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काशी खण्ड · अध्याय 9

अप्सरोलोक-सूर्यलोक वर्णन

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (skanda.4.9.1)

शिवशर्मोवाच । का इमा रूपलावण्य सौभाग्यनिधयः स्त्रियः । दिव्यालंकारधारिण्यो दिव्यभोगसमन्विताः

śivaśarmovāca kā imā rūpalāvaṇya saubhāgyanidhayaḥ striyaḥ divyālaṁkāradhāriṇyo divyabhogasamanvitāḥ

शिवशर्मा ने कहा — ये कौन स्त्रियाँ हैं, जो रूप, लावण्य और सौभाग्य की निधि हैं, दिव्य आभूषणों को धारण किए हुई हैं और दिव्य भोगों से संपन्न हैं?

श्लोक 2 (skanda.4.9.2)

गणावूचतुः । एता वारविलासिन्यो यज्ञभाजां प्रियंकराः । गीतज्ञा नृत्यकुशला वाद्यविद्या विचक्षणाः

gaṇāvūcatuḥ etā vāravilāsinyo yajñabhājāṁ priyaṁkarāḥ gītajñā nṛtyakuśalā vādyavidyā vicakṣaṇāḥ

गणों ने कहा — ये यज्ञ करने वालों को प्रिय देवगणिकाएँ हैं, जो गीत में निपुण, नृत्य में कुशल और वाद्यविद्या में प्रवीण हैं।

श्लोक 3 (skanda.4.9.3)

कामकेलिकलाभिज्ञा द्यूतविद्याविशारदाः । रसज्ञा भाववेदिन्यश्चतुराश्चोचितोक्तिषु

kāmakelikalābhijñā dyūtavidyāviśāradāḥ rasajñā bhāvavedinyaścaturāścocitoktiṣu

वे कामक्रीड़ा की कलाओं में निपुण, द्यूतविद्या में प्रवीण, रस की मर्मज्ञ, भाव को पहचानने वाली और अवसरोचित वचन कहने में चतुर हैं।

श्लोक 4 (skanda.4.9.4)

नानादेश विशेषज्ञा नानाभाषा सुकोविदाः । संकेतोदंतनिपुणा नैकास्वैरचरा मुदा

nānādeśa viśeṣajñā nānābhāṣā sukovidāḥ saṁketodaṁtanipuṇā naikāsvairacarā mudā

वे अनेक देशों की विशेषताओं को जानने वाली, नाना भाषाओं में निपुण, संकेत और संदेश देने में कुशल हैं, तथा आनंदपूर्वक अनेक स्थानों में स्वच्छन्द विचरण करती हैं।

श्लोक 5 (skanda.4.9.5)

लीलानर्मसुसाभिज्ञाः सुप्रलापेषु पंडिताः । यूनां मनांसि सततं स्वैर्हावै रमयंत्यमूः

līlānarmasusābhijñāḥ supralāpeṣu paṁḍitāḥ yūnāṁ manāṁsi satataṁ svairhāvai ramayaṁtyamūḥ

वे लीला और परिहास में सुनिपुण, मधुर वार्तालाप में पंडित हैं, और अपने हाव-भाव से सदा युवकों के मन को रमाती रहती हैं।

श्लोक 6 (skanda.4.9.6)

निर्मथ्यमानात्क्षीरोदात्पूर्वमप्सरसस्त्वमूः । निःसृतास्त्रिजगज्जेतुर्मोहनास्त्रमनोभुवः

nirmathyamānātkṣīrodātpūrvamapsarasastvamūḥ niḥsṛtāstrijagajjeturmohanāstramanobhuvaḥ

क्षीरसागर के मंथन के समय पूर्वकाल में ये अप्सराएँ प्रकट हुई थीं — ये मनोभव (कामदेव) के त्रिभुवन को जीतने वाले मोहन-अस्त्र के समान हैं।

श्लोक 7 (skanda.4.9.7)

उर्वशी मेनका रंभा चंद्रलेखा तिलोत्तमा । वपुष्मतीकांतिमती लीलावत्युत्पलावती

urvaśī menakā raṁbhā caṁdralekhā tilottamā vapuṣmatīkāṁtimatī līlāvatyutpalāvatī

उर्वशी, मेनका, रम्भा, चन्द्रलेखा, तिलोत्तमा, वपुष्मती, कान्तिमती, लीलावती, उत्पलावती —

श्लोक 8 (skanda.4.9.8)

अलंबुषा गुणवती स्थूलकेशी कलावती । कलानिधिर्गुणनिधिः कर्पूरतिलकोर्वरा

alaṁbuṣā guṇavatī sthūlakeśī kalāvatī kalānidhirguṇanidhiḥ karpūratilakorvarā

अलम्बुषा, गुणवती, स्थूलकेशी, कलावती, कलानिधि, गुणनिधि, कर्पूरतिलका, उर्वरा —

श्लोक 9 (skanda.4.9.9)

अनंगलतिका चापि तथा मदनमोहिनी । चकोराक्षी चंद्रकला तथा मुनिमनोहरा

anaṁgalatikā cāpi tathā madanamohinī cakorākṣī caṁdrakalā tathā munimanoharā

तथा अनंगलतिका, मदनमोहिनी, चकोराक्षी, चन्द्रकला और मुनिमनोहरा भी —

श्लोक 10 (skanda.4.9.10)

ग्रावद्रावा तपोद्वेष्टी चारुनासा सुकर्णिका । दारुसंजीविनी सुश्रीः क्रतुशुल्का शुभानना

grāvadrāvā tapodveṣṭī cārunāsā sukarṇikā dārusaṁjīvinī suśrīḥ kratuśulkā śubhānanā

