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काशी खण्ड · अध्याय 53

शिव द्वारा काशी में गणों का प्रेषण और वाराणसी-गुणवर्णन

अध्याय 52अध्याय-सूचीअध्याय 54

श्लोक 1 (skanda.4.53.1)

॥ अगस्तिरुवाच ॥ अपूवेंयं कथा ख्याता ब्रह्मणो ब्रह्मवित्तम ॥ किं चकार पुनः शंभुस्तत्र ब्रह्मण्यपि स्थिते

|| agastiruvāca || apūveṁyaṁ kathā khyātā brahmaṇo brahmavittama || kiṁ cakāra punaḥ śaṁbhustatra brahmaṇyapi sthite

अगस्ति ने कहा - यह ब्रह्मा की अपूर्व कथा प्रसिद्ध हुई, हे ब्रह्मवित्तम! फिर ब्रह्मा के भी वहीं स्थित हो जाने पर शम्भु ने क्या किया?

श्लोक 2 (skanda.4.53.2)

॥स्कंद उवाच॥ शृण्वगस्त्य महाभाग काश्यां ब्रह्मण्यपिस्थिते ॥ गिरिशश्चिंतयामास भृशमुद्विग्नमानसः

||skaṁda uvāca|| śṛṇvagastya mahābhāga kāśyāṁ brahmaṇyapisthite || giriśaściṁtayāmāsa bhṛśamudvignamānasaḥ

स्कन्द ने कहा - सुनो, हे महाभाग अगस्त्य! जब ब्रह्मा भी काशी में जा बसे, तब गिरीश अत्यन्त उद्विग्नचित्त होकर विचार करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.4.53.3)

पुरी सा यादृशी काशी वशीकरणभूमिका ॥ न तादृशीदृशीहासीत्क्वचिन्मे प्रायशो ध्रुवम्

purī sā yādṛśī kāśī vaśīkaraṇabhūmikā || na tādṛśīdṛśīhāsītkvacinme prāyaśo dhruvam

'वह नगरी काशी जैसी वशीकरण की भूमि है, वैसी अन्यत्र कहीं मेरे लिए निश्चय ही नहीं है।'

श्लोक 4 (skanda.4.53.4)

यो यो याति पुरीं तां तु स स तत्रैव तिष्ठति ॥ अभूवन्ननुयोगिन्योऽयोगिन्यः काशिसंगताः

yo yo yāti purīṁ tāṁ tu sa sa tatraiva tiṣṭhati || abhūvannanuyoginyo'yoginyaḥ kāśisaṁgatāḥ

'जो-जो भी उस नगरी में जाता है, वह वहीं टिक जाता है; योगिनियाँ भी काशी से जुड़कर मानो अयोगिनी हो गईं।'

श्लोक 5 (skanda.4.53.5)

अकिंचित्करतां प्राप्तः स सहस्रकरोप्यरम् ॥ विधिर्विधानदक्षोपि न मे स सविधोभवत्

akiṁcitkaratāṁ prāptaḥ sa sahasrakaropyaram || vidhirvidhānadakṣopi na me sa savidhobhavat

'सहस्रकिरण सूर्य भी वहाँ जाकर कुछ भी करने में असमर्थ हो गया; विधानदक्ष विधाता भी मेरे निकट नहीं लौटा।'

श्लोक 6 (skanda.4.53.6)

चिंतयन्निति देवेशो गणानारहूय भूरिशः ॥ प्रेषयामास भो यात क्षिप्रं वाराणसीं पुरीम्

ciṁtayanniti deveśo gaṇānārahūya bhūriśaḥ || preṣayāmāsa bho yāta kṣipraṁ vārāṇasīṁ purīm

इस प्रकार विचार करते हुए देवेश ने बहुत-से गणों को बुलाकर कहा - 'तुम शीघ्र वाराणसी नगरी जाओ।'

श्लोक 7 (skanda.4.53.7)

किं कुर्वंति तु योगिन्यः किं करोति स भानुमान् ॥ गत्वा वित्त त्वरायुक्ता विधिश्च विदधाति किम्

kiṁ kurvaṁti tu yoginyaḥ kiṁ karoti sa bhānumān || gatvā vitta tvarāyuktā vidhiśca vidadhāti kim

'योगिनियाँ क्या कर रही हैं, वह सूर्य क्या कर रहा है - जाकर शीघ्रता से पता लगाओ, और विधाता भी क्या कर रहा है।'

श्लोक 8 (skanda.4.53.8)

नामग्राहं ततःऽप्रैषीद्बहुमान पुरःसरम्॥ शंकुकर्ण महाकाल घटाकर्ण महोदर

nāmagrāhaṁ tataḥ'praiṣīdbahumāna puraḥsaram|| śaṁkukarṇa mahākāla ghaṭākarṇa mahodara

फिर उन्होंने नाम लेकर बड़े सम्मान के साथ भेजा - शंकुकर्ण, महाकाल, घटाकर्ण, महोदर,

श्लोक 9 (skanda.4.53.9)

सोमनंदिन्नंदिषेण काल पिंगल कुक्कुट ॥ कुंडोदर मयूराक्ष बाण गोकर्ण तारक

somanaṁdinnaṁdiṣeṇa kāla piṁgala kukkuṭa || kuṁḍodara mayūrākṣa bāṇa gokarṇa tāraka

सोमनन्दी, नन्दिषेण, काल, पिंगल, कुक्कुट, कुण्डोदर, मयूराक्ष, बाण, गोकर्ण, तारक,

श्लोक 10 (skanda.4.53.10)

तिलपर्ण स्मृलकर्ण दृमिचंड प्रभामय ॥ सुकेश विंदते छाग कपर्दिन्पिंगलाक्षक

tilaparṇa smṛlakarṇa dṛmicaṁḍa prabhāmaya || sukeśa viṁdate chāga kapardinpiṁgalākṣaka

तिलपर्ण, स्थूलकर्ण, द्रुमिचण्ड, प्रभामय, सुकेश, विन्दति-छाग, कपर्दी, पिंगलाक्षक,

श्लोक 11 (skanda.4.53.11)

वीरभद्र किराताख्य चतुर्मुख निकुंभक ॥ पंचाक्षभारभूताख्य त्र्यक्ष क्षेमक लांगलिन्

vīrabhadra kirātākhya caturmukha nikuṁbhaka || paṁcākṣabhārabhūtākhya tryakṣa kṣemaka lāṁgalin

वीरभद्र, किरात नाम वाले, चतुर्मुख, निकुम्भक, पंचाक्ष, भारभूत नाम वाले, त्र्यक्ष, क्षेमक, लांगली,

श्लोक 12 (skanda.4.53.12)

विराध सुमुखाषाढे भवंतो मम सूनवः ॥ यथेमौ स्कंदहेरंबौ नैगमेयो यथा त्वयम्

virādha sumukhāṣāḍhe bhavaṁto mama sūnavaḥ || yathemau skaṁdaheraṁbau naigameyo yathā tvayam

विराध, सुमुख, आषाढ - 'तुम सब मेरे पुत्रों के समान हो, जैसे ये स्कन्द और हेरम्ब हैं, जैसे यह नैगमेय है,'

श्लोक 13 (skanda.4.53.13)

यथा शाखविशाखौ च यथेमौ नंदिभृंगिणौ ॥ भवत्सु विद्यमानेषु महाविक्रमशालिषु

yathā śākhaviśākhau ca yathemau naṁdibhṛṁgiṇau || bhavatsu vidyamāneṣu mahāvikramaśāliṣu

'जैसे ये शाख और विशाख हैं, जैसे ये नन्दी और भृंगी हैं - महान पराक्रम से सम्पन्न तुम सबके रहते हुए,'

श्लोक 14 (skanda.4.53.14)

काशीप्रवृत्तिं नो जाने दिवोदासनृपस्य च ॥ योगिन्यर्कविधीनां च तद्द्वौ यातं भवत्स्वमू

kāśīpravṛttiṁ no jāne divodāsanṛpasya ca || yoginyarkavidhīnāṁ ca taddvau yātaṁ bhavatsvamū

'काशी में क्या हो रहा है, राजा दिवोदास की भी क्या स्थिति है, यह मुझे नहीं पता; योगिनियों, सूर्य और विधाता का भी - तुम दोनों वहाँ जाओ।'

श्लोक 15 (skanda.4.53.15)

शंकुकर्णमहाकालौ कालस्यापि प्रकंपनौ ॥ ज्ञातुं वाराणसीवार्तामायातं चत्वरान्वितौ

śaṁkukarṇamahākālau kālasyāpi prakaṁpanau || jñātuṁ vārāṇasīvārtāmāyātaṁ catvarānvitau

शंकुकर्ण और महाकाल, जो काल को भी कँपाने वाले हैं, वाराणसी का समाचार जानने के लिए शीघ्रता से चल पड़े।

श्लोक 16 (skanda.4.53.16)

कृतप्रतिज्ञौ तो(?) तूर्णं प्राप्य वाराणसीं पुरीम् ॥ शंकुकर्णमहाकालौ विस्मृत्य शांभवीं गिरम्

kṛtapratijñau to(?) tūrṇaṁ prāpya vārāṇasīṁ purīm || śaṁkukarṇamahākālau vismṛtya śāṁbhavīṁ giram

यह प्रतिज्ञा करके वे दोनों शीघ्र वाराणसी नगरी पहुँचकर, शंकुकर्ण और महाकाल, शाम्भवी वाणी को भूलकर -

