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काशी खण्ड · अध्याय 87

दक्षयज्ञ-प्रादुर्भाव

अध्याय 86अध्याय-सूचीअध्याय 88

श्लोक 1 (skanda.4.87.1)

।। अगस्त्य उवाच ।। ।। सर्वज्ञसूनो षड्वक्त्र सर्वार्थकुशल प्रभो ।। प्रादुर्भावं निशम्यैषां लिंगानां मुक्तिदायिनाम्

|| agastya uvāca || || sarvajñasūno ṣaḍvaktra sarvārthakuśala prabho || prādurbhāvaṁ niśamyaiṣāṁ liṁgānāṁ muktidāyinām

अगस्त्य ने कहा — हे सर्वज्ञ-पुत्र, षड्मुख, सब विषयों में कुशल प्रभो, इन मुक्तिदायक लिंगों के प्राकट्य को सुनकर —

श्लोक 2 (skanda.4.87.2)

नितरां परितृप्तोस्मि सुधां पीत्वेव निर्जरः ।। ओंकारप्रमुखैर्लिंगैरिदमानंदकाननम्

nitarāṁ paritṛptosmi sudhāṁ pītveva nirjaraḥ || oṁkārapramukhairliṁgairidamānaṁdakānanam

— मैं पूर्णतः तृप्त हो गया हूँ, मानो अमृत पीने वाला देवता। ओंकार आदि लिंगों वाला यह आनन्दकानन —

श्लोक 3 (skanda.4.87.3)

आनंदमेवजनयेदपि पापजुषामिह ।। परानंदमहं प्राप्तः श्रुत्वैतल्लिंगकीर्तनम्

ānaṁdamevajanayedapi pāpajuṣāmiha || parānaṁdamahaṁ prāptaḥ śrutvaitalliṁgakīrtanam

यहाँ पापियों को भी आनन्द ही उत्पन्न करता है। मैं इन लिंगों के कीर्तन को सुनकर परमानन्द को प्राप्त हुआ हूँ।

श्लोक 4 (skanda.4.87.4)

जीवन्मुक्तइवासं हि क्षेत्रतत्त्वश्रुतेरहम् ।। स्कंददक्षेश्वरादीनि लिंगानीह चतुर्दश ।। यान्युक्तानि समाचक्ष्व तत्प्रभावमशेषतः

jīvanmuktaivāsaṁ hi kṣetratattvaśruteraham || skaṁdadakṣeśvarādīni liṁgānīha caturdaśa || yānyuktāni samācakṣva tatprabhāvamaśeṣataḥ

इस क्षेत्र के तत्त्व को सुनकर मैं मानो जीवन्मुक्त हो गया हूँ। स्कन्द-दक्षेश्वर आदि जो चौदह लिंग यहाँ बताए गए हैं, उनका प्रभाव पूर्णतः बताइए।

श्लोक 5 (skanda.4.87.5)

यो दक्षो गर्हयामास मध्ये देवसभं विभुम् ।। स कथं लिंगमीशस्य प्रत्यस्थापयदद्भुतम्

yo dakṣo garhayāmāsa madhye devasabhaṁ vibhum || sa kathaṁ liṁgamīśasya pratyasthāpayadadbhutam

जो दक्ष ने देव-सभा के मध्य में विभु की निन्दा की थी, उसने कैसे ईश का यह अद्भुत लिंग स्थापित किया?

श्लोक 6 (skanda.4.87.6)

इति श्रुत्वा शिखिरथः कुंभयोनेरुदीरितम् ।। सूत संकथयामास दक्षेश्वर समुद्भवम्

iti śrutvā śikhirathaḥ kuṁbhayonerudīritam || sūta saṁkathayāmāsa dakṣeśvara samudbhavam

कुम्भयोनि (अगस्त्य) द्वारा कहे इस प्रश्न को सुनकर स्कन्द ने, हे सूत, दक्षेश्वर की उत्पत्ति कह सुनाई —

श्लोक 7 (skanda.4.87.7)

।। स्कंद उवाच ।। आकर्णय मुने वच्मि कथां कल्मषहारिणीम् ।। पुरश्चरणकामोसौ दक्षः काशीं समाययौ

|| skaṁda uvāca || ākarṇaya mune vacmi kathāṁ kalmaṣahāriṇīm || puraścaraṇakāmosau dakṣaḥ kāśīṁ samāyayau

स्कन्द ने कहा — सुनो, हे मुने, मैं पाप हरने वाली कथा कहता हूँ। पुरश्चरण की इच्छा से वह दक्ष काशी आया,

श्लोक 8 (skanda.4.87.8)

छागवक्त्रो विरूपास्यो दधीचि परिधिक्कृतः ।। प्रायश्चित्तविधानार्थं सूपदिष्टः स्वयंभुवा

chāgavaktro virūpāsyo dadhīci paridhikkṛtaḥ || prāyaścittavidhānārthaṁ sūpadiṣṭaḥ svayaṁbhuvā

बकरे के मुख वाला, विकृत मुख वाला, दधीचि द्वारा तिरस्कृत, स्वयं ब्रह्मा द्वारा प्रायश्चित्त की विधि बताया गया।

श्लोक 9 (skanda.4.87.9)

एकदा देवदेवस्य सेवार्थं शशिमौलिनः ।। कैलासमगमद्विष्णुः पद्मयोनिपुरस्कृतः

ekadā devadevasya sevārthaṁ śaśimaulinaḥ || kailāsamagamadviṣṇuḥ padmayonipuraskṛtaḥ

एक बार चन्द्रमौलि देवदेव की सेवा के लिए ब्रह्मा के साथ विष्णु कैलास गए।

श्लोक 10 (skanda.4.87.10)

इंद्रादयो लोकपाला विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।। आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विद्याधरोरगाः

iṁdrādayo lokapālā viśvedevā marudgaṇāḥ || ādityā vasavo rudrāḥ sādhyā vidyādharoragāḥ

इन्द्र आदि लोकपाल, विश्वेदेव, मरुद्गण, आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विद्याधर, नाग,

श्लोक 11 (skanda.4.87.11)

ऋषयोऽप्सरसोयक्षा गंधर्वाः सिद्धचारणाः ।। तैर्नतो देवदेवेशः परिहृष्टतनूरुहैः

ṛṣayo'psarasoyakṣā gaṁdharvāḥ siddhacāraṇāḥ || tairnato devadeveśaḥ parihṛṣṭatanūruhaiḥ

ऋषि, अप्सराएँ, यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध और चारण — इन सबने, अपने रोमांचित शरीर के साथ, देवदेवेश को प्रणाम किया,

श्लोक 12 (skanda.4.87.12)

स्तुतश्च नाना स्तुतिभिः शंभुनापि कृतादराः ।। विविशुश्चासनश्रेण्यां तन्मुखासक्तदृष्टयः

stutaśca nānā stutibhiḥ śaṁbhunāpi kṛtādarāḥ || viviśuścāsanaśreṇyāṁ tanmukhāsaktadṛṣṭayaḥ

और नाना स्तुतियों से उनकी स्तुति की; शम्भु द्वारा भी आदरित होकर वे उनके मुख की ओर दृष्टि लगाए हुए आसन-पंक्ति में बैठ गए।

श्लोक 13 (skanda.4.87.13)

अथ तेषूपविष्टेषु शंभुना विष्टरश्रवाः ।। कृतहस्तपरिस्पर्शमानः पृष्टो महादरम्

atha teṣūpaviṣṭeṣu śaṁbhunā viṣṭaraśravāḥ || kṛtahastaparisparśamānaḥ pṛṣṭo mahādaram

फिर उनके बैठ जाने पर शम्भु ने विष्णु का हाथ से स्पर्श करते हुए, अत्यन्त आदरपूर्वक पूछा —

श्लोक 14 (skanda.4.87.14)

श्रीवत्सलांछन हरे दैत्यवंशदवानल ।। कच्चित्पालयितुं शक्तिस्त्रिलोकीमस्त्यकुंठिता

śrīvatsalāṁchana hare daityavaṁśadavānala || kaccitpālayituṁ śaktistrilokīmastyakuṁṭhitā

"हे श्रीवत्स-चिह्नित हरि, दैत्य-वंश के दावानल! तीनों लोकों की रक्षा करने की शक्ति क्या निर्बाध बनी हुई है?"

श्लोक 15 (skanda.4.87.15)

दितिजान्दनुजान्दुष्टान्कच्चिच्छासि रणांगणे ।। अपि कुद्धान्महीदेवान्मामिव प्रतिमन्यसे

ditijāndanujānduṣṭānkaccicchāsi raṇāṁgaṇe || api kuddhānmahīdevānmāmiva pratimanyase

"क्या तुम दुष्ट दैत्यों-दानवों को रणभूमि में दंडित करते हो? और क्या क्रुद्ध ब्राह्मणों को भी मेरे समान ही सम्मान देते हो?"

श्लोक 16 (skanda.4.87.16)

बाधया रहिता गावः कच्चित्संति महीतले ।। स्त्रियः संति हि सुश्रीकाः पतिव्रतपरायणाः

bādhayā rahitā gāvaḥ kaccitsaṁti mahītale || striyaḥ saṁti hi suśrīkāḥ pativrataparāyaṇāḥ

"क्या पृथ्वी पर गायें बाधा-रहित हैं? क्या स्त्रियाँ शोभावती और पतिव्रता-परायण हैं?"

