काशी खण्ड · अध्याय 75
त्रिलोचनमाहात्म्यम्
श्लोक 1 (skanda.4.75.1)
॥अगस्त्य उवाच॥ श्रुत्वोंकारकथामेतां महापातकनाशिनीम् ॥ न तृप्तोस्मि विशाखाथ ब्रूहि त्रैविष्टपीं कथाम्
||agastya uvāca|| śrutvoṁkārakathāmetāṁ mahāpātakanāśinīm || na tṛptosmi viśākhātha brūhi traiviṣṭapīṁ kathām
अगस्त्य ने कहा - इस महापातकनाशक ओंकार-कथा को सुनकर भी, हे विशाखा-पुत्र, मैं तृप्त नहीं हुआ; अब त्रिविष्टप की कथा बताइए।
श्लोक 2 (skanda.4.75.2)
कथं च कथिता देव्यै देवदेवेन षण्मुख ॥ आविर्भूतिर्महाबुद्धे पुण्या त्रैलोचनी परा
kathaṁ ca kathitā devyai devadevena ṣaṇmukha || āvirbhūtirmahābuddhe puṇyā trailocanī parā
हे षण्मुख, हे महाबुद्धे, देवदेव ने देवी को त्रिलोचनी की उस पवित्र परम अभिव्यक्ति की कथा कैसे सुनाई थी?
श्लोक 3 (skanda.4.75.3)
॥स्कंद उवाच॥ आकर्णय मुने वच्मि कथां श्रमनिवारिणीम् ॥ यथा देवेन कथितां त्रिविष्टपसमुद्भवाम्
||skaṁda uvāca|| ākarṇaya mune vacmi kathāṁ śramanivāriṇīm || yathā devena kathitāṁ triviṣṭapasamudbhavām
स्कन्द ने कहा - हे मुने, सुनो, मैं वह श्रमहारी कथा बताता हूँ, जैसे देव ने त्रिविष्टप की उत्पत्ति की कथा सुनाई थी।
श्लोक 4 (skanda.4.75.4)
विरजाख्यं हि तत्पीठं तत्र लिंगं त्रिविष्टपम् ॥ तत्पीठदर्शनादेव विरजा जायते नरः
virajākhyaṁ hi tatpīṭhaṁ tatra liṁgaṁ triviṣṭapam || tatpīṭhadarśanādeva virajā jāyate naraḥ
वह पीठ विरजा नाम से जाना जाता है, और वहाँ त्रिविष्टप लिंग है; उस पीठ के दर्शन मात्र से मनुष्य विरज (निष्पाप) हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.4.75.5)
तिस्रस्तु संगतास्तत्र स्रोतस्विन्यो घटोद्भव ॥ तिस्रः कल्मषहारिण्यो दक्षिणे हि त्रिलोचनात्
tisrastu saṁgatāstatra srotasvinyo ghaṭodbhava || tisraḥ kalmaṣahāriṇyo dakṣiṇe hi trilocanāt
हे घटोद्भव, त्रिलोचन के दक्षिण में तीन नदियाँ वहाँ मिलती हैं - तीन पापहारिणी नदियाँ।
श्लोक 6 (skanda.4.75.6)
स्रोतोमूर्तिधराः साक्षाल्लिंगस्नपनहेतवे ॥ सरस्वत्यथ कालिंदी नर्मदा चातिशर्मदा
srotomūrtidharāḥ sākṣālliṁgasnapanahetave || sarasvatyatha kāliṁdī narmadā cātiśarmadā
वे साक्षात् प्रवाह-मूर्ति धारण करके, लिंग के स्नपन के लिए - सरस्वती, कालिंदी (यमुना), और अत्यंत कल्याणकारी नर्मदा।
श्लोक 7 (skanda.4.75.7)
तिस्रोपि हि त्रिसंध्यं ताः सरितः कुंभपाणयः ॥ स्नपयंति महाधाम लिंगं त्रैविष्टपं महत्
tisropi hi trisaṁdhyaṁ tāḥ saritaḥ kuṁbhapāṇayaḥ || snapayaṁti mahādhāma liṁgaṁ traiviṣṭapaṁ mahat
वे तीनों नदियाँ, कलश हाथ में लिए, त्रिकाल संध्या में उस महान त्रिविष्टप लिंग को स्नान कराती हैं।
श्लोक 8 (skanda.4.75.8)
लिंगानि परितस्ताभिः स्वनाम्नास्थापि तान्यपि ॥ तेषां संदर्शनात्पुंसां तासां स्नानफलं भवेत्
liṁgāni paritastābhiḥ svanāmnāsthāpi tānyapi || teṣāṁ saṁdarśanātpuṁsāṁ tāsāṁ snānaphalaṁ bhavet
उनके द्वारा उनके अपने-अपने नामों से चारों ओर लिंग भी स्थापित किए गए हैं; उनके दर्शन मात्र से मनुष्यों को उन नदियों के स्नान का फल मिलता है।
श्लोक 9 (skanda.4.75.9)
सरस्वतीश्वरं लिंगं दक्षिणेन त्रिविष्टपात् ॥ सारस्वतं पदं दद्याद्दृष्टं स्पृष्टं च जाड्यहृत्
sarasvatīśvaraṁ liṁgaṁ dakṣiṇena triviṣṭapāt || sārasvataṁ padaṁ dadyāddṛṣṭaṁ spṛṣṭaṁ ca jāḍyahṛt
त्रिविष्टप के दक्षिण में सरस्वतीश्वर लिंग है; उसका दर्शन-स्पर्श सारस्वत पद देता है और जड़ता को हरता है।
श्लोक 10 (skanda.4.75.10)
यमुनेशं प्रतीच्यां च नरैर्भक्त्या समर्चितम् ॥ अपि किल्बिषवद्भिश्च यमलोकनिवारणम्
yamuneśaṁ pratīcyāṁ ca narairbhaktyā samarcitam || api kilbiṣavadbhiśca yamalokanivāraṇam
पश्चिम में यमुनेश है, मनुष्यों द्वारा भक्तिपूर्वक पूजित; पापियों द्वारा भी पूजित होने पर वह यमलोक से बचाता है।
श्लोक 11 (skanda.4.75.11)
दृष्टं त्रिलोचनात्प्राच्यां नर्मदेशं सुशर्मदम् ॥ तल्लिंगार्चनतो नृणां गर्भवासो निषिध्यते
dṛṣṭaṁ trilocanātprācyāṁ narmadeśaṁ suśarmadam || talliṁgārcanato nṛṇāṁ garbhavāso niṣidhyate
त्रिलोचन के पूर्व में नर्मदेश दिखाई देता है, महाकल्याणकारी; उस लिंग की पूजा से मनुष्यों का गर्भवास निषिद्ध हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.4.75.12)
स्नात्वा पिलिपिला तीर्थे त्रिविष्टपसमीपतः ॥ दृष्ट्वा त्रिलोचनं लिंगं किं भूयः परिशोचति
snātvā pilipilā tīrthe triviṣṭapasamīpataḥ || dṛṣṭvā trilocanaṁ liṁgaṁ kiṁ bhūyaḥ pariśocati
पिलिपिला तीर्थ में स्नान कर, त्रिविष्टप के समीप त्रिलोचन लिंग का दर्शन कर, मनुष्य फिर किस बात का शोक करेगा?
