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काशी खण्ड · अध्याय 68

कृत्तिवासः समुद्भवः

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (skanda.4.68.1)

॥स्कंद उवाच॥ अन्यच्च शृणु विप्रेंद्र वृत्तातं तत्र संभवम् ॥ महाश्चर्यप्रजननं महापातकहारि च

||skaṁda uvāca|| anyacca śṛṇu vipreṁdra vṛttātaṁ tatra saṁbhavam || mahāścaryaprajananaṁ mahāpātakahāri ca

स्कन्द ने कहा - हे विप्रेन्द्र, वहाँ घटित एक और घटना सुनो - जो महान आश्चर्य उत्पन्न करने वाली और महापाप का नाश करने वाली है।

श्लोक 2 (skanda.4.68.2)

इत्थं कथां प्रकुर्वाणे रत्नशेस्य महेश्वरे ॥ कोलाहलो महानासीत्त्रातत्रातेति सर्वतः

itthaṁ kathāṁ prakurvāṇe ratnaśesya maheśvare || kolāhalo mahānāsīttrātatrāteti sarvataḥ

जब महेश्वर रत्नेश इस प्रकार कथा सुना रहे थे, तभी सब ओर से 'बचाओ, बचाओ' की महान हलचल मच गई।

श्लोक 3 (skanda.4.68.3)

महिषासुरपुत्रोसौ समायाति गजासुरः ॥ प्रमथन्प्रमथान्सर्वान्निजवीर्य मदोद्धतः

mahiṣāsuraputrosau samāyāti gajāsuraḥ || pramathanpramathānsarvānnijavīrya madoddhataḥ

महिषासुर का वह पुत्र गजासुर, अपने पराक्रम के मद से उन्मत्त, सभी प्रमथगणों को कुचलता हुआ आ रहा था।

श्लोक 4 (skanda.4.68.4)

यत्रयत्र धरायां स चरणं प्रमिणोति हि ॥ अचलोल्लोलयांचक्रे तत्रतत्रास्य भारतः

yatrayatra dharāyāṁ sa caraṇaṁ pramiṇoti hi || acalollolayāṁcakre tatratatrāsya bhārataḥ

पृथ्वी पर वह जहाँ-जहाँ अपना पैर रखता था, वहाँ-वहाँ उसके भार से पर्वत हिल उठते थे।

श्लोक 5 (skanda.4.68.5)

ऊरुवेगेन तरवः पतंति शिखरैः सह ॥ यस्य दोर्दंडघातेन चूर्णाः स्युश्च शिलोच्चयाः

ūruvegena taravaḥ pataṁti śikharaiḥ saha || yasya dordaṁḍaghātena cūrṇāḥ syuśca śiloccayāḥ

उसकी जाँघों के वेग से वृक्ष शिखरों सहित गिर पड़ते थे; उसकी भुजाओं के प्रहार से पर्वत-राशियाँ चूर्ण हो जाती थीं।

श्लोक 6 (skanda.4.68.6)

यस्य मौलिजसंघर्षाद्घ(?)नाव्योम त्यजंत्यपि ॥ नीलिमानं न चाद्यापि जह्युस्तक्लेशसंगजम्

yasya maulijasaṁgharṣādgha(?)nāvyoma tyajaṁtyapi || nīlimānaṁ na cādyāpi jahyustakleśasaṁgajam

उसके मुकुट के घर्षण से घने बादल भी छिन्न-भिन्न हो जाते थे, फिर भी आज तक आकाश ने उस स्पर्श से उत्पन्न नीलिमा नहीं छोड़ी।

श्लोक 7 (skanda.4.68.7)

यस्य निःश्वाससंभारैरुत्तरंगा महाब्धयः ॥ नद्योप्यमंदकल्लोला भवंति तिमिभिः सह

yasya niḥśvāsasaṁbhārairuttaraṁgā mahābdhayaḥ || nadyopyamaṁdakallolā bhavaṁti timibhiḥ saha

उसकी श्वासों के भार से महासागर तरंगित हो उठते थे, तथा नदियाँ भी व्हेल मछलियों सहित अशांत तरंगों वाली हो जाती थीं।

श्लोक 8 (skanda.4.68.8)

योजनानां सहस्राणि नवयस्य समुच्छ्रयः ॥ तावानेव हि विस्तारस्तनोर्मायाविनोस्य हि

yojanānāṁ sahasrāṇi navayasya samucchrayaḥ || tāvāneva hi vistārastanormāyāvinosya hi

उस मायावी की ऊँचाई नौ हजार योजन थी, और उसके शरीर का विस्तार भी उतना ही था।

श्लोक 9 (skanda.4.68.9)

यन्नेत्रयोः पिंगलिमा तथा तरलिमा पुनः ॥ विद्युता नोज्झ्यतेऽद्यापि सोयमायाति सत्वरः

yannetrayoḥ piṁgalimā tathā taralimā punaḥ || vidyutā nojjhyate'dyāpi soyamāyāti satvaraḥ

उसकी दोनों आँखों की पीलिमा और चंचलता को आज भी बिजली ने नहीं छोड़ा है - वही वह शीघ्रता से आ रहा था।

श्लोक 10 (skanda.4.68.10)

यांयां दिशं समभ्येति सोयं दुःसह दानवः ॥ सासा समी भवेदस्य साध्वसादिव दिग्ध्रुवम्

yāṁyāṁ diśaṁ samabhyeti soyaṁ duḥsaha dānavaḥ || sāsā samī bhavedasya sādhvasādiva digdhruvam

वह असह्य दानव जिस-जिस दिशा की ओर बढ़ता, वह-वह दिशा मानो उसके भय से स्तब्ध और वायुरहित हो जाती थी।

श्लोक 11 (skanda.4.68.11)

ब्रह्मलब्धवरश्चायं तृणीकृतजगत्त्रयः ॥ अवध्योहं भवामीति स्त्रीपुंसैः कामनिर्जितैः

brahmalabdhavaraścāyaṁ tṛṇīkṛtajagattrayaḥ || avadhyohaṁ bhavāmīti strīpuṁsaiḥ kāmanirjitaiḥ

ब्रह्मा से वर पाकर, त्रिलोक को तृण के समान मानने वाला वह सोचता था - 'काम से पराजित स्त्री-पुरुष द्वारा मैं अवध्य हूँ'।