श्लोक 17 (skanda.4.87.17)

विधियज्ञाः प्रवर्तंते पृथिव्यां बहुदक्षिणाः ।। निराबाधं तपः कच्चिदस्ति शश्वत्तपस्विनाम्

vidhiyajñāḥ pravartaṁte pṛthivyāṁ bahudakṣiṇāḥ || nirābādhaṁ tapaḥ kaccidasti śaśvattapasvinām

"क्या पृथ्वी पर विधिपूर्वक, बहुत दक्षिणा वाले यज्ञ चलते हैं? क्या तपस्वियों की तपस्या निरन्तर निर्बाध चलती है?"

श्लोक 18 (skanda.4.87.18)

निष्प्रत्यूहं पठंत्येव सांगान्वेदान्द्विजोत्तमाः ।। महीपालाः प्रजाः कच्चित्पांति त्वमिवकेशव

niṣpratyūhaṁ paṭhaṁtyeva sāṁgānvedāndvijottamāḥ || mahīpālāḥ prajāḥ kaccitpāṁti tvamivakeśava

"क्या श्रेष्ठ ब्राह्मण निर्बाध होकर सांग वेदों का पाठ करते हैं? हे केशव, क्या राजा तुम्हारी ही तरह प्रजा की रक्षा करते हैं?"

श्लोक 19 (skanda.4.87.19)

स्वेषु स्वेषु च धर्मेषु कच्चिद्वर्णाश्रमास्तथा ।। निष्ठावंतो हि तिष्ठंति प्रहृष्टेंद्रियमानसाः

sveṣu sveṣu ca dharmeṣu kaccidvarṇāśramāstathā || niṣṭhāvaṁto hi tiṣṭhaṁti prahṛṣṭeṁdriyamānasāḥ

"और क्या वर्ण-आश्रम अपने-अपने धर्म में निष्ठावान, प्रसन्न इन्द्रिय-मन वाले होकर स्थित हैं?"

श्लोक 20 (skanda.4.87.20)

धूर्जटिः परिपृछ्येति हृष्टं वैकुंठनायकम्। ब्रह्माणं चापि पप्रच्छ ब्राह्मं तेजः समेधते

dhūrjaṭiḥ paripṛchyeti hṛṣṭaṁ vaikuṁṭhanāyakam| brahmāṇaṁ cāpi papraccha brāhmaṁ tejaḥ samedhate

इस प्रकार प्रसन्न वैकुण्ठनायक से पूछकर धूर्जटि ने ब्रह्मा से भी पूछा — "क्या ब्राह्मण-तेज बढ़ रहा है?"

श्लोक 21 (skanda.4.87.21)

सत्यमस्खलितं कच्चिदस्ति त्रैलोक्यमंडपे ।। तीर्थावरोधो न क्वापि केनचित्क्रियते विधे

satyamaskhalitaṁ kaccidasti trailokyamaṁḍape || tīrthāvarodho na kvāpi kenacitkriyate vidhe

"क्या त्रिलोक-मण्डप में सत्य अखण्डित है? क्या किसी भी तीर्थ को कहीं भी किसी के द्वारा अवरुद्ध नहीं किया जाता, हे विधे?"

श्लोक 22 (skanda.4.87.22)

इंद्रादयः सुराः कच्चित्स्वेषु स्वेषु पुरेष्वहो ।। राज्यं प्रशासति स्वस्थाः कृष्णदोर्दंडपालिताः

iṁdrādayaḥ surāḥ kaccitsveṣu sveṣu pureṣvaho || rājyaṁ praśāsati svasthāḥ kṛṣṇadordaṁḍapālitāḥ

"क्या इन्द्र आदि देवता अपने-अपने नगरों में, कृष्ण की भुजा से पालित होकर, स्वस्थ रहते हुए राज्य करते हैं?"

श्लोक 23 (skanda.4.87.23)

प्रत्येकं परिपृच्छयेशः सर्वानित्थं कृतादरान् ।। पृष्ट्वा गमनकार्यं च तेषां कृत्वा मनोरथान्

pratyekaṁ paripṛcchayeśaḥ sarvānitthaṁ kṛtādarān || pṛṣṭvā gamanakāryaṁ ca teṣāṁ kṛtvā manorathān

इस प्रकार आदर से पूछे गए सबसे एक-एक करके पूछकर, ईश ने उनके आगमन का प्रयोजन जानकर उनके मनोरथ पूर्ण किए,

श्लोक 24 (skanda.4.87.24)

विससर्जाथ तान्सर्वान्देवः सौधं समाविशत् ।। गतेष्वथ च देवेषु स्वस्व धिष्ण्येषु हृष्टवत्

visasarjātha tānsarvāndevaḥ saudhaṁ samāviśat || gateṣvatha ca deveṣu svasva dhiṣṇyeṣu hṛṣṭavat

और फिर सबको विदा करके देव अपने भवन में चले गए। फिर देवताओं के अपने-अपने स्थान पर प्रसन्नतापूर्वक जाने पर —

श्लोक 25 (skanda.4.87.25)

मध्ये मार्गं स चिंतोभूद्दक्षः सत्याः पिता तदा ।। अन्यदेवसमानं स मानं प्राप न चाधिकम्

madhye mārgaṁ sa ciṁtobhūddakṣaḥ satyāḥ pitā tadā || anyadevasamānaṁ sa mānaṁ prāpa na cādhikam

— सती के पिता दक्ष मार्ग के मध्य में ही चिन्तित हो गए, क्योंकि उन्हें अन्य देवताओं के समान ही सम्मान मिला था, अधिक नहीं।

श्लोक 26 (skanda.4.87.26)

अतीव क्षुब्धचित्तोभून्मंदराघाततोऽब्धिवत् ।। उवाच च मनस्येतन्महाक्रोधरयांधदृक्

atīva kṣubdhacittobhūnmaṁdarāghātato'bdhivat || uvāca ca manasyetanmahākrodharayāṁdhadṛk

मन्दराचल के प्रहार से समुद्र की भाँति अत्यन्त क्षुब्ध-चित्त होकर, महाक्रोध के वेग से अन्धी दृष्टि वाले उन्होंने मन में यह कहा —

श्लोक 27 (skanda.4.87.27)

अतीवगर्वितो जातः सती मे प्राप्य कन्यकाम् ।। कस्यचिन्नाप्यसौ प्रायो न कोस्यापि क्वचित्पुनः

atīvagarvito jātaḥ satī me prāpya kanyakām || kasyacinnāpyasau prāyo na kosyāpi kvacitpunaḥ

"मेरी कन्या सती को पाकर यह अत्यन्त अभिमानी हो गया है; इसे किसी की भी परवाह नहीं है, न किसी के समान समझता है।"

श्लोक 28 (skanda.4.87.28)

किं वंश्यस्त्वेष किं गोत्रः किं देशीयः किमात्मकः ।। किं वृत्तिः किं समाचारो विपा(षा?)दी वृषवाहनः

kiṁ vaṁśyastveṣa kiṁ gotraḥ kiṁ deśīyaḥ kimātmakaḥ || kiṁ vṛttiḥ kiṁ samācāro vipā(ṣā?)dī vṛṣavāhanaḥ

"इसका कौन-सा वंश है, कौन-सा गोत्र, कौन-सा देश, कैसा स्वभाव? क्या वृत्ति, क्या आचार — भस्म-लिपुत, बैल पर सवार यह?"

श्लोक 29 (skanda.4.87.29)

न प्रायशस्तपस्व्येष क्व तपः क्वास्त्रधारणम् ।। न गृहस्थेषु गण्योसौ श्मशाननिलयो यतः

na prāyaśastapasvyeṣa kva tapaḥ kvāstradhāraṇam || na gṛhastheṣu gaṇyosau śmaśānanilayo yataḥ

"यह प्रायः तपस्वी भी नहीं है — कहाँ तप, कहाँ शस्त्र-धारण! गृहस्थों में भी इसकी गणना नहीं, क्योंकि श्मशान में रहता है।"

श्लोक 30 (skanda.4.87.30)

असौ न ब्रह्मचारी स्यात्कृतपाणिग्रह स्थितिः।। वानप्रस्थ्यं कुतश्चास्मिन्नैश्वर्यमदमोहिते

asau na brahmacārī syātkṛtapāṇigraha sthitiḥ|| vānaprasthyaṁ kutaścāsminnaiśvaryamadamohite

"यह ब्रह्मचारी भी नहीं हो सकता, क्योंकि विवाह कर चुका है; और ऐश्वर्य के मद से मोहित इसमें वानप्रस्थ कहाँ से?"