श्लोक 17 (skanda.4.53.17)

यथैंद्रजालिकीं दृष्ट्वा मायामिह विचक्षणः ॥ क्षणेन मोहमायाति काशीं वीक्ष्य तथैव तौ

yathaiṁdrajālikīṁ dṛṣṭvā māyāmiha vicakṣaṇaḥ || kṣaṇena mohamāyāti kāśīṁ vīkṣya tathaiva tau

-जैसे कोई चतुर पुरुष ऐंद्रजालिक की माया देखकर क्षणभर में मोहित हो जाता है, वैसे ही वे दोनों काशी को देखकर मोहित हो गए।

श्लोक 18 (skanda.4.53.18)

अहो मोहस्य माहात्म्यमहो भाग्यविपर्ययः ॥ निर्वाणराशिं यत्काशीं प्राप्य यांत्यन्यतोऽबुधाः

aho mohasya māhātmyamaho bhāgyaviparyayaḥ || nirvāṇarāśiṁ yatkāśīṁ prāpya yāṁtyanyato'budhāḥ

अहो, मोह की महिमा! अहो, भाग्य का विपर्यय! कि निर्वाण की राशिरूप काशी को पाकर भी अज्ञानी लोग अन्यत्र चले जाते हैं।

श्लोक 19 (skanda.4.53.19)

तत्यजे यैरियं काशी महाशीर्वादभूभिका ॥ तेषां करतलान्मुक्तिः प्राप्तापि परितो गता

tatyaje yairiyaṁ kāśī mahāśīrvādabhūbhikā || teṣāṁ karatalānmuktiḥ prāptāpi parito gatā

जिन लोगों ने महाआशीर्वाद की भूमिरूप इस काशी को त्याग दिया, उनके हाथ की हथेली से मुक्ति भी, प्राप्त होकर भी, चारों ओर से चली गई।

श्लोक 20 (skanda.4.53.20)

यत्र सर्वावभृथतः स्नानमात्रं विशिष्यते ॥ अप्युष्णीकृतपानीयैस्तां काशीं कः परित्यजेत्

yatra sarvāvabhṛthataḥ snānamātraṁ viśiṣyate || apyuṣṇīkṛtapānīyaistāṁ kāśīṁ kaḥ parityajet

जहाँ सभी अवभृथ स्नानों से भी बढ़कर मात्र स्नान ही विशिष्ट है, उस काशी को गरम किए हुए जल से भी कौन त्यागेगा?

श्लोक 21 (skanda.4.53.21)

यत्रैकपुष्पदानेन शिवलिंगस्य मूर्धनि ॥ दशसौवर्णिकं पुण्यं कस्तां काशीं परित्यजेत्

yatraikapuṣpadānena śivaliṁgasya mūrdhani || daśasauvarṇikaṁ puṇyaṁ kastāṁ kāśīṁ parityajet

जहाँ शिवलिंग के मस्तक पर एक ही पुष्प चढ़ाने से दस स्वर्ण-दान के बराबर पुण्य मिलता है, उस काशी को कौन त्यागेगा?

श्लोक 22 (skanda.4.53.22)

यत्र दंडप्रणामेन अप्येकेन शिवाग्रतः ॥ तुच्छमेंद्रपदंप्राहुस्तां काशीं को विमुंचति

yatra daṁḍapraṇāmena apyekena śivāgrataḥ || tucchameṁdrapadaṁprāhustāṁ kāśīṁ ko vimuṁcati

जहाँ शिव के सामने एक भी दण्डवत् प्रणाम करने से इन्द्र का पद भी तुच्छ कहा गया है, उस काशी को कौन छोड़ता है?

श्लोक 23 (skanda.4.53.23)

यत्रैकद्विजमात्रं तु भोजयित्वा यथेच्छया ॥ वाजपेयाधिकं पुण्यं तां काशीं को विमुंचति

yatraikadvijamātraṁ tu bhojayitvā yathecchayā || vājapeyādhikaṁ puṇyaṁ tāṁ kāśīṁ ko vimuṁcati

जहाँ इच्छानुसार एक ही ब्राह्मण को भोजन कराकर वाजपेय यज्ञ से भी अधिक पुण्य मिलता है, उस काशी को कौन छोड़ता है?

श्लोक 24 (skanda.4.53.24)

एकां गां यत्र दत्त्वा वै विधिवद्ब्राह्मणाय वै ॥ लभेदयुत गोपुण्यं कस्तां काशीं त्यजेत्सुधीः

ekāṁ gāṁ yatra dattvā vai vidhivadbrāhmaṇāya vai || labhedayuta gopuṇyaṁ kastāṁ kāśīṁ tyajetsudhīḥ

जहाँ विधिपूर्वक एक ही गाय ब्राह्मण को दान करने से दस हजार गौओं के दान का पुण्य मिलता है, उस काशी को कौन-सा बुद्धिमान त्यागेगा?

श्लोक 25 (skanda.4.53.25)

एकलिंगं प्रतिष्ठाप्य यत्र संस्थापितं भवेत् ॥ अपि त्रैलोक्यमखिलं तां काशीं कः समुज्झति

ekaliṁgaṁ pratiṣṭhāpya yatra saṁsthāpitaṁ bhavet || api trailokyamakhilaṁ tāṁ kāśīṁ kaḥ samujjhati

जहाँ एक ही लिंग की प्रतिष्ठा करने से सम्पूर्ण त्रिलोक की स्थापना का फल मिलता है, उस काशी को कौन त्याग देता है?

श्लोक 26 (skanda.4.53.26)

परिनिश्चित्य तावित्थं लिंगे संस्थाप्य पुण्यदे ॥ तत्रैव संस्थितिं प्राप्तौ काशीं नाद्यापि मुंचतः

pariniścitya tāvitthaṁ liṁge saṁsthāpya puṇyade || tatraiva saṁsthitiṁ prāptau kāśīṁ nādyāpi muṁcataḥ

इस प्रकार भलीभाँति निश्चय करके, उस पुण्यदायी लिंग की वहीं स्थापना कर, वे दोनों वहीं स्थिर हो गए और आज तक काशी को नहीं छोड़ते।

श्लोक 27 (skanda.4.53.27)

शंकुकर्णेश्वरं लिंगं शंकुकर्ण ग णार्चितम् ॥ दृष्ट्वा न जायते जंतुर्जातु मातुर्महोदरे

śaṁkukarṇeśvaraṁ liṁgaṁ śaṁkukarṇa ga ṇārcitam || dṛṣṭvā na jāyate jaṁturjātu māturmahodare

शंकुकर्ण गण द्वारा पूजित शंकुकर्णेश्वर लिंग का दर्शन करके प्राणी कभी माता के उदर में जन्म नहीं लेता।

श्लोक 28 (skanda.4.53.28)

विश्वेशाद्वायुदिग्भागे शंकुकर्णेश्वरं नरः ॥ संपूज्य न विशेदत्र घोरे संसारसागरे

viśveśādvāyudigbhāge śaṁkukarṇeśvaraṁ naraḥ || saṁpūjya na viśedatra ghore saṁsārasāgare

विश्वेश के वायव्य दिशा में स्थित शंकुकर्णेश्वर की पूजा करके मनुष्य इस भयंकर संसार-सागर में प्रवेश नहीं करता।

श्लोक 29 (skanda.4.53.29)

महाकालेश्वरं लिंगं महाकालगणार्चितम् ॥ अर्चयित्वा च नत्वा च स्तुत्वा कालभयं कुतः

mahākāleśvaraṁ liṁgaṁ mahākālagaṇārcitam || arcayitvā ca natvā ca stutvā kālabhayaṁ kutaḥ

महाकाल गण द्वारा पूजित महाकालेश्वर लिंग की अर्चना, वन्दना और स्तुति करके काल का भय कहाँ रह जाता है?

श्लोक 30 (skanda.4.53.30)

॥स्कंद उवाच॥ शंकुकर्णे महाकाले चिरंतन विलंबिते ॥ ज्ञात्वा सर्वज्ञनाथोथ प्राहैपीदपरौ गणौ

||skaṁda uvāca|| śaṁkukarṇe mahākāle ciraṁtana vilaṁbite || jñātvā sarvajñanāthotha prāhaipīdaparau gaṇau

स्कन्द ने कहा - शंकुकर्ण और महाकाल के बहुत विलम्ब हो जाने पर, सर्वज्ञ स्वामी ने यह जानकर दो अन्य गणों से कहा -

श्लोक 31 (skanda.4.53.31)

घंटाकर्ण त्वमागच्छ महोदर महामते ॥ काशीं यातं युवां तूर्णं ज्ञातुं तत्रत्य चेष्टितम्

ghaṁṭākarṇa tvamāgaccha mahodara mahāmate || kāśīṁ yātaṁ yuvāṁ tūrṇaṁ jñātuṁ tatratya ceṣṭitam

'हे घण्टाकर्ण, हे महामते महोदर! तुम दोनों जाओ, शीघ्र काशी जाकर वहाँ का चरित्र जान लो।'

श्लोक 32 (skanda.4.53.32)

इत्यगस्ते गणौ तौ तु गत्वा काशीं महापुरीम्॥ व्यावृत्याद्यापि नो यातौ क्वापि तत्रैव संस्थितौ

ityagaste gaṇau tau tu gatvā kāśīṁ mahāpurīm|| vyāvṛtyādyāpi no yātau kvāpi tatraiva saṁsthitau

