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काशी खण्ड · अध्याय 52

दशाश्वमेध महात्म्य: ब्रह्मा के दश अश्वमेध यज्ञ

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

श्लोक 1 (skanda.4.52.1)

॥स्कंद उवाच॥ गभस्तिमालिनिगते काशीं त्रैलोक्यमोहिनीम् ॥ पुनश्चिंतामवापोच्चैर्मंदरस्थो मुने हरः

||skaṁda uvāca|| gabhastimālinigate kāśīṁ trailokyamohinīm || punaściṁtāmavāpoccairmaṁdarastho mune haraḥ

स्कन्द ने कहा - जब सूर्यरूप गभस्तिमालिन् वहाँ से गए, तब मन्दराचल पर स्थित हर पुनः त्रैलोक्य-मोहिनी काशी के विषय में चिन्तामग्न हो गए, हे मुने।

श्लोक 2 (skanda.4.52.2)

नाद्याप्यायांति योगिन्यो नाद्याप्यायाति तिग्मगुः ॥ प्रवृत्तिरपि मे काश्याश्चित्रमत्यंत दुर्लभा

nādyāpyāyāṁti yoginyo nādyāpyāyāti tigmaguḥ || pravṛttirapi me kāśyāścitramatyaṁta durlabhā

'अभी तक न योगिनियाँ लौटीं, न अभी तक तीक्ष्णकिरण सूर्य ही लौटे; काशी का समाचार पाना भी मेरे लिए अत्यन्त दुर्लभ हो गया है, यह आश्चर्य है।'

श्लोक 3 (skanda.4.52.3)

किमत्र चित्रं यत्काशी मदीयमपिमानसम् ॥ निश्चलं चंचलयति गणना केतरेसुरे

kimatra citraṁ yatkāśī madīyamapimānasam || niścalaṁ caṁcalayati gaṇanā ketaresure

'इसमें क्या आश्चर्य कि काशी मेरे इस अचल मन को भी चंचल कर देती है - फिर अन्य देवताओं की तो बात ही क्या।'

श्लोक 4 (skanda.4.52.4)

अधाक्षिपमहं कामं त्रिजगज्जित्त्वरंदृशा ॥ अहो काश्यभिलाषोत्र मामेव दुनुयात्तराम्

adhākṣipamahaṁ kāmaṁ trijagajjittvaraṁdṛśā || aho kāśyabhilāṣotra māmeva dunuyāttarām

'मैंने तो एक ही दृष्टि से त्रिलोक-विजयी कामदेव को भस्म कर डाला था; किन्तु अहो, यहाँ काशी की अभिलाषा मुझे ही सर्वाधिक व्यथित कर रही है।'

श्लोक 5 (skanda.4.52.5)

काशीप्रवृत्तिमन्वेष्टुं कं वा प्रहिणुयामितः ॥ ज्ञातुं क एव निपुणो यतः स चतुराननः

kāśīpravṛttimanveṣṭuṁ kaṁ vā prahiṇuyāmitaḥ || jñātuṁ ka eva nipuṇo yataḥ sa caturānanaḥ

'काशी का समाचार जानने के लिए मैं यहाँ से किसे भेजूँ? जानने में वही तो निपुण है, जो चतुरानन ब्रह्मा हैं।'

श्लोक 6 (skanda.4.52.6)

इत्याहूय विधातारं बहुमानपुरःसरम् ॥ तत्रोपवेश्य श्रीकंठः प्रोवाच चतुराननम्

ityāhūya vidhātāraṁ bahumānapuraḥsaram || tatropaveśya śrīkaṁṭhaḥ provāca caturānanam

इस प्रकार विधाता को बड़े सम्मान के साथ बुलाकर, वहाँ बिठाकर श्रीकण्ठ ने चतुरानन से कहा -

श्लोक 7 (skanda.4.52.7)

योगिन्यः प्रेषिताः पूर्वं प्रेषितोथ सहस्रगुः ॥ नाद्यापि ते निवर्तंते काश्याः कलशसंभव

yoginyaḥ preṣitāḥ pūrvaṁ preṣitotha sahasraguḥ || nādyāpi te nivartaṁte kāśyāḥ kalaśasaṁbhava

हे कलशसम्भव! पहले योगिनियाँ भेजी गईं, फिर सहस्ररश्मि सूर्य भेजे गए - काशी से अभी तक वे नहीं लौटे।

श्लोक 8 (skanda.4.52.8)

सा समुत्सुकयेत्काशी लोकेश मम मानसम् ॥ प्राकृतस्य जनस्येव चंचलाक्षीव काचन

sā samutsukayetkāśī lokeśa mama mānasam || prākṛtasya janasyeva caṁcalākṣīva kācana

'हे लोकेश! वह काशी मेरे मन को वैसे ही उत्सुक कर देती है, जैसे किसी साधारण पुरुष के मन को कोई चंचलनयना स्त्री।'

श्लोक 9 (skanda.4.52.9)

मंदरेत्र रतिर्मे न भृशं सुंदरकंदरे ॥ अनच्छतुच्छपानीये नक्रस्येवाल्पपल्वले

maṁdaretra ratirme na bhṛśaṁ suṁdarakaṁdare || anacchatucchapānīye nakrasyevālpapalvale

'यहाँ मन्दर के सुन्दर कन्दरा में भी मुझे रति नहीं है, जैसे किसी छोटे-से उथले, गंदले जलाशय में मगर को रति नहीं होती।'

श्लोक 10 (skanda.4.52.10)

ना बाधिष्ट तथा मां स तापो हालाहलोद्भवः ॥ काशीविरहजन्मात्र यथा मामतिबाधते

nā bādhiṣṭa tathā māṁ sa tāpo hālāhalodbhavaḥ || kāśīvirahajanmātra yathā māmatibādhate

'वह हलाहल-विष से उत्पन्न सन्ताप भी मुझे उतना नहीं सताता, जितना यहाँ काशी-वियोग से उत्पन्न सन्ताप मुझे सताता है।'

श्लोक 11 (skanda.4.52.11)

शीतरश्मिः शिरःस्थोपि वर्षन्पीयूषसीकरैः ॥ काशीविश्लेषजं तापं नाहो गमयितुं प्रभुः

śītaraśmiḥ śiraḥsthopi varṣanpīyūṣasīkaraiḥ || kāśīviśleṣajaṁ tāpaṁ nāho gamayituṁ prabhuḥ

'मेरे मस्तक पर स्थित शीतल किरणों वाला चन्द्रमा भी अमृत की बूँदें बरसाते हुए भी काशी-वियोगजन्य सन्ताप को दूर करने में समर्थ नहीं है, अहो!'

श्लोक 12 (skanda.4.52.12)

विधे विधेहि मे कार्यमार्य धुर्य महामते ॥ याहि काशीमितस्तूर्णं यतस्व च ममेहिते

vidhe vidhehi me kāryamārya dhurya mahāmate || yāhi kāśīmitastūrṇaṁ yatasva ca mamehite

'हे विधे! हे आर्य! हे धुरन्धर महामते! मेरा यह कार्य करो - यहाँ से शीघ्र काशी जाओ और मेरे प्रयोजन के लिए प्रयत्न करो।'

श्लोक 13 (skanda.4.52.13)

ब्रह्मंस्त्वमेव तद्वेत्सि काशी त्यजनकारणम् ॥ मंदोपि न त्यजेत्काशीं किमु यो वेत्ति किंचन

brahmaṁstvameva tadvetsi kāśī tyajanakāraṇam || maṁdopi na tyajetkāśīṁ kimu yo vetti kiṁcana

'हे ब्रह्मन्! तुम स्वयं ही काशी-त्याग का कारण जानते हो; मन्दबुद्धि भी काशी को नहीं त्यागता, तो जो कुछ जानता है, उसकी तो बात ही क्या?'

