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काशी खण्ड · अध्याय 59

पंचनद की उत्पत्ति: धूतपापा, धर्म और पाँच नदियाँ

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (skanda.4.59.1)

अगस्त्य उवाच ॥ सर्वज्ञ हृदयानंद गौरीचुंबितमूर्धज ॥ तारकांतक षड्वक्त्र तारिणे भद्रकारिणे

agastya uvāca || sarvajña hṛdayānaṁda gaurīcuṁbitamūrdhaja || tārakāṁtaka ṣaḍvaktra tāriṇe bhadrakāriṇe

अगस्त्य ने कहा - "हे सर्वज्ञ, हृदय के आनन्द, गौरी द्वारा चूमे गए मस्तक वाले! हे तारकासुर के अन्तक, षड्मुख, तारने वाले, कल्याण करने वाले!"

श्लोक 2 (skanda.4.59.2)

सर्वज्ञाननिधे तुभ्यं नमः सर्वज्ञसूनवे ॥ सर्वथा जितमाराय कुमाराय महात्मने

sarvajñānanidhe tubhyaṁ namaḥ sarvajñasūnave || sarvathā jitamārāya kumārāya mahātmane

"सर्वज्ञान के निधान, सर्वज्ञ के पुत्र, आपको नमस्कार है; सर्वथा काम को जीतने वाले महात्मा कुमार को नमस्कार है।"

श्लोक 3 (skanda.4.59.3)

कामारिमर्धनारीशं वीक्ष्य कामकृतं किल ॥ यो जिगाय कुमारोपि मारं तस्मै नमोस्तु ते

kāmārimardhanārīśaṁ vīkṣya kāmakṛtaṁ kila || yo jigāya kumāropi māraṁ tasmai namostu te

"कामारि अर्धनारीश्वर को देखकर मानो काम से प्रेरित होते हुए भी, हे कुमार, जिन्होंने मार को भी जीत लिया, आपको नमस्कार हो।"

श्लोक 4 (skanda.4.59.4)

यदुक्तं भवता स्कंद मायाद्विजवपुर्हरिः ॥ काश्यां पंचनदं तीर्थमध्यासातीव पावनम्

yaduktaṁ bhavatā skaṁda māyādvijavapurhariḥ || kāśyāṁ paṁcanadaṁ tīrthamadhyāsātīva pāvanam

"हे स्कन्द, आपने जो कहा कि माया से ब्राह्मण-रूपधारी हरि काशी में अत्यन्त पावन पंचनद तीर्थ में निवास करने लगे..."

श्लोक 5 (skanda.4.59.5)

भूर्भुवःस्वः प्रदेशेषु काशीपरमपावनम् ॥ तत्रापि हरिणाज्ञायि तीर्थं पंचनदं परम्

bhūrbhuvaḥsvaḥ pradeśeṣu kāśīparamapāvanam || tatrāpi hariṇājñāyi tīrthaṁ paṁcanadaṁ param

"...भूः, भुवः, स्वः लोकों में काशी परम पावन है, और वहाँ भी हरि द्वारा पंचनद तीर्थ को परम [पावन] जाना गया।"

श्लोक 6 (skanda.4.59.6)

कुतः पंचनदं नाम तस्य तीर्थस्य षण्मुख ॥ कुतश्च सर्वतीर्थेभ्यस्तदासीत्पावनं परम्

kutaḥ paṁcanadaṁ nāma tasya tīrthasya ṣaṇmukha || kutaśca sarvatīrthebhyastadāsītpāvanaṁ param

"हे षण्मुख, उस तीर्थ का नाम 'पंचनद' क्यों है? और यह सभी तीर्थों से परम पावन क्यों था?"

श्लोक 7 (skanda.4.59.7)

कथं च भगवान्विष्णुरंतरात्मा जगत्पतिः ॥ सर्वेषां जगतां पाता कर्ता हर्ता च लीलया

kathaṁ ca bhagavānviṣṇuraṁtarātmā jagatpatiḥ || sarveṣāṁ jagatāṁ pātā kartā hartā ca līlayā

"और भगवान् विष्णु, जो अन्तरात्मा, जगत्पति, सम्पूर्ण जगतों के पालक, लीला से रचयिता और संहारक हैं, वे कैसे..."

श्लोक 8 (skanda.4.59.8)

अरूपो रूपमापन्नो ह्यव्यक्तो व्यक्ततां गतः ॥ निराकारोपि साकारो निष्प्रपंचः प्रपंचभाक्

arūpo rūpamāpanno hyavyakto vyaktatāṁ gataḥ || nirākāropi sākāro niṣprapaṁcaḥ prapaṁcabhāk

"...रूपरहित होकर भी रूप धारण करने वाले, अव्यक्त होकर भी व्यक्त होने वाले, निराकार होकर भी साकार, प्रपंच से परे होकर भी प्रपंच में सम्मिलित..."

श्लोक 9 (skanda.4.59.9)

अजन्मानेकजन्मा च त्वनामास्फुटनामभृत् ॥ निरालंबोऽखिलालंबो निर्गुणोपि गुणास्पदम्

ajanmānekajanmā ca tvanāmāsphuṭanāmabhṛt || nirālaṁbo'khilālaṁbo nirguṇopi guṇāspadam

"...अजन्मा होकर भी अनेक जन्म लेने वाले, नामरहित होकर भी स्पष्ट नाम धारण करने वाले, निराधार होकर भी सबके आधार, निर्गुण होकर भी गुणों के आश्रय..."

श्लोक 10 (skanda.4.59.10)

अहृषीकोहृषीकेशो प्यनंघ्रिरपिसर्वगः ॥ उपसंहृत्य रूपं स्वं सर्वव्यापी जनार्दनः

ahṛṣīkohṛṣīkeśo pyanaṁghrirapisarvagaḥ || upasaṁhṛtya rūpaṁ svaṁ sarvavyāpī janārdanaḥ

"...इन्द्रियरहित होकर भी हृषीकेश, चरणरहित होकर भी सर्वगामी - सर्वव्यापी जनार्दन अपने रूप का उपसंहार कर..."

श्लोक 11 (skanda.4.59.11)

स्थितः सर्वात्मभावेन तीर्थे पंचनदे परे ॥ एतदाख्याहि षड्वक्त्र पंचवक्त्राद्यथा श्रुतम्

sthitaḥ sarvātmabhāvena tīrthe paṁcanade pare || etadākhyāhi ṣaḍvaktra paṁcavaktrādyathā śrutam

"...सर्वात्मभाव से उस श्रेष्ठ पंचनद तीर्थ में कैसे स्थित हुए? हे षड्वक्त्र, जैसा आपने पंचवक्त्र (शिव) से सुना है, वही बताइए।"

श्लोक 12 (skanda.4.59.12)

स्कंद उवाच ॥ कथयामि कथामेतां नमस्कृत्य महेश्वरम् ॥ सर्वाघौघ प्रशमनीं सर्वश्रेयोविधायिनीम्

skaṁda uvāca || kathayāmi kathāmetāṁ namaskṛtya maheśvaram || sarvāghaugha praśamanīṁ sarvaśreyovidhāyinīm

स्कन्द ने कहा - महेश्वर को नमस्कार कर, सम्पूर्ण पापों को शान्त करने वाली और सब कल्याण करने वाली इस कथा को मैं कहता हूँ।

श्लोक 13 (skanda.4.59.13)

यथा पंचनदं तीर्थं काश्यां प्रथितिमागतम् ॥ यन्नामग्रहणादेव पापं याति सहस्रधा

yathā paṁcanadaṁ tīrthaṁ kāśyāṁ prathitimāgatam || yannāmagrahaṇādeva pāpaṁ yāti sahasradhā

जिस प्रकार पंचनद तीर्थ काशी में प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ - जिसके नाम के उच्चारण मात्र से पाप सहस्रधा नष्ट हो जाता है -

श्लोक 14 (skanda.4.59.14)

प्रयागोपि च तीर्थेशो यत्र साक्षात्स्वयं स्थितः ॥ पापिनां पापसंघातं प्रसह्य निजतेजसा

prayāgopi ca tīrtheśo yatra sākṣātsvayaṁ sthitaḥ || pāpināṁ pāpasaṁghātaṁ prasahya nijatejasā

तीर्थों का स्वामी प्रयाग भी, जहाँ वह स्वयं साक्षात् स्थित है, अपने ही तेज से पापियों के पाप-समूह को बलपूर्वक हर लेता है -

श्लोक 15 (skanda.4.59.15)

हरंति सर्वतीर्थानि प्रयागस्य बलेन हि ॥ तानि सर्वाणि तीर्थानि माघे मकरगे रवौ

haraṁti sarvatīrthāni prayāgasya balena hi || tāni sarvāṇi tīrthāni māghe makarage ravau

प्रयाग के बल से ही सम्पूर्ण तीर्थ [पाप] हर लेते हैं। वे सम्पूर्ण तीर्थ माघ मास में, सूर्य के मकर राशि में होने पर -

श्लोक 16 (skanda.4.59.16)

प्रत्यब्दं निर्मलानि स्युस्तीर्थराज समागमात् ॥ प्रयागश्चापि तीर्थेंद्रः सर्वतीर्थार्पितं मलम्

pratyabdaṁ nirmalāni syustīrtharāja samāgamāt || prayāgaścāpi tīrtheṁdraḥ sarvatīrthārpitaṁ malam

-तीर्थराज के संगम से प्रतिवर्ष निर्मल होते हैं। और तीर्थेन्द्र प्रयाग स्वयं, सम्पूर्ण तीर्थों द्वारा अर्पित मल को...

