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काशी खण्ड · अध्याय 50

खखोल्कादित्य एवं गरुडेश-वर्णन

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

श्लोक 1 (skanda.4.50.1)

॥ स्कंद उवाच॥ वाराणस्यां तथादित्या ये चान्ये तान्वदाम्यतः॥ कलशोद्भव ते प्रीत्या सर्वे सर्वाघनाशनाः

skaṁda uvāca vārāṇasyāṁ tathādityā ye cānye tānvadāmyataḥ kalaśodbhava te prītyā sarve sarvāghanāśanāḥ

स्कंद ने कहा — हे कलशोद्भव! अब मैं वाराणसी में स्थित अन्य आदित्यों के विषय में भी बताता हूँ; वे सभी प्रेमवश समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 2 (skanda.4.50.2)

खखोल्को नाम भगवानादित्य परिकीर्तितः॥ त्रिविष्टपोत्तरे भागे सर्वव्याधिविघातकृत्

khakholko nāma bhagavānāditya parikīrtitaḥ triviṣṭapottare bhāge sarvavyādhivighātakṛt

'खखोल्क' नामक भगवान् आदित्य कहे जाते हैं, जो उत्तर दिशा में स्थित होकर समस्त व्याधियों का नाश करते हैं।

श्लोक 3 (skanda.4.50.3)

यथा खखोल्क इत्याख्या तस्यादित्यस्य तच्छृणु॥ पुरा कद्रूश्च विनता दक्षस्य तनये शुभे

yathā khakholka ityākhyā tasyādityasya tacchṛṇu purā kadrūśca vinatā dakṣasya tanaye śubhe

उस आदित्य का नाम 'खखोल्क' कैसे पड़ा, वह सुनो। पूर्वकाल में दक्ष की दो शुभ कन्याएँ कद्रू और विनता —

श्लोक 4 (skanda.4.50.4)

कश्यपस्य च ते पत्न्यौ मारीचेः प्राक्प्रजापतेः॥ क्रीडंत्यावेकदान्योन्यं मुने ते ऊचतुस्त्विति

kaśyapasya ca te patnyau mārīceḥ prākprajāpateḥ krīḍaṁtyāvekadānyonyaṁ mune te ūcatustviti

— जो मारीच-पुत्र प्रजापति कश्यप की पत्नियाँ थीं, हे मुने! एक बार साथ क्रीड़ा करते हुए आपस में यह कहने लगीं।

श्लोक 5 (skanda.4.50.5)

॥ कद्रूरुवाच॥ विनते त्वं विजानासि यदि तद्ब्रूहि मेग्रतः॥ अखंडिता गतिस्तेस्ति यतो गगनमंडले

kadrūruvāca vinate tvaṁ vijānāsi yadi tadbrūhi megrataḥ akhaṁḍitā gatistesti yato gaganamaṁḍale

कद्रू ने कहा — हे विनते! तुम आकाश-मंडल में अखंडित गति रखती हो, अतः यदि जानती हो तो मुझे बताओ।

श्लोक 6 (skanda.4.50.6)

योसावुच्चैःश्रवा वाजी श्रूयते सवितूरथे॥ किं रूपःसोस्ति शबलो धवलो वा वदाशु मे

yosāvuccaiḥśravā vājī śrūyate savitūrathe kiṁ rūpaḥsosti śabalo dhavalo vā vadāśu me

सूर्य के रथ में जुता हुआ जो उच्चैःश्रवा नामक अश्व सुना जाता है, वह किस रूप का है — शबल है या धवल? मुझे शीघ्र बताओ।

श्लोक 7 (skanda.4.50.7)

पणं च कुरु कल्याणि तुभ्यं यो रोचतेनघे॥ एवमेव न यात्येष कालक्रीडनकं विना

paṇaṁ ca kuru kalyāṇi tubhyaṁ yo rocatenaghe evameva na yātyeṣa kālakrīḍanakaṁ vinā

और हे कल्याणि, हे निष्पापे! जो तुम्हें रुचे, वह पण भी लगा लो; यों ही समय व्यतीत नहीं होता, कोई न कोई खेल तो चाहिए ही।

श्लोक 8 (skanda.4.50.8)

॥ विनतोवाच॥ किं पणेन भगिन्यत्र कथयाम्येवमेव हि॥ त्वज्जये का च मे प्रीतिर्मज्जये किं नु ते सुखम्

vinatovāca kiṁ paṇena bhaginyatra kathayāmyevameva hi tvajjaye kā ca me prītirmajjaye kiṁ nu te sukham

विनता ने कहा — हे बहन! यहाँ पण की क्या आवश्यकता है, मैं तो यों ही बता दूँगी। तुम्हारी विजय से मुझे क्या प्रसन्नता, और मेरी विजय से तुम्हें क्या सुख?

श्लोक 9 (skanda.4.50.9)

ज्ञात्वा पणो न कर्तव्यो मिथः स्नेहमभीप्सता॥ ध्रुवमेकस्य विजये क्रोधोन्स्येह जायते

jñātvā paṇo na kartavyo mithaḥ snehamabhīpsatā dhruvamekasya vijaye krodhonsyeha jāyate

परस्पर स्नेह चाहने वाले को जान-बूझकर पण नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक की विजय होने पर निश्चय ही दूसरे को क्रोध उत्पन्न होता है।

श्लोक 10 (skanda.4.50.10)

कद्रूरुवाच॥ क्रीडेयं नात्र भगिनि कारणं किमपि क्रुधः॥ खेलस्य व्यवहारोयं पणे यत्किंचिदुच्यते॥ ॥ विनतोवाच॥ तथा कुरु यथा प्रीतिस्तवास्ति पवनाशिनि॥ अथ तां विनतामाह कद्रूः कुटिलमानसा

kadrūruvāca krīḍeyaṁ nātra bhagini kāraṇaṁ kimapi krudhaḥ khelasya vyavahāroyaṁ paṇe yatkiṁciducyate vinatovāca tathā kuru yathā prītistavāsti pavanāśini atha tāṁ vinatāmāha kadrūḥ kuṭilamānasā

कद्रू ने कहा — हे बहन! यह तो केवल क्रीड़ा है, इसमें क्रोध का कोई कारण नहीं; खेल का यही व्यवहार है कि पण में कुछ न कुछ कहा जाए। विनता ने कहा — हे पवनाशिनि! जिसमें तुम्हें प्रसन्नता हो, वैसा ही करो। तब कुटिल मन वाली कद्रू ने विनता से यह कहा।

श्लोक 11 (skanda.4.50.11)

तस्यास्तु सा भवेद्दासी पराजीयेत या यया॥ अस्मिन्पणे इमाः सर्वाः सख्यः साक्षिण्य एव नौ

tasyāstu sā bhaveddāsī parājīyeta yā yayā asminpaṇe imāḥ sarvāḥ sakhyaḥ sākṣiṇya eva nau

जो भी हार जाए, वह दूसरी की दासी बन जाए; और इस पण में यहाँ उपस्थित हम दोनों की ये सभी सखियाँ साक्षी होंगी।

श्लोक 12 (skanda.4.50.12)

इत्यन्योन्यं पणीकृत्य सर्पिण्यपि पतत्त्रिणी॥ उवाच कर्बुरं कद्रूरश्वं श्वेतं गरुत्मती

ityanyonyaṁ paṇīkṛtya sarpiṇyapi patattriṇī uvāca karburaṁ kadrūraśvaṁ śvetaṁ garutmatī

इस प्रकार परस्पर पण लगाकर, सर्पमाता कद्रू ने अश्व को शबल कहा और पक्षिमाता विनता ने उसे श्वेत कहा।

श्लोक 13 (skanda.4.50.13)

कदागंतव्यमिति च चक्राते ते गमावधिम्॥ जग्मतुश्च विरम्याथ क्रीडनात्स्वस्वमालयम्

kadāgaṁtavyamiti ca cakrāte te gamāvadhim jagmatuśca viramyātha krīḍanātsvasvamālayam

कब लौटना है, यह समय निश्चित कर, वे दोनों क्रीड़ा से विरत होकर अपने-अपने घर चली गईं।

श्लोक 14 (skanda.4.50.14)

विनतायां गतायां तु कद्रूराहूय चांगजान्॥ उवाच यात वै पुत्रा द्रुतं वचनतो मम

vinatāyāṁ gatāyāṁ tu kadrūrāhūya cāṁgajān uvāca yāta vai putrā drutaṁ vacanato mama

विनता के चले जाने पर कद्रू ने अपने पुत्रों को बुलाकर कहा — हे पुत्रो! मेरे वचन से शीघ्र जाओ।

श्लोक 15 (skanda.4.50.15)

तुरंगमुच्चैःश्रवसं प्रोद्भूतं क्षीरनीरधेः॥ सुरासुरैर्मथ्यमानान्मंदराघातसाध्वसात्

turaṁgamuccaiḥśravasaṁ prodbhūtaṁ kṣīranīradheḥ surāsurairmathyamānānmaṁdarāghātasādhvasāt

क्षीरसागर से उत्पन्न, जो देव-असुरों द्वारा मथे जाने पर मंदराचल के आघात के भय से —

श्लोक 16 (skanda.4.50.16)

कार्यकारणरूपस्य सादृश्यमधिगच्छति॥ अतस्तं क्षीरवर्णाभं कल्माषयत पुत्रकाः

kāryakāraṇarūpasya sādṛśyamadhigacchati atastaṁ kṣīravarṇābhaṁ kalmāṣayata putrakāḥ

कार्य अपने कारण के सादृश्य को प्राप्त करता है, अतः वह क्षीर के समान श्वेतवर्ण है; इसलिए हे पुत्रो! उसे शबल बना दो।

श्लोक 17 (skanda.4.50.17)

तस्य वालधिमध्यास्य कृष्णकुंतलतां गताः॥ तथा तदंगलोमानि विधत्तविषसीत्कृतैः

tasya vāladhimadhyāsya kṛṣṇakuṁtalatāṁ gatāḥ tathā tadaṁgalomāni vidhattaviṣasītkṛtaiḥ

उसकी पूँछ पर बैठकर, कृष्ण केश के रूप में परिणत हो जाओ, तथा अपने विष के फुफकार से उसके शरीर के रोमों को भी वैसा ही बना दो।

श्लोक 18 (skanda.4.50.18)

इति श्रुत्वा वचो मातुः काद्रवेयाः परस्परम्॥ संमंत्र्य मातरं प्रोचुः कद्रूं कद्रूपमागताः

iti śrutvā vaco mātuḥ kādraveyāḥ parasparam saṁmaṁtrya mātaraṁ procuḥ kadrūṁ kadrūpamāgatāḥ

माता का यह वचन सुनकर कद्रू-पुत्र आपस में परामर्श कर, उस कुत्सित कार्य के लिए तैयार होकर, माता कद्रू से यह कहने लगे।

श्लोक 19 (skanda.4.50.19)