श्लोक 14 (skanda.4.52.14)

अद्यैव किं न गच्छेयं काशीं ब्रह्मन्स्वमायया ॥ दिवोदासं स्वधर्मस्थं न तूल्लंघितुमुत्सहे

adyaiva kiṁ na gaccheyaṁ kāśīṁ brahmansvamāyayā || divodāsaṁ svadharmasthaṁ na tūllaṁghitumutsahe

'हे ब्रह्मन्! मैं स्वयं अपनी माया से आज ही काशी क्यों न चला जाऊँ? किन्तु अपने धर्म में स्थित दिवोदास का उल्लंघन करने का मैं साहस नहीं करता।'

श्लोक 15 (skanda.4.52.15)

विधे सर्वविधेयानि त्वमेव विदधासि यत् ॥ इति चेति च वक्तव्यं त्वय्यपार्थमतोखिलम्

vidhe sarvavidheyāni tvameva vidadhāsi yat || iti ceti ca vaktavyaṁ tvayyapārthamatokhilam

'हे विधे! चूँकि तुम स्वयं ही समस्त विधेय कार्यों को सम्पन्न करने वाले हो, अतः तुमसे यह-यह कहना भी व्यर्थ ही है।'

श्लोक 16 (skanda.4.52.16)

अरिष्टं गच्छ पंथास्ते शुभोदर्को भवत्वलम्॥ आदायाज्ञां विधि मूर्ध्नि ययौ वाराणसीं मुदा

ariṣṭaṁ gaccha paṁthāste śubhodarko bhavatvalam|| ādāyājñāṁ vidhi mūrdhni yayau vārāṇasīṁ mudā

'अरिष्ट को नष्ट करता हुआ जाओ, तुम्हारा मार्ग शुभ फलदायी हो, बस इतना ही काफी है।' यह आज्ञा मस्तक पर धारण कर विधाता प्रसन्नतापूर्वक वाराणसी को चले गए।

श्लोक 17 (skanda.4.52.17)

सितहंसरथस्तूर्णं प्राप्य वाराणसीं पुरीम् ॥ कृतकृत्यमिवात्मानममन्यत तदात्मभूः

sitahaṁsarathastūrṇaṁ prāpya vārāṇasīṁ purīm || kṛtakṛtyamivātmānamamanyata tadātmabhūḥ

श्वेत हंसों वाले रथ से शीघ्र वाराणसी नगरी पहुँचकर स्वयंभू ने मानो अपने को कृतकृत्य ही मान लिया।

श्लोक 18 (skanda.4.52.18)

हंसयानफलं मेद्य जातं काशीसमागमे ॥ काशी प्राप्तौ यतः प्रोक्ता अंतरायाः पदेपदे

haṁsayānaphalaṁ medya jātaṁ kāśīsamāgame || kāśī prāptau yataḥ proktā aṁtarāyāḥ padepade

'आज मेरे हंसयान का फल सफल हुआ, जो काशी की प्राप्ति हुई; क्योंकि काशी की प्राप्ति में तो पग-पग पर विघ्न बताए गए हैं।'

श्लोक 19 (skanda.4.52.19)

दृशि धातुरभूद्य मदृशो प्राप्य सान्वयः ॥ स्पष्टं दृष्टिपथं प्राप्ता यदेषाऽऽनंदवाटिका

dṛśi dhāturabhūdya madṛśo prāpya sānvayaḥ || spaṣṭaṁ dṛṣṭipathaṁ prāptā yadeṣā''naṁdavāṭikā

'मेरी दृष्टि में जो 'दृश्' धातु थी, वह भी आज इस स्थान को पाकर सार्थक हो गई; क्योंकि यह आनन्दवाटिका अब स्पष्ट रूप से मेरी दृष्टि के पथ में आ गई है।'

श्लोक 20 (skanda.4.52.20)

स्वयं सिंचति या मद्भिः स्वाभिः स्वर्गतरंगिणी ॥ यत्रानंदमया वृक्षा यत्रानंदमया जनाः

svayaṁ siṁcati yā madbhiḥ svābhiḥ svargataraṁgiṇī || yatrānaṁdamayā vṛkṣā yatrānaṁdamayā janāḥ

'यह वह स्थान है जिसे स्वर्गगंगा स्वयं अपने आनन्दमय जल से सींचती है, जहाँ वृक्ष भी आनन्दमय हैं और जन भी आनन्दमय हैं।'

श्लोक 21 (skanda.4.52.21)

निर्विशंति सदा काश्यां फलान्यानंदवंत्यपि॥ सदैवानंदभूः काशी सदैवानंददः शिवः

nirviśaṁti sadā kāśyāṁ phalānyānaṁdavaṁtyapi|| sadaivānaṁdabhūḥ kāśī sadaivānaṁdadaḥ śivaḥ

'काशी में सदा आनन्दमय फल ही भोगे जाते हैं; काशी सदैव आनन्द की भूमि है, और शिव वहाँ सदैव आनन्द देने वाले हैं।'

श्लोक 22 (skanda.4.52.22)

आनंदरूपा जायंते तेन काश्यां हि जंतवः ॥ चरणौ चरितुं वित्तस्तावेव कृतिनामिह

ānaṁdarūpā jāyaṁte tena kāśyāṁ hi jaṁtavaḥ || caraṇau carituṁ vittastāveva kṛtināmiha

'इसीलिए काशी में प्राणी आनन्दस्वरूप ही जन्म लेते हैं; यहाँ वे ही दोनों चरण सफल गिने जाते हैं, जो पुण्यशील पुरुषों के भ्रमण के लिए हों।'

श्लोक 23 (skanda.4.52.23)

चरणौ विचरेतांयौ विश्वभर्तृ पुरी भुवि ॥ तावेव श्रवणौ श्रोतुं संविदा ते बहुश्रुतौ

caraṇau vicaretāṁyau viśvabhartṛ purī bhuvi || tāveva śravaṇau śrotuṁ saṁvidā te bahuśrutau

'वे ही दोनों चरण सार्थक हैं जो विश्वभर्ता की इस नगरी में भूमि पर विचरण करें; वे ही श्रोत्र सुनने योग्य हैं, जो सुविज्ञ होकर बहुश्रुत बनें।'

श्लोक 24 (skanda.4.52.24)

इह श्रुतिमतां पुंसां याभ्यां काशी श्रुता सकृत् ॥ तदेव मनुते सर्वं मनस्त्विह मनस्विनाम

iha śrutimatāṁ puṁsāṁ yābhyāṁ kāśī śrutā sakṛt || tadeva manute sarvaṁ manastviha manasvināma

'यहाँ श्रुतिवान् पुरुषों में जिन कानों से काशी एक बार भी सुनी गई है, यहाँ मनस्वी पुरुषों का मन उसी को सब कुछ मानता है।'

श्लोक 25 (skanda.4.52.25)

येनानुमन्यते चैषा काशी सर्वप्रमाणभूः ॥ बुद्धिर्बुध्यति सा सर्वमिह बुद्धिमतां सताम् ॥ ययैतद्धूर्जटेर्धाम धृतं स्व विषयीकृतम्

yenānumanyate caiṣā kāśī sarvapramāṇabhūḥ || buddhirbudhyati sā sarvamiha buddhimatāṁ satām || yayaitaddhūrjaṭerdhāma dhṛtaṁ sva viṣayīkṛtam