हे अगस्त्य! इस प्रकार आज्ञा पाकर वे दोनों गण महानगरी काशी में जाकर, आज तक वहाँ से लौटे नहीं, वहीं कहीं स्थित रह गए।

श्लोक 33 (skanda.4.53.33)

घंटाकर्णेश्वरं लिंगं घंटाकर्ण गणोत्तमः ॥ काश्यां संस्थाप्य विधिवत्स्वयं तत्रैव निर्वृतः

ghaṁṭākarṇeśvaraṁ liṁgaṁ ghaṁṭākarṇa gaṇottamaḥ || kāśyāṁ saṁsthāpya vidhivatsvayaṁ tatraiva nirvṛtaḥ

घण्टाकर्णेश्वर लिंग की काशी में विधिपूर्वक स्थापना कर, गणश्रेष्ठ घण्टाकर्ण स्वयं वहीं आनन्दमग्न हो गया।

श्लोक 34 (skanda.4.53.34)

कुंडं तत्रैव संस्थाप्य लिंगस्नपनकर्मणे ॥ नाद्यापि स त्यजेत्काशीं ध्यायँल्लिंगं तथैव हि

kuṁḍaṁ tatraiva saṁsthāpya liṁgasnapanakarmaṇe || nādyāpi sa tyajetkāśīṁ dhyāya~lliṁgaṁ tathaiva hi

लिंग-स्नपन के कर्म के लिए वहीं एक कुण्ड की स्थापना कर, उस लिंग का ध्यान करते हुए वह आज भी काशी को नहीं त्यागता।

श्लोक 35 (skanda.4.53.35)

महोदरोपि तत्प्राच्यां शिवध्यानपरायणः ॥ महोदरेश्वरं लिंगं ध्यायेदद्यापि कुंभज

mahodaropi tatprācyāṁ śivadhyānaparāyaṇaḥ || mahodareśvaraṁ liṁgaṁ dhyāyedadyāpi kuṁbhaja

महोदर भी उसके पूर्व दिशा में शिवध्यान में तत्पर होकर, हे कुम्भज! आज भी महोदरेश्वर लिंग का ध्यान करता है।

श्लोक 36 (skanda.4.53.36)

महोदरेश्वरं दृष्ट्वा वाराणस्यां द्विजोत्तम ॥ कदाचिदपि वै मातुः प्रविशेन्नौदरीं दरीम्

mahodareśvaraṁ dṛṣṭvā vārāṇasyāṁ dvijottama || kadācidapi vai mātuḥ praviśennaudarīṁ darīm

हे द्विजोत्तम! वाराणसी में महोदरेश्वर का दर्शन करके मनुष्य कभी भी माता के गर्भरूपी गुहा में प्रवेश नहीं करता।

श्लोक 37 (skanda.4.53.37)

घंटाकर्ण ह्रदे स्नात्वा दृष्ट्वा व्यासेश्वरं विभुम् ॥ यत्र कुत्र विपन्नोपि वाराणस्यां मृतो भवेत्

ghaṁṭākarṇa hrade snātvā dṛṣṭvā vyāseśvaraṁ vibhum || yatra kutra vipannopi vārāṇasyāṁ mṛto bhavet

घण्टाकर्ण-ह्रद में स्नान करके, विभु व्यासेश्वर का दर्शन करके, चाहे कहीं भी मृत्यु को प्राप्त हो, वह वाराणसी में ही मरा माना जाता है।

श्लोक 38 (skanda.4.53.38)

घंटाकर्णे महातीर्थे श्राद्धं कृत्वा विधानतः ॥ अपि दुर्गतिमापन्नानुद्धरेत्सप्तपूर्वजान्

ghaṁṭākarṇe mahātīrthe śrāddhaṁ kṛtvā vidhānataḥ || api durgatimāpannānuddharetsaptapūrvajān

घण्टाकर्ण नामक महातीर्थ में विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य दुर्गति को प्राप्त हुए अपने सात पूर्व पुरखों का भी उद्धार कर सकता है।

श्लोक 39 (skanda.4.53.39)

निमज्ज्याद्यापि तत्कुंडे क्षण योवहितो भवेत् ॥ विश्वेश्वरमहापूजा घंटारावाञ्शृणोति सः

nimajjyādyāpi tatkuṁḍe kṣaṇa yovahito bhavet || viśveśvaramahāpūjā ghaṁṭārāvāñśṛṇoti saḥ

जो कोई क्षणभर के लिए भी सावधान होकर आज भी उस कुण्ड में डुबकी लगाता है, वह विश्वेश्वर की महापूजा में बजने वाली घण्टा-ध्वनि सुनता है।

श्लोक 40 (skanda.4.53.40)

वदंति पितरः काश्यां घंटाकर्णेमलेजले॥ दाता तिलोदकस्यापि वंशे नः कोपि जायते

vadaṁti pitaraḥ kāśyāṁ ghaṁṭākarṇemalejale|| dātā tilodakasyāpi vaṁśe naḥ kopi jāyate

पितर काशी में घण्टाकर्ण के निर्मल जल के विषय में कहते हैं - 'हमारे वंश में क्या कोई तिल-जल देने वाला भी उत्पन्न होगा?'

श्लोक 41 (skanda.4.53.41)

यद्वंश्या मुनयः काश्यां घंटाकर्णे महाह्रदे॥ कृतोदकक्रियाः प्राप्ताः परां सिद्धिं घटोद्भव

yadvaṁśyā munayaḥ kāśyāṁ ghaṁṭākarṇe mahāhrade|| kṛtodakakriyāḥ prāptāḥ parāṁ siddhiṁ ghaṭodbhava

हे घटोद्भव! जिनके वंशज मुनियों ने काशी में घण्टाकर्ण के महाह्रद में जलक्रिया की, वे परम सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 42 (skanda.4.53.42)

॥स्कंद उवाच॥ घंटाकर्णे गणे याते प्रयाते च महोदरे ॥ विसिस्माय स्मरद्वेष्टा मौलिमांदोलयन्मुहुः

||skaṁda uvāca|| ghaṁṭākarṇe gaṇe yāte prayāte ca mahodare || visismāya smaradveṣṭā maulimāṁdolayanmuhuḥ

स्कन्द ने कहा - घण्टाकर्ण गण के चले जाने पर और महोदर के भी प्रस्थान कर जाने पर, कामदेव के शत्रु शिव ने बार-बार अपने मस्तक को हिलाते हुए विस्मय व्यक्त किया।

श्लोक 43 (skanda.4.53.43)

उवाच च मनस्येव हरः स्मित्वा पुनःपुनः ॥ महामोहनविद्यासि काशि त्वां पर्यवैम्यहम्

uvāca ca manasyeva haraḥ smitvā punaḥpunaḥ || mahāmohanavidyāsi kāśi tvāṁ paryavaimyaham

मुस्कुराते हुए हर ने बार-बार अपने ही मन में कहा - 'हे काशी! तू महामोहिनी विद्या है, अब मैं तुझे भलीभाँति पहचान गया हूँ।'

श्लोक 44 (skanda.4.53.44)

पुराविदः प्रशंसंति त्वां महामोहहारिणीम् ॥ काशींत्विति न जानंति महामोहनभूरियम्

purāvidaḥ praśaṁsaṁti tvāṁ mahāmohahāriṇīm || kāśīṁtviti na jānaṁti mahāmohanabhūriyam

'पुराणों के ज्ञाता तुझे महामोह-हारिणी कहकर प्रशंसा करते हैं; परन्तु काशी को वे नहीं जानते - यह तो स्वयं महामोह की ही भूमि है।'

श्लोक 45 (skanda.4.53.45)

प्रेषयिष्याम्यहं सर्वान्भवती मोहयिष्यति ॥ इति सम्यग्विजानामि काशि त्वां मोहनोषधिम्

preṣayiṣyāmyahaṁ sarvānbhavatī mohayiṣyati || iti samyagvijānāmi kāśi tvāṁ mohanoṣadhim

'मैं सबको भेजूँगा, तू सबको मोहित कर देगी - यह मैं भलीभाँति जानता हूँ, हे काशी, कि तू मोहन की औषधि है।'

श्लोक 46 (skanda.4.53.46)

तथापि प्रेषयिष्यामि यावान्मेस्ति परिच्छदः ॥ नोद्यमाद्विरमंतीह ज्ञानिनः साध्यकर्मणि

tathāpi preṣayiṣyāmi yāvānmesti paricchadaḥ || nodyamādviramaṁtīha jñāninaḥ sādhyakarmaṇi

'फिर भी जब तक मेरे पास परिजन शेष हैं, तब तक मैं भेजता रहूँगा; क्योंकि ज्ञानी पुरुष साध्य कार्य में उद्यम से विरत नहीं होते।'

श्लोक 47 (skanda.4.53.47)

नोद्यमाद्विरतिः कार्या क्वापि कार्ये विचक्षणैः ॥ प्रतिकूलोपि खिद्येत विधिस्तत्सततोद्यमात्

nodyamādviratiḥ kāryā kvāpi kārye vicakṣaṇaiḥ || pratikūlopi khidyeta vidhistatsatatodyamāt

विचक्षण पुरुषों को किसी भी कार्य में उद्यम से कभी विरति नहीं करनी चाहिए; प्रतिकूल विधाता भी निरन्तर उद्यम से खिन्न हो उठता है।

श्लोक 48 (skanda.4.53.48)