श्लोक 17 (skanda.4.59.17)

महाघिनां महाघं च हरेत्पांचनदाद्बलात् ॥ यं संचयति पापौघमावर्षं तीर्थनायकः ॥ तमेकमज्जनादूर्जे त्यजेत्पंचनदे ध्रुवम्

mahāghināṁ mahāghaṁ ca haretpāṁcanadādbalāt || yaṁ saṁcayati pāpaughamāvarṣaṁ tīrthanāyakaḥ || tamekamajjanādūrje tyajetpaṁcanade dhruvam

...पंचनद के बल से हर लेता है, चाहे वह महापापियों का महापाप ही क्यों न हो। तीर्थनायक (प्रयाग) जो पाप-समूह वर्षभर संचित करता है, उसे वह एक ही बार ऊर्ज (कार्तिक) मास में पंचनद में डुबकी लगाकर निश्चय ही त्याग देता है।

श्लोक 18 (skanda.4.59.18)

यथा पंचनदोत्पत्तिस्तथा च कथयाम्यहम् ॥ निशामय महाभाग मित्रावरुणनंदन

yathā paṁcanadotpattistathā ca kathayāmyaham || niśāmaya mahābhāga mitrāvaruṇanaṁdana

और जैसे पंचनद की उत्पत्ति हुई, वह भी मैं कहता हूँ - हे महाभाग मित्रावरुणनन्दन, सुनिए।

श्लोक 19 (skanda.4.59.19)

पुरा वेदशिरा नाम मुनिरासीन्महातपाः ॥ भृगुवंश समुत्पन्नो मूर्तो वेद इवापरः

purā vedaśirā nāma munirāsīnmahātapāḥ || bhṛguvaṁśa samutpanno mūrto veda ivāparaḥ

पूर्वकाल में वेदशिरा नामक एक महातपस्वी मुनि थे, भृगुवंश में उत्पन्न, मानो साक्षात् वेद के दूसरे मूर्तिमान् रूप।

श्लोक 20 (skanda.4.59.20)

तपस्यतस्तस्य मुनेः पुरोदृग्गोचरं गता ॥ शुचिरप्सरसां श्रेष्ठा रूपलावण्यशालिनी

tapasyatastasya muneḥ purodṛggocaraṁ gatā || śucirapsarasāṁ śreṣṭhā rūpalāvaṇyaśālinī

तपस्या करते हुए उस मुनि की दृष्टि के सामने अप्सराओं में श्रेष्ठ, रूप-लावण्य से सुशोभित शुचि नामक अप्सरा आ गई।

श्लोक 21 (skanda.4.59.21)

तस्या दर्शनमात्रेण परिक्षुब्धं मुनेर्मनः ॥ चस्कंद स मुनिस्तूर्णं साथ भीता वराप्सराः

tasyā darśanamātreṇa parikṣubdhaṁ munermanaḥ || caskaṁda sa munistūrṇaṁ sātha bhītā varāpsarāḥ

उसे देखते ही मुनि का मन क्षुब्ध हो गया, और मुनि का वीर्य तुरन्त स्खलित हो गया; तब वह सुन्दर अप्सरा भयभीत हो गई।

श्लोक 22 (skanda.4.59.22)

दूरादेव नमस्कृत्य तमृषिं साभ्यभाषत ॥ अतीव वेपमानांगी शुचिस्तच्छापभीतितः

dūrādeva namaskṛtya tamṛṣiṁ sābhyabhāṣata || atīva vepamānāṁgī śucistacchāpabhītitaḥ

दूर से ही उस ऋषि को प्रणाम कर, शाप के भय से अत्यन्त काँपते हुए अंगों वाली शुचि ने उनसे कहा -

श्लोक 23 (skanda.4.59.23)

नापराध्नोम्यहं किंचिन्महोग्रतपसांनिधे ॥ क्षंतव्यं मे क्षमाधार क्षमारूपास्तपस्विनः

nāparādhnomyahaṁ kiṁcinmahogratapasāṁnidhe || kṣaṁtavyaṁ me kṣamādhāra kṣamārūpāstapasvinaḥ

"हे महाघोर तपस्या के निधान, मैंने कोई अपराध नहीं किया; हे क्षमा के आधार, मुझे क्षमा कीजिए - तपस्वी तो स्वयं क्षमा-रूप होते हैं।"

श्लोक 24 (skanda.4.59.24)

मुनीनां मानसं प्रायो यत्पद्मादपि तन्मृदु ॥ स्त्रियः कठोरहृदयाः स्वरूपेणैव सत्तम

munīnāṁ mānasaṁ prāyo yatpadmādapi tanmṛdu || striyaḥ kaṭhorahṛdayāḥ svarūpeṇaiva sattama

"हे सत्तम, मुनियों का मन प्रायः कमल से भी अधिक कोमल होता है, परन्तु स्त्रियाँ स्वभाव से ही कठोर हृदय वाली होती हैं।"

श्लोक 25 (skanda.4.59.25)

इति श्रुत्वा वचस्तस्याः शुचेरप्सरसो मुनिः ॥ विवेकसेतुना स्तंभीन्महारोषनदीरयम्

iti śrutvā vacastasyāḥ śucerapsaraso muniḥ || vivekasetunā staṁbhīnmahāroṣanadīrayam

शुचि अप्सरा की यह बात सुनकर, मुनि ने विवेक के बाँध से अपने महान् क्रोध की नदी के वेग को रोक लिया।

श्लोक 26 (skanda.4.59.26)

उवाच च प्रसन्नात्मा शुचे शुचिरसि ध्रुवम् ॥ न मेऽल्पोपि हि दोषोत्र न ते दोषोस्ति सुंदरि

uvāca ca prasannātmā śuce śucirasi dhruvam || na me'lpopi hi doṣotra na te doṣosti suṁdari

और प्रसन्न मन से बोले - "हे शुचि, तुम निश्चय ही पवित्र हो; इसमें न मेरा तनिक भी दोष है, न तुम्हारा, हे सुन्दरी।"

श्लोक 27 (skanda.4.59.27)

वह्निस्वरूपा ललना नवनीत समः पुमान् ॥ अनभिज्ञा वदंतीति विचारान्महदंतरम्

vahnisvarūpā lalanā navanīta samaḥ pumān || anabhijñā vadaṁtīti vicārānmahadaṁtaram

"अज्ञानी लोग कहते हैं कि स्त्री अग्निस्वरूपा है और पुरुष मक्खन के समान; परन्तु विचार करने पर तो [इसमें] बड़ा अन्तर है।"

श्लोक 28 (skanda.4.59.28)

स्निह्येदुद्धृतसारोपि वह्नेः संस्पर्शमाप्य वै ॥ चित्रं स्त्र्याख्या समादानात्पुमान्स्निह्यति दूरतः

snihyeduddhṛtasāropi vahneḥ saṁsparśamāpya vai || citraṁ stryākhyā samādānātpumānsnihyati dūrataḥ

"सार निकाला हुआ मक्खन भी अग्नि के प्रत्यक्ष स्पर्श से पिघलता है; किन्तु आश्चर्य यह है कि पुरुष स्त्री के नाम-मात्र लेने से ही दूर से पिघल जाता है।"

श्लोक 29 (skanda.4.59.29)

अतः शुचे न भेतव्यं त्वया शुचि मनोगते ॥ अतर्कितोपस्थितया त्वया च स्खलितं मया

ataḥ śuce na bhetavyaṁ tvayā śuci manogate || atarkitopasthitayā tvayā ca skhalitaṁ mayā

"अतः हे पवित्र-मना शुचि, तुम्हें भय नहीं करना चाहिए; अकस्मात् उपस्थित होकर तुमने ही मुझे स्खलित किया।"

श्लोक 30 (skanda.4.59.30)

स्खलनान्न तथा हानिरकामात्तपसो मुनेः ॥ यथा क्षणांधीकरणाद्धानिः कोपरयादरेः

skhalanānna tathā hānirakāmāttapaso muneḥ || yathā kṣaṇāṁdhīkaraṇāddhāniḥ koparayādareḥ

"अनजाने स्खलन से मुनि की तपस्या की उतनी हानि नहीं होती, जितनी हानि क्षणभर के अन्धकार को उत्पन्न करने वाले क्रोध-रूपी शत्रु के वेग से होती है।"

श्लोक 31 (skanda.4.59.31)

कोपात्तपः क्षयं याति संचितं यत्सुकृच्छ्रतः ॥ यथाभ्रपटलं प्राप्य प्रकाशः पुष्पवंतयोः

kopāttapaḥ kṣayaṁ yāti saṁcitaṁ yatsukṛcchrataḥ || yathābhrapaṭalaṁ prāpya prakāśaḥ puṣpavaṁtayoḥ

"बड़े कष्ट से संचित तप क्रोध से नष्ट हो जाता है, जैसे बादलों के परदे को पाकर सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश [ढँक जाता है]।"

श्लोक 32 (skanda.4.59.32)

अनर्थकारिणः क्रोधात्क्वार्थानांपरिजृभणम् ॥ क्व वा खलजनोत्सेधात्साधूनां परिवर्धनम्

anarthakāriṇaḥ krodhātkvārthānāṁparijṛbhaṇam || kva vā khalajanotsedhātsādhūnāṁ parivardhanam

"अनर्थ करने वाले क्रोध से भला अर्थों की वृद्धि कहाँ हो सकती है? या दुष्टजनों की उन्नति से साधुओं की वृद्धि कहाँ हो सकती है?"

श्लोक 33 (skanda.4.59.33)

अमर्षे कर्षति मनो मनोभू संभवः कुतः ॥ विधुंतुदे तुदत्युच्चैर्विधुं कुत्रास्ति कौमुदी

amarṣe karṣati mano manobhū saṁbhavaḥ kutaḥ || vidhuṁtude tudatyuccairvidhuṁ kutrāsti kaumudī

"जब असहनशीलता मन को खींचती है, तब [सच्चे] प्रेम की उत्पत्ति कहाँ हो सकती है? विधुंतुद (राहु) जब चन्द्रमा पर तीव्र आघात करता है, तब चाँदनी कहाँ रहती है?"

श्लोक 34 (skanda.4.59.34)

ज्वलतो रोषदावाग्नेः क्व वा शांतितरोः स्थितिः ॥ दृष्टा केनापि किं क्वापि सिंहात्कलभसुस्थता

jvalato roṣadāvāgneḥ kva vā śāṁtitaroḥ sthitiḥ || dṛṣṭā kenāpi kiṁ kvāpi siṁhātkalabhasusthatā

"जलते हुए क्रोध-रूपी दावाग्नि में शान्ति-रूपी वृक्ष की स्थिति कहाँ हो सकती है? क्या किसी ने कभी सिंह के सामने गजशावक को सुस्थिर देखा है?"

