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काशी खण्ड · अध्याय 86

विश्वकर्मेश-प्रादुर्भाव

अध्याय 85अध्याय-सूचीअध्याय 87

श्लोक 1 (skanda.4.86.1)

।। पार्वत्युवाच ।। ।। विश्वकर्मेश्वरं लिंगं यत्काश्यां प्रथितं परम् ।। तस्य लिंगस्य कथय देवदेव समुद्भवम्

|| pārvatyuvāca || || viśvakarmeśvaraṁ liṁgaṁ yatkāśyāṁ prathitaṁ param || tasya liṁgasya kathaya devadeva samudbhavam

पार्वती ने कहा — काशी में जो विश्वकर्मेश्वर नामक श्रेष्ठ लिंग प्रसिद्ध है, हे देवदेव, उस लिंग की उत्पत्ति बताइए।

श्लोक 2 (skanda.4.86.2)

।। देवदेव उवाच ।। ।। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कथां पातकनाशिनीम् ।। विश्वकर्मेश लिंगस्य प्रादुर्भावं मनोहरम्

|| devadeva uvāca || || śṛṇu devi pravakṣyāmi kathāṁ pātakanāśinīm || viśvakarmeśa liṁgasya prādurbhāvaṁ manoharam

देवदेव ने कहा — सुनो, हे देवि, मैं पापनाशिनी कथा कहता हूँ — विश्वकर्मेश लिंग का मनोहर प्राकट्य।

श्लोक 3 (skanda.4.86.3)

विश्वकर्माभवत्पूर्वं ब्रह्मणस्त्वपरा तनुः ।। त्वष्टुः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्वकर्मसु

viśvakarmābhavatpūrvaṁ brahmaṇastvaparā tanuḥ || tvaṣṭuḥ prajāpateḥ putro nipuṇaḥ sarvakarmasu

"पूर्वकाल में विश्वकर्मा ब्रह्मा की ही एक अन्य देह थे, प्रजापति त्वष्टा के पुत्र, सब कर्मों में निपुण।"

श्लोक 4 (skanda.4.86.4)

कृतोपनयनः सोथ बालो गुरुकुले वसन् ।। चकार गुरुशुश्रूषां भिक्षान्नकृतभोजनः

kṛtopanayanaḥ sotha bālo gurukule vasan || cakāra guruśuśrūṣāṁ bhikṣānnakṛtabhojanaḥ

"उपनयन-संस्कार होने पर वह बालक गुरुकुल में रहते हुए गुरु की सेवा करता था, भिक्षा के अन्न से भोजन करते हुए।"

श्लोक 5 (skanda.4.86.5)

एकदा तद्गुरुः प्राह प्रावृट्काले समागते ।। कुरूटजं मदर्थं त्वं यथा प्रावृण्न बाधते

ekadā tadguruḥ prāha prāvṛṭkāle samāgate || kurūṭajaṁ madarthaṁ tvaṁ yathā prāvṛṇna bādhate

"एक बार वर्षा-काल आने पर उसके गुरु ने कहा — 'मेरे लिए ऐसा फूस का वस्त्र बनाओ जिसे वर्षा भी न भेद सके,'"

श्लोक 6 (skanda.4.86.6)

यत्कदाचिन्न भज्येत न पुरातनतां व्रजेत्।। गुरुपत्न्यात्वभिहितो रे त्वाष्ट्र कुरु कंचुकम्

yatkadācinna bhajyeta na purātanatāṁ vrajet|| gurupatnyātvabhihito re tvāṣṭra kuru kaṁcukam

"'जो कभी टूटे नहीं, पुराना भी न हो।' और गुरु-पत्नी ने उससे कहा — 'हे त्वष्ट्र-पुत्र, मेरे लिए एक चोली बनाओ —'"

श्लोक 7 (skanda.4.86.7)

ममांगयोग्यं नो गाढं न श्लथं च प्रयत्नतः ।। विनैव वाससा चारु वाल्कलं च सदोज्ज्वलम्

mamāṁgayogyaṁ no gāḍhaṁ na ślathaṁ ca prayatnataḥ || vinaiva vāsasā cāru vālkalaṁ ca sadojjvalam

"'— मेरे शरीर के अनुकूल, न अधिक कसी हुई न ढीली, प्रयत्नपूर्वक बनी; और बिना कपड़े के ही एक सुन्दर, सदा चमकीली वल्कल-वस्त्र भी।'"

श्लोक 8 (skanda.4.86.8)

गुरुपुत्रेण चाज्ञप्तो ममार्थं पादुके कुरु ।। यदारूढस्य मे पादौ न पंकः संस्पृशेत्क्वचित्

guruputreṇa cājñapto mamārthaṁ pāduke kuru || yadārūḍhasya me pādau na paṁkaḥ saṁspṛśetkvacit

"गुरु-पुत्र ने भी आज्ञा दी — 'मेरे लिए ऐसी खड़ाऊँ बनाओ, जिन्हें पहनकर मेरे पैरों को कीचड़ कभी न छुए,'"

श्लोक 9 (skanda.4.86.9)

चर्मादिबंधनिर्मुक्ते धावतो मे सुखप्रदे ।। याभ्यां च संचरे वारि स्थल भूमाविव द्रुतम्।।

carmādibaṁdhanirmukte dhāvato me sukhaprade || yābhyāṁ ca saṁcare vāri sthala bhūmāviva drutam||

"'चमड़े आदि बन्धनों से मुक्त, दौड़ते समय सुख देने वाली, जिनसे मैं जल पर भी स्थल-भूमि की भाँति तेज़ी से चल सकूँ।'"

श्लोक 10 (skanda.4.86.10)

गुरुकन्यापि तं प्राह त्वाष्ट्र मे श्रवणोचिते ।। भूषणे स्वेन हस्तेन कुरु कांचननिर्मिते

gurukanyāpi taṁ prāha tvāṣṭra me śravaṇocite || bhūṣaṇe svena hastena kuru kāṁcananirmite

"गुरु-कन्या ने भी उससे कहा — 'हे त्वष्ट्र-पुत्र, मेरे कानों के अनुकूल स्वर्ण से बने दो आभूषण अपने हाथ से बनाओ,'"

श्लोक 11 (skanda.4.86.11)

कुमारी क्रीडनीयानि कौतुकानि च देहि मे ।। दंतिदंतमयान्येव स्वहस्तरचितानि च

kumārī krīḍanīyāni kautukāni ca dehi me || daṁtidaṁtamayānyeva svahastaracitāni ca

"'और मुझे खेलने योग्य विचित्र वस्तुएँ दो, हाथी-दाँत से बनी, अपने ही हाथों से रची हुई।'"

श्लोक 12 (skanda.4.86.12)

गृहोपकरणं द्रव्यं मुसलोलूखलादिकम् ।। तथा घटय मेधाविन्यथा त्रुट्यति न क्वचित्

gṛhopakaraṇaṁ dravyaṁ musalolūkhalādikam || tathā ghaṭaya medhāvinyathā truṭyati na kvacit

"'और घर के उपकरण, जैसे मूसल-ऊखल आदि, बनाओ, हे बुद्धिमान, ऐसे कि वे कभी टूटें नहीं।'"

श्लोक 13 (skanda.4.86.13)

अक्षालितान्यपि यथा नित्यं पीठानि सत्तम ।। उज्ज्वलानि भवंत्येव स्थालिकाश्च तथा कुरु

akṣālitānyapi yathā nityaṁ pīṭhāni sattama || ujjvalāni bhavaṁtyeva sthālikāśca tathā kuru

"'हे श्रेष्ठ, आसन और थालियाँ भी ऐसी बनाओ कि बिना रोज़ धोए भी वे सदा चमकदार बनी रहें।'"

श्लोक 14 (skanda.4.86.14)

सूपकर्मण्यपि च मां प्रशाधि त्वष्ट्रनंदन ।। यथांगुल्यो न दह्यंते पाकः स्याच्च यथा शुभः ।।

sūpakarmaṇyapi ca māṁ praśādhi tvaṣṭranaṁdana || yathāṁgulyo na dahyaṁte pākaḥ syācca yathā śubhaḥ ||

"'और मुझे रसोई का काम भी सिखाओ, हे त्वष्ट्र-पुत्र, ऐसे कि उँगलियाँ जलें नहीं, और भोजन शुभ बने।'"

श्लोक 15 (skanda.4.86.15)

एकस्तंभमयं गेहमेकदारुविनिर्मितम् ।। तथा कुरु वरं त्वाष्ट्र यत्रेच्छा तत्र धारये

ekastaṁbhamayaṁ gehamekadāruvinirmitam || tathā kuru varaṁ tvāṣṭra yatrecchā tatra dhāraye

"'और एक स्तम्भ वाला, एक ही लकड़ी से बना घर बनाओ, हे त्वष्ट्र-पुत्र, जिसे मैं जहाँ चाहूँ वहाँ रख सकूँ।'"

श्लोक 16 (skanda.4.86.16)

ये सहाध्यायिनोप्यस्य वयोज्येष्ठाश्च तेपि हि ।। सर्वेसर्वे समीहंते कर्म तत्कृतमेव हि

ye sahādhyāyinopyasya vayojyeṣṭhāśca tepi hi || sarvesarve samīhaṁte karma tatkṛtameva hi