शीतोष्णभानू स्वर्भानु ग्रस्तावपि नभोंगणे ॥ गतिं न त्यजतोद्यापि प्रक्रांतव्य कृतोद्यमौ

śītoṣṇabhānū svarbhānu grastāvapi nabhoṁgaṇe || gatiṁ na tyajatodyāpi prakrāṁtavya kṛtodyamau

शीत और उष्ण किरणों वाले चन्द्र-सूर्य आकाश-मण्डल में राहु द्वारा ग्रसे जाने पर भी आज तक अपनी गति नहीं त्यागते, क्योंकि वे सतत उद्यमशील रहते हैं।

श्लोक 49 (skanda.4.53.49)

एकत्र हंति कार्याणि प्रातिकूल्याद्विधिर्मुहुः ॥ एकत्रकरणीयानि सेत्स्यंत्यत्र भृशोद्यमात्

ekatra haṁti kāryāṇi prātikūlyādvidhirmuhuḥ || ekatrakaraṇīyāni setsyaṁtyatra bhṛśodyamāt

एक ओर विधाता बार-बार प्रतिकूलता से कार्यों को नष्ट करता है, तो दूसरी ओर अत्यन्त उद्यम से किए जाने वाले कार्य सिद्ध भी हो जाते हैं।

श्लोक 50 (skanda.4.53.50)

दैवं पूर्वकृतं कर्म कथ्यते नेतरत्पुनः ॥ तन्निराकरणे यत्नः स्वयं कार्यो विपश्चिता

daivaṁ pūrvakṛtaṁ karma kathyate netaratpunaḥ || tannirākaraṇe yatnaḥ svayaṁ kāryo vipaścitā

दैव तो केवल पूर्वकृत कर्म को ही कहा जाता है, अन्य कुछ नहीं; विद्वान पुरुष को स्वयं ही उसके निराकरण का प्रयत्न करना चाहिए।

श्लोक 51 (skanda.4.53.51)

भाजनोपस्थितं दैवाद्भोज्यं नास्यं स्वयं विशेत् ॥ हस्तवक्त्रोद्यमात्तच्च प्रविशेदौदरीं दरीम्

bhājanopasthitaṁ daivādbhojyaṁ nāsyaṁ svayaṁ viśet || hastavaktrodyamāttacca praviśedaudarīṁ darīm

दैव से पात्र में उपस्थित हुआ भोज्य पदार्थ स्वयं मुख में प्रवेश नहीं करता; हाथ और मुख के प्रयत्न से ही वह पेट की गुहा में प्रवेश करता है।

श्लोक 52 (skanda.4.53.52)

इत्युद्यमं समर्थ्येशो निश्चितं दैवजित्वरम् ॥ पुनश्च प्रेषयांचक्रे गणान्पंचमहारयान्

ityudyamaṁ samarthyeśo niścitaṁ daivajitvaram || punaśca preṣayāṁcakre gaṇānpaṁcamahārayān

इस प्रकार दैव को जीतने में समर्थ उद्यम का निश्चय कर ईश्वर ने पुनः पाँच महाबलशाली गणों को भेजा -

श्लोक 53 (skanda.4.53.53)

सोमनंदी नंदिषेणः कालपिंगलकुक्कुटाः ॥ तेद्यापि न निवर्तंते काश्यां जीवामृता यथा

somanaṁdī naṁdiṣeṇaḥ kālapiṁgalakukkuṭāḥ || tedyāpi na nivartaṁte kāśyāṁ jīvāmṛtā yathā

सोमनन्दी, नन्दिषेण, काल, पिंगल, कुक्कुट - वे आज भी वहाँ से नहीं लौटे, जैसे उन्होंने जीवित अमृत को पा लिया हो।

श्लोक 54 (skanda.4.53.54)

तेपि स्वनाम्ना लिंगानि शंभुसंतुष्टि काम्यया॥ प्रतिष्ठाप्य स्थिताः काश्यां विश्वनिर्वाणजन्मनि

tepi svanāmnā liṁgāni śaṁbhusaṁtuṣṭi kāmyayā|| pratiṣṭhāpya sthitāḥ kāśyāṁ viśvanirvāṇajanmani

वे भी शम्भु को प्रसन्न करने की इच्छा से अपने-अपने नाम पर लिंगों की स्थापना कर, विश्व को निर्वाण देने वाली उस काशी में ही बस गए।

श्लोक 55 (skanda.4.53.55)

सोमनंदीश्वरं दृष्ट्वा लिंगं नंदवने परम् ॥ सोमलोके परानंदं प्राप्नुयाद्भक्तिमान्नरः

somanaṁdīśvaraṁ dṛṣṭvā liṁgaṁ naṁdavane param || somaloke parānaṁdaṁ prāpnuyādbhaktimānnaraḥ

सोमनन्दीश्वर नामक उस उत्तम लिंग का नन्दनवन में दर्शन करके भक्तिमान मनुष्य सोमलोक में परमानन्द को प्राप्त करता है।

श्लोक 56 (skanda.4.53.56)

तदुत्तरे विलोक्याथ नंदिषेणेश्वरं नरः ॥ आनंदसेनां संप्राप्य जयेन्मृत्युमपि क्षणात्

taduttare vilokyātha naṁdiṣeṇeśvaraṁ naraḥ || ānaṁdasenāṁ saṁprāpya jayenmṛtyumapi kṣaṇāt

फिर उसके उत्तर में नन्दिषेणेश्वर का दर्शन करके मनुष्य आनन्द की सेना को प्राप्त कर क्षणभर में मृत्यु पर भी विजय पा लेता है।

श्लोक 57 (skanda.4.53.57)

कालेश्वरं महालिंगं गंगायाः पश्चिमोत्तरे ॥ प्रणम्य कालपाशेन नो बध्येत कदाचन

kāleśvaraṁ mahāliṁgaṁ gaṁgāyāḥ paścimottare || praṇamya kālapāśena no badhyeta kadācana

गंगा के पश्चिमोत्तर में स्थित कालेश्वर महालिंग को प्रणाम करके मनुष्य कभी कालपाश से नहीं बँधता।

श्लोक 58 (skanda.4.53.58)

पिंगलेश्वरमभ्यर्च्य कालेशात्किंचिदुत्तरे ॥ लभते पिंगलज्ञानं येन तन्मयतां व्रजेत्

piṁgaleśvaramabhyarcya kāleśātkiṁciduttare || labhate piṁgalajñānaṁ yena tanmayatāṁ vrajet

कालेश से कुछ उत्तर में स्थित पिंगलेश्वर की अर्चना करके मनुष्य पिंगल-ज्ञान को प्राप्त करता है, जिससे वह उसी में तन्मय हो जाता है।

श्लोक 59 (skanda.4.53.59)

कुक्कुटेश्वर लिंगस्य येत्र भक्तिं वितन्वते ॥ कुक्कुटांडाकृतेस्तस्य न ते गर्भमवाप्नुयुः

kukkuṭeśvara liṁgasya yetra bhaktiṁ vitanvate || kukkuṭāṁḍākṛtestasya na te garbhamavāpnuyuḥ

जो लोग कुक्कुटेश्वर लिंग में भक्ति फैलाते हैं, जिसका आकार मुर्गी के अण्डे जैसा है, वे कभी गर्भ को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 60 (skanda.4.53.60)

॥स्कंद उवाच॥ सोमनंदि प्रभृतिषु मुने पंचगणेष्वपि ॥ आनंदकाननं प्राप्य स्थितेषु स्थाणुरब्रवीत्

||skaṁda uvāca|| somanaṁdi prabhṛtiṣu mune paṁcagaṇeṣvapi || ānaṁdakānanaṁ prāpya sthiteṣu sthāṇurabravīt

स्कन्द ने कहा - हे मुने! सोमनन्दी आदि पाँचों गणों के भी आनन्दकानन को पाकर वहीं स्थिर हो जाने पर स्थाणु ने कहा -

श्लोक 61 (skanda.4.53.61)

कार्यमस्माकमेवैतद्यदि सम्यग्विमृश्यते ॥ अनेनोपाधिनाप्येते तत्र तिष्ठंतु मामकाः

kāryamasmākamevaitadyadi samyagvimṛśyate || anenopādhināpyete tatra tiṣṭhaṁtu māmakāḥ

'यदि भलीभाँति विचार किया जाए, तो यह तो हमारा ही कार्य है; इस बहाने से भी वे मेरे अपने ही वहाँ बने रहें।'

श्लोक 62 (skanda.4.53.62)

प्रमथेषु प्रविष्टेषु मायावीर्यमहत्स्वपि ॥ अहमेव प्रविष्टोस्मि वाराणस्यां न संशयः

pramatheṣu praviṣṭeṣu māyāvīryamahatsvapi || ahameva praviṣṭosmi vārāṇasyāṁ na saṁśayaḥ

'माया के बल में महान इन प्रमथों के भी वहाँ प्रविष्ट हो जाने पर, मैं स्वयं ही मानो वाराणसी में प्रविष्ट हो गया हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 63 (skanda.4.53.63)

क्रमेण प्रेषयिष्यामि योस्ति मे स्वपरिच्छदः ॥ तत्र सर्वेषु यातेषु ततो यास्याम्यहं पुनः

krameṇa preṣayiṣyāmi yosti me svaparicchadaḥ || tatra sarveṣu yāteṣu tato yāsyāmyahaṁ punaḥ

'अब मैं क्रमशः जो भी अपना परिवार शेष है, उसे भेजूँगा; और जब सब वहाँ चले जाएँगे, तब मैं स्वयं भी वहाँ जाऊँगा।'