श्लोक 12 (skanda.4.68.12)

ततस्त्रिशूलहेतिस्तमायांतं दैत्यपुंगवम् ॥ विज्ञायावध्यमन्येन शूलेनाभिजघान तम्

tatastriśūlahetistamāyāṁtaṁ daityapuṁgavam || vijñāyāvadhyamanyena śūlenābhijaghāna tam

तब त्रिशूलधारी शिव ने, आते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ को अन्य किसी शस्त्र से अवध्य जानकर, त्रिशूल से ही प्रहार किया।

श्लोक 13 (skanda.4.68.13)

प्रोतस्तेन त्रिशूलेन स च दैत्यो गजासुरः ॥ छत्रीकृतमिवात्मानं मन्यमानो जगौ हरम्

protastena triśūlena sa ca daityo gajāsuraḥ || chatrīkṛtamivātmānaṁ manyamāno jagau haram

उस त्रिशूल से बिंधा हुआ वह गजासुर दैत्य, स्वयं को मानो छत्र बनाया हुआ मानते हुए, हर से बोला।

श्लोक 14 (skanda.4.68.14)

॥गजासुर उवाच॥ त्रिशूलपाणे देवेश जाने त्वां स्मरहारिणम् ॥ तव हस्ते मम वधः श्रेयानेव पुरांतक

||gajāsura uvāca|| triśūlapāṇe deveśa jāne tvāṁ smarahāriṇam || tava haste mama vadhaḥ śreyāneva purāṁtaka

गजासुर ने कहा - 'हे त्रिशूलधारी देवेश, मैं तुम्हें कामनाशक जानता हूँ; हे पुरांतक, तुम्हारे हाथों मेरी मृत्यु ही श्रेयस्कर है।'

श्लोक 15 (skanda.4.68.15)

किंचिद्विज्ञप्तुमिच्छामि अवधेहि ममेरितम् ॥ सत्यं ब्रवीमि नासत्यं मृत्युंजय विचारय

kiṁcidvijñaptumicchāmi avadhehi mameritam || satyaṁ bravīmi nāsatyaṁ mṛtyuṁjaya vicāraya

'कुछ निवेदन करना चाहता हूँ, मेरी बात सुनो; मैं सत्य कहता हूँ, असत्य नहीं - हे मृत्युंजय, विचार करो।'

श्लोक 16 (skanda.4.68.16)

त्वमेको जगतां वंद्यो विश्वस्योपरि संस्थितः ॥ अहं त्वदुपरिष्टाच्च स्थितोस्मी ति जितं मया

tvameko jagatāṁ vaṁdyo viśvasyopari saṁsthitaḥ || ahaṁ tvadupariṣṭācca sthitosmī ti jitaṁ mayā

'तुम अकेले ही समस्त जगत के वंदनीय हो, विश्व के ऊपर स्थित हो; और मैं भी अब तुम्हारे ऊपर स्थित हूँ - इस प्रकार मैंने विजय पा ली है।'

श्लोक 17 (skanda.4.68.17)

धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मि त्वत्त्रिशूलाग्रसंस्थितः ॥ कालेन सर्वैर्मर्तव्यं श्रेयसे मृत्युरीदृशः

dhanyosmyanugṛhītosmi tvattriśūlāgrasaṁsthitaḥ || kālena sarvairmartavyaṁ śreyase mṛtyurīdṛśaḥ

'तुम्हारे त्रिशूल के अग्रभाग पर स्थित होकर मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ; काल से सबको मरना ही है - कल्याण के लिए ऐसी ही मृत्यु हो।'

श्लोक 18 (skanda.4.68.18)

इति तस्य वचः श्रुत्वा देवदेवः कृपानिधिः ॥ प्रोवाच प्रहसञ्छंभुर्घटोद्भव गजासुरम्

iti tasya vacaḥ śrutvā devadevaḥ kṛpānidhiḥ || provāca prahasañchaṁbhurghaṭodbhava gajāsuram

उसके ये वचन सुनकर, कृपानिधि देवदेव शंभु ने मुस्कुराते हुए, हे घटोद्भव, गजासुर से कहा।

श्लोक 19 (skanda.4.68.19)

॥ईश्वर उवाच॥ गजासुर प्रसन्नोस्मि महापौरुषशेवधे ॥ स्वानुकूल वरं ब्रूहि ददामि सुमतेऽसुर

||īśvara uvāca|| gajāsura prasannosmi mahāpauruṣaśevadhe || svānukūla varaṁ brūhi dadāmi sumate'sura

ईश्वर ने कहा - 'हे गजासुर, हे महापराक्रम के भंडार, मैं प्रसन्न हूँ; हे सुमति असुर, अपने अनुकूल वर माँगो, मैं दूँगा।'

श्लोक 20 (skanda.4.68.20)

इत्याकर्ण्य स दैत्येंद्रः प्रत्युवाच महेश्वरम् ॥ ॥गजासुर उवाच॥ यदि प्रसन्नो दिग्वासस्तदा नित्यं वसान मे

ityākarṇya sa daityeṁdraḥ pratyuvāca maheśvaram || ||gajāsura uvāca|| yadi prasanno digvāsastadā nityaṁ vasāna me

यह सुनकर उस दैत्येंद्र ने महेश्वर को उत्तर दिया। गजासुर ने कहा - 'यदि प्रसन्न हो, हे दिशाओं को वस्त्र मानने वाले, तो सदा धारण करो -'

श्लोक 21 (skanda.4.68.21)

इमां कृत्तिं विरूपाक्ष त्वत्त्रिशूलाग्निपाविताम् ॥ स्वप्रमाणां सुखस्पर्शां रणांगणपणीकृताम्

imāṁ kṛttiṁ virūpākṣa tvattriśūlāgnipāvitām || svapramāṇāṁ sukhasparśāṁ raṇāṁgaṇapaṇīkṛtām

'- मेरी इस चर्मत्वचा को, हे विरूपाक्ष, जो तुम्हारे त्रिशूल की अग्नि से पवित्र हो चुकी है, तुम्हारे ही माप की, सुखस्पर्श वाली, रणभूमि में दाँव पर लगाई गई इस त्वचा को।'

श्लोक 22 (skanda.4.68.22)