उसके साथ पढ़ने वाले, और आयु में बड़े साथी भी, सभी ने वैसी ही माँगें कीं, कि यह काम उनके लिए भी किया जाए।

श्लोक 17 (skanda.4.86.17)

तथेति स प्रतिज्ञाय सर्वेषां पुरतोद्रिजे ।। मध्ये वनं प्राविशच्च महाचिंताभयार्दितः

tatheti sa pratijñāya sarveṣāṁ puratodrije || madhye vanaṁ prāviśacca mahāciṁtābhayārditaḥ

"ऐसा ही होगा" यह प्रतिज्ञा करके, हे पर्वत-पुत्री, वह सबके समक्ष से वन के मध्य में चला गया, महान चिन्ता और भय से पीड़ित —

श्लोक 18 (skanda.4.86.18)

किंचित्कर्तुं न जानाति प्रतिज्ञातं च तेन वै।। सर्वेषां पुरतः सर्वं करिष्यामीति निश्चितम्

kiṁcitkartuṁ na jānāti pratijñātaṁ ca tena vai|| sarveṣāṁ purataḥ sarvaṁ kariṣyāmīti niścitam

क्योंकि उसे कुछ भी करना नहीं आता था, और उसने सबके समक्ष निश्चय के साथ प्रतिज्ञा कर ली थी कि वह सब कुछ करेगा।

श्लोक 19 (skanda.4.86.19)

किं करोमि क्व गच्छामि को मे साहाय्यमर्पयेत् ।। बुद्धेरपि वनस्थस्य शरणं कं व्रजामि च

kiṁ karomi kva gacchāmi ko me sāhāyyamarpayet || buddherapi vanasthasya śaraṇaṁ kaṁ vrajāmi ca

"मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे कौन सहायता दे? वन में रहकर मेरी बुद्धि किस शरण को जाए?"

श्लोक 20 (skanda.4.86.20)

अंगीकृत्य गुरोर्वाक्यं गुरुपत्न्या गुरोः शिशोः ।। यो न निष्पादयेन्मूढः स भवेन्निरयी नरः

aṁgīkṛtya gurorvākyaṁ gurupatnyā guroḥ śiśoḥ || yo na niṣpādayenmūḍhaḥ sa bhavennirayī naraḥ

"जो मूर्ख गुरु, गुरु-पत्नी और गुरु के शिशु के वचन को स्वीकार करके भी उसे पूरा नहीं करता, वह नरकवासी होता है।"

श्लोक 21 (skanda.4.86.21)

गुरुशुश्रूषणं धर्म एको हि ब्रह्मचारिणाम् ।। अनिष्पाद्य तु तद्वाक्यं कथं मे निष्कृतिर्भवेत्

guruśuśrūṣaṇaṁ dharma eko hi brahmacāriṇām || aniṣpādya tu tadvākyaṁ kathaṁ me niṣkṛtirbhavet

"गुरु-सेवा ही ब्रह्मचारियों का एकमात्र धर्म है; उनका वचन पूरा किए बिना मेरा उद्धार कैसे होगा?"

श्लोक 22 (skanda.4.86.22)

गुरूणां वाक्यकरणात्सर्व एव मनोरथाः ।। सिद्ध्यंतीतरथा नैव तस्मात्कार्यं हि तद्वचः

gurūṇāṁ vākyakaraṇātsarva eva manorathāḥ || siddhyaṁtītarathā naiva tasmātkāryaṁ hi tadvacaḥ

"गुरुओं के वचन का पालन करने से ही सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, अन्यथा नहीं; इसलिए उनका वचन अवश्य करना चाहिए।"

श्लोक 23 (skanda.4.86.23)

कथं तद्वचसः सिद्धिं प्राप्स्याम्यत्र वने स्थितः ।। कश्च मेत्र सहायी स्याद्धिषणादुर्बलस्य वै

kathaṁ tadvacasaḥ siddhiṁ prāpsyāmyatra vane sthitaḥ || kaśca metra sahāyī syāddhiṣaṇādurbalasya vai

"इस वन में रहकर मैं उस वचन की सिद्धि कैसे पाऊँगा? और मुझ बुद्धि से दुर्बल का यहाँ सहायक कौन होगा?"

श्लोक 24 (skanda.4.86.24)

आस्तां गुरुकथा दूरं योऽन्यस्यापि लघोरपि ।। ओमित्युक्त्वा न कुरुते कार्यं सोथ व्रजत्यधः

āstāṁ gurukathā dūraṁ yo'nyasyāpi laghorapi || omityuktvā na kurute kāryaṁ sotha vrajatyadhaḥ

"गुरु की बात तो दूर, जो किसी छोटे व्यक्ति को भी 'हाँ' कहकर उसका काम नहीं करता, वह अधोगति को जाता है।"

श्लोक 25 (skanda.4.86.25)

कथमेतानि कर्माणि करिष्येऽज्ञोऽसहायवान् ।। अंगीकृतानि तद्भीत्या नमस्ते भवितव्यते

kathametāni karmāṇi kariṣye'jño'sahāyavān || aṁgīkṛtāni tadbhītyā namaste bhavitavyate

"अज्ञानी, असहाय मैं इन कार्यों को कैसे करूँगा, जिन्हें उस भय से स्वीकार कर लिया? हे होनहार, तुझे नमस्कार है!"

श्लोक 26 (skanda.4.86.26)

यावदित्थं चिंतयति स त्वाष्ट्रो वनमध्यगः ।। तावत्तदेव संप्राप्तस्तेनैकोऽदर्शि तापसः

yāvaditthaṁ ciṁtayati sa tvāṣṭro vanamadhyagaḥ || tāvattadeva saṁprāptastenaiko'darśi tāpasaḥ

जब तक त्वष्ट्र-पुत्र वन के मध्य में इस प्रकार चिन्तन कर रहा था, तभी उसे एक तपस्वी दिखाई दिया, जो वहाँ आ पहुँचा था।

श्लोक 27 (skanda.4.86.27)

अथ नत्वा स तं प्राह वने दृष्टं तपस्विनम् ।। को भवान्मानसं मे यो नितरां सुखयत्यहो

atha natvā sa taṁ prāha vane dṛṣṭaṁ tapasvinam || ko bhavānmānasaṁ me yo nitarāṁ sukhayatyaho

फिर प्रणाम करके उसने उस वन में दिखे तपस्वी से कहा — "आप कौन हैं, जिन्होंने मेरे मन को इतना सुखी कर दिया?"

श्लोक 28 (skanda.4.86.28)

त्वद्दर्शनेन मे गात्रं चिंतासंतापतापितम् ।। हिमानी गाहनेनेव शीतलं भवति क्षणम्

tvaddarśanena me gātraṁ ciṁtāsaṁtāpatāpitam || himānī gāhaneneva śītalaṁ bhavati kṣaṇam

"आपके दर्शन से चिन्ता-सन्ताप से जला मेरा शरीर, मानो हिमानी में डुबोने से, क्षणभर में शीतल हो गया है।"

श्लोक 29 (skanda.4.86.29)

किं त्वं मे प्राक्तनं कर्म प्राप्तं तापसरूपधृक् ।। अथवा करुणावार्धिराविर्भूतः शिवो भवान्

kiṁ tvaṁ me prāktanaṁ karma prāptaṁ tāpasarūpadhṛk || athavā karuṇāvārdhirāvirbhūtaḥ śivo bhavān

"क्या आप मेरा पूर्व-जन्म का सुकृत हैं, जो तपस्वी-रूप धारण करके आए हैं? या क्या आप स्वयं करुणा-सागर शिव प्रकट हुए हैं?"

श्लोक 30 (skanda.4.86.30)

योसि सोसि नमस्तुभ्यमुपदेशेन युंक्ष्व माम् ।। गुरूक्तं गुरुपत्न्युक्तं गुर्वपत्योक्तमेव च

yosi sosi namastubhyamupadeśena yuṁkṣva mām || gurūktaṁ gurupatnyuktaṁ gurvapatyoktameva ca

"जो भी आप हों, आपको नमस्कार है — मुझे उपदेश से जोड़िए। जो गुरु ने कहा, जो गुरु-पत्नी ने कहा, और जो गुरु-सन्तान ने कहा —"

श्लोक 31 (skanda.4.86.31)

कथं कर्तुमहं शक्तः कर्म तत्र दिशाद्भुतम् ।। कुरु मे बुद्धिसाहाय्यं निर्जने बंधुतां गतः ।।

kathaṁ kartumahaṁ śaktaḥ karma tatra diśādbhutam || kuru me buddhisāhāyyaṁ nirjane baṁdhutāṁ gataḥ ||

"— वह अद्भुत कार्य मैं कैसे कर पाऊँगा? मुझे बुद्धि की सहायता दीजिए, इस निर्जन में मेरे बन्धु बनकर।"

श्लोक 32 (skanda.4.86.32)