श्लोक 35 (skanda.4.59.35)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्रतीपः प्रतिघातुकः ॥ चतुर्वर्गस्य देहस्य परिहेयो विपश्चिता

tasmātsarvaprayatnena pratīpaḥ pratighātukaḥ || caturvargasya dehasya pariheyo vipaścitā

"इसलिए, हे विद्वान, चारों पुरुषार्थों और शरीर के भी शत्रु, प्रतिघातक क्रोध को सर्वप्रयत्न से त्याग देना चाहिए।"

श्लोक 36 (skanda.4.59.36)

इदानीं शृणु कल्याणि कर्तव्यं यत्त्वया शुचे ॥ अमोघबीजा हि वयं तद्बीजमुररी कुरु

idānīṁ śṛṇu kalyāṇi kartavyaṁ yattvayā śuce || amoghabījā hi vayaṁ tadbījamurarī kuru

"हे कल्याणी शुचि, अब सुनो कि तुम्हें क्या करना है - हमारा बीज कभी व्यर्थ नहीं जाता, अतः उस बीज को स्वीकार करो।"

श्लोक 37 (skanda.4.59.37)

एतस्मिन्रक्षिते वीर्ये परिस्कन्ने त्वदीक्षणात् ॥ त्वया तव भवित्रेकं कन्यारत्नं महाशुचि

etasminrakṣite vīrye pariskanne tvadīkṣaṇāt || tvayā tava bhavitrekaṁ kanyāratnaṁ mahāśuci

"हे महापवित्रे, तुम्हें देखकर स्खलित हुए इस वीर्य की रक्षा करने पर, तुम्हें एक कन्यारत्न की प्राप्ति होगी।"

श्लोक 38 (skanda.4.59.38)

इत्युक्ता तेन मुनिना पुनर्जातेव साप्सराः ॥ महाप्रसाद इत्युक्त्वा मुनेः शुक्रमजीगिलत्

ityuktā tena muninā punarjāteva sāpsarāḥ || mahāprasāda ityuktvā muneḥ śukramajīgilat

उस मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, वह अप्सरा मानो पुनर्जन्म पाई हुई-सी हुई; "यह महान् वरदान है" ऐसा कहकर उसने मुनि का वीर्य ग्रहण कर लिया।

श्लोक 39 (skanda.4.59.39)

अथ कालेन दिव्यस्त्री कन्यारत्नमजीजनत् ॥ अतीव नयनानंदि निधानं रूपसंपदाम्

atha kālena divyastrī kanyāratnamajījanat || atīva nayanānaṁdi nidhānaṁ rūpasaṁpadām

फिर समय आने पर उस दिव्य स्त्री ने एक कन्यारत्न को जन्म दिया, जो नेत्रों को अत्यन्त आनन्दित करने वाला, रूप-सम्पदा का निधान था।

श्लोक 40 (skanda.4.59.40)

तस्यैव वेदशिरस आश्रमे तां निधाय सा ॥ शुचिरप्सरसां श्रेष्ठा जगाम च यथेप्सितम्

tasyaiva vedaśirasa āśrame tāṁ nidhāya sā || śucirapsarasāṁ śreṣṭhā jagāma ca yathepsitam

उस कन्या को उसी वेदशिरा के आश्रम में रखकर, अप्सराओं में श्रेष्ठ शुचि अपनी इच्छानुसार चली गई।

श्लोक 41 (skanda.4.59.41)

तां च वेदशिराः कन्यां स्नेहेन समवर्धयत् ॥ क्षीरेण स्वाश्रमस्थाया हरिण्या हरिणीक्षणाम्

tāṁ ca vedaśirāḥ kanyāṁ snehena samavardhayat || kṣīreṇa svāśramasthāyā hariṇyā hariṇīkṣaṇām

वेदशिरा ने उस कन्या को स्नेह से, अपने आश्रम में स्थित हरिणी के दूध से, बड़े प्यार से पाला।

श्लोक 42 (skanda.4.59.42)

मुनिर्नाम ददौ तस्यै धूतपापेति चार्थवत् ॥ यन्नामोच्चारणेनापि कंपते पातकावली

munirnāma dadau tasyai dhūtapāpeti cārthavat || yannāmoccāraṇenāpi kaṁpate pātakāvalī

मुनि ने उसे 'धूतपापा' नाम दिया, जो सार्थक भी था - जिसके नाम-उच्चारण मात्र से पापों की पंक्ति काँप उठती है।

श्लोक 43 (skanda.4.59.43)

सर्वलक्षणशोभाढ्यां सर्वावयव सुंदरीम् ॥ मुनिस्तत्याज नोत्संगात्क्षणमात्रमपि क्वचित्

sarvalakṣaṇaśobhāḍhyāṁ sarvāvayava suṁdarīm || munistatyāja notsaṁgātkṣaṇamātramapi kvacit

सभी शुभ लक्षणों से सुशोभित, सर्वांग-सुन्दरी उस कन्या को मुनि ने कहीं भी क्षणमात्र के लिए भी अपनी गोद से नहीं छोड़ा।

श्लोक 44 (skanda.4.59.44)

दिनेदिने वर्धमानां तां पश्यन्मुमुदे भृशम् ॥ क्षीरनीरधिवद्रम्यां निशि चांद्रमसीं कलाम्

dinedine vardhamānāṁ tāṁ paśyanmumude bhṛśam || kṣīranīradhivadramyāṁ niśi cāṁdramasīṁ kalām

दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई उसे देखकर वे बहुत हर्षित होते, जैसे रात्रि में क्षीरसागर के समान मनोहर चन्द्रकला को देखकर [हर्ष होता है]।

श्लोक 45 (skanda.4.59.45)

अथाष्टवार्षिकीं दृष्ट्वा तां कन्यां स मुनीश्वरः ॥ कस्मै देयेति संचित्य तामेव समपृच्छत

athāṣṭavārṣikīṁ dṛṣṭvā tāṁ kanyāṁ sa munīśvaraḥ || kasmai deyeti saṁcitya tāmeva samapṛcchata

फिर उस कन्या को आठ वर्ष की देखकर, उस मुनीश्वर ने सोचा - "इसे किसे दूँ?" और यही उसी से पूछा।

श्लोक 46 (skanda.4.59.46)

॥वेदशिरा उवाच॥ अयि पुत्रि महाभागे धूतपापे शुभेक्षणे ॥ कस्मै दद्यावराय त्वां त्वमेवाख्याहि तं वरम्

||vedaśirā uvāca|| ayi putri mahābhāge dhūtapāpe śubhekṣaṇe || kasmai dadyāvarāya tvāṁ tvamevākhyāhi taṁ varam

वेदशिरा ने कहा - "हे पुत्री, महाभागे धूतपापे, शुभ नेत्रों वाली, मैं तुम्हें किस वर को दूँ? तुम स्वयं ही उस वर को बताओ।"

श्लोक 47 (skanda.4.59.47)

अतिस्नेहार्द्रचित्तस्य जनेतुश्चेति भाषितम् ॥ निशम्य धूतपापा सा प्रोवाच विनतानना

atisnehārdracittasya janetuśceti bhāṣitam || niśamya dhūtapāpā sā provāca vinatānanā

अत्यन्त स्नेह से आर्द्र हृदय वाले पिता की यह बात सुनकर, झुके हुए मुख वाली धूतपापा ने कहा -

श्लोक 48 (skanda.4.59.48)

॥धूतपापोवाच॥ जनेतर्यद्यहं देया सुंदराय वराय ते ॥ तदा तस्मै प्रयच्छ त्वं यमहं कथयामि ते

||dhūtapāpovāca|| janetaryadyahaṁ deyā suṁdarāya varāya te || tadā tasmai prayaccha tvaṁ yamahaṁ kathayāmi te

धूतपापा ने कहा - "हे पिता, यदि मुझे किसी सुन्दर वर को देना है, तो उसे ही दीजिए जिसका मैं वर्णन करती हूँ।"

श्लोक 49 (skanda.4.59.49)

तुभ्यं च रोचते तात शृणोत्ववहितो भवान् ॥ सर्वेभ्योतिपवित्रो यो यः सर्वेषां नमस्कृतः

tubhyaṁ ca rocate tāta śṛṇotvavahito bhavān || sarvebhyotipavitro yo yaḥ sarveṣāṁ namaskṛtaḥ

"यदि आपको भी रुचिकर लगे तो, हे तात, सावधान होकर सुनिए। जो सबसे अधिक पवित्र है, जो सबके द्वारा नमस्कृत है..."

श्लोक 50 (skanda.4.59.50)

सर्वे यमभिलष्यंति यस्मात्सर्वसुखोदयः ॥ कदाचिद्यो न नश्येत यः सदैवानुवर्तते

sarve yamabhilaṣyaṁti yasmātsarvasukhodayaḥ || kadācidyo na naśyeta yaḥ sadaivānuvartate

"...जिसे सब चाहते हैं, जिससे सब सुखों की उत्पत्ति होती है, जो कभी नष्ट नहीं होता, जो सदैव विद्यमान रहता है..."

श्लोक 51 (skanda.4.59.51)

इहामुत्रापि यो रक्षेन्महापदुदयाद्ध्रुवम् ॥ सर्वे मनोरथा यस्मात्परिपूर्णा भवंति हि

ihāmutrāpi yo rakṣenmahāpadudayāddhruvam || sarve manorathā yasmātparipūrṇā bhavaṁti hi

"...जो यहाँ और परलोक में भी बड़ी आपदा से निश्चय ही रक्षा करता है, जिससे सब मनोरथ भली भाँति पूर्ण होते हैं..."

श्लोक 52 (skanda.4.59.52)

दिनेदिने च सौभाग्यं वर्धते यस्य सन्निधौ ॥ नैरंतर्येण यत्सेवां कुर्वतो न भयं क्वचित्

dinedine ca saubhāgyaṁ vardhate yasya sannidhau || nairaṁtaryeṇa yatsevāṁ kurvato na bhayaṁ kvacit

"...जिसके सान्निध्य में दिन-प्रतिदिन सौभाग्य बढ़ता है, जिसकी निरन्तर सेवा करने वाले को कभी भय नहीं होता..."

श्लोक 53 (skanda.4.59.53)

यन्नामग्रहणादेव केपि वाधां न कुर्वते ॥ यदाधारेण तिष्ठंति भुवनानि चतुर्दश

yannāmagrahaṇādeva kepi vādhāṁ na kurvate || yadādhāreṇa tiṣṭhaṁti bhuvanāni caturdaśa

"...जिसका नाम लेने मात्र से ही कोई कष्ट नहीं पहुँचा सकता, जिसके आधार पर चौदह भुवन टिके हुए हैं..."