इष्टगंधिः सदैवास्तु सदैवास्त्वतिकोमला ॥ सदैव निर्मला चास्तु सदैवास्त्वतिमंडनम्

iṣṭagaṁdhiḥ sadaivāstu sadaivāstvatikomalā || sadaiva nirmalā cāstu sadaivāstvatimaṁḍanam

'यह सदा प्रिय सुगंध वाली हो, सदा अत्यंत कोमल हो, सदा निर्मल हो, और सदा ही परम अलंकार बनी रहे।'

श्लोक 23 (skanda.4.68.23)

महातपोऽनलज्वालाः प्राप्यापि सुचिरं विभो ॥ न दग्धा कृत्तिरेषा मे पुण्यगंधनिधिस्ततः

mahātapo'nalajvālāḥ prāpyāpi suciraṁ vibho || na dagdhā kṛttireṣā me puṇyagaṁdhanidhistataḥ

'हे विभो, महातप की अग्नि-ज्वालाओं को दीर्घकाल तक सहकर भी मेरी यह त्वचा जली नहीं - इसलिए यह पुण्य-सुगंध की निधि है।'

श्लोक 24 (skanda.4.68.24)

यदि पुण्यवती नैषा ममकृत्तिर्दिगंबर ॥ तदा त्वदंगसंगोस्याः कथं जातो रणांगणे

yadi puṇyavatī naiṣā mamakṛttirdigaṁbara || tadā tvadaṁgasaṁgosyāḥ kathaṁ jāto raṇāṁgaṇe

'हे दिगंबर, यदि मेरी यह त्वचा पुण्यवती न होती, तो युद्धभूमि में इसका तुम्हारे शरीर से स्पर्श कैसे होता?'

श्लोक 25 (skanda.4.68.25)

अन्यं च मे वरं देहि यदि तुष्टोसि शंकर ॥ नामास्तु कृत्तिवासास्ते प्रारभ्याद्यतनं दिनम्

anyaṁ ca me varaṁ dehi yadi tuṣṭosi śaṁkara || nāmāstu kṛttivāsāste prārabhyādyatanaṁ dinam

'हे शंकर, यदि प्रसन्न हो तो एक और वर दो - आज के दिन से तुम्हारा नाम कृत्तिवास हो।'

श्लोक 26 (skanda.4.68.26)

इति तस्य वचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा च शंकरः ॥ पुनःप्रोवाच तं दैत्यं भक्तिनिर्मलमानसम्

iti tasya vacaḥ śrutvā tathetyuktvā ca śaṁkaraḥ || punaḥprovāca taṁ daityaṁ bhaktinirmalamānasam

उसके ये वचन सुनकर, 'ऐसा ही हो' कहकर शंकर ने भक्ति से पवित्र मन वाले उस दैत्य से पुनः कहा।

श्लोक 27 (skanda.4.68.27)

॥ईश्वर उवाच॥ शृणु पुण्यनिधे दैत्य वरमन्यं सुदुर्लभम् ॥ अविमुक्ते महाक्षेत्रे रण त्यक्त कलेवर

||īśvara uvāca|| śṛṇu puṇyanidhe daitya varamanyaṁ sudurlabham || avimukte mahākṣetre raṇa tyakta kalevara

ईश्वर ने कहा - 'हे पुण्यनिधि दैत्य, सुनो एक अन्य दुर्लभ वर; हे अविमुक्त महाक्षेत्र में युद्ध में शरीर त्यागने वाले -'

श्लोक 28 (skanda.4.68.28)

इदं पुण्यशरीरं ते क्षेत्रेस्मिन्मुक्तिसाधने ॥ मम लिंगं भवत्वत्र सर्वेषांमुक्तिदायकम्

idaṁ puṇyaśarīraṁ te kṣetresminmuktisādhane || mama liṁgaṁ bhavatvatra sarveṣāṁmuktidāyakam

'- तुम्हारा यह पुण्य शरीर, मुक्ति के साधनरूप इस क्षेत्र में, यहाँ सबको मुक्ति देने वाला मेरा लिंग बनेगा।'

श्लोक 29 (skanda.4.68.29)

कृत्तिवासेश्वरं नाम महापातकनाशनम् ॥ सर्वेषामेव लिंगानां शिरोभूतमिदं वरम्

kṛttivāseśvaraṁ nāma mahāpātakanāśanam || sarveṣāmeva liṁgānāṁ śirobhūtamidaṁ varam

'कृत्तिवासेश्वर नाम से यह महापातकों का नाशक होगा; यह सभी लिंगों में मानो शिरोभूत श्रेष्ठ लिंग होगा।'

श्लोक 30 (skanda.4.68.30)

यावंति संति लिंगानि वाराणस्यां महांत्यपि ॥ उत्तमं तावतामेतदुत्तमांगवदुत्तमम्

yāvaṁti saṁti liṁgāni vārāṇasyāṁ mahāṁtyapi || uttamaṁ tāvatāmetaduttamāṁgavaduttamam

'वाराणसी में जितने भी महान लिंग हैं, उनमें यह वैसे ही सर्वश्रेष्ठ है जैसे अंगों में शिर सर्वश्रेष्ठ है।'

श्लोक 31 (skanda.4.68.31)

मानवानां हितायात्र स्थास्येहं सपरिग्रहः ॥ दृष्टेनानेन लिंगेन पूजितेन स्तुतेन च ॥ कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यः संसारं न विशेत्पुनः

mānavānāṁ hitāyātra sthāsyehaṁ saparigrahaḥ || dṛṣṭenānena liṁgena pūjitena stutena ca || kṛtakṛtyo bhavenmartyaḥ saṁsāraṁ na viśetpunaḥ

'मनुष्यों के हित के लिए मैं अपने परिवार सहित यहाँ रहूँगा; इस लिंग को देखकर, पूजकर और स्तुति कर मनुष्य कृतकृत्य होगा, और पुनः संसार में प्रवेश नहीं करेगा।'

श्लोक 32 (skanda.4.68.32)

रुद्राः पाशुपताः सिद्धा ऋषयस्तत्त्वचिंतकाः ॥ शांता दांता जितक्रोधा निर्द्वंद्वा निष्परिग्रहाः

rudrāḥ pāśupatāḥ siddhā ṛṣayastattvaciṁtakāḥ || śāṁtā dāṁtā jitakrodhā nirdvaṁdvā niṣparigrahāḥ

