया जाता है।

श्लोक 118 (skanda.4.37.118)

कृष्णः स एव भर्तृघ्न्याः पुंश्चल्याश्च प्रकीर्तितः॥ नाभेरधस्तात्तिलकं मशको लांछनं शुभम्॥ मशकस्तिलकं चिह्नं गुल्फदेशे दरिद्रकृत॥ करे कर्णे कपोले वा कण्ठे वामे भवेद्यदि

kṛṣṇaḥ sa eva bhartṛghnyāḥ puṁścalyāśca prakīrtitaḥ nābheradhastāttilakaṁ maśako lāṁchanaṁ śubham maśakastilakaṁ cihnaṁ gulphadeśe daridrakṛta kare karṇe kapole vā kaṇṭhe vāme bhavedyadi

किन्तु वही तिल यदि काला हो, तो वह पति-हत्यारिन और कुलटा स्त्री का चिह्न कहा गया है। नाभि के नीचे तिल अथवा जन्मचिह्न शुभ है, किन्तु टखने पर तिल अथवा चिह्न दरिद्रता देता है। यदि यह चिह्न बाएँ हाथ, कान, गाल अथवा कण्ठ पर हो...

श्लोक 119 (skanda.4.37.119)

एषां त्रयाणामेकं तु प्राग्गर्भे पुत्रदं भवेत्॥ भालगेन त्रिशूलेन निर्मितेन स्वयंभुवा

eṣāṁ trayāṇāmekaṁ tu prāggarbhe putradaṁ bhavet bhālagena triśūlena nirmitena svayaṁbhuvā

...तो इन तीनों में से कोई भी एक चिह्न पहली ही गर्भावस्था में पुत्र प्रदान करता है -- जैसा कि स्वयं ब्रह्मा द्वारा ललाट पर बनाए गए त्रिशूल-चिह्न से होता है।

श्लोक 120 (skanda.4.37.120)

नितंबिनी सहस्राणां स्वामित्वं योषिदाप्नुयात्॥ सुप्ता परस्परं यातु दंतान्किटिकिटायते

nitaṁbinī sahasrāṇāṁ svāmitvaṁ yoṣidāpnuyāt suptā parasparaṁ yātu daṁtānkiṭikiṭāyate

ऐसी स्त्री हज़ारों की स्वामिनी बनती है। किन्तु जो सोते समय दाँत किटकिटाती है...

श्लोक 121 (skanda.4.37.121)

सुलक्ष्मापि न सा शस्ता या किंचित्प्रलपेत्तथा॥ पाणौ प्रदक्षिणावर्तो धर्म्यो वामो न शोभनः

sulakṣmāpi na sā śastā yā kiṁcitpralapettathā pāṇau pradakṣiṇāvarto dharmyo vāmo na śobhanaḥ

...और जो नींद में कुछ बड़बड़ाती है, वह शुभ लक्षणों वाली होकर भी प्रशंसनीय नहीं है। हाथ में दाहिनी ओर घूमा हुआ भँवर धर्म्य माना जाता है, और बाईं ओर घूमा हुआ शोभा नहीं देता।

श्लोक 122 (skanda.4.37.122)

नाभौ श्रुतावुरसि वा दक्षिणावर्त ईडितः॥ सुखाय दक्षिणावर्तः पृष्ठवंशस्य दक्षिणे

nābhau śrutāvurasi vā dakṣiṇāvarta īḍitaḥ sukhāya dakṣiṇāvartaḥ pṛṣṭhavaṁśasya dakṣiṇe

नाभि पर, कान पर अथवा वक्षःस्थल पर दाहिनी ओर घूमा हुआ भँवर प्रशंसनीय माना गया है; और रीढ़ की हड्डी के दाहिने भाग पर दाहिनावर्त भँवर सुख देने वाला होता है।

श्लोक 123 (skanda.4.37.123)

अन्तःपृष्ठं नाभिसमो बह्वायुः पुत्रवर्धनः॥ राजपत्न्याः प्रदृश्येत भगमौलौ प्रदक्षिणः

antaḥpṛṣṭhaṁ nābhisamo bahvāyuḥ putravardhanaḥ rājapatnyāḥ pradṛśyeta bhagamaulau pradakṣiṇaḥ

पीठ के भीतरी भाग पर नाभि के समतल भँवर दीर्घायु और पुत्र-वृद्धि देने वाला है। गुह्यांग के ऊपरी भाग पर दाहिनावर्त भँवर केवल राजा की पत्नी में ही देखा जाता है।

श्लोक 124 (skanda.4.37.124)