श्लोक 13 (skanda.4.75.13)
त्रिविष्टपस्य लिंगस्य स्मरणादपि मानवः ॥ त्रिविष्टप पतिर्भूयान्नात्र कार्या विचारणा
triviṣṭapasya liṁgasya smaraṇādapi mānavaḥ || triviṣṭapa patirbhūyānnātra kāryā vicāraṇā
त्रिविष्टप लिंग का स्मरण मात्र करने से भी मनुष्य त्रिविष्टप (स्वर्ग) का स्वामी बन जाता है - इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.4.75.14)
त्रिविष्टपस्य द्रष्टारः स्रष्टारः स्युर्न संशयः ॥ कृतकृत्यास्त एवात्र त एवात्र महाधियः
triviṣṭapasya draṣṭāraḥ sraṣṭāraḥ syurna saṁśayaḥ || kṛtakṛtyāsta evātra ta evātra mahādhiyaḥ
त्रिविष्टप के दर्शक निःसंदेह स्वयं सृष्टिकर्ता के समान हो जाते हैं; वे ही यहाँ कृतकृत्य हैं, वे ही यहाँ महाबुद्धिमान हैं।
श्लोक 15 (skanda.4.75.15)
आनंदकानने लिंगं प्रणतं यैस्त्रिविष्टपम् ॥ त्रिलोचनस्य नामापि यैः श्रुतं शुद्धबुद्धिभिः
ānaṁdakānane liṁgaṁ praṇataṁ yaistriviṣṭapam || trilocanasya nāmāpi yaiḥ śrutaṁ śuddhabuddhibhiḥ
आनंदकानन में जिन शुद्धबुद्धि लोगों ने त्रिविष्टप लिंग को प्रणाम किया, और त्रिलोचन का नाम भी जिन्होंने सुना -
श्लोक 16 (skanda.4.75.16)
सप्तजन्मार्जितात्पापात्ते पूता नात्र संशयः ॥ पृथिव्यां यानि लिंगानि तेषु दृष्टेषु यत्फलम्
saptajanmārjitātpāpātte pūtā nātra saṁśayaḥ || pṛthivyāṁ yāni liṁgāni teṣu dṛṣṭeṣu yatphalam
- वे सात जन्मों के पाप से पवित्र हुए, इसमें संशय नहीं। पृथ्वी पर जितने भी लिंग हैं, उनके दर्शन का जो फल है -
श्लोक 17 (skanda.4.75.17)
तत्स्यात्रिविष्टपे दृष्टे काश्यां मन्ये ततोधिकम् ॥ काश्यां त्रिविष्टपे दृष्टे दृष्टं सर्वं त्रिविष्टपम्
tatsyātriviṣṭape dṛṣṭe kāśyāṁ manye tatodhikam || kāśyāṁ triviṣṭape dṛṣṭe dṛṣṭaṁ sarvaṁ triviṣṭapam
- वही फल काशी में त्रिविष्टप के दर्शन से, बल्कि मैं मानता हूँ उससे भी अधिक, प्राप्त होता है। काशी में त्रिविष्टप के दर्शन से मानो संपूर्ण स्वर्ग देख लिया जाता है।
श्लोक 18 (skanda.4.75.18)
क्षणान्निर्धूत पापोसौ न पुनर्गर्भभाग्भवेत ॥ स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वावभृथवान्स च
kṣaṇānnirdhūta pāposau na punargarbhabhāgbhaveta || sa snātaḥ sarvatīrtheṣu sarvāvabhṛthavānsa ca
क्षण भर में उसका पाप धुल जाता है, और वह फिर गर्भ में नहीं आता; वह मानो सभी तीर्थों में स्नान किए हुए और सभी अवभृथ (यज्ञांत स्नान) किए हुए के समान हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.4.75.19)
यो वै पिलिपिला तीर्थे स्नात्वोत्तरवहांभसि ॥ सरित्त्रयं महापुण्यं यत्र साक्षाद्वसेत्सदा
yo vai pilipilā tīrthe snātvottaravahāṁbhasi || sarittrayaṁ mahāpuṇyaṁ yatra sākṣādvasetsadā
जो पिलिपिला तीर्थ में, उसके उत्तरवाहिनी जल में स्नान करता है, जहाँ महापुण्य तीनों नदियाँ साक्षात् सदा निवास करती हैं -
श्लोक 20 (skanda.4.75.20)
तत्र श्राद्धादिकं कृत्वा गयायां किं करिष्यति ॥ स्नात्वा पिलिपिला तीर्थे कृत्वा वै पिंडपातनम्
tatra śrāddhādikaṁ kṛtvā gayāyāṁ kiṁ kariṣyati || snātvā pilipilā tīrthe kṛtvā vai piṁḍapātanam
- वहाँ श्राद्ध आदि कर, उसे गया जाने की क्या आवश्यकता? पिलिपिला तीर्थ में स्नान कर, पिंडदान करके -
श्लोक 21 (skanda.4.75.21)
दृष्ट्वा त्रिविष्टपं लिंगं कोटितीर्थफलं लभेत् ॥ यदन्यत्रार्जितं पापं तत्काशी दर्शनाद्व्रजेत्