रुद्रगण, पाशुपत, सिद्ध, तत्त्वचिंतक ऋषि, शांत, दांत, क्रोध-विजयी, द्वंद्वरहित, निष्परिग्रह -

श्लोक 33 (skanda.4.68.33)

अविमुक्ते स्थिता ये तु मम भक्ता मुमुक्षवः ॥ मानापमानयोस्तुल्याः समलोष्टाश्मकांचनाः

avimukte sthitā ye tu mama bhaktā mumukṣavaḥ || mānāpamānayostulyāḥ samaloṣṭāśmakāṁcanāḥ

- अविमुक्त में स्थित जो मेरे मुमुक्षु भक्त हैं, मान-अपमान में समान, मिट्टी-पत्थर-सोने में समभाव रखने वाले -

श्लोक 34 (skanda.4.68.34)

कृत्तिवासेश्वरे लिंगे स्थास्येहं तदनुग्रहे ॥ दशकोटिसहस्राणि तीर्थानि प्रतिवासरम्

kṛttivāseśvare liṁge sthāsyehaṁ tadanugrahe || daśakoṭisahasrāṇi tīrthāni prativāsaram

- उनकी कृपा के लिए मैं कृत्तिवासेश्वर लिंग में निवास करूँगा। प्रतिदिन दस हजार करोड़ तीर्थ -

श्लोक 35 (skanda.4.68.35)

त्रिकालमागमिष्यंति कृत्तिवासे न संशयः ॥ कलिद्वापरसंभूता नराः कल्मषबुद्धयः

trikālamāgamiṣyaṁti kṛttivāse na saṁśayaḥ || kalidvāparasaṁbhūtā narāḥ kalmaṣabuddhayaḥ

- कृत्तिवास में तीनों समय आएँगे, इसमें संशय नहीं। कलियुग-द्वापर में उत्पन्न, कलुषित बुद्धि वाले मनुष्य -

श्लोक 36 (skanda.4.68.36)

सदाचारविनिर्मुक्ताः सत्यशौचपराङ्मुखाः ॥ मायया दंभलोभाभ्यां मोहाहंकृतिसंयुताः

sadācāravinirmuktāḥ satyaśaucaparāṅmukhāḥ || māyayā daṁbhalobhābhyāṁ mohāhaṁkṛtisaṁyutāḥ

- सदाचार से रहित, सत्य और शौच से विमुख, माया, दंभ, लोभ, मोह और अहंकार से युक्त -

श्लोक 37 (skanda.4.68.37)

शूद्रान्नसेविनो विप्रा जिह्वाला अतिलालसाः ॥ संध्यास्नानजपेज्यासु दूरीकृत मनोधियः

śūdrānnasevino viprā jihvālā atilālasāḥ || saṁdhyāsnānajapejyāsu dūrīkṛta manodhiyaḥ

- शूद्रों का अन्न खाने वाले, जिह्वा-लोलुप, अत्यंत लालची ब्राह्मण, जिनका मन संध्या, स्नान, जप और पूजा से दूर हो गया है -

श्लोक 38 (skanda.4.68.38)

कृत्तिवासेश्वरं प्राप्य सर्वपापविवर्जिताः ॥ सुखेन मोक्षमेष्यंति यथा सुकृतिनस्तथा

kṛttivāseśvaraṁ prāpya sarvapāpavivarjitāḥ || sukhena mokṣameṣyaṁti yathā sukṛtinastathā

- कृत्तिवासेश्वर को प्राप्त कर, सभी पापों से मुक्त होकर, पुण्यात्माओं की भाँति ही सुखपूर्वक मोक्ष को प्राप्त होंगे।'

श्लोक 39 (skanda.4.68.39)

कृत्तिवासेश्वरं लिंगं सेव्यं काश्यां ततो नरैः ॥ जन्मांतरसहस्रेषु मोक्षोन्यत्र सुदुर्लभः

kṛttivāseśvaraṁ liṁgaṁ sevyaṁ kāśyāṁ tato naraiḥ || janmāṁtarasahasreṣu mokṣonyatra sudurlabhaḥ

'इसलिए मनुष्यों को काशी में कृत्तिवासेश्वर लिंग की सेवा करनी चाहिए; अन्यत्र हजारों जन्मों में भी मोक्ष अत्यंत दुर्लभ है।'

श्लोक 40 (skanda.4.68.40)

कृत्तिवासेश्वरे लिंगे लभ्यस्त्वेकेन जन्मना ॥ पृर्वजन्मकृतं पापं तपोदानादिभिः शनैः ॥ नश्येत्सद्यो विनश्येत कृत्तिवासे श्वरेक्षणात्

kṛttivāseśvare liṁge labhyastvekena janmanā || pṛrvajanmakṛtaṁ pāpaṁ tapodānādibhiḥ śanaiḥ || naśyetsadyo vinaśyeta kṛttivāse śvarekṣaṇāt

'कृत्तिवासेश्वर लिंग में एक ही जन्म में वह प्राप्त हो जाता है; पूर्वजन्म का पाप तप-दान आदि से जो धीरे-धीरे नष्ट होता है, वह कृत्तिवासेश्वर के दर्शन से तुरंत ही नष्ट हो जाता है।'

श्लोक 41 (skanda.4.68.41)

कृत्तिवासेश्वरं लिंगं येर्चयिष्यंति मानवाः ॥ प्रविष्टास्ते शरीरे मे तेषां नास्ति पुनर्भवः

kṛttivāseśvaraṁ liṁgaṁ yercayiṣyaṁti mānavāḥ || praviṣṭāste śarīre me teṣāṁ nāsti punarbhavaḥ

'जो मनुष्य कृत्तिवासेश्वर लिंग की पूजा करेंगे, वे मानो मेरे ही शरीर में प्रविष्ट हो गए हैं - उनका पुनर्जन्म नहीं होगा।'

श्लोक 42 (skanda.4.68.42)

अविमुक्तेऽत्र वस्तव्यं जप्तव्यं शतरुद्रियम् ॥ कृत्तिवासेश्वरो देवो द्रष्टव्यश्च पुनःपुनः

avimukte'tra vastavyaṁ japtavyaṁ śatarudriyam || kṛttivāseśvaro devo draṣṭavyaśca punaḥpunaḥ