श्लोक 64 (skanda.4.53.64)

संप्रधार्येति हृदये देवदेवेन शूलिना ॥ प्रैषिष्ट प्रमथानां तु ततो गणचतुष्टयम्

saṁpradhāryeti hṛdaye devadevena śūlinā || praiṣiṣṭa pramathānāṁ tu tato gaṇacatuṣṭayam

देवों के देव, त्रिशूलधारी शिव ने हृदय में यह निश्चय कर, फिर प्रमथों के चार गणों को भेजा -

श्लोक 65 (skanda.4.53.65)

कुंडोदरो मयूराख्यो बाणो गोकर्ण एव च ॥ मायाबलं समाश्रित्य काशीं प्रविविशुर्गणाः

kuṁḍodaro mayūrākhyo bāṇo gokarṇa eva ca || māyābalaṁ samāśritya kāśīṁ praviviśurgaṇāḥ

कुण्डोदर, मयूराख्य, बाण और गोकर्ण - माया-बल का सहारा लेकर वे गण काशी में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 66 (skanda.4.53.66)

कृत्वोपायशतं तैस्तु दिवोदासस्य संभ्रमे यदैकोपि समर्थो न तदा तत्रैव संस्थितम्

kṛtvopāyaśataṁ taistu divodāsasya saṁbhrame yadaikopi samartho na tadā tatraiva saṁsthitam

दिवोदास को विचलित करने के लिए उन्होंने सैकड़ों उपाय किए, किन्तु जब कोई भी एक उपाय सफल नहीं हुआ, तब वे वहीं टिक गए।

श्लोक 67 (skanda.4.53.67)

अपराधशतेष्वीशः केन तुष्यति कर्मणा ॥ संप्रधार्येति ते चक्रुर्लिंगाराधनमुत्तमम्

aparādhaśateṣvīśaḥ kena tuṣyati karmaṇā || saṁpradhāryeti te cakrurliṁgārādhanamuttamam

'ईश्वर सैकड़ों अपराधों के किस कर्म से प्रसन्न होते हैं?' - यह भलीभाँति विचार कर उन्होंने लिंगाराधना को ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग मान लिया।

श्लोक 68 (skanda.4.53.68)

एकस्मिञ्शांभवे लिंगे विधिनात्र समर्चिते ॥ क्षमेत्त्र्यक्षोपराधानां शतं मोक्षं च यच्छति

ekasmiñśāṁbhave liṁge vidhinātra samarcite || kṣamettryakṣoparādhānāṁ śataṁ mokṣaṁ ca yacchati

एक ही शाम्भव लिंग की विधिपूर्वक पूजा करने से त्र्यक्ष शिव सौ अपराधों को क्षमा कर देते हैं और मोक्ष भी प्रदान करते हैं।

श्लोक 69 (skanda.4.53.69)

न तुष्यति तथा शंभुर्यज्ञदानतपोव्रतैः ॥ यथा तुष्येत्सकृल्लिंगे विधिनाभ्यर्चिते सति

na tuṣyati tathā śaṁbhuryajñadānatapovrataiḥ || yathā tuṣyetsakṛlliṁge vidhinābhyarcite sati

शम्भु उतने यज्ञ, दान, तप और व्रत से प्रसन्न नहीं होते, जितने वे विधिपूर्वक पूजित लिंग से एक बार में ही प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 70 (skanda.4.53.70)

लिंगार्चनविधानज्ञो लिंगार्चनरतः सदा ॥ त्र्यक्ष एव स विज्ञेयः साक्षाद्द्व्यक्षोपि मानवः

liṁgārcanavidhānajño liṁgārcanarataḥ sadā || tryakṣa eva sa vijñeyaḥ sākṣāddvyakṣopi mānavaḥ

लिंगपूजा की विधि जानने वाला, सदा लिंगपूजा में रत रहने वाला मनुष्य, साक्षात् दो नेत्रों वाला होकर भी, त्रिनेत्र के समान ही जानना चाहिए।

श्लोक 71 (skanda.4.53.71)

न गोशतप्रदानेन न स्वर्णशतदानतः ॥ तत्फलं लभ्यते पुंभिर्यत्सकृल्लिंगपूजनात्

na gośatapradānena na svarṇaśatadānataḥ || tatphalaṁ labhyate puṁbhiryatsakṛlliṁgapūjanāt

सौ गौओं के दान से या सौ स्वर्णदानों से मनुष्य वह फल प्राप्त नहीं करते, जो फल एक बार लिंग-पूजा से प्राप्त होता है।

श्लोक 72 (skanda.4.53.72)

अश्वमेधादिभिर्यागैर्न तत्फलमवाप्यते ॥ यत्फलं लभ्यते मर्त्यैर्नित्यं लिंगप्रपूजनात्

aśvamedhādibhiryāgairna tatphalamavāpyate || yatphalaṁ labhyate martyairnityaṁ liṁgaprapūjanāt

अश्वमेध आदि यज्ञों से भी वह फल प्राप्त नहीं होता, जो फल मनुष्य नित्य लिंग-पूजा से प्राप्त करते हैं।

श्लोक 73 (skanda.4.53.73)

स्नापयित्वा विधानेन यो लिंगस्नपनोदकम् ॥ त्रिः पिबेत्त्रिविधं पापं तस्येहाशु प्रणश्यति

snāpayitvā vidhānena yo liṁgasnapanodakam || triḥ pibettrividhaṁ pāpaṁ tasyehāśu praṇaśyati

जो व्यक्ति विधिपूर्वक लिंग को स्नान कराकर उसका जल तीन बार पी लेता है, उसका त्रिविध पाप यहाँ शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।

श्लोक 74 (skanda.4.53.74)

लिंग स्नपनवार्भिर्यः कुर्यान्मूर्ध्न्यभिषेचनम् ॥ गंगास्नानफलं तस्य जायतेत्र विपाप्मनः

liṁga snapanavārbhiryaḥ kuryānmūrdhnyabhiṣecanam || gaṁgāsnānaphalaṁ tasya jāyatetra vipāpmanaḥ

लिंग-स्नपन के जल से जो अपने मस्तक का अभिषेक करता है, उसे यहाँ पापरहित होकर गंगा-स्नान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 75 (skanda.4.53.75)

लिंगं समर्चितं दृष्ट्वा यः कुर्यात्प्रणतिं सकृत् ॥ संदेहो जायते तस्य पुनर्देहनिबंधने

liṁgaṁ samarcitaṁ dṛṣṭvā yaḥ kuryātpraṇatiṁ sakṛt || saṁdeho jāyate tasya punardehanibaṁdhane

पूजित लिंग का दर्शन करके जो एक बार भी प्रणाम कर लेता है, उसके पुनः देह धारण करने में संदेह उत्पन्न हो जाता है।

श्लोक 76 (skanda.4.53.76)

लिंगं यः स्थापयेद्भक्त्या सप्तजन्मकृतादघात् ॥ मुच्यते नात्र संदेहो विशुद्धः स्वर्गभाग्भवेत्

liṁgaṁ yaḥ sthāpayedbhaktyā saptajanmakṛtādaghāt || mucyate nātra saṁdeho viśuddhaḥ svargabhāgbhavet

जो भक्तिपूर्वक लिंग की स्थापना करता है, वह सात जन्मों में किए गए पाप से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं; वह विशुद्ध होकर स्वर्ग का भागी बनता है।

श्लोक 77 (skanda.4.53.77)

विचार्येति गणैः काश्यां स्वामिद्रोहोपशांतये ॥ प्रतिष्ठितानि लिंगानि महापातकभिंद्यपि

vicāryeti gaṇaiḥ kāśyāṁ svāmidrohopaśāṁtaye || pratiṣṭhitāni liṁgāni mahāpātakabhiṁdyapi

अपने स्वामी के प्रति हुए अपराध को शान्त करने के लिए, इस प्रकार विचार कर गणों ने काशी में महापातकों को भी नष्ट करने वाले लिंगों की प्रतिष्ठा की।

श्लोक 78 (skanda.4.53.78)

कुंडोदरेश्वरं लिंगं दृष्ट्वा लोलार्कसन्निधौ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते

kuṁḍodareśvaraṁ liṁgaṁ dṛṣṭvā lolārkasannidhau || sarvapāpavinirmuktaḥ śivaloke mahīyate

लोलार्क के समीप कुण्डोदरेश्वर लिंग का दर्शन करके मनुष्य सर्वपापों से विमुक्त होकर शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 79 (skanda.4.53.79)

कुंडोदरेश्वराल्लिंगात्प्रतीच्यामसिरोधसि ॥ मयूरेश्वरमभ्यर्च्य न गर्भं प्रतिपद्यते

kuṁḍodareśvarālliṁgātpratīcyāmasirodhasi || mayūreśvaramabhyarcya na garbhaṁ pratipadyate

कुण्डोदरेश्वर लिंग से पश्चिम में असि नदी के तट पर मयूरेश्वर की अर्चना करके मनुष्य पुनः गर्भ को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 80 (skanda.4.53.80)

मयूरेशप्रतीच्यां च लिंगं बाणेश्वरं महत् ॥ तस्य दर्शनमात्रेण सर्वैः पापैः प्रमुच्यते

mayūreśapratīcyāṁ ca liṁgaṁ bāṇeśvaraṁ mahat || tasya darśanamātreṇa sarvaiḥ pāpaiḥ pramucyate