सचेच्छकटभंगःस्याद्बह्वपत्यसुखप्रदः॥ कटिगो गुह्यवेधेन पत्यपत्यनिपातनः

sacecchakaṭabhaṁgaḥsyādbahvapatyasukhapradaḥ kaṭigo guhyavedhena patyapatyanipātanaḥ

यदि यही भँवर टूटी हुई गाड़ी के आकार का हो, तो वह अनेक सन्तानों का सुख देता है; किन्तु कमर पर स्थित भँवर यदि गुह्यांग की ओर छेदता हुआ प्रतीत हो, तो वह पति और सन्तान दोनों का पतन करता है।

श्लोक 125 (skanda.4.37.125)

स्यातामुदरवेधेन पृष्ठावर्तौ न शोभनौ॥ एकेन हंति भर्तारं भवेदन्येन पुं श्चली

syātāmudaravedhena pṛṣṭhāvartau na śobhanau ekena haṁti bhartāraṁ bhavedanyena puṁ ścalī

पीठ पर उदर की ओर छेदते हुए दो भँवर हों, तो वे शोभा नहीं देते -- एक से वह अपने पति का नाश करती है, और दूसरे से वह कुलटा बन जाती है।

श्लोक 126 (skanda.4.37.126)

कण्ठगो दक्षिणावर्तो दुःखवैधव्यहेतुकः॥ सीमन्तेथ ललाटे वा त्याज्यो दूरात्प्रयत्नतः

kaṇṭhago dakṣiṇāvarto duḥkhavaidhavyahetukaḥ sīmantetha lalāṭe vā tyājyo dūrātprayatnataḥ

कण्ठ पर स्थित दाहिनावर्त भँवर दुःख और वैधव्य का कारण बनता है; इसी प्रकार माँग अथवा ललाट पर होने पर भी उसे बड़े प्रयत्न से दूर से ही त्याग देना चाहिए।

श्लोक 127 (skanda.4.37.127)

सा पतिं हंति वर्षेण यस्या मध्ये कृकाटिकम्॥ प्रदक्षिणो वा वामो वा रोम्णामावर्त्तकः स्त्रियाः॥ एको वा मूर्धनि द्वौ वा वामे वामगती यदि॥ आदशाहं पतिघ्नौ तौ त्याज्यौ दूरात्सुबुद्धिना

sā patiṁ haṁti varṣeṇa yasyā madhye kṛkāṭikam pradakṣiṇo vā vāmo vā romṇāmāvarttakaḥ striyāḥ eko vā mūrdhani dvau vā vāme vāmagatī yadi ādaśāhaṁ patighnau tau tyājyau dūrātsubuddhinā

जिसकी गर्दन के ठीक बीच में भँवर हो, वह एक वर्ष के भीतर अपने पति का नाश कर देती है। स्त्री के केशों का भँवर चाहे दाहिनी ओर हो या बाईं ओर -- यदि सिर पर एक भँवर हो अथवा दो भँवर बाईं ओर झुके हुए हों और दस दिनों तक ऐसे ही बने रहें, तो वे दोनों पति-घातक माने जाते हैं; बुद्धिमान् पुरुष उन्हें दूर से ही त्याग दे।

श्लोक 128 (skanda.4.37.128)

कट्यावर्ता च कुलटा नाभ्यावर्ता पतिव्रता॥ पृष्ठावर्ता च भर्तृघ्नी कुलटा वाथ जायते

kaṭyāvartā ca kulaṭā nābhyāvartā pativratā pṛṣṭhāvartā ca bhartṛghnī kulaṭā vātha jāyate

कमर पर भँवर होने से स्त्री कुलटा बनती है, नाभि पर भँवर होने से वह पतिव्रता बनती है, और पीठ पर भँवर होने से वह या तो पति-घातिनी बनती है या कुलटा बनती है।

श्लोक 129 (skanda.4.37.129)

स्कंद उवाच॥ सुलक्षणापि दुःशीला कुलक्षण शिरोमणिः॥ अलक्षणापि सा साध्वी सर्वलक्षणभूस्तु सा

skaṁda uvāca sulakṣaṇāpi duḥśīlā kulakṣaṇa śiromaṇiḥ alakṣaṇāpi sā sādhvī sarvalakṣaṇabhūstu sā

स्कन्द ने कहा -- शुभ लक्षणों से युक्त होकर भी यदि स्त्री दुराचारिणी हो, तो वह समस्त कुलक्षणों का शिखर ही है; और यदि लक्षणरहित होकर भी वह सती-साध्वी हो, तो वही सम्पूर्ण शुभ लक्षणों की भूमि है।

श्लोक 130 (skanda.4.37.130)

सुलक्षणा सुचारित्रा स्वाधीना पतिदेवता॥ विश्वेशानुग्रहादेव गृहे योषिदवाप्यते

sulakṣaṇā sucāritrā svādhīnā patidevatā viśveśānugrahādeva gṛhe yoṣidavāpyate

शुभ लक्षणों वाली, सच्चरित्र, आत्मसंयमी और पति को ही देवता मानने वाली स्त्री केवल विश्वेश्वर की कृपा से ही घर में प्राप्त होती है।

श्लोक 131 (skanda.4.37.131)

अलकृताः स्ववासिन्यो याभिः प्राक्तनजन्मनि॥ नानाविधैरलंकारैस्ताः सुरूपा भवंति हि

alakṛtāḥ svavāsinyo yābhiḥ prāktanajanmani nānāvidhairalaṁkāraistāḥ surūpā bhavaṁti hi

जिन स्त्रियों ने पूर्वजन्म में अपनी कुलदेवियों को नाना प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित किया हो, वे इस जन्म में सुन्दर रूप को प्राप्त करती हैं।

श्लोक 132 (skanda.4.37.132)

सुतीर्थेषु वपुर्याभिः क्षयितं वा विहायितम्॥ ता लावण्यतरंगिण्यो भवंतीह सुलक्षणाः

sutīrtheṣu vapuryābhiḥ kṣayitaṁ vā vihāyitam tā lāvaṇyataraṁgiṇyo bhavaṁtīha sulakṣaṇāḥ

जिन स्त्रियों ने पवित्र तीर्थों में अपने शरीर को तप से क्षीण किया अथवा त्याग ही दिया, वे इस जन्म में लावण्य की लहरों से युक्त, शुभ लक्षणों वाली बनती हैं।

श्लोक 133 (skanda.4.37.133)

अर्चिता जगतां माता याभिर्मृडवधूरिव॥ ता भवंति सुचारित्रा योषाः स्वाधीनभ र्तृकाः

arcitā jagatāṁ mātā yābhirmṛḍavadhūriva tā bhavaṁti sucāritrā yoṣāḥ svādhīnabha rtṛkāḥ

जिन स्त्रियों ने जगज्जननी की आराधना उन्हें साक्षात् शिव-वधू के रूप में मानकर की, वे सच्चरित्र स्त्रियाँ बनती हैं, जिनके पति सदा उनके अनुकूल रहते हैं।

श्लोक 134 (skanda.4.37.134)

स्वाधीन पतिकानां च सुशीलानां मृगीदृशाम्॥ स्वर्गापवर्गावत्रैव सुलक्षण फलं हि तत्

svādhīna patikānāṁ ca suśīlānāṁ mṛgīdṛśām svargāpavargāvatraiva sulakṣaṇa phalaṁ hi tat

जिन मृगनयनी स्त्रियों के पति उनके प्रति सदा अनुकूल रहते हैं और जो स्वयं सुशीला हैं, उनके लिए स्वर्ग और मोक्ष दोनों यहीं प्राप्त हो जाते हैं -- यही शुभ लक्षणों का सच्चा फल है।

श्लोक 135 (skanda.4.37.135)

सुलक्षणैः सुचरितैरपि मंदायुषं पतिम्॥ दीर्घायुषं प्रकुर्वंति प्रमदाः प्रमदास्पदम्

sulakṣaṇaiḥ sucaritairapi maṁdāyuṣaṁ patim dīrghāyuṣaṁ prakurvaṁti pramadāḥ pramadāspadam

अपने शुभ लक्षणों और सच्चरित्रता से युक्त होकर स्त्रियाँ -- जो स्वयं आनन्द का धाम हैं -- अल्पायु पति को भी दीर्घायु बना देती हैं।

श्लोक 136 (skanda.4.37.136)

अतः सुलक्षणा योषा परिणेया विचक्षणैः॥ लक्षणानि परीक्ष्यादौ हित्वा दुर्लक्षणान्यपि॥ लक्षणानि मयोक्तानि सुखाय गृहमेधिनाम्॥ विवाहानपि वक्ष्यामि तन्निबोध घटोद्भव

ataḥ sulakṣaṇā yoṣā pariṇeyā vicakṣaṇaiḥ lakṣaṇāni parīkṣyādau hitvā durlakṣaṇānyapi lakṣaṇāni mayoktāni sukhāya gṛhamedhinām vivāhānapi vakṣyāmi tannibodha ghaṭodbhava

अतः विवेकी पुरुषों को चाहिए कि पहले लक्षणों की भली-भाँति परीक्षा करके, अशुभ लक्षणों वाली कन्याओं को छोड़कर, शुभ लक्षणों वाली कन्या से ही विवाह करें। मैंने ये लक्षण गृहस्थों के सुख के लिए कहे हैं। अब मैं विवाह-विधि का भी वर्णन करूँगा -- हे घटोद्भव, उसे सुनो।

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