श्लोक 31 (skanda.4.87.31)

न ब्राह्मणोभवत्येष यतो वेदो न वेत्त्यमुम् ।। शस्त्रास्त्रधारणात्प्रायः क्षत्रियः स्यान्न सोप्ययम्

na brāhmaṇobhavatyeṣa yato vedo na vettyamum || śastrāstradhāraṇātprāyaḥ kṣatriyaḥ syānna sopyayam

"यह ब्राह्मण नहीं होता, क्योंकि वेद इसे नहीं जानता; शस्त्रास्त्र धारण करने से यह क्षत्रिय भी नहीं, [उसका असली स्वभाव नहीं है]।"

श्लोक 32 (skanda.4.87.32)

क्षतात्संत्राणनात्क्षत्रं तत्क्वास्मिन्प्रलयप्रिये ।। वैश्योपि न भवेदेष सदा निर्धनचेष्टनः

kṣatātsaṁtrāṇanātkṣatraṁ tatkvāsminpralayapriye || vaiśyopi na bhavedeṣa sadā nirdhanaceṣṭanaḥ

"क्षति से रक्षा करने के कारण ही क्षत्र नाम है — यह विनाश-प्रिय में कहाँ? यह वैश्य भी नहीं हो सकता, सदा निर्धन जैसा आचरण करने वाला।"

श्लोक 33 (skanda.4.87.33)

शूद्रोपि न भवेत्प्रायो नागयज्ञोपवीतवान् ।। एवं वर्णाश्रमातीतः कोसौ सम्यङ्नकीर्त्यते

śūdropi na bhavetprāyo nāgayajñopavītavān || evaṁ varṇāśramātītaḥ kosau samyaṅnakīrtyate

"यह शूद्र भी नहीं हो सकता, सर्प को यज्ञोपवीत धारण करता है। इस प्रकार वर्णाश्रम से परे यह क्या भलीभाँति कहा जा सकता है?"

श्लोक 34 (skanda.4.87.34)

सर्वः प्रकृत्या ज्ञायेत स्थाणुः प्रकृतिवर्जितः ।। प्रायशः पुरुषोनासावर्धनारीवपुर्यतः

sarvaḥ prakṛtyā jñāyeta sthāṇuḥ prakṛtivarjitaḥ || prāyaśaḥ puruṣonāsāvardhanārīvapuryataḥ

"सब कुछ अपने स्वभाव से जाना जाता है, परन्तु यह स्थाणु स्वभाव-रहित है; यह पुरुष भी प्रायः नहीं, क्योंकि इसका शरीर अर्ध-नारी है।"

श्लोक 35 (skanda.4.87.35)

योषापि न भवेदेष यतोसौ श्मश्रुलाननः ।। नपुंसकोपि न भवेल्लिंगमस्ययतोर्च्यते

yoṣāpi na bhavedeṣa yatosau śmaśrulānanaḥ || napuṁsakopi na bhavelliṁgamasyayatorcyate

"यह स्त्री भी नहीं हो सकता, क्योंकि इसका मुख दाढ़ी वाला है; नपुंसक भी नहीं, क्योंकि इसके लिंग की पूजा होती है।"

श्लोक 36 (skanda.4.87.36)

बालोपि न भवत्येष यतोऽयं बहुवार्षिकः।। अनादिवृद्धो लोकेषु गीयते चोग्र एष यत्

bālopi na bhavatyeṣa yato'yaṁ bahuvārṣikaḥ|| anādivṛddho lokeṣu gīyate cogra eṣa yat

"यह बालक भी नहीं, क्योंकि यह अनेक वर्षों का है; लोकों में यह अनादि होते हुए भी वृद्ध और उग्र गाया जाता है।"

श्लोक 37 (skanda.4.87.37)

अतो युवत्वं संभाव्यं नात्र नूनं चिरंतने ।। वृद्धोऽपि न भवत्येष जरामरणवर्जितः

ato yuvatvaṁ saṁbhāvyaṁ nātra nūnaṁ ciraṁtane || vṛddho'pi na bhavatyeṣa jarāmaraṇavarjitaḥ

"इसलिए इस चिरन्तन में युवावस्था भी सम्भव नहीं है। वृद्ध भी नहीं है, क्योंकि जरा-मृत्यु से रहित है।"

श्लोक 38 (skanda.4.87.38)

ब्रह्मादीन्संहरेत्प्रांते तथापि च न पातकी ।। पुण्यलेशोपि नास्त्यस्मिन्ब्रह्ममौलिच्छिदिक्रुधा

brahmādīnsaṁharetprāṁte tathāpi ca na pātakī || puṇyaleśopi nāstyasminbrahmamaulicchidikrudhā

"अन्त में ब्रह्मा आदि का भी संहार करेगा, फिर भी पापी नहीं कहलाता; ब्रह्मा का सिर काटने वाले क्रोध में इसमें पुण्य का लेश भी नहीं है।"

श्लोक 39 (skanda.4.87.39)

अस्थिनेपथ्यवति च क्व शुचित्वं विवाससि ।। किं बहूक्तेन नो किंचिज्ज्ञायतेऽस्य विचेष्टितम्

asthinepathyavati ca kva śucitvaṁ vivāsasi || kiṁ bahūktena no kiṁcijjñāyate'sya viceṣṭitam

"हड्डियों के आभूषण वाले, नग्न-सम इस में पवित्रता कहाँ? क्या अधिक कहूँ, इसकी चेष्टाओं का कुछ भी ज्ञान नहीं होता।"

श्लोक 40 (skanda.4.87.40)

अहो धार्ष्ट्यं महद्दृष्टं जटिलस्याद्य चाद्भुतम् ।। यदासनान्नोत्थितोसौ दृष्ट्वा मां श्वशुरं गुरुम्

aho dhārṣṭyaṁ mahaddṛṣṭaṁ jaṭilasyādya cādbhutam || yadāsanānnotthitosau dṛṣṭvā māṁ śvaśuraṁ gurum

"अहो, आज मैंने इस जटाधारी की महान, अद्भुत धृष्टता देखी — यह आसन से उठा भी नहीं, अपने श्वसुर और गुरु मुझे देखकर!"

श्लोक 41 (skanda.4.87.41)

एवंभूता भवंत्येव मातापितृविवर्जिताः ।। निर्गुणा अकुलीनाश्च कर्मभ्रष्टा निरंकुशाः

evaṁbhūtā bhavaṁtyeva mātāpitṛvivarjitāḥ || nirguṇā akulīnāśca karmabhraṣṭā niraṁkuśāḥ

"ऐसे ही होते हैं जो माता-पिता से रहित हों — गुणहीन, अकुलीन, कर्म-भ्रष्ट, निरंकुश,"

श्लोक 42 (skanda.4.87.42)

स्वच्छंदचारिणोऽनाथाः सर्वत्र स्वाभिमानिनः ।। अकिंचना अपिप्रायस्तथापीश्वरमानिनः

svacchaṁdacāriṇo'nāthāḥ sarvatra svābhimāninaḥ || akiṁcanā apiprāyastathāpīśvaramāninaḥ

"स्वच्छन्द विचरण करने वाले, अनाथ, सर्वत्र स्वाभिमानी; प्रायः निर्धन होते हुए भी अपने को ईश्वर मानने वाले।"

श्लोक 43 (skanda.4.87.43)

जामातॄणां स्वभावोयं प्रायशो गर्वभाजनम् ।। किंचिदैश्वयर्मासाद्य भवत्येव न संशयः

jāmātṝṇāṁ svabhāvoyaṁ prāyaśo garvabhājanam || kiṁcidaiśvayarmāsādya bhavatyeva na saṁśayaḥ

"दामादों का यह स्वभाव प्रायः अभिमान का पात्र ही होता है; थोड़ा-सा भी ऐश्वर्य पाकर ऐसा हो ही जाता है, इसमें संशय नहीं।"

श्लोक 44 (skanda.4.87.44)

द्विजराजः स गर्विष्ठो रोहिणीप्रेमनिर्भरः ।। कृत्तिकादिषु चास्नेही मया शप्तः क्षयीकृतः

dvijarājaḥ sa garviṣṭho rohiṇīpremanirbharaḥ || kṛttikādiṣu cāsnehī mayā śaptaḥ kṣayīkṛtaḥ

"वह अभिमानी चन्द्रमा, रोहिणी के प्रेम में डूबा, कृत्तिका आदि के प्रति स्नेहहीन, मेरे शाप से क्षीण किया गया।"

श्लोक 45 (skanda.4.87.45)

अस्याहं गर्वसर्वस्वं हरिष्याम्येव शूलिनः ।। यथावमानितश्चाहमनेनास्य गृहं गतः

asyāhaṁ garvasarvasvaṁ hariṣyāmyeva śūlinaḥ || yathāvamānitaścāhamanenāsya gṛhaṁ gataḥ

"मैं इस शूलपाणि के अभिमान का भी सर्वस्व हर लूँगा। जैसे मैं इसके घर जाकर इसके द्वारा अपमानित हुआ,"

श्लोक 46 (skanda.4.87.46)

तथास्याहं करिष्यामि मानहानिं च सर्वतः ।। संप्रधार्येति बहुशः स तु दक्षः प्रजापतिः

tathāsyāhaṁ kariṣyāmi mānahāniṁ ca sarvataḥ || saṁpradhāryeti bahuśaḥ sa tu dakṣaḥ prajāpatiḥ

"वैसे ही मैं इसकी हर तरफ से मान-हानि करूँगा।" ऐसा बार-बार निश्चय करके वे प्रजापति दक्ष —

श्लोक 47 (skanda.4.87.47)

प्राप्य स्वभवनं देवानाजुहाव सवासवान् ।। अहं यियक्षुर्यूयं मे यज्ञसाहाय्यकारिणः

prāpya svabhavanaṁ devānājuhāva savāsavān || ahaṁ yiyakṣuryūyaṁ me yajñasāhāyyakāriṇaḥ