मयूरेश्वर से पश्चिम में महान बाणेश्वर लिंग है; उसके दर्शन मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 81 (skanda.4.53.81)

गोकर्णेशं महालिंगमंतर्गेहस्य पश्चिमे ॥ द्वारे समर्च्य वै काश्यां न विघ्नैरभिभूयते

gokarṇeśaṁ mahāliṁgamaṁtargehasya paścime || dvāre samarcya vai kāśyāṁ na vighnairabhibhūyate

अन्तर्गृह के पश्चिम द्वार पर स्थित गोकर्णेश्वर महालिंग की काशी में पूजा करके मनुष्य विघ्नों से पराभूत नहीं होता।

श्लोक 82 (skanda.4.53.82)

गोकर्णेश्वर भक्तस्य पंचत्व समये सति ॥ ज्ञानभ्रंशो न जायेत क्वचिदप्यंतमृच्छतः

gokarṇeśvara bhaktasya paṁcatva samaye sati || jñānabhraṁśo na jāyeta kvacidapyaṁtamṛcchataḥ

गोकर्णेश्वर के भक्त को मृत्यु के समय भी ज्ञान का भ्रंश नहीं होता, चाहे वह कहीं भी अन्तिम श्वास ले।

श्लोक 83 (skanda.4.53.83)

॥स्कंद उवाच॥ चिरयत्सुगणेष्वेषु चतुर्ष्वपिगणेश्वरः ॥ महिमानं महत्त्वं तु तत्काश्याः पर्यवर्णयत्

||skaṁda uvāca|| cirayatsugaṇeṣveṣu caturṣvapigaṇeśvaraḥ || mahimānaṁ mahattvaṁ tu tatkāśyāḥ paryavarṇayat

स्कन्द ने कहा - इन चारों गणों के भी वहाँ चिरकाल तक रह जाने पर, गणेश्वर शिव ने काशी की महिमा और महत्ता का पूर्ण वर्णन ही कर डाला।

श्लोक 84 (skanda.4.53.84)

वैष्णव्या मायया विश्वं भ्राम्येतात्र ययाखिलम्॥ ध्रुवं मूर्तिमती सैषा काशी विश्वैकमोहिनी

vaiṣṇavyā māyayā viśvaṁ bhrāmyetātra yayākhilam|| dhruvaṁ mūrtimatī saiṣā kāśī viśvaikamohinī

'वैष्णवी माया से यह सम्पूर्ण विश्व भ्रमित होता है, परन्तु काशी तो निश्चय ही उस माया की साक्षात् मूर्ति है, विश्व की एकमात्र मोहिनी।'

श्लोक 85 (skanda.4.53.85)

अपास्य सोदरान्दारान्पुत्रं क्षेत्रं गृहं वसु ॥ अप्यंगीकृत्य निधनं सर्वे काशीमुपासते

apāsya sodarāndārānputraṁ kṣetraṁ gṛhaṁ vasu || apyaṁgīkṛtya nidhanaṁ sarve kāśīmupāsate

'भाइयों, पत्नियों, पुत्रों, खेत, घर और धन को त्यागकर, यहाँ तक कि मृत्यु को भी स्वीकार करके, सभी काशी की ही उपासना करते हैं।'

श्लोक 86 (skanda.4.53.86)

मरणादपि नो काश्यां भयं यत्र मनागपि ॥ गणास्तत्र तु तिष्ठंतः कुतो मत्तोपि बिभ्यति

maraṇādapi no kāśyāṁ bhayaṁ yatra manāgapi || gaṇāstatra tu tiṣṭhaṁtaḥ kuto mattopi bibhyati

'जहाँ मृत्यु से भी लेशमात्र भय नहीं होता, वहाँ रहते हुए गण मुझसे भी क्यों डरेंगे?'

श्लोक 87 (skanda.4.53.87)

मरणं मंगलं यत्र विभूतिर्यत्र भूषणम् ॥ कौपीनं यत्र कौशेयं काशी कुत्रोपमीयते

maraṇaṁ maṁgalaṁ yatra vibhūtiryatra bhūṣaṇam || kaupīnaṁ yatra kauśeyaṁ kāśī kutropamīyate

'जहाँ मरण भी मंगल है, विपत्ति भी आभूषण है, जहाँ कौपीन भी रेशमी वस्त्र के समान है - काशी की तुलना किससे की जाए?'

श्लोक 88 (skanda.4.53.88)

निर्वाणरमणी यत्र रंकं वाऽरंकमेव वा ॥ ब्राह्मणं वा श्वपाकं वा वृणीते प्रांत्यभूषणम्

nirvāṇaramaṇī yatra raṁkaṁ vā'raṁkameva vā || brāhmaṇaṁ vā śvapākaṁ vā vṛṇīte prāṁtyabhūṣaṇam

'जहाँ निर्वाण-रूपी रमणी दरिद्र या धनी, ब्राह्मण या चाण्डाल - किसी को भी अन्तिम आभूषण के रूप में वर लेती है।'

श्लोक 89 (skanda.4.53.89)

मृतानां यत्र जंतूनां निर्वाणपदमृच्छताम् ॥ कोट्यंशेनापि न समा अपि शक्रादयः सुराः

mṛtānāṁ yatra jaṁtūnāṁ nirvāṇapadamṛcchatām || koṭyaṁśenāpi na samā api śakrādayaḥ surāḥ

'वहाँ मरने वाले प्राणियों की, जो निर्वाण-पद को प्राप्त करते हैं, कोटि-अंश में भी बराबरी इन्द्र आदि देवता भी नहीं कर सकते।'

श्लोक 90 (skanda.4.53.90)

यत्र काश्यां मृतो जंतुर्ब्रह्मनारायणादिभिः ॥ प्रबद्ध मूर्धांजलिभिर्नमस्येतातियत्नतः

yatra kāśyāṁ mṛto jaṁturbrahmanārāyaṇādibhiḥ || prabaddha mūrdhāṁjalibhirnamasyetātiyatnataḥ

'काशी में मरे हुए प्राणी को ब्रह्मा, नारायण आदि भी हाथ जोड़कर सिर झुकाए अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक प्रणाम करते हैं।'

श्लोक 91 (skanda.4.53.91)

यत्र काश्यां शवत्वेपि जंतुर्नाशुचितां व्रजेत् ॥ अतस्तत्कर्णसंस्पर्शं करोम्यहमपि स्वयम्

yatra kāśyāṁ śavatvepi jaṁturnāśucitāṁ vrajet || atastatkarṇasaṁsparśaṁ karomyahamapi svayam

'जहाँ काशी में शव होने पर भी प्राणी अशुद्धता को प्राप्त नहीं होता, इसलिए मैं स्वयं भी उसके कान का स्पर्श करता हूँ।'

श्लोक 92 (skanda.4.53.92)

यस्तु काशीति काशीति द्विस्त्रिर्जपति पुण्यवान् ॥ अपि सर्वपवित्रेभ्यः स पवित्रतरो महान्

yastu kāśīti kāśīti dvistrirjapati puṇyavān || api sarvapavitrebhyaḥ sa pavitrataro mahān

'जो पुण्यवान दो-तीन बार भी "काशी, काशी" जपता है, वह सब पवित्र वस्तुओं से भी अधिक महान पवित्र है।'

श्लोक 93 (skanda.4.53.93)

येन काशी हृदि ध्याता येन काशीह सेविता ॥ तेनाहं हृदि संध्यातस्तेनाहं सेवितः सदा

yena kāśī hṛdi dhyātā yena kāśīha sevitā || tenāhaṁ hṛdi saṁdhyātastenāhaṁ sevitaḥ sadā

'जिसने हृदय में काशी का ध्यान किया है, जिसने यहाँ काशी की सेवा की है, उसी के द्वारा मेरा भी हृदय में ध्यान किया गया है, उसी के द्वारा मेरी भी सेवा सदा हुई है।'

श्लोक 94 (skanda.4.53.94)

काशीं यः सेवते जंतुर्निर्विकल्पेन चेतसा ॥ तमहं हृदये नित्यं धारयामि प्रयत्नतः

kāśīṁ yaḥ sevate jaṁturnirvikalpena cetasā || tamahaṁ hṛdaye nityaṁ dhārayāmi prayatnataḥ

'जो प्राणी निर्विकल्प चित्त से काशी की सेवा करता है, उसे मैं सदा अपने हृदय में प्रयत्नपूर्वक धारण किए रहता हूँ।'

श्लोक 95 (skanda.4.53.95)

स्वयं वस्तुमशक्तोपि वासयेत्तीर्थवासिनम् ॥ अप्येकमपि मूल्येन स वस्तुःफलभाग्ध्रुवम्

svayaṁ vastumaśaktopi vāsayettīrthavāsinam || apyekamapi mūlyena sa vastuḥphalabhāgdhruvam

'स्वयं वस्तु देने में असमर्थ होते हुए भी जो कोई तीर्थवासी को केवल एक ही मूल्य से भी बसा दे, वह निश्चय ही उस वस्तु के फल का भागी होता है।'

श्लोक 96 (skanda.4.53.96)

काश्यां वसंति ये धीरा आपंचत्व विनिश्चयाः ॥ जीवन्मुक्तास्तु ते ज्ञेया वंद्याः पूज्यास्त एव हि

kāśyāṁ vasaṁti ye dhīrā āpaṁcatva viniścayāḥ || jīvanmuktāstu te jñeyā vaṁdyāḥ pūjyāsta eva hi