'जिस बुद्धि से यह काशी, जो समस्त प्रमाणों की भूमि है, स्वीकार की जाती है, वही बुद्धि यहाँ बुद्धिमान सत्पुरुषों में सब कुछ जानती है - जिससे धूर्जटि का यह धाम ग्रहण कर अपना विषय बनाया जाता है।'

श्लोक 26 (skanda.4.52.26)

वरं तृणानि धान्यानि तानि वात्याहतान्यपि ॥ काश्यां यान्या पतंतीह न जनाः काश्यदर्शनाः

varaṁ tṛṇāni dhānyāni tāni vātyāhatānyapi || kāśyāṁ yānyā pataṁtīha na janāḥ kāśyadarśanāḥ

'श्रेष्ठ तो वे तिनके और अन्न के दाने भी हैं, जो आँधी से उड़कर काशी में यहाँ गिर पड़ते हैं, उन मनुष्यों से जो काशी को कभी नहीं देखते।'

श्लोक 27 (skanda.4.52.27)

अद्य मे सफलं चायुः परार्धद्वय संमितम् ॥ यस्मिन्सति मया प्रापि दुष्प्रापा काशिका पुरी

adya me saphalaṁ cāyuḥ parārdhadvaya saṁmitam || yasminsati mayā prāpi duṣprāpā kāśikā purī

'आज मेरी आयु, जो दो परार्धों के बराबर मानी जाती है, सफल हुई; क्योंकि उसके रहते ही मैंने अत्यन्त दुष्प्राप्य काशी नगरी को प्राप्त किया है।'

श्लोक 28 (skanda.4.52.28)

अहो मे धर्मसंपत्तिरहोमे भाग्यगौरवम् ॥ यदद्राक्षिषमद्याहं काशीं सुचिर चिंतिताम्

aho me dharmasaṁpattirahome bhāgyagauravam || yadadrākṣiṣamadyāhaṁ kāśīṁ sucira ciṁtitām

'अहो, यह मेरी धर्म-सम्पत्ति है, अहो यह मेरे भाग्य की गरिमा है, कि आज मैंने चिरकाल से चिन्तित काशी का दर्शन कर लिया!'

श्लोक 29 (skanda.4.52.29)

अद्य मे स्वतपो वृक्षो मनोरथफलैरलम् ॥ शिवभक्त्यंबुना सिक्तः फलितोति बृहत्तरैः

adya me svatapo vṛkṣo manorathaphalairalam || śivabhaktyaṁbunā siktaḥ phalitoti bṛhattaraiḥ

'आज मेरी तपस्या का वृक्ष, शिवभक्तिरूपी जल से सिंचित होकर, बड़े-बड़े मनोरथरूपी फलों से लद गया है।'

श्लोक 30 (skanda.4.52.30)

मया व्यधायि बहुधा सृष्टिः सृष्टिं वितन्वता ॥ परमन्यादृशी काशी स्वयं विश्वेश निर्मितिः

mayā vyadhāyi bahudhā sṛṣṭiḥ sṛṣṭiṁ vitanvatā || paramanyādṛśī kāśī svayaṁ viśveśa nirmitiḥ

'सृष्टि रचते हुए मैंने अनेक प्रकार की सृष्टियाँ रची हैं, किन्तु काशी तो सर्वथा भिन्न ही है - वह तो स्वयं विश्वेश की रचना है।'

श्लोक 31 (skanda.4.52.31)

इति हृष्टमना वेधा दृष्ट्वा वाराणसीं पुरीम् ॥ वृद्धब्राह्मणरूपेण राजानं च ददर्श ह

iti hṛṣṭamanā vedhā dṛṣṭvā vārāṇasīṁ purīm || vṛddhabrāhmaṇarūpeṇa rājānaṁ ca dadarśa ha

इस प्रकार प्रसन्नमन विधाता वाराणसी नगरी को देखकर, वृद्ध ब्राह्मण के रूप में राजा को भी देख पाए।

श्लोक 32 (skanda.4.52.32)

जलार्द्राक्षतपाणिश्च स्वस्त्युक्त्वा पृथिवीभुजे ॥ कृतप्रणामो राज्ञाथ भेजे तद्दत्तमासनम्

jalārdrākṣatapāṇiśca svastyuktvā pṛthivībhuje || kṛtapraṇāmo rājñātha bheje taddattamāsanam

जल से भीगे हुए अक्षतों को हाथ में लेकर पृथ्वीपति को आशीर्वाद देकर, राजा द्वारा किए गए प्रणाम को स्वीकार कर, उन्होंने उनका दिया हुआ आसन ग्रहण किया।

श्लोक 33 (skanda.4.52.33)

कृतमानो नृपतिना सोभ्युत्थानासनादिभिः ॥ विप्रो व्यजिज्ञपद्भूपं पृष्टागमनकारणम्

kṛtamāno nṛpatinā sobhyutthānāsanādibhiḥ || vipro vyajijñapadbhūpaṁ pṛṣṭāgamanakāraṇam

राजा द्वारा उठकर स्वागत, आसनादि से सम्मानित होकर, ब्राह्मण ने पूछे जाने पर राजा को अपने आगमन का कारण बताया।

श्लोक 34 (skanda.4.52.34)

॥ब्राह्मण उवाच॥ भूपाल बहुकालीनोस्म्यहमत्र चिरंतनः ॥ त्वं तु मां नैव जानासि जाने त्वां हि रिपुंजयम्

||brāhmaṇa uvāca|| bhūpāla bahukālīnosmyahamatra ciraṁtanaḥ || tvaṁ tu māṁ naiva jānāsi jāne tvāṁ hi ripuṁjayam

ब्राह्मण ने कहा - 'हे भूपाल! मैं यहाँ बहुत काल से, चिरन्तन काल से रहता आया हूँ; तुम मुझे नहीं जानते, किन्तु मैं तुम्हें रिपुंजय के रूप में जानता हूँ।'

श्लोक 35 (skanda.4.52.35)

परःशता मया दृष्टा राजानो भूरिदक्षिणाः ॥ विजितानेकसंग्रामा यायजूका जितेंद्रियाः

paraḥśatā mayā dṛṣṭā rājāno bhūridakṣiṇāḥ || vijitānekasaṁgrāmā yāyajūkā jiteṁdriyāḥ

'मैंने सैकड़ों से भी अधिक राजाओं को देखा है - उदार दक्षिणा देने वाले, अनेक संग्रामों के विजेता, यज्ञशील, जितेन्द्रिय।'

श्लोक 36 (skanda.4.52.36)

विनिष्कृतारिषड्वर्गाः सुशीलाः सत्त्वशालिनः ॥ श्रुतस्यपारदृश्वानो राजनीतिविचक्षणाः

viniṣkṛtāriṣaḍvargāḥ suśīlāḥ sattvaśālinaḥ || śrutasyapāradṛśvāno rājanītivicakṣaṇāḥ

'शत्रुभूत छह विकारों को दूर करने वाले, सुशील, सत्त्वगुण से सम्पन्न, शास्त्रों के पारदर्शी, राजनीति में निपुण।'

श्लोक 37 (skanda.4.52.37)

दयादाक्षिण्यनिपुणाः सत्यव्रतपरायणाः ॥ क्षमया क्षमयातुल्या गांभीर्यजितसागराः

dayādākṣiṇyanipuṇāḥ satyavrataparāyaṇāḥ || kṣamayā kṣamayātulyā gāṁbhīryajitasāgarāḥ

'दया और शिष्टाचार में निपुण, सत्यव्रत में तत्पर, क्षमा में पृथ्वी के समान, गाम्भीर्य में समुद्र को भी जीतने वाले।'