ग्रावद्रावा, तपोद्वेष्टी, चारुनासा, सुकर्णिका, दारुसंजीविनी, सुश्री, क्रतुशुल्का, शुभानना —

श्लोक 11 (skanda.4.9.11)

तपःशुल्का तीर्थशुल्का दानशुल्का हिमावती । पंचाश्वमेधिका चैव राजसूयार्थिनी तथा

tapaḥśulkā tīrthaśulkā dānaśulkā himāvatī paṁcāśvamedhikā caiva rājasūyārthinī tathā

तपःशुल्का, तीर्थशुल्का, दानशुल्का, हिमावती, तथा पंचाश्वमेधिका और राजसूयार्थिनी भी —

श्लोक 12 (skanda.4.9.12)

अष्टाग्निहोमिका तद्वद्वाजपेयशतोद्भवा । इत्याद्यप्सरसां श्रेष्ठं सहस्रं षष्टिसंमितम्

aṣṭāgnihomikā tadvadvājapeyaśatodbhavā ityādyapsarasāṁ śreṣṭhaṁ sahasraṁ ṣaṣṭisaṁmitam

और अष्टाग्निहोमिका, तथा वाजपेयशतोद्भवा — इस प्रकार इन आदि अप्सराओं में श्रेष्ठ, साठ हज़ार की संख्या में हैं।

श्लोक 13 (skanda.4.9.13)

एतस्मिन्नप्सरोलोके वसंत्यन्या अपिस्त्रियः । सदा स्खलितलावण्याः सदास्खलितयौवनाः

etasminnapsaroloke vasaṁtyanyā apistriyaḥ sadā skhalitalāvaṇyāḥ sadāskhalitayauvanāḥ

इस अप्सरालोक में अन्य स्त्रियाँ भी निवास करती हैं — वे जिनका लावण्य किसी एक बार डगमगाया हो, और जिनका यौवन किसी एक बार स्खलित हुआ हो।

श्लोक 14 (skanda.4.9.14)

दिव्यांबरा दिव्यमाल्या दिव्यगंधानुलेपनाः । दिव्यभोगैः सुसंपन्नाः स्वेच्छाविधृतविग्रहाः

divyāṁbarā divyamālyā divyagaṁdhānulepanāḥ divyabhogaiḥ susaṁpannāḥ svecchāvidhṛtavigrahāḥ

वे दिव्य वस्त्र पहने, दिव्य मालाएँ धारण किए, दिव्य सुगंध का अनुलेपन किए हुई हैं, दिव्य भोगों से संपन्न हैं, और अपनी इच्छा से अपना रूप धारण करती हैं।

श्लोक 15 (skanda.4.9.15)

कृत्वा मासोपवासानि स्खलंति ब्रह्मचर्यतः । सकृदेव द्विकृत्वो वा त्रिःकृत्वो दैवयोगतः

kṛtvā māsopavāsāni skhalaṁti brahmacaryataḥ sakṛdeva dvikṛtvo vā triḥkṛtvo daivayogataḥ

मासभर उपवास करके भी वे ब्रह्मचर्य से स्खलित हो जाती हैं — दैवयोग से कभी एक बार, कभी दो बार, कभी तीन बार।

श्लोक 16 (skanda.4.9.16)

ता इमा दिव्यभोगिन्यो रूपलावण्यसंपदः। निवसंत्यप्सरोलोके सर्वकामसमन्विताः

tā imā divyabhoginyo rūpalāvaṇyasaṁpadaḥ nivasaṁtyapsaroloke sarvakāmasamanvitāḥ

ये सब दिव्य भोगों को भोगने वाली, रूप-लावण्य की संपदा से युक्त स्त्रियाँ, सर्वकामनाओं से संपन्न होकर अप्सरालोक में निवास करती हैं।

श्लोक 17 (skanda.4.9.17)

कृत्वा व्रतानि सांगानि कामिकानि विधानतः । भवंति स्वैरचारिण्यो देवभोग्या इहागताः

kṛtvā vratāni sāṁgāni kāmikāni vidhānataḥ bhavaṁti svairacāriṇyo devabhogyā ihāgatāḥ

कामनापूर्वक विधिपूर्वक साङ्ग व्रतों का पालन करके वे स्वेच्छाचारिणी हो जाती हैं, तथा देवताओं द्वारा भोगे जाने के लिए यहाँ आती हैं।

श्लोक 18 (skanda.4.9.18)

पतिव्रतधृता नार्यो बलेन बलिना धृताः । भर्तबुद्ध्यारमंतेतं(?) कदाचित्ता इमा द्विज

pativratadhṛtā nāryo balena balinā dhṛtāḥ bhartabuddhyāramaṁtetaṁ(?) kadācittā imā dvija

हे द्विज, पतिव्रता स्त्रियाँ जो किसी बलवान के बल से पकड़ ली जाती हैं और किसी समय पति-बुद्धि से ही उसके साथ रमण कर बैठती हैं —

श्लोक 19 (skanda.4.9.19)

भर्तरि प्रोषिते याश्च ब्रह्मचर्यव्रताः सदा । विप्लवं ते सकृद्दैवात्ता एता वामलोचनाः

bhartari proṣite yāśca brahmacaryavratāḥ sadā viplavaṁ te sakṛddaivāttā etā vāmalocanāḥ

और वे सुनयना स्त्रियाँ, जो पति के परदेश जाने पर सदा ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करती हैं, किन्तु दैवयोग से किसी एक बार स्खलित हो जाती हैं — वे भी यहीं आ बसती हैं।