dṛṣṭvā triviṣṭapaṁ liṁgaṁ koṭitīrthaphalaṁ labhet || yadanyatrārjitaṁ pāpaṁ tatkāśī darśanādvrajet
- और त्रिविष्टप लिंग का दर्शन कर, मनुष्य करोड़ तीर्थों का फल प्राप्त करता है। अन्यत्र अर्जित पाप काशी के दर्शन से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.4.75.22)
काश्यां तु यत्कृतं पापं तत्पैशाचपदप्रदम् ॥ प्रमादात्पातकं कृत्वा शंभोरानंदकानने
kāśyāṁ tu yatkṛtaṁ pāpaṁ tatpaiśācapadapradam || pramādātpātakaṁ kṛtvā śaṁbhorānaṁdakānane
परंतु काशी में किया गया पाप पिशाच-योनि देता है। शंभु के आनंदकानन में प्रमादवश पाप कर बैठने पर भी -
श्लोक 23 (skanda.4.75.23)
दृष्ट्वा त्रिविष्टपं लिंगं तत्पापमपि हास्यति ॥ सर्वस्मिन्नपि भूपृष्ठे श्रेष्ठमानंदकाननम्
dṛṣṭvā triviṣṭapaṁ liṁgaṁ tatpāpamapi hāsyati || sarvasminnapi bhūpṛṣṭhe śreṣṭhamānaṁdakānanam
- त्रिविष्टप लिंग का दर्शन कर, वह पाप भी नष्ट हो जाता है। संपूर्ण पृथ्वी की सतह में आनंदकानन सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 24 (skanda.4.75.24)
तत्रापि सर्वतीर्थानि ततोप्योंकारभूमिका ॥ ओंकारादपि सल्लिंगान्मोक्षवर्त्म प्रकाशकात्
tatrāpi sarvatīrthāni tatopyoṁkārabhūmikā || oṁkārādapi salliṁgānmokṣavartma prakāśakāt
वहाँ भी सभी तीर्थ हैं, और उससे भी परे ओंकार-भूमि है। और मोक्ष का मार्ग प्रकाशित करने वाले उस सत् लिंग ओंकार से भी परे -
श्लोक 25 (skanda.4.75.25)
अतिश्रेष्ठतरं लिंगं श्रेयोरूपं त्रिलोचनम्
atiśreṣṭhataraṁ liṁgaṁ śreyorūpaṁ trilocanam
- वह अत्यंत श्रेष्ठतर, कल्याणरूप त्रिलोचन लिंग है।
श्लोक 26 (skanda.4.75.26)
तेजस्विषु यथा भानुर्दृश्येषु च यथा शशी ॥ तथा लिंगेषु सर्वेषु परं लिंगं त्रिलोचनम्
tejasviṣu yathā bhānurdṛśyeṣu ca yathā śaśī || tathā liṁgeṣu sarveṣu paraṁ liṁgaṁ trilocanam
जैसे तेजस्वियों में सूर्य और दृश्यों में चंद्रमा है, वैसे ही सभी लिंगों में त्रिलोचन परम लिंग है।
श्लोक 27 (skanda.4.75.27)
त्रिलोचनार्चकानां सा पदवी न दवीयसी ॥ परं निर्वाणपद्माया महासौख्यैकशेवधेः
trilocanārcakānāṁ sā padavī na davīyasī || paraṁ nirvāṇapadmāyā mahāsaukhyaikaśevadheḥ
त्रिलोचन के पूजकों के लिए वह पद दूर नहीं है - जो निर्वाणरूपी लक्ष्मी का, महासुख के एकमात्र भंडार का पद है।
श्लोक 28 (skanda.4.75.28)
सकृत्त्रिलोचनार्चातो यच्छ्रेयः समुपार्ज्यते ॥ न तदा जन्मसंपूंज्य लिंगान्यन्यानि लभ्यते
sakṛttrilocanārcāto yacchreyaḥ samupārjyate || na tadā janmasaṁpūṁjya liṁgānyanyāni labhyate
त्रिलोचन की एक बार पूजा से जो कल्याण प्राप्त होता है, वह कई जन्मों तक अन्य लिंगों की पूजा से भी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 29 (skanda.4.75.29)
काश्यां त्रिलोचनं लिंगं येर्चयंति महाधियः ॥ तेर्च्यास्त्रिभुवनौकोभिर्ममप्रीतिमभीप्सुभिः
kāśyāṁ trilocanaṁ liṁgaṁ yercayaṁti mahādhiyaḥ || tercyāstribhuvanaukobhirmamaprītimabhīpsubhiḥ
काशी में जो महाबुद्धिमान त्रिलोचन लिंग की पूजा करते हैं, वे मेरी प्रीति चाहने वाले त्रिभुवन-निवासियों द्वारा पूजनीय हैं।
श्लोक 30 (skanda.4.75.30)
कृत्वापि सर्वसंन्यासं कृत्वा पाशुपतव्रतम् ॥ नियमेभ्यः स्खलित्वापि कुतो बिभ्यति मानवाः
kṛtvāpi sarvasaṁnyāsaṁ kṛtvā pāśupatavratam || niyamebhyaḥ skhalitvāpi kuto bibhyati mānavāḥ
संपूर्ण संन्यास लेकर, पाशुपत व्रत धारण कर, फिर भी नियमों से स्खलित होने पर भी - मनुष्य किससे डरें?
श्लोक 31 (skanda.4.75.31)
विद्यमाने महालिंगे महापापौघहारिणि ॥ त्रिविष्टपे पुण्यराशौ मोक्षनिक्षेपसद्मनि
vidyamāne mahāliṁge mahāpāpaughahāriṇi || triviṣṭape puṇyarāśau mokṣanikṣepasadmani
जब महापाप-समूह को हरने वाला वह महालिंग विद्यमान है - त्रिविष्टप, पुण्य की राशि, मोक्ष के जमा होने का सदन -
श्लोक 32 (skanda.4.75.32)
समभ्यर्च्य महालिंगं सकृदेव त्रिलोचनम् ।।ऽ ॥ मुच्यते कलुषैः सर्वैरपिजन्मशतार्जितैः
samabhyarcya mahāliṁgaṁ sakṛdeva trilocanam ||' || mucyate kaluṣaiḥ sarvairapijanmaśatārjitaiḥ
- उस महालिंग त्रिलोचन की एक बार भी पूजा कर लेने से, मनुष्य सैकड़ों जन्मों में अर्जित सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 33 (skanda.4.75.33)
ब्रह्महापि सुरापो वा स्तेयी वा गुरुतल्पगः ॥ तत्संयोग्यपि वा वर्षं महापापी प्रकीर्तितः
brahmahāpi surāpo vā steyī vā gurutalpagaḥ || tatsaṁyogyapi vā varṣaṁ mahāpāpī prakīrtitaḥ
ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर, गुरु-पत्नी-गामी, या उसके साथ एक वर्ष तक संपर्क रखने वाला भी महापापी कहा गया है।
श्लोक 34 (skanda.4.75.34)
परदाररतश्चापि परहिंसा रतोपि वा ॥ परापवादशीलोपि तथा विस्रंभघातकः
paradārarataścāpi parahiṁsā ratopi vā || parāpavādaśīlopi tathā visraṁbhaghātakaḥ
पराई स्त्री में आसक्त, या दूसरों को सताने में रत, दूसरों की निंदा करने वाला, तथा विश्वासघाती भी -
श्लोक 35 (skanda.4.75.35)
कृतघ्नोपि भ्रूणहापि वृषलीपतिरेव वा ॥ मातापितृगुरुत्यागी वह्निदो गरदोपि वा
kṛtaghnopi bhrūṇahāpi vṛṣalīpatireva vā || mātāpitṛgurutyāgī vahnido garadopi vā
- कृतघ्न, भ्रूणहत्यारा, नीच स्त्री का पति, माता-पिता-गुरु का त्यागी, अग्निदाता या विषदाता -
श्लोक 36 (skanda.4.75.36)
गोघ्नः स्त्रीघ्नोपि शूद्रघ्नः कन्यादूषयितापि च ॥ क्रूरो वा पिशुनो वापि निजधर्मपराङ्मुखः
goghnaḥ strīghnopi śūdraghnaḥ kanyādūṣayitāpi ca || krūro vā piśuno vāpi nijadharmaparāṅmukhaḥ
- गौ, स्त्री या शूद्र का हत्यारा, कन्या को दूषित करने वाला, क्रूर, चुगलखोर, या अपने धर्म से विमुख -
श्लोक 37 (skanda.4.75.37)
निंदको नास्तिको वापि कूटसाक्ष्यप्रवादकः ॥ अभक्ष्यभक्षको वापि तथाऽविक्रेय विक्रयी
niṁdako nāstiko vāpi kūṭasākṣyapravādakaḥ || abhakṣyabhakṣako vāpi tathā'vikreya vikrayī
- निंदक, नास्तिक, या झूठी गवाही देने वाला, अभक्ष्य खाने वाला, या न बेचने योग्य वस्तु बेचने वाला -
श्लोक 38 (skanda.4.75.38)
इत्यादि पापशीलोपि मुक्त्वैकं शिवनिंदकम ॥ पापान्निष्कृतिमाप्नोति नत्वा लिंगं त्रिलोचनम्
ityādi pāpaśīlopi muktvaikaṁ śivaniṁdakama || pāpānniṣkṛtimāpnoti natvā liṁgaṁ trilocanam
- इस प्रकार के पापी भी, केवल शिव-निंदक को छोड़कर, त्रिलोचन लिंग को प्रणाम कर पाप से मुक्ति पा सकते हैं।
श्लोक 39 (skanda.4.75.39)
शिवनिंदारतो मूढः शिवशास्त्रविनिंदकः ॥ तस्य नो निष्कृतिर्दृष्टा क्वापि शास्त्रेपि केनचित्
śivaniṁdārato mūḍhaḥ śivaśāstraviniṁdakaḥ || tasya no niṣkṛtirdṛṣṭā kvāpi śāstrepi kenacit
शिव-निंदा में रत, शिव-शास्त्र की निंदा करने वाला मूर्ख - उसके लिए किसी भी शास्त्र में कहीं भी मुक्ति नहीं देखी गई।
श्लोक 40 (skanda.4.75.40)
आत्मघाती स विज्ञेयः सदा त्रैलोक्यघातकः ॥ शिवनिंदां विधत्ते यः स नाभाष्योऽधमाधमः
ātmaghātī sa vijñeyaḥ sadā trailokyaghātakaḥ || śivaniṁdāṁ vidhatte yaḥ sa nābhāṣyo'dhamādhamaḥ
वह आत्महंता समझा जाना चाहिए, सदा त्रैलोक्य-घातक; जो शिव-निंदा करता है, वह अधम से भी अधम, बात करने योग्य नहीं है।
श्लोक 41 (skanda.4.75.41)
शिवनिंदारता ये च शिवभक्तजनेष्वपि ॥ ते यांति नरके घोरे यावच्चंद्रदिवाकरौ
śivaniṁdāratā ye ca śivabhaktajaneṣvapi || te yāṁti narake ghore yāvaccaṁdradivākarau
शिव-निंदा में रत जो लोग शिवभक्तों की भी निंदा करते हैं, वे सूर्य-चंद्र के रहने तक घोर नरक में जाते हैं।
श्लोक 42 (skanda.4.75.42)
शैवाः पूज्याः प्रयत्नेन काश्या मोक्षमभीप्सुभिः ॥ तेष्वर्चितेष्वपि शिवः प्रीतो भवत्यसंशयः
śaivāḥ pūjyāḥ prayatnena kāśyā mokṣamabhīpsubhiḥ || teṣvarciteṣvapi śivaḥ prīto bhavatyasaṁśayaḥ
काशी में मोक्षाकांक्षियों को शिव-भक्तों की प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए; उनकी पूजा से भी शिव निःसंदेह प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 43 (skanda.4.75.43)
सर्वेषामिह पापानां प्रायश्चित्तचिकीर्षया ॥ निःशंकैरेव वक्तव्यं प्रमाणज्ञैरिदं वचः
sarveṣāmiha pāpānāṁ prāyaścittacikīrṣayā || niḥśaṁkaireva vaktavyaṁ pramāṇajñairidaṁ vacaḥ
सभी पापों के प्रायश्चित्त की इच्छा से, शास्त्र-प्रमाणों के ज्ञाताओं द्वारा यह वचन निःसंदेह कहा जाना चाहिए।
श्लोक 44 (skanda.4.75.44)
पुरश्चरणकामश्चेद्भीतोसि यदि पापतः ॥ मन्यसे यदि नः सत्यं वाक्यशास्त्रप्रमाणतः
puraścaraṇakāmaścedbhītosi yadi pāpataḥ || manyase yadi naḥ satyaṁ vākyaśāstrapramāṇataḥ
यदि तुम पुरश्चरण चाहते हो, यदि पाप से भयभीत हो, यदि शास्त्र-प्रमाण से हमारी बात सत्य मानते हो -
श्लोक 45 (skanda.4.75.45)
ततः सर्वं परित्यज्य कृत्वा मनसि निश्चयम् ॥ आनंदकाननं याहि यत्र विश्वेश्वरः स्वयम्
tataḥ sarvaṁ parityajya kṛtvā manasi niścayam || ānaṁdakānanaṁ yāhi yatra viśveśvaraḥ svayam
- तो सब कुछ त्यागकर, मन में निश्चय कर, आनंदकानन जाओ, जहाँ स्वयं विश्वेश्वर विराजते हैं।
श्लोक 46 (skanda.4.75.46)
यत्र क्षेत्रप्रविष्टानां नराणां निश्चितात्मनाम् ॥ न बाधतेऽघनिचयः प्राप्येत च परोवृषः
yatra kṣetrapraviṣṭānāṁ narāṇāṁ niścitātmanām || na bādhate'ghanicayaḥ prāpyeta ca parovṛṣaḥ
वहाँ, दृढ़-निश्चयी होकर क्षेत्र में प्रवेश करने वाले मनुष्यों को पाप-समूह बाधित नहीं करता, और परम धर्म प्राप्त होता है।
श्लोक 47 (skanda.4.75.47)
तत्राद्यापि महातीर्थं त्रिस्रोतस्यतिनिर्मले ॥ पुण्ये पिलिपिलानाम्नि त्रिसरित्परिसेविते
tatrādyāpi mahātīrthaṁ trisrotasyatinirmale || puṇye pilipilānāmni trisaritparisevite
वहाँ आज भी वह महातीर्थ है, अत्यंत निर्मल त्रिस्रोता, पिलिपिला नामक पुण्यस्थल, तीनों नदियों द्वारा सेवित।
श्लोक 48 (skanda.4.75.48)
त्रिलोचनाक्षिविक्षेप परिक्षिप्त महैनसि ॥ स्नात्वा गृह्योक्तविधिना तर्पणीयान्प्रतर्प्य च
trilocanākṣivikṣepa parikṣipta mahainasi || snātvā gṛhyoktavidhinā tarpaṇīyānpratarpya ca
वहाँ त्रिलोचन की दृष्टि के मात्र संचरण से महापाप बिखर जाता है - वहाँ गृह्यसूत्र में कहे विधि से स्नान कर, तर्पणीयों को तर्पण देकर -
श्लोक 49 (skanda.4.75.49)
दत्त्वा देयं यथाशक्ति वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥ दृष्ट्वा त्रिविष्टपं लिंगं समभ्यर्च्यातिभक्तितः
dattvā deyaṁ yathāśakti vittaśāṭhyavivarjitaḥ || dṛṣṭvā triviṣṭapaṁ liṁgaṁ samabhyarcyātibhaktitaḥ
- यथाशक्ति दान देकर, धन के प्रति कंजूसी त्यागकर, त्रिविष्टप लिंग का दर्शन कर, अत्यंत भक्तिपूर्वक पूजा कर -
श्लोक 50 (skanda.4.75.50)
गंधाद्यैर्विविधैर्माल्यैः पंचामृतपुरःसरैः ॥ धूपैर्दीपैः सनैवेद्यैर्वासोभिर्बहुभूषणैः
gaṁdhādyairvividhairmālyaiḥ paṁcāmṛtapuraḥsaraiḥ || dhūpairdīpaiḥ sanaivedyairvāsobhirbahubhūṣaṇaiḥ
- गंध आदि नाना मालाओं से, पंचामृत सहित, धूप-दीप-नैवेद्य से, वस्त्रों और अनेक आभूषणों से -
श्लोक 51 (skanda.4.75.51)
पूजोपकरणैर्द्रव्यैर्घंटादर्पणचामरैः ॥ चित्रध्वजपताकाभिर्नृत्यवाद्यसुगायनैः
pūjopakaraṇairdravyairghaṁṭādarpaṇacāmaraiḥ || citradhvajapatākābhirnṛtyavādyasugāyanaiḥ
- पूजा-सामग्रियों और द्रव्यों से, घंटा-दर्पण-चामरों से, विचित्र ध्वज-पताकाओं से, नृत्य-वाद्य-सुगान से -
श्लोक 52 (skanda.4.75.52)
जपैः प्रदक्षिणाभिश्च नमस्कारैर्मुदायुतैः ॥ परिचारकसंतोषैः कृत्वेति परिपूजनम्
japaiḥ pradakṣiṇābhiśca namaskārairmudāyutaiḥ || paricārakasaṁtoṣaiḥ kṛtveti paripūjanam
- जप, प्रदक्षिणा और हर्षपूर्वक नमस्कारों से, तथा सेवकों को संतुष्ट कर, इस प्रकार पूर्ण पूजा कर -
श्लोक 53 (skanda.4.75.53)
ब्राह्मणान्वाचयेत्पश्चान्निष्पापोहमिति ब्रुवन् ॥ एवं कुर्वन्नरः प्राज्ञो निरेना जायते क्षणात्
brāhmaṇānvācayetpaścānniṣpāpohamiti bruvan || evaṁ kurvannaraḥ prājño nirenā jāyate kṣaṇāt
- फिर ब्राह्मणों से वाचन कराए, 'मैं निष्पाप हूँ' यह कहते हुए। इस प्रकार करने वाला बुद्धिमान मनुष्य क्षण भर में पापरहित हो जाता है।
श्लोक 54 (skanda.4.75.54)
ततः पंचनदे स्नात्वा मणिकर्णी ह्रदे ततः ॥ ततो विश्वेशमभ्यर्च्य प्राप्नोति सुकृतं महत्
tataḥ paṁcanade snātvā maṇikarṇī hrade tataḥ || tato viśveśamabhyarcya prāpnoti sukṛtaṁ mahat
फिर पंचनद में स्नान कर, फिर मणिकर्णिका ह्रद में, फिर विश्वेश की पूजा कर, वह महान पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 55 (skanda.4.75.55)
प्रायश्चित्तमिदं प्रोक्तं महापापविशोधनम् ॥ नास्तिके न प्रवक्तव्यं काशीमाहात्म्य निंदके
prāyaścittamidaṁ proktaṁ mahāpāpaviśodhanam || nāstike na pravaktavyaṁ kāśīmāhātmya niṁdake
यह महापाप-शोधक प्रायश्चित्त बताया गया है; इसे नास्तिक को या काशी-माहात्म्य की निंदा करने वाले को नहीं बताना चाहिए।
श्लोक 56 (skanda.4.75.56)
ददच्च द्रव्यलोभेन प्रायश्चित्तमिदं शुभम् ॥ दाता नरकमाप्नोति सत्यंसत्यं घटोद्भव
dadacca dravyalobhena prāyaścittamidaṁ śubham || dātā narakamāpnoti satyaṁsatyaṁ ghaṭodbhava
हे घटोद्भव, इस शुभ प्रायश्चित्त को धन के लोभ से देने वाला दाता स्वयं नरक प्राप्त करता है - यह सत्य है, बिल्कुल सत्य है।
श्लोक 57 (skanda.4.75.57)
क्षमां प्रदक्षिणीकृन्य यत्फलं सम्यगाप्यते ॥ प्रदोषे तत्फलं काश्यां सप्तकृत्वस्त्रिलोचने
kṣamāṁ pradakṣiṇīkṛnya yatphalaṁ samyagāpyate || pradoṣe tatphalaṁ kāśyāṁ saptakṛtvastrilocane
पृथ्वी की परिक्रमा से जो फल भलीभाँति प्राप्त होता है, वही फल काशी में संध्या-समय त्रिलोचन की सात परिक्रमा से मिलता है।
श्लोक 58 (skanda.4.75.58)
भुजंगमेखलं लिंगं काश्यां दृष्ट्वा त्रिविष्टपम् ॥ जन्मांतरेपि मुक्तः स्यादन्यत्र मरणे सति
bhujaṁgamekhalaṁ liṁgaṁ kāśyāṁ dṛṣṭvā triviṣṭapam || janmāṁtarepi muktaḥ syādanyatra maraṇe sati
काशी में सर्पों से घिरे त्रिविष्टप लिंग का दर्शन कर, अन्यत्र मृत्यु होने पर भी, अगले जन्म में ही मुक्ति मिल जाती है।
श्लोक 59 (skanda.4.75.59)
अन्यत्र सर्वलिंगेषु पुण्यकालो विशिष्यते ॥ त्रिविष्टपे पुण्यकालः सदा रात्रिदिवं नृणाम्
anyatra sarvaliṁgeṣu puṇyakālo viśiṣyate || triviṣṭape puṇyakālaḥ sadā rātridivaṁ nṛṇām
अन्यत्र सभी लिंगों के लिए पुण्यकाल विशिष्ट है, परंतु त्रिविष्टप में मनुष्यों के लिए दिन-रात सदा ही पुण्यकाल है।
श्लोक 60 (skanda.4.75.60)
लिंगान्योंकारमुख्यानि सर्वपापप्रकृंत्यलम् ॥ परं त्रैलोचनी शक्तिः काचिदन्यैव पार्वति
liṁgānyoṁkāramukhyāni sarvapāpaprakṛṁtyalam || paraṁ trailocanī śaktiḥ kācidanyaiva pārvati
ओंकार आदि अन्य लिंग भी सभी पापों को काटने में समर्थ हैं, परंतु हे पार्वती, त्रिलोचनी शक्ति कोई और ही अद्भुत वस्तु है।
श्लोक 61 (skanda.4.75.61)
यतः सर्वेषु लिंगेषु लिंगमेतदनुत्तमम् ॥ तत्कारणं शृण्व पर्णे कर्णे कुरु वदाम्यहम्
yataḥ sarveṣu liṁgeṣu liṁgametadanuttamam || tatkāraṇaṁ śṛṇva parṇe karṇe kuru vadāmyaham
जिस कारण सभी लिंगों में यह लिंग अनुत्तम है, वह कारण सुनो, हे अपर्णे, कान लगाओ, मैं बताता हूँ।
श्लोक 62 (skanda.4.75.62)
पुरा मे योगयुक्तस्य लिंगमेतद्भुवस्तलात् ॥ उद्भिद्य सप्तपातालं निरगात्पुरतो महत्
purā me yogayuktasya liṁgametadbhuvastalāt || udbhidya saptapātālaṁ niragātpurato mahat
'पूर्वकाल में, योगयुक्त रहते हुए, यह महालिंग पृथ्वी-तल से सातों पातालों को भेदकर मेरे सामने महान रूप में प्रकट हुआ था।'
श्लोक 63 (skanda.4.75.63)
अस्मिँल्लिगे पुरा गौरि सुगुप्तं तिष्ठता मया ॥ तुभ्यं नेत्रत्रयं दत्तं निरैक्षिष्ठास्तथोत्तमम्
asmi~llige purā gauri suguptaṁ tiṣṭhatā mayā || tubhyaṁ netratrayaṁ dattaṁ niraikṣiṣṭhāstathottamam
'हे गौरी, इस लिंग में पूर्वकाल में सुगुप्त रूप से रहते हुए, मैंने तुम्हें तीसरा नेत्र दिया था, जिससे तुमने उस श्रेष्ठ लिंग को देखा था।'
श्लोक 64 (skanda.4.75.64)
तदा प्रभृति देवेशि लिंगमेतत्त्रिलोचनम ॥ विष्टपत्रितयांतस्थैर्गीयते ज्ञानदृष्टिदम्
tadā prabhṛti deveśi liṁgametattrilocanama || viṣṭapatritayāṁtasthairgīyate jñānadṛṣṭidam
'हे देवेशी, तभी से यह लिंग त्रिलोचन नाम से, तीनों लोकों के निवासियों द्वारा ज्ञान-दृष्टि देने वाला कहा जाता है।'
श्लोक 65 (skanda.4.75.65)
त्रिलोचनस्य ये भक्तास्तेपि सर्वे त्रिलोचनाः ॥ मम पारिषदास्ते तु जीवन्मुक्ताऽस्त एव हि
trilocanasya ye bhaktāstepi sarve trilocanāḥ || mama pāriṣadāste tu jīvanmuktā'sta eva hi
'त्रिलोचन के जो भक्त हैं, वे भी सभी त्रिलोचन हो जाते हैं; वे मेरे ही पार्षद हैं, वे जीते-जी मुक्त हो जाते हैं।'
श्लोक 66 (skanda.4.75.66)
त्रिलोचनस्य लिंगस्य महिमानं न कश्चन ॥ सम्यग्वेत्ति महेशानि मयैव परिगोपितम्
trilocanasya liṁgasya mahimānaṁ na kaścana || samyagvetti maheśāni mayaiva parigopitam
'हे महेशानी, त्रिलोचन लिंग की महिमा को कोई भी भलीभाँति नहीं जानता; यह मेरे द्वारा ही सुरक्षित रखी गई है।'
श्लोक 67 (skanda.4.75.67)
शुक्लराधतृतीयायां स्नात्वा पैलिपिले ह्रदे ॥ उपोषणपरा भक्त्या रात्रौ जागरणान्विताः
śuklarādhatṛtīyāyāṁ snātvā pailipile hrade || upoṣaṇaparā bhaktyā rātrau jāgaraṇānvitāḥ
वैशाख शुक्ल तृतीया को पैलिपिला ह्रद में स्नान कर, श्रद्धापूर्वक उपवास रखते हुए, रात्रि में जागरण करते हुए -
श्लोक 68 (skanda.4.75.68)
त्रिलोचनं पूजयित्वा प्रातः स्नात्वापि तत्र वै ॥ पुनर्लिंगं समभ्यर्च्य दत्त्वा धर्मघटानपि
trilocanaṁ pūjayitvā prātaḥ snātvāpi tatra vai || punarliṁgaṁ samabhyarcya dattvā dharmaghaṭānapi
- त्रिलोचन की पूजा कर, प्रातःकाल पुनः वहीं स्नान कर, फिर लिंग की पूजा कर, धर्म-घट भी अर्पित कर -
श्लोक 69 (skanda.4.75.69)
सान्नान्सदक्षिणान्देवि पितॄनुद्दिश्य हर्षिताः ॥ विधाय पारणं पश्चाच्छिवभक्तजनैः सह
sānnānsadakṣiṇāndevi pitṝnuddiśya harṣitāḥ || vidhāya pāraṇaṁ paścācchivabhaktajanaiḥ saha
- हे देवी, अन्न और दक्षिणा सहित, पितरों को समर्पित कर, हर्षपूर्वक, फिर शिवभक्तों सहित पारणा कर -
श्लोक 70 (skanda.4.75.70)
विसृज्य पार्थिवं देहं तेन पुण्येन नोदिताः ॥ भवंति देवि नियतं गणा मम पुरोगमाः
visṛjya pārthivaṁ dehaṁ tena puṇyena noditāḥ || bhavaṁti devi niyataṁ gaṇā mama purogamāḥ
- और अपने पार्थिव शरीर को त्यागकर, उस पुण्य से प्रेरित होकर, हे देवी, वे निश्चय ही मेरे प्रमुख गण बन जाते हैं।
श्लोक 71 (skanda.4.75.71)
तावद्धमंति संसारे देवा मर्त्या महोरगाः ॥ गौरि यावन्न पश्यंति काश्यां लिंगं त्रिलोचनम्
tāvaddhamaṁti saṁsāre devā martyā mahoragāḥ || gauri yāvanna paśyaṁti kāśyāṁ liṁgaṁ trilocanam
हे गौरी, देव, मनुष्य और महानाग तब तक ही संसार में भटकते हैं, जब तक वे काशी में त्रिलोचन लिंग को नहीं देखते।
श्लोक 72 (skanda.4.75.72)
सकृत्त्रिविष्टपं दृष्ट्वा स्नात्वा पैलिपिले ह्रदे ॥ न जातुः मातुस्तनपो जायते जंतुरत्र हि
sakṛttriviṣṭapaṁ dṛṣṭvā snātvā pailipile hrade || na jātuḥ mātustanapo jāyate jaṁturatra hi
त्रिविष्टप का एक बार दर्शन कर, पैलिपिला ह्रद में स्नान कर, प्राणी फिर कभी माता का स्तनपान नहीं करता (जन्म नहीं लेता)।
श्लोक 73 (skanda.4.75.73)
प्रतिमासं सदाष्टम्यां चतुर्दश्यां च भामिनि ॥ आयांति सर्वतीर्थानि द्रष्टुं देवं त्रिविष्टपम्
pratimāsaṁ sadāṣṭamyāṁ caturdaśyāṁ ca bhāmini || āyāṁti sarvatīrthāni draṣṭuṁ devaṁ triviṣṭapam
हे भामिनी, प्रत्येक मास अष्टमी और चतुर्दशी को सभी तीर्थ देव त्रिविष्टप का दर्शन करने आते हैं।
श्लोक 74 (skanda.4.75.74)
त्रिविष्टपाद्दक्षिणतः स्नातः पैलिपिलेंऽभसि ॥ तत्र संध्यामुपास्यैकां राजसूयफलं लभेत्
triviṣṭapāddakṣiṇataḥ snātaḥ pailipileṁ'bhasi || tatra saṁdhyāmupāsyaikāṁ rājasūyaphalaṁ labhet
त्रिविष्टप के दक्षिण में पैलिपिला के जल में स्नान कर, वहाँ एक बार संध्या-उपासना कर, राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 75 (skanda.4.75.75)
पादोदकाख्यस्तत्रैव कूपः पापविनाशकः ॥ प्राश्य तस्योदकं मर्त्यो न मर्त्यो जायते पुनः
pādodakākhyastatraiva kūpaḥ pāpavināśakaḥ || prāśya tasyodakaṁ martyo na martyo jāyate punaḥ
वहीं पादोदक नामक कूप है, पापनाशक; उसका जल पीने वाला मनुष्य फिर कभी मनुष्य-योनि में जन्म नहीं लेता।
श्लोक 76 (skanda.4.75.76)
तस्य लिंगस्य पार्श्वे तु संति लिंगान्यनेकशः ॥ कैवल्यदानि तान्यत्र दर्शनात्स्पर्शनादपि
tasya liṁgasya pārśve tu saṁti liṁgānyanekaśaḥ || kaivalyadāni tānyatra darśanātsparśanādapi
उस लिंग के पास अनेक और लिंग हैं, जो केवल दर्शन-स्पर्श से ही कैवल्य-मोक्ष देने वाले हैं।
श्लोक 77 (skanda.4.75.77)
तत्र शांतनवं लिंगं गंगातीरे प्रतिष्ठितम् ॥ तद्दृष्ट्वा शांतिमाप्नोति नरः संसारतापितः
tatra śāṁtanavaṁ liṁgaṁ gaṁgātīre pratiṣṭhitam || taddṛṣṭvā śāṁtimāpnoti naraḥ saṁsāratāpitaḥ
वहाँ गंगा के तट पर शांतनव नामक लिंग स्थापित है; उसका दर्शन कर संसार से संतप्त मनुष्य शांति प्राप्त करता है।
श्लोक 78 (skanda.4.75.78)
तद्दक्षिणे महालिंगं मुने भीष्मेश संज्ञितम् ॥ कलिः कालश्च कामश्च बाधंते न तदीक्षणात्
taddakṣiṇe mahāliṁgaṁ mune bhīṣmeśa saṁjñitam || kaliḥ kālaśca kāmaśca bādhaṁte na tadīkṣaṇāt
हे मुने, उसके दक्षिण में भीष्मेश नामक महालिंग है; उसके दर्शन से कलि, काल और काम बाधा नहीं पहुँचाते।
श्लोक 79 (skanda.4.75.79)
तत्प्रतीच्यां महालिंगं द्रोणेश इति कीर्तितम् ॥ यल्लिंगपूजनाद्द्रोणो ज्योतीरूपं पुनर्दधौ
tatpratīcyāṁ mahāliṁgaṁ droṇeśa iti kīrtitam || yalliṁgapūjanāddroṇo jyotīrūpaṁ punardadhau
उसके पश्चिम में द्रोणेश नामक महालिंग प्रसिद्ध है, जिस लिंग की पूजा से द्रोण ने पुनः ज्योतिर्मय रूप धारण किया।
श्लोक 80 (skanda.4.75.80)
अश्वत्थामेश्वरं लिंगं तदग्रे चातिपुण्यदम् ॥ यदर्चनवशाद्द्रौणिर्न बिभेत्यपि कालतः
aśvatthāmeśvaraṁ liṁgaṁ tadagre cātipuṇyadam || yadarcanavaśāddrauṇirna bibhetyapi kālataḥ
उसके आगे अत्यंत पुण्यदायक अश्वत्थामेश्वर लिंग है, जिसकी पूजा से द्रोण-पुत्र काल से भी नहीं डरता।
श्लोक 81 (skanda.4.75.81)
द्रोणेशाद्वायु दिग्भागे वालखिल्येश्वरं परम् ॥ तल्लिंगं श्रद्धया दृष्ट्वा सर्वक्रतुफलं लभेत्
droṇeśādvāyu digbhāge vālakhilyeśvaraṁ param || talliṁgaṁ śraddhayā dṛṣṭvā sarvakratuphalaṁ labhet
द्रोणेश के वायव्य दिशा में परम वालखिल्येश्वर है; उस लिंग का श्रद्धापूर्वक दर्शन कर, सभी यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 82 (skanda.4.75.82)
तद्वामे लिंगमालोक्य वाल्मीकेश्वरसंज्ञितम् ॥ तस्य संदर्शनादेव विशोको जायते नरः
tadvāme liṁgamālokya vālmīkeśvarasaṁjñitam || tasya saṁdarśanādeva viśoko jāyate naraḥ
उसके बाईं ओर वाल्मीकेश्वर नामक लिंग है; उसके दर्शन मात्र से मनुष्य शोकरहित हो जाता है।
श्लोक 83 (skanda.4.75.83)
अन्यच्चात्रैव यद्वृत्तं तद्ब्रवीमि घटोद्भव ॥ त्रिविष्टपस्य माहात्म्यं देव्यै देवेन भाषितम्
anyaccātraiva yadvṛttaṁ tadbravīmi ghaṭodbhava || triviṣṭapasya māhātmyaṁ devyai devena bhāṣitam
हे घटोद्भव, यहाँ जो एक और घटना घटी, वह बताता हूँ - त्रिविष्टप की यह महिमा देव ने देवी को इसी प्रकार सुनाई थी।