श्लोक 38 (skanda.4.52.38)

जितरोषरयाः शूराः सौम्यसौंदर्यभूमयः ॥ इत्यादि गुणसंपन्नाः सुसंचितयशोधनाः

jitaroṣarayāḥ śūrāḥ saumyasauṁdaryabhūmayaḥ || ityādi guṇasaṁpannāḥ susaṁcitayaśodhanāḥ

'क्रोध के वेग पर विजय पाने वाले शूरवीर, सौम्य सौन्दर्य की भूमि - ऐसे गुणों से सम्पन्न, सुसंचित यशधन वाले राजा मैंने देखे हैं।'

श्लोक 39 (skanda.4.52.39)

परं द्वित्राः पवित्रा ये राजर्षे तव सद्गुणाः ॥ तेष्वेषु राजसु मम प्रायशो न दृशं गताः

paraṁ dvitrāḥ pavitrā ye rājarṣe tava sadguṇāḥ || teṣveṣu rājasu mama prāyaśo na dṛśaṁ gatāḥ

'किन्तु, हे राजर्षे! तुम्हारे जो दो-तीन पवित्र सद्गुण हैं, वे उन राजाओं में प्रायः मेरी दृष्टि में नहीं आए।'

श्लोक 40 (skanda.4.52.40)

प्रजानिजकुटुंबस्त्वं त्वं तु भूदेवदैवतः ॥ महातपः सहायस्त्वं पथानान्ये तथा नृपाः

prajānijakuṭuṁbastvaṁ tvaṁ tu bhūdevadaivataḥ || mahātapaḥ sahāyastvaṁ pathānānye tathā nṛpāḥ

'तुम प्रजा को अपना कुटुम्ब मानते हो; तुम ब्राह्मणों के भी देवता हो; तुम महातपस्वियों के सहायक हो - अन्य राजा ऐसे मार्ग पर नहीं चलते।'

श्लोक 41 (skanda.4.52.41)

धन्यो मान्योसि च सतां पूजनीयोसि सद्गुणैः ॥ देवा अपि दिवोदास त्वत्त्रासान्न विमार्गगाः

dhanyo mānyosi ca satāṁ pūjanīyosi sadguṇaiḥ || devā api divodāsa tvattrāsānna vimārgagāḥ

'तुम धन्य हो, सत्पुरुषों द्वारा माननीय हो, सद्गुणों के कारण पूजनीय हो; हे दिवोदास! तुम्हारे भय से देवता भी कुमार्गगामी नहीं होते।'

श्लोक 42 (skanda.4.52.42)

किं नः स्तुत्या तव नृप द्विजानामस्पृहावताम् ॥ किं कुर्मस्त्वद्गुणग्रामाः स्तावकान्नः प्रकुर्वते

kiṁ naḥ stutyā tava nṛpa dvijānāmaspṛhāvatām || kiṁ kurmastvadguṇagrāmāḥ stāvakānnaḥ prakurvate

'हे राजन्! हम निःस्पृह ब्राह्मणों को तुम्हारी स्तुति से क्या प्रयोजन? किन्तु क्या करें, तुम्हारे गुणसमूह ही हमें स्तुतिकर्ता बना देते हैं।'

श्लोक 43 (skanda.4.52.43)

गोष्ठी तिष्ठत्वियं तावत्प्रस्तुतं स्तौमि सांप्रतम् ॥ यष्टुकामोस्म्यहं राजंस्त्वां सहायमतो वृणे

goṣṭhī tiṣṭhatviyaṁ tāvatprastutaṁ staumi sāṁpratam || yaṣṭukāmosmyahaṁ rājaṁstvāṁ sahāyamato vṛṇe

'यह बातचीत अभी यहीं रहने दो, अब मैं प्रस्तुत विषय कहता हूँ: हे राजन्! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, इसलिए तुम्हें अपना सहायक चुनता हूँ।'

श्लोक 44 (skanda.4.52.44)

त्वया राजन्वती चैषाऽवनिः सर्वर्धिभाजनम् ॥ अहं चास्तिधनो राजन्न्यायोपात्तमहाधनः

tvayā rājanvatī caiṣā'vaniḥ sarvardhibhājanam || ahaṁ cāstidhano rājannyāyopāttamahādhanaḥ

'तुम्हारे कारण ही यह पृथ्वी सुराजित और सर्व समृद्धियों का आगार है; और, हे राजन्! मेरे पास भी न्यायोपार्जित बड़ा धन है।'

श्लोक 45 (skanda.4.52.45)

इयं च राजधानी ते कर्मभूमावनुत्तमा ॥ यस्यां कृतानां कार्याणां संवर्तेपि न संक्षयः

iyaṁ ca rājadhānī te karmabhūmāvanuttamā || yasyāṁ kṛtānāṁ kāryāṇāṁ saṁvartepi na saṁkṣayaḥ

'और यह तुम्हारी राजधानी कर्मभूमियों में सर्वश्रेष्ठ है, जहाँ किए गए कार्यों का क्षय प्रलयकाल में भी नहीं होता।'

श्लोक 46 (skanda.4.52.46)

संचितं यद्धनं पुंभिर्नयसन्मार्गगामिभिः ॥ तत्काश्यां विनियुज्येत क्लेशायेतरथा भवेत्

saṁcitaṁ yaddhanaṁ puṁbhirnayasanmārgagāmibhiḥ || tatkāśyāṁ viniyujyeta kleśāyetarathā bhavet

'न्यायमार्गगामी पुरुषों द्वारा संचित जो धन है, वह काशी में ही लगाया जाना चाहिए, अन्यथा वह क्लेश का कारण ही बनता है।'

श्लोक 47 (skanda.4.52.47)

महिमानं परं काश्याः कोपि वेद न भूपते ॥ ऋते त्रिनयनाच्छंभोः सर्वज्ञानप्रदायिनः

mahimānaṁ paraṁ kāśyāḥ kopi veda na bhūpate || ṛte trinayanācchaṁbhoḥ sarvajñānapradāyinaḥ

'हे भूपते! काशी की परम महिमा को त्रिनेत्र शम्भु के अतिरिक्त, जो सर्वज्ञान के प्रदाता हैं, कोई नहीं जानता।'

श्लोक 48 (skanda.4.52.48)

मन्ये धन्यतरोसि त्वं बहुजन्मशतार्जितैः ॥ सुकृतैः पासि यत्काशीं विश्वभर्तुः परां तनुम्

manye dhanyatarosi tvaṁ bahujanmaśatārjitaiḥ || sukṛtaiḥ pāsi yatkāśīṁ viśvabhartuḥ parāṁ tanum

'मैं तुम्हें अत्यन्त धन्य मानता हूँ, कि सैकड़ों जन्मों के अर्जित सुकृतों से तुम विश्वभर्ता की इस परम देह-रूप काशी की रक्षा करते हो।'

श्लोक 49 (skanda.4.52.49)

काशी त्रिजगतीसारस्त्रिवेदी सार एव वै ॥ त्रिवर्गोत्तरसारश्च निर्णीतेति महर्षिभिः

kāśī trijagatīsārastrivedī sāra eva vai || trivargottarasāraśca nirṇīteti maharṣibhiḥ

'काशी त्रिलोक का सार है, त्रिवेदी का भी सार है; महर्षियों ने इसे त्रिवर्ग से भी उत्कृष्ट सार निश्चित किया है।'

श्लोक 50 (skanda.4.52.50)

विश्वेशानुग्रहेणैव त्वयैषा पाल्यते पुरी ॥ एकस्याप्यवनात्काश्यां त्रैलोक्यमवितं भवेत्

viśveśānugraheṇaiva tvayaiṣā pālyate purī || ekasyāpyavanātkāśyāṁ trailokyamavitaṁ bhavet