'अविमुक्त में निवास करना चाहिए, शतरुद्रीय का जप करना चाहिए, तथा कृत्तिवासेश्वर देव का बार-बार दर्शन करना चाहिए।'

श्लोक 43 (skanda.4.68.43)

सप्तकोटिमहारुद्रैः सुजप्तैर्यत्फलं भवेत् ॥ तत्फलं लभ्यते काश्यां पूजनात्कृत्तिवाससः

saptakoṭimahārudraiḥ sujaptairyatphalaṁ bhavet || tatphalaṁ labhyate kāśyāṁ pūjanātkṛttivāsasaḥ

'सात करोड़ महारुद्र-जप से जो फल होता है, वही फल काशी में कृत्तिवास की पूजा से प्राप्त होता है।'

श्लोक 44 (skanda.4.68.44)

माघ कृष्णचतुर्दश्यामुपोष्य निशि जागृयात् ॥ कृत्तिवासेशमभ्यर्च्य यः स यायात्परां गतिम्

māgha kṛṣṇacaturdaśyāmupoṣya niśi jāgṛyāt || kṛttivāseśamabhyarcya yaḥ sa yāyātparāṁ gatim

'माघ की कृष्ण चतुर्दशी को उपवास कर, रात्रि में जागरण कर, जो कृत्तिवासेश की पूजा करता है, वह परमगति को जाता है।'

श्लोक 45 (skanda.4.68.45)

शुक्लायां पंचदश्यां यश्चैत्र्यां कर्ता महोत्सवम् ॥ कृत्तिवासेश्वरे लिंगे न स गर्भं प्रवक्ष्येते

śuklāyāṁ paṁcadaśyāṁ yaścaitryāṁ kartā mahotsavam || kṛttivāseśvare liṁge na sa garbhaṁ pravakṣyete

'चैत्र की शुक्ल पंचदशी को जो कृत्तिवासेश्वर लिंग का महोत्सव करता है, वह पुनः गर्भ में प्रवेश नहीं करेगा।'

श्लोक 46 (skanda.4.68.46)

कथयित्वेति देवेशस्तत्कृत्तिं परिगृह्य च ॥ गजासुरस्य महतीं प्रावृणोद्धरिदंबरः

kathayitveti deveśastatkṛttiṁ parigṛhya ca || gajāsurasya mahatīṁ prāvṛṇoddharidaṁbaraḥ

यह कहकर देवेश ने वह त्वचा ग्रहण की और, तपे हुए स्वर्ण-वर्ण वाले हरि (शिव) ने गजासुर की उस विशाल त्वचा को धारण किया।

श्लोक 47 (skanda.4.68.47)

महामहोत्सवो जातस्तस्मिन्नहनि कुंभज ॥ कृत्तिवासत्वमापेदे यस्मिन्देवो दिगंबरः

mahāmahotsavo jātastasminnahani kuṁbhaja || kṛttivāsatvamāpede yasmindevo digaṁbaraḥ

हे घटोद्भव, जिस दिन दिगंबर देव कृत्तिवास-रूप को प्राप्त हुए, उस दिन एक महान उत्सव हुआ।

श्लोक 48 (skanda.4.68.48)

यत्रच्छत्रीकृतो दैत्यः शूलमारोप्य भूतले ॥ तच्छूलोत्पाटनाज्जातं तत्र कुंडं महत्तरम्

yatracchatrīkṛto daityaḥ śūlamāropya bhūtale || tacchūlotpāṭanājjātaṁ tatra kuṁḍaṁ mahattaram

जहाँ भूतल में त्रिशूल गाड़कर दैत्य को मानो छत्र बनाया गया था, वहाँ उस त्रिशूल को उखाड़ने से एक विशाल कुंड बन गया।

श्लोक 49 (skanda.4.68.49)

तस्मिन्कुंडे नरः स्नात्वा कृत्वा च पितृतर्पणम् ॥ कृत्तिवासेश्वरं दृष्ट्वा कृतकृत्यो नरो भवेत्

tasminkuṁḍe naraḥ snātvā kṛtvā ca pitṛtarpaṇam || kṛttivāseśvaraṁ dṛṣṭvā kṛtakṛtyo naro bhavet

उस कुंड में स्नान कर, पितृतर्पण कर, तथा कृत्तिवासेश्वर का दर्शन कर, मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 50 (skanda.4.68.50)

॥स्कंद उवाच॥ तस्मिंस्तीर्थे तु यद्वृत्तं तदगस्ते निशामय ॥ काका हंसत्वमापन्नास्तत्तीर्थस्य प्रभावतः

||skaṁda uvāca|| tasmiṁstīrthe tu yadvṛttaṁ tadagaste niśāmaya || kākā haṁsatvamāpannāstattīrthasya prabhāvataḥ

स्कन्द ने कहा - हे अगस्त्य, उस तीर्थ में जो घटना हुई, उसे सुनो - उस तीर्थ के प्रभाव से कौवे हंस बन गए।

श्लोक 51 (skanda.4.68.51)

एकदा कृत्तिवासे तु चैत्र्यां यात्राऽभवत्पुरा ॥ अन्नं राशीकृतं तत्र ह्युपहारसमुद्भवम्

ekadā kṛttivāse tu caitryāṁ yātrā'bhavatpurā || annaṁ rāśīkṛtaṁ tatra hyupahārasamudbhavam

एक बार पूर्वकाल में कृत्तिवास में चैत्र के महीने में यात्रा हुई थी; वहाँ भेंट से उत्पन्न अन्न की राशि एकत्र थी।

श्लोक 52 (skanda.4.68.52)

बहुदेवलकैर्विप्र तं दृष्ट्वा पक्षिणो मिलन् ॥ परस्परं तदन्नार्थं युध्यंतो व्योमवर्त्मनि

bahudevalakairvipra taṁ dṛṣṭvā pakṣiṇo milan || parasparaṁ tadannārthaṁ yudhyaṁto vyomavartmani

हे विप्र, अनेक श्रद्धालुओं द्वारा लाए गए उस अन्न को देखकर, पक्षी मिलकर आकाश-मार्ग में उस अन्न के लिए आपस में लड़ने लगे।

श्लोक 53 (skanda.4.68.53)