इत्युक्तस्तेन स वने तापसो ब्रह्मचारिणा ।। कारुण्यपूर्णहृदयो यथोक्तमुपदिष्टवान्

ityuktastena sa vane tāpaso brahmacāriṇā || kāruṇyapūrṇahṛdayo yathoktamupadiṣṭavān

इस प्रकार उस ब्रह्मचारी द्वारा कहे जाने पर, वन में वह तपस्वी, करुणा से भरे हृदय वाला, जैसा पूछा गया था वैसा ही उपदेश देने लगा।

श्लोक 33 (skanda.4.86.33)

य आप्तत्वेन संपृष्टो दुर्बुद्धिं संप्रयच्छति ।। स याति नरकं घोरं यावदाभूतसंप्लवम्

ya āptatvena saṁpṛṣṭo durbuddhiṁ saṁprayacchati || sa yāti narakaṁ ghoraṁ yāvadābhūtasaṁplavam

[तपस्वी ने सोचा] — जो विश्वासपात्र होकर पूछे जाने पर दुर्बुद्धि दे देता है, वह प्रलय तक भयंकर नरक में जाता है।

श्लोक 34 (skanda.4.86.34)

तापस उवाच ।। ।। ब्रह्मचारिञ्शृणु ब्रूयां किमद्भुततरं त्विदम्।। विश्वेशानुग्रहाद्ब्रह्माप्यभवत्सृष्टिकोविदः

tāpasa uvāca || || brahmacāriñśṛṇu brūyāṁ kimadbhutataraṁ tvidam|| viśveśānugrahādbrahmāpyabhavatsṛṣṭikovidaḥ

तपस्वी ने कहा — "हे ब्रह्मचारी, सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ — इससे भी अधिक अद्भुत क्या हो सकता है — विश्वेश की कृपा से ब्रह्मा भी सृष्टि में कुशल बने।"

श्लोक 35 (skanda.4.86.35)

यदि त्वं त्वाष्ट्र सर्वज्ञं काश्यामाराधयिष्यसि ।। ततस्ते विश्वकर्मेति नाम सत्यं भविष्यति

yadi tvaṁ tvāṣṭra sarvajñaṁ kāśyāmārādhayiṣyasi || tataste viśvakarmeti nāma satyaṁ bhaviṣyati

"यदि तुम, हे त्वष्ट्र-पुत्र, काशी में सर्वज्ञ की आराधना करोगे, तो तुम्हारा 'विश्वकर्मा' नाम सत्य हो जाएगा।"

श्लोक 36 (skanda.4.86.36)

विश्वेशानुग्रहात्काश्यामभिलाषा न दुर्लभाः ।। सुलभो दुर्लभो वै यद्यत्र मोक्षस्तनुत्यजाम्

viśveśānugrahātkāśyāmabhilāṣā na durlabhāḥ || sulabho durlabho vai yadyatra mokṣastanutyajām

"विश्वेश की कृपा से काशी में इच्छाएँ दुर्लभ नहीं रहतीं; वहाँ शरीर त्यागने वालों को दुर्लभ मोक्ष भी सुलभ हो जाता है।"

श्लोक 37 (skanda.4.86.37)

सृष्टेःकरण सामर्थ्यं सृष्टिरक्षाप्रवीणता ।। विधिना विष्णुना प्रापि विश्वेशानुग्रहात्परात्

sṛṣṭeḥkaraṇa sāmarthyaṁ sṛṣṭirakṣāpravīṇatā || vidhinā viṣṇunā prāpi viśveśānugrahātparāt

"सृष्टि करने की शक्ति और सृष्टि की रक्षा में निपुणता, ब्रह्मा और विष्णु ने भी विश्वेश की परम कृपा से ही पाई।"

श्लोक 38 (skanda.4.86.38)

याहि वैश्वेश्वरं सद्म पद्मया समधिष्ठितम् ।। निर्वाणसंज्ञया बाला यदीच्छेः स्वान्मनोरथान्

yāhi vaiśveśvaraṁ sadma padmayā samadhiṣṭhitam || nirvāṇasaṁjñayā bālā yadīccheḥ svānmanorathān

"पद्मा (लक्ष्मी) सहित 'निर्वाण' नाम से विराजते विश्वेश्वर के धाम को जाओ, हे बालक, यदि अपने मनोरथ चाहते हो।"

श्लोक 39 (skanda.4.86.39)

स हि सर्वप्रदः शंभुर्याचितश्चोपमन्युना ।। पयोमात्रं ददौ तस्मै सर्वं क्षीराब्धिमेव च

sa hi sarvapradaḥ śaṁbhuryācitaścopamanyunā || payomātraṁ dadau tasmai sarvaṁ kṣīrābdhimeva ca

"वह सर्वप्रद शम्भु, उपमन्यु द्वारा केवल दूध माँगे जाने पर, उन्हें सम्पूर्ण क्षीरसागर ही दे बैठे।"

श्लोक 40 (skanda.4.86.40)

आनंदकानने शंभोः किं किं केन न लभ्यते ।। यत्र वासकृतां पुंसां धर्मराशिः पदेपदे

ānaṁdakānane śaṁbhoḥ kiṁ kiṁ kena na labhyate || yatra vāsakṛtāṁ puṁsāṁ dharmarāśiḥ padepade

"शम्भु के आनन्दकानन में क्या-क्या किसको नहीं मिलता? वहाँ निवास करने वाले मनुष्यों के लिए पग-पग पर धर्म की राशि है।"

श्लोक 41 (skanda.4.86.41)

स्वर्धुनी स्पर्शमात्रेण महापातकसंततिः ।। यत्र संक्षयति क्षिप्रं तां काशीं को न संश्रयेत्

svardhunī sparśamātreṇa mahāpātakasaṁtatiḥ || yatra saṁkṣayati kṣipraṁ tāṁ kāśīṁ ko na saṁśrayet

"स्वर्ग-गंगा के स्पर्श मात्र से जहाँ महापापों की परम्परा शीघ्र नष्ट हो जाती है, उस काशी की शरण कौन न ले?"

श्लोक 42 (skanda.4.86.42)

न तादृग्धर्मसंभारो लभ्यते क्रतुकोटिभिः ।। यादृग्वाराणसी वीथी संचारेण पदेपदे

na tādṛgdharmasaṁbhāro labhyate kratukoṭibhiḥ || yādṛgvārāṇasī vīthī saṁcāreṇa padepade

"वाराणसी की गली में पग-पग पर चलने मात्र से जो धर्म-सम्पदा मिलती है, वैसी करोड़ों यज्ञों से भी नहीं मिलती।"

श्लोक 43 (skanda.4.86.43)

धर्मार्थकाममोक्षाणां यद्यत्रास्ति मनोरथः ।। तदा वाराणसीं याहि याहि त्रैलोक्यपावनीम्

dharmārthakāmamokṣāṇāṁ yadyatrāsti manorathaḥ || tadā vārāṇasīṁ yāhi yāhi trailokyapāvanīm

"यदि धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की कोई इच्छा हो, तो त्रिलोक-पावनी वाराणसी को जाओ, वहीं जाओ।"

श्लोक 44 (skanda.4.86.44)

सर्वकामफलप्राप्तिस्तदैव स्याद्ध्रुवं नृणाम् ।। यदैव सर्वदः सर्वः काश्यां विश्वेश्वरः श्रितः

sarvakāmaphalaprāptistadaiva syāddhruvaṁ nṛṇām || yadaiva sarvadaḥ sarvaḥ kāśyāṁ viśveśvaraḥ śritaḥ

"जिस क्षण मनुष्य काशी में सर्वदाता विश्वेश्वर की शरण लेता है, उसी क्षण उसे सब कामनाओं के फल की प्राप्ति निश्चित हो जाती है।"

श्लोक 45 (skanda.4.86.45)

स तापसोक्तमाकर्ण्य त्वाष्ट्र इत्थं सुहृष्टवान् ।। काशीसंप्रात्युपायं च तमेव समपृच्छत

sa tāpasoktamākarṇya tvāṣṭra itthaṁ suhṛṣṭavān || kāśīsaṁprātyupāyaṁ ca tameva samapṛcchata

तपस्वी के इस वचन को सुनकर त्वष्ट्र-पुत्र अत्यन्त प्रसन्न हुआ, और उसी से काशी पहुँचने का उपाय पूछा।

श्लोक 46 (skanda.4.86.46)

।। त्वाष्ट्र उवाच ।। ।। तदानंदवनं शंभोः क्वास्ति तापससत्तम ।। यत्र नो दुर्लभं किंचित्साधकानां त्रयीस्थितम्

|| tvāṣṭra uvāca || || tadānaṁdavanaṁ śaṁbhoḥ kvāsti tāpasasattama || yatra no durlabhaṁ kiṁcitsādhakānāṁ trayīsthitam

त्वष्ट्र-पुत्र ने कहा — "हे तपस्वि-श्रेष्ठ, वह शम्भु का आनन्दकानन कहाँ है, जहाँ वेद-त्रयी में स्थित साधकों को कुछ भी दुर्लभ नहीं है?"