— अपने भवन पहुँचकर, इन्द्र सहित देवताओं को बुला भेजा — "मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, तुम मेरे यज्ञ में सहायक बनो।"

श्लोक 48 (skanda.4.87.48)

भवंतु यज्ञसंभारानानयंतु त्वरान्विताः ।। श्वेतद्वीपमथो गत्वा चक्रे चक्रिणमच्युतम्

bhavaṁtu yajñasaṁbhārānānayaṁtu tvarānvitāḥ || śvetadvīpamatho gatvā cakre cakriṇamacyutam

"शीघ्रता से यज्ञ-सामग्री ले आओ।" फिर श्वेतद्वीप जाकर उन्होंने चक्रधारी अच्युत को —

श्लोक 49 (skanda.4.87.49)

महाक्रतूपद्रष्टारं यज्ञपूरुषमेव च ।। तस्यर्त्विजोभवन्सर्व ऋषयो ब्रह्मवादिनः

mahākratūpadraṣṭāraṁ yajñapūruṣameva ca || tasyartvijobhavansarva ṛṣayo brahmavādinaḥ

— महायज्ञ का साक्षी और साक्षात् यज्ञ-पुरुष बनाया; ब्रह्मवादी सब ऋषि उनके ऋत्विज हुए।

श्लोक 50 (skanda.4.87.50)

प्रावर्तत ततस्तस्य दक्षस्य च महाध्वरः ।। दृष्ट्वा देवनिकायांश्च तस्मिन्दक्ष महाध्वरे

prāvartata tatastasya dakṣasya ca mahādhvaraḥ || dṛṣṭvā devanikāyāṁśca tasmindakṣa mahādhvare

फिर उस दक्ष का महायज्ञ आरम्भ हुआ। उस दक्ष के महायज्ञ में देव-समूहों को देखकर —

श्लोक 51 (skanda.4.87.51)

अनीश्वरांस्ततो वेधा व्याजं कृत्वा गृहं ययौ ।। दधीचिरथ संवीक्ष्य सर्वांस्त्रैलोक्यवासिनः

anīśvarāṁstato vedhā vyājaṁ kṛtvā gṛhaṁ yayau || dadhīciratha saṁvīkṣya sarvāṁstrailokyavāsinaḥ

— जो अपने स्वामी (शिव) से रहित थे, तब ब्रह्मा कोई बहाना बनाकर घर चले गए। दधीचि ने तब तीनों लोकों के सब निवासियों को देखा —

श्लोक 52 (skanda.4.87.52)

दक्षयज्ञे समायातान्सतीश्वरविवर्जितान् ।। प्राप्तसंमानसंभारान्वासोलंकृतिपूर्वकम्

dakṣayajñe samāyātānsatīśvaravivarjitān || prāptasaṁmānasaṁbhārānvāsolaṁkṛtipūrvakam

— सती के पति (शिव) से रहित, दक्ष-यज्ञ में आए हुए, सम्मान-सामग्री, वस्त्र-आभूषण आदि पाकर —

श्लोक 53 (skanda.4.87.53)

दक्षस्य हि शुभोदर्कमिच्छन्प्रोवाच चेति वै ।। ।। दधीचिरुवाच ।। दक्षप्रजापते दक्ष साक्षाद्धातृस्वरूपधृक्

dakṣasya hi śubhodarkamicchanprovāca ceti vai || || dadhīciruvāca || dakṣaprajāpate dakṣa sākṣāddhātṛsvarūpadhṛk

— दक्ष का शुभ परिणाम चाहते हुए, दधीचि ने यह कहा — दधीचि ने कहा — "हे दक्ष प्रजापते, आप साक्षात् धाता-स्वरूप हैं,"

श्लोक 54 (skanda.4.87.54)

न चास्ति तव सामर्थ्यं क्वापि कस्यापि निश्चितम् ।। यादृशः क्रतुसंभारस्तव चेह समीक्ष्यते

na cāsti tava sāmarthyaṁ kvāpi kasyāpi niścitam || yādṛśaḥ kratusaṁbhārastava ceha samīkṣyate

"— आपकी सामर्थ्य का निश्चय ही कहीं कोई सामना नहीं है; जैसी यज्ञ-सामग्री यहाँ देखी जाती है, वैसी —"

श्लोक 55 (skanda.4.87.55)

न तादृङ्नेदसि प्रायः क्वापि ज्ञातो महामते ।। क्रतुस्तु नैव कर्तव्यो नास्ति क्रतुसमो रिपुः

na tādṛṅnedasi prāyaḥ kvāpi jñāto mahāmate || kratustu naiva kartavyo nāsti kratusamo ripuḥ

"— प्रायः कहीं भी नहीं देखी गई, हे महामते। परन्तु यज्ञ ऐसा नहीं करना चाहिए था — यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं है।"

श्लोक 56 (skanda.4.87.56)

कर्तव्यश्चेत्तदाकार्यः स्याच्चेत्संपत्ति रीदृशी ।। साक्षादग्निः स्वयं कुंडे साक्षादिंद्रादिदेवताः

kartavyaścettadākāryaḥ syāccetsaṁpatti rīdṛśī || sākṣādagniḥ svayaṁ kuṁḍe sākṣādiṁdrādidevatāḥ

"यदि करना ही था, तो ऐसा करना चाहिए था कि यह सम्पदा वैसी हो — साक्षात् अग्नि स्वयं कुण्ड में हो, साक्षात् इन्द्र आदि देवता हों,"

श्लोक 57 (skanda.4.87.57)

साक्षाच्च सर्वे मंत्रा वै साक्षाद्यज्ञपुमानसौ ।। आचार्यपदवीमेष देवाचार्यः स्वयं चरेत् ।। साक्षाद्ब्रह्मा स्वयं चैष भृगुर्वै कर्मकांडवित्

sākṣācca sarve maṁtrā vai sākṣādyajñapumānasau || ācāryapadavīmeṣa devācāryaḥ svayaṁ caret || sākṣādbrahmā svayaṁ caiṣa bhṛgurvai karmakāṁḍavit

"— साक्षात् सब मन्त्र हों, साक्षात् वह यज्ञ-पुरुष स्वयं हों; आचार्य-पद पर देवाचार्य (बृहस्पति) स्वयं आसीन हों; साक्षात् ब्रह्मा स्वयं हों, और कर्मकाण्ड-ज्ञाता भृगु भी हों,"

श्लोक 58 (skanda.4.87.58)

अयं पूषा भगस्त्वेष इयं देवी सरस्वती ।। एते च सर्वदिक्पाला यज्ञरक्षाकृतः स्वयम्

ayaṁ pūṣā bhagastveṣa iyaṁ devī sarasvatī || ete ca sarvadikpālā yajñarakṣākṛtaḥ svayam

"यह पूषा हों, यह भग हों, यह देवी सरस्वती हों; और ये सब दिक्पाल स्वयं यज्ञ की रक्षा करने वाले हों।"

श्लोक 59 (skanda.4.87.59)

त्वं च दीक्षां शुभां प्राप्तो देव्या च शतरूपया ।। जामाता त्वेष ते धर्मः पत्नीभिर्दशभिः सह

tvaṁ ca dīkṣāṁ śubhāṁ prāpto devyā ca śatarūpayā || jāmātā tveṣa te dharmaḥ patnībhirdaśabhiḥ saha

"आपने भी शतरूपा देवी सहित शुभ दीक्षा प्राप्त की है; और यह धर्म आपके दामाद हैं, दस पत्नियों सहित —"

श्लोक 60 (skanda.4.87.60)

स्वयमेव हि कुर्वीत धर्मकार्यं प्रयत्नतः ।। ओषधीनामयं नाथस्तव जामातृषूत्तमः

svayameva hi kurvīta dharmakāryaṁ prayatnataḥ || oṣadhīnāmayaṁ nāthastava jāmātṛṣūttamaḥ

"— जो स्वयं ही धर्म-कार्य प्रयत्नपूर्वक करेंगे। और यह आपके दामादों में श्रेष्ठ, औषधियों के स्वामी (चन्द्रमा),"

श्लोक 61 (skanda.4.87.61)

सप्तविंशतिभिः सार्धं पत्नीभिस्तव कार्यकृत् ।। ओषधीः पूरयेत्सर्वा द्विजराजो महासुधीः

saptaviṁśatibhiḥ sārdhaṁ patnībhistava kāryakṛt || oṣadhīḥ pūrayetsarvā dvijarājo mahāsudhīḥ

"— सत्ताईस पत्नियों सहित आपका कार्य करने वाले, वह महाबुद्धिमान द्विजराज सब औषधियाँ पूरी करेंगे।"

श्लोक 62 (skanda.4.87.62)

दीक्षितो राजसूयस्य दत्तत्रैलोक्यदक्षिणः ।। मारीचः कश्यपश्चासौ प्रजापतिषु सत्तमः ।। त्रयोदशमिताभिश्च भार्याभिस्तव कार्यकृत्

dīkṣito rājasūyasya dattatrailokyadakṣiṇaḥ || mārīcaḥ kaśyapaścāsau prajāpatiṣu sattamaḥ || trayodaśamitābhiśca bhāryābhistava kāryakṛt