बलिपुष्टैरपुष्टांगा रटतः करटाः कटु ॥ वलिभिश्चातिपुष्टांगैरबलाश्चंचुभिर्हताः

balipuṣṭairapuṣṭāṁgā raṭataḥ karaṭāḥ kaṭu || valibhiścātipuṣṭāṁgairabalāścaṁcubhirhatāḥ

भेंट खाकर मोटे हुए कौवे, दुबले-पतले शरीर वाले भूखे कौवों को अपनी चोंचों से कठोरता से चोट पहुँचाने लगे, जो कर्कश स्वर में चिल्लाते थे।

श्लोक 54 (skanda.4.68.54)

ते हन्यमाना न्यपतंस्तस्मिन्कुंडे नभोंगणात् ॥ आयुःशेषेण संत्राता हंसीभूतास्तु वायसाः

te hanyamānā nyapataṁstasminkuṁḍe nabhoṁgaṇāt || āyuḥśeṣeṇa saṁtrātā haṁsībhūtāstu vāyasāḥ

मार खाकर वे कौवे आकाश के आँगन से उस कुंड में गिर पड़े; अपनी शेष आयु के कारण बचकर वे कौवे हंस बन गए।

श्लोक 55 (skanda.4.68.55)

आश्चर्यवंतस्तत्रत्या यात्रायां मिलिता जनाः ॥ ऊचुरंगुलिनिर्देशैरहो पश्यत पश्यत

āścaryavaṁtastatratyā yātrāyāṁ militā janāḥ || ūcuraṁgulinirdeśairaho paśyata paśyata

यात्रा में एकत्रित हुए वहाँ के लोग यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए और उंगली से दिखाते हुए बोले - 'अहो, देखो, देखो!'

श्लोक 56 (skanda.4.68.56)

अस्मासु वीक्षमाणेषु काकाः कुंडेत्र ये पतन् ॥ धार्तराष्ट्रास्तु ते जातास्तीर्थस्यास्य प्रभावतः

asmāsu vīkṣamāṇeṣu kākāḥ kuṁḍetra ye patan || dhārtarāṣṭrāstu te jātāstīrthasyāsya prabhāvataḥ

'हमारे देखते-देखते जो कौवे इस कुंड में गिरे, वे इस तीर्थ के प्रभाव से हंस बन गए!'

श्लोक 57 (skanda.4.68.57)

हंसतीर्थं तदारभ्य कृत्तिवास समीपतः ॥ नाम्ना ख्यातमभूल्लोके तत्कुंडं कलशोद्भव

haṁsatīrthaṁ tadārabhya kṛttivāsa samīpataḥ || nāmnā khyātamabhūlloke tatkuṁḍaṁ kalaśodbhava

तब से कृत्तिवास के समीप वह कुंड 'हंसतीर्थ' नाम से लोक में प्रसिद्ध हुआ, हे कलशोद्भव।

श्लोक 58 (skanda.4.68.58)

अतीव मलिनात्मानो महामलिन कर्मभिः ॥ क्षणान्निर्मलतां यांति हंसतीर्थकृतोदकाः

atīva malinātmāno mahāmalina karmabhiḥ || kṣaṇānnirmalatāṁ yāṁti haṁsatīrthakṛtodakāḥ

महापापों से अत्यंत मलिन आत्मा वाले लोग भी हंसतीर्थ में जलक्रिया करके क्षण भर में निर्मलता को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 59 (skanda.4.68.59)

काश्यां सदैव वस्तव्यं स्नातव्यं हंसतीर्थके ॥ द्रष्टव्यः कृत्तिवासेशः प्राप्तव्यं परमं पदम्

kāśyāṁ sadaiva vastavyaṁ snātavyaṁ haṁsatīrthake || draṣṭavyaḥ kṛttivāseśaḥ prāptavyaṁ paramaṁ padam

काशी में सदा निवास करना चाहिए, हंसतीर्थ में स्नान करना चाहिए, कृत्तिवासेश का दर्शन करना चाहिए, और परम पद प्राप्त करना चाहिए।

श्लोक 60 (skanda.4.68.60)

काश्यां लिंगान्यनेकानि मुने संति पदेपदे ॥ कृत्तिवासेश्वरं लिंगं सर्वलिंगशिरः स्मृतम्

kāśyāṁ liṁgānyanekāni mune saṁti padepade || kṛttivāseśvaraṁ liṁgaṁ sarvaliṁgaśiraḥ smṛtam

हे मुने, काशी में पद-पद पर अनेक लिंग हैं; कृत्तिवासेश्वर लिंग सभी लिंगों का शिर माना जाता है।

श्लोक 61 (skanda.4.68.61)

कृत्तिवासं समाराध्य भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ सर्वलिंगाराधनजं फलं काश्यामवाप्यते

kṛttivāsaṁ samārādhya bhaktiyuktena cetasā || sarvaliṁgārādhanajaṁ phalaṁ kāśyāmavāpyate

भक्तियुक्त मन से कृत्तिवास की आराधना कर, काशी में सभी लिंगों की आराधना का फल प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 62 (skanda.4.68.62)

जपो दानं तपो होमस्तर्पणं देवतार्चनम् ॥ समीपे कृत्तिवासस्य कृतं सर्वमनंतकम्

japo dānaṁ tapo homastarpaṇaṁ devatārcanam || samīpe kṛttivāsasya kṛtaṁ sarvamanaṁtakam

जप, दान, तप, होम, तर्पण और देवता-पूजन - कृत्तिवास के समीप किए गए ये सभी अनंत फल देने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 63 (skanda.4.68.63)

तीर्थं त्वनादिसंसिद्धमेतत्कलशसंभव ॥ पुनर्देवस्य सान्निध्यादाविरासीन्महेशितुः

tīrthaṁ tvanādisaṁsiddhametatkalaśasaṁbhava || punardevasya sānnidhyādāvirāsīnmaheśituḥ

हे कलशोद्भव, यह तीर्थ अनादिकाल से सिद्ध है; देव की उपस्थिति के कारण यह पुनः प्रकट हुआ।

श्लोक 64 (skanda.4.68.64)

एतानि सिद्धलिंगानिच्छन्नानि स्युर्युगेयुगे ॥ अवाप्य शंभुसान्निध्यं पुनराविर्भवंति हि

etāni siddhaliṁgānicchannāni syuryugeyuge || avāpya śaṁbhusānnidhyaṁ punarāvirbhavaṁti hi