श्लोक 47 (skanda.4.86.47)

स्वर्गे वा मर्त्यलोके वा बलिसद्मनि वा मुने ।। क्व तदानंदगहनं यत्रानंदपयोब्धिजा

svarge vā martyaloke vā balisadmani vā mune || kva tadānaṁdagahanaṁ yatrānaṁdapayobdhijā

"क्या वह स्वर्ग में है, या मृत्युलोक में, या बलि के भवन में, हे मुने? वह आनन्द-सघन स्थान कहाँ है, जहाँ आनन्द-सागर से जन्मी (लक्ष्मी) —"

श्लोक 48 (skanda.4.86.48)

यत्र विश्वेश्वरो देवो विश्वेषां कर्णधारकः ।। व्याचष्टे तारकं ज्ञानं येन तन्मयतां ययुः

yatra viśveśvaro devo viśveṣāṁ karṇadhārakaḥ || vyācaṣṭe tārakaṁ jñānaṁ yena tanmayatāṁ yayuḥ

"— जहाँ विश्वेश्वर देव, सबके कर्णधार, तारक ज्ञान का व्याख्यान करते हैं, जिससे प्राणी उनसे तन्मय हो जाते हैं?"

श्लोक 49 (skanda.4.86.49)

सुलभा यत्र नियतमानंदवनचारिणः ।। अपि नैःश्रेयसी लक्ष्मीः किमन्येल्प मनोरथाः

sulabhā yatra niyatamānaṁdavanacāriṇaḥ || api naiḥśreyasī lakṣmīḥ kimanyelpa manorathāḥ

"जहाँ आनन्दवन में विचरने वालों को निश्चय ही मुक्ति की लक्ष्मी तक सुलभ है, फिर अन्य छोटी कामनाओं की क्या बात?"

श्लोक 50 (skanda.4.86.50)

कस्तां मां प्रापयेच्छंभोः कथं यामि तथा वद ।। स तपस्वीति तद्वाक्यमाकर्ण्य श्रद्धयान्वितम्

kastāṁ māṁ prāpayecchaṁbhoḥ kathaṁ yāmi tathā vada || sa tapasvīti tadvākyamākarṇya śraddhayānvitam

"मुझे वहाँ कौन पहुँचाएगा, हे शम्भु, मैं कैसे जाऊँ, यह बताइए।" उसके यह वचन श्रद्धापूर्वक सुनकर वह तपस्वी —

श्लोक 51 (skanda.4.86.51)

प्राहागच्छ नयामि त्वां यियासुरहमप्यहो।। दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं यदि काशी न सेविता

prāhāgaccha nayāmi tvāṁ yiyāsurahamapyaho|| durlabhaṁ prāpya mānuṣyaṁ yadi kāśī na sevitā

— बोला — "आओ, मैं तुम्हें ले चलता हूँ, मैं भी जाना चाहता हूँ। अहो, यदि दुर्लभ मनुष्य-देह पाकर भी काशी की सेवा न की जाए,"

श्लोक 52 (skanda.4.86.52)

पुनःक्व नृत्वं श्रेयोभूः क्व काशीकर्मबंधहृत् ।। वृथागते हि मानुष्ये काशीप्राप्तिविवर्जनात्

punaḥkva nṛtvaṁ śreyobhūḥ kva kāśīkarmabaṁdhahṛt || vṛthāgate hi mānuṣye kāśīprāptivivarjanāt

"तो फिर कल्याणकारी मनुष्यत्व कहाँ, और कर्म-बन्धन हरने वाली काशी कहाँ? मनुष्य-जन्म व्यर्थ जाने का कारण काशी-प्राप्ति का न होना ही है।"

श्लोक 53 (skanda.4.86.53)

आयुष्यं च भविष्यं च सर्वमेव वृथागतम्।। अतोहं सफलीकर्तुं मानुष्यं चातिचंचलम्

āyuṣyaṁ ca bhaviṣyaṁ ca sarvameva vṛthāgatam|| atohaṁ saphalīkartuṁ mānuṣyaṁ cāticaṁcalam

"आयु और भविष्य सब कुछ व्यर्थ बीत जाता है। इसलिए मैं इस अत्यन्त चंचल मनुष्य-जन्म को सफल करने के लिए —"

श्लोक 54 (skanda.4.86.54)

यास्यामि काशीमायाहि मायां हित्वा त्वमप्यहो ।। इति तेन सह त्वाष्ट्रो मुनिनातिकृपालुना

yāsyāmi kāśīmāyāhi māyāṁ hitvā tvamapyaho || iti tena saha tvāṣṭro muninātikṛpālunā

"काशी जाऊँगा; तुम भी माया त्यागकर आओ।" इस प्रकार उस अत्यन्त कृपालु मुनि के साथ त्वष्ट्र-पुत्र —

श्लोक 55 (skanda.4.86.55)

पुरीं वैश्वेश्वरीं प्राप्तो मनःस्वास्थ्यमवाप च ।। ततः प्रापय्य तां काशीं तापसः क्वाप्यतर्कितम्

purīṁ vaiśveśvarīṁ prāpto manaḥsvāsthyamavāpa ca || tataḥ prāpayya tāṁ kāśīṁ tāpasaḥ kvāpyatarkitam

— विश्वेश्वरी नगरी पहुँचा, और वहाँ मन की स्वस्थता पाई। फिर उसे काशी पहुँचाकर वह तपस्वी अकस्मात् कहीं —

श्लोक 56 (skanda.4.86.56)

जगाम कुंभसंभूत स त्वाष्ट्रोपीत्यमन्यत ।। अवश्यं स हि विश्वेशः सर्वेषां चिंतितप्रदः

jagāma kuṁbhasaṁbhūta sa tvāṣṭropītyamanyata || avaśyaṁ sa hi viśveśaḥ sarveṣāṁ ciṁtitapradaḥ

— चला गया। हे कुम्भ-संभूत, वह त्वष्ट्र-पुत्र भी यह सोचने लगा — "निश्चय ही वह विश्वेश सबकी इच्छा पूर्ण करने वाले हैं —"

श्लोक 57 (skanda.4.86.57)

सत्पथस्थिरवृतीनां दूरस्थोपि समीपगः ।। यस्मिन्प्रसन्नदृक्त्र्यक्षस्तं दविष्ठमपि ध्रुवम्

satpathasthiravṛtīnāṁ dūrasthopi samīpagaḥ || yasminprasannadṛktryakṣastaṁ daviṣṭhamapi dhruvam

"— सत्पथ में स्थिर रहने वालों के लिए वे दूर से भी निकट हैं; जिस पर त्रिलोचन की प्रसन्न दृष्टि पड़ती है, उसे वे दूर होते हुए भी निश्चय ही —"

श्लोक 58 (skanda.4.86.58)

सुनेदिष्ठं करोत्येव स्वयंवर्त्मोपदेशयन् ।। क्वाहं तत्र वने बालश्चिंताकुलितमानसः ।। क्व तापसः स यो मां वै सूदिश्येह चानयत्

sunediṣṭhaṁ karotyeva svayaṁvartmopadeśayan || kvāhaṁ tatra vane bālaściṁtākulitamānasaḥ || kva tāpasaḥ sa yo māṁ vai sūdiśyeha cānayat

"— स्वयं मार्ग दिखाकर अत्यन्त निकट कर देते हैं। कहाँ था मैं, उस वन में चिन्ता से व्याकुल बालक, और कहाँ वह तपस्वी, जिसने ठीक इशारा करके मुझे यहाँ पहुँचाया?"

श्लोक 59 (skanda.4.86.59)

खेलोयमस्य त्र्यक्षस्य यस्य भक्तस्य कुत्रचित् ।। न दुर्लभतरं किंचिदहो क्वाहं क्व काशिका

kheloyamasya tryakṣasya yasya bhaktasya kutracit || na durlabhataraṁ kiṁcidaho kvāhaṁ kva kāśikā

"यह उस त्रिलोचन की ही लीला है; उनके भक्त को कहीं भी कुछ भी दुर्लभ नहीं है। अहो, कहाँ मैं और कहाँ काशिका!"

श्लोक 60 (skanda.4.86.60)

नाराधितो मया शंभुः प्राक्तने जन्मनि क्वचित् ।। शरीरित्वानुमानेन ज्ञातमेतदसंशयम्

nārādhito mayā śaṁbhuḥ prāktane janmani kvacit || śarīritvānumānena jñātametadasaṁśayam

"मैंने पूर्वजन्म में कभी शम्भु की आराधना नहीं की थी — यह मैं अपने शरीरधारी होने के अनुमान से बिना संशय जानता हूँ।"

श्लोक 61 (skanda.4.86.61)

अस्मिञ्जन्मनि बालत्वान्न चैवाराधितः स्फुटम् ।। प्रत्यक्षमेव मे वैतत्कुतोनुग्रहधीर्मयि

asmiñjanmani bālatvānna caivārādhitaḥ sphuṭam || pratyakṣameva me vaitatkutonugrahadhīrmayi

"इस जन्म में भी बाल्यावस्था के कारण मैंने स्पष्टतः उनकी आराधना नहीं की। यह मुझे साक्षात् प्रत्यक्ष है — तो फिर मुझ पर उनकी अनुग्रह-बुद्धि कहाँ से?"