'विश्वेश की कृपा से ही यह नगरी तुम्हारे द्वारा पालित होती है; और काशी की रक्षा मात्र से त्रिलोक की रक्षा हो जाती है।'

श्लोक 51 (skanda.4.52.51)

अन्यच्च ते हितं वच्मि यदि ते रोचतेऽनघ ॥ प्रीणनीयः सदैवैको विश्वेशः सर्वकर्मभिः

anyacca te hitaṁ vacmi yadi te rocate'nagha || prīṇanīyaḥ sadaivaiko viśveśaḥ sarvakarmabhiḥ

'हे निष्पाप! तुम्हें एक और हितकर बात कहता हूँ, यदि तुम्हें रुचिकर लगे: सर्वकर्मों के द्वारा सदा एकमात्र विश्वेश को ही प्रसन्न करना चाहिए।'

श्लोक 52 (skanda.4.52.52)

अन्यदेवधिया राजन्विश्वेशं पश्य मा क्वचित् ॥ ब्रह्मविष्ण्विंद्र चंद्रार्का क्रीडेयं तस्य धूर्जटेः

anyadevadhiyā rājanviśveśaṁ paśya mā kvacit || brahmaviṣṇviṁdra caṁdrārkā krīḍeyaṁ tasya dhūrjaṭeḥ

'हे राजन्! कभी भी विश्वेश को अन्य बुद्धि से मत देखो; ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, चन्द्र और सूर्य - ये सब तो उन धूर्जटि की लीला मात्र हैं।'

श्लोक 53 (skanda.4.52.53)

विप्रैरुदर्कमिच्छद्भिः शिक्षणीया यतो नृपाः ॥ अतस्तव हितं ख्यातं किं वा मे चिंतयानया

viprairudarkamicchadbhiḥ śikṣaṇīyā yato nṛpāḥ || atastava hitaṁ khyātaṁ kiṁ vā me ciṁtayānayā

'चूँकि उत्तम परिणाम चाहने वाले ब्राह्मणों द्वारा राजा शिक्षा पाने योग्य होते हैं, अतः तुम्हारा हित कह दिया गया; इससे आगे मुझे और क्या सोचना है?'

श्लोक 54 (skanda.4.52.54)

इति जोषं स्थितं विप्रं प्रत्युवाच नृपोत्तमः ॥ सर्वं मया हृदि धृतं यत्त्वयोक्तं द्विजोत्तम

iti joṣaṁ sthitaṁ vipraṁ pratyuvāca nṛpottamaḥ || sarvaṁ mayā hṛdi dhṛtaṁ yattvayoktaṁ dvijottama

इस प्रकार मौन खड़े ब्राह्मण से श्रेष्ठ राजा ने कहा - 'हे द्विजोत्तम! आपने जो कुछ कहा, वह सब मैंने हृदय में धारण कर लिया है।'

श्लोक 55 (skanda.4.52.55)

॥ राजोवाच ॥ अहं यियक्षमाणस्य तव साहाय्यकर्मणि ॥ दासोस्मि यज्ञसंभारान्नयमेको शतोऽखिलान्

|| rājovāca || ahaṁ yiyakṣamāṇasya tava sāhāyyakarmaṇi || dāsosmi yajñasaṁbhārānnayameko śato'khilān

राजा ने कहा - 'यज्ञ करने की इच्छा वाले आपके सहायता-कार्य में मैं आपका सेवक हूँ; मैं अकेला ही सम्पूर्ण यज्ञ-सामग्री सौ गुना जुटाऊँगा।'

श्लोक 56 (skanda.4.52.56)

यदस्ति मेखिलं तत्र सप्तांगेपि भवान्प्रभुः ॥ यजस्वैकमनाब्रह्मन्सिद्धं मन्यस्व वांछितम्

yadasti mekhilaṁ tatra saptāṁgepi bhavānprabhuḥ || yajasvaikamanābrahmansiddhaṁ manyasva vāṁchitam

'मेरा जो कुछ भी है, सप्तांग राज्य सहित, उस पर भी आप ही स्वामी हैं; हे ब्रह्मन्! एकाग्रचित्त होकर यज्ञ कीजिए, अपने इच्छित को सिद्ध मानिए।'

श्लोक 57 (skanda.4.52.57)

राज्यं करोमि यद्ब्रह्मन्स्वार्थं तन्न मनागपि ॥ पुत्रैः कलत्रैर्देहेनपरोपकृतये यते

rājyaṁ karomi yadbrahmansvārthaṁ tanna manāgapi || putraiḥ kalatrairdehenaparopakṛtaye yate

'हे ब्रह्मन्! मैं जो राज्य करता हूँ, वह किंचित् भी अपने स्वार्थ के लिए नहीं है; पुत्रों, पत्नियों और शरीर से मैं केवल परोपकार के लिए ही प्रयत्न करता हूँ।'

श्लोक 58 (skanda.4.52.58)

राज्ञां क्रतुक्रियाभ्योपि तीर्थेभ्योपि समंततः ॥ प्रजापालनमेवैको धर्मः प्रोक्तो मनीषिभिः

rājñāṁ kratukriyābhyopi tīrthebhyopi samaṁtataḥ || prajāpālanamevaiko dharmaḥ prokto manīṣibhiḥ

'बुद्धिमानों ने कहा है कि राजाओं के लिए यज्ञ-कर्मों और तीर्थों से भी बढ़कर एकमात्र प्रजा-पालन ही धर्म है।'

श्लोक 59 (skanda.4.52.59)

प्रजासंतापजोवह्निर्वज्राग्नेरपि दारुणः ॥ द्वित्रान्दहति वज्राग्निः पूर्वो राज्यं कुलं तनुम्

prajāsaṁtāpajovahnirvajrāgnerapi dāruṇaḥ || dvitrāndahati vajrāgniḥ pūrvo rājyaṁ kulaṁ tanum

'प्रजा के सन्ताप से उत्पन्न अग्नि वज्राग्नि से भी भयंकर है; वज्राग्नि तो दो-तीन को जलाती है, पर वह पूर्वोक्त अग्नि राज्य, कुल और शरीर तक को जला देती है।'

श्लोक 60 (skanda.4.52.60)

यदावभृथसिस्रासुर्भवेयं द्विजसत्तम ॥ तदा विप्रपदांभोभिरभिषेकं करोम्यहम्

yadāvabhṛthasisrāsurbhaveyaṁ dvijasattama || tadā viprapadāṁbhobhirabhiṣekaṁ karomyaham

'हे द्विजसत्तम! जब मैं अवभृथ स्नान की इच्छा करता हूँ, तब मैं ब्राह्मणों के चरणों के जल से ही अपना अभिषेक कर लेता हूँ।'

श्लोक 61 (skanda.4.52.61)

हवनं ब्राह्मणमुखे यत्करोमि द्विजोत्तम ॥ मन्ये क्रतुक्रियाभ्योपि तद्विशिष्टं महामते

havanaṁ brāhmaṇamukhe yatkaromi dvijottama || manye kratukriyābhyopi tadviśiṣṭaṁ mahāmate

'हे द्विजोत्तम! जो हवन मैं ब्राह्मण के मुख में करता हूँ, उसे मैं यज्ञ-कर्मों से भी बढ़कर मानता हूँ, हे महामते!'