श्लोक 54 (skanda.4.59.54)

एवमाद्या गुणा यस्य वरस्य वरचेष्टितम् ॥ तस्मै प्रयच्छ मां तात मम तेपीहशर्मणे

evamādyā guṇā yasya varasya varaceṣṭitam || tasmai prayaccha māṁ tāta mama tepīhaśarmaṇe

"...ऐसे आदि गुण और श्रेष्ठ आचरण जिस वर में हों, हे तात, उसी को मुझे दीजिए - मेरे इस कल्याण के लिए।"

श्लोक 55 (skanda.4.59.55)

एतच्छ्रुत्वापि ता तस्या भृशं मुदमवाप ह ॥ धन्योस्मि धन्या मे पूर्वे येषामैषा सुतान्वये

etacchrutvāpi tā tasyā bhṛśaṁ mudamavāpa ha || dhanyosmi dhanyā me pūrve yeṣāmaiṣā sutānvaye

यह सुनकर उन्हें भी अत्यन्त हर्ष हुआ - "मैं धन्य हूँ, मेरे पूर्वज धन्य हैं, जिनके वंश में यह [कन्या] उत्पन्न हुई है!"

श्लोक 56 (skanda.4.59.56)

ध्रुवा हि धूतपापासौ यस्या ईदृग्विधा मतिः ॥ ईदृग्विधैर्गुणगणैर्गरिम्णा कोत्र वै भवेत्

dhruvā hi dhūtapāpāsau yasyā īdṛgvidhā matiḥ || īdṛgvidhairguṇagaṇairgarimṇā kotra vai bhavet

"यह धूतपापा निश्चय ही महान् है, जिसकी ऐसी बुद्धि है। ऐसे गुण-समूहों से गरिमा में इसकी बराबरी यहाँ कौन कर सकता है?"

श्लोक 57 (skanda.4.59.57)

अथवा स कथं लभ्यो विना पुण्यभरोदयम् ॥ इति क्षणं समाधाय मनः स मुनिपुंगवः

athavā sa kathaṁ labhyo vinā puṇyabharodayam || iti kṣaṇaṁ samādhāya manaḥ sa munipuṁgavaḥ

"अथवा, पुण्य के महान् संचय के बिना वह [वर] कैसे प्राप्त हो सकता है?" - ऐसा क्षणभर मन में विचार कर, वह श्रेष्ठ मुनि -

श्लोक 58 (skanda.4.59.58)

ज्ञानेन तं समालोच्य वरमीदृग्गुणोदयम् ॥ धन्यां कन्यां बभाषेथ शृणु वत्से शुभैषिणि

jñānena taṁ samālocya varamīdṛgguṇodayam || dhanyāṁ kanyāṁ babhāṣetha śṛṇu vatse śubhaiṣiṇi

...अपने ज्ञान से इस प्रकार के गुणों वाले उस वर के विषय में विचार कर, अपनी धन्य कन्या से बोले - "हे वत्से शुभैषिणि, सुनो।"

श्लोक 59 (skanda.4.59.59)

॥पितोवाच॥ वरस्य ये त्वया प्रोक्ता गुणा एते विचक्षणे ॥ एषां गुणानामाधारो वरोस्तीति विनिश्चितम्

||pitovāca|| varasya ye tvayā proktā guṇā ete vicakṣaṇe || eṣāṁ guṇānāmādhāro varostīti viniścitam

पिता ने कहा - "हे विदुषी, तुमने वर के जो गुण बताए हैं, यह निश्चित है कि इन गुणों का आधार बनने वाला कोई वर अवश्य है।"

श्लोक 60 (skanda.4.59.60)

परं स सुखलभ्यो न नितरां सुभगाकृतिः ॥ तपः पणेन स क्रय्यः सुतीर्थविपणौ क्वचित्

paraṁ sa sukhalabhyo na nitarāṁ subhagākṛtiḥ || tapaḥ paṇena sa krayyaḥ sutīrthavipaṇau kvacit

"किन्तु वह सुगम रूप से सुलभ नहीं है; वह तो केवल तप के मूल्य से ही उत्तम तीर्थ के बाज़ार में क्रय किया जा सकता है।"

श्लोक 61 (skanda.4.59.61)

तीर्थभारैः स सुलभो न कौलीन्येन कन्यके ॥ न वेदशास्त्राभ्यसनैर्न चैश्वर्यबलेन वै

tīrthabhāraiḥ sa sulabho na kaulīnyena kanyake || na vedaśāstrābhyasanairna caiśvaryabalena vai

"हे कन्ये, वह तीर्थों की बहुलता से, कुलीनता से, वेदशास्त्र के अभ्यास से, अथवा ऐश्वर्य के बल से सुलभ नहीं है।"

श्लोक 62 (skanda.4.59.62)

न सौंदर्येण वपुषा न बुद्ध्या न पराक्रमैः ॥ एकयैव मनः शुद्ध्या करणानां जयेन च

na sauṁdaryeṇa vapuṣā na buddhyā na parākramaiḥ || ekayaiva manaḥ śuddhyā karaṇānāṁ jayena ca

"न सौन्दर्य से, न बुद्धि से, न पराक्रम से - केवल एक मन की शुद्धि और इन्द्रियों की विजय से..."

श्लोक 63 (skanda.4.59.63)

महातपः सहायेन दमदानदयायुजा ॥ लभ्यते स महाप्राज्ञो नान्यथा सदृशः पतिः

mahātapaḥ sahāyena damadānadayāyujā || labhyate sa mahāprājño nānyathā sadṛśaḥ patiḥ

"...महातप की सहायता से, दम, दान और दया से युक्त होकर, वह महाप्राज्ञ पति प्राप्त होता है - अन्यथा नहीं।"

श्लोक 64 (skanda.4.59.64)

इति श्रुत्वाथ सा कन्या पितरं प्रणिपत्य च ॥ अनुज्ञां प्रार्थयामास तपसे कृतनिश्चया

iti śrutvātha sā kanyā pitaraṁ praṇipatya ca || anujñāṁ prārthayāmāsa tapase kṛtaniścayā

यह सुनकर उस कन्या ने पिता को प्रणाम कर, तप का निश्चय करके, उनसे अनुमति की प्रार्थना की।

श्लोक 65 (skanda.4.59.65)

॥स्कंद उवाच॥ कृतानुज्ञा जनेत्रा सा क्षेत्रे परमपावने ॥ तपस्तताप परमं यदसाध्यं तपस्विभिः

||skaṁda uvāca|| kṛtānujñā janetrā sā kṣetre paramapāvane || tapastatāpa paramaṁ yadasādhyaṁ tapasvibhiḥ

स्कन्द ने कहा - पिता से अनुमति पाकर वह कन्या उस परम पावन क्षेत्र में ऐसी उत्कट तपस्या करने लगी, जो तपस्वियों के लिए भी असाध्य थी।

श्लोक 66 (skanda.4.59.66)

क्व सा बालातिमृद्वंगी क्व च तत्तादृशं तपः ॥ कठोरवर्ष्मसंसाध्यमहो सच्चेतसो धृतिः

kva sā bālātimṛdvaṁgī kva ca tattādṛśaṁ tapaḥ || kaṭhoravarṣmasaṁsādhyamaho saccetaso dhṛtiḥ

कहाँ वह अत्यन्त कोमल अंगों वाली बालिका, और कहाँ वैसा तप, जो कठोर शरीर से ही सम्भव है! अहो, सच्चे हृदय की धृति कैसी होती है!

श्लोक 67 (skanda.4.59.67)

धारासारा सुवर्षासु महावातवतीष्वलम् ॥ शिलासु सावकाशासु सा बह्वीरनयन्निशाः

dhārāsārā suvarṣāsu mahāvātavatīṣvalam || śilāsu sāvakāśāsu sā bahvīranayanniśāḥ

प्रचण्ड वृष्टि और महावायु से युक्त रातों में, खुले स्थान की चट्टानों पर, उसने बहुत सी रातें बिताईं।

श्लोक 68 (skanda.4.59.68)

श्रुत्वा गर्जरवं घोरं दृष्ट्वा विद्युच्चमत्कृतीः ॥ आसारसीकरैः क्लिन्ना न चकंपे मनाक्च सा

śrutvā garjaravaṁ ghoraṁ dṛṣṭvā vidyuccamatkṛtīḥ || āsārasīkaraiḥ klinnā na cakaṁpe manākca sā

भयंकर गर्जन सुनकर, बिजली की चमक देखकर, वर्षा की फुहारों से भीगकर भी वह तनिक भी न काँपी।

श्लोक 69 (skanda.4.59.69)

तडित्स्फुरंतीत्वसकृत्तमिस्रासु तपोवने ॥ यातायातं करोतीव द्रष्टुं तत्तपसः स्थितिम्

taḍitsphuraṁtītvasakṛttamisrāsu tapovane || yātāyātaṁ karotīva draṣṭuṁ tattapasaḥ sthitim

तपोवन की अंधेरी रातों में बार-बार चमकती बिजली मानो उस तप की स्थिरता को देखने के लिए ही आना-जाना कर रही थी।

श्लोक 70 (skanda.4.59.70)

तपर्तुरेव साक्षाच्च कुमारी कैतवात्किल ॥ पंचाग्नीन्परिधायात्र तपस्यति तपोवने

tapartureva sākṣācca kumārī kaitavātkila || paṁcāgnīnparidhāyātra tapasyati tapovane

वह कुमारी मानो साक्षात् तप-ऋतु ही थी, जो छल से पाँच अग्नियों से घिरकर उस तपोवन में तपस्या कर रही थी।

श्लोक 71 (skanda.4.59.71)

जलाभिलाषिणी बाला न मनागपि सा पिबत् ॥ कुशाग्रतोयपृषतं पंचाग्निपरितापिता

jalābhilāṣiṇī bālā na manāgapi sā pibat || kuśāgratoyapṛṣataṁ paṁcāgniparitāpitā

जल की अभिलाषा रखने वाली वह बालिका, पाँच अग्नियों से संतप्त होकर भी, कुश की नोक पर के जल-कण को भी तनिक नहीं पीती थी।

श्लोक 72 (skanda.4.59.72)

रोमांच कंचुकवती वेपमानतनुच्छदा ॥ पर्यक्षिपत्क्षपाः क्षामा तपसा हैमनीश्च सा

romāṁca kaṁcukavatī vepamānatanucchadā || paryakṣipatkṣapāḥ kṣāmā tapasā haimanīśca sā

रोमांच से आच्छादित, काँपती हुई त्वचा वाली, तप से क्षीण वह हेमन्त की रातें भी बिताती रही।

श्लोक 73 (skanda.4.59.73)

निशीथिनीषु शिशिरे श्रयंती सारसं रसम् ॥ मेने सा सारसैः केयमुद्यताद्येति पद्मिनी

niśīthinīṣu śiśire śrayaṁtī sārasaṁ rasam || mene sā sārasaiḥ keyamudyatādyeti padminī

शिशिर की रातों में सारस-रव का आश्रय लेती हुई उसे सारसों ने पूछा-सा माना - "यह कौन असमय में खिली कमलिनी है?"