ये सिद्ध लिंग युग-युग में छिप जाते हैं, और शंभु की उपस्थिति पाकर पुनः प्रकट हो जाते हैं।

श्लोक 65 (skanda.4.68.65)

हंसतीर्थस्य परितो लिंगानामयुतं मुने ॥ प्रतिष्ठितं मुनिवरैरत्रास्ति द्विशतोत्तरम्

haṁsatīrthasya parito liṁgānāmayutaṁ mune || pratiṣṭhitaṁ munivarairatrāsti dviśatottaram

हे मुने, हंसतीर्थ के चारों ओर मुनिश्रेष्ठों द्वारा स्थापित दस हजार दो सौ लिंग हैं।

श्लोक 66 (skanda.4.68.66)

एकैकं सिद्धिदं नृणामविमुक्तनिवासिनाम् ॥ लिंगं कात्यायनेशादि च्यवनेशां तमेव हि

ekaikaṁ siddhidaṁ nṛṇāmavimuktanivāsinām || liṁgaṁ kātyāyaneśādi cyavaneśāṁ tameva hi

अविमुक्त-निवासी मनुष्यों को एक-एक लिंग सिद्धि देने वाला है - कात्यायनेश आदि, तथा च्यवनेश्वर भी वैसा ही है।

श्लोक 67 (skanda.4.68.67)

लोमशेशं महालिंगं लोमशेन प्रतिष्ठितम् ॥ कृत्तिवासः प्रतीच्यां तु तद्दृष्ट्वा क्वांतकाद्भयम्

lomaśeśaṁ mahāliṁgaṁ lomaśena pratiṣṭhitam || kṛttivāsaḥ pratīcyāṁ tu taddṛṣṭvā kvāṁtakādbhayam

लोमश ऋषि द्वारा स्थापित महालिंग लोमशेश, कृत्तिवास के पश्चिम में है; उसे देखकर मृत्यु का भय कहाँ रहता है?

श्लोक 68 (skanda.4.68.68)

मालतीशं शुभं लिंगं कृत्तिवासोत्तरे महत् ॥ सपर्ययित्वा तल्लिंगं राजा गजपतिर्भवेत्

mālatīśaṁ śubhaṁ liṁgaṁ kṛttivāsottare mahat || saparyayitvā talliṁgaṁ rājā gajapatirbhavet

कृत्तिवास के उत्तर में शुभ महान मालतीश लिंग है; उसकी पूजा कर राजा गजपति (हाथियों का स्वामी) बनता है।

श्लोक 69 (skanda.4.68.69)

अंतकेश्वर संज्ञं च लिंगं तद्रुद्रदिक्स्थितम् ॥ अतिपापोपि निष्पापो जायते तद्विलोकनात्

aṁtakeśvara saṁjñaṁ ca liṁgaṁ tadrudradiksthitam || atipāpopi niṣpāpo jāyate tadvilokanāt

रुद्र-दिशा (ईशान) में स्थित अंतकेश्वर नामक लिंग है; अत्यंत पापी भी उसके दर्शन से निष्पाप हो जाता है।

श्लोक 70 (skanda.4.68.70)

जनकेशं महालिंगं तत्पार्श्वे ज्ञानदं परम् ॥ तल्लिंग वरिवस्यातो ब्रह्मज्ञानमवाप्यते

janakeśaṁ mahāliṁgaṁ tatpārśve jñānadaṁ param || talliṁga varivasyāto brahmajñānamavāpyate

उसके पास परम ज्ञान देने वाला जनकेश महालिंग है; उस लिंग की उपासना से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है।

श्लोक 71 (skanda.4.68.71)

तदुत्तरे महामूर्तिरसितांगोस्ति भैरवः ॥ तस्य दर्शनतः पुंसां न भवेद्यमदर्शनम्

taduttare mahāmūrtirasitāṁgosti bhairavaḥ || tasya darśanataḥ puṁsāṁ na bhavedyamadarśanam

उसके उत्तर में असितांग नामक विशालकाय भैरव हैं; उनके दर्शन से मनुष्यों को यम का दर्शन नहीं करना पड़ता।

श्लोक 72 (skanda.4.68.72)

शुष्कोदरी च तत्रास्ति देवी विकटलोचना ॥ कृत्तिवासादुदीच्यां तु काशीप्रत्यूह भक्षिणी

śuṣkodarī ca tatrāsti devī vikaṭalocanā || kṛttivāsādudīcyāṁ tu kāśīpratyūha bhakṣiṇī

वहाँ विकट नेत्रों वाली देवी शुष्कोदरी भी हैं, कृत्तिवास के उत्तर में, काशी के विघ्नों को भक्षण करने वाली।

श्लोक 73 (skanda.4.68.73)

अग्निजिह्वोस्ति वेतालस्तस्या देव्यास्तु नैर्ऋते ॥ ददाति वांछितां सिद्धिं सोर्चितो भौमवासरे

agnijihvosti vetālastasyā devyāstu nairṛte || dadāti vāṁchitāṁ siddhiṁ sorcito bhaumavāsare

उस देवी के नैऋत्य में अग्निजिह्व नामक वेताल हैं; मंगलवार को पूजित होकर वे इच्छित सिद्धि देते हैं।

श्लोक 74 (skanda.4.68.74)

वेतालकुंडं तत्रास्ति सर्वव्याधिविघातकृत् ॥ तत्कुंडोदकसंस्पर्शाद्व्रणविस्फोटरुग्व्रजेत्

vetālakuṁḍaṁ tatrāsti sarvavyādhivighātakṛt || tatkuṁḍodakasaṁsparśādvraṇavisphoṭarugvrajet

वहाँ वेतालकुंड है, सभी रोगों का नाशक; उस कुंड के जल के स्पर्श से घाव और फोड़ों का रोग दूर हो जाता है।

श्लोक 75 (skanda.4.68.75)

वेतालकुंडे सुस्नातो वेतालं प्रणिपत्य च ॥ लभेत वांछितां सिद्धिं दुर्लभां सर्वदेहिभिः

vetālakuṁḍe susnāto vetālaṁ praṇipatya ca || labheta vāṁchitāṁ siddhiṁ durlabhāṁ sarvadehibhiḥ