श्लोक 62 (skanda.4.52.62)

अभिलाषेषु सर्वेषु जागर्त्येको हृदीह मे ॥ अद्यापि मार्गणः कोपि द्रष्टव्यः स्वतनोरपि

abhilāṣeṣu sarveṣu jāgartyeko hṛdīha me || adyāpi mārgaṇaḥ kopi draṣṭavyaḥ svatanorapi

'मेरी समस्त अभिलाषाओं में एक ही अभिलाषा सदा मेरे हृदय में जागृत रहती है - कि आज भी अपने शरीर से भी अधिक प्रिय कोई याचक मुझे देखने को मिले।'

श्लोक 63 (skanda.4.52.63)

अहो अहोभिर्बहुभिः फलितो मे मनोरथः ॥ यत्त्वं मेद्य गृहे प्राप्तः किंचित्प्रार्थयितुं द्विज

aho ahobhirbahubhiḥ phalito me manorathaḥ || yattvaṁ medya gṛhe prāptaḥ kiṁcitprārthayituṁ dvija

'अहो! बहुत दिनों के बाद आज मेरा मनोरथ सफल हुआ, कि हे द्विज, आप आज मेरे घर कुछ माँगने के लिए पधारे हैं।'

श्लोक 64 (skanda.4.52.64)

एकाग्रमानसो विप्र यज्ञान्विपुलदक्षिणान् ॥ बहून्यजकृतं विद्धि साहाय्यं सर्ववस्तुषु

ekāgramānaso vipra yajñānvipuladakṣiṇān || bahūnyajakṛtaṁ viddhi sāhāyyaṁ sarvavastuṣu

'हे विप्र! एकाग्रचित्त होकर बहुत-सी विपुल दक्षिणा वाली यज्ञ-विधियाँ सम्पन्न कीजिए; जान लीजिए कि सभी वस्तुओं में मेरी सहायता उपस्थित है।'

श्लोक 65 (skanda.4.52.65)

इति राज्ञो महाबुद्धेर्धर्मशीलस्य भाषितम् ॥ श्रुत्वा तुष्टमनाः स्रष्टा क्रतुसंभारमाहरत्

iti rājño mahābuddherdharmaśīlasya bhāṣitam || śrutvā tuṣṭamanāḥ sraṣṭā kratusaṁbhāramāharat

उस महाबुद्धिमान, धर्मशील राजा के इस वचन को सुनकर, प्रसन्नमन स्रष्टा ने यज्ञ-सामग्री एकत्र की।

श्लोक 66 (skanda.4.52.66)

साहाय्यं प्राप्य राजर्षेर्दिवोदासस्य पद्मभूः ॥ इयाज दशभिः काश्यामश्वमेधैर्महामखैः

sāhāyyaṁ prāpya rājarṣerdivodāsasya padmabhūḥ || iyāja daśabhiḥ kāśyāmaśvamedhairmahāmakhaiḥ

राजर्षि दिवोदास की सहायता पाकर पद्मयोनि ब्रह्मा ने काशी में दस महान अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया।

श्लोक 67 (skanda.4.52.67)

अद्यापि होमधूमोघैर्यद्व्याप्तं गगनांतरम् ॥ तदा प्रभृति न व्योम नीलिमानं जहात्यदः

adyāpi homadhūmoghairyadvyāptaṁ gaganāṁtaram || tadā prabhṛti na vyoma nīlimānaṁ jahātyadaḥ

आज भी जो आकाश-मण्डल तब हवन के धूम-समूहों से व्याप्त हुआ था, वह आकाश तब से आज तक अपनी नीलिमा को नहीं छोड़ता।

श्लोक 68 (skanda.4.52.68)

तीर्थं दशाश्वमेधाख्यं प्रथितं जगतीतले ॥ तदा प्रभृति तत्रासीद्वाराणस्यां शुभप्रदम्

tīrthaṁ daśāśvamedhākhyaṁ prathitaṁ jagatītale || tadā prabhṛti tatrāsīdvārāṇasyāṁ śubhapradam

'दशाश्वमेध' नाम से पृथ्वीतल पर प्रसिद्ध वह तीर्थ, तभी से वाराणसी में शुभदायक होकर विद्यमान हुआ।

श्लोक 69 (skanda.4.52.69)

पुरा रुद्रसरो नाम तत्तीर्थं कलशोद्भव ॥ दशाश्वमेधिकं पश्चाज्जातं विधिपरिग्रहात्

purā rudrasaro nāma tattīrthaṁ kalaśodbhava || daśāśvamedhikaṁ paścājjātaṁ vidhiparigrahāt

हे कलशोद्भव! पहले उस तीर्थ का नाम रुद्रसर था; ब्रह्मा के इस अनुष्ठान के कारण बाद में यह 'दशाश्वमेधिक' नाम से जाना गया।

श्लोक 70 (skanda.4.52.70)

स्वर्धुन्यथ ततः प्राप्ता भगीरथसमागमात् ॥ अतीव पुण्यवज्जातमतस्तत्तीर्थमुत्तमम्

svardhunyatha tataḥ prāptā bhagīrathasamāgamāt || atīva puṇyavajjātamatastattīrthamuttamam

फिर भगीरथ के आगमन से स्वर्गगंगा वहाँ आ पहुँची; इसलिए वह उत्तम तीर्थ अत्यन्त पुण्यमय हो गया।

श्लोक 71 (skanda.4.52.71)

विधिर्दशाश्वमेधेशं लिंगं संस्थाप्य तत्र वै॥ स्थितवान्न गतोद्यापि क्वापि काशीं विहाय तु

vidhirdaśāśvamedheśaṁ liṁgaṁ saṁsthāpya tatra vai|| sthitavānna gatodyāpi kvāpi kāśīṁ vihāya tu

ब्रह्मा ने वहाँ दशाश्वमेधेश नामक लिंग की स्थापना कर, आज तक काशी को छोड़कर कहीं और नहीं गए, वहीं स्थित रहे।

श्लोक 72 (skanda.4.52.72)

राज्ञो धर्मरतेस्तस्य च्छिद्रं नावाप किंचन ॥ अतः पुरारेः पुरतो व्रजित्वा किं वदेद्विधिः

rājño dharmaratestasya cchidraṁ nāvāpa kiṁcana || ataḥ purāreḥ purato vrajitvā kiṁ vadedvidhiḥ

उन्होंने धर्मपरायण उस राजा में कोई भी दोष नहीं पाया; अतः त्रिपुरारि के सम्मुख जाकर विधाता क्या कहते?

श्लोक 73 (skanda.4.52.73)

क्षेत्रप्रभावं विज्ञाय ध्यायन्विश्वेश्वरं शिवम् ॥ ब्रह्मेश्वरं च संस्थाप्य विधिस्तत्रैव संस्थितः

kṣetraprabhāvaṁ vijñāya dhyāyanviśveśvaraṁ śivam || brahmeśvaraṁ ca saṁsthāpya vidhistatraiva saṁsthitaḥ

इस क्षेत्र का प्रभाव जानकर, विश्वेश्वर शिव का ध्यान करते हुए, विधाता ने ब्रह्मेश्वर लिंग की स्थापना कर वहीं निवास कर लिया।

श्लोक 74 (skanda.4.52.74)

परातनुरियं काशी विश्वेशस्येति निश्चितम् ॥ अस्याः संसेवनाच्छंभुर्न कुप्यति पुरो मयि

parātanuriyaṁ kāśī viśveśasyeti niścitam || asyāḥ saṁsevanācchaṁbhurna kupyati puro mayi

'यह काशी निश्चय ही विश्वेश की परम देह है; इसकी सेवा करते रहने से शम्भु मुझसे कभी अप्रसन्न नहीं होंगे।'

श्लोक 75 (skanda.4.52.75)

कः प्राप्य काशीं दुर्मेधाः पुनस्त्यक्तुमिहेह ते ॥ अनेकजन्मजनितकर्मनिर्मूलनक्षमाम्

kaḥ prāpya kāśīṁ durmedhāḥ punastyaktumiheha te || anekajanmajanitakarmanirmūlanakṣamām

अनेक जन्मों से उपार्जित कर्मों को उखाड़ फेंकने में समर्थ काशी को पाकर, उसे पुनः त्यागने वाला कौन-सा दुर्बुद्धि होगा?