"राजसूय की दीक्षा लेने वाले, त्रिलोक-दक्षिणा देने वाले, प्रजापतियों में श्रेष्ठ मरीचि-पुत्र कश्यप, तेरह पत्नियों सहित आपका कार्य करेंगे —"

श्लोक 63 (skanda.4.87.63)

हविः कामदुघा सूते कल्पवृक्षः समित्कुशान् ।। दारुपात्राणि सर्वाणि शकटं मंडपादिकम्

haviḥ kāmadughā sūte kalpavṛkṣaḥ samitkuśān || dārupātrāṇi sarvāṇi śakaṭaṁ maṁḍapādikam

"— कामधेनु हवि देगी, कल्पवृक्ष समिधा-कुश देगा, सारे लकड़ी के पात्र, गाड़ी, मण्डप आदि —"

श्लोक 64 (skanda.4.87.64)

विश्वकर्माप्यलंकारान्कुरुतेभ्यागतर्त्विजाम् ।। वसूनि चाऽपि वासांसि वसवोष्टौ ददत्यपि

viśvakarmāpyalaṁkārānkurutebhyāgatartvijām || vasūni cā'pi vāsāṁsi vasavoṣṭau dadatyapi

"विश्वकर्मा भी आए हुए ऋत्विजों के लिए आभूषण बनाएँगे; और आठों वसु भी धन-वस्त्र देंगे।"

श्लोक 65 (skanda.4.87.65)

स्वयंलक्ष्मीरलंकुर्याद्यावै चात्र सुवासिनीः

svayaṁlakṣmīralaṁkuryādyāvai cātra suvāsinīḥ

स्वयं लक्ष्मी यहाँ सुहागिन स्त्रियों को अलंकृत करेंगी।

श्लोक 66 (skanda.4.87.66)

सर्वे सुखाय मे दक्ष वीक्षमाणस्य सर्वतः ।। एकं दुःखाकरोत्येव यत्त्वं विस्मृतवानसि

sarve sukhāya me dakṣa vīkṣamāṇasya sarvataḥ || ekaṁ duḥkhākarotyeva yattvaṁ vismṛtavānasi

"यह सब देखकर, हे दक्ष, मुझे चारों ओर से सुख होता; एक ही बात दुःख देती है — जो आप भूल गए हैं।"

श्लोक 67 (skanda.4.87.67)

जीवहीनो यथा देहो भूषितोपि न शोभते ।। तथेश्वरं विना यज्ञः श्मशानमिव लक्ष्यते

jīvahīno yathā deho bhūṣitopi na śobhate || tatheśvaraṁ vinā yajñaḥ śmaśānamiva lakṣyate

"जैसे प्राण-रहित देह भूषित होने पर भी शोभा नहीं देती, वैसे ही ईश्वर के बिना यज्ञ श्मशान के समान लगता है।"

श्लोक 68 (skanda.4.87.68)

इत्थं दधीचिवचनं श्रुत्वा दक्षः प्रजापतिः ।। भृशं जज्वाल कोपेन हविषा कृष्णवर्त्मवत्

itthaṁ dadhīcivacanaṁ śrutvā dakṣaḥ prajāpatiḥ || bhṛśaṁ jajvāla kopena haviṣā kṛṣṇavartmavat

इस प्रकार दधीचि के वचन सुनकर प्रजापति दक्ष क्रोध से घी में डाली अग्नि की भाँति अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे।

श्लोक 69 (skanda.4.87.69)

पूर्वस्तुत्याति संहृष्टो दृष्टो योसौ दधीचिना ।। स एव चापि कोपाग्निमुद्वमन्वीक्षितो मुखात्

pūrvastutyāti saṁhṛṣṭo dṛṣṭo yosau dadhīcinā || sa eva cāpi kopāgnimudvamanvīkṣito mukhāt

थोड़ी देर पहले जिस दक्ष को दधीचि ने प्रशंसा से अत्यन्त प्रसन्न देखा था, वही अब मुख से क्रोधाग्नि उगलते हुए दिखे।

श्लोक 70 (skanda.4.87.70)

प्रत्युवाचाथ तं विप्रं वेपमानांगयष्टिकः ।। दक्षः प्रजापती रोषाज्जिघांसुरिव तं द्विजम्

pratyuvācātha taṁ vipraṁ vepamānāṁgayaṣṭikaḥ || dakṣaḥ prajāpatī roṣājjighāṁsuriva taṁ dvijam

प्रजापति दक्ष ने काँपते शरीर से, क्रोधवश उस द्विज को मानो मारने की इच्छा से उत्तर दिया —

श्लोक 71 (skanda.4.87.71)

।। दक्ष उवाच ।। ।। ब्राह्मणोसि दधीचे त्वं किं करोमि तवात्र वै ।। दीक्षामहमहो प्राप्तः कर्तुं नायाति किंचन

|| dakṣa uvāca || || brāhmaṇosi dadhīce tvaṁ kiṁ karomi tavātra vai || dīkṣāmahamaho prāptaḥ kartuṁ nāyāti kiṁcana

दक्ष ने कहा — "तुम ब्राह्मण हो, हे दधीचि, तुम्हारे लिए यहाँ मैं क्या करूँ? मैं तो दीक्षा ले चुका हूँ, अब कुछ नहीं हो सकता।"

श्लोक 72 (skanda.4.87.72)

भवान्केन समाहूतो यदत्रागान्महाजडः ।। आगतोपि हि केन त्वं पृष्ट इत्थं प्रब्रवीषि यत्

bhavānkena samāhūto yadatrāgānmahājaḍaḥ || āgatopi hi kena tvaṁ pṛṣṭa itthaṁ prabravīṣi yat

"तुम्हें किसने बुलाया कि तुम यहाँ आए, हे महामूर्ख? आए भी हो तो, किसने पूछा कि तुम ऐसा बोल रहे हो?"

श्लोक 73 (skanda.4.87.73)

सर्वमंगलमांगल्यो यत्र श्रीमानयं हरिः ।। स्वयं वै यज्ञपुरुषः स मखः किं श्मशानवत्

sarvamaṁgalamāṁgalyo yatra śrīmānayaṁ hariḥ || svayaṁ vai yajñapuruṣaḥ sa makhaḥ kiṁ śmaśānavat

"जहाँ सब मंगलों के मंगल-स्वरूप श्रीमान हरि स्वयं साक्षात् यज्ञ-पुरुष हों, वह यज्ञ श्मशान जैसा कैसे हो सकता है?"

श्लोक 74 (skanda.4.87.74)

यत्र वज्रधरः शक्रः शतयज्ञैकदीक्षितः ।। त्रयस्त्रिंशतिकोटीनाममराणां पतिः स्वयम्

yatra vajradharaḥ śakraḥ śatayajñaikadīkṣitaḥ || trayastriṁśatikoṭīnāmamarāṇāṁ patiḥ svayam

"जहाँ वज्रधारी शक्र, सौ यज्ञों से दीक्षित, तैंतीस करोड़ देवताओं के स्वयं स्वामी उपस्थित हों —"

श्लोक 75 (skanda.4.87.75)

तं त्वंचोपमिमीषेमुं श्मशानेन महामखम् ।। धर्मराट्च स्वयं यत्र धर्माधर्मैककोविदः

taṁ tvaṁcopamimīṣemuṁ śmaśānena mahāmakham || dharmarāṭca svayaṁ yatra dharmādharmaikakovidaḥ

"— उस महायज्ञ की तुम श्मशान से उपमा देते हो! और जहाँ धर्म-अधर्म के एकमात्र ज्ञाता स्वयं धर्मराज उपस्थित हों —"

श्लोक 76 (skanda.4.87.76)

श्रीदोस्ति यत्र श्रीदाता साक्षाद्यत्राशुशुक्षणिः ।। तं यज्ञमुपमासि त्वममंगलभुवातया

śrīdosti yatra śrīdātā sākṣādyatrāśuśukṣaṇiḥ || taṁ yajñamupamāsi tvamamaṁgalabhuvātayā

"— जहाँ धन के दाता कुबेर, और साक्षात् अग्नि उपस्थित हों, उस यज्ञ की तुम अमंगल कहकर तुलना करते हो!"

श्लोक 77 (skanda.4.87.77)

देवाचार्यः स्वयं यत्र क्रतोराचार्यतागतः ।। अभिमानवशात्तं त्वमाख्यासि पितृकाननम्

devācāryaḥ svayaṁ yatra kratorācāryatāgataḥ || abhimānavaśāttaṁ tvamākhyāsi pitṛkānanam

"जहाँ स्वयं देवाचार्य (बृहस्पति) आचार्य-पद पर स्वयं आसीन हों, उसे तुम अभिमानवश पितृ-वन कहते हो।"

श्लोक 78 (skanda.4.87.78)

यत्रार्त्विज्यं भजंतेऽमी वसिष्ठप्रमुखर्षयः ।। तमध्वरं समाचक्षे मंगलेतरभूमिवत्

yatrārtvijyaṁ bhajaṁte'mī vasiṣṭhapramukharṣayaḥ || tamadhvaraṁ samācakṣe maṁgaletarabhūmivat

"जहाँ वसिष्ठ आदि ये ऋषि स्वयं ऋत्विज-कर्म करते हैं, उस यज्ञ को तुम अमंगल-भूमि कहते हो!"