श्लोक 62 (skanda.4.86.62)

आज्ञातं गुरुभक्तिर्मे हेतुः शंभुप्रसादने ।। ययेहानुगृहीतोस्मि विश्वेशेन कृपालुना

ājñātaṁ gurubhaktirme hetuḥ śaṁbhuprasādane || yayehānugṛhītosmi viśveśena kṛpālunā

"अब समझा — मेरी गुरु-भक्ति ही शम्भु की प्रसन्नता का कारण है, जिससे मुझ पर कृपालु विश्वेश ने अनुग्रह किया है।"

श्लोक 63 (skanda.4.86.63)

अथवा कारणापेक्षस्त्र्यक्षस्त्वितरदेववत् ।। रंकमप्यनुगृह्णाति केवलं कारणं कृपा

athavā kāraṇāpekṣastryakṣastvitaradevavat || raṁkamapyanugṛhṇāti kevalaṁ kāraṇaṁ kṛpā

"या फिर, क्या त्रिलोचन को अन्य देवताओं की भाँति कारण की अपेक्षा होती है? वे तो दीन को भी अनुग्रहीत करते हैं — कृपा ही अकेली उनका कारण है।"

श्लोक 64 (skanda.4.86.64)

यदि नो मय्यनुक्रोशः कथं तापससंगतिः ।। तद्रूपेण स्वयं शंभुरानिनायेह मां ध्रुवम्

yadi no mayyanukrośaḥ kathaṁ tāpasasaṁgatiḥ || tadrūpeṇa svayaṁ śaṁbhurānināyeha māṁ dhruvam

"यदि मुझ पर उनकी दया न होती, तो उस तपस्वी से भेंट कैसे होती? निश्चय ही स्वयं शम्भु ने उसी रूप में मुझे यहाँ ला दिया।"

श्लोक 65 (skanda.4.86.65)

न दानानि न वै यज्ञा न तपांसि व्रतानि च ।।। शंभोः प्रसादहेतूनि कारणं तत्कृपैव हि ।।

na dānāni na vai yajñā na tapāṁsi vratāni ca ||| śaṁbhoḥ prasādahetūni kāraṇaṁ tatkṛpaiva hi ||

"न दान, न यज्ञ, न तपस्या, न व्रत — शम्भु की प्रसन्नता का कारण उनकी कृपा ही है।"

श्लोक 66 (skanda.4.86.66)

दयामपि तदा कुर्यादसौ विश्वेश्वरः पराम् ।। यदाश्रुत्युक्तमध्वानं सद्भिः क्षुण्णं न संत्यजेत्

dayāmapi tadā kuryādasau viśveśvaraḥ parām || yadāśrutyuktamadhvānaṁ sadbhiḥ kṣuṇṇaṁ na saṁtyajet

"फिर भी वह विश्वेश्वर उसी पर परम दया करते हैं, जो श्रुति-कथित, सज्जनों द्वारा चला हुआ मार्ग नहीं छोड़ता।"

श्लोक 67 (skanda.4.86.67)

अनुक्रोशं समर्थ्येति स त्वाष्ट्रः र्शाभवं शुचिः।। संस्थाप्य लिंगमीशस्याराधयत्स्वस्थमानसः

anukrośaṁ samarthyeti sa tvāṣṭraḥ rśābhavaṁ śuciḥ|| saṁsthāpya liṁgamīśasyārādhayatsvasthamānasaḥ

इस प्रकार उस कृपा को समझते हुए, पवित्र त्वष्ट्र-पुत्र ने शिव का लिंग स्थापित करके स्वस्थ मन से उसकी आराधना की।

श्लोक 68 (skanda.4.86.68)

आनीय पुष्पसंभारमार्तवं काननाद्बहु ।। स्नात्वाभ्यर्चयतीशानं कंदमूलफलाशनः

ānīya puṣpasaṁbhāramārtavaṁ kānanādbahu || snātvābhyarcayatīśānaṁ kaṁdamūlaphalāśanaḥ

वन से बहुत-से ऋतु-पुष्प लाकर, स्नान करके, कन्द-मूल-फल खाते हुए वह ईशान की पूजा करने लगा।

श्लोक 69 (skanda.4.86.69)

इत्थं त्वष्टृतनूजस्य लिंगाराधनचेतसः ।। त्रिहायनात्प्रसन्नोभूत्तस्येशः करुणानिधिः

itthaṁ tvaṣṭṛtanūjasya liṁgārādhanacetasaḥ || trihāyanātprasannobhūttasyeśaḥ karuṇānidhiḥ

इस प्रकार त्वष्ट्र-पुत्र के लिंगाराधना में तीन वर्ष लग जाने पर करुणानिधि ईश उससे प्रसन्न हो गए।

श्लोक 70 (skanda.4.86.70)

तस्मादेव हि लिंगाच्च प्रादुर्भूय भवोऽब्रवीत् ।। वरं वरय रे त्वाष्ट्र दृढभक्त्यानया तव ।।

tasmādeva hi liṁgācca prādurbhūya bhavo'bravīt || varaṁ varaya re tvāṣṭra dṛḍhabhaktyānayā tava ||

उसी लिंग से प्रकट होकर भव ने कहा — "वर माँगो, हे त्वष्ट्र-पुत्र, तुम्हारी इस दृढ़ भक्ति से —"

श्लोक 71 (skanda.4.86.71)

प्रसन्नोस्मि भृशं बाल गुर्वर्थकृतचेतसः ।। गुरुणा गुरुपत्न्या च गुर्वपत्यद्वयेन च

prasannosmi bhṛśaṁ bāla gurvarthakṛtacetasaḥ || guruṇā gurupatnyā ca gurvapatyadvayena ca

"मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, हे बालक, तुम पर, जिसका चित्त गुरु, गुरु-पत्नी और गुरु के दोनों सन्तानों के कार्य में लगा था —"

श्लोक 72 (skanda.4.86.72)

यथार्थितं तथा कर्तुं ते सामर्थ्यं भविष्यति

yathārthitaṁ tathā kartuṁ te sāmarthyaṁ bhaviṣyati

"— जैसा माँगा गया था वैसा करने का सामर्थ्य तुम्हें प्राप्त होगा।"

श्लोक 73 (skanda.4.86.73)

अन्यान्वरांश्च ते दद्यां त्वाष्ट्र तुष्टस्त्वदर्चया ।। ताञ्शृणुष्व महाभाग लिंगस्यास्याद्भुतश्रियः

anyānvarāṁśca te dadyāṁ tvāṣṭra tuṣṭastvadarcayā || tāñśṛṇuṣva mahābhāga liṁgasyāsyādbhutaśriyaḥ

"तुम्हारी पूजा से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें और भी वर दूँगा, हे त्वष्ट्र-पुत्र; इस लिंग की अद्भुत महिमा को सुनो, हे भाग्यशाली।"

श्लोक 74 (skanda.4.86.74)

त्वं सुवर्णादिधातूनां दारूणां दृषदामपि ।। मणीनामपिरत्नानां पुष्पाणामपि वाससाम्

tvaṁ suvarṇādidhātūnāṁ dārūṇāṁ dṛṣadāmapi || maṇīnāmapiratnānāṁ puṣpāṇāmapi vāsasām

"तुम स्वर्ण आदि धातुओं, लकड़ियों और पत्थरों के, मणियों और रत्नों के, फूलों और वस्त्रों के —"

श्लोक 75 (skanda.4.86.75)

कर्पूरादिसुगंधीनां द्रव्याणामप्यपामपि ।। कंदमूलफलानां च द्रव्याणामपि च त्वचाम्।।

karpūrādisugaṁdhīnāṁ dravyāṇāmapyapāmapi || kaṁdamūlaphalānāṁ ca dravyāṇāmapi ca tvacām||

"— कपूर आदि सुगन्धित वस्तुओं के, जल के भी, कन्द-मूल-फलों के, और छालों के भी —"

श्लोक 76 (skanda.4.86.76)

सर्वेषां वस्तुजातानां कर्तुं कर्म प्रवेत्स्यसि ।। यस्य यस्य रुचिर्यत्र सद्म देवालयादिषु

sarveṣāṁ vastujātānāṁ kartuṁ karma pravetsyasi || yasya yasya ruciryatra sadma devālayādiṣu

"— सभी प्रकार की वस्तुओं का कार्य करना जानोगे। जिसकी जो रुचि हो, जहाँ भी, देवालय आदि में,"

श्लोक 77 (skanda.4.86.77)

तस्य तस्येह तुष्ट्यै त्वं तथा कर्तुं प्रवेत्स्यसि ।। सर्वनेपथ्यरचनाः सर्वाः सूपस्य संस्कृतीः

tasya tasyeha tuṣṭyai tvaṁ tathā kartuṁ pravetsyasi || sarvanepathyaracanāḥ sarvāḥ sūpasya saṁskṛtīḥ

"उस-उसकी प्रसन्नता के लिए तुम वैसा करना जानोगे। सब प्रकार के वेशभूषा-रचना, रसोई की सब विधियाँ,"

श्लोक 78 (skanda.4.86.78)

सर्वाणि शिल्पकार्याणि तौर्यत्रिकमथापि च ।। सर्वं ज्ञास्यसि कर्तुं त्वं द्वितीय इव पद्मभूः

sarvāṇi śilpakāryāṇi tauryatrikamathāpi ca || sarvaṁ jñāsyasi kartuṁ tvaṁ dvitīya iva padmabhūḥ

"सब शिल्प-कार्य, और नृत्य-गीत-वाद्य की त्रिविध कला भी — यह सब करना तुम जानोगे, मानो द्वितीय ब्रह्मा हो।"

श्लोक 79 (skanda.4.86.79)

नानाविधानि यंत्राणि नानायुधविधानकम् ।। जलाशयानां रचनाः सुदुर्गरचनास्तथा

nānāvidhāni yaṁtrāṇi nānāyudhavidhānakam || jalāśayānāṁ racanāḥ sudurgaracanāstathā

"नाना प्रकार के यन्त्र, नाना प्रकार के अस्त्र-निर्माण, जलाशयों की रचना, और दुर्गम दुर्गों की रचना भी —"

श्लोक 80 (skanda.4.86.80)

तादृक्कर्तुं पुरा वेत्सि यादृङ्नान्योऽधियास्यति ।। कलाजातं हि सर्वं त्वमवयास्यसि मे वरात्

tādṛkkartuṁ purā vetsi yādṛṅnānyo'dhiyāsyati || kalājātaṁ hi sarvaṁ tvamavayāsyasi me varāt

"— वैसा करना पहले जानोगे जैसा और कोई नहीं जान पाएगा। हर प्रकार की कला, मेरे वर से, तुम जान लोगे।"

श्लोक 81 (skanda.4.86.81)

सर्वेंद्रजालिकी विद्या त्वदधीना भविष्यति ।। सर्वकर्मसु कौशल्यं सर्वबुद्धिवरिष्ठताम्

sarveṁdrajālikī vidyā tvadadhīnā bhaviṣyati || sarvakarmasu kauśalyaṁ sarvabuddhivariṣṭhatām

"सम्पूर्ण इन्द्रजाल-विद्या तुम्हारे अधीन होगी; सब कार्यों में कुशलता, और सब बुद्धियों में श्रेष्ठता,"

श्लोक 82 (skanda.4.86.82)

सर्वेषां च मनोवृत्तिं त्वं ज्ञास्यसि वरान्मम ।। किं बहूक्तेन यत्स्वर्गे यत्पाताले यदत्र च

sarveṣāṁ ca manovṛttiṁ tvaṁ jñāsyasi varānmama || kiṁ bahūktena yatsvarge yatpātāle yadatra ca

"और सबके मनोभावों को भी तुम मेरे वर से जान लोगे। क्या अधिक कहूँ — जो कुछ स्वर्ग में है, जो पाताल में है, जो यहाँ है —"

श्लोक 83 (skanda.4.86.83)

अतिलोकोत्तरं कर्म तत्सर्वं वेत्स्यसि स्वयम्

atilokottaraṁ karma tatsarvaṁ vetsyasi svayam

"— वह सारा लोकोत्तर कार्य तुम स्वयं जान जाओगे।"

श्लोक 84 (skanda.4.86.84)

विश्वेषां विश्वकर्माणि विश्वेषु भुवनेषु च ।। यतो ज्ञास्यसि तन्नाम विश्वकर्मेति तेऽनघ

viśveṣāṁ viśvakarmāṇi viśveṣu bhuvaneṣu ca || yato jñāsyasi tannāma viśvakarmeti te'nagha

"सब लोकों में सब प्राणियों के सारे कार्य जान लेने के कारण, हे निष्पाप, तुम्हारा नाम 'विश्वकर्मा' होगा।"

श्लोक 85 (skanda.4.86.85)

अपरः को वरो देयस्तव तं प्रार्थयाश्वहो ।। तवादेयं न मे किंचिल्लिंगार्चनरतस्य हि

aparaḥ ko varo deyastava taṁ prārthayāśvaho || tavādeyaṁ na me kiṁcilliṁgārcanaratasya hi

"और कौन-सा वर दिया जाए, वह शीघ्र माँगो। लिंग-पूजा में रत तुम्हें कुछ भी न देने योग्य मेरे पास नहीं है।"

श्लोक 86 (skanda.4.86.86)

अन्यत्रापि हि यो लिंगं समर्चयति सन्मतिः ।। तस्यापि वांछितं देयं किंपुनर्योविकाशिकम्

anyatrāpi hi yo liṁgaṁ samarcayati sanmatiḥ || tasyāpi vāṁchitaṁ deyaṁ kiṁpunaryovikāśikam

"अन्यत्र भी जो सन्मति व्यक्ति लिंग की पूजा करता है, उसे भी वांछित फल मिलता है — फिर काशी में करने वाले की तो बात ही क्या!"

श्लोक 87 (skanda.4.86.87)

येन काश्यां समभ्यर्चि येन काश्यां प्रतिष्ठितम् ।। येन काश्यां स्तुतं लिंगं स मे रूपाय दर्पणः

yena kāśyāṁ samabhyarci yena kāśyāṁ pratiṣṭhitam || yena kāśyāṁ stutaṁ liṁgaṁ sa me rūpāya darpaṇaḥ

"जिसने काशी में पूजा की, जिसने काशी में लिंग स्थापित किया, जिसने काशी में लिंग की स्तुति की, वह मानो मेरे रूप का दर्पण बन गया।"

श्लोक 88 (skanda.4.86.88)

तत्त्वं स्वच्छोसि मुकुरो मम नेत्रत्रयस्य हि ।। काश्यां लिंगार्चनात्त्वाष्ट्र वरं वरय सुव्रत

tattvaṁ svacchosi mukuro mama netratrayasya hi || kāśyāṁ liṁgārcanāttvāṣṭra varaṁ varaya suvrata

"तो तुम भी काशी में लिंग-पूजा से मेरे तीनों नेत्रों के लिए स्वच्छ दर्पण हो, हे त्वष्ट्र-पुत्र। वर माँगो, हे सुव्रत।"

श्लोक 89 (skanda.4.86.89)

काश्यां यो राजधान्यां मे हित्वा मामन्यमर्चयेत् ।। स वराकोल्पधीर्मुष्टोऽल्पतुष्टिर्मुक्तिवर्जितः

kāśyāṁ yo rājadhānyāṁ me hitvā māmanyamarcayet || sa varākolpadhīrmuṣṭo'lpatuṣṭirmuktivarjitaḥ

"मेरी राजधानी काशी में जो मुझे छोड़कर अन्य किसी की पूजा करता है, वह अल्पबुद्धि, ठगा हुआ, अल्प-सन्तुष्ट, मुक्ति से वंचित है।"

श्लोक 90 (skanda.4.86.90)

तदानंदवनेह्यत्र समर्च्योहं मुमुक्षुभिः ।। द्रुहिणोपेंद्रचंद्रेंद्रैरिहान्यो न समर्च्यते

tadānaṁdavanehyatra samarcyohaṁ mumukṣubhiḥ || druhiṇopeṁdracaṁdreṁdrairihānyo na samarcyate

"इस आनन्दवन में मुक्ति चाहने वालों को मेरी ही पूजा करनी चाहिए; यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, चन्द्र, इन्द्र में से कोई अन्य पूज्य नहीं है।"

श्लोक 91 (skanda.4.86.91)

यथानंदवनं प्राप्य त्वं मामर्चितवानसि ।। तथान्ये पुण्यकर्माणो मामभ्यर्च्यैव मामिताः

yathānaṁdavanaṁ prāpya tvaṁ māmarcitavānasi || tathānye puṇyakarmāṇo māmabhyarcyaiva māmitāḥ

"जैसे तुमने आनन्दवन पाकर मेरी पूजा की, वैसे ही अन्य पुण्यकर्मी भी मेरी ही पूजा करके मुझ तक पहुँचे हैं।"

श्लोक 92 (skanda.4.86.92)

अनुग्राह्योऽसि नितरां ततो वरय दुर्लभम् ।। श्राणितं तदवैहि त्वं वद मा चिरयस्व भोः

anugrāhyo'si nitarāṁ tato varaya durlabham || śrāṇitaṁ tadavaihi tvaṁ vada mā cirayasva bhoḥ

"तुम अत्यन्त अनुग्रह के पात्र हो, इसलिए दुर्लभ वर माँगो। जान लो, वह पहले ही दिया जा चुका है — कहो, देर मत करो।"

श्लोक 93 (skanda.4.86.93)

।। विश्वकर्मोवाच ।। ।। इदं यत्स्थापितं लिंगं मयाज्ञेनापि शंकर ।। तल्लिंगमन्येप्याराध्य संतु समृद्धिभाजनम्

|| viśvakarmovāca || || idaṁ yatsthāpitaṁ liṁgaṁ mayājñenāpi śaṁkara || talliṁgamanyepyārādhya saṁtu samṛddhibhājanam

विश्वकर्मा ने कहा — "हे शंकर, यह जो मैंने अज्ञानी होते हुए भी लिंग स्थापित किया है, उसकी अन्य लोग भी आराधना करके समृद्धि के भागी बनें।"

श्लोक 94 (skanda.4.86.94)

अन्यच्च नाथ प्रार्थ्योसि तच्च विश्राणयिष्यसि ।। मया विनिर्मापयिता स्वं प्रासादं कदा भवान्

anyacca nātha prārthyosi tacca viśrāṇayiṣyasi || mayā vinirmāpayitā svaṁ prāsādaṁ kadā bhavān

"और भी एक प्रार्थना है, हे नाथ, जो आप अवश्य पूरी करेंगे — कब आप अपना प्रासाद मुझसे बनवाएँगे?"

श्लोक 95 (skanda.4.86.95)

देवदेव उवाच ।। ।। एवमस्तु यदुक्तं ते तव लिंगसमर्चकाः ।। समृद्धिभाजनं वै स्युः स्युश्च निर्वाणदीक्षिताः

devadeva uvāca || || evamastu yaduktaṁ te tava liṁgasamarcakāḥ || samṛddhibhājanaṁ vai syuḥ syuśca nirvāṇadīkṣitāḥ

देवदेव ने कहा — "ऐसा ही हो, जो तुमने कहा; तुम्हारे लिंग की पूजा करने वाले समृद्धि के भागी होंगे, और निर्वाण में दीक्षित होंगे।"

श्लोक 96 (skanda.4.86.96)

यदा च राजा भविता दिवोदासो विधेर्वरात्।। तदा मे वचनात्तात प्रासादं मे विधास्यति

yadā ca rājā bhavitā divodāso vidhervarāt|| tadā me vacanāttāta prāsādaṁ me vidhāsyati

"और जब ब्रह्मा के वर से दिवोदास राजा बनेंगे, तब, हे पुत्र, मेरे वचन से वे मेरा प्रासाद बनवाएँगे।"

श्लोक 97 (skanda.4.86.97)

नवीकृत्य पुनः काशी निर्विष्टा तेन भूभुजा ।। गणेशमायया राज्यात्परिनिर्विण्णचेतसा

navīkṛtya punaḥ kāśī nirviṣṭā tena bhūbhujā || gaṇeśamāyayā rājyātparinirviṇṇacetasā

"वे राजा काशी का पुनर्निर्माण करके, गणेश की माया से राज्य से विरक्त-चित्त होकर,"

श्लोक 98 (skanda.4.86.98)

विष्णोः सदुपदेशाच्च मामेव शरणं गतः ।। निर्वाणलक्ष्मीः प्राप्तेह हित्वा राज्यश्रियं चलाम्

viṣṇoḥ sadupadeśācca māmeva śaraṇaṁ gataḥ || nirvāṇalakṣmīḥ prāpteha hitvā rājyaśriyaṁ calām

"विष्णु के सदुपदेश से मुझ ही की शरण लेंगे, और चंचल राज्य-लक्ष्मी को त्यागकर यहाँ निर्वाण-लक्ष्मी प्राप्त करेंगे।"

श्लोक 99 (skanda.4.86.99)

विश्वकर्मन्व्रज गुरोः शासनाय यतस्व च ।। गुरुभक्तिकृतो यस्मान्मद्भक्ता नात्र संशयः

viśvakarmanvraja guroḥ śāsanāya yatasva ca || gurubhaktikṛto yasmānmadbhaktā nātra saṁśayaḥ

"हे विश्वकर्मा, जाओ, गुरु की आज्ञा पूरी करने का प्रयत्न करो; क्योंकि गुरु-भक्ति करने वाले निःसंदेह मेरे ही भक्त हैं।"

श्लोक 100 (skanda.4.86.100)

ये गुरुं चावमन्यंते तेवमान्या मयाप्यहो ।। तस्माद्गुरूपदिष्टं हि कुरु शिष्यसमीहितम्

ye guruṁ cāvamanyaṁte tevamānyā mayāpyaho || tasmādgurūpadiṣṭaṁ hi kuru śiṣyasamīhitam

"जो गुरु का अनादर करते हैं, अहो, वे मेरे द्वारा भी अनादृत हैं। इसलिए गुरु द्वारा बताया गया शिष्य-कर्तव्य अवश्य करो।"

श्लोक 101 (skanda.4.86.101)

तत आगत्य मे पार्श्वं यावन्निर्वाणमेष्यसि ।। तावत्स्थास्यसि शुद्धात्मा देवानां हितमाचरन्

tata āgatya me pārśvaṁ yāvannirvāṇameṣyasi || tāvatsthāsyasi śuddhātmā devānāṁ hitamācaran

"फिर मेरे पास लौटकर, जब तक निर्वाण को प्राप्त नहीं होगे, तब तक शुद्ध आत्मा होकर देवताओं का हित करते रहोगे।"

श्लोक 102 (skanda.4.86.102)

तवात्र लिंगे सततं स्थास्याम्यहमभीष्टदः ।। अस्य लिंगस्य भक्तानां निर्वाणश्रीरदूरतः

tavātra liṁge satataṁ sthāsyāmyahamabhīṣṭadaḥ || asya liṁgasya bhaktānāṁ nirvāṇaśrīradūrataḥ

"तुम्हारे इस लिंग में मैं सदा अभीष्ट देने वाला होकर रहूँगा; इस लिंग के भक्तों के लिए निर्वाण-श्री दूर नहीं है।"

श्लोक 103 (skanda.4.86.103)

अंगारेशादुदीच्यां ये त्वल्लिंगस्यसमर्चकाः ।। तेषां मनोरथावाप्तिर्भविष्यति पदेपदे

aṁgāreśādudīcyāṁ ye tvalliṁgasyasamarcakāḥ || teṣāṁ manorathāvāptirbhaviṣyati padepade

"अंगारेश से उत्तर में तुम्हारे लिंग की जो पूजा करेंगे, उन्हें पग-पग पर मनोरथ-प्राप्ति होगी।"

श्लोक 104 (skanda.4.86.104)

इत्युक्त्वांतर्दधे देवस्त्वाष्ट्रोपि गुरुमाप्तवान् ।। गुरोः समीहितं भूरि विधाय स गृहान्ययौ

ityuktvāṁtardadhe devastvāṣṭropi gurumāptavān || guroḥ samīhitaṁ bhūri vidhāya sa gṛhānyayau

यह कहकर देव अन्तर्धान हो गए; त्वष्ट्र-पुत्र भी अपने गुरु के पास पहुँचा, और गुरु की बहुत-सी इच्छाएँ पूरी करके घर गया।

श्लोक 105 (skanda.4.86.105)

गृहेपि मातापितरौ संतोष्य निजकर्मणा ।। तदुक्ताज्ञां समाधाय पुनः काशीं समाययौ

gṛhepi mātāpitarau saṁtoṣya nijakarmaṇā || taduktājñāṁ samādhāya punaḥ kāśīṁ samāyayau

घर में माता-पिता को भी अपनी कला से सन्तुष्ट करके, उस आज्ञा (शिव की) का पालन करते हुए वह फिर काशी लौट आया।

श्लोक 106 (skanda.4.86.106)

स्वलिंगाराधनासक्तो नाद्यापि त्वष्टृनंदनः ।। काशीं त्यजति मेधावी सर्वदेव प्रियं चरन्

svaliṁgārādhanāsakto nādyāpi tvaṣṭṛnaṁdanaḥ || kāśīṁ tyajati medhāvī sarvadeva priyaṁ caran

अपने लिंग की आराधना में लगा वह बुद्धिमान त्वष्ट्र-पुत्र आज तक भी काशी नहीं छोड़ता, सदा देवताओं का प्रिय करते हुए।

श्लोक 107 (skanda.4.86.107)

।। ईश्वर उवाच ।। ।। पृष्टानि यानि र्लिगानि त्वया देवि गिरींद्रजे ।। काशी मुक्तौ समर्थानि तान्युक्तानि मया तव

|| īśvara uvāca || || pṛṣṭāni yāni rligāni tvayā devi girīṁdraje || kāśī muktau samarthāni tānyuktāni mayā tava

ईश्वर ने कहा — हे गिरिराज-पुत्री देवि, तुमने काशी में मुक्ति देने में समर्थ जो लिंग पूछे थे, वे सब मैंने तुम्हें बता दिए हैं।

श्लोक 108 (skanda.4.86.108)

लिंगमोंकारसंज्ञं च तथा देवं त्रिविष्टपम् ।। महादेवः कृत्तिवासा रत्नेशश्चंद्रसंज्ञकः

liṁgamoṁkārasaṁjñaṁ ca tathā devaṁ triviṣṭapam || mahādevaḥ kṛttivāsā ratneśaścaṁdrasaṁjñakaḥ

"ओंकार नामक लिंग, वैसे ही त्रिविष्टप देव, महादेव, कृत्तिवास, रत्नेश, चन्द्र नामक लिंग,"

श्लोक 109 (skanda.4.86.109)

केदारश्चापि धर्मेशस्तथा वीरेश्वराभिधः ।। कामेशविश्वकर्मेशौ मणिकर्णीश्वरस्तथा

kedāraścāpi dharmeśastathā vīreśvarābhidhaḥ || kāmeśaviśvakarmeśau maṇikarṇīśvarastathā

"केदार भी, धर्मेश, वैसे ही वीरेश्वर नामक, कामेश और विश्वकर्मेश, मणिकर्णीश्वर भी,"

श्लोक 110 (skanda.4.86.110)

ममार्च्यमविमुक्ताख्यं ततो देवि ममा ख्यकम् ।। विश्वनाथेति विश्वस्मिन्प्रथितं विश्वसौख्यदम्

mamārcyamavimuktākhyaṁ tato devi mamā khyakam || viśvanātheti viśvasminprathitaṁ viśvasaukhyadam

"मेरा पूज्य 'अविमुक्त' नामक, फिर हे देवि, मेरा ही 'विश्वनाथ' नाम से सारे विश्व में प्रसिद्ध, विश्व-सुख देने वाला।"

श्लोक 111 (skanda.4.86.111)

अविमुक्तं समासाद्य येन विश्वेश्वरोर्चितः ।। न तस्यास्ति पुनर्जन्म कल्पकोटिशतेष्वपि

avimuktaṁ samāsādya yena viśveśvarorcitaḥ || na tasyāsti punarjanma kalpakoṭiśateṣvapi

अविमुक्त को पाकर जिसने विश्वेश्वर की पूजा की, उसका सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी फिर जन्म नहीं होता।

श्लोक 112 (skanda.4.86.112)

अष्टौ मासान्विहारः स्याद्यतीनां संयतात्मनाम् ।। एकत्र चतुरोमासानब्दं नावास इष्यते

aṣṭau māsānvihāraḥ syādyatīnāṁ saṁyatātmanām || ekatra caturomāsānabdaṁ nāvāsa iṣyate

"संयमी यतियों के लिए आठ मास भ्रमण और एक स्थान पर चार मास निवास विहित है; एक वर्ष एक ही स्थान पर रहना नहीं कहा गया —"

श्लोक 113 (skanda.4.86.113)

अविमुक्ते प्रविष्टानां विहारो नैव युज्यते ।। मोक्षोप्यसंशयश्चात्र तस्मात्त्याज्या न काशिका

avimukte praviṣṭānāṁ vihāro naiva yujyate || mokṣopyasaṁśayaścātra tasmāttyājyā na kāśikā

"— सिवाय अविमुक्त में प्रविष्ट लोगों के, जिनके लिए भ्रमण उचित ही नहीं है। यहाँ मोक्ष भी असंदिग्ध है, इसलिए काशिका कभी नहीं त्यागनी चाहिए।"

श्लोक 114 (skanda.4.86.114)

आनंदकाननं हित्वा नान्यद्गच्छेत्तपोवनम् ।। तपोयोगश्च मोक्षश्च यतोत्रैव मदाश्रयात्

ānaṁdakānanaṁ hitvā nānyadgacchettapovanam || tapoyogaśca mokṣaśca yatotraiva madāśrayāt

"आनन्दकानन छोड़कर किसी अन्य तपोवन को नहीं जाना चाहिए; क्योंकि तप, योग और मोक्ष सब कुछ यहीं, मेरी शरण से ही होता है।"

श्लोक 115 (skanda.4.86.115)

कृपया सर्वजंतूनां क्षेत्रमेतन्मया कृतम् ।। अवश्यमेव सिद्ध्यंति क्षेत्रेस्मिन्सिद्धिकांक्षिणः

kṛpayā sarvajaṁtūnāṁ kṣetrametanmayā kṛtam || avaśyameva siddhyaṁti kṣetresminsiddhikāṁkṣiṇaḥ

"सब प्राणियों की दया से ही मैंने यह क्षेत्र बनाया है; इस क्षेत्र में सिद्धि चाहने वाले अवश्य ही सिद्ध होते हैं।"

श्लोक 116 (skanda.4.86.116)

अतीतं वर्तमानं च जानतोऽज्ञानतः कृतम् ।। यदेनस्तल्लयं यायादानंदवनवीक्षणात्

atītaṁ vartamānaṁ ca jānato'jñānataḥ kṛtam || yadenastallayaṁ yāyādānaṁdavanavīkṣaṇāt

"जान-बूझकर या अनजाने किया गया, भूत या वर्तमान का पाप, आनन्दवन के दर्शन मात्र से लीन हो जाता है।"

श्लोक 117 (skanda.4.86.117)

अत्युग्रैश्च तपोभिर्यन्महादानैर्महाव्रतैः ।। नियमैश्च यमैः सम्यक्त्वयोगेन महामखैः

atyugraiśca tapobhiryanmahādānairmahāvrataiḥ || niyamaiśca yamaiḥ samyaktvayogena mahāmakhaiḥ

"जो अत्यन्त उग्र तपस्याओं से, महादानों से, महाव्रतों से, नियम-यमों से, सम्यक् योग से, महायज्ञों से —"

श्लोक 118 (skanda.4.86.118)

वेदांतशास्त्राभ्यसनैः सर्वोपनिषदाश्रयात् ।। एभिर्वै यदवाप्येत तत्काश्यां हेलयाप्यते

vedāṁtaśāstrābhyasanaiḥ sarvopaniṣadāśrayāt || ebhirvai yadavāpyeta tatkāśyāṁ helayāpyate

"— वेदान्त-शास्त्रों के अभ्यास से, समस्त उपनिषदों की शरण से जो पाया जाता है, वह काशी में सहज ही पा लिया जाता है।"

श्लोक 119 (skanda.4.86.119)

कर्मसूत्रेण बद्धा वै भ्राम्यंते तावदेव हि ।। यावद्वैश्वेश्वरे धाम्नि मम नैव तनुत्यजः

karmasūtreṇa baddhā vai bhrāmyaṁte tāvadeva hi || yāvadvaiśveśvare dhāmni mama naiva tanutyajaḥ

"कर्म-सूत्र से बँधे प्राणी तभी तक भटकते हैं, जब तक विश्वेश्वर के धाम में देह नहीं त्यागते।"

श्लोक 120 (skanda.4.86.120)

काश्यां स्वलीलया देवि तिर्यग्योनिजुषामपि।। ददामि चांते तत्स्थानं यत्र यांति न याज्ञिकाः

kāśyāṁ svalīlayā devi tiryagyonijuṣāmapi|| dadāmi cāṁte tatsthānaṁ yatra yāṁti na yājñikāḥ

"काशी में मैं अपनी लीला से पशु-पक्षी योनि में जन्मे प्राणियों को भी अन्त में वह पद देता हूँ, जहाँ याज्ञिक भी नहीं पहुँचते।"

श्लोक 121 (skanda.4.86.121)

भूतग्रामोऽखिलोप्यत्र मुक्तिक्षेत्रे कृतालयः ।। कालेन निधनं यातो यात्येव परमां गतिम्

bhūtagrāmo'khilopyatra muktikṣetre kṛtālayaḥ || kālena nidhanaṁ yāto yātyeva paramāṁ gatim

इस मुक्ति-क्षेत्र में निवास करने वाला सम्पूर्ण प्राणी-समूह भी, समय आने पर मृत्यु पाकर परम गति को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 122 (skanda.4.86.122)

विषयासक्तचित्तोपि त्यक्तधर्मरतिस्त्वपि ।। कालेनोज्झितदेहोऽत्र न संसारं पुनर्विशेत्

viṣayāsaktacittopi tyaktadharmaratistvapi || kālenojjhitadeho'tra na saṁsāraṁ punarviśet

विषयों में आसक्त-चित्त और धर्म-रति त्यागने वाला भी, यहाँ समय आने पर देह त्यागकर फिर संसार में प्रवेश नहीं करता।

श्लोक 123 (skanda.4.86.123)

प्रयागे यत्फलं देवि माघे चोपनिमज्जनात् ।। तत्फलं कोटिगुणितं वाराणस्यां क्षणेक्षणे

prayāge yatphalaṁ devi māghe copanimajjanāt || tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ vārāṇasyāṁ kṣaṇekṣaṇe

"प्रयाग में माघ मास में डुबकी लगाने से जो फल मिलता है, हे देवि, वह फल करोड़ों गुना होकर वाराणसी में क्षण-क्षण मिलता है।"

श्लोक 124 (skanda.4.86.124)

अस्य क्षेत्रस्य महिमा कोपि वाचामगोचरः ।। उद्देशमात्रमाख्यायि मया ते प्रीतिकाम्यया

asya kṣetrasya mahimā kopi vācāmagocaraḥ || uddeśamātramākhyāyi mayā te prītikāmyayā

"इस क्षेत्र की महिमा किसी भी प्रकार वाणी के अगोचर है; तुम्हारे प्रति प्रेम की इच्छा से मैंने तुम्हें केवल संक्षेप में बताया है।"

श्लोक 125 (skanda.4.86.125)

चतुर्दशानां लिंगानां श्रुत्वाख्यानानि सत्तमः ।। चतुर्दश सुलोकेषु पूजां प्राप्स्यत्यनुत्तमाम्

caturdaśānāṁ liṁgānāṁ śrutvākhyānāni sattamaḥ || caturdaśa sulokeṣu pūjāṁ prāpsyatyanuttamām

इन चौदह लिंगों के आख्यान सुनकर जो श्रेष्ठ मनुष्य होगा, वह चौदह लोकों में अनुपम पूजा प्राप्त करेगा।

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