श्लोक 76 (skanda.4.52.76)

विश्वसंतापसंहर्तुः स्थाने विश्वपतेस्तनुः ॥ संताप्यतेतरां काश्या विश्लेषज महाग्निना

viśvasaṁtāpasaṁhartuḥ sthāne viśvapatestanuḥ || saṁtāpyatetarāṁ kāśyā viśleṣaja mahāgninā

विश्व के सन्ताप को हरने वाले विश्वपति के इस स्थान में भी, काशी से बिछुड़ने पर उत्पन्न महाग्नि से मनुष्य अत्यन्त सन्तप्त हो उठता है।

श्लोक 77 (skanda.4.52.77)

प्राप्य काशीं त्यजेद्यस्तु समस्ताघौघनाशिनीम्॥ नृपशुः स परिज्ञेयो महासौख्यपराङमुखः

prāpya kāśīṁ tyajedyastu samastāghaughanāśinīm|| nṛpaśuḥ sa parijñeyo mahāsaukhyaparāṅamukhaḥ

समस्त पापसमूह का नाश करने वाली काशी को पाकर भी जो उसे त्याग देता है, वह मनुष्यरूपी पशु महासुख से विमुख ही जानना चाहिए।

श्लोक 78 (skanda.4.52.78)

निर्वाणलक्ष्मीं यः कांक्षेत्त्यक्त्वा संसारदुर्गतिम् ॥ तेन काशी न संत्याज्या यद्याप्तैशादनुग्रहात्

nirvāṇalakṣmīṁ yaḥ kāṁkṣettyaktvā saṁsāradurgatim || tena kāśī na saṁtyājyā yadyāptaiśādanugrahāt

जो संसार की दुर्गति त्यागकर निर्वाण-लक्ष्मी की कामना करे, उसे तो काशी कभी नहीं त्यागनी चाहिए, यदि उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त हुई हो।

श्लोक 79 (skanda.4.52.79)

यः काशीं संपरित्यज्य गच्छेदन्यत्र दुर्मतिः ॥ तस्य हस्ततलाद्गच्छेच्चतुर्वर्गफलोदयः

yaḥ kāśīṁ saṁparityajya gacchedanyatra durmatiḥ || tasya hastatalādgaccheccaturvargaphalodayaḥ

जो दुर्बुद्धि काशी को पूर्ण रूप से त्यागकर अन्यत्र जाता है, उसके हाथ की हथेली से मानो चारों पुरुषार्थों का फल ही निकल जाता है।

श्लोक 80 (skanda.4.52.80)

निबर्हणी मधौघस्य सुपुण्य परिबृंहिणीम् ॥ कः प्राप्य काशीं दुर्मेधास्त्यजेन्मोक्षसुखप्रदाम्

nibarhaṇī madhaughasya supuṇya paribṛṁhiṇīm || kaḥ prāpya kāśīṁ durmedhāstyajenmokṣasukhapradām

पापसमूह की विनाशिनी, महापुण्य की वर्धिनी, मोक्ष-सुख देने वाली काशी को पाकर कौन-सा मूर्ख उसे त्याग देगा?

श्लोक 81 (skanda.4.52.81)

सत्यलोके क्व तत्सौख्यं क्व सौख्यं वैष्णवे पदे ॥ यत्सौख्यं लभ्यते काश्यां निमेषार्धनिषेवणात्

satyaloke kva tatsaukhyaṁ kva saukhyaṁ vaiṣṇave pade || yatsaukhyaṁ labhyate kāśyāṁ nimeṣārdhaniṣevaṇāt

सत्यलोक में वह सुख कहाँ, वैष्णव पद में भी वह सुख कहाँ, जो सुख काशी में आधी पलक झपकने भर की सेवा से प्राप्त होता है?

श्लोक 82 (skanda.4.52.82)

वाराणसीगुणगणान्निर्णीय द्रुहिणस्त्विति ॥ व्यावृत्य मंदरगिरिं न पुनः प्रत्यगान्मुने

vārāṇasīguṇagaṇānnirṇīya druhiṇastviti || vyāvṛtya maṁdaragiriṁ na punaḥ pratyagānmune

इस प्रकार वाराणसी के गुणसमूह का निश्चय कर, ब्रह्मा अपने प्रयोजन से विरत होकर, हे मुने, फिर कभी मन्दराचल को नहीं लौटे।

श्लोक 83 (skanda.4.52.83)

॥स्कंद उवाच॥ मित्रावरुणयोः पुत्र महिमानं ब्रवीमि ते ॥ काश्यां दशाश्वमेधस्य सर्वतीर्थशिरोमणेः

||skaṁda uvāca|| mitrāvaruṇayoḥ putra mahimānaṁ bravīmi te || kāśyāṁ daśāśvamedhasya sarvatīrthaśiromaṇeḥ

स्कन्द ने कहा - हे मित्रावरुण-पुत्र! अब मैं तुम्हें समस्त तीर्थों के शिरोमणि, काशी के दशाश्वमेध तीर्थ की महिमा बताता हूँ।

श्लोक 84 (skanda.4.52.84)

दशाश्वमेधिकं प्राप्य सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम् ॥ यत्किंचित्क्रियते कर्म तदक्षयमिहेरितम्

daśāśvamedhikaṁ prāpya sarvatīrthottamottamam || yatkiṁcitkriyate karma tadakṣayamiheritam

समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ दशाश्वमेधिक को पाकर, वहाँ जो भी कोई कर्म किया जाता है, वह अक्षय कहा गया है।

श्लोक 85 (skanda.4.52.85)

स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायो दे वतार्चनम् ॥ संध्योपास्तिस्तर्पणं च श्राद्धं पितृसमर्चनम्

snānaṁ dānaṁ japo homaḥ svādhyāyo de vatārcanam || saṁdhyopāstistarpaṇaṁ ca śrāddhaṁ pitṛsamarcanam

स्नान, दान, जप, हवन, स्वाध्याय, देवार्चन, सन्ध्योपासना, तर्पण, श्राद्ध और पितृ-पूजन—

श्लोक 86 (skanda.4.52.86)

दशाश्वमेधिके तीर्थे सकृत्स्नात्वा नरोत्तमः दृष्ट्वा दशाश्वमेधेशं सर्वपापैः प्रमुच्यते

daśāśvamedhike tīrthe sakṛtsnātvā narottamaḥ dṛṣṭvā daśāśvamedheśaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

—दशाश्वमेध तीर्थ में एक बार स्नान करके और दशाश्वमेधेश का दर्शन करके श्रेष्ठ मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 87 (skanda.4.52.87)

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे प्राप्य प्रतिपदं तिथिम् ॥ दशाश्वमेधिके स्नात्वा मुच्यते जन्मपातकैः

jyeṣṭhe māsi site pakṣe prāpya pratipadaṁ tithim || daśāśvamedhike snātvā mucyate janmapātakaiḥ

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को पाकर दशाश्वमेधिक में स्नान करने से मनुष्य जन्म के पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 88 (skanda.4.52.88)