॥ नागा ऊचुः॥ मातर्वयं त्वदाह्वानाद्विहाय क्रीडनं बलात्॥ प्राप्ताः प्रहृष्टा मृष्टान्नं दास्यत्यद्य प्रसूरिति॥ मृष्टं तिष्ठतु तद्दूरं विषादप्यधिकं कटु॥ तत्त्वया वादियन्मंत्रैरौषधैर्नोपशाम्यति

nāgā ūcuḥ mātarvayaṁ tvadāhvānādvihāya krīḍanaṁ balāt prāptāḥ prahṛṣṭā mṛṣṭānnaṁ dāsyatyadya prasūriti mṛṣṭaṁ tiṣṭhatu taddūraṁ viṣādapyadhikaṁ kaṭu tattvayā vādiyanmaṁtrairauṣadhairnopaśāmyati

नागों ने कहा — हे माता! हम तुम्हारे बुलाने पर बलपूर्वक अपनी क्रीड़ा छोड़कर यह सोचते हुए आए कि आज माता हमें मिष्टान्न देंगी। वह मिष्टान्न तो दूर ही रहे; यह जो तुमने कहा है, वह तो विष से भी अधिक कड़वा है, जो किसी मंत्र या औषधि से भी शांत नहीं होता।

श्लोक 20 (skanda.4.50.20)

वयं न यामो यद्भाव्यं तदस्माकं भवत्विह॥ इति प्रोक्तं विषास्यैस्तैस्तदा कुटिलगामिभिः

vayaṁ na yāmo yadbhāvyaṁ tadasmākaṁ bhavatviha iti proktaṁ viṣāsyaistaistadā kuṭilagāmibhiḥ

हम नहीं जाएँगे, हमारा जो भी होना हो, वह यहाँ हो जाए — विषमुख तथा कुटिलगामी उन सर्पों ने ऐसा ही कहा।

श्लोक 21 (skanda.4.50.21)

॥ स्कंद उवाच॥ अन्येपि ये कुटिलगाः पररंध्रनिषेविणः॥ अकर्णाः कूरहृदयाः पितरौ व्रीडयंति ते

skaṁda uvāca anyepi ye kuṭilagāḥ pararaṁdhraniṣeviṇaḥ akarṇāḥ kūrahṛdayāḥ pitarau vrīḍayaṁti te

स्कंद ने कहा — जो अन्य लोग भी कुटिलगामी, दूसरों के छिद्र ढूँढ़ने वाले, कर्णहीन तथा क्रूर हृदय वाले होते हैं, वे भी अपने माता-पिता को लज्जित करते हैं।

श्लोक 22 (skanda.4.50.22)

पित्रोर्गिरं निराकृत्य ये तिष्ठेयुः सुदुर्मदाः॥ अत्याहितमिह प्राप्य गच्छेयुस्तेऽचिराल्लयम्

pitrorgiraṁ nirākṛtya ye tiṣṭheyuḥ sudurmadāḥ atyāhitamiha prāpya gaccheyuste'cirāllayam

जो अत्यंत उद्धत जन माता-पिता के वचन को अस्वीकार कर अपनी ही मनमानी करते हैं, वे यहाँ महान् अनिष्ट को प्राप्त कर शीघ्र ही विनाश को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 23 (skanda.4.50.23)

तेषां वचनमाकर्ण्य नयाम इति सोरगी॥ शशाप तान्क्रुधाविष्टा नागांश्चागः समागतान्

teṣāṁ vacanamākarṇya nayāma iti soragī śaśāpa tānkrudhāviṣṭā nāgāṁścāgaḥ samāgatān

उनकी यह बात सुनकर वह सर्पमाता क्रोध से आविष्ट होकर, 'मैं तुम्हें तुम्हारे परिणाम तक ले चलती हूँ' — यह कहकर, पाप-सहित आए हुए उन नागों को शाप देने लगी।

श्लोक 24 (skanda.4.50.24)

तार्क्ष्यस्य भक्ष्या भवत यूयं मद्वाक्यलंघनात्॥ जातमात्राश्च सर्पिण्यो भक्षयंतु स्वबालकान्

tārkṣyasya bhakṣyā bhavata yūyaṁ madvākyalaṁghanāt jātamātrāśca sarpiṇyo bhakṣayaṁtu svabālakān

मेरे वचन का उल्लंघन करने के कारण तुम तार्क्ष्य के भक्ष्य बन जाओ; और सर्पिणियाँ भी जन्म लेते ही अपने बालकों को खा जाएँ।

श्लोक 25 (skanda.4.50.25)

इति शापानलाद्भीतैः कैश्चित्पातालमाश्रितम्॥ जिजीविषुभिरन्यैश्च द्वित्रैश्चक्रे प्रसूवचः

iti śāpānalādbhītaiḥ kaiścitpātālamāśritam jijīviṣubhiranyaiśca dvitraiścakre prasūvacaḥ

उस शाप-अग्नि से भयभीत होकर कुछ नाग पाताल का आश्रय ले बैठे, परंतु जीने की इच्छा रखने वाले दो-तीन अन्य नागों ने माता की आज्ञा का पालन किया।

श्लोक 26 (skanda.4.50.26)

ते पुच्छमौच्चैःश्रवसमधिगम्य महाधियः॥ सुनीलचिकुराभासं चक्रुरंगं च कर्बुरम्

te pucchamauccaiḥśravasamadhigamya mahādhiyaḥ sunīlacikurābhāsaṁ cakruraṁgaṁ ca karburam

उन चतुर नागों ने उच्चैःश्रवा की पूँछ के पास पहुँचकर, उसे अत्यंत नीले केशों के समान बना दिया, तथा उसके शरीर को भी शबल कर दिया।

श्लोक 27 (skanda.4.50.27)

तत्क्ष्वेडानल धूमौघैः फूत्कारभरनिःसृतैः॥ मातृवाक्कृतिजाद्धर्मान्न दग्धा भानुभानुभिः

tatkṣveḍānala dhūmaughaiḥ phūtkārabharaniḥsṛtaiḥ mātṛvākkṛtijāddharmānna dagdhā bhānubhānubhiḥ

अपने विष की अग्नि के धूम-समूह को फुफकार के साथ छोड़ते हुए, माता के वचन-पालनरूपी धर्म के कारण ही वे सूर्य-किरणों से भी दग्ध नहीं हुए।

श्लोक 28 (skanda.4.50.28)

विनतापृष्ठमारुह्य कद्रूः स्नेहवशात्ततः॥ वियन्मार्गमलंकृत्य ददर्शोष्णांशुमंडलम्॥ तिग्मरश्मिप्रभावेण व्याकुलीभूतमानसा॥ कद्रुस्ततः खगीं प्राह विस्रब्धं विनते व्रज

vinatāpṛṣṭhamāruhya kadrūḥ snehavaśāttataḥ viyanmārgamalaṁkṛtya dadarśoṣṇāṁśumaṁḍalam tigmaraśmiprabhāveṇa vyākulībhūtamānasā kadrustataḥ khagīṁ prāha visrabdhaṁ vinate vraja

तब स्नेहवश विनता की पीठ पर सवार होकर, आकाश-मार्ग को अलंकृत करती हुई कद्रू ने उष्ण सूर्यमंडल को देखा; तीक्ष्ण किरणों के प्रभाव से व्याकुलचित्त हुई कद्रू ने विनता से कहा — हे विनते! निश्चिंत होकर चलो।

श्लोक 29 (skanda.4.50.29)

उष्णगोरुष्णगोभिर्मे ताप्यते नितरां तनुः॥ विस्रब्धाहं स्वभावेन त्वं सापेक्षाहि सर्वतः

uṣṇagoruṣṇagobhirme tāpyate nitarāṁ tanuḥ visrabdhāhaṁ svabhāvena tvaṁ sāpekṣāhi sarvataḥ

उष्णकिरण सूर्य की किरणों से मेरा शरीर अत्यंत संतप्त हो रहा है; मैं तो स्वभाव से ही निश्चिंत हूँ, परंतु तुम सर्वतः सावधान रहो।

श्लोक 30 (skanda.4.50.30)

स्वरूपेण पतंगी त्वं पतंगोसौ सहस्रगुः॥ अतएव न ते बाधा गगने तापसंभवा

svarūpeṇa pataṁgī tvaṁ pataṁgosau sahasraguḥ ataeva na te bādhā gagane tāpasaṁbhavā

तुम स्वभाव से ही पतंगिनी हो, और वह सूर्य भी सहस्रकिरण पतंग है; इसीलिए आकाश में तुम्हें ताप-जनित कोई बाधा नहीं होती।

श्लोक 31 (skanda.4.50.31)

वियत्सरसि हंसोयं भवती हंसगामिनी॥ चंडरश्मिप्रतापाग्निस्त्वामतो नेह बाधते

viyatsarasi haṁsoyaṁ bhavatī haṁsagāminī caṁḍaraśmipratāpāgnistvāmato neha bādhate

यह सूर्य आकाशरूपी सरोवर का हंस है, और तुम हंसगामिनी हो; इसीलिए इसके प्रचंड किरणों की प्रतापाग्नि तुम्हें यहाँ बाधित नहीं करती।

श्लोक 32 (skanda.4.50.32)

खगीमुद्गीयमानां खे पुनरूचे बिलेशया॥ त्राहित्राहि भगिन्यत्र यावोन्यत्र वियत्पथः

khagīmudgīyamānāṁ khe punarūce bileśayā trāhitrāhi bhaginyatra yāvonyatra viyatpathaḥ

आकाश में इस प्रकार प्रशंसित होती हुई वह बिलवासिनी पुनः बोली — हे बहन! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो; हम आकाश-मार्ग में कहीं और चलें।

श्लोक 33 (skanda.4.50.33)

विनते विनतां मां त्वं किं नावसि पतत्त्रिणी॥ तव दासी भविष्यामि त्वदुच्छिष्टनिषेविणी

vinate vinatāṁ māṁ tvaṁ kiṁ nāvasi patattriṇī tava dāsī bhaviṣyāmi tvaducchiṣṭaniṣeviṇī

हे विनते! मुझ नत को, हे पक्षिणी! तुम क्यों नहीं बचातीं? मैं तुम्हारी दासी बन जाऊँगी, तुम्हारे उच्छिष्ट का सेवन करने वाली।

श्लोक 34 (skanda.4.50.34)

यावज्जीवमहं भूयां त्वत्पादोदकपायिनी॥ खखोल्कानि पतेदेषा भृशगद्गदभाषिणी

yāvajjīvamahaṁ bhūyāṁ tvatpādodakapāyinī khakholkāni patedeṣā bhṛśagadgadabhāṣiṇī

जब तक जीवित रहूँ, तब तक तुम्हारे चरणोदक का सेवन करने वाली बनूँ — इतना कहते-कहते अत्यंत गद्गद वाणी में उसके मुख से 'खखोल्कानि' यह शब्द निकल पड़ा।

श्लोक 35 (skanda.4.50.35)