'जो धीर पुरुष काशी में मृत्यु का पूर्ण निश्चय करके वास करते हैं, वे जीवन्मुक्त ही जानने चाहिए; वे ही वन्दनीय और पूज्य हैं।'

श्लोक 97 (skanda.4.53.97)

इत्थं विमृश्य बहुशः स्थाणुर्वाराणसीगुणान् ॥ गणानन्यान्समाहूय प्राहिणोत्प्रीतिपूर्वकम्

itthaṁ vimṛśya bahuśaḥ sthāṇurvārāṇasīguṇān || gaṇānanyānsamāhūya prāhiṇotprītipūrvakam

इस प्रकार स्थाणु ने वाराणसी के गुणों पर बार-बार विचार करके, अन्य गणों को बुलाकर प्रेम-पूर्वक भेजा -

श्लोक 98 (skanda.4.53.98)

तारकत्वं समागच्छ गच्छाति स्वच्छमानस ॥ दिवोदासो वृषावासो यामधीष्टे वरां पुरीम्

tārakatvaṁ samāgaccha gacchāti svacchamānasa || divodāso vṛṣāvāso yāmadhīṣṭe varāṁ purīm

'हे स्वच्छमना तारक! तुम जाकर उस श्रेष्ठ नगरी में तारकत्व को प्राप्त करो, जहाँ वृषभवाहन दिवोदास निवास करता है।'

श्लोक 99 (skanda.4.53.99)

तिलपर्ण स्धूलकर्ण दृमिचंड प्रभामय ॥ सुकेश विंदते छाग कपर्दिन्पिंगलाक्षक

tilaparṇa sdhūlakarṇa dṛmicaṁḍa prabhāmaya || sukeśa viṁdate chāga kapardinpiṁgalākṣaka

तिलपर्ण, स्थूलकर्ण, द्रुमिचण्ड, प्रभामय, सुकेश, विन्दति-छाग, कपर्दी, पिंगलाक्षक,

श्लोक 100 (skanda.4.53.100)

वीरभद्र किराताख्य चतुर्मुख निकुंभक ॥ पंचाक्ष भारभूताख्य त्र्यक्ष क्षेमकलांगलिन्

vīrabhadra kirātākhya caturmukha nikuṁbhaka || paṁcākṣa bhārabhūtākhya tryakṣa kṣemakalāṁgalin

वीरभद्र, किरात नाम वाले, चतुर्मुख, निकुम्भक, पंचाक्ष, भारभूत नाम वाले, त्र्यक्ष, क्षेमक, लांगली,

श्लोक 101 (skanda.4.53.101)

विराध सुमुखाषाढे यांतु सर्वे पृथक्पृथक् ॥ एते गणा महाभागाः स्वामिभक्ता दृढव्रताः

virādha sumukhāṣāḍhe yāṁtu sarve pṛthakpṛthak || ete gaṇā mahābhāgāḥ svāmibhaktā dṛḍhavratāḥ

विराध, सुमुख, आषाढ - 'तुम सब अलग-अलग जाओ'; ये सब महाभाग्यशाली गण अपने स्वामी के भक्त और दृढ़व्रती थे।

श्लोक 102 (skanda.4.53.102)

कृत्वा माया बहुविधा बहुरूपा विचक्षणाः॥ अनिमेषेक्षणास्तस्थुः क्षोणीशच्छिद्रकांक्षिणः

kṛtvā māyā bahuvidhā bahurūpā vicakṣaṇāḥ|| animeṣekṣaṇāstasthuḥ kṣoṇīśacchidrakāṁkṣiṇaḥ

अनेक प्रकार की बहुरूपिणी माया रचकर, चतुर वे सब वहाँ राजा के छिद्र की खोज करते हुए अनिमेष दृष्टि से बैठे रहे।

श्लोक 103 (skanda.4.53.103)

अपरुज्ञात तच्छिद्रा विद्रावितयशोधनाः॥ आः किमेतदहोजातं निनिंदुः स्वमितीह ते

aparujñāta tacchidrā vidrāvitayaśodhanāḥ|| āḥ kimetadahojātaṁ niniṁduḥ svamitīha te

उसका छिद्र न जान पाने के कारण, उनकी सारी सम्मान-सम्पत्ति विदीर्ण हो गई; उन्होंने स्वयं ही खीझकर कहा - 'अहो, यह क्या हो गया!'

श्लोक 104 (skanda.4.53.104)

॥गणा ऊचुः॥ धिगस्मान्स्वामिना नित्यं कृतसंभावनान्मुहुः ॥ मनुष्यमात्रमप्यत्र यैरेकं न वशीकृतम्

||gaṇā ūcuḥ|| dhigasmānsvāminā nityaṁ kṛtasaṁbhāvanānmuhuḥ || manuṣyamātramapyatra yairekaṁ na vaśīkṛtam

गण बोले - 'हमें धिक्कार है, कि जिन्हें स्वामी ने सदा बार-बार सम्मान दिया, उन हमने भी यहाँ एक मनुष्य मात्र को भी वश में नहीं किया।'

श्लोक 105 (skanda.4.53.105)

बहुमानेन दानेन सौहार्देन महीयसा ॥ कृतप्रसादांस्त्र्यक्षेण धिङ्नस्तत्कार्यवंचकान्

bahumānena dānena sauhārdena mahīyasā || kṛtaprasādāṁstryakṣeṇa dhiṅnastatkāryavaṁcakān

'महान सम्मान से, दान से, विशाल सौहार्द से त्रिनेत्र ने हम पर कृपा की - उस कार्य में असफल होने वाले हमें धिक्कार है।'

श्लोक 106 (skanda.4.53.106)

का गतिर्नो भवित्रीह स्वामिकृत्यप्रमादिनाम् ॥ अंधं तमोमये लोके ध्रुवं वासो भविष्यति

kā gatirno bhavitrīha svāmikṛtyapramādinām || aṁdhaṁ tamomaye loke dhruvaṁ vāso bhaviṣyati

'स्वामी के कार्य में प्रमाद करने वाले हमारी क्या गति होगी? निश्चय ही अन्धकारमय लोक में हमारा वास होगा।'

श्लोक 107 (skanda.4.53.107)

अकृतस्वामिकार्याणामहो जीवितधारिणाम्॥ अक्षतेंद्रियवृत्तीनां दुर्गतिश्च पदे पदे

akṛtasvāmikāryāṇāmaho jīvitadhāriṇām|| akṣateṁdriyavṛttīnāṁ durgatiśca pade pade

'अहो! जीवन धारण करते हुए भी जिन्होंने स्वामी का कार्य नहीं किया, उन इन्द्रियों से पूर्ण प्राणियों की भी पग-पग पर दुर्गति होती है।'

श्लोक 108 (skanda.4.53.108)

लब्धसंभावनानां च न्यक्कृतस्वामिकर्मणाम् ॥ भृत्यानां भूरिभाजां च भंगुराः स्युर्मनोरथाः

labdhasaṁbhāvanānāṁ ca nyakkṛtasvāmikarmaṇām || bhṛtyānāṁ bhūribhājāṁ ca bhaṁgurāḥ syurmanorathāḥ

'जिन्होंने सम्मान पाकर भी स्वामी का कार्य तिरस्कारपूर्वक छोड़ दिया, ऐसे बहुत-से भाग्यशाली सेवकों के भी मनोरथ भंग हो जाते हैं।'

श्लोक 109 (skanda.4.53.109)

अनिष्पादितकार्यार्था ये मुखं प्रेक्षयंत्यहो ॥ अपत्रपाः पुरो भर्तुस्तैर्भूर्भारवतीत्वियम्

aniṣpāditakāryārthā ye mukhaṁ prekṣayaṁtyaho || apatrapāḥ puro bhartustairbhūrbhāravatītviyam

'जो अपने कार्य को पूर्ण किए बिना, अहो, स्वामी के सामने अपना मुख दिखाते हैं, उनके कारण यह पृथ्वी भी लज्जा से भारग्रस्त हो उठती है।'

श्लोक 110 (skanda.4.53.110)

नाद्रीणां न समुद्राणां न द्रुमाणां महीयसाम् ॥ भूतधात्र्यास्तथा भारो यथा स्वामिद्रुहां महान्

nādrīṇāṁ na samudrāṇāṁ na drumāṇāṁ mahīyasām || bhūtadhātryāstathā bhāro yathā svāmidruhāṁ mahān

'पर्वतों का, समुद्रों का, विशाल वृक्षों का भार पृथ्वी को उतना नहीं दबाता, जितना स्वामी के प्रति द्रोह करने वालों का भार उसे दबाता है।'

श्लोक 111 (skanda.4.53.111)

अहो पौराणिकी गाथा स्मृतास्माभिरनिंदिता ॥ तदर्थमवलंब्येह स्थास्यामः कृतनिश्चयाः

aho paurāṇikī gāthā smṛtāsmābhiraniṁditā || tadarthamavalaṁbyeha sthāsyāmaḥ kṛtaniścayāḥ

'अहो! हमें एक निन्दारहित पौराणिक गाथा स्मरण हो आई है; उसी के सहारे यहाँ हमने यह निश्चय किया है कि हम यहीं रहेंगे।'

श्लोक 112 (skanda.4.53.112)