श्लोक 20 (skanda.4.9.20)

कुसुमानि सुगंधीनि सुवासं चंदनं तथा । सुगौरं चापि कर्पूरं सुसूक्ष्माण्यंबराणि च

kusumāni sugaṁdhīni suvāsaṁ caṁdanaṁ tathā sugauraṁ cāpi karpūraṁ susūkṣmāṇyaṁbarāṇi ca

सुगंधित पुष्प, सुवासित चन्दन, उज्ज्वल कर्पूर, और अत्यंत सूक्ष्म वस्त्र,

श्लोक 21 (skanda.4.9.21)

पर्णानि ऋजुताराणि जीर्णानि कठिनानि च । साग्राणि स्वर्णवर्णानि स्थूलनीलशिराणि च

parṇāni ṛjutārāṇi jīrṇāni kaṭhināni ca sāgrāṇi svarṇavarṇāni sthūlanīlaśirāṇi ca

सीधी शिराओंवाले, पके और कठोर, अग्रभाग में सुवर्ण-वर्ण, तथा मोटी नीली शिराओं से युक्त पान के पत्ते,

श्लोक 22 (skanda.4.9.22)

सुवासोपस्कराढ्यानि नागवल्ल्या द्विजोत्तम । शय्याविचित्राभरणा रतिशालोचितानि च

suvāsopaskarāḍhyāni nāgavallyā dvijottama śayyāvicitrābharaṇā ratiśālocitāni ca

हे द्विजोत्तम, नागवल्ली (पान) के सुवासित उपस्करों से समृद्ध, तथा विचित्र आभूषणों से युक्त शय्या, जो रतिगृह के योग्य हो,

श्लोक 23 (skanda.4.9.23)

बहुकौतुकवस्तूनि समर्च्यद्विजदंपती । भोगदानमिदं काम्यं प्रतिसंक्रमणं रवेः

bahukautukavastūni samarcyadvijadaṁpatī bhogadānamidaṁ kāmyaṁ pratisaṁkramaṇaṁ raveḥ

और अनेक कौतुकपूर्ण वस्तुओं से ब्राह्मण-दंपती की पूजा करनी चाहिए; सूर्य की प्रत्येक संक्रांति पर यह कामनापूर्ण भोगदान देना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.4.9.24)

किंवा प्रतिव्यतीपातमेकसंवत्सरावधि। कोदादिति च मंत्रेण या दद्याद्वरवर्णिनी

kiṁvā prativyatīpātamekasaṁvatsarāvadhi kodāditi ca maṁtreṇa yā dadyādvaravarṇinī

अथवा प्रत्येक व्यतीपात पर, एक वर्ष की अवधि तक, जो श्रेष्ठ वर्णवाली स्त्री उस मंत्र के साथ यह दान देती है,

श्लोक 25 (skanda.4.9.25)

कामरूपधरो देवः प्रीयतामिति वादिनी । सा श्रेष्ठाऽप्सरसां मध्ये वसेत्कल्पमिहांगना

kāmarūpadharo devaḥ prīyatāmiti vādinī sā śreṣṭhā'psarasāṁ madhye vasetkalpamihāṁganā

यह कहती हुई कि 'कामरूपधारी देव प्रसन्न हों' — वह स्त्री अप्सराओं में श्रेष्ठ होकर यहाँ एक कल्प तक निवास करती है।

श्लोक 26 (skanda.4.9.26)

कन्यारूपधराकाचिद्याभुक्ता केनचित्क्वचित् । देवरूपेण तं कालमारभ्य ब्रह्मचारिणी

kanyārūpadharākācidyābhuktā kenacitkvacit devarūpeṇa taṁ kālamārabhya brahmacāriṇī

और कोई कन्यारूपधारी स्त्री, जो किसी के द्वारा कहीं देवरूप में एक बार भोगी गई हो, उस काल से लेकर ब्रह्मचारिणी बनी रहती है,

श्लोक 27 (skanda.4.9.27)

तदेव वृत्तं ध्यायंती निधनं याति कालतः । दिव्यरूपधरा सेह जायते दिव्य भोगभाक्

tadeva vṛttaṁ dhyāyaṁtī nidhanaṁ yāti kālataḥ divyarūpadharā seha jāyate divya bhogabhāk

और उसी घटना का सतत ध्यान करती हुई काल पाकर मृत्यु को प्राप्त होती है; वह दिव्य रूप धारण करके यहाँ दिव्य भोग की भागिनी बनकर जन्म लेती है।

श्लोक 28 (skanda.4.9.28)

निदानमप्सरोलोकस्येतिशृण्वन्द्विजाग्रणीः । सौरं लोकमथ प्राप्य क्षणेन स विमानगः

nidānamapsarolokasyetiśṛṇvandvijāgraṇīḥ sauraṁ lokamatha prāpya kṣaṇena sa vimānagaḥ

इस प्रकार अप्सरालोक के निदान (उत्पत्ति) को सुनते हुए वह द्विजश्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर क्षणभर में सौरलोक में जा पहुँचा।

श्लोक 29 (skanda.4.9.29)

यथा कदंबकुसुमं किंजल्कैः सर्वतोवृतम् । देदीप्यमानं हि तथा समंताद्भानुभानुभिः

yathā kadaṁbakusumaṁ kiṁjalkaiḥ sarvatovṛtam dedīpyamānaṁ hi tathā samaṁtādbhānubhānubhiḥ