मूर्च्छां गतवती पक्षपुटौ धृत्वा बिडोरगी॥ सख्युल्कानि पतेदेषा वक्तव्ये त्विति संभ्रमात्

mūrcchāṁ gatavatī pakṣapuṭau dhṛtvā biḍoragī sakhyulkāni patedeṣā vaktavye tviti saṁbhramāt

वह बिलवासिनी सर्पिणी मूर्च्छित होकर, पक्षपुटों को पकड़कर, यह कहना चाहती थी कि 'मेरी सखी पर उल्कापात हो', परंतु घबराहट में —

श्लोक 36 (skanda.4.50.36)

खखोल्केति यदुक्ता गीः कद्र्वा संभ्रातचेतसा॥ तदा खखोल्कनामार्कः स्तुतो विनतया बहु

khakholketi yaduktā gīḥ kadrvā saṁbhrātacetasā tadā khakholkanāmārkaḥ stuto vinatayā bahu

घबराए हुए मन वाली कद्रू के मुख से जो वाणी निकली, वह 'खखोल्क' थी; और तभी विनता द्वारा अत्यधिक स्तुति किए जाने पर सूर्य का नाम 'खखोल्क' पड़ गया।

श्लोक 37 (skanda.4.50.37)

मनागतिग्मतां प्राप्ते खे प्रयाति विवस्वति॥ ताभ्यां तुरंगमो दर्शि किंचित्किर्मीरवान्रथे॥ उक्ता विनतयैवैषा तापोपहतलोचना॥ क्रूरा सरीसृपी सत्यवादिन्या विश्वमान्यया

manāgatigmatāṁ prāpte khe prayāti vivasvati tābhyāṁ turaṁgamo darśi kiṁcitkirmīravānrathe uktā vinatayaivaiṣā tāpopahatalocanā krūrā sarīsṛpī satyavādinyā viśvamānyayā

जब सूर्य की तीव्रता कुछ कम हुई और वे आकाश में आगे बढ़े, तब उन दोनों ने रथ में उस अश्व को कुछ चितकबरे रूप में देखा। तब सत्यवादिनी तथा विश्वमान्या विनता ने ही, ताप से पीड़ित नेत्रों वाली उस क्रूर सरीसृपिणी से कहा —

श्लोक 38 (skanda.4.50.38)

कद्रु त्वया जितं भद्रे यत उच्चैःश्रवा हयः॥ चंद्ररश्मिप्रभोप्येष कल्माष इव भासते

kadru tvayā jitaṁ bhadre yata uccaiḥśravā hayaḥ caṁdraraśmiprabhopyeṣa kalmāṣa iva bhāsate

हे कद्रु! हे भद्रे! तुम्हीं जीती, क्योंकि उच्चैःश्रवा अश्व, जो चंद्रकिरण के समान कांतिमान था, अब चितकबरा-सा दिखाई पड़ रहा है।

श्लोक 39 (skanda.4.50.39)

विधिर्बलीयान्भुजगि चित्रं जयपराजये॥ क्रूरोपि विजयी क्वापि त्वक्रूरोपि पराजयी

vidhirbalīyānbhujagi citraṁ jayaparājaye krūropi vijayī kvāpi tvakrūropi parājayī

हे भुजगि! विधाता ही बलवान् है; जय-पराजय में यह कैसा विचित्र है — कभी क्रूर भी विजयी होता है और अक्रूर भी पराजित हो जाता है।

श्लोक 40 (skanda.4.50.40)

विनताविनताधारा वदंतीति यथागतम्॥ कद्रूनिवेशनं प्राप्ता तस्या दास्यमचीकरत्

vinatāvinatādhārā vadaṁtīti yathāgatam kadrūniveśanaṁ prāptā tasyā dāsyamacīkarat

इस प्रकार कहती हुई, नत हुई विनता जैसी आई थी वैसे ही लौटकर, कद्रू के निवास में पहुँची और उसकी दासता करने लगी।

श्लोक 41 (skanda.4.50.41)

कदाचिद्विनतादर्शि सुपर्णनाश्रुलोचना॥ विच्छाया मलिना दीना दीर्घनिःश्वासवत्यपि

kadācidvinatādarśi suparṇanāśrulocanā vicchāyā malinā dīnā dīrghaniḥśvāsavatyapi

एक बार सुपर्ण (गरुड़) ने विनता को अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली, कांतिहीन, मलिन, दीन तथा दीर्घ निःश्वास लेती हुई देखा।

श्लोक 42 (skanda.4.50.42)

सुपर्ण उवाच॥ प्रातःप्रातरहो मातः क्व यासि त्वं दिनेदिने॥ सायमायासि च कुतो विच्छाया दीनमानसा

suparṇa uvāca prātaḥprātaraho mātaḥ kva yāsi tvaṁ dinedine sāyamāyāsi ca kuto vicchāyā dīnamānasā

सुपर्ण ने कहा — हे माता! तुम प्रतिदिन प्रातःकाल कहाँ जाती हो, और सायंकाल कहाँ से आती हो, कांतिहीन तथा दीनमना होकर?

श्लोक 43 (skanda.4.50.43)

कुतो निःश्वसिसि प्रोच्चैरश्रुपूर्ण विलोचना॥ यथा क्लीबसुता योषिद्यथापति तिरस्कृता

kuto niḥśvasisi proccairaśrupūrṇa vilocanā yathā klībasutā yoṣidyathāpati tiraskṛtā

तुम इतनी ऊँची साँसें क्यों लेती हो, नेत्रों में अश्रु भरे हुए — मानो क्लीब-पुत्रा स्त्री हो अथवा पति से तिरस्कृत नारी हो?

श्लोक 44 (skanda.4.50.44)

ब्रूहि मातर्झटित्यद्य कुतो दूनासि पत्त्रिणि॥ मयि जीवति ते बाले कालेपि कृतसाध्वसे

brūhi mātarjhaṭityadya kuto dūnāsi pattriṇi mayi jīvati te bāle kālepi kṛtasādhvase

हे माता! तुम आज इतनी दुःखी क्यों हो, यह मुझे शीघ्र बताओ; मेरे जीवित रहते हुए, हे बाले! तुम तो काल को भी भयभीत कर सकती हो।

श्लोक 45 (skanda.4.50.45)

अश्रुनिर्माणकरणे कारणं किं तपस्विनि॥ सुचरित्रा सुनारीषु नामंगलमिहेष्यते

aśrunirmāṇakaraṇe kāraṇaṁ kiṁ tapasvini sucaritrā sunārīṣu nāmaṁgalamiheṣyate

हे तपस्विनि! तुम्हारे अश्रुपात का कारण क्या है? सुचरित्र तथा सती स्त्रियों में यहाँ अमंगल की कल्पना नहीं की जा सकती।

श्लोक 46 (skanda.4.50.46)

धिक्तांश्च पुत्रान्यन्माता तेषु जीवत्सु दुःखभाक्॥ वरं वंध्यैव सा यस्याः सुता वंध्यमनोरथाः॥ इत्यूर्जस्वलमाकर्ण्य वचः सूनोर्गरुत्मतः॥ विनता प्राह तं पुत्रं मातृभक्तिसमन्वितम्

dhiktāṁśca putrānyanmātā teṣu jīvatsu duḥkhabhāk varaṁ vaṁdhyaiva sā yasyāḥ sutā vaṁdhyamanorathāḥ ityūrjasvalamākarṇya vacaḥ sūnorgarutmataḥ vinatā prāha taṁ putraṁ mātṛbhaktisamanvitam

धिक्कार है उन पुत्रों को, जिनके जीवित रहते हुए भी माता दुःख भोगती है; उससे तो बांझ ही अच्छी, जिसकी संतान की कामनाएँ निष्फल हों। अपने पुत्र गरुड़ की यह ओजस्वी वाणी सुनकर, विनता ने मातृभक्तिसंपन्न उस पुत्र से कहा।

श्लोक 47 (skanda.4.50.47)

अहं दास्यस्मि रे बाल कद्र्वाश्च क्रूरचेतसः॥ पृष्ठे वहामि तां नित्यं तत्पुत्रानपि पुत्रक

ahaṁ dāsyasmi re bāla kadrvāśca krūracetasaḥ pṛṣṭhe vahāmi tāṁ nityaṁ tatputrānapi putraka

हे बाल! मैं क्रूरचित्ता कद्रू की दासी हूँ; हे पुत्र! मैं सदा उसे तथा उसके पुत्रों को भी अपनी पीठ पर ढोती हूँ।

श्लोक 48 (skanda.4.50.48)

कदाचिन्मंदरं यामि कदाचिन्मलयाचलम्॥ कदाचिदंतरीपेषु चरेयं तदुदन्वताम्

kadācinmaṁdaraṁ yāmi kadācinmalayācalam kadācidaṁtarīpeṣu careyaṁ tadudanvatām

कभी मंदराचल जाती हूँ, कभी मलयाचल; कभी उन समुद्रों के द्वीपों में विचरण करती हूँ।

श्लोक 49 (skanda.4.50.49)

यत्रयत्र नयेयुस्ते काद्रवेयाः सुदुर्मदाः॥ व्रजेयं तत्रतत्राहं तदधीना यतः सुत

yatrayatra nayeyuste kādraveyāḥ sudurmadāḥ vrajeyaṁ tatratatrāhaṁ tadadhīnā yataḥ suta

वे अत्यंत उद्धत कद्रू-पुत्र मुझे जहाँ-जहाँ ले जाते हैं, हे सुत! मैं वहाँ-वहाँ जाती हूँ, क्योंकि मैं उनके अधीन हूँ।

श्लोक 50 (skanda.4.50.50)

गरुड उवाच॥ दासीत्वकारणं मातः किं ते जातं सुलक्षणे॥ दक्षप्रजापतेः पुत्रि कश्यपस्यप्रियेऽनघे

garuḍa uvāca dāsītvakāraṇaṁ mātaḥ kiṁ te jātaṁ sulakṣaṇe dakṣaprajāpateḥ putri kaśyapasyapriye'naghe

गरुड़ ने कहा — हे माता! हे सुलक्षणे! हे दक्ष प्रजापति की पुत्री! हे कश्यप की निष्पाप प्रिया! तुम्हारी इस दासता का कारण क्या हुआ?