अनाकलितपुण्यानां परिक्षीणधनायुषाम् ॥ सर्वोपायविहीनानां गतिर्वाराणसीपुरी

anākalitapuṇyānāṁ parikṣīṇadhanāyuṣām || sarvopāyavihīnānāṁ gatirvārāṇasīpurī

'जिनके पास पुण्य नहीं, जिनका धन और आयु क्षीण हो चुके हैं, जो सभी उपायों से रहित हैं - उनकी अन्तिम गति वाराणसी नगरी ही है।'

श्लोक 113 (skanda.4.53.113)

अपुण्यभारखिन्नानां पश्चात्तापमुपेयुषाम्॥ विष्वगूर्ध्वगतीनां च गतिर्वाराणसीपुरी

apuṇyabhārakhinnānāṁ paścāttāpamupeyuṣām|| viṣvagūrdhvagatīnāṁ ca gatirvārāṇasīpurī

'पाप के भार से खिन्न, पश्चात्ताप को प्राप्त हुए, ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों प्रकार के प्राणियों की भी गति वाराणसी नगरी ही है।'

श्लोक 114 (skanda.4.53.114)

स्वामिद्रुहः कृतघ्नाश्च ये च विश्रंभघातकाः ॥ तेषां क्वापि गतिर्नास्ति मुक्त्वा वाराणसीं पुरीम्

svāmidruhaḥ kṛtaghnāśca ye ca viśraṁbhaghātakāḥ || teṣāṁ kvāpi gatirnāsti muktvā vārāṇasīṁ purīm

'जो स्वामी के प्रति द्रोही, कृतघ्न और विश्वासघाती हैं, उनकी वाराणसी नगरी को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी गति नहीं है।'

श्लोक 115 (skanda.4.53.115)

इत्थं निश्चित्य गाथार्थं प्रमथा अवतस्थिरे ॥ अविज्ञातस्वरूपाश्च दिवोदासेन भूभुजा

itthaṁ niścitya gāthārthaṁ pramathā avatasthire || avijñātasvarūpāśca divodāsena bhūbhujā

इस प्रकार उस गाथा के अर्थ का निश्चय कर, वे प्रमथ, अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर, राजा दिवोदास द्वारा पहचाने न जाकर वहीं रह गए।

श्लोक 116 (skanda.4.53.116)

न बुबोध स भूपालो नितरां बुद्धिमानपि ॥ विबुधान्विविधाकारैः स्थितानीशप्रभावतः

na bubodha sa bhūpālo nitarāṁ buddhimānapi || vibudhānvividhākāraiḥ sthitānīśaprabhāvataḥ

वह राजा, अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी, ईश्वर के प्रभाव से नाना रूपों में स्थित उन देवताओं को कभी नहीं पहचान पाया।

श्लोक 117 (skanda.4.53.117)

चित्रं न चित्रगुप्तोपि वेत्ति वाराणसीस्थितान्॥ जंतून्का गणनान्येषां मर्त्यलोकनिवासिनाम्

citraṁ na citraguptopi vetti vārāṇasīsthitān|| jaṁtūnkā gaṇanānyeṣāṁ martyalokanivāsinām

यह आश्चर्य नहीं है कि चित्रगुप्त भी वाराणसी में स्थित मनुष्यलोक-निवासी प्राणियों की गणना नहीं कर पाते।

श्लोक 118 (skanda.4.53.118)

अविच्छिन्न प्रभावाणामपरिच्छिन्न तेजसाम् ॥ कृतलिंगप्रतिष्ठानां नांतं प्राप्नोति धर्मराट्

avicchinna prabhāvāṇāmaparicchinna tejasām || kṛtaliṁgapratiṣṭhānāṁ nāṁtaṁ prāpnoti dharmarāṭ

जिन्होंने वहाँ लिंग की प्रतिष्ठा कर ली है, उन अक्षुण्ण प्रभाव वाले, अपरिमित तेज वाले प्राणियों की गणना का अन्त धर्मराज भी नहीं पा सकते।

श्लोक 119 (skanda.4.53.119)

इति ते प्रमथाः सर्वे घटोद्भव महामुने ॥ कृतलिंगार्चनाः काशीं नाद्याप्युज्झंति शर्मदाम्

iti te pramathāḥ sarve ghaṭodbhava mahāmune || kṛtaliṁgārcanāḥ kāśīṁ nādyāpyujjhaṁti śarmadām

हे घटोद्भव महामुने! इस प्रकार वे सभी प्रमथगण, लिंगार्चना करके, आज तक उस सुखदायिनी काशी को नहीं त्यागते।

श्लोक 120 (skanda.4.53.120)

तारकेशं महालिंगं तारकाख्यो गणोत्तमः ॥ तारकज्ञानदं पुंसां मुनेऽद्यापि समर्चयेत्

tārakeśaṁ mahāliṁgaṁ tārakākhyo gaṇottamaḥ || tārakajñānadaṁ puṁsāṁ mune'dyāpi samarcayet

गणश्रेष्ठ तारक नामक गण, हे मुने, आज भी तारकेश्वर नामक महालिंग की अर्चना करता है, जो मनुष्यों को तारक-ज्ञान देने वाला है।

श्लोक 121 (skanda.4.53.121)

तारकेश्वरलिंगस्य कृत्वा भक्तिसुनिश्चलाम् ॥ सुखेन तारकज्ञानं लभ्यते तैर्नरोत्तमैः

tārakeśvaraliṁgasya kṛtvā bhaktisuniścalām || sukhena tārakajñānaṁ labhyate tairnarottamaiḥ

तारकेश्वर लिंग में अत्यन्त अचल भक्ति करके, श्रेष्ठ मनुष्य सुखपूर्वक तारक-ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 122 (skanda.4.53.122)

तिलपर्णेश्वरं लिंगं तिलपर्ण प्रतिष्ठितम् ॥ तिलप्रमाणमप्यत्र दृष्ट्वा पापं न संभवेत्

tilaparṇeśvaraṁ liṁgaṁ tilaparṇa pratiṣṭhitam || tilapramāṇamapyatra dṛṣṭvā pāpaṁ na saṁbhavet

तिलपर्ण द्वारा स्थापित तिलपर्णेश्वर लिंग का यहाँ तिल-मात्र भी दर्शन करने से पाप की सम्भावना नहीं रहती।

श्लोक 123 (skanda.4.53.123)

स्थूलकर्णेश्वरं लिंगं परिपूज्य नरोत्तमः ॥ न दुर्गतिमवाप्नोति पुण्यमाप्नोति चोत्तमम्

sthūlakarṇeśvaraṁ liṁgaṁ paripūjya narottamaḥ || na durgatimavāpnoti puṇyamāpnoti cottamam

स्थूलकर्णेश्वर लिंग की भलीभाँति पूजा करके श्रेष्ठ मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता, अपितु उत्तम पुण्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 124 (skanda.4.53.124)

दृमिचंडेश्वरं लिंगं तथा लिंगं प्रभामयम् ॥ आराध्य तत्प्रतीच्यां च न पापैरभिभूयते

dṛmicaṁḍeśvaraṁ liṁgaṁ tathā liṁgaṁ prabhāmayam || ārādhya tatpratīcyāṁ ca na pāpairabhibhūyate

द्रुमिचण्डेश्वर लिंग की, तथा उसके पश्चिम में प्रभामय नामक लिंग की आराधना करके मनुष्य पापों से पराभूत नहीं होता।

श्लोक 125 (skanda.4.53.125)

प्रभामयेश्वरं लिंगं दृष्ट्वान्यत्रापि संस्थितः ॥ प्रभामयेन यानेन शिवलोके व्रजेत्सुधीः

prabhāmayeśvaraṁ liṁgaṁ dṛṣṭvānyatrāpi saṁsthitaḥ || prabhāmayena yānena śivaloke vrajetsudhīḥ

प्रभामयेश्वर लिंग का अन्यत्र भी स्थित होकर दर्शन करके बुद्धिमान पुरुष प्रभामय यान से शिवलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 126 (skanda.4.53.126)

सुकेशेश्वरमभ्यर्च्य हरिकेशवने नरः ॥ षाट्कौशिकमयं देहं धारयेन्न पुनःपुनः

sukeśeśvaramabhyarcya harikeśavane naraḥ || ṣāṭkauśikamayaṁ dehaṁ dhārayenna punaḥpunaḥ

हरिकेशवन में सुकेशेश्वर की अर्चना करके मनुष्य बार-बार षट्कोश से बने इस शरीर को धारण नहीं करता।

श्लोक 127 (skanda.4.53.127)

विंदतीशं नरोभ्यर्च्य भीमचंडी समीपतः ॥ त्यक्त्वा प्रचंडमप्येनो मोक्षं विंदति शाश्वतम्

viṁdatīśaṁ narobhyarcya bhīmacaṁḍī samīpataḥ || tyaktvā pracaṁḍamapyeno mokṣaṁ viṁdati śāśvatam

भीमचण्डी के समीप विन्दतीश की अर्चना करके मनुष्य प्रचण्ड पाप को भी त्यागकर शाश्वत मोक्ष को प्राप्त करता है।

श्लोक 128 (skanda.4.53.128)

छागलेशं महालिंगं पित्रीश्वरसमीपगम् ॥ विलोक्य पशुवत्कोपि न पापं प्राकृतं स्पृशेत्

chāgaleśaṁ mahāliṁgaṁ pitrīśvarasamīpagam || vilokya paśuvatkopi na pāpaṁ prākṛtaṁ spṛśet

पित्रीश्वर के समीप स्थित छागलेश महालिंग का दर्शन करके कोई भी प्राकृत पशुतुल्य पाप को नहीं छूता।

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