ज्येष्ठे शुक्ल द्वितीयायां स्नात्वा रुद्रसरोवरे ॥ जन्मद्वयकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति

jyeṣṭhe śukla dvitīyāyāṁ snātvā rudrasarovare || janmadvayakṛtaṁ pāpaṁ tatkṣaṇādeva naśyati

ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया को रुद्रसरोवर में स्नान करने से दो जन्मों में किया गया पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 89 (skanda.4.52.89)

एवं सर्वासु तिथिषु क्रमस्नायी नरोत्तमः ॥ आशुक्लपक्षदशमि प्रतिजन्माघमुत्सृजेत्

evaṁ sarvāsu tithiṣu kramasnāyī narottamaḥ || āśuklapakṣadaśami pratijanmāghamutsṛjet

इस प्रकार शुक्ल पक्ष की दशमी तक क्रमशः प्रत्येक तिथि पर स्नान करते हुए श्रेष्ठ मनुष्य प्रत्येक जन्म के पाप को त्याग देता है।

श्लोक 90 (skanda.4.52.90)

तिथिं दशहरां प्राप्य दशजन्माघहारिणीम् ॥ दशाश्वमेधिके स्नातो यामीं पश्येन्न यातनाम्

tithiṁ daśaharāṁ prāpya daśajanmāghahāriṇīm || daśāśvamedhike snāto yāmīṁ paśyenna yātanām

दस जन्मों के पाप को हरने वाली दशहरा तिथि को पाकर दशाश्वमेधिक में स्नान करने वाला मनुष्य यम की यातना नहीं देखता।

श्लोक 91 (skanda.4.52.91)

लिंगं दशाश्वमेधेशं दृष्ट्वा दशहरा तिथौ ॥ दशजन्मार्जितैः पापैस्त्यज्यते नात्र संशयः

liṁgaṁ daśāśvamedheśaṁ dṛṣṭvā daśaharā tithau || daśajanmārjitaiḥ pāpaistyajyate nātra saṁśayaḥ

दशहरा तिथि को दशाश्वमेधेश लिंग का दर्शन करने से दस जन्मों में अर्जित पापों से मुक्ति मिलती है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 92 (skanda.4.52.92)

स्नातो दशहरायां यः पूजयेल्लिंगमुत्तमम् ॥ भक्त्या दशाश्वमेधेशं न तं गर्भदशा स्पृशेत्

snāto daśaharāyāṁ yaḥ pūjayelliṁgamuttamam || bhaktyā daśāśvamedheśaṁ na taṁ garbhadaśā spṛśet

जो दशहरा को स्नान करके भक्तिपूर्वक उत्तम दशाश्वमेधेश लिंग की पूजा करता है, उसे गर्भवास कभी स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 93 (skanda.4.52.93)

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे पक्षं रुद्रसरे नरः ॥ कुर्वन्वै वार्षिकीं यात्रां न विघ्नैरभिभूयते

jyeṣṭhe māsi site pakṣe pakṣaṁ rudrasare naraḥ || kurvanvai vārṣikīṁ yātrāṁ na vighnairabhibhūyate

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में पूरे पक्ष भर रुद्रसर पर वार्षिक यात्रा करने वाला मनुष्य विघ्नों से पराभूत नहीं होता।

श्लोक 94 (skanda.4.52.94)

दशाश्वमेधावभृथैर्यत्फलं सम्यगाप्यते ॥ दशाश्वमेधे तन्नूनं स्नात्वा दशहरा तिथौ

daśāśvamedhāvabhṛthairyatphalaṁ samyagāpyate || daśāśvamedhe tannūnaṁ snātvā daśaharā tithau

दस अश्वमेध यज्ञों के अवभृथ स्नान से जो फल पूर्णतः प्राप्त होता है, वही फल निश्चय ही दशहरा तिथि को दशाश्वमेध में स्नान करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 95 (skanda.4.52.95)

स्वर्धुन्याः पश्चिमे तीरे नत्वा दशहरेश्वरम् ॥ न दुर्दशामवाप्नोति पुमान्पुण्यतमः क्वचित्

svardhunyāḥ paścime tīre natvā daśahareśvaram || na durdaśāmavāpnoti pumānpuṇyatamaḥ kvacit

स्वर्गगंगा के पश्चिमी तट पर दशहरेश्वर को नमस्कार करने वाला अत्यन्त पुण्यवान पुरुष कभी दुर्दशा को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 96 (skanda.4.52.96)

यत्काश्यां दक्षिणद्वारमंतर्गेहस्य कीर्त्यते ॥ तत्र ब्रह्मेश्वरं दृष्ट्वा ब्रह्मलोके महीयते

yatkāśyāṁ dakṣiṇadvāramaṁtargehasya kīrtyate || tatra brahmeśvaraṁ dṛṣṭvā brahmaloke mahīyate

काशी में जो अन्तर्गृह का दक्षिण द्वार कहा जाता है, वहाँ ब्रह्मेश्वर का दर्शन करके मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 97 (skanda.4.52.97)

इति ब्राह्मणवेषेण वाराणस्यां महाधिया ॥ द्रुहिणेन स्थितं तावद्यावद्विश्वेश्वरागमः

iti brāhmaṇaveṣeṇa vārāṇasyāṁ mahādhiyā || druhiṇena sthitaṁ tāvadyāvadviśveśvarāgamaḥ

इस प्रकार ब्राह्मण के वेश में महाबुद्धिमान ब्रह्मा वाराणसी में तब तक रहे, जब तक विश्वेश्वर का आगमन नहीं हुआ।

श्लोक 98 (skanda.4.52.98)

दिवोदासोपि राजेंद्रो वृद्धब्राह्मणरूपिणे ॥ ब्रह्मणे कृतयज्ञाय ब्रह्मशालामकल्पयत्

divodāsopi rājeṁdro vṛddhabrāhmaṇarūpiṇe || brahmaṇe kṛtayajñāya brahmaśālāmakalpayat

राजेन्द्र दिवोदास ने भी वृद्ध ब्राह्मण के रूप में यज्ञ करने वाले ब्रह्मा के लिए एक ब्रह्मशाला बनवाई।

श्लोक 99 (skanda.4.52.99)

ब्रह्मेश्वरसमीपे तु ब्रह्मशाला मनोहरा ॥ ब्रह्मा तत्रावसद्व्योम ब्रह्मघोषैर्निनादयन्

brahmeśvarasamīpe tu brahmaśālā manoharā || brahmā tatrāvasadvyoma brahmaghoṣairninādayan

ब्रह्मेश्वर के समीप वह मनोहर ब्रह्मशाला है; वहाँ निवास करते हुए ब्रह्मा आकाश को वेदघोष से गुँजायमान करते रहे।

श्लोक 100 (skanda.4.52.100)

इति ते कथितो ब्रह्मन्महिमातिमहत्तरः ॥ दशाश्वमेधतीर्थस्य सर्वाघौघविनाशनः

iti te kathito brahmanmahimātimahattaraḥ || daśāśvamedhatīrthasya sarvāghaughavināśanaḥ

हे ब्रह्मन्! इस प्रकार तुम्हें समस्त पापसमूह का नाशक दशाश्वमेध तीर्थ का अत्यन्त महान माहात्म्य बताया गया।

श्लोक 101 (skanda.4.52.101)

श्रुत्वाध्यायमिमं पुण्यं श्रावयित्वा तथैव च ॥ ब्रह्मलोकमवाप्नोति श्रद्धया मानवोत्तमः

śrutvādhyāyamimaṁ puṇyaṁ śrāvayitvā tathaiva ca || brahmalokamavāpnoti śraddhayā mānavottamaḥ

इस पुण्यदायक अध्याय को सुनकर, अथवा सुनाकर, श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

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