श्लोक 74 (skanda.4.59.74)

मनस्विनामपि मनोरागतां सृजते मधौ ॥ तदोष्ठपल्लवाद्रागो जह्रे माकंदपल्लवैः

manasvināmapi manorāgatāṁ sṛjate madhau || tadoṣṭhapallavādrāgo jahre mākaṁdapallavaiḥ

वसन्त में स्थिर मन वाले पुरुषों के मन में भी अनुराग उत्पन्न होता है; परन्तु उसके अधर-पल्लव की लालिमा को आम्र-मंजरियों ने भी हर लिया (अर्थात् उससे भी अधिक शोभित हुई)।

श्लोक 75 (skanda.4.59.75)

वसंते निवसंती सा वने बालाचलंमनः ॥ चक्रे तपस्यपि श्रुत्वा कोकिला काकलीरवम्

vasaṁte nivasaṁtī sā vane bālācalaṁmanaḥ || cakre tapasyapi śrutvā kokilā kākalīravam

वसन्त में वन में रहते हुए, कोयल की मधुर कूक सुनकर भी उस बालिका ने अपने मन को तप से विचलित नहीं होने दिया।

श्लोक 76 (skanda.4.59.76)

बंधुजीवेऽधररुचिं कलहंसे कलागतीः ॥ निक्षेपमिव सा क्षिप्त्वा शरद्यासीत्तपोरता

baṁdhujīve'dhararuciṁ kalahaṁse kalāgatīḥ || nikṣepamiva sā kṣiptvā śaradyāsīttaporatā

अपने अधरों की लालिमा को बन्धुजीव के फूल में और अपनी सुन्दर चाल को हंस में मानो जमा करके, वह शरद ऋतु में भी तप में लीन रही।

श्लोक 77 (skanda.4.59.77)

अपास्तभोगसंपर्का भोगिनां वृत्तिमाश्रिता ॥ क्षुदुद्बोधनिरोधाय धूतपापा तपस्विनी

apāstabhogasaṁparkā bhogināṁ vṛttimāśritā || kṣududbodhanirodhāya dhūtapāpā tapasvinī

समस्त भोगों के सम्पर्क को त्यागकर, सर्पों की सी वृत्ति का आश्रय लेकर, तपस्विनी धूतपापा भूख के जागने को रोकती रही।

श्लोक 78 (skanda.4.59.78)

शाणेन मणिवल्लीढा कृशाप्यायादनर्घताम् ॥ तथापि तपसा क्षामा दिदीपे तत्तनुस्तराम्

śāṇena maṇivallīḍhā kṛśāpyāyādanarghatām || tathāpi tapasā kṣāmā didīpe tattanustarām

जैसे सान पर घिसा जाने पर पतला होकर भी मणि अमूल्यता को प्राप्त होता है, वैसे ही तप से क्षीण होकर भी उसका शरीर और अधिक दीप्तिमान् हुआ।

श्लोक 79 (skanda.4.59.79)

निरीक्ष्य तां तपस्यंतीं विधिः संशुद्धमानसाम् ॥ उपेत्योवाच सुप्रज्ञे प्रसन्नोस्मि वरं वृणु

nirīkṣya tāṁ tapasyaṁtīṁ vidhiḥ saṁśuddhamānasām || upetyovāca suprajñe prasannosmi varaṁ vṛṇu

तपस्या करती हुई उस विशुद्ध-मन कन्या को देखकर विधि (ब्रह्मा) ने पास आकर कहा - "हे सुप्रज्ञे, मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।"

श्लोक 80 (skanda.4.59.80)

सा चतुर्वक्त्रमालोक्य हंसयानोपरिस्थितम् ॥ प्रणम्य प्रांजलिः प्रीता प्रोवाचाथ प्रजापतिम्

sā caturvaktramālokya haṁsayānoparisthitam || praṇamya prāṁjaliḥ prītā provācātha prajāpatim

हंस-वाहन पर बैठे चतुर्मुख को देखकर वह प्रणाम कर, हाथ जोड़कर, प्रसन्नतापूर्वक प्रजापति से बोली -

श्लोक 81 (skanda.4.59.81)

॥धूतपापोवाच॥ पितामह वरो मह्यं यदि देयो वरप्रद ॥ सर्वेभ्यः पावनेभ्योपि कुरु मामतिपावनीम्

||dhūtapāpovāca|| pitāmaha varo mahyaṁ yadi deyo varaprada || sarvebhyaḥ pāvanebhyopi kuru māmatipāvanīm

धूतपापा ने कहा - "हे पितामह वरप्रद, यदि मुझे वर देना हो, तो मुझे सब पावन वस्तुओं से भी अधिक पावन बना दीजिए।"

श्लोक 82 (skanda.4.59.82)

स्रष्टा तदिष्टमाकर्ण्य नितरां तुष्टमानसः ॥ प्रत्युवाचाथ तां बालां विमलां विमलेषिणीम्

sraṣṭā tadiṣṭamākarṇya nitarāṁ tuṣṭamānasaḥ || pratyuvācātha tāṁ bālāṁ vimalāṁ vimaleṣiṇīm

स्रष्टा उस इच्छा को सुनकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हुए, और उस निर्मल, पवित्रता चाहने वाली बालिका को उत्तर दिया।

श्लोक 83 (skanda.4.59.83)

॥ब्रह्मोवाच॥ धूतपापे पवित्राणि यानि संत्यत्र सर्वतः ॥ तेभ्यः पवित्रमतुलं त्वमेधि वरतो मम

||brahmovāca|| dhūtapāpe pavitrāṇi yāni saṁtyatra sarvataḥ || tebhyaḥ pavitramatulaṁ tvamedhi varato mama

ब्रह्मा ने कहा - "हे धूतपापे, यहाँ सब ओर जो भी पवित्र वस्तुएँ हैं, उनसे भी असीम पवित्र तुम मेरे वरदान से हो जाओ।"

श्लोक 84 (skanda.4.59.84)

तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च संति तीर्थानि कन्यके ॥ दिवि भुव्यंतरिक्षे च पावनान्युत्तरोत्तरम्

tisraḥ koṭyo'rdhakoṭī ca saṁti tīrthāni kanyake || divi bhuvyaṁtarikṣe ca pāvanānyuttarottaram

"हे कन्ये, साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, स्वर्ग में, पृथ्वी पर और अन्तरिक्ष में, एक से बढ़कर एक पावन।"

श्लोक 85 (skanda.4.59.85)

तानि सर्वाणि तीर्थानि त्वत्तनौ प्रतिलोम वै ॥ वसंतु मम वाक्येन भव सर्वातिपावनी

tāni sarvāṇi tīrthāni tvattanau pratiloma vai || vasaṁtu mama vākyena bhava sarvātipāvanī

"वे सभी तीर्थ उल्टे क्रम में मेरी वाणी से तुम्हारे ही शरीर में निवास करें; तुम सर्वाधिक पावन बन जाओ।"

श्लोक 86 (skanda.4.59.86)

इत्युक्त्वांतर्दधे वेधाः सापि निर्धूतकल्मषा ॥ धूतपापोटजं प्राप्ताथो वेदशिरसः पितुः

ityuktvāṁtardadhe vedhāḥ sāpi nirdhūtakalmaṣā || dhūtapāpoṭajaṁ prāptātho vedaśirasaḥ pituḥ

ऐसा कहकर विधि अन्तर्धान हो गए; और वह भी, समस्त कल्मष से रहित होकर, फिर पिता वेदशिरा की कुटी में पहुँची - धूतपापा के रूप में।

श्लोक 87 (skanda.4.59.87)

कदाचित्तां समालोक्य खेलंतीमुटजाजिरे ॥ धर्मस्तत्तपसाकृष्टः प्रार्थयामास कन्यकाम्

kadācittāṁ samālokya khelaṁtīmuṭajājire || dharmastattapasākṛṣṭaḥ prārthayāmāsa kanyakām

एक बार कुटी के आँगन में खेलती हुई उसे देखकर, उसके तप से आकृष्ट होकर धर्म ने उस कन्या से प्रार्थना की।

श्लोक 88 (skanda.4.59.88)

॥धर्म उवाच॥ पृथुश्रोणि विशालाक्षि क्षामोदरि शुभानने ॥ क्रीतः स्वरूपसंपत्त्या त्वयाहं देहि मे रहः

||dharma uvāca|| pṛthuśroṇi viśālākṣi kṣāmodari śubhānane || krītaḥ svarūpasaṁpattyā tvayāhaṁ dehi me rahaḥ

धर्म ने कहा - "हे विशाल नितम्बों, विशाल नेत्रों, क्षीण उदर और शुभ मुख वाली, मैं तुम्हारे रूप-सम्पदा से क्रीत हो गया हूँ - मुझे एकान्त दो।"

श्लोक 89 (skanda.4.59.89)

नितरां बाधते कामस्त्वत्कृते मां सुलोचने ॥ अज्ञातनाम्ना सा तेन प्रार्थितेत्यसकृद्ग्रहः

nitarāṁ bādhate kāmastvatkṛte māṁ sulocane || ajñātanāmnā sā tena prārthitetyasakṛdgrahaḥ

"हे सुलोचने, तुम्हारे कारण काम मुझे अत्यन्त पीड़ित करता है।" - इस प्रकार उस अज्ञातनाम वाले द्वारा उससे बार-बार प्रार्थना की गई।

श्लोक 90 (skanda.4.59.90)

उवाच सा पिता दाता तं प्रार्थय सुदुर्मते ॥ पितृप्रदेया यत्कन्या श्रुतिरेषा सनातनी

uvāca sā pitā dātā taṁ prārthaya sudurmate || pitṛpradeyā yatkanyā śrutireṣā sanātanī