श्लोक 79 (skanda.4.87.79)

निशम्येति मुनिः प्राह दधीचिर्ज्ञानिनां वरः ।। सर्वमंगलमांगल्यो भवेद्यज्ञपुमान्हरिः

niśamyeti muniḥ prāha dadhīcirjñānināṁ varaḥ || sarvamaṁgalamāṁgalyo bhavedyajñapumānhariḥ

यह सुनकर ज्ञानियों में श्रेष्ठ मुनि दधीचि ने कहा — "हरि, यज्ञ-पुरुष, निश्चय ही सब मंगलों का मंगल-स्वरूप हैं —"

श्लोक 80 (skanda.4.87.80)

तथापि शांभवी शक्तिर्वेदे विष्णुः प्रपठ्यते ।। वामांगं स्रष्टुराद्यस्य हरिस्तदितरद्विधिः

tathāpi śāṁbhavī śaktirvede viṣṇuḥ prapaṭhyate || vāmāṁgaṁ sraṣṭurādyasya haristaditaradvidhiḥ

"— फिर भी वेद में विष्णु शाम्भवी शक्ति ही कहे जाते हैं; हरि उस आदि स्रष्टा (शिव) के बाएँ अंग हैं, ब्रह्मा दूसरे अंग।"

श्लोक 81 (skanda.4.87.81)

दीक्षितो योश्वमेधानां शतस्य कुलिशायुधः ।। दुर्वाससा क्षणेनापि नीतो निःश्रीकतां हि सः

dīkṣito yośvamedhānāṁ śatasya kuliśāyudhaḥ || durvāsasā kṣaṇenāpi nīto niḥśrīkatāṁ hi saḥ

"वह वज्रधारी, सौ अश्वमेधों से दीक्षित, दुर्वासा द्वारा क्षणभर में ही श्रीहीन कर दिया गया था;"

श्लोक 82 (skanda.4.87.82)

पुनराराध्य भूतेशं प्रापैकाममरावतीम् ।। यस्त्वया धर्मराजोत्र कथितः क्रतुरक्षकः

punarārādhya bhūteśaṁ prāpaikāmamarāvatīm || yastvayā dharmarājotra kathitaḥ kraturakṣakaḥ

"— फिर से भूतेश की आराधना करके ही उसने एकमात्र अमरावती पुनः पाई। और यह जिस धर्मराज को आपने यज्ञ-रक्षक बताया —"

श्लोक 83 (skanda.4.87.83)

बलं तस्याखिलैर्ज्ञातं श्वेतं पाशयतः पुरा ।। धनदस्त्र्यंबकसखस्तच्चक्षुश्चाशुशुक्षणिः

balaṁ tasyākhilairjñātaṁ śvetaṁ pāśayataḥ purā || dhanadastryaṁbakasakhastaccakṣuścāśuśukṣaṇiḥ

"— उसकी शक्ति पहले सबको ज्ञात हो गई थी, जब उसने श्वेत को बाँधना चाहा था। कुबेर, त्रिनेत्र के मित्र, और साक्षात् अग्नि भी —"

श्लोक 84 (skanda.4.87.84)

पार्ष्णिग्राह्यभवद्रुद्रो देवाचार्यस्य वै तदा ।। यदा तारामधार्षीत्स द्विजराजोऽतिसुंदरीम्

pārṣṇigrāhyabhavadrudro devācāryasya vai tadā || yadā tārāmadhārṣītsa dvijarājo'tisuṁdarīm

"— तब रुद्र ही देवाचार्य (बृहस्पति) के पिछले रक्षक बने थे, जब उस चन्द्रमा ने अत्यन्त सुन्दरी तारा का भंग किया था।"

श्लोक 85 (skanda.4.87.85)

तं विदंति वसिष्ठाद्यास्तवार्त्विज्यं भजंति ये ।। एको रुद्रो न द्वितीयः संविदाना अपीति हि

taṁ vidaṁti vasiṣṭhādyāstavārtvijyaṁ bhajaṁti ye || eko rudro na dvitīyaḥ saṁvidānā apīti hi

"यह वसिष्ठ आदि, जो आपके ऋत्विज बने हैं, वे भी जानते हैं — कि रुद्र अद्वितीय हैं, यह वे स्वयं भी मानते हैं।"

श्लोक 86 (skanda.4.87.86)

प्रावर्तंतर्षयोन्येपि गौरवात्तव ते क्रतौ ।। यदि मे ब्राह्मणस्यैकं शृणोषि वचनं हितम्

prāvartaṁtarṣayonyepi gauravāttava te kratau || yadi me brāhmaṇasyaikaṁ śṛṇoṣi vacanaṁ hitam

"आपके सम्मान के कारण ही अन्य ऋषि भी आपके इस यज्ञ में सम्मिलित हुए हैं। यदि आप मुझ ब्राह्मण का एक हितकर वचन सुनें —"

श्लोक 87 (skanda.4.87.87)

तदा क्रतुफलाधीशं विश्वेशं त्वं समाह्वय ।। विना तेन क्रतुरसौ कृतोप्यकृत एव हि

tadā kratuphalādhīśaṁ viśveśaṁ tvaṁ samāhvaya || vinā tena kraturasau kṛtopyakṛta eva hi

"— तो यज्ञ-फल के अधीश्वर विश्वेश को बुलाइए। उनके बिना यह यज्ञ किया हुआ भी अकृत ही है।"

श्लोक 88 (skanda.4.87.88)

सति तस्म्निमहादेवे विश्वकर्मैकसाक्षिणि ।। तवापि चैषा सर्वेषां फलिष्यंति मनोरथाः

sati tasmnimahādeve viśvakarmaikasākṣiṇi || tavāpi caiṣā sarveṣāṁ phaliṣyaṁti manorathāḥ

"वह महादेव, सृष्टि के एकमात्र साक्षी, उपस्थित रहने पर ही आपके और सबके मनोरथ फलेंगे।"

श्लोक 89 (skanda.4.87.89)

यथा जडानि बीजानि न फलंति स्वयं तथा ।। जडानि सर्वकर्माणि न फलंतीश्वरं विना

yathā jaḍāni bījāni na phalaṁti svayaṁ tathā || jaḍāni sarvakarmāṇi na phalaṁtīśvaraṁ vinā

"जैसे जड़ बीज स्वयं फल नहीं देते, वैसे ही जड़ सब कर्म ईश्वर के बिना फल नहीं देते।"

श्लोक 90 (skanda.4.87.90)

अर्थहीना यथा वाणी धर्महीना यथा तनुः ।। पतिहीना यथा नारी शिवहीना तथा क्रिया ।।

arthahīnā yathā vāṇī dharmahīnā yathā tanuḥ || patihīnā yathā nārī śivahīnā tathā kriyā ||

"जैसे वाणी अर्थहीन, देह धर्महीन, स्त्री पतिहीन — वैसे ही शिव-रहित क्रिया है।"

श्लोक 91 (skanda.4.87.91)

गंगाहीना यथा देशाः पुत्रहीना यथा गृहाः ।। दानहीना यथा संपच्छिवहीना तथा क्रिया

gaṁgāhīnā yathā deśāḥ putrahīnā yathā gṛhāḥ || dānahīnā yathā saṁpacchivahīnā tathā kriyā

"जैसे देश गंगा-रहित, घर पुत्र-रहित, सम्पदा दान-रहित — वैसे ही शिव-रहित क्रिया है।"

श्लोक 92 (skanda.4.87.92)

मंत्रिहीनं यथा राज्यं श्रुतिहीना यथा द्विजाः ।। योषा हीनं यथा सौख्यं शिवहीना तथा क्रिया

maṁtrihīnaṁ yathā rājyaṁ śrutihīnā yathā dvijāḥ || yoṣā hīnaṁ yathā saukhyaṁ śivahīnā tathā kriyā

"जैसे राज्य मन्त्री-रहित, ब्राह्मण वेद-रहित, सुख स्त्री-रहित — वैसे ही शिव-रहित क्रिया है।"

श्लोक 93 (skanda.4.87.93)

दर्भहीना यथा संध्या तिलहीनं च तर्पणम् ।। हविर्हीनो यथा होमः शिवहीना तथा क्रिया

darbhahīnā yathā saṁdhyā tilahīnaṁ ca tarpaṇam || havirhīno yathā homaḥ śivahīnā tathā kriyā

"जैसे संध्या कुश-रहित, तर्पण तिल-रहित, होम हवि-रहित — वैसे ही शिव-रहित क्रिया है।"

श्लोक 94 (skanda.4.87.94)

इत्थं दधीचिनाख्यातं जग्राह वचनं न तत् ।। दक्षो दक्षोपि तत्रैव शंभोर्माया विमोहितः

itthaṁ dadhīcinākhyātaṁ jagrāha vacanaṁ na tat || dakṣo dakṣopi tatraiva śaṁbhormāyā vimohitaḥ

इस प्रकार दधीचि द्वारा कहे जाने पर भी दक्ष ने उस वचन को नहीं माना, क्योंकि वे भी वहीं शम्भु की माया से मोहित थे।

श्लोक 95 (skanda.4.87.95)