जैसे कदंब का पुष्प चारों ओर केसर से घिरा रहता है, वैसे ही वह लोक चारों ओर सूर्य की किरणों से देदीप्यमान हो रहा था।

श्लोक 30 (skanda.4.9.30)

दूराद्रविं स विज्ञाय धृततामरसद्वयम् । नवभिर्योजनानां च सहस्रैः संमितेन ह

dūrādraviṁ sa vijñāya dhṛtatāmarasadvayam navabhiryojanānāṁ ca sahasraiḥ saṁmitena ha

उसने दूर से ही सूर्यदेव को पहचाना, जो दोनों हाथों में कमल धारण किए हुए थे, नौ हज़ार योजनों के परिमाण से,

श्लोक 31 (skanda.4.9.31)

विचित्रेणैकचक्रेण सप्तसप्तियुतेन च । अनूरुणाधिष्ठितेन पुरतोधृतरश्मिना

vicitreṇaikacakreṇa saptasaptiyutena ca anūruṇādhiṣṭhitena puratodhṛtaraśminā

विचित्र एक चक्रवाले, सात घोड़ों से युक्त रथ पर, अनूरु अरुण द्वारा संचालित, तथा आगे लगाम धारण किए हुए,

श्लोक 32 (skanda.4.9.32)

अप्सरोमुनिगंधर्व सर्पग्रामणि नैर्ऋतैः । स्यंदनेनातिजविना प्रणनाम कृतांजलिः

apsaromunigaṁdharva sarpagrāmaṇi nairṛtaiḥ syaṁdanenātijavinā praṇanāma kṛtāṁjaliḥ

अत्यंत वेगवान रथ में अप्सराओं, मुनियों, गंधर्वों, सर्पों के अधिपतियों और नैर्ऋतों (राक्षसों) से घिरे हुए उस सूर्यदेव को उसने अंजलिबद्ध होकर प्रणाम किया।

श्लोक 33 (skanda.4.9.33)

तस्य प्रणामंदेवोपि भ्रूभंगेनानुमन्य च। अतिदूरं नभोवर्त्म व्यतिचक्राम सक्षणात्

tasya praṇāmaṁdevopi bhrūbhaṁgenānumanya ca atidūraṁ nabhovartma vyaticakrāma sakṣaṇāt

उस देव ने भी उसके प्रणाम को भ्रूभंग मात्र से स्वीकार करके क्षणभर में ही आकाश के अत्यंत विस्तृत मार्ग को पार कर लिया।

श्लोक 34 (skanda.4.9.34)

प्रक्रांते द्युमणौ दूरं शिवशर्मातिशर्मवान् । प्रोवाच भगवद्भक्तौ कथं लभ्यं रवेः पदम्

prakrāṁte dyumaṇau dūraṁ śivaśarmātiśarmavān provāca bhagavadbhaktau kathaṁ labhyaṁ raveḥ padam

सूर्यदेव के दूर निकल जाने पर अत्यंत आनंदित शिवशर्मा ने भगवद्भक्त उन दोनों गणों से कहा — 'सूर्य का पद कैसे प्राप्त होता है?'

श्लोक 35 (skanda.4.9.35)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमाचक्षाथां ममाग्रतः । सतां साप्तपदी मैत्री तन्मे मैत्र्या प्रणोदितौ

etadicchāmyahaṁ śrotumācakṣāthāṁ mamāgrataḥ satāṁ sāptapadī maitrī tanme maitryā praṇoditau

यह मैं सुनना चाहता हूँ, मेरे समक्ष कहो। सज्जनों की मित्रता सप्तपदी से बंधी होती है; अतः उसी मैत्री से प्रेरित होकर तुम दोनों मुझे बताओ।

श्लोक 36 (skanda.4.9.36)

गणावूचतुः । शृणु द्विज महाप्राज्ञ त्वय्यकथ्यं न किंचन । सत्संगादेव साधूनां सत्कथा संप्रवर्तते

gaṇāvūcatuḥ śṛṇu dvija mahāprājña tvayyakathyaṁ na kiṁcana satsaṁgādeva sādhūnāṁ satkathā saṁpravartate

गणों ने कहा — हे महाप्राज्ञ द्विज, सुनो; तुमसे कुछ भी न कहने योग्य नहीं है। साधुओं के सत्संग से ही सत्कथा प्रवर्तित होती है।

श्लोक 37 (skanda.4.9.37)

नियंता सर्वभूतानां य एकःकारणं परम् । अनामा गोत्ररहितो रूपादि परिवर्जितः

niyaṁtā sarvabhūtānāṁ ya ekaḥkāraṇaṁ param anāmā gotrarahito rūpādi parivarjitaḥ

जो समस्त प्राणियों के नियंता हैं, जो एकमात्र परम कारण हैं, जो नाम-रहित, गोत्र-रहित तथा रूपादि से रहित हैं —

श्लोक 38 (skanda.4.9.38)

आविर्भाव तिरोभावौ यद्भूनर्तनवर्तिनौ । स एव वक्ति सततं सर्वात्मा वेदपूरुषः

āvirbhāva tirobhāvau yadbhūnartanavartinau sa eva vakti satataṁ sarvātmā vedapūruṣaḥ

जिनका आविर्भाव और तिरोभाव इस भू-नर्तन (सृष्टि के नर्तन) में सतत होता रहता है — वे ही सर्वात्मा वेदपुरुष सदा यह कहते हैं —

श्लोक 39 (skanda.4.9.39)

योसावादित्यपुरुषः सोसावहमिति स्फुटम् । अंधतमः प्रविशंति ये चैवान्यमुपासते

yosāvādityapuruṣaḥ sosāvahamiti sphuṭam aṁdhatamaḥ praviśaṁti ye caivānyamupāsate

'जो यह आदित्यरूप पुरुष हैं, वे ही मैं हूँ' — यह स्पष्ट कहा गया है। जो इसे न जानकर अन्य की उपासना करते हैं, वे अंधतम (घोर अंधकार) में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 40 (skanda.4.9.40)

निश्चितार्थां श्रुतिमिमां ब्राह्मणासो द्विजोत्तम । तमेकमुपतिष्ठंते निश्चित्येति पुनःपुनः

niścitārthāṁ śrutimimāṁ brāhmaṇāso dvijottama tamekamupatiṣṭhaṁte niścityeti punaḥpunaḥ

हे द्विजोत्तम, इस निश्चितार्थ श्रुति को जानकर ब्राह्मणजन बार-बार निश्चय करके उस एक ही परमेश्वर की उपासना करते हैं।

श्लोक 41 (skanda.4.9.41)

उपलभ्य च सावित्रीं नोपतिष्ठेत यः पराम् । काले त्रिकालं सप्ताहात्स पतेन्नात्र संशयः

upalabhya ca sāvitrīṁ nopatiṣṭheta yaḥ parām kāle trikālaṁ saptāhātsa patennātra saṁśayaḥ

जो व्यक्ति परा सावित्री (गायत्री) को प्राप्त करके भी काल में त्रिकाल उसकी उपासना नहीं करता, वह सात दिनों में ही पतित हो जाता है — इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 42 (skanda.4.9.42)

तावत्प्रातर्जपंस्तिष्ठेद्यावदर्धोदयो रवेः । आसनस्थो जपेन्मौनी प्रत्यगातारकोदयात्

tāvatprātarjapaṁstiṣṭhedyāvadardhodayo raveḥ āsanastho japenmaunī pratyagātārakodayāt

प्रातःकाल जब तक सूर्य आधा उदित न हो जाए तब तक खड़े होकर जप करता रहे; सायंकाल आसन पर बैठकर मौन होकर तारों के उदय होने तक जप करे।

श्लोक 43 (skanda.4.9.43)

सादित्यां मध्यमां संध्यां जपेदादित्यसंमुखः । काललोपो न कर्तव्यस्ततः कालं प्रतीक्षयेत्

sādityāṁ madhyamāṁ saṁdhyāṁ japedādityasaṁmukhaḥ kālalopo na kartavyastataḥ kālaṁ pratīkṣayet

मध्याह्न की संध्या सूर्य के सम्मुख होकर जपनी चाहिए; काल का लोप कभी न करे, अपितु काल की प्रतीक्षा करे।

श्लोक 44 (skanda.4.9.44)

काले फलंत्योषधयः काले पुष्पंति पादपाः । वर्षंति तोयदाः काले तस्मात्कालं न लंघयेत्

kāle phalaṁtyoṣadhayaḥ kāle puṣpaṁti pādapāḥ varṣaṁti toyadāḥ kāle tasmātkālaṁ na laṁghayet

काल में ही ओषधियाँ फलती हैं, काल में ही वृक्ष पुष्पित होते हैं, काल में ही मेघ वर्षा करते हैं — इसलिए काल का उल्लंघन कभी न करे।

श्लोक 45 (skanda.4.9.45)

मंदेहदेहनाशार्थमुदयास्तमये रविः । समीहते द्विजोत्सृष्टं मंत्रतोयांजलित्रयम्

maṁdehadehanāśārthamudayāstamaye raviḥ samīhate dvijotsṛṣṭaṁ maṁtratoyāṁjalitrayam

मन्देह राक्षसों के शरीर-नाश के लिए उदय और अस्त के समय सूर्य द्विजों द्वारा दिए गए मंत्रजल की तीन अंजलियाँ चाहते हैं।

श्लोक 46 (skanda.4.9.46)

गायत्रीमंत्रतोयाढ्यं दत्तं येनांजलित्रयम् । काले सवित्रे किं न स्यात्तेन दत्तं जगत्त्रयम्

gāyatrīmaṁtratoyāḍhyaṁ dattaṁ yenāṁjalitrayam kāle savitre kiṁ na syāttena dattaṁ jagattrayam

जिसने गायत्री-मंत्र-युक्त जल की तीन अंजलियाँ काल पर सविता को अर्पित की हों, उसने क्या नहीं दिया? उसने मानो तीनों लोक ही दे दिए।

श्लोक 47 (skanda.4.9.47)

किं किं न सविता सूते काले सम्यगुपासितः । आयुरारोग्यमैश्वर्यं वसूनि सपशूनि च

kiṁ kiṁ na savitā sūte kāle samyagupāsitaḥ āyurārogyamaiśvaryaṁ vasūni sapaśūni ca

काल में सम्यक् उपासित सविता क्या नहीं देते? आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और पशु —

श्लोक 48 (skanda.4.9.48)

मित्रपुत्र कलत्राणि क्षेत्राणि विविधानि च । भोगानष्टविधांश्चापि स्वर्गं चाप्यपवर्गकम्

mitraputra kalatrāṇi kṣetrāṇi vividhāni ca bhogānaṣṭavidhāṁścāpi svargaṁ cāpyapavargakam

मित्र, पुत्र, पत्नी, नाना प्रकार के क्षेत्र, आठों प्रकार के भोग, स्वर्ग और मोक्ष तक भी —

श्लोक 49 (skanda.4.9.49)

अष्टादश सुविद्यासु मीमांसातिगरीयसी । ततोपि तर्कशास्त्राणि पुराणं तेभ्य एव च

aṣṭādaśa suvidyāsu mīmāṁsātigarīyasī tatopi tarkaśāstrāṇi purāṇaṁ tebhya eva ca

अठारह विद्याओं में मीमांसा सर्वाधिक गुरुतर है, उससे भी अधिक तर्कशास्त्र, और उनसे भी अधिक पुराण गुरुतर हैं;

श्लोक 50 (skanda.4.9.50)

ततोपि धर्मशास्त्राणि तेभ्यो गुर्वी श्रुतिर्द्विज । ततोप्युपनिषच्छ्रेष्ठा गायत्री च ततोधिका

tatopi dharmaśāstrāṇi tebhyo gurvī śrutirdvija tatopyupaniṣacchreṣṭhā gāyatrī ca tatodhikā

उनसे भी अधिक धर्मशास्त्र, और हे द्विज, उनसे भी गुरुतर श्रुति है; उससे भी श्रेष्ठ उपनिषद हैं, और उनसे भी अधिक गायत्री है।

श्लोक 51 (skanda.4.9.51)

दुर्लभा सर्वमंत्रेषु गायत्री प्रणवान्विता । न गायत्र्याधिकं किंचित्त्रयीषु परिगीयते

durlabhā sarvamaṁtreṣu gāyatrī praṇavānvitā na gāyatryādhikaṁ kiṁcittrayīṣu parigīyate

समस्त मंत्रों में प्रणवयुक्त गायत्री दुर्लभ है; त्रयी (तीनों वेदों) में गायत्री से अधिक कुछ भी नहीं गाया गया है।

श्लोक 52 (skanda.4.9.52)

न गायत्री समो मंत्रो न काशी सदृशी पुरी । न विश्वेश समं लिंगं सत्यंसत्यं पुनःपुनः

na gāyatrī samo maṁtro na kāśī sadṛśī purī na viśveśa samaṁ liṁgaṁ satyaṁsatyaṁ punaḥpunaḥ

गायत्री के समान कोई मंत्र नहीं, काशी के समान कोई नगरी नहीं, विश्वेश्वर के समान कोई लिंग नहीं — यह सत्य है, सत्य है, बार-बार सत्य है।

श्लोक 53 (skanda.4.9.53)

गायत्री वेदजननी गायत्री ब्राह्मणप्रसूः । गातारं त्रायते यस्माद्गायत्री तेन गीयते

gāyatrī vedajananī gāyatrī brāhmaṇaprasūḥ gātāraṁ trāyate yasmādgāyatrī tena gīyate

गायत्री वेदों की जननी हैं, गायत्री ब्राह्मणत्व की उत्पत्ति-स्थान हैं; क्योंकि वे अपने गाने वाले (गाता) का त्राण करती हैं, इसीलिए वे 'गायत्री' कही जाती हैं।

श्लोक 54 (skanda.4.9.54)

वाच्यवाचकसंबंधो गायत्र्याः सवितुर्द्वयोः । वाच्योसौ सविता साक्षाद्गायत्रीवाचिकापरा

vācyavācakasaṁbaṁdho gāyatryāḥ saviturdvayoḥ vācyosau savitā sākṣādgāyatrīvācikāparā

गायत्री और सविता, इन दोनों के बीच वाच्य-वाचक का संबंध है: सविता साक्षात् वाच्य (कहा जाने वाला अर्थ) हैं, और गायत्री उनकी वाचिका (कहने वाली वाणी) है।

श्लोक 55 (skanda.4.9.55)

प्रभावेणैव गायत्र्याः क्षत्रियः कौशिको वशी । राजर्षित्वं परित्यज्य ब्रह्मर्षिपदमीयिवान्

prabhāveṇaiva gāyatryāḥ kṣatriyaḥ kauśiko vaśī rājarṣitvaṁ parityajya brahmarṣipadamīyivān

गायत्री के प्रभाव से ही संयमी क्षत्रिय कौशिक (विश्वामित्र) ने राजर्षित्व को त्यागकर ब्रह्मर्षि-पद प्राप्त किया;

श्लोक 56 (skanda.4.9.56)

सामर्थ्यं प्राप चात्युच्चैरन्यद्भुवनसर्जने । किं किं न दद्याद्गायत्री सम्यगेवमुपासिता

sāmarthyaṁ prāpa cātyuccairanyadbhuvanasarjane kiṁ kiṁ na dadyādgāyatrī samyagevamupāsitā

और उन्होंने एक अन्य सृष्टि की रचना करने में भी अत्यंत उच्च सामर्थ्य प्राप्त कर लिया। सम्यक् उपासित गायत्री क्या-क्या न दे सके?

श्लोक 57 (skanda.4.9.57)

न ब्राह्मणो वेदपाठान्न शास्त्रपठनादपि । देव्यास्त्रिकालमभ्यासाद्बाह्मणः स्याद्धि नान्यथा

na brāhmaṇo vedapāṭhānna śāstrapaṭhanādapi devyāstrikālamabhyāsādbāhmaṇaḥ syāddhi nānyathā

न वेदपाठ से, न शास्त्रपठन से ही कोई ब्राह्मण होता है — केवल देवी (गायत्री) के त्रिकाल अभ्यास से ही ब्राह्मण होता है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 58 (skanda.4.9.58)

गायत्र्येव परं विष्णुर्गायत्र्येव परःशिवः । गायत्र्येव परोब्रह्मा गायत्र्येव त्रयी ततः

gāyatryeva paraṁ viṣṇurgāyatryeva paraḥśivaḥ gāyatryeva parobrahmā gāyatryeva trayī tataḥ

गायत्री ही परम विष्णु हैं, गायत्री ही परम शिव हैं, गायत्री ही परम ब्रह्मा हैं; अतः गायत्री ही त्रयी (तीनों वेद) है।

श्लोक 59 (skanda.4.9.59)

देवत्रयं स भगवानंशुमाली दिवाकरः । सर्वेषां महसां राशिः कालकालप्रवर्तकः

devatrayaṁ sa bhagavānaṁśumālī divākaraḥ sarveṣāṁ mahasāṁ rāśiḥ kālakālapravartakaḥ

वे भगवान अंशुमाली दिवाकर स्वयं त्रिदेव-स्वरूप हैं; वे समस्त तेजों की राशि हैं, तथा काल के भी काल के प्रवर्तक हैं।

श्लोक 60 (skanda.4.9.60)

अर्कमुद्दिश्य सततमस्मल्लोकनिवासिनः । श्रुतिं ह्युदाहरंतीमां सारासारविवेकिनः

arkamuddiśya satatamasmallokanivāsinaḥ śrutiṁ hyudāharaṁtīmāṁ sārāsāravivekinaḥ

इस लोक में निवास करने वाले सारासार का विवेक रखने वाले पुरुष सूर्य को उद्दिष्ट करके सदा इस श्रुति का उच्चारण करते हैं —

श्लोक 61 (skanda.4.9.61)

एषो ह देवः प्रदिशोनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अंतः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जानास्तिष्ठति सर्वतोमुखः

eṣo ha devaḥ pradiśonu sarvāḥ pūrvo ha jātaḥ sa u garbhe aṁtaḥ sa eva jātaḥ sa janiṣyamāṇaḥ pratyaṅjānāstiṣṭhati sarvatomukhaḥ

'यह देव समस्त दिशाओं में व्याप्त हैं; ये पहले उत्पन्न हुए, और गर्भ के भीतर भी यही हैं; यही उत्पन्न हुए हैं और यही उत्पन्न होने वाले हैं; समस्त प्राणियों के सम्मुख सभी दिशाओं की ओर मुख किए हुए स्थित हैं।'

श्लोक 62 (skanda.4.9.62)

सदैवमुपतिष्ठेरन्सौरसूक्तैरतंद्रिताः । ये नमंत्यत्र ते विप्रा विप्रा भास्करसन्निभाः

sadaivamupatiṣṭheransaurasūktairataṁdritāḥ ye namaṁtyatra te viprā viprā bhāskarasannibhāḥ

जो अतंद्रित होकर सूर्य-सूक्तों से सदा इस प्रकार उपासना करते हुए प्रणाम करते हैं, वे विप्र सूर्य के समान तेजस्वी विप्र बन जाते हैं।

श्लोक 63 (skanda.4.9.63)

पुष्यार्केप्यथ हस्तार्के मूलार्केप्यथवा द्विज । उत्तरार्केऽथ यत्कार्यं तत्फलत्येव नान्यथा

puṣyārkepyatha hastārke mūlārkepyathavā dvija uttarārke'tha yatkāryaṁ tatphalatyeva nānyathā

हे द्विज, पुष्य, हस्त, मूल अथवा उत्तरा नक्षत्र में पड़ने वाले रविवार को जो भी कर्म किया जाता है, वह अवश्य फलित होता है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 64 (skanda.4.9.64)

पौषे मास्यर्कदिवसे यः स्नात्वा भास्करोदये । दानहोमंजपंकुर्यादर्चामर्कस्य सुव्रत

pauṣe māsyarkadivase yaḥ snātvā bhāskarodaye dānahomaṁjapaṁkuryādarcāmarkasya suvrata

हे सुव्रत, जो पौष मास के रविवार को सूर्योदय के समय स्नान करके दान, होम, जप और सूर्य की अर्चा करता है,

श्लोक 65 (skanda.4.9.65)

श्रद्धावानेकभक्तश्च कामक्रोधविवर्जितः । सहाप्सरोभिर्द्युतिमान्स वसेदत्र भोगवान्

śraddhāvānekabhaktaśca kāmakrodhavivarjitaḥ sahāpsarobhirdyutimānsa vasedatra bhogavān

श्रद्धावान, एकभुक्त तथा काम-क्रोध से रहित रहकर, वह द्युतिमान पुरुष अप्सराओं के साथ भोगयुक्त होकर यहाँ निवास करता है।

श्लोक 66 (skanda.4.9.66)

अयने विषुवे चापि षडशीतिमुखेषु वा । विष्णुपद्यां च ये दद्युर्महादानानि सुव्रताः

ayane viṣuve cāpi ṣaḍaśītimukheṣu vā viṣṇupadyāṁ ca ye dadyurmahādānāni suvratāḥ

जो सुव्रत पुरुष अयन में, विषुव में, अथवा षडशीति (छियासी संक्रांतियों) के अवसरों पर, तथा विष्णुपदी तिथि पर महादान देते हैं,

श्लोक 67 (skanda.4.9.67)

तिलाञ्जुह्वति साज्यांश्च ब्राह्मणान्भोजयंति च । पितॄनुद्दिश्य च श्राद्धं ये कुर्वंति विपश्चितः

tilāñjuhvati sājyāṁśca brāhmaṇānbhojayaṁti ca pitṝnuddiśya ca śrāddhaṁ ye kurvaṁti vipaścitaḥ

जो घी से युक्त तिलों की आहुति देते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, तथा जो विद्वान पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करते हैं,

श्लोक 68 (skanda.4.9.68)

महापूजां च ये कुर्युर्महामंत्राञ्जपंति च । तेऽत्र वैकर्तने लोके विकर्तनसमप्रभा

mahāpūjāṁ ca ye kuryurmahāmaṁtrāñjapaṁti ca te'tra vaikartane loke vikartanasamaprabhā

और जो महापूजा करते हैं तथा महामंत्रों का जप करते हैं — वे इस वैकर्तन लोक में विकर्तन (सूर्य) के समान प्रभावाले होते हैं।

श्लोक 69 (skanda.4.9.69)

न दरिद्रा न च दुःखार्ता न व्याधि परिपीडिताः । संक्रमेष्वर्कभक्ता ये न विरूपा न दुर्भगाः

na daridrā na ca duḥkhārtā na vyādhi paripīḍitāḥ saṁkrameṣvarkabhaktā ye na virūpā na durbhagāḥ

संक्रांतियों में सूर्य के भक्त कभी दरिद्र नहीं होते, न दुःखार्त होते हैं, न व्याधि से पीड़ित होते हैं, न विरूप होते हैं, न दुर्भाग्यशाली होते हैं।

श्लोक 70 (skanda.4.9.70)

संक्रमेषु न यैर्दत्तं न स्नातं तीर्थवारिषु। विशेषहोमो न कृतः कपिलाज्याप्लुतैस्तिलैः

saṁkrameṣu na yairdattaṁ na snātaṁ tīrthavāriṣu viśeṣahomo na kṛtaḥ kapilājyāplutaistilaiḥ

किन्तु जिन्होंने संक्रांतियों में कुछ दान नहीं दिया, तीर्थजल में स्नान नहीं किया, तथा कपिला गाय के घी में डुबोए तिलों से विशेष होम नहीं किया —

श्लोक 71 (skanda.4.9.71)

ते दृश्यंते प्रतिद्वारं विहीन नयनाननाः । देहिदेहीति जल्पंतो देहिनः सपटच्चराः

te dṛśyaṁte pratidvāraṁ vihīna nayanānanāḥ dehidehīti jalpaṁto dehinaḥ sapaṭaccarāḥ

वे प्रत्येक द्वार पर नेत्रहीन मुखवाले, 'दो, दो' पुकारते हुए, फटे-चिथड़े पहने भिखारी के रूप में दिखाई देते हैं।

श्लोक 72 (skanda.4.9.72)

समं कृष्णलकेनापि यो दद्यात्कांचनं कृती । सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे स वसेदत्र पुण्यभाक्

samaṁ kṛṣṇalakenāpi yo dadyātkāṁcanaṁ kṛtī sūryagrahe kurukṣetre sa vasedatra puṇyabhāk

जो कृती पुरुष सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में एक कृष्णल के बराबर भी सुवर्ण देता है, वह पुण्यभागी होकर यहाँ निवास करता है।

श्लोक 73 (skanda.4.9.73)

सर्वं गंगासमं तोयं सर्वे ब्रह्मसमा द्विजाः । सर्वं देयं स्वर्णसमं राहुग्रस्ते दिवाकरे

sarvaṁ gaṁgāsamaṁ toyaṁ sarve brahmasamā dvijāḥ sarvaṁ deyaṁ svarṇasamaṁ rāhugraste divākare

राहु द्वारा सूर्य के ग्रस्त होने पर सभी जल गंगाजल के समान, सभी द्विज ब्रह्मा के समान हो जाते हैं, तथा दिया गया प्रत्येक दान सुवर्ण के समान माना जाता है।

श्लोक 74 (skanda.4.9.74)

दत्तं जप्तं हुतं स्नातं यत्किंचित्सदनुष्ठितम्। भानूपरागे श्राद्धादि तद्धेतुर्ब्रध्न संनिधे

dattaṁ japtaṁ hutaṁ snātaṁ yatkiṁcitsadanuṣṭhitam bhānūparāge śrāddhādi taddheturbradhna saṁnidhe

सूर्यग्रहण के अवसर पर जो भी दान, जप, हवन, स्नान, श्राद्धादि सत्कर्म किया जाता है, वह सूर्य की उपस्थिति में महान पुण्य का हेतु बनता है।

श्लोक 75 (skanda.4.9.75)

रविवारे संक्रमश्चेदुपरागोऽथवाभवेत् । तदा यदर्जितं पुण्यं तदिहाक्षयमाप्यते

ravivāre saṁkramaśceduparāgo'thavābhavet tadā yadarjitaṁ puṇyaṁ tadihākṣayamāpyate

यदि रविवार को संक्रांति अथवा ग्रहण हो जाए, तो उस समय अर्जित पुण्य यहाँ अक्षय हो जाता है।

श्लोक 76 (skanda.4.9.76)

भानुवारो यदा षष्ठ्यां सप्तम्यामथ जायते । तदा यत्सुकृतं कर्म कृतं तदिह भुज्यते

bhānuvāro yadā ṣaṣṭhyāṁ saptamyāmatha jāyate tadā yatsukṛtaṁ karma kṛtaṁ tadiha bhujyate

जब रविवार षष्ठी अथवा सप्तमी तिथि को पड़ता है, तब उस समय किया गया शुभ कर्म यहाँ पूर्णरूप से भोगा जाता है।

श्लोक 77 (skanda.4.9.77)

हंसो भानुः सहस्रांशुस्तपनस्तापनो रवि । विकर्तनो विवस्वांश्च विश्वकर्मा विभावसुः

haṁso bhānuḥ sahasrāṁśustapanastāpano ravi vikartano vivasvāṁśca viśvakarmā vibhāvasuