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काशी खण्ड · अध्याय 46

लोलार्क-वर्णन

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (skanda.4.46.1)

॥ स्कंद उवाच॥ गतेथ योगिनीवृंदे देवदेवो घटोद्भव॥ काशीप्रवृत्तिं जिज्ञासुः प्राहिणोदंशुमालिनम्

skaṁda uvāca gatetha yoginīvṛṁde devadevo ghaṭodbhava kāśīpravṛttiṁ jijñāsuḥ prāhiṇodaṁśumālinam

स्कंद ने कहा — हे घटोद्भव! योगिनी-समूह के चले जाने पर, काशी की स्थिति जानने की इच्छा से देवदेव ने सूर्यदेव को भेजा।

श्लोक 2 (skanda.4.46.2)

देवदेव उवाच॥ सप्ताश्व त्वरितो याहि पुरीं वाराणसीं शुभाम्॥ यत्रास्ति स दिवोदासो धर्ममूर्तिर्महीपतिः

devadeva uvāca saptāśva tvarito yāhi purīṁ vārāṇasīṁ śubhām yatrāsti sa divodāso dharmamūrtirmahīpatiḥ

देवदेव ने कहा — हे सप्ताश्व! तुम शीघ्र ही उस शुभ वाराणसी नगरी को जाओ, जहाँ धर्ममूर्ति राजा दिवोदास निवास करते हैं।

श्लोक 3 (skanda.4.46.3)

तस्य धर्मविरोधेन यथातत्क्षेत्रमुद्वसेत्॥ तथा कुरुष्व भो क्षिप्रं मावमंस्थाश्च तं नृपम्

tasya dharmavirodhena yathātatkṣetramudvaset tathā kuruṣva bho kṣipraṁ māvamaṁsthāśca taṁ nṛpam

ऐसा शीघ्र करो कि वह धर्म के विरुद्ध आचरण के कारण उस क्षेत्र को त्याग दे; परंतु हे मित्र! उस राजा का अनादर मत करना।

श्लोक 4 (skanda.4.46.4)

धर्ममार्ग प्रवृत्तस्य क्रियते यावमानना॥ सा भवेदात्मनो नूनं महदेनश्च जायते

dharmamārga pravṛttasya kriyate yāvamānanā sā bhavedātmano nūnaṁ mahadenaśca jāyate

धर्म-मार्ग में प्रवृत्त पुरुष का जो अनादर किया जाता है, वह निश्चय ही स्वयं के लिए ही होता है और उससे महान् पाप उत्पन्न होता है।

श्लोक 5 (skanda.4.46.5)

तवबुद्धिविकासेन च्यवते चेत्स धर्मतः॥ तदा सा नगरी भानो त्वयोद्वास्याऽसहैः करैः

tavabuddhivikāsena cyavate cetsa dharmataḥ tadā sā nagarī bhāno tvayodvāsyā'sahaiḥ karaiḥ

हे भानो! यदि तुम्हारी बुद्धि-कुशलता से वह धर्म से च्युत हो जाए, तो तुम अपनी असह्य किरणों से उस नगरी को निर्वासित करा देना।

श्लोक 6 (skanda.4.46.6)

कामक्रोधौ लोभमोहौ मत्सराहंकृती अपि॥ ते तत्र न भवेतां यत्तत्कालोपि न तं जयेत्

kāmakrodhau lobhamohau matsarāhaṁkṛtī api te tatra na bhavetāṁ yattatkālopi na taṁ jayet

जहाँ काम-क्रोध, लोभ-मोह और मात्सर्य-अहंकार नहीं होते, वहाँ काल भी उस पुरुष को जीत नहीं पाता।

श्लोक 7 (skanda.4.46.7)

यावद्धर्मे स्थिराबुद्धिर्यावद्धर्मेस्थिरं मनः॥ तावद्विघ्नोदयः क्वास्ति विपद्यपि रवे नृषु

yāvaddharme sthirābuddhiryāvaddharmesthiraṁ manaḥ tāvadvighnodayaḥ kvāsti vipadyapi rave nṛṣu

हे रवे! जब तक मनुष्य की बुद्धि धर्म में स्थिर रहती है, जब तक उसका मन धर्म में स्थिर रहता है, तब तक विपत्ति में भी उसके लिए विघ्न कहाँ से उत्पन्न हो सकता है?

श्लोक 8 (skanda.4.46.8)

सर्वेषामिह जंतूनां त्वं वेत्सि ब्रध्नचेष्टितम्॥ अतएव जगच्चक्षुर्व्रज त्वं कार्यसिद्धये

sarveṣāmiha jaṁtūnāṁ tvaṁ vetsi bradhnaceṣṭitam ataeva jagaccakṣurvraja tvaṁ kāryasiddhaye

तुम ही समस्त प्राणियों की चेष्टाओं को जानते हो, अतः हे जगच्चक्षु! कार्यसिद्धि के लिए तुम प्रस्थान करो।

श्लोक 9 (skanda.4.46.9)

रविरादाय देवाज्ञां मूर्तिमन्यां प्रकल्प्य च॥ नभोध्वगामहोरात्रं काशीमभिमुखोऽभवत्

ravirādāya devājñāṁ mūrtimanyāṁ prakalpya ca nabhodhvagāmahorātraṁ kāśīmabhimukho'bhavat

सूर्य ने देव की आज्ञा प्राप्त कर एक अन्य मूर्ति धारण की और दिन-रात आकाश-मार्ग से यात्रा करते हुए काशी की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 10 (skanda.4.46.10)

मनसातीवलोलोऽभूत्काशीदर्शनलालसः॥ सहस्रचरणोप्यैच्छत्तदा खे नैकपादताम्॥ हंसत्वं तस्य सूर्यस्य तदा सफलतामगात्॥ सदा नभोध्वनीनस्य काशीं प्रति यियासतः

manasātīvalolo'bhūtkāśīdarśanalālasaḥ sahasracaraṇopyaicchattadā khe naikapādatām haṁsatvaṁ tasya sūryasya tadā saphalatāmagāt sadā nabhodhvanīnasya kāśīṁ prati yiyāsataḥ

काशी-दर्शन की लालसा से उनका मन अत्यंत चंचल हो उठा; सहस्र-किरण होते हुए भी वे आकाश में मानो अनेक चरणों की कामना करने लगे। सदा आकाश-मार्ग में गमन करने वाले तथा काशी की ओर उत्सुक उस सूर्य का वेग तभी सार्थक हुआ।

श्लोक 11 (skanda.4.46.11)

अथ काशीं समासाद्य रविरंतर्बहिश्चरन्॥ मनागपि न तद्भूपे धर्मध्वस्तिमवेक्षत

atha kāśīṁ samāsādya raviraṁtarbahiścaran manāgapi na tadbhūpe dharmadhvastimavekṣata

काशी पहुँचकर सूर्य ने भीतर-बाहर सर्वत्र विचरण करते हुए भी उस राजा में धर्म के ध्वंस का किंचिन्मात्र भी लक्षण नहीं देखा।

श्लोक 12 (skanda.4.46.12)

विभावसुर्वसन्काश्यां नानारूपेण वत्सरम्॥ क्वचिन्नावसरं प्राप तत्र राज्ञि सुधर्मिणि

vibhāvasurvasankāśyāṁ nānārūpeṇa vatsaram kvacinnāvasaraṁ prāpa tatra rājñi sudharmiṇi

विभावसु (सूर्य) एक वर्ष तक काशी में अनेक रूप धारण कर रहते हुए भी, उस सुधर्मी राजा के विषय में कहीं भी कोई अवसर नहीं पा सके।

श्लोक 13 (skanda.4.46.13)

कदाचिदतिथिर्भूतो दुर्लभं प्रार्थयन्रविः॥ न तस्य राज्ञो विषये दुर्लभं किंचिदैक्षत

kadācidatithirbhūto durlabhaṁ prārthayanraviḥ na tasya rājño viṣaye durlabhaṁ kiṁcidaikṣata

कभी अतिथि बनकर दुर्लभ वस्तु माँगते हुए भी सूर्य ने उस राजा के राज्य में कोई दुर्लभ वस्तु नहीं पाई।

श्लोक 14 (skanda.4.46.14)

कदाचिद्याचको जातो बहुदोपि कदाप्यभूत्॥ कदाचिद्दीनतां प्राप्तः कदाचिद्गणकोप्यभूत्

kadācidyācako jāto bahudopi kadāpyabhūt kadāciddīnatāṁ prāptaḥ kadācidgaṇakopyabhūt

कभी वे याचक बने, कभी बहुत दानी बने; कभी दीनता को प्राप्त हुए, तो कभी गणक (ज्योतिषी) बने।

श्लोक 15 (skanda.4.46.15)

वेदबाह्यां क्रियां चापि कदाचित्प्रत्यपादयत्॥ कदाचित्स्थापयामास दृष्टप्रत्ययमैहिकम्

vedabāhyāṁ kriyāṁ cāpi kadācitpratyapādayat kadācitsthāpayāmāsa dṛṣṭapratyayamaihikam

कभी उन्होंने वेदबाह्य क्रियाओं का प्रतिपादन किया, तो कभी केवल प्रत्यक्ष-प्रमाण पर आधारित ऐहिक मत की स्थापना की।

श्लोक 16 (skanda.4.46.16)

कदाचिज्जटिलो जातः कदाचिच्च दिगंबरः॥ स कदाचिज्जांगुलिको विषविद्याविशारदः

kadācijjaṭilo jātaḥ kadācicca digaṁbaraḥ sa kadācijjāṁguliko viṣavidyāviśāradaḥ

कभी वे जटाधारी तापस बने, कभी दिगंबर बने; कभी विषविद्या में निपुण जांगुलिक (सर्पविष-चिकित्सक) बने।

श्लोक 17 (skanda.4.46.17)

सर्वपाषंडधर्मज्ञः कदाचिद्ब्रह्मवाद्यभूत्॥ ऐंद्रजालिक आसीच्च कदाचिद्भ्रामयञ्जनान्

sarvapāṣaṁḍadharmajñaḥ kadācidbrahmavādyabhūt aiṁdrajālika āsīcca kadācidbhrāmayañjanān

सभी पाखंड-धर्मों का ज्ञाता होकर वे कभी ब्रह्मवादी बने, तो कभी लोगों को भ्रमित करने वाले ऐंद्रजालिक (जादूगर) बने।

श्लोक 18 (skanda.4.46.18)

नानाव्रतोपदेशैश्च कदाचित्स पतिव्रताः॥ क्षोभयामास बहुशः सदृष्टांत कथानकैः

nānāvratopadeśaiśca kadācitsa pativratāḥ kṣobhayāmāsa bahuśaḥ sadṛṣṭāṁta kathānakaiḥ

कभी उन्होंने विभिन्न व्रतों के उपदेश देकर तथा दृष्टांत-सहित कथाओं द्वारा पतिव्रता स्त्रियों को बारंबार क्षुब्ध करने का प्रयत्न किया।

श्लोक 19 (skanda.4.46.19)

कापालिक व्रतधरः कदाचिच्चाभवद्द्विजः॥ कदाचिदपि विज्ञानी धातुवादी कदाचन॥ क्वचिद्विप्रः क्वचिद्राजपुत्रो वैश्योंत्यजः क्वचित॥ ब्रह्मचारी क्वचिदभूद्गृही वनचरः क्वचित्

kāpālika vratadharaḥ kadāciccābhavaddvijaḥ kadācidapi vijñānī dhātuvādī kadācana kvacidvipraḥ kvacidrājaputro vaiśyoṁtyajaḥ kvacita brahmacārī kvacidabhūdgṛhī vanacaraḥ kvacit

कभी कापालिक-व्रतधारी, कभी द्विज बने; कभी विज्ञानी, तो कभी धातुवादी बने; कभी विप्र, कभी राजपुत्र, कभी वैश्य, तो कभी अंत्यज बने; कभी ब्रह्मचारी, कभी गृहस्थ, तो कभी वनवासी बने —

श्लोक 20 (skanda.4.46.20)

यतिः कदाचिदिति सरूपैरभ्रामयज्जनान्॥ सर्वविद्यासु कुशलः सर्वज्ञश्चाभवत्क्वचित्

yatiḥ kadāciditi sarūpairabhrāmayajjanān sarvavidyāsu kuśalaḥ sarvajñaścābhavatkvacit

तथा कभी संन्यासी बनकर, इन विभिन्न रूपों में उन्होंने लोगों को भ्रमित करने का प्रयत्न किया; सभी विद्याओं में कुशल होकर वे कहीं सर्वज्ञ भी बने।

श्लोक 21 (skanda.4.46.21)

इति नानाविधै रूपैश्चरन्काश्यां ग्रहेश्वरः॥ न कदापि जने क्वापि च्छिद्रं प्राप कदाचन

iti nānāvidhai rūpaiścarankāśyāṁ graheśvaraḥ na kadāpi jane kvāpi cchidraṁ prāpa kadācana

इस प्रकार अनेक प्रकार के रूपों में काशी में विचरण करते हुए भी वह ग्रहेश्वर (सूर्य) कभी भी किसी जन में कोई छिद्र नहीं पा सका।

श्लोक 22 (skanda.4.46.22)

ततो निनिंद चात्मानं चिंतार्तः कश्यपात्मजः॥ धिक्परप्रेष्यतां यस्यां यशो लभ्येत न क्वचित्

tato niniṁda cātmānaṁ ciṁtārtaḥ kaśyapātmajaḥ dhikparapreṣyatāṁ yasyāṁ yaśo labhyeta na kvacit

तब चिंता से व्याकुल कश्यपपुत्र सूर्य ने स्वयं की निंदा करते हुए कहा — 'धिक्कार है इस परसेवा को, जिसमें कहीं भी यश प्राप्त नहीं होता!'

श्लोक 23 (skanda.4.46.23)

॥ मार्तंड उवाच॥ मंदरं यदि याम्यद्य सद्यस्तत्क्रुद्ध्यतीश्वरः॥ अनिष्पादितकार्यार्थे मयि सामान्यभृत्यवत्

mārtaṁḍa uvāca maṁdaraṁ yadi yāmyadya sadyastatkruddhyatīśvaraḥ aniṣpāditakāryārthe mayi sāmānyabhṛtyavat

मार्तंड ने कहा — यदि मैं आज मंदराचल जाऊँ, तो कार्य सिद्ध न होने के कारण ईश्वर सामान्य सेवक की भाँति मुझ पर तत्काल क्रुद्ध हो जाएँगे।

श्लोक 24 (skanda.4.46.24)

कोपमप्युररीकृत्य यदि यायां कथंचन॥ कथं तिष्ठे पुरस्तस्य तर्हि वै मूढभृत्यवत्

kopamapyurarīkṛtya yadi yāyāṁ kathaṁcana kathaṁ tiṣṭhe purastasya tarhi vai mūḍhabhṛtyavat

और यदि मैं किसी प्रकार उनके कोप को स्वीकार कर भी जाऊँ, तो मूर्ख सेवक की भाँति मैं उनके समक्ष कैसे खड़ा हो सकूँगा?

श्लोक 25 (skanda.4.46.25)

अथोंकृत्यावहेलं वा यामि चेच्च कथंचन॥ क्रोधान्निरीक्षेत्त्र्यक्षो मां विषं पेयं तदा मया

athoṁkṛtyāvahelaṁ vā yāmi cecca kathaṁcana krodhānnirīkṣettryakṣo māṁ viṣaṁ peyaṁ tadā mayā

अथवा यदि मैं उनकी अवहेलना कर किसी प्रकार जाऊँ, और त्र्यक्ष (शिव) क्रोध से मुझे देखें, तो मुझे विष ही पीना पड़ेगा।

श्लोक 26 (skanda.4.46.26)

हरकोपानले नूनं यदि यातः पतंगताम्॥ पितामहोपि मां त्रातुं तदा शक्ष्यति नस्फुटम्

harakopānale nūnaṁ yadi yātaḥ pataṁgatām pitāmahopi māṁ trātuṁ tadā śakṣyati nasphuṭam

यदि हर के क्रोधाग्नि में मैं निश्चय ही पतंग-तुल्य हो जाऊँ, तो स्पष्ट है कि तब स्वयं पितामह भी मेरी रक्षा नहीं कर सकेंगे।

श्लोक 27 (skanda.4.46.27)

स्थास्याम्यत्रैव तन्नित्यं न त्यक्ष्यामि कदाचन॥ क्षेत्रसंन्यासविधिना वाराणस्यां कृताश्रमः

sthāsyāmyatraiva tannityaṁ na tyakṣyāmi kadācana kṣetrasaṁnyāsavidhinā vārāṇasyāṁ kṛtāśramaḥ

अतः मैं यहीं सदा के लिए रहूँगा, कभी नहीं जाऊँगा। क्षेत्र-संन्यास की विधि से वाराणसी में ही अपना आश्रम बनाकर —

श्लोक 28 (skanda.4.46.28)

पुरः पुरारेः कायार्थमनिवेद्येह तिष्ठतः॥ यत्पापं भावि मे तस्य काशीपापस्यनिष्कृतिः॥ अन्यान्यपि च पापानि महांत्यल्पानि यानि च॥ क्षयंति तानि सर्वाणि काशीं प्रविशतां सताम्

puraḥ purāreḥ kāyārthamanivedyeha tiṣṭhataḥ yatpāpaṁ bhāvi me tasya kāśīpāpasyaniṣkṛtiḥ anyānyapi ca pāpāni mahāṁtyalpāni yāni ca kṣayaṁti tāni sarvāṇi kāśīṁ praviśatāṁ satām

पुरारि के समक्ष अपने कार्य का निवेदन किए बिना यहाँ रहने से जो पाप मुझे लगेगा, उसका प्रायश्चित्त भी काशी ही है। इसके अतिरिक्त अन्य समस्त छोटे-बड़े पाप भी काशी में प्रवेश करने वाले सज्जनों के नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 29 (skanda.4.46.29)

बुद्धिपूर्वं मया चैतन्न पापं समुपार्जितम्॥ पुरारिणैव हि पुराऽऽशासि धर्मो हि रक्ष्यताम्

buddhipūrvaṁ mayā caitanna pāpaṁ samupārjitam purāriṇaiva hi purā''śāsi dharmo hi rakṣyatām

और यह पाप भी मैंने जान-बूझकर अर्जित नहीं किया है; क्योंकि स्वयं पुरारि ने ही पहले यह आदेश दिया था कि धर्म की रक्षा की जाए।

श्लोक 30 (skanda.4.46.30)

धर्मो हि रक्षितो येन देहे सत्वरगत्वरे॥ त्रैलोक्यरक्षितं तेन किं कामार्थैः सुरक्षितैः

dharmo hi rakṣito yena dehe satvaragatvare trailokyarakṣitaṁ tena kiṁ kāmārthaiḥ surakṣitaiḥ

जिसने इस क्षणभंगुर देह में रहते हुए भी धर्म की रक्षा की, उसने मानो त्रैलोक्य की ही रक्षा कर ली; फिर उसे सुरक्षित काम और अर्थ से भी क्या प्रयोजन?

श्लोक 31 (skanda.4.46.31)

रक्षणीयो यदि भवेत्कामः कामारिणा कथम्॥ क्षणादनंगतां नीतो बहूनां सुखकार्यपि

rakṣaṇīyo yadi bhavetkāmaḥ kāmāriṇā katham kṣaṇādanaṁgatāṁ nīto bahūnāṁ sukhakāryapi

यदि काम सचमुच रक्षणीय होता, तो कामारि (शिव) ने क्षणभर में ही उसे अनंग क्यों बना दिया होता, चाहे वह अनेकों के लिए सुखकारक ही क्यों न रहा हो?

श्लोक 32 (skanda.4.46.32)

अर्थश्चेत्सर्वथारक्ष्य इति कैश्चिदुदाहृतम्॥ तत्कथं न हरिश्चंद्रोऽरक्षत्कुशिकनंदने

arthaścetsarvathārakṣya iti kaiścidudāhṛtam tatkathaṁ na hariścaṁdro'rakṣatkuśikanaṁdane

और यदि कुछ लोग कहें कि अर्थ की रक्षा सर्वथा करनी चाहिए, तो फिर हरिश्चंद्र ने कुशिकनंदन (विश्वामित्र) के समक्ष अपने धन की रक्षा क्यों नहीं की?

श्लोक 33 (skanda.4.46.33)

धर्मस्तु रक्षितः सर्वैरपिदेहव्ययेन च॥ शिबिप्रभृतिभूपालैर्दधीचिप्रमुखैर्द्विजैः

dharmastu rakṣitaḥ sarvairapidehavyayena ca śibiprabhṛtibhūpālairdadhīcipramukhairdvijaiḥ

परंतु धर्म की रक्षा तो शिबि आदि राजाओं ने तथा दधीचि आदि द्विजों ने अपने शरीर का बलिदान देकर भी की है।

श्लोक 34 (skanda.4.46.34)

अयमेव हि वै धर्मः काशीसेवनसंभवः॥ रुषितादपि रुद्रान्मां रक्षिष्यति न संशयः

ayameva hi vai dharmaḥ kāśīsevanasaṁbhavaḥ ruṣitādapi rudrānmāṁ rakṣiṣyati na saṁśayaḥ

काशी-सेवा से उत्पन्न यही तो वह धर्म है, जो निःसंदेह क्रुद्ध रुद्र से भी मेरी रक्षा करेगा।

श्लोक 35 (skanda.4.46.35)

अवाप्य काशीं दुष्प्रापां को जहाति सचेतनः॥ रत्नं करस्थमुत्सृज्य कः काचं संजिघृक्षति

avāpya kāśīṁ duṣprāpāṁ ko jahāti sacetanaḥ ratnaṁ karasthamutsṛjya kaḥ kācaṁ saṁjighṛkṣati

दुष्प्राप्य काशी को पाकर भला कौन सचेतन प्राणी उसे त्याग सकता है? हाथ में रखे रत्न को छोड़कर कौन काँच ग्रहण करना चाहेगा?

श्लोक 36 (skanda.4.46.36)

वाराणसीं समुत्सृज्य यस्त्वन्यत्र यियासति॥ हत्वा निधानं पादेन सोर्थमिच्छति भिक्षया

vārāṇasīṁ samutsṛjya yastvanyatra yiyāsati hatvā nidhānaṁ pādena sorthamicchati bhikṣayā

जो वाराणसी को त्यागकर अन्यत्र जाना चाहता है, वह मानो अपने पैर से गड़े हुए धन को ठुकराकर भीख से धन पाने की इच्छा करता है।

श्लोक 37 (skanda.4.46.37)

पुत्रमित्रकलत्राणि क्षेत्राणि च धनानि च॥ प्रतिजन्मेह लभ्यंते काश्येका नैव लभ्यते॥ येन लब्धा पुरी काशी त्रैलोक्योद्धरणक्षमा॥ त्रैलोक्यैश्वर्यदुष्प्रापं तेन लब्धं महासुखम्

putramitrakalatrāṇi kṣetrāṇi ca dhanāni ca pratijanmeha labhyaṁte kāśyekā naiva labhyate yena labdhā purī kāśī trailokyoddharaṇakṣamā trailokyaiśvaryaduṣprāpaṁ tena labdhaṁ mahāsukham

पुत्र, मित्र, पत्नी, क्षेत्र और धन तो प्रत्येक जन्म में प्राप्त हो जाते हैं, परंतु काशी अकेली ऐसी नहीं है जो सहज में प्राप्त हो। जिसने त्रैलोक्य का उद्धार करने में समर्थ काशी नगरी को प्राप्त कर लिया, उसने त्रैलोक्य के ऐश्वर्य से भी दुष्प्राप्य वह महासुख प्राप्त कर लिया।

श्लोक 38 (skanda.4.46.38)

कुपितोपि हि मे रुद्रस्तेजोहानिं विधास्यति॥ काश्यां च लप्स्ये तत्तेजो यद्वै स्वात्मावबोधजम्

kupitopi hi me rudrastejohāniṁ vidhāsyati kāśyāṁ ca lapsye tattejo yadvai svātmāvabodhajam

यद्यपि रुद्र क्रुद्ध होकर मेरे तेज की हानि कर देंगे, तथापि मैं काशी में वह तेज प्राप्त कर लूँगा जो स्वयं आत्मबोध से उत्पन्न होता है।

श्लोक 39 (skanda.4.46.39)

इतराणीह तेजांसि भासंते तावदेव हि॥ खद्योताभानि यावन्नो जृंभते काशिजं महः

itarāṇīha tejāṁsi bhāsaṁte tāvadeva hi khadyotābhāni yāvanno jṛṁbhate kāśijaṁ mahaḥ

अन्य सभी तेज तो तभी तक चमकते हैं, जब तक काशी से उत्पन्न होने वाला वह महातेज प्रकट नहीं होता — अन्यथा वे खद्योत (जुगनू) के समान ही हैं।

श्लोक 40 (skanda.4.46.40)

इति काशीप्रभावज्ञो जगच्चक्षुस्तमोनुदः॥ कृत्वा द्वादशधात्मानं काशीपुर्यां व्यवस्थितः

iti kāśīprabhāvajño jagaccakṣustamonudaḥ kṛtvā dvādaśadhātmānaṁ kāśīpuryāṁ vyavasthitaḥ

इस प्रकार काशी के प्रभाव को जानकर तमोनाशक जगच्चक्षु (सूर्य) ने स्वयं को द्वादश रूपों में विभक्त कर काशीपुरी में स्थित हो गए।

श्लोक 41 (skanda.4.46.41)

लोलार्क उत्तरार्कश्च सांबादित्यस्तथैव च॥ चतुर्थो द्रुपदादित्यो मयूखादित्य एव च

lolārka uttarārkaśca sāṁbādityastathaiva ca caturtho drupadādityo mayūkhāditya eva ca

लोलार्क, उत्तरार्क तथा साम्बादित्य, चौथे द्रुपदादित्य और मयूखादित्य —

श्लोक 42 (skanda.4.46.42)

खखोल्कश्चारुणादित्यो वृद्धकेशवसंज्ञकौ॥ दशमो विमलादित्यो गंगादित्यस्तथैव च

khakholkaścāruṇādityo vṛddhakeśavasaṁjñakau daśamo vimalādityo gaṁgādityastathaiva ca

खखोल्क, अरुणादित्य, वृद्ध और केशव नामक दोनों, दसवें विमलादित्य तथा गंगादित्य —

श्लोक 43 (skanda.4.46.43)

द्वादशश्च यमादित्यः काशिपुर्यां घटोद्भव॥ तमोऽधिकेभ्यो दुष्टेभ्यः क्षेत्रं रक्षंत्यमी सदा

dvādaśaśca yamādityaḥ kāśipuryāṁ ghaṭodbhava tamo'dhikebhyo duṣṭebhyaḥ kṣetraṁ rakṣaṁtyamī sadā

और द्वादश यमादित्य — हे घटोद्भव! काशीपुरी में ये बारह आदित्य तमोग्रस्त दुष्ट जनों से इस क्षेत्र की सदा रक्षा करते हैं।

श्लोक 44 (skanda.4.46.44)

तस्यार्कस्य मनोलोलं यदासीत्काशिदर्शने॥ अतो लोलार्क इत्याख्या काश्यां जाता विवस्वतः

tasyārkasya manololaṁ yadāsītkāśidarśane ato lolārka ityākhyā kāśyāṁ jātā vivasvataḥ

चूँकि उस सूर्य का मन काशी-दर्शन के लिए अत्यंत लोल (चंचल) हो उठा था, इसीलिए काशी में विवस्वान् का नाम 'लोलार्क' पड़ा।

श्लोक 45 (skanda.4.46.45)

लोलार्कस्त्वसिसंभेदे दक्षिणस्यां दिशिस्थितः॥ योगक्षेमं सदा कुर्यात्काशीवासि जनस्य च

lolārkastvasisaṁbhede dakṣiṇasyāṁ diśisthitaḥ yogakṣemaṁ sadā kuryātkāśīvāsi janasya ca

लोलार्क असि-संगम पर, दक्षिण दिशा में स्थित होकर, काशीवासी जनों का सदा योगक्षेम करते हैं।

श्लोक 46 (skanda.4.46.46)

मार्गशीर्षस्य सप्तम्यां षष्ठ्यां वा रविवासरे॥ विधाय वार्षिकीं यात्रां नरः पापै प्रमुच्यते॥ कृतानि यानि पापानि नरैः संवत्सरावधि॥ नश्यंति क्षणतस्तानि षष्ठ्यर्के लोलदर्शनात्

mārgaśīrṣasya saptamyāṁ ṣaṣṭhyāṁ vā ravivāsare vidhāya vārṣikīṁ yātrāṁ naraḥ pāpai pramucyate kṛtāni yāni pāpāni naraiḥ saṁvatsarāvadhi naśyaṁti kṣaṇatastāni ṣaṣṭhyarke loladarśanāt

मार्गशीर्ष मास की सप्तमी अथवा षष्ठी को, रविवार के दिन वार्षिक यात्रा कर, मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। मनुष्यों द्वारा एक वर्ष तक किए गए समस्त पाप, षष्ठी को अर्क के लोलदर्शन से क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 47 (skanda.4.46.47)

नरः स्नात्वासिसंभेदे संतर्प्य पितृदेवताः॥ श्राद्धं विधाय विधिना पित्रानृण्यमवाप्नुयात्

naraḥ snātvāsisaṁbhede saṁtarpya pitṛdevatāḥ śrāddhaṁ vidhāya vidhinā pitrānṛṇyamavāpnuyāt

असि-संगम में स्नान कर, पितृ-देवताओं का तर्पण कर तथा विधिपूर्वक श्राद्ध कर मनुष्य पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 48 (skanda.4.46.48)

लोलार्कसंगमे स्नात्वा दानं होमं सुरार्चनम्॥ यत्किंचित्क्रियते कर्म तदानंत्याय कल्पते

lolārkasaṁgame snātvā dānaṁ homaṁ surārcanam yatkiṁcitkriyate karma tadānaṁtyāya kalpate

लोलार्क-संगम में स्नान कर दान, होम अथवा देवार्चन — जो भी कर्म किया जाता है, वह अनंत फल देने वाला बन जाता है।

श्लोक 49 (skanda.4.46.49)

सूर्योपरागे लोलार्के स्नानदानादिकाः क्रियाः॥ कुरुक्षेत्राद्दशगुणा भवंतीह न संशयः

sūryoparāge lolārke snānadānādikāḥ kriyāḥ kurukṣetrāddaśaguṇā bhavaṁtīha na saṁśayaḥ

सूर्यग्रहण के समय लोलार्क में स्नान, दान आदि क्रियाएँ कुरुक्षेत्र की अपेक्षा दस गुना अधिक फलदायी होती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 50 (skanda.4.46.50)

लोलार्के रथसप्तम्यां स्नात्वा गंगासिसंगमे॥ सप्तजन्मकृतैः पापैर्मुक्तो भवति तत्क्षणात्

lolārke rathasaptamyāṁ snātvā gaṁgāsisaṁgame saptajanmakṛtaiḥ pāpairmukto bhavati tatkṣaṇāt

रथसप्तमी को लोलार्क में, गंगा-असि-संगम पर स्नान करने से मनुष्य सात जन्मों के पापों से तत्काल मुक्त हो जाता है।

श्लोक 51 (skanda.4.46.51)

प्रत्यर्कवारं लोलार्कं यः पश्यति शुचिव्रतः॥ न तस्य दुःखं लोकेस्मिन्कदाचित्संभविष्यति

pratyarkavāraṁ lolārkaṁ yaḥ paśyati śucivrataḥ na tasya duḥkhaṁ lokesminkadācitsaṁbhaviṣyati

जो शुद्धाचारी मनुष्य प्रत्येक रविवार को लोलार्क का दर्शन करता है, उसे इस लोक में कभी भी दुःख नहीं होता।

श्लोक 52 (skanda.4.46.52)

न तस्य दुःखं नो पामा न दद्रुर्न विचर्चिका॥ लोलार्कमर्के यः पश्येत्तत्पादोदकसेवकः

na tasya duḥkhaṁ no pāmā na dadrurna vicarcikā lolārkamarke yaḥ paśyettatpādodakasevakaḥ

जो सूर्यवार को लोलार्क का दर्शन करता है और उनके चरणोदक का सेवन करता है, उसे न दुःख होता है, न खाज, न दाद और न विचर्चिका।

श्लोक 53 (skanda.4.46.53)

वाराणस्यामुषित्वापि यो लोलार्कं न सेवते॥ सेवंते तं नरं नूनं क्लेशाः क्षुद्व्याधिसंभवाः

vārāṇasyāmuṣitvāpi yo lolārkaṁ na sevate sevaṁte taṁ naraṁ nūnaṁ kleśāḥ kṣudvyādhisaṁbhavāḥ

जो व्यक्ति वाराणसी में निवास करते हुए भी लोलार्क की सेवा नहीं करता, निश्चय ही उसे क्षुधा और व्याधि से उत्पन्न क्लेश घेर लेते हैं।

श्लोक 54 (skanda.4.46.54)

सर्वेषां काशितीर्थानां लोलार्कः प्रथमं शिरः॥ ततोंऽगान्यन्यतीर्थानि तज्जलप्लावितानिहि

sarveṣāṁ kāśitīrthānāṁ lolārkaḥ prathamaṁ śiraḥ tatoṁ'gānyanyatīrthāni tajjalaplāvitānihi

काशी के समस्त तीर्थों में लोलार्क सर्वप्रथम शिरस्थानीय है; अन्य तीर्थ मानो उसी के अंग हैं, जो उसी के जल से आप्लावित हैं।

श्लोक 55 (skanda.4.46.55)

तीर्थांतराणि सर्वाणि भूमीवलयगान्यपि॥ असिसंभेदतीर्थस्य कलां नार्हंति षोडशीम्॥ सर्वेषामेव तीर्थानां स्नानाद्यल्लभ्यते फलम्॥ तत्फलं सम्यगाप्येत नरैर्गंगासिसंगमे

tīrthāṁtarāṇi sarvāṇi bhūmīvalayagānyapi asisaṁbhedatīrthasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm sarveṣāmeva tīrthānāṁ snānādyallabhyate phalam tatphalaṁ samyagāpyeta narairgaṁgāsisaṁgame

पृथ्वी-मंडल में स्थित अन्य समस्त तीर्थ भी असि-संगम तीर्थ की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं। समस्त तीर्थों में स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह संपूर्ण फल मनुष्यों को गंगा-असि-संगम में ही भलीभाँति प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 56 (skanda.4.46.56)

नार्थवादोयमुदितः स्तुतिवादो न वै मुने॥ सत्यं यथार्थवादोयं श्रद्धेयः सद्भिरादरात्

nārthavādoyamuditaḥ stutivādo na vai mune satyaṁ yathārthavādoyaṁ śraddheyaḥ sadbhirādarāt

हे मुने! यह कोई अर्थवाद (अतिशयोक्ति) नहीं है, न ही यह मात्र स्तुतिवाद है; यह तो यथार्थ सत्य वचन है, जिसे सज्जनों को आदरपूर्वक श्रद्धा करनी चाहिए।

श्लोक 57 (skanda.4.46.57)

यत्र विश्वेश्वरः साक्षाद्यत्र स्वर्गतरंगिणी॥ मिथ्या तत्रानुमन्यंते तार्किकाश्चानुसूयकाः

yatra viśveśvaraḥ sākṣādyatra svargataraṁgiṇī mithyā tatrānumanyaṁte tārkikāścānusūyakāḥ

जहाँ स्वयं साक्षात् विश्वेश्वर विराजमान हैं और जहाँ स्वर्गगामिनी गंगा प्रवाहित होती हैं, वहाँ की महिमा को केवल कुतर्की तथा ईर्ष्यालु लोग ही मिथ्या मानते हैं।

श्लोक 58 (skanda.4.46.58)

उदाहरंति ये मूढाः कुतर्कबलदर्पिताः॥ काश्यां सर्वेर्थवादोयं ते विट्कीटा युगेयुगे

udāharaṁti ye mūḍhāḥ kutarkabaladarpitāḥ kāśyāṁ sarverthavādoyaṁ te viṭkīṭā yugeyuge

जो मूर्ख लोग कुतर्क के बल से गर्वित होकर यह कहते हैं कि काशी के विषय में यह सब अर्थवाद (अतिशयोक्ति) मात्र है, वे युग-युग में विष्ठा के कीड़े बनते हैं।

श्लोक 59 (skanda.4.46.59)

कस्यचित्काशितीर्थस्य महिम्नो महतस्तुलाम्॥ नाधिरोहेन्मुने नूनमपि त्रैलोक्यमंडपः

kasyacitkāśitīrthasya mahimno mahatastulām nādhirohenmune nūnamapi trailokyamaṁḍapaḥ

हे मुने! काशी के किसी भी तीर्थ की महती महिमा की तुलना तो निश्चय ही समस्त त्रैलोक्य-मंडप भी नहीं कर सकता।

श्लोक 60 (skanda.4.46.60)

नास्तिका वेदबाह्याश्च शिश्नोदरपरायणाः॥ अंत्यजाताश्च ये तेषां पुरः काशी न वर्ण्यताम्

nāstikā vedabāhyāśca śiśnodaraparāyaṇāḥ aṁtyajātāśca ye teṣāṁ puraḥ kāśī na varṇyatām

नास्तिकों, वेदबाह्य लोगों, शिश्नोदरपरायण जनों तथा अंत्यजों के समक्ष काशी का वर्णन कदापि नहीं करना चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.4.46.61)

लोलार्ककरनिष्टप्ता असिधार विखंडिताः॥ काश्यां दक्षिणदिग्भागे न विशेयुर्महामलाः

lolārkakaraniṣṭaptā asidhāra vikhaṁḍitāḥ kāśyāṁ dakṣiṇadigbhāge na viśeyurmahāmalāḥ

लोलार्क की किरणों से संतप्त तथा असिधारा से विखंडित होकर, महान् मलिन जन काशी के दक्षिण दिग्भाग में प्रवेश नहीं कर पाते।

श्लोक 62 (skanda.4.46.62)

महिमानमिमं श्रुत्वा लोलार्कस्य नरोत्तमः॥ न दुःखी जायते क्वापि संसारे दुःखसागरे

mahimānamimaṁ śrutvā lolārkasya narottamaḥ na duḥkhī jāyate kvāpi saṁsāre duḥkhasāgare

लोलार्क की इस महिमा को सुनकर श्रेष्ठ मनुष्य इस दुःखसागर-रूपी संसार में कहीं भी दुःखी नहीं होता।

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