उसने कहा - "मेरे पिता ही मुझे देने वाले हैं, उन्हीं से प्रार्थना करो, हे दुर्बुद्धे; कन्या पिता द्वारा दी जाती है - यही सनातन श्रुति है।"

श्लोक 91 (skanda.4.59.91)

निशम्येति वचो धर्मो भाविनोर्थस्य गौरवात् ॥ पुनर्निबंधयांचक्रे ऽपधृतिर्धृतिशालिनीम्

niśamyeti vaco dharmo bhāvinorthasya gauravāt || punarnibaṁdhayāṁcakre 'padhṛtirdhṛtiśālinīm

यह वचन सुनकर, आगे होने वाली बात के गुरुत्व से, स्वयं धृतिहीन धर्म ने धृतिशालिनी उस कन्या पर पुनः दबाव डाला।

श्लोक 92 (skanda.4.59.92)

॥धर्म उवाच॥ न प्रार्थयेहं सुभगे पितरं तव सुंदरि ॥ गांधर्वेण विवाहेन कुरु मे त्वं समीहितम्

||dharma uvāca|| na prārthayehaṁ subhage pitaraṁ tava suṁdari || gāṁdharveṇa vivāhena kuru me tvaṁ samīhitam

धर्म ने कहा - "हे सुभगे, हे सुन्दरी, मैं तुम्हारे पिता से प्रार्थना नहीं करूँगा; तुम स्वयं गान्धर्व विवाह से मेरी इच्छा पूर्ण करो।"

श्लोक 93 (skanda.4.59.93)

इति निर्बंधवद्वाक्यं सा निशम्य कुमारिका ॥ पितुः कन्याफलंदित्सुः पुनराहेति तं द्विजम्

iti nirbaṁdhavadvākyaṁ sā niśamya kumārikā || pituḥ kanyāphalaṁditsuḥ punarāheti taṁ dvijam

यह आग्रहपूर्ण बात सुनकर, पिता को कन्या का फल देने की इच्छुक उस कुमारी ने पुनः उस ब्राह्मण से कहा -

श्लोक 94 (skanda.4.59.94)

अरे जडमते मा त्वं पुनर्ब्रूहीति याह्यतः ॥ इत्युक्तोपि कुमार्या स नातिष्ठन्मदनातुरः

are jaḍamate mā tvaṁ punarbrūhīti yāhyataḥ || ityuktopi kumāryā sa nātiṣṭhanmadanāturaḥ

"अरे जड़बुद्धि, फिर मत कहना, यहाँ से चले जाओ।" - ऐसा कहे जाने पर भी वह काम से पीड़ित उस कुमारी के सामने से न हटा।

श्लोक 95 (skanda.4.59.95)

ततः शशाप तं बाला प्रबला तपसो बलात् ॥ जडोसि नितरां यस्माज्जलाधारो नदो भव

tataḥ śaśāpa taṁ bālā prabalā tapaso balāt || jaḍosi nitarāṁ yasmājjalādhāro nado bhava

तब अपने तप के बल से प्रबल हुई उस बालिका ने उसे शाप दिया - "तुम अत्यन्त जड़ हो, इसलिए जल का आधार नद बन जाओ!"

श्लोक 96 (skanda.4.59.96)

इति शप्तस्तया सोथ तां शशाप क्रुधान्वितः ॥ कठोरहृदये त्वं तु शिला भव सुदुर्मते

iti śaptastayā sotha tāṁ śaśāpa krudhānvitaḥ || kaṭhorahṛdaye tvaṁ tu śilā bhava sudurmate

इस प्रकार उसके द्वारा शापित होकर, वह भी क्रोधित होकर उसे शाप देने लगा - "तुम कठोर हृदय वाली हो, इसलिए हे दुर्बुद्धे, शिला बन जाओ!"

श्लोक 97 (skanda.4.59.97)

॥स्कंद उवाच॥ इत्यन्योन्यस्य शापेन मुने धर्मो नदोऽभवत् ॥ अविमुक्ते महाक्षेत्रे ख्यातो धर्मनदो महान्

||skaṁda uvāca|| ityanyonyasya śāpena mune dharmo nado'bhavat || avimukte mahākṣetre khyāto dharmanado mahān

स्कन्द ने कहा - हे मुने, इस प्रकार परस्पर के शाप से धर्म नद बन गए - अविमुक्त महाक्षेत्र में जो महान् धर्मनद के नाम से विख्यात हैं।

श्लोक 98 (skanda.4.59.98)

साप्याह पितरं त्रस्ता स्वशिलात्वस्य कारणम् ॥ ध्यानेन धर्मं विज्ञाय मुनिः कन्यामथाब्रवीत्

sāpyāha pitaraṁ trastā svaśilātvasya kāraṇam || dhyānena dharmaṁ vijñāya muniḥ kanyāmathābravīt

वह भी भयभीत होकर अपने शिला बनने का कारण पिता को बताने लगी; ध्यान से धर्म का [कृत्य] जानकर मुनि ने कन्या से कहा -

श्लोक 99 (skanda.4.59.99)

मा भैः पुत्रि करिष्यामि तव सर्वं शुभोदयम् ॥ तच्छापो नान्यथा भूयाच्चंद्रकांतशिला भव

mā bhaiḥ putri kariṣyāmi tava sarvaṁ śubhodayam || tacchāpo nānyathā bhūyāccaṁdrakāṁtaśilā bhava

"मत डरो, पुत्री, मैं तुम्हारा सब कुछ शुभ करूँगा; वह शाप अन्यथा न हो - बल्कि तुम चन्द्रकान्त शिला बन जाओ।"

श्लोक 100 (skanda.4.59.100)

चंद्रोदयमनुप्राप्य द्रवीभूततनुस्ततः ॥ धुनी भव सुते साध्वि धूतपापेति विश्रुता

caṁdrodayamanuprāpya dravībhūtatanustataḥ || dhunī bhava sute sādhvi dhūtapāpeti viśrutā

"चन्द्रोदय होने पर तुम्हारा शरीर द्रवीभूत होकर, हे साध्वी पुत्री, नदी बन जाए - धूतपापा के नाम से विख्यात।"

श्लोक 101 (skanda.4.59.101)

स च धर्मनदः कन्ये तव भर्ता सुशोभनः ॥ तैर्गुणैः परिपूर्णांगो ये गुणाः प्रार्थितास्त्वया

sa ca dharmanadaḥ kanye tava bhartā suśobhanaḥ || tairguṇaiḥ paripūrṇāṁgo ye guṇāḥ prārthitāstvayā

"और वह धर्मनद ही, हे कन्ये, तुम्हारा सुशोभित पति होगा, उन्हीं गुणों से परिपूर्ण, जो गुण तुमने चाहे थे।"

श्लोक 102 (skanda.4.59.102)

अन्यच्च शृणु सद्बुद्धे ममापि तपसो बलात् ॥ द्वैरूप्यं भवतोर्भावि प्राकृतं च द्रवं च वै

anyacca śṛṇu sadbuddhe mamāpi tapaso balāt || dvairūpyaṁ bhavatorbhāvi prākṛtaṁ ca dravaṁ ca vai

"और भी सुनो, हे सद्बुद्धे - मेरी तपस्या के बल से भी तुम दोनों का द्विरूप्य होगा - एक प्राकृत (शरीर) रूप, और एक द्रव (नदी) रूप।"

श्लोक 103 (skanda.4.59.103)

इत्याश्वास्य पिता कन्यां धूतपापां परंतप ॥ चंद्रकांतशिलाभूतामनुजग्राह बुद्धिमान्

ityāśvāsya pitā kanyāṁ dhūtapāpāṁ paraṁtapa || caṁdrakāṁtaśilābhūtāmanujagrāha buddhimān

हे परन्तप, इस प्रकार अपनी कन्या धूतपापा को सान्त्वना देकर, बुद्धिमान् पिता ने चन्द्रकान्त शिला बनी उस कन्या को अपनाया।

श्लोक 104 (skanda.4.59.104)

तदारभ्य मुने काश्यां ख्यातो धर्मनदो ह्रदः ॥ धर्मो द्रवस्वरूपेण महापातकनाशनः

tadārabhya mune kāśyāṁ khyāto dharmanado hradaḥ || dharmo dravasvarūpeṇa mahāpātakanāśanaḥ

हे मुने, तभी से काशी में धर्मनद नाम से विख्यात ह्रद, द्रव-रूप में स्वयं धर्म ही है, जो महापातकों का नाशक है।

श्लोक 105 (skanda.4.59.105)

धुनी च धूतपापा सा सर्वतीर्थमयी शुभा ॥ हरेन्महाघसंघातान्कूलजानिव पादपान्

dhunī ca dhūtapāpā sā sarvatīrthamayī śubhā || harenmahāghasaṁghātānkūlajāniva pādapān

और सम्पूर्ण तीर्थमयी वह शुभ धूतपापा नदी, तट पर उगे वृक्षों की भाँति, महान् पाप-समूहों को बहा ले जाती है।

श्लोक 106 (skanda.4.59.106)

तत्र धर्मनदे तीर्थे धूतपापा समन्विते ॥ यदा न स्वर्धुनी तत्र तदा ब्रध्नस्तपो व्यधात्

tatra dharmanade tīrthe dhūtapāpā samanvite || yadā na svardhunī tatra tadā bradhnastapo vyadhāt

उस धूतपापा से युक्त धर्मनद तीर्थ में, जब तक वहाँ स्वर्धुनी (गंगा) नहीं थी, तब तक सूर्य (ब्रध्न) ने तप किया।

श्लोक 107 (skanda.4.59.107)

गभस्तिमाली भगवान्गभस्तीश्वर सन्निधौ ॥ शीलयन्मंगलां गौरीं तप उग्रं चचार ह

gabhastimālī bhagavāngabhastīśvara sannidhau || śīlayanmaṁgalāṁ gaurīṁ tapa ugraṁ cacāra ha

किरणों की माला धारण करने वाले भगवान् सूर्य ने गभस्तीश्वर के समीप, मंगलकारिणी गौरी की सेवा करते हुए, उग्र तप किया।

श्लोक 108 (skanda.4.59.108)