प्रोवाच च भृशं क्रुद्धः का चिंता तव मे क्रतोः ।। क्रतुमुख्यानि सर्वाणि यानि कर्माणि सर्वतः

provāca ca bhṛśaṁ kruddhaḥ kā ciṁtā tava me kratoḥ || kratumukhyāni sarvāṇi yāni karmāṇi sarvataḥ

और अत्यन्त क्रुद्ध होकर बोले — "मेरे यज्ञ की तुम्हें क्या चिन्ता? यज्ञ के सब मुख्य कर्म —"

श्लोक 96 (skanda.4.87.96)

तानि सिद्ध्यंति नियतं यथार्थकरणादिह ।। अयथार्थविधानेन सिद्ध्येत्कर्मापि नेशितुः

tāni siddhyaṁti niyataṁ yathārthakaraṇādiha || ayathārthavidhānena siddhyetkarmāpi neśituḥ

"— वे यहाँ सही ढंग से किए जाने से ही सिद्ध होते हैं। गलत विधि से तो ईश्वर का भी कर्म सिद्ध नहीं होता।"

श्लोक 97 (skanda.4.87.97)

स्वकर्मसिद्धये चाथ सर्व एव हि चेश्वरः ।। ईश्वरः कर्मणां साक्षी यत्त्वयापीति भाषितम्

svakarmasiddhaye cātha sarva eva hi ceśvaraḥ || īśvaraḥ karmaṇāṁ sākṣī yattvayāpīti bhāṣitam

"अपने कर्म की सिद्धि के लिए तो हर कोई स्वयं ही ईश्वर है। और तुमने जो कहा कि ईश्वर कर्मों का साक्षी है —"

श्लोक 98 (skanda.4.87.98)

तत्तथास्तु परं साक्षी नार्थं दद्याच्च कुत्रचित्

tattathāstu paraṁ sākṣī nārthaṁ dadyācca kutracit

"— वह भले ऐसा हो, पर मात्र साक्षी कहीं भी कुछ देता नहीं है।"

श्लोक 99 (skanda.4.87.99)

जडानि सर्वकर्माणि न फलंतीश्वरं विना ।। यदुक्तं भवता तत्राप्यहो दृष्टांतयाम्यहम्

jaḍāni sarvakarmāṇi na phalaṁtīśvaraṁ vinā || yaduktaṁ bhavatā tatrāpyaho dṛṣṭāṁtayāmyaham

"जड़ सब कर्म ईश्वर के बिना फल नहीं देते, यह जो तुमने कहा, उस पर भी मैं एक उदाहरण देता हूँ।"

श्लोक 100 (skanda.4.87.100)

जडान्यपि च बीजानि कालं संप्राप्यवात्मनः ।। अंकूरयंति कालाच्च पुष्प्यंति च फलंति च

jaḍānyapi ca bījāni kālaṁ saṁprāpyavātmanaḥ || aṁkūrayaṁti kālācca puṣpyaṁti ca phalaṁti ca

"जड़ बीज भी अपना समय पाकर स्वयं ही अंकुरित होते हैं, समय आने पर फूलते और फलते हैं।"

श्लोक 101 (skanda.4.87.101)

विनापीशं तथा कर्म स्वयं कालात्फलत्यहो ।। किमीश्वरेण तेनात्र महामंगलमूर्तिना

vināpīśaṁ tathā karma svayaṁ kālātphalatyaho || kimīśvareṇa tenātra mahāmaṁgalamūrtinā

"वैसे ही ईश्वर के बिना भी कर्म स्वयं समय से फल देता है। तो यहाँ उस महामंगल-मूर्ति ईश्वर से क्या प्रयोजन?"

श्लोक 102 (skanda.4.87.102)

।। दधीचिरुवाच ।। ।। यथार्थकरणात्सिद्धमपि कार्यं कदाचन ।। ईश्वरप्रातिकूल्याच्च सिद्धमेवाशु नश्यति

|| dadhīciruvāca || || yathārthakaraṇātsiddhamapi kāryaṁ kadācana || īśvaraprātikūlyācca siddhamevāśu naśyati

दधीचि ने कहा — "यथार्थ विधि से सिद्ध हुआ कार्य भी कभी-कभी ईश्वर की प्रतिकूलता से तुरन्त नष्ट हो जाता है।"

श्लोक 103 (skanda.4.87.103)

ईश्वरेच्छा बलात्कर्म कृतमप्यविधानतः ।। संसिद्ध्येत्तदधीनाश्च कथं सर्व इहेश्वराः

īśvarecchā balātkarma kṛtamapyavidhānataḥ || saṁsiddhyettadadhīnāśca kathaṁ sarva iheśvarāḥ

"ईश्वर की इच्छा के बल से अविधिपूर्वक किया गया कर्म भी सिद्ध हो जाता है; और यदि सब उसी के अधीन हैं, तो सब यहाँ स्वयं ईश्वर कैसे हो सकते हैं?"

श्लोक 104 (skanda.4.87.104)

सामान्यसाक्षिवन्नेशः सर्वेषां सर्वकर्मणाम् ।। साक्षीभवेदसंदिग्धः फलस्य प्रतिभूरपि

sāmānyasākṣivanneśaḥ sarveṣāṁ sarvakarmaṇām || sākṣībhavedasaṁdigdhaḥ phalasya pratibhūrapi

"ईश्वर सामान्य साक्षी की तरह सबके सब कर्मों के साक्षी नहीं बनते; वे असंदिग्ध रूप से फल के प्रतिभू भी बनते हैं।"

श्लोक 105 (skanda.4.87.105)

भूजलादिस्वरूपेण बीजमाविश्यसर्वकृत् ।। स्वयं कालस्वरूपेण विदध्यादंकुरोदयम्

bhūjalādisvarūpeṇa bījamāviśyasarvakṛt || svayaṁ kālasvarūpeṇa vidadhyādaṁkurodayam

"भूमि-जल आदि के रूप में बीज में प्रवेश करके, वह सब कुछ करने वाला, स्वयं काल-स्वरूप से अंकुर का उदय कराता है।"

श्लोक 106 (skanda.4.87.106)

यत्त्वयोक्तं विनापीशं काले कर्मफलेत्स्वयम् ।। स एव कालो भगवान्सर्वकर्ता महेशिता

yattvayoktaṁ vināpīśaṁ kāle karmaphaletsvayam || sa eva kālo bhagavānsarvakartā maheśitā

"तुमने जो कहा कि ईश्वर के बिना कर्म समय आने पर स्वयं ही फल देता है — वह काल ही स्वयं भगवान, सबका कर्ता, महेश्वर है।"

श्लोक 107 (skanda.4.87.107)

अन्यच्च भवता प्रोक्तं तदेकं तथ्यमेव तत् ।। किमीश्वरेण तेनात्र महामंगलमूर्तिना

anyacca bhavatā proktaṁ tadekaṁ tathyameva tat || kimīśvareṇa tenātra mahāmaṁgalamūrtinā

"और तुमने जो कहा — 'तो यहाँ उस महामंगल-मूर्ति ईश्वर से क्या प्रयोजन' — वह एक बात सत्य ही है,"

श्लोक 108 (skanda.4.87.108)

ये महांतो भवंत्येव ये च मंगलमूर्तयः ।। ईश्वराख्या च येष्वस्ति किं तैरत्र तवांतिके

ye mahāṁto bhavaṁtyeva ye ca maṁgalamūrtayaḥ || īśvarākhyā ca yeṣvasti kiṁ tairatra tavāṁtike

"— क्योंकि जो कोई भी महान हैं, जो मंगल-मूर्ति हैं, जिनमें ईश्वर-नाम है, उनका तुम्हारे समक्ष क्या प्रयोजन?"

श्लोक 109 (skanda.4.87.109)

उत्तरादुत्तरं चेति प्रत्युत्तरयति द्विजे ।। दधीचौ चुक्रुधेऽत्यंतं दक्षोगर्वातिसुश्रिया

uttarāduttaraṁ ceti pratyuttarayati dvije || dadhīcau cukrudhe'tyaṁtaṁ dakṣogarvātisuśriyā

इस प्रकार उत्तर पर उत्तर देते हुए उस ब्राह्मण दधीचि से दक्ष अपने अत्यन्त गर्व और सम्पदा के कारण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 110 (skanda.4.87.110)

आदिदेश समीपस्थानालोक्य परितस्त्विति ।। ब्राह्मणापसदं चामुं परिदूरयताशु वै

ādideśa samīpasthānālokya paritastviti || brāhmaṇāpasadaṁ cāmuṁ paridūrayatāśu vai

पास खड़े लोगों की ओर देखते हुए उन्होंने आदेश दिया — "इस अधम ब्राह्मण को शीघ्र दूर हटा दो —"

श्लोक 111 (skanda.4.87.111)

अमुष्मादध्वरश्रेष्ठादवरिष्ठमनोगतम् ।। इत्थं दधीचिराकर्ण्य प्रोवाच प्रहसन्निव

amuṣmādadhvaraśreṣṭhādavariṣṭhamanogatam || itthaṁ dadhīcirākarṇya provāca prahasanniva

"— जिसका मन इस श्रेष्ठ यज्ञ से इतना निम्न है।" इस प्रकार सुनकर दधीचि मानो हँसते हुए बोले —

श्लोक 112 (skanda.4.87.112)

किं मां दूरयसे मूढ दूरीभूतो भवानपि ।। सर्वेभ्यो मंगलेभ्यश्च सर्वैरेभिः समं ध्रुवम्

kiṁ māṁ dūrayase mūḍha dūrībhūto bhavānapi || sarvebhyo maṁgalebhyaśca sarvairebhiḥ samaṁ dhruvam

"क्यों मुझे दूर करते हो, हे मूर्ख? तुम स्वयं ही दूर हो जाओगे — इन सब मंगलों से, और इन सबसे भी, निश्चय ही।"

श्लोक 113 (skanda.4.87.113)

अकांडे क्रोधजो दंडस्तव मूर्ध्नि पतिष्यति ।। महेशितुस्त्रिजगती परिशास्तुः प्रजापते

akāṁḍe krodhajo daṁḍastava mūrdhni patiṣyati || maheśitustrijagatī pariśāstuḥ prajāpate

"बिना समय के ही क्रोध से उत्पन्न दण्ड तुम्हारे सिर पर गिरेगा, हे प्रजापते, तीनों लोकों के परम शासक महेश्वर की ओर से।"

श्लोक 114 (skanda.4.87.114)

इत्युक्त्वा निर्जगामाशु यज्ञवाटात्ततो द्विजः ।। तस्मिन्निर्याति निर्यातो दुर्वासाश्च्यवनो भवान्

ityuktvā nirjagāmāśu yajñavāṭāttato dvijaḥ || tasminniryāti niryāto durvāsāścyavano bhavān

यह कहकर वह ब्राह्मण शीघ्र यज्ञ-स्थल से चला गया; उसके जाते ही दुर्वासा, च्यवन और स्वयं भव भी चले गए।

श्लोक 115 (skanda.4.87.115)

उत्तंक उपमन्युश्च ऋचीकोद्दालकावपि ।। मांडव्यो वामदेवश्च गालवो गर्गगौतमौ

uttaṁka upamanyuśca ṛcīkoddālakāvapi || māṁḍavyo vāmadevaśca gālavo gargagautamau

उत्तंक, उपमन्यु, ऋचीक, उद्दालक, माण्डव्य, वामदेव, गालव, गर्ग, गौतम —

श्लोक 116 (skanda.4.87.116)

शिवतत्त्वविदोन्येपि दक्षयज्ञाद्विनिर्ययुः ।। गते दधीचौ सानंदं प्रावर्तत महामखः

śivatattvavidonyepi dakṣayajñādviniryayuḥ || gate dadhīcau sānaṁdaṁ prāvartata mahāmakhaḥ

— और शिव-तत्त्व के अन्य ज्ञाता भी दक्ष-यज्ञ से निकल गए। दधीचि के जाने पर वह महायज्ञ आनन्दपूर्वक चलने लगा।

श्लोक 117 (skanda.4.87.117)

ये स्थिता ब्राह्मणास्तत्र तेभ्यो द्विगुण दक्षिणाम् ।। प्रादात्प्रजापतिर्दक्षस्त्वन्येभ्योप्यधिकं वसु ।।

ye sthitā brāhmaṇāstatra tebhyo dviguṇa dakṣiṇām || prādātprajāpatirdakṣastvanyebhyopyadhikaṁ vasu ||

वहाँ रुके हुए ब्राह्मणों को प्रजापति दक्ष ने दुगुनी दक्षिणा दी, और अन्य लोगों को भी अधिक धन दिया।

श्लोक 118 (skanda.4.87.118)

सर्वे जामातरस्तेन तोषिता भूरिशोधनैः ।। कन्याश्चालंकृताः सर्वा महाविभवविस्तरैः

sarve jāmātarastena toṣitā bhūriśodhanaiḥ || kanyāścālaṁkṛtāḥ sarvā mahāvibhavavistaraiḥ

सब दामादों को उन्होंने प्रचुर धन से सन्तुष्ट किया, और सब कन्याओं को महान वैभव से अलंकृत किया।

श्लोक 119 (skanda.4.87.119)

ऋषिपत्न्योपि बहुशो देवपत्न्योप्यनेकशः ।। तथा पुरांगनाः सर्वास्तेन मानभुवः कृताः

ṛṣipatnyopi bahuśo devapatnyopyanekaśaḥ || tathā purāṁganāḥ sarvāstena mānabhuvaḥ kṛtāḥ

ऋषि-पत्नियों को भी बहुत, देव-पत्नियों को भी अनेक बार, वैसे ही नगर की सब स्त्रियों को भी उन्होंने सम्मानित किया।

श्लोक 120 (skanda.4.87.120)

ब्रह्मघोषेण तारेण व्योमशब्दगुणं स्फुटम् ।। कारितं तेन दक्षेण विप्राणां हृष्टचेतसाम्

brahmaghoṣeṇa tāreṇa vyomaśabdaguṇaṁ sphuṭam || kāritaṁ tena dakṣeṇa viprāṇāṁ hṛṣṭacetasām

उस दक्ष द्वारा प्रसन्न-चित्त ब्राह्मणों से वेद-घोष का ऊँचा, स्पष्ट स्वर आकाश में गुंजायमान कराया गया।

श्लोक 121 (skanda.4.87.121)

अग्निर्मंदाग्निरभवत्तस्मिञ्जुह्वति दीक्षिते ।। हविः परिमलेनैव परितृप्ता दिगंगनाः

agnirmaṁdāgnirabhavattasmiñjuhvati dīkṣite || haviḥ parimalenaiva paritṛptā digaṁganāḥ

दीक्षित पुरोहितों के हवन करते समय अग्नि भी मन्द हो गई; हवि की सुगन्ध मात्र से दिशाओं की देवियाँ तृप्त हो गईं।

श्लोक 122 (skanda.4.87.122)

स्वाहाकारैर्वषट्कारैः सुरा जाताः पिचंडिलाः ।। रचिता गिरयस्तेन सदन्नानां पदेपदे

svāhākārairvaṣaṭkāraiḥ surā jātāḥ picaṁḍilāḥ || racitā girayastena sadannānāṁ padepade

स्वाहा और वषट्कार से देवता तृप्त होकर स्थूल-उदर हो गए; उनके द्वारा पग-पग पर सुस्वादु अन्न के पर्वत रचे गए।

श्लोक 123 (skanda.4.87.123)

घृतकुल्याः कृतास्तेन मधुकुल्याः सहस्रशः ।। महासरांसि पयसां द्रप्सस्यापि महाह्रदाः

ghṛtakulyāḥ kṛtāstena madhukulyāḥ sahasraśaḥ || mahāsarāṁsi payasāṁ drapsasyāpi mahāhradāḥ

उन्होंने घी की नहरें बनाईं, हज़ारों मधु की नहरें भी; दूध के महासरोवर, और दही के भी महाह्रद।

श्लोक 124 (skanda.4.87.124)

राशयश्च दुकूलानां रत्नानां शिखराणि च ।। यज्ञवाटस्य वसुधा स्वर्णरूप्यमयीकृता

rāśayaśca dukūlānāṁ ratnānāṁ śikharāṇi ca || yajñavāṭasya vasudhā svarṇarūpyamayīkṛtā

रेशमी वस्त्रों की राशियाँ, रत्नों के ढेर; यज्ञ-स्थल की भूमि स्वर्ण-रजत से मढ़ दी गई।

श्लोक 125 (skanda.4.87.125)

न लभ्यंते क्रतौ तस्य मार्गिता अपि मार्गणाः ।। हृष्टाः पुष्टाः समभवन्नपि तत्परिचारकाः

na labhyaṁte kratau tasya mārgitā api mārgaṇāḥ || hṛṣṭāḥ puṣṭāḥ samabhavannapi tatparicārakāḥ

उस यज्ञ में याचक भी ढूँढ़ने पर भी कहीं वंचित नहीं रहे; उनके सेवक भी प्रसन्न और पुष्ट हो गए।

श्लोक 126 (skanda.4.87.126)

ध्वनिर्मंगलगीतानां व्यानशे गगनांगणम् ।। जहृषे चाप्सरोवृंदैर्गंधर्वैर्मुमुदेतराम्

dhvanirmaṁgalagītānāṁ vyānaśe gaganāṁgaṇam || jahṛṣe cāpsarovṛṁdairgaṁdharvairmumudetarām

मंगल-गीतों की ध्वनि आकाश-मण्डल में व्याप्त हो गई; अप्सराओं के समूह प्रसन्न हुए, और गन्धर्व अत्यन्त हर्षित हुए।

श्लोक 127 (skanda.4.87.127)

विद्याधरैर्ननंदे च वसुधा ववृधे भृशम् ।। महाविभवसंभारे तस्मिन्दाक्षे महाक्रतौ ।। इत्थं प्रवृत्तेऽथ मुनिः कैलासं नारदो ययौ

vidyādharairnanaṁde ca vasudhā vavṛdhe bhṛśam || mahāvibhavasaṁbhāre tasmindākṣe mahākratau || itthaṁ pravṛtte'tha muniḥ kailāsaṁ nārado yayau

विद्याधर आनन्दित हुए, और पृथ्वी अत्यन्त समृद्ध हो गई, उस दक्ष के महान वैभव-सम्पन्न महायज्ञ में। इस प्रकार यज्ञ चलते हुए, नारद मुनि कैलास गए।

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