श्लोक 51 (skanda.4.50.51)

विनतोवाच गरुडं पुरावृत्तमशेषतः॥ दासीत्वकारणं यद्वदादित्याश्वविलोकनम्

vinatovāca garuḍaṁ purāvṛttamaśeṣataḥ dāsītvakāraṇaṁ yadvadādityāśvavilokanam

विनता ने गरुड़ को अपनी दासता के कारण को — सूर्य के अश्व के अवलोकन की उस समस्त पूर्वकथा को विस्तारपूर्वक बताया।

श्लोक 52 (skanda.4.50.52)

श्रुत्वेति गरुडः प्राह मातरं सत्वरं व्रज॥ पृच्छाद्य मातस्तान्दुष्टान्काद्रवेयानिदं वचः

śrutveti garuḍaḥ prāha mātaraṁ satvaraṁ vraja pṛcchādya mātastānduṣṭānkādraveyānidaṁ vacaḥ

यह सुनकर गरुड़ ने कहा — हे माता! तुम शीघ्र जाओ, और आज उन दुष्ट कद्रू-पुत्रों से यह बात पूछो —

श्लोक 53 (skanda.4.50.53)

यद्दुर्लभं हि भवतां यत्रात्यंतरुचिश्च वः॥ मद्दासीत्वविमोक्षाय तद्याचध्वं ददाम्यहम्

yaddurlabhaṁ hi bhavatāṁ yatrātyaṁtaruciśca vaḥ maddāsītvavimokṣāya tadyācadhvaṁ dadāmyaham

'जो तुम्हारे लिए दुर्लभ हो और जिसमें तुम्हारी अत्यंत रुचि हो, वह मेरी माता की दासता से मुक्ति के लिए माँग लो; मैं वह दूँगा।'

श्लोक 54 (skanda.4.50.54)

तथाकरोच्च विनता तेपि श्रुत्वा तदीरितम्॥ सर्पाः संमंत्र्य तां प्रोचुर्विनतां हृष्टमानसाः

tathākarocca vinatā tepi śrutvā tadīritam sarpāḥ saṁmaṁtrya tāṁ procurvinatāṁ hṛṣṭamānasāḥ

विनता ने वैसा ही किया; और वे सर्प भी यह सुनकर आपस में परामर्श कर, हर्षित मन से विनता से कहने लगे।

श्लोक 55 (skanda.4.50.55)

मातृशापविमोक्षाय यदि दास्यति नः सुधाम्॥ तदा समीहितं तेस्तु न दास्यत्यथ दास्यसि॥ इत्योंकृत्य समापृच्छ्य कद्रूं द्रुतगतिः खगी॥ गरुत्मंतं समाचष्ट दृष्ट्वा संहृष्टमानसम्

mātṛśāpavimokṣāya yadi dāsyati naḥ sudhām tadā samīhitaṁ testu na dāsyatyatha dāsyasi ityoṁkṛtya samāpṛcchya kadrūṁ drutagatiḥ khagī garutmaṁtaṁ samācaṣṭa dṛṣṭvā saṁhṛṣṭamānasam

'यदि वह हमें मातृशाप से मुक्ति के लिए अमृत दे दे, तो तुम्हारी अभीष्ट सिद्धि हो; अन्यथा तुम दासी ही रहोगी।' इस बात को स्वीकार कर, कद्रू से आज्ञा लेकर, वेगगामिनी विनता ने गरुड़ को यह बताया, और उसे अत्यंत हर्षित देखा।

श्लोक 56 (skanda.4.50.56)

नागांतकस्ततः प्राह मातरं चिंतयातुराम्॥ आनीतं विद्धि पीयूषं मातर्मे देहि भोजनम्

nāgāṁtakastataḥ prāha mātaraṁ ciṁtayāturām ānītaṁ viddhi pīyūṣaṁ mātarme dehi bhojanam

तब नागों के अंतक (गरुड़) ने चिंता से व्याकुल माता से कहा — हे माता! अमृत को लाया हुआ ही समझो, अब मुझे भोजन दो।

श्लोक 57 (skanda.4.50.57)

विनता प्राह तं पुत्रं संप्रहृष्टतनूरुहा॥ भोः सुपर्णार्णवं तूर्णं याहि मंगलमस्तु ते

vinatā prāha taṁ putraṁ saṁprahṛṣṭatanūruhā bhoḥ suparṇārṇavaṁ tūrṇaṁ yāhi maṁgalamastu te

विनता ने रोमांचित होकर अपने उस पुत्र से कहा — हे सुपर्ण! तुम शीघ्र समुद्र की ओर जाओ, तुम्हारा मंगल हो।

श्लोक 58 (skanda.4.50.58)

संति तत्रापि बहुशो निषादा मत्स्यघातिनः॥ वेलातटनिवासाश्च तान्भक्षय दुरात्मनः

saṁti tatrāpi bahuśo niṣādā matsyaghātinaḥ velātaṭanivāsāśca tānbhakṣaya durātmanaḥ

वहाँ भी तट पर निवास करने वाले मत्स्यघाती निषाद बहुत हैं; उन दुरात्माओं को खा जाओ।

श्लोक 59 (skanda.4.50.59)

परप्राणैर्निजप्राणान्ये पुष्णंतीह दुर्धियः॥ शासनीयाः प्रयत्नेन श्रेयस्तच्छासनं परम्

paraprāṇairnijaprāṇānye puṣṇaṁtīha durdhiyaḥ śāsanīyāḥ prayatnena śreyastacchāsanaṁ param

जो दुर्बुद्धि पुरुष दूसरों के प्राणों से अपने प्राणों का पोषण करते हैं, उन्हें यत्नपूर्वक दंडित करना चाहिए; उनका वह दंडन ही परम श्रेय है।

श्लोक 60 (skanda.4.50.60)

बहुहिंसाकृतां हिंसा भवेत्स्वर्गस्य साधनम्॥ विहिंसितेषु दुष्टेषु रक्ष्यते भूरिशो यतः

bahuhiṁsākṛtāṁ hiṁsā bhavetsvargasya sādhanam vihiṁsiteṣu duṣṭeṣu rakṣyate bhūriśo yataḥ

बहुत हिंसा करने वालों की हिंसा स्वर्ग-प्राप्ति का साधन बन जाती है, क्योंकि दुष्टों के हिंसित होने पर बहुत से जनों की रक्षा हो जाती है।

श्लोक 61 (skanda.4.50.61)

निषादेष्वपि चेद्विप्रः कश्चिद्भवति पुत्रक॥ संरक्षणीयो यत्नेन भक्षणीयो न कर्हिचित्

niṣādeṣvapi cedvipraḥ kaścidbhavati putraka saṁrakṣaṇīyo yatnena bhakṣaṇīyo na karhicit

परंतु हे पुत्र! यदि उन निषादों में भी कोई ब्राह्मण हो, तो उसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, उसे कदापि भक्षण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.4.50.62)

॥ गरुड उवाच॥ मत्स्यादिनां वसन्मध्ये कथं ज्ञेयो द्विजो मया ॥ अभक्ष्यो यस्त्वया प्रोक्तस्तच्चिह्नं किं चनात्थ मे

garuḍa uvāca matsyādināṁ vasanmadhye kathaṁ jñeyo dvijo mayā abhakṣyo yastvayā proktastaccihnaṁ kiṁ canāttha me

गरुड़ ने कहा — मछुआरों के बीच रहने वाले द्विज को मैं कैसे पहचानूँ? जिसे तुमने अभक्ष्य कहा है, उसका कोई चिह्न मुझे बताओ।

श्लोक 63 (skanda.4.50.63)

॥ विनतोवाच॥ यज्ञसूत्रं गले यस्य सोत्तरीयं सुनिर्मलम्॥ नित्यधौतानि वासांसि भालं तिलक लांछितम्

vinatovāca yajñasūtraṁ gale yasya sottarīyaṁ sunirmalam nityadhautāni vāsāṁsi bhālaṁ tilaka lāṁchitam

विनता ने कहा — जिसके गले में यज्ञोपवीत हो, अत्यंत निर्मल उत्तरीय वस्त्र हो, सदा धुले हुए वस्त्र हों तथा ललाट पर तिलक लगा हो —

श्लोक 64 (skanda.4.50.64)

सपवित्रौ करौ यस्य यन्नीवी कुशगर्भिणी॥ यन्मौलिः सशिखाग्रंथिः स ज्ञेयो ब्राह्मणस्त्वया॥ उच्चरेदृग्यजुःसाम्नामृचमेकामपीह यः॥ गायत्रीमात्रमंत्रोपि स विज्ञेयो द्विजस्त्वया

sapavitrau karau yasya yannīvī kuśagarbhiṇī yanmauliḥ saśikhāgraṁthiḥ sa jñeyo brāhmaṇastvayā uccaredṛgyajuḥsāmnāmṛcamekāmapīha yaḥ gāyatrīmātramaṁtropi sa vijñeyo dvijastvayā

— जिसके हाथों में पवित्री हो, जिसकी नीवी कुशगर्भिणी हो, जिसका शिखाबंध सुव्यवस्थित हो — उसे तुम ब्राह्मण जानो। और जो ऋक्, यजुः, साम में से कोई एक भी ऋचा उच्चारित करे, अथवा केवल गायत्री मंत्र भी जानता हो — उसे भी तुम द्विज समझो।

श्लोक 65 (skanda.4.50.65)

गरुड उवाच॥ मध्ये सदा निषादानां यो वसेज्जननि द्विजः॥ तस्यैतेष्वेकमप्येव न मन्ये लक्ष्मबोधकम्

garuḍa uvāca madhye sadā niṣādānāṁ yo vasejjanani dvijaḥ tasyaiteṣvekamapyeva na manye lakṣmabodhakam

गरुड़ ने कहा — हे जननी! जो द्विज सदा निषादों के मध्य ही रहता हो, उसमें इन चिह्नों में से एक भी पहचानने योग्य होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता।

श्लोक 66 (skanda.4.50.66)

लक्ष्मांतरं समाचक्ष्व द्विजबोधकरं प्रसूः॥ येन विज्ञाय तं विप्रं त्यजेयमपि कंठगम्

lakṣmāṁtaraṁ samācakṣva dvijabodhakaraṁ prasūḥ yena vijñāya taṁ vipraṁ tyajeyamapi kaṁṭhagam

हे जननी! कोई अन्य चिह्न बताओ जो द्विज की पहचान करा सके, जिससे उसे जानकर मैं उस ब्राह्मण को कंठ में जाने पर भी छोड़ सकूँ।

श्लोक 67 (skanda.4.50.67)

तच्छ्रुत्वा विनता प्राह यस्ते कंठगतोंऽगज॥ खदिरांगारवद्दह्यात्तमपाकुरु दूरतः

tacchrutvā vinatā prāha yaste kaṁṭhagatoṁ'gaja khadirāṁgāravaddahyāttamapākuru dūrataḥ

यह सुनकर विनता ने कहा — हे पुत्र! जो भी तुम्हारे कंठ में जाकर खदिर के अंगारे की भाँति जलाए, उसे दूर हटा देना।

श्लोक 68 (skanda.4.50.68)

द्विजमात्रेपि या हिंसा सा हिंसा कुशलाय न॥ देशं वंशं श्रियं स्वं च निर्मूलयति कालतः

dvijamātrepi yā hiṁsā sā hiṁsā kuśalāya na deśaṁ vaṁśaṁ śriyaṁ svaṁ ca nirmūlayati kālataḥ

सामान्य द्विज को भी की गई हिंसा कल्याणकारी नहीं होती; वह समय आने पर देश, वंश तथा अपनी संपत्ति को भी समूल नष्ट कर देती है।

श्लोक 69 (skanda.4.50.69)

निशम्य काश्यपिरितिप्रसूपादौप्रणम्य च॥ गृहीताशीर्ययौ शीघ्रं खमार्गेण खगेश्वरः

niśamya kāśyapiritiprasūpādaupraṇamya ca gṛhītāśīryayau śīghraṁ khamārgeṇa khageśvaraḥ

यह सुनकर काश्यपि ने माता के चरणों में प्रणाम कर, आशीर्वाद प्राप्त कर, शीघ्र ही आकाश-मार्ग से प्रस्थान किया।

श्लोक 70 (skanda.4.50.70)

दूरादालोकयांचक्रे निषादान्मत्स्यजीविनः॥ पक्षौ विधूय पक्षींद्रो रजसापूर्य रोदसी

dūrādālokayāṁcakre niṣādānmatsyajīvinaḥ pakṣau vidhūya pakṣīṁdro rajasāpūrya rodasī

उसने दूर से ही मत्स्यजीवी निषादों को देखा; और वह पक्षिराज अपने पंखों को फड़फड़ाकर धूल से आकाश-पृथ्वी को भर देने लगा।

श्लोक 71 (skanda.4.50.71)

अंधीकृत्य दिशोभागानब्धिरोधस्युपाविशत्॥ व्यादाय वदनं घोरं महाकंदरसन्निभम्

aṁdhīkṛtya diśobhāgānabdhirodhasyupāviśat vyādāya vadanaṁ ghoraṁ mahākaṁdarasannibham

दिशाओं को अंधकारमय कर, वह समुद्र के तट पर बैठ गया, तथा एक विशाल गुहा के समान अपना भीषण मुख फैलाकर बैठ गया।

श्लोक 72 (skanda.4.50.72)

कांदिशीका निषादास्तु विविशुस्तत्र च स्वयम्॥ मन्वानेष्वथ पंथानं तेषु कंठं विशत्स्वपि

kāṁdiśīkā niṣādāstu viviśustatra ca svayam manvāneṣvatha paṁthānaṁ teṣu kaṁṭhaṁ viśatsvapi

भयभीत होकर इधर-उधर भागते हुए निषाद, उसे मार्ग समझकर, स्वयं उसी मुख में प्रविष्ट हो गए; और जब वे कंठ में प्रवेश कर रहे थे —

श्लोक 73 (skanda.4.50.73)

जज्वालेंगलसंस्पर्शो द्विजस्तत्कंठकंदलीम्॥ प्राक्प्रविष्टानथो तार्क्ष्यो निषादानौदरीं दरीम्॥ प्रवेश्य कंठतालुस्थं तं विज्ञाय द्विजस्फुटम्॥ भयादुदगिरत्तूर्णं मातृवाक्येन यंत्रितः

jajvāleṁgalasaṁsparśo dvijastatkaṁṭhakaṁdalīm prākpraviṣṭānatho tārkṣyo niṣādānaudarīṁ darīm praveśya kaṁṭhatālusthaṁ taṁ vijñāya dvijasphuṭam bhayādudagirattūrṇaṁ mātṛvākyena yaṁtritaḥ

उन्हीं में एक द्विज, अंगारे के स्पर्श के समान जलते हुए, उसके कंठ की उस कंदरा को जला देने लगा। तार्क्ष्य ने पूर्व प्रविष्ट निषादों को तो उदर-गुहा में भेज दिया, परंतु कंठ-तालु में स्थित उस द्विज को स्पष्ट पहचानकर, माता के वचन से बँधे हुए वे भय से शीघ्र ही उसे उगल गए।

श्लोक 74 (skanda.4.50.74)

तमुद्गीर्णं नरं दृष्ट्वा पक्षिराट्समभाषत॥ कस्त्वं जात्यासि निगद मम कंठविदाहकृत्

tamudgīrṇaṁ naraṁ dṛṣṭvā pakṣirāṭsamabhāṣata kastvaṁ jātyāsi nigada mama kaṁṭhavidāhakṛt

उस उगले हुए पुरुष को देखकर पक्षिराज ने कहा — तुम जाति से कौन हो, बताओ, तुमने ही मेरे कंठ को जलाया है।

श्लोक 75 (skanda.4.50.75)

स तदाहेति विप्रोहं पृष्टः सन्गरुडाग्रतः॥ वसाम्येषु निषादेषु जातिमात्रोपजीवकः

sa tadāheti viprohaṁ pṛṣṭaḥ sangaruḍāgrataḥ vasāmyeṣu niṣādeṣu jātimātropajīvakaḥ

गरुड़ के समक्ष पूछे जाने पर उसने कहा — मैं ब्राह्मण हूँ, परंतु इन निषादों के बीच रहता हूँ, और केवल जातिमात्र से ही अपनी जीविका चलाता हूँ।

श्लोक 76 (skanda.4.50.76)

तं प्रेष्य गरुडो दूरं भक्षयित्वाथ भूरिशः॥ नभो विक्षोभयांचक्रे प्रलयानिल सन्निभः

taṁ preṣya garuḍo dūraṁ bhakṣayitvātha bhūriśaḥ nabho vikṣobhayāṁcakre pralayānila sannibhaḥ

उसे दूर भेजकर तथा शेष अनेक निषादों को भक्षण कर, गरुड़ ने प्रलयकालीन वायु के समान आकाश को विक्षुब्ध कर दिया।

श्लोक 77 (skanda.4.50.77)

तं दृष्ट्वा तिग्मतेजस्कं ज्वालाततदिगंतरम्॥ ज्वलद्दावानलं शैलमिव बिभ्युर्दिवौकसः

taṁ dṛṣṭvā tigmatejaskaṁ jvālātatadigaṁtaram jvaladdāvānalaṁ śailamiva bibhyurdivaukasaḥ

तीक्ष्ण तेजस्वी, दिशाओं में फैली हुई ज्वालाओं वाले उसे देखकर, दावाग्नि से जलते हुए पर्वत के समान, देवगण भयभीत हो गए।

श्लोक 78 (skanda.4.50.78)

ते सन्नह्यंत युद्धाय सज्जीकृत बलायुधाः॥ अध्यास्य वाहनान्याशु सर्वे वर्मभृतः सुराः

te sannahyaṁta yuddhāya sajjīkṛta balāyudhāḥ adhyāsya vāhanānyāśu sarve varmabhṛtaḥ surāḥ

वे युद्ध के लिए तैयार हो गए, अपनी सेना और शस्त्र सुसज्जित किए; समस्त देवगण शीघ्र अपने वाहनों पर सवार होकर कवच धारण कर लिए।

श्लोक 79 (skanda.4.50.79)

तिर्यग्गतीरविर्नायं नायमग्निः सधूमवान्॥ क्षणप्रभाप्यसौ नैव को नः सम्मुख एत्यसौ

tiryaggatīravirnāyaṁ nāyamagniḥ sadhūmavān kṣaṇaprabhāpyasau naiva ko naḥ sammukha etyasau

उन्होंने कहा — यह तिर्यक् गति वाला सूर्य नहीं है, यह अग्नि भी नहीं है क्योंकि इसमें धुआँ नहीं है, यह क्षणप्रभा विद्युत् भी नहीं है — यह कौन है, जो हमारे सम्मुख आ रहा है?

श्लोक 80 (skanda.4.50.80)

न दैत्येषु प्रभेदृक्स्यान्नाकृतिर्दानवेष्वियम्॥ महासाध्वसदः कोयमस्माकं हृत्प्रकंपनः

na daityeṣu prabhedṛksyānnākṛtirdānaveṣviyam mahāsādhvasadaḥ koyamasmākaṁ hṛtprakaṁpanaḥ

दैत्यों में ऐसा तेज नहीं होता, और दानवों में भी ऐसी आकृति नहीं है; यह हमारे हृदय को कंपाने वाला महान् भय का कारण कौन है?

श्लोक 81 (skanda.4.50.81)

यावत्संभावयंतीति नीतिज्ञा अपि निर्जराः॥ तावद्दुधाव स्वौ पक्षौ पक्षिराजो महाबलः

yāvatsaṁbhāvayaṁtīti nītijñā api nirjarāḥ tāvaddudhāva svau pakṣau pakṣirājo mahābalaḥ

नीतिज्ञ देवगण जब तक इस प्रकार अनुमान ही लगा रहे थे, तब तक महाबली पक्षिराज ने अपने दोनों पंखों को फड़फड़ा दिया।

श्लोक 82 (skanda.4.50.82)

निपेतुः पक्षवातेन सायुधाश्च सवाहनाः॥ न ज्ञायंते क्व संप्राप्ता वात्यया पार्णतार्णवत्॥ अथ तेषु प्रणष्टेषु बुद्ध्या विज्ञाय पक्षिराट्॥ कोशागारं सुधायाः स तत्रापश्यच्च रक्षिणः

nipetuḥ pakṣavātena sāyudhāśca savāhanāḥ na jñāyaṁte kva saṁprāptā vātyayā pārṇatārṇavat atha teṣu praṇaṣṭeṣu buddhyā vijñāya pakṣirāṭ kośāgāraṁ sudhāyāḥ sa tatrāpaśyacca rakṣiṇaḥ

उसके पंखों की वायु से वे शस्त्र और वाहन सहित गिर पड़े, और यह भी ज्ञात नहीं हो सका कि वे आँधी से उड़े हुए पत्तों की भाँति कहाँ जा पहुँचे। जब वे इस प्रकार विलुप्त हो गए, तब पक्षिराज ने अपनी बुद्धि से जानकर वहाँ अमृत का कोशागार तथा उसके रक्षकों को देखा।

श्लोक 83 (skanda.4.50.83)

शस्त्रास्त्रोद्यतपाणींस्तान्सुरानाधूय सर्वशः॥ ददर्श कर्तरीयंत्रममृतोपरिसंस्थितम्

śastrāstrodyatapāṇīṁstānsurānādhūya sarvaśaḥ dadarśa kartarīyaṁtramamṛtoparisaṁsthitam

शस्त्र-अस्त्र उठाए उन देवताओं को सर्वत्र झटक कर उसने अमृत के ऊपर स्थित उस कर्तरी-यंत्र को देखा।

श्लोक 84 (skanda.4.50.84)

मनःपवनवेगेन भ्रममाणं महारयम्॥ अपिस्पृशंतं मशकं यत्खंडयति कोटिशः

manaḥpavanavegena bhramamāṇaṁ mahārayam apispṛśaṁtaṁ maśakaṁ yatkhaṁḍayati koṭiśaḥ

वह मन और वायु के वेग से घूमता हुआ, अत्यंत भयंकर वेगवाला था, जो स्पर्श मात्र करने वाले मच्छर को भी करोड़ों टुकड़ों में काट डालता था।

श्लोक 85 (skanda.4.50.85)

उपोपविश्य पक्षींद्रस्तस्य यंत्रस्य निर्भयः॥ क्षणं विचारयामास किमत्र करवाण्यहो

upopaviśya pakṣīṁdrastasya yaṁtrasya nirbhayaḥ kṣaṇaṁ vicārayāmāsa kimatra karavāṇyaho

पक्षिराज उस यंत्र के पास निर्भय होकर बैठ गया और क्षणभर विचार करने लगा — 'अहो! यहाँ मैं क्या करूँ?'

श्लोक 86 (skanda.4.50.86)

स्प्रष्टुं न लभ्यते चैतद्वात्या न प्रभवेदिह॥ क उपायोत्र कर्तव्यो वृथा जातो ममोद्यमः

spraṣṭuṁ na labhyate caitadvātyā na prabhavediha ka upāyotra kartavyo vṛthā jāto mamodyamaḥ

इसे स्पर्श करना भी संभव नहीं है, और यहाँ वायु का वेग भी प्रभावी नहीं हो सकता; यहाँ क्या उपाय किया जाए — क्या मेरा यह सारा प्रयत्न व्यर्थ ही गया?

श्लोक 87 (skanda.4.50.87)

न बलं प्रभवेदत्र न किंचिदपि पौरुषम्॥ अहो प्रयत्नो देवानामेतत्पीयूषरक्षणे

na balaṁ prabhavedatra na kiṁcidapi pauruṣam aho prayatno devānāmetatpīyūṣarakṣaṇe

यहाँ न बल काम आता है और न कोई पुरुषार्थ; अहो! इस अमृत की रक्षा में देवताओं का यह प्रयत्न कैसा अद्भुत है!

श्लोक 88 (skanda.4.50.88)

यदि मे शंकरे भक्तिर्निर्द्वंद्वातीव निश्चला॥ तदा स देवदेवो मां वियुनक्तु महाऽधिया

yadi me śaṁkare bhaktirnirdvaṁdvātīva niścalā tadā sa devadevo māṁ viyunaktu mahā'dhiyā

यदि शंकर के प्रति मेरी भक्ति निर्द्वंद्व तथा अत्यंत अटल है, तो वे देवदेव मुझे महती बुद्धि से युक्त करें।

श्लोक 89 (skanda.4.50.89)

यद्यहं मातृभक्तोस्मि स्वामिनः शंकरादपि॥ तदा मे बुद्धिरत्रास्तु पीयूषहरणं क्षमा

yadyahaṁ mātṛbhaktosmi svāminaḥ śaṁkarādapi tadā me buddhiratrāstu pīyūṣaharaṇaṁ kṣamā

यदि मैं अपने स्वामी शंकर से भी अधिक मातृभक्त हूँ, तो यहाँ मेरी बुद्धि अमृत-हरण में समर्थ हो।

श्लोक 90 (skanda.4.50.90)

आत्मार्थं नोद्यमश्चायं हृत्स्थो वेत्तीति विश्वगः॥ मातुर्दास्यविमोक्षाय यतेहममृतं प्रति

ātmārthaṁ nodyamaścāyaṁ hṛtstho vettīti viśvagaḥ māturdāsyavimokṣāya yatehamamṛtaṁ prati

यह मेरा प्रयत्न अपने लिए नहीं है, यह मेरे हृदय में स्थित विश्वव्यापी प्रभु जानते हैं; मैं यहाँ अमृत के लिए माता की दासता से मुक्ति के हेतु ही प्रयत्नशील हूँ।

श्लोक 91 (skanda.4.50.91)

जरितौ पितरौ यस्य बालापत्यश्च यः पुमान्॥ साध्वी भार्या च तत्पुष्ट्यै दोषोऽकृत्येपि तस्य न॥ इति चिंतयतस्तस्य बुद्धिरासीन्महात्मनः

jaritau pitarau yasya bālāpatyaśca yaḥ pumān sādhvī bhāryā ca tatpuṣṭyai doṣo'kṛtyepi tasya na iti ciṁtayatastasya buddhirāsīnmahātmanaḥ

जिसके माता-पिता वृद्ध हों, जिसके छोटे बच्चे हों तथा जिसकी पत्नी सती हो, उनके पालन-पोषण के लिए अकृत्य कर्म भी उसके लिए दोषकारी नहीं होता — इस प्रकार विचार करते हुए उस महात्मा को एक युक्ति सूझी।

श्लोक 92 (skanda.4.50.92)

देहं चकार सोत्यंतमणीयांसमणोरपि॥ परमाणुसहस्रांशं कृत्वा रूपं महाद्भुतम्

dehaṁ cakāra sotyaṁtamaṇīyāṁsamaṇorapi paramāṇusahasrāṁśaṁ kṛtvā rūpaṁ mahādbhutam

उसने अपने शरीर को अणु से भी अत्यंत सूक्ष्म बना लिया, अपने रूप को परमाणु के सहस्रांश के समान बनाकर एक अत्यंत अद्भुत रूप धारण कर लिया।

श्लोक 93 (skanda.4.50.93)

प्रविश्य कर्तरीयंत्रमधोदेहस्य लाघवात्॥ बिभ्यत्तद्यंत्रतो देहं वंचयन्वायुखंडनात्॥ मूलमुत्पाट्य तरसा गृहीत्वाऽमृतभाजनम्

praviśya kartarīyaṁtramadhodehasya lāghavāt bibhyattadyaṁtrato dehaṁ vaṁcayanvāyukhaṁḍanāt mūlamutpāṭya tarasā gṛhītvā'mṛtabhājanam

शरीर की लघुता से उस कर्तरी-यंत्र में नीचे से प्रविष्ट होकर, उस यंत्र से भयभीत होते हुए भी, अपने शरीर को उसकी वायु-खंडन से बचाते हुए, उसने तेजी से उसकी जड़ को ही उखाड़ कर अमृत-पात्र को ग्रहण कर लिया।

श्लोक 94 (skanda.4.50.94)

निर्ययौ पावने मार्गे क्रोशत्सु स्वर्गसद्मसु

niryayau pāvane mārge krośatsu svargasadmasu

वह उस पावन मार्ग से बाहर निकल आया, जबकि स्वर्गवासी क्रंदन कर रहे थे।

श्लोक 95 (skanda.4.50.95)

तथा वैकुंठनाथं ते गत्वा प्रोचुः सुधाभुजः॥ निर्जित्य नीयते चक्रिन्सुधा नो जीवितं परम्

tathā vaikuṁṭhanāthaṁ te gatvā procuḥ sudhābhujaḥ nirjitya nīyate cakrinsudhā no jīvitaṁ param

तब उन अमृतभोजी देवताओं ने वैकुंठनाथ के पास जाकर कहा — हे चक्रिन्! हमारा वह अमृत, जो हमारा परम जीवन है, हमें जीतकर ले जाया जा रहा है।

श्लोक 96 (skanda.4.50.96)

इत्याकर्ण्य हरिस्तेभ्योऽभयं दत्त्वा त्वरायुतः॥ कृत्वा युद्धं च सुमहद्विंशार्कघटिकाद्वयम्

ityākarṇya haristebhyo'bhayaṁ dattvā tvarāyutaḥ kṛtvā yuddhaṁ ca sumahadviṁśārkaghaṭikādvayam

यह सुनकर हरि ने उन्हें अभयदान देकर त्वरापूर्वक बीस घड़ी के दुगुने तक अत्यंत महान् युद्ध किया।

श्लोक 97 (skanda.4.50.97)

शुंभदेव्योर्यथासूत गरुडस्तत्र चाधिकः॥ तदा प्रसन्नो भगवान्महायुद्धेन सर्वदः

śuṁbhadevyoryathāsūta garuḍastatra cādhikaḥ tadā prasanno bhagavānmahāyuddhena sarvadaḥ

उस महायुद्ध में गरुड़ ही अधिक प्रबल सिद्ध हुआ; तब उस महायुद्ध से प्रसन्न होकर सर्वदाता भगवान् ने —

श्लोक 98 (skanda.4.50.98)

गत्वा गरुडमाहेदं प्रसन्नोस्मि खगेश्वर॥ वरं वृणीहि भद्रं ते जितवृंदारवृंदक

gatvā garuḍamāhedaṁ prasannosmi khageśvara varaṁ vṛṇīhi bhadraṁ te jitavṛṁdāravṛṁdaka

— गरुड़ के पास जाकर यह कहा — हे खगेश्वर! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, हे देववृंद को जीतने वाले!

श्लोक 99 (skanda.4.50.99)

हसित्वा गरुडः प्राह विश्वरूपं जनार्दनम्॥ अहमेव प्रसन्नोस्मि त्वं प्रार्थय वरद्वयम्

hasitvā garuḍaḥ prāha viśvarūpaṁ janārdanam ahameva prasannosmi tvaṁ prārthaya varadvayam

हँसते हुए गरुड़ ने विश्वरूप जनार्दन से कहा — मैं ही तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम ही मुझसे दो वर माँग लो।

श्लोक 100 (skanda.4.50.100)

ततः कैटभजित्प्राह वैनतेयं मुदान्वितः॥ वृतंवृतं महोदार देहिदेहि वरद्वयम्॥ इति विष्णूदितं श्रुत्वा प्रहसन्नाह पक्षिराट्॥ किं विलंबेन तद्ब्रूहि दत्तं दत्तं वरद्वयम्

tataḥ kaiṭabhajitprāha vainateyaṁ mudānvitaḥ vṛtaṁvṛtaṁ mahodāra dehidehi varadvayam iti viṣṇūditaṁ śrutvā prahasannāha pakṣirāṭ kiṁ vilaṁbena tadbrūhi dattaṁ dattaṁ varadvayam

तब कैटभजित् ने प्रसन्न होकर वैनतेय से कहा — हे महोदार! स्वीकृत है, स्वीकृत है, मुझे दो वर दो-दो। विष्णु की यह बात सुनकर पक्षिराज हँसते हुए बोले — विलंब क्यों? कहो, दिया-दिया, दो वर दिए।

श्लोक 101 (skanda.4.50.101)

अलब्धलाभे संजाते द्यूतादि विजयोदये॥ दातव्यं सुधियापात्रे सदा लाभजयौ क्व वा

alabdhalābhe saṁjāte dyūtādi vijayodaye dātavyaṁ sudhiyāpātre sadā lābhajayau kva vā

द्यूत आदि में जब अप्राप्य लाभ हो जाए अथवा विजय प्राप्त हो, तो बुद्धिमान् को सदा सुपात्र को कुछ देना चाहिए; भला लाभ और विजय कब निश्चित रहते हैं?