नाम्ना मयूखादित्यस्य तीर्थे तत्र तपस्यतः ॥ किरणेभ्यः प्रववृते महास्वेदोतिखेदतः

nāmnā mayūkhādityasya tīrthe tatra tapasyataḥ || kiraṇebhyaḥ pravavṛte mahāsvedotikhedataḥ

मयूखादित्य नामक तीर्थ में तप करते हुए उनकी किरणों से अत्यधिक थकान के कारण महान् स्वेद प्रवाहित हुआ।

श्लोक 109 (skanda.4.59.109)

किरणेभ्यः प्रवृत्ताया महास्वेदस्य संततिः ॥ ततः सा किरणानाम जाता पुण्या तरंगिणी

kiraṇebhyaḥ pravṛttāyā mahāsvedasya saṁtatiḥ || tataḥ sā kiraṇānāma jātā puṇyā taraṁgiṇī

उन किरणों से प्रवाहित महास्वेद की उस धारा से एक पुण्य तरंगिणी उत्पन्न हुई, जो 'किरणा' नाम से प्रसिद्ध हुई।

श्लोक 110 (skanda.4.59.110)

महापापांधतमसं किरणाख्या तरंगिणी ॥ ध्वंसयेत्स्नानमात्रेण मिलिता धूतपापया

mahāpāpāṁdhatamasaṁ kiraṇākhyā taraṁgiṇī || dhvaṁsayetsnānamātreṇa militā dhūtapāpayā

किरणा नामक वह तरंगिणी, धूतपापा से मिलकर, स्नान मात्र से महापापों के अन्धकार को नष्ट कर देती है।

श्लोक 111 (skanda.4.59.111)

आदौ धर्मनदः पुण्यो मिश्रितो धूतपापया ॥ यया धूतानि पापानि सर्वतीर्थीकृतात्मना

ādau dharmanadaḥ puṇyo miśrito dhūtapāpayā || yayā dhūtāni pāpāni sarvatīrthīkṛtātmanā

पहले पुण्य धर्मनद धूतपापा से मिश्रित हुए, जिसने अपने को सम्पूर्ण तीर्थमय बनाकर पापों को धो डाला।

श्लोक 112 (skanda.4.59.112)

ततोपि मिलितागत्य किरणा रविणैधिता ॥ यन्नामस्मरणादेव महामोहोंधतां व्रजेत्

tatopi militāgatya kiraṇā raviṇaidhitā || yannāmasmaraṇādeva mahāmohoṁdhatāṁ vrajet

फिर सूर्य से पुष्ट हुई किरणा भी उसमें मिलकर आ गई - जिसके नाम-स्मरण मात्र से महामोह का अन्धकार दूर हो जाता है।

श्लोक 113 (skanda.4.59.113)

किरणा धूतपापे च तस्मिन्धर्मनदे शुभे ॥ स्रवंत्यौ पापसंहर्त्र्यौ वाराणस्यां शुभद्रवे

kiraṇā dhūtapāpe ca tasmindharmanade śubhe || sravaṁtyau pāpasaṁhartryau vārāṇasyāṁ śubhadrave

किरणा और धूतपापा, उस शुभ धर्मनद में [मिलकर], वाराणसी में पाप-संहर्त्री दो शुभद्रव धाराएँ हैं।

श्लोक 114 (skanda.4.59.114)

ततो भागीरथी प्राप्ता तेन दैलीपिना सह ॥ भागीरथी समायाता यमुना च सरस्वती

tato bhāgīrathī prāptā tena dailīpinā saha || bhāgīrathī samāyātā yamunā ca sarasvatī

फिर उस दिलीप-पुत्र (भगीरथ) के साथ भागीरथी वहाँ आई; भागीरथी आई, और यमुना तथा सरस्वती भी आईं।

श्लोक 115 (skanda.4.59.115)

किरणा धूतपापा च पुण्यतोया सरस्वती ॥ गंगा च यमुना चैव पंचनद्योत्र कीर्तिताः

kiraṇā dhūtapāpā ca puṇyatoyā sarasvatī || gaṁgā ca yamunā caiva paṁcanadyotra kīrtitāḥ

किरणा, धूतपापा, पुण्य जल वाली सरस्वती, गंगा और यमुना - ये यहाँ पाँच नदियाँ (पंचनद) कही गई हैं।

श्लोक 116 (skanda.4.59.116)

अतः पंचनदं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ तत्राप्लुतो न गृह्णीयाद्देहं ना पांचभौतिकम्

ataḥ paṁcanadaṁ nāma tīrthaṁ trailokyaviśrutam || tatrāpluto na gṛhṇīyāddehaṁ nā pāṁcabhautikam

इसीलिए त्रैलोक्य में विख्यात उस तीर्थ का नाम 'पंचनद' है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य पुनः पाँच भूतों से बना शरीर नहीं पाता।

श्लोक 117 (skanda.4.59.117)

अस्मिन्पंचनदीनां च संभेदेघौघभेदिनि ॥ स्नानमात्रात्प्रयात्येव भित्त्वा ब्रह्मांडमंडपम्

asminpaṁcanadīnāṁ ca saṁbhedeghaughabhedini || snānamātrātprayātyeva bhittvā brahmāṁḍamaṁḍapam

पापों के समूह को भेदने वाले इस पंचनदी-संगम में, स्नान मात्र से ही मनुष्य ब्रह्माण्ड-मण्डप को भेदकर [मुक्ति की ओर] चला जाता है।

श्लोक 118 (skanda.4.59.118)

तीर्थानि संति भूयांसि काश्यामत्र पदेपदे ॥ न पंचनदतीर्थस्य कोट्यंशेन समान्यपि

tīrthāni saṁti bhūyāṁsi kāśyāmatra padepade || na paṁcanadatīrthasya koṭyaṁśena samānyapi

काशी में यहाँ पद-पद पर बहुत से तीर्थ हैं, परन्तु पंचनद तीर्थ के करोड़वें अंश के भी बराबर कोई नहीं है।

श्लोक 119 (skanda.4.59.119)

प्रयागे माघमासे तु सम्यक्स्नातस्य यत्फलम् ॥ तत्फलं स्याद्दिनैकेन काश्यां पंचनदे ध्रुवम्

prayāge māghamāse tu samyaksnātasya yatphalam || tatphalaṁ syāddinaikena kāśyāṁ paṁcanade dhruvam

माघ मास में प्रयाग में भली भाँति स्नान करने वाले को जो फल मिलता है, वही फल काशी के पंचनद में एक ही दिन में निश्चय ही मिल जाता है।

श्लोक 120 (skanda.4.59.120)

स्नात्वा पंचनदे तीर्थे कृत्वा च पितृतर्पणम् ॥ बिंदुमाधवमभ्यर्च्य न भूयो जन्मभाग्भवेत्

snātvā paṁcanade tīrthe kṛtvā ca pitṛtarpaṇam || biṁdumādhavamabhyarcya na bhūyo janmabhāgbhavet

पंचनद तीर्थ में स्नान कर, पितृ-तर्पण करके, बिन्दुमाधव की पूजा कर, मनुष्य फिर जन्म का भागी नहीं होता।

श्लोक 121 (skanda.4.59.121)

यावत्संख्यास्तिलादत्ताः पितृभ्यो जलतर्पणे ॥ पुण्ये पंचनदे तीर्थे तृप्तिः स्यात्तावदाब्दिकी

yāvatsaṁkhyāstilādattāḥ pitṛbhyo jalatarpaṇe || puṇye paṁcanade tīrthe tṛptiḥ syāttāvadābdikī

पितरों को जल-तर्पण में जितने तिल दिए जाते हैं, पंचनद के पुण्य तीर्थ में उतने ही वर्षों की तृप्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 122 (skanda.4.59.122)

श्रद्धया यैः कृतं श्राद्धं तीथें पंचनदे शुभे ॥ तेषां पितामहा मुक्ता नानायोनि गता अपि

śraddhayā yaiḥ kṛtaṁ śrāddhaṁ tītheṁ paṁcanade śubhe || teṣāṁ pitāmahā muktā nānāyoni gatā api

जिन्होंने श्रद्धापूर्वक शुभ पंचनद तीर्थ में श्राद्ध किया है, उनके पितामह, चाहे वे नाना योनियों में गए हों, मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 123 (skanda.4.59.123)

यमलोके पितृगणैर्गाथेयं परिगीयते ॥ महिमानं पांचनदं दृष्ट्वा श्राद्धविधानतः

yamaloke pitṛgaṇairgātheyaṁ parigīyate || mahimānaṁ pāṁcanadaṁ dṛṣṭvā śrāddhavidhānataḥ

यमलोक में पितृगणों द्वारा यह गाथा गाई जाती है, श्राद्ध-विधि से पंचनद की महिमा देखकर -

श्लोक 124 (skanda.4.59.124)

अस्माकमपि वंश्योत्र कश्चिच्छ्राद्धं करिष्यति ॥ काश्यां पंचनदं प्राप्य येन मुच्यामहे वयम्

asmākamapi vaṁśyotra kaścicchrāddhaṁ kariṣyati || kāśyāṁ paṁcanadaṁ prāpya yena mucyāmahe vayam

"क्या हमारे वंश में भी कोई यहाँ श्राद्ध करेगा, काशी में पंचनद प्राप्त कर, जिससे हम मुक्त हो जाएँ?"

श्लोक 125 (skanda.4.59.125)

इयं गाथा प्रतिदिनं श्राद्धदेवस्य सन्निधौ ॥ पितृभिः परिगीयेत काश्यां पंचनदं प्रति

iyaṁ gāthā pratidinaṁ śrāddhadevasya sannidhau || pitṛbhiḥ parigīyeta kāśyāṁ paṁcanadaṁ prati

यह गाथा प्रतिदिन श्राद्धदेव (यम) के समीप पितरों द्वारा काशी के पंचनद के विषय में गाई जाती है।

श्लोक 126 (skanda.4.59.126)

तत्र पंचनदे तीर्थे यत्किंचिद्दीयते वसु ॥ कल्पक्षयेपि न भवेत्तस्य पुण्यस्य संक्षयः

tatra paṁcanade tīrthe yatkiṁciddīyate vasu || kalpakṣayepi na bhavettasya puṇyasya saṁkṣayaḥ

उस पंचनद तीर्थ में जो भी थोड़ा-सा भी धन दिया जाता है, कल्प के क्षय होने पर भी उसके पुण्य का क्षय नहीं होता।

श्लोक 127 (skanda.4.59.127)

वंध्यापि वर्षपर्यंतं स्नात्वा पंचनदे ह्रदे ॥ समर्च्य मंगलां गौंरीं पुत्रं जनयति ध्रुवम्

vaṁdhyāpi varṣaparyaṁtaṁ snātvā paṁcanade hrade || samarcya maṁgalāṁ gauṁrīṁ putraṁ janayati dhruvam

बाँझ स्त्री भी वर्षभर पंचनद ह्रद में स्नान कर, मंगलकारिणी गौरी की पूजा कर, निश्चय ही पुत्र को जन्म देती है।

श्लोक 128 (skanda.4.59.128)

जलैः पांचनदैः पुण्यैर्वाससा पारिशोधितैः ॥ महाफलमवाप्नोति स्नपयित्वेष्टदेवताम्

jalaiḥ pāṁcanadaiḥ puṇyairvāsasā pāriśodhitaiḥ || mahāphalamavāpnoti snapayitveṣṭadevatām

वस्त्र से छाने गए पंचनद के पुण्य जल से अपने इष्टदेव को स्नान कराकर मनुष्य महान् फल प्राप्त करता है।

श्लोक 129 (skanda.4.59.129)

पंचामृतानां कलशैरष्टोत्तरशतोन्मितैः ॥ तुलितोधिकतां यातो बिंदुः पंचनदांभसः

paṁcāmṛtānāṁ kalaśairaṣṭottaraśatonmitaiḥ || tulitodhikatāṁ yāto biṁduḥ paṁcanadāṁbhasaḥ

एक सौ आठ पंचामृत के कलशों से तौले जाने पर भी, पंचनद के जल की एक बूँद अधिक भारी सिद्ध होती है।

श्लोक 130 (skanda.4.59.130)

पंचकूर्चेन पीतेन यात्र शुद्धिरुदाहृता ॥ सा शुद्धिः श्रद्धया प्राश्य बिंदुं पांचनदांभसः

paṁcakūrcena pītena yātra śuddhirudāhṛtā || sā śuddhiḥ śraddhayā prāśya biṁduṁ pāṁcanadāṁbhasaḥ

पंचकूर्च पीने से जो शुद्धि बताई गई है, वही शुद्धि पंचनद के जल की एक बूँद श्रद्धापूर्वक चखने से हो जाती है।

श्लोक 131 (skanda.4.59.131)

भवेदवभृथस्नानाद्राजसूयाश्वमेधयोः ॥ यत्फलं तच्छतगुणं स्नानात्पांचनदांभसा

bhavedavabhṛthasnānādrājasūyāśvamedhayoḥ || yatphalaṁ tacchataguṇaṁ snānātpāṁcanadāṁbhasā

राजसूय और अश्वमेध के अवभृथ-स्नान से जो फल मिलता है, वह फल सौ गुना होकर पंचनद के जल में स्नान से मिलता है।

श्लोक 132 (skanda.4.59.132)

राजसूयाश्वमेधौ च भवेतां स्वर्गसाधनम् ॥ आब्रह्मघटिकाद्वंद्वं मुक्त्यै पांचनदाप्लुतिः

rājasūyāśvamedhau ca bhavetāṁ svargasādhanam || ābrahmaghaṭikādvaṁdvaṁ muktyai pāṁcanadāplutiḥ

राजसूय और अश्वमेध तो केवल स्वर्ग के साधन हैं, किन्तु पंचनद में दो घड़ी भर की डुबकी ब्रह्मलोक तक की मुक्ति के लिए है।

श्लोक 133 (skanda.4.59.133)

स्वर्गराज्याभिषेकोपि न तथा संमतः सताम् ॥ अभिषेकः पांचनदो यथानल्पसुखप्रदः

svargarājyābhiṣekopi na tathā saṁmataḥ satām || abhiṣekaḥ pāṁcanado yathānalpasukhapradaḥ

स्वर्ग के राज्याभिषेक को भी सज्जन उतना सम्मानित नहीं मानते, जितना पंचनद के अभिषेक को, जो इतना महान् सुख देने वाला है।

श्लोक 134 (skanda.4.59.134)

वरं वाराणसीं प्राप्य भृत्यः पंचनदोक्षिणाम् ॥ नान्यत्र सेवकीभूत भूपकोटिर्नरेश्वरः

varaṁ vārāṇasīṁ prāpya bhṛtyaḥ paṁcanadokṣiṇām || nānyatra sevakībhūta bhūpakoṭirnareśvaraḥ

वाराणसी प्राप्त कर पंचनद-स्नायियों का सेवक बनना श्रेष्ठ है, न कि अन्यत्र करोड़ों राजाओं का स्वामी होकर भी किसी और की सेवा करना।

श्लोक 135 (skanda.4.59.135)

यैर्न पंचनदे स्नातं कार्तिके पापहारिणि ॥ तेऽद्यापि गर्भे तिष्ठंति पुनस्ते गर्भवासिनः

yairna paṁcanade snātaṁ kārtike pāpahāriṇi || te'dyāpi garbhe tiṣṭhaṁti punaste garbhavāsinaḥ

जिन्होंने कार्तिक में पाप हरने वाले पंचनद में स्नान नहीं किया, वे आज भी गर्भ में ही स्थित हैं, बार-बार गर्भवासी बनते हुए।

श्लोक 136 (skanda.4.59.136)

कृते धर्मनदं नाम त्रेतायां धूतपापकम् ॥ द्वापरे बिंदुतीर्थं च कलौ पंचनदं स्मृतम्

kṛte dharmanadaṁ nāma tretāyāṁ dhūtapāpakam || dvāpare biṁdutīrthaṁ ca kalau paṁcanadaṁ smṛtam

सत्ययुग में यह 'धर्मनद' नाम से, त्रेता में 'धूतपापक' नाम से, द्वापर में 'बिन्दुतीर्थ' नाम से, और कलियुग में 'पंचनद' नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 137 (skanda.4.59.137)

शतं समास्तपस्तप्त्वा कृते यत्प्राप्यते फलम् ॥ तत्कार्तिके पंचनदे सकृत्स्नानेन लभ्यते

śataṁ samāstapastaptvā kṛte yatprāpyate phalam || tatkārtike paṁcanade sakṛtsnānena labhyate

सत्ययुग में सौ वर्ष तप करने से जो फल मिलता है, वह फल कलियुग में कार्तिक मास में पंचनद में एक बार स्नान करने से मिल जाता है।

श्लोक 138 (skanda.4.59.138)

इष्टापूर्तेषु धर्मेषु यावजन्मकृतेषु यत् ॥ अन्यत्र स्यात्फलं तत्स्यादूर्जे धर्मनदाप्लवात्

iṣṭāpūrteṣu dharmeṣu yāvajanmakṛteṣu yat || anyatra syātphalaṁ tatsyādūrje dharmanadāplavāt

जीवनभर किए गए इष्ट-पूर्त धर्मों से जो फल अन्यत्र मिलता, वह फल ऊर्ज (कार्तिक) मास में धर्मनद में एक डुबकी से मिल जाता है।

श्लोक 139 (skanda.4.59.139)

न धूतपाप सदृशं तीर्थं क्वापि महीतले ॥ यदेकस्नानतो नश्येदघं जन्मत्रयार्जितम्

na dhūtapāpa sadṛśaṁ tīrthaṁ kvāpi mahītale || yadekasnānato naśyedaghaṁ janmatrayārjitam

धूतपापा के समान तीर्थ पृथ्वी पर कहीं नहीं है, जहाँ एक ही स्नान से तीन जन्मों में अर्जित पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 140 (skanda.4.59.140)

बिंदुतीर्थे नरो दत्त्वा कांचनं कृष्णलोन्मितम् ॥ न दरिद्रो भवेत्क्वापि न स्वर्णेन वियुज्यते

biṁdutīrthe naro dattvā kāṁcanaṁ kṛṣṇalonmitam || na daridro bhavetkvāpi na svarṇena viyujyate

बिन्दुतीर्थ में एक कृष्णल भर भी सोना देने वाला मनुष्य कहीं भी दरिद्र नहीं होता, न कभी स्वर्ण से वियुक्त होता है।

श्लोक 141 (skanda.4.59.141)

गोभूतिलहिरण्याश्व वासोन्नस्रग्विभूषणम् ॥ यत्किंचिद्बिंदुतीर्थेत्र दत्त्वाक्षयमवाप्नुयात्

gobhūtilahiraṇyāśva vāsonnasragvibhūṣaṇam || yatkiṁcidbiṁdutīrthetra dattvākṣayamavāpnuyāt

गाय, भूमि, तिल, सोना, घोड़ा, वस्त्र, अन्न, माला अथवा आभूषण - बिन्दुतीर्थ में जो भी दिया जाए, वह अक्षय फल देता है।

श्लोक 142 (skanda.4.59.142)

एकामप्याहुतिं दत्त्वा समिद्धेग्नौ विधानतः ॥ पुण्ये धर्मनदे तीर्थे कोटिहोमफलं लभेत्

ekāmapyāhutiṁ dattvā samiddhegnau vidhānataḥ || puṇye dharmanade tīrthe koṭihomaphalaṁ labhet

पुण्य धर्मनद तीर्थ में प्रज्वलित अग्नि में विधिपूर्वक एक भी आहुति देने से करोड़ हवनों का फल मिलता है।

श्लोक 143 (skanda.4.59.143)

न पंचनदतीर्थस्य महिमानमनंतकम् ॥ कोपि वर्णयितुं शक्तश्चतुर्वर्ग शुभौकसः

na paṁcanadatīrthasya mahimānamanaṁtakam || kopi varṇayituṁ śaktaścaturvarga śubhaukasaḥ

चारों पुरुषार्थों के सुख में स्थित कोई भी व्यक्ति पंचनद तीर्थ की अनन्त महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 144 (skanda.4.59.144)

श्रुत्वाख्यानमिदं पुण्यं श्रावयित्वापि भक्तितः ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोके महीयते

śrutvākhyānamidaṁ puṇyaṁ śrāvayitvāpi bhaktitaḥ || sarvapāpaviśuddhātmā viṣṇuloke mahīyate

इस पुण्य कथा को सुनकर, अथवा भक्तिपूर्वक सुनाकर भी, मनुष्य सम्पूर्ण पापों से शुद्ध आत्मा होकर विष्णुलोक में सम्मानित होता है।

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