वेतालकुंड में भलीभाँति स्नान कर, वेताल को प्रणाम कर, सभी प्राणियों के लिए दुर्लभ इच्छित सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 76 (skanda.4.68.76)

गणोस्ति तत्र द्विभुजश्चतुष्पात्पंचशीर्षकः ॥ तस्य संवीक्षणादेव पापं याति सहस्रधा

gaṇosti tatra dvibhujaścatuṣpātpaṁcaśīrṣakaḥ || tasya saṁvīkṣaṇādeva pāpaṁ yāti sahasradhā

वहाँ दो भुजा, चार पैर और पाँच सिर वाला एक गण है; उसके दर्शन मात्र से पाप हजार गुना नष्ट हो जाता है।

श्लोक 77 (skanda.4.68.77)

तदुत्तरे मुने रुद्रश्तुःशृंगोस्ति भीषणः ॥ त्रिपादस्तु द्विशीर्षा च हस्ताः स्युः सप्त एव हि

taduttare mune rudraśtuḥśṛṁgosti bhīṣaṇaḥ || tripādastu dviśīrṣā ca hastāḥ syuḥ sapta eva hi

हे मुने, उसके उत्तर में चार सींगों वाला एक भयंकर रुद्र है, तीन पैर वाला, दो सिर वाला, और पूरे सात हाथों वाला।

श्लोक 78 (skanda.4.68.78)

रोरूयते वृषाकारस्त्रिधा बद्धः स कुंभज ॥ काशीविघ्रकरा ये च ये काश्यां पापबुद्धयः

rorūyate vṛṣākārastridhā baddhaḥ sa kuṁbhaja || kāśīvighrakarā ye ca ye kāśyāṁ pāpabuddhayaḥ

हे कलशोद्भव, वह बैल के समान आकार वाला, तीन स्थानों में बँधा हुआ गर्जता है; काशी में विघ्न करने वाले और पापी बुद्धि वाले -

श्लोक 79 (skanda.4.68.79)

तेषां च संछिदां कर्तुमहं धृतकुठारकः ॥ ये काश्यां विघ्नहर्तारो ये काश्यां धर्मबुद्धयः

teṣāṁ ca saṁchidāṁ kartumahaṁ dhṛtakuṭhārakaḥ || ye kāśyāṁ vighnahartāro ye kāśyāṁ dharmabuddhayaḥ

- उनका नाश करने के लिए मैंने कुल्हाड़ी धारण की है' (ऐसा वह कहता है); काशी में विघ्न हरने वाले, धर्मबुद्धि वाले -

श्लोक 80 (skanda.4.68.80)

सुधाघटकरश्चाहं तद्वंशपरिषेककृत् ॥ तं दृष्ट्वा वृषरुद्रं वै पूजयित्वा तु भक्तितः

sudhāghaṭakaraścāhaṁ tadvaṁśapariṣekakṛt || taṁ dṛṣṭvā vṛṣarudraṁ vai pūjayitvā tu bhaktitaḥ

- उनके लिए मैं अमृत-घट धारण करने वाला हूँ, उनके वंश का अभिषेक करने वाला हूँ' (ऐसा कहने वाले) उस वृषरूप रुद्र को देखकर, भक्तिपूर्वक पूजा कर -

श्लोक 81 (skanda.4.68.81)

महामहोपचारैश्च न विघ्नैरभिभूयते ॥ मणिप्रदीपो नागोऽस्ति तस्माद्रुद्रादुदग्दिशि

mahāmahopacāraiśca na vighnairabhibhūyate || maṇipradīpo nāgo'sti tasmādrudrādudagdiśi

- महान उपचारों सहित, मनुष्य विघ्नों से अभिभूत नहीं होता। उस रुद्र के उत्तर में मणिप्रदीप नामक नाग है।

श्लोक 82 (skanda.4.68.82)

मणिकुंडं तदग्रे तु विषव्याधिहरं परम् ॥ तस्मिन्कुंडे कृतस्नानस्तं नागं परिवीक्ष्य च

maṇikuṁḍaṁ tadagre tu viṣavyādhiharaṁ param || tasminkuṁḍe kṛtasnānastaṁ nāgaṁ parivīkṣya ca

उसके आगे मणिकुंड है, विष-रोग का परम नाशक; उस कुंड में स्नान कर और उस नाग का दर्शन कर -

श्लोक 83 (skanda.4.68.83)

मणिमाणिक्यसंपूर्ण गजाश्वरथसंकुलम् ॥ स्त्रीरत्नपुत्ररत्नैश्च समृद्धं राज्यमाप्नुयात्

maṇimāṇikyasaṁpūrṇa gajāśvarathasaṁkulam || strīratnaputraratnaiśca samṛddhaṁ rājyamāpnuyāt

- मणि-माणिक्यों से पूर्ण, हाथी-घोड़े-रथों से भरा, स्त्री-रत्न और पुत्र-रत्न से समृद्ध राज्य प्राप्त होता है।

श्लोक 84 (skanda.4.68.84)

कृत्तिवासेश्वरं लिंगं काश्यां यैर्न विलोकितम् ॥ ते मर्त्यलोके भाराय भुवो भूता न संशयः

kṛttivāseśvaraṁ liṁgaṁ kāśyāṁ yairna vilokitam || te martyaloke bhārāya bhuvo bhūtā na saṁśayaḥ

काशी में जिन्होंने कृत्तिवासेश्वर लिंग का दर्शन नहीं किया, वे निःसंदेह मृत्युलोक में पृथ्वी के भार बने हुए प्राणी हैं।

श्लोक 85 (skanda.4.68.85)

॥स्कंद उवाच॥ कृत्तिवासः समुत्पत्तिं ये श्रोष्यंतीह मानवाः ॥ तल्लिंगदर्शनाच्छ्रेयो लप्स्यंते नात्र संशयः

||skaṁda uvāca|| kṛttivāsaḥ samutpattiṁ ye śroṣyaṁtīha mānavāḥ || talliṁgadarśanācchreyo lapsyaṁte nātra saṁśayaḥ

स्कन्द ने कहा - जो मनुष्य यहाँ कृत्तिवास की उत्पत्ति सुनेंगे, उन्हें उस लिंग के दर्शन के समान ही कल्याण प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं।

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