श्लोक 102 (skanda.4.50.102)

॥ श्रीविष्णुरुवाच॥ बलवानसि पक्षींद्र तन्मे वाहनतां व्रज॥ एको वरोयं वरद द्वितीयं शृणु काश्यप

śrīviṣṇuruvāca balavānasi pakṣīṁdra tanme vāhanatāṁ vraja eko varoyaṁ varada dvitīyaṁ śṛṇu kāśyapa

श्री विष्णु ने कहा — हे पक्षिराज! तुम बलवान् हो, अतः मेरे वाहन बनो; यह एक वर हुआ, हे वरद! हे काश्यप! दूसरा वर सुनो।

श्लोक 103 (skanda.4.50.103)

दर्शयित्वामृतं प्राज्ञ मातृदास्यविमोक्षकम्॥ द्विजिह्वेभ्यः कुरु तथा द्रागश्नंति न ते यथा

darśayitvāmṛtaṁ prājña mātṛdāsyavimokṣakam dvijihvebhyaḥ kuru tathā drāgaśnaṁti na te yathā

हे प्राज्ञ! माता की दासता-मुक्ति के लिए अमृत दिखाकर, ऐसा करो कि द्विजिह्व सर्प उसे शीघ्र पी न सकें।

श्लोक 104 (skanda.4.50.104)

देया सुधा सुधाभुग्भ्यो द्वितीयोस्तु वरो मम॥ तथेति स प्रतिज्ञाय निर्ययौ पक्षिराड्दिवः

deyā sudhā sudhābhugbhyo dvitīyostu varo mama tatheti sa pratijñāya niryayau pakṣirāḍdivaḥ

अमृत तो अमृतभोगियों को ही दिया जाए — यह मेरा दूसरा वर हो। 'ऐसा ही होगा' कहकर, यह प्रतिज्ञा कर पक्षिराज स्वर्ग से प्रस्थान कर गए।

श्लोक 105 (skanda.4.50.105)

स मातरं विनिर्मोच्य दास्यात्काश्यपनंदनः॥ नागानां पुरतो धृत्वा महामृतकमंडलुम्

sa mātaraṁ vinirmocya dāsyātkāśyapanaṁdanaḥ nāgānāṁ purato dhṛtvā mahāmṛtakamaṁḍalum

काश्यपनंदन गरुड़ ने अपनी माता को दासता से मुक्त करने के लिए, महान् अमृत-कमंडलु को नागों के समक्ष रखकर —

श्लोक 106 (skanda.4.50.106)

अमृतं पातुकामांस्तानित्याचष्ट महामतिः॥ नागाः शुचित्वमासाद्य भोक्तव्यैषा सुधा शुभा

amṛtaṁ pātukāmāṁstānityācaṣṭa mahāmatiḥ nāgāḥ śucitvamāsādya bhoktavyaiṣā sudhā śubhā

— और अमृत पीने के इच्छुक उन नागों से उस महाबुद्धिमान् ने कहा — हे नागो! शुद्धता प्राप्त कर ही यह शुभ अमृत ग्रहण करना चाहिए।

श्लोक 107 (skanda.4.50.107)

नोचेदशुचिभिः स्पृष्टा स्नानादि परिवर्जितैः॥ यास्यत्यदृश्यतामेषा सुधाऽनिमिषरक्षिता

nocedaśucibhiḥ spṛṣṭā snānādi parivarjitaiḥ yāsyatyadṛśyatāmeṣā sudhā'nimiṣarakṣitā

अन्यथा स्नानादि से रहित अशुद्ध जनों द्वारा स्पर्श किए जाने पर, अनिमेष देवताओं द्वारा रक्षित यह अमृत भी अदृश्य हो जाएगा।

श्लोक 108 (skanda.4.50.108)

सामान्यमपि यद्रक्ष्यं स्पृश्यतेऽशुचिभिः क्वचित्॥ हरंति तद्रसं देवास्तच्च तिष्ठति नीरसम्

sāmānyamapi yadrakṣyaṁ spṛśyate'śucibhiḥ kvacit haraṁti tadrasaṁ devāstacca tiṣṭhati nīrasam

सामान्य रक्षणीय वस्तु को भी यदि कभी अशुद्ध जन स्पर्श कर लें, तो देवता उसका रस हर लेते हैं और वह नीरस ही रह जाती है।

श्लोक 109 (skanda.4.50.109)

इत्युक्त्वा सहितो मात्रा वैनतेयो विनिर्ययौ॥ कुशासने च तैरुक्तो धृत्वा पीयूषभाजनम्॥ यावत्स्नातुं गताः सर्पास्तावत्पीयूषभाजनम्॥ आदाय विष्णुना दत्तं देवेभ्य इव जीवितम्

ityuktvā sahito mātrā vainateyo viniryayau kuśāsane ca tairukto dhṛtvā pīyūṣabhājanam yāvatsnātuṁ gatāḥ sarpāstāvatpīyūṣabhājanam ādāya viṣṇunā dattaṁ devebhya iva jīvitam

यह कहकर वैनतेय, माता सहित, उनके कहे अनुसार अमृत-पात्र को कुशासन पर रखकर, वहाँ से चला गया। और जब तक सर्प स्नान करने गए, तब तक उसने विष्णु द्वारा प्रदत्त, मानो देवताओं का जीवन ही हो, उस अमृत-पात्र को उठा लिया —

श्लोक 110 (skanda.4.50.110)

आगत्य भुजगाः स्नात्वा न दृष्ट्वामृतभाजनम्॥ अहो प्रतारिता नीतममृतं चेति चुक्रुशुः

āgatya bhujagāḥ snātvā na dṛṣṭvāmṛtabhājanam aho pratāritā nītamamṛtaṁ ceti cukruśuḥ

— और वहाँ से चला गया। स्नान करके लौटे हुए सर्पों ने अमृत-पात्र को न देखकर चिल्लाकर कहा — अहो! हम ठगे गए, अमृत को ले जाया गया!

श्लोक 111 (skanda.4.50.111)

ततः पर्यलिहन्दर्भान्पीयूषस्पर्शकांक्षिणः॥ आस्तां तावत्सुधा दूरं जिह्वास्तेषां द्विधाभवन्

tataḥ paryalihandarbhānpīyūṣasparśakāṁkṣiṇaḥ āstāṁ tāvatsudhā dūraṁ jihvāsteṣāṁ dvidhābhavan

तब अमृत के स्पर्श की इच्छा से उन्होंने उस कुशासन को ही चाट लिया; अमृत तो दूर ही रहा, उनकी जीभें ही दो भागों में बँट गईं।

श्लोक 112 (skanda.4.50.112)

अन्येप्यन्यायलब्धार्थं ये बुभुक्षंति केवलम्॥ तन्नो परिणतिं गच्छेद्भोक्तुं वातैर्न लभ्यते

anyepyanyāyalabdhārthaṁ ye bubhukṣaṁti kevalam tanno pariṇatiṁ gacchedbhoktuṁ vātairna labhyate

इसी प्रकार अन्य लोग भी जो अन्यायपूर्वक प्राप्त धन का भोग करना चाहते हैं, उनका वह धन कभी परिणति को नहीं पहुँचता; लोलुपों द्वारा उसका भोग कभी संभव नहीं होता।

श्लोक 113 (skanda.4.50.113)

न्यायाध्वस्थेन तार्क्ष्येण सुधा प्राप्तातिदुर्लभा॥ लब्धाप्यन्यायतो नागैर्दृष्टमात्रा क्षणाद्गता

nyāyādhvasthena tārkṣyeṇa sudhā prāptātidurlabhā labdhāpyanyāyato nāgairdṛṣṭamātrā kṣaṇādgatā

न्याय के मार्ग पर चलने वाले तार्क्ष्य ने वह अत्यंत दुर्लभ अमृत प्राप्त किया; परंतु नागों को वह अन्यायपूर्वक प्राप्त होते ही देखते-देखते क्षणभर में हाथ से निकल गया।

श्लोक 114 (skanda.4.50.114)

अथ दास्याद्विनिर्मुक्ता विनतोवाच खेचरम्॥ पुत्र काशीं प्रयास्यामि दास्यपापापनुत्तये

atha dāsyādvinirmuktā vinatovāca khecaram putra kāśīṁ prayāsyāmi dāsyapāpāpanuttaye

तब दासता से मुक्त हुई विनता ने खेचर से कहा — हे पुत्र! अपनी दासता के पाप को दूर करने के लिए मैं काशी जाऊँगी।

श्लोक 115 (skanda.4.50.115)

तावत्पापानि जृंभंते नानाजन्मार्जितान्यपि॥ यावत्काशी न हृत्संस्था पुनर्भवविघातिनी

tāvatpāpāni jṛṁbhaṁte nānājanmārjitānyapi yāvatkāśī na hṛtsaṁsthā punarbhavavighātinī

अनेक जन्मों में संचित पाप भी तभी तक फलते-फूलते हैं, जब तक पुनर्जन्म का नाश करने वाली काशी हृदय में प्रतिष्ठित नहीं होती।

श्लोक 116 (skanda.4.50.116)

काशीस्मरणमात्रेण किं चित्रं यदघं व्रजेत्॥ गर्भवासोपि नश्येत विश्वेशानुग्रहात्परात्

kāśīsmaraṇamātreṇa kiṁ citraṁ yadaghaṁ vrajet garbhavāsopi naśyeta viśveśānugrahātparāt

काशी के स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाए, इसमें क्या आश्चर्य? विश्वेश की परम कृपा से तो गर्भवास भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 117 (skanda.4.50.117)

यत्र विश्वेश्वरः साक्षात्तारापतिविभूषणः॥ तारयेत्तारकद्रोण्या दुस्तराद्भवसागरात्

yatra viśveśvaraḥ sākṣāttārāpativibhūṣaṇaḥ tārayettārakadroṇyā dustarādbhavasāgarāt

जहाँ स्वयं साक्षात् चंद्रभूषण विश्वेश्वर विराजमान हैं, वे तारक-मंत्र रूपी नौका से दुस्तर भवसागर से पार लगाते हैं।

श्लोक 118 (skanda.4.50.118)

विश्वेशानुगृहीतानां विच्छिन्नाखिलकर्मणाम्॥ भवेत्काशीं प्रति मतिर्नेतरेषां कदाचन॥ काशीं प्रति मनो येषां निःशेषक्षालितैनसाम्॥ त एव मानवा लोके सत्यं नृप शवोपरे

viśveśānugṛhītānāṁ vicchinnākhilakarmaṇām bhavetkāśīṁ prati matirnetareṣāṁ kadācana kāśīṁ prati mano yeṣāṁ niḥśeṣakṣālitainasām ta eva mānavā loke satyaṁ nṛpa śavopare

विश्वेश की कृपा से जिनके समस्त कर्म विच्छिन्न हो गए हैं, उन्हीं की बुद्धि काशी की ओर होती है, अन्य किसी की नहीं। जिनका मन काशी की ओर लगा है, उनके पाप निःशेष रूप से धुल जाते हैं; हे राजन्! सत्य तो यह है कि वे ही मनुष्य हैं, चाहे वे शव के समान भी क्यों न पड़े हों।

श्लोक 119 (skanda.4.50.119)

तैरेव कालो विजितस्त एव हि गतैनसः॥ अपुनर्गर्भवासास्ते प्राप्ता वाराणसीह यैः

taireva kālo vijitasta eva hi gatainasaḥ apunargarbhavāsāste prāptā vārāṇasīha yaiḥ

उन्हीं के द्वारा काल भी जीता गया, वे ही पापरहित हैं; जिन्होंने यहाँ वाराणसी को प्राप्त कर लिया, वे पुनः गर्भवास को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 120 (skanda.4.50.120)

श्रेयसां भाजनं चैतन्नृजन्मन मुधा नयेत्॥ देवानामपिदुष्प्राप्यं काशीसंदर्शनादृते

śreyasāṁ bhājanaṁ caitannṛjanmana mudhā nayet devānāmapiduṣprāpyaṁ kāśīsaṁdarśanādṛte

यह मनुष्य-जन्म समस्त कल्याणों का पात्र है, इसे व्यर्थ न बिताएँ — काशी के दर्शन के बिना, जो देवताओं के लिए भी दुष्प्राप्य है।

श्लोक 121 (skanda.4.50.121)

कः कलिः कोथवा कालः किं वा कर्माण्यनेकधा॥ परानंदप्रदं क्षेत्रमविमुक्तं यदीक्षितम्

kaḥ kaliḥ kothavā kālaḥ kiṁ vā karmāṇyanekadhā parānaṁdapradaṁ kṣetramavimuktaṁ yadīkṣitam

यदि परमानंद प्रदान करने वाला अविमुक्त-क्षेत्र देख लिया गया हो, तो फिर कलियुग क्या, काल क्या, अथवा अनेक प्रकार के कर्म ही क्या?

श्लोक 122 (skanda.4.50.122)

ते गर्भवासे तिष्ठंति पुनस्ते गर्भवासिनः॥ ये न गर्भवनच्छेत्रीं सेवंते वरणामसिम्

te garbhavāse tiṣṭhaṁti punaste garbhavāsinaḥ ye na garbhavanacchetrīṁ sevaṁte varaṇāmasim

जो वरणा और असि के मध्य स्थित, गर्भवनरूपी वन को काटने वाली उस भूमि की सेवा नहीं करते, वे बारंबार गर्भवास में ही पड़े रहते हैं।

श्लोक 123 (skanda.4.50.123)

निशम्येति वचः प्राह तार्क्ष्यो नत्वाथ मातरम्॥ अहमप्यागमिष्यामि काशीं द्रष्टुं शिवार्चिताम्

niśamyeti vacaḥ prāha tārkṣyo natvātha mātaram ahamapyāgamiṣyāmi kāśīṁ draṣṭuṁ śivārcitām

यह वचन सुनकर तार्क्ष्य ने माता को प्रणाम कर कहा — मैं भी शिव-अर्चित काशी को देखने आऊँगा।

श्लोक 124 (skanda.4.50.124)

मातुराज्ञामथ प्राप्य जनन्या सह पक्षिराट्॥ क्षणाद्वाराणसीं प्राप मोक्षनिक्षेपभूमिकाम्

māturājñāmatha prāpya jananyā saha pakṣirāṭ kṣaṇādvārāṇasīṁ prāpa mokṣanikṣepabhūmikām

तब माता की आज्ञा पाकर पक्षिराज ने अपनी जननी के साथ क्षणभर में ही उस मोक्ष-निक्षेप-भूमिका वाराणसी को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 125 (skanda.4.50.125)

उभावपि च तेपाते तप उग्रं महामती॥ संस्थाप्य शांभवं लिंगं पतत्त्रींद्रोऽचलेंद्रियः

ubhāvapi ca tepāte tapa ugraṁ mahāmatī saṁsthāpya śāṁbhavaṁ liṁgaṁ patattrīṁdro'caleṁdriyaḥ

वे दोनों महाबुद्धिमान उग्र तपस्या करने लगे; पक्षिराज ने अपनी इंद्रियों को स्थिर कर शांभव लिंग की स्थापना की।

श्लोक 126 (skanda.4.50.126)

नाम्ना खखोल्कमादित्यं संस्थाप्य विनता शुभम्॥ अचिरेणैव कालेन महतस्तपसस्तयोः

nāmnā khakholkamādityaṁ saṁsthāpya vinatā śubham acireṇaiva kālena mahatastapasastayoḥ

विनता ने खखोल्क नामक शुभ आदित्य की स्थापना की; और उन दोनों की उस महान् तपस्या के फलस्वरूप अल्प समय में ही —

श्लोक 127 (skanda.4.50.127)

काश्यां प्रसन्नौ संजातौ देवौ शंकरभास्करौ॥ गरुडस्थापिताल्लिंगादाविरासीदुमापतिः॥ गरुडाय वरान्प्रादात्स बहूनतिदुर्लभान्॥ खगेंद्र मम भक्तोसि तव ज्ञानं भविष्यति

kāśyāṁ prasannau saṁjātau devau śaṁkarabhāskarau garuḍasthāpitālliṁgādāvirāsīdumāpatiḥ garuḍāya varānprādātsa bahūnatidurlabhān khageṁdra mama bhaktosi tava jñānaṁ bhaviṣyati

— काशी में शंकर और भास्कर दोनों ही देव उन पर प्रसन्न हुए। गरुड़ द्वारा स्थापित लिंग से उमापति स्वयं प्रकट हुए; और उन्होंने गरुड़ को अनेक अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान किए — हे खगेंद्र! तुम मेरे भक्त हो, तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।

श्लोक 128 (skanda.4.50.128)

वेत्स्यसि त्वं रहस्यं मे यन्न ज्ञातं सुरैरपि॥ त्वयैतत्स्थापितं लिंगं गरुडेश्वरसंज्ञितम्

vetsyasi tvaṁ rahasyaṁ me yanna jñātaṁ surairapi tvayaitatsthāpitaṁ liṁgaṁ garuḍeśvarasaṁjñitam

तुम मेरा वह रहस्य जान सकोगे, जिसे देवता भी नहीं जान सके। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह लिंग 'गरुडेश्वर' नाम से प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 129 (skanda.4.50.129)

परमज्ञानदं पुंसां दृष्टं स्पृष्टं समर्चितम् ॥ अन्यच्च शृणु पक्षींद्र हितं ते वच्मि सांप्रतम्

paramajñānadaṁ puṁsāṁ dṛṣṭaṁ spṛṣṭaṁ samarcitam anyacca śṛṇu pakṣīṁdra hitaṁ te vacmi sāṁpratam

यह देखे जाने, स्पर्श किए जाने तथा भलीभाँति पूजित होने पर मनुष्यों को परम ज्ञान प्रदान करता है। हे पक्षींद्र! और भी सुनो, मैं अब तुम्हारे हित की बात कहता हूँ।

श्लोक 130 (skanda.4.50.130)

असावहं स वै विष्णुर्मास्तु ते भेददृक्च नौ॥ एवं तस्यैव पक्षींद्र दैत्येंद्र बलहारिण

asāvahaṁ sa vai viṣṇurmāstu te bhedadṛkca nau evaṁ tasyaiva pakṣīṁdra daityeṁdra balahāriṇa

वह विष्णु मैं ही हूँ और मैं ही वह हूँ; हम दोनों में भेद-दृष्टि तुम्हें न हो। हे पक्षींद्र! हे दैत्येंद्र के बल का हरण करने वाले!

श्लोक 131 (skanda.4.50.131)

प्राप्य सत्पत्रतां पत्रिंस्त्वमप्यर्च्यो भविष्यसि॥ इति दत्त्वा वरं शंभुः स्वभक्ताय गरुत्मते

prāpya satpatratāṁ patriṁstvamapyarcyo bhaviṣyasi iti dattvā varaṁ śaṁbhuḥ svabhaktāya garutmate

— हे पत्रिन्! सत्पत्रता को प्राप्त कर तुम भी पूज्य बनोगे। इस प्रकार अपने भक्त गरुड़ को वर देकर शंभु —

श्लोक 132 (skanda.4.50.132)

तत्रैवांतर्हितो जातो गरुडोपि हरिं ययौ॥ हरे रथत्वं संप्राप्य सोपि पूज्योऽभवद्भुवि

tatraivāṁtarhito jāto garuḍopi hariṁ yayau hare rathatvaṁ saṁprāpya sopi pūjyo'bhavadbhuvi

वहीं अंतर्धान हो गए; और गरुड़ भी हरि के पास चले गए, तथा हरि का वाहन बनकर वे भी पृथ्वी पर पूज्य बन गए।

श्लोक 133 (skanda.4.50.133)

तपस्यंतीमथालोक्य कदाचिद्विनतां प्रभुः॥ शिवस्यैव परामूर्तिः खखोल्को नाम भास्करः

tapasyaṁtīmathālokya kadācidvinatāṁ prabhuḥ śivasyaiva parāmūrtiḥ khakholko nāma bhāskaraḥ

तत्पश्चात् एक बार तपस्या करती हुई विनता को देखकर, शिव की ही परम मूर्तिस्वरूप, खखोल्क नामक भास्कर प्रभु ने —

श्लोक 134 (skanda.4.50.134)

दत्त्वा वरं च पापघ्नं शिवज्ञानसमन्वितम्॥ काशीवासिजनानेक भवपापक्षयंकरः

dattvā varaṁ ca pāpaghnaṁ śivajñānasamanvitam kāśīvāsijanāneka bhavapāpakṣayaṁkaraḥ

— शिवज्ञान से युक्त, पापनाशक वरदान दिया; और काशी में निवास करने वाले अनेक जनों के भव-पाप का नाशक बने।

श्लोक 135 (skanda.4.50.135)

विनतादित्य इत्याख्यः खखोल्कस्तत्र संस्थितः॥ इत्थं खखोल्क आदित्यः काशीविघ्नतमोहरः

vinatāditya ityākhyaḥ khakholkastatra saṁsthitaḥ itthaṁ khakholka ādityaḥ kāśīvighnatamoharaḥ

विनतादित्य नाम से वह खखोल्क वहाँ स्थित हैं। इस प्रकार खखोल्क आदित्य काशी के विघ्नरूपी अंधकार को हरने वाले हैं।

श्लोक 136 (skanda.4.50.136)

तस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ काश्यां पैशंगिले तीर्थे खखोल्कस्य विलोकनात्॥ नरश्चिंतितमाप्नोति नीरोगो जायते क्षणात्॥ नरः श्रुत्वैतदाख्यानं खखोल्कादित्यसंभवम्॥ गरुडेशेन सहितं सर्वपापैः प्रमुच्यते

tasya darśanamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate kāśyāṁ paiśaṁgile tīrthe khakholkasya vilokanāt naraściṁtitamāpnoti nīrogo jāyate kṣaṇāt naraḥ śrutvaitadākhyānaṁ khakholkādityasaṁbhavam garuḍeśena sahitaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

उनके दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। काशी में पैशंगिल तीर्थ में खखोल्क का दर्शन कर मनुष्य अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करता है और क्षणभर में नीरोग हो जाता है। खखोल्कादित्य की उत्पत्ति से संबंधित तथा गरुडेश-सहित इस आख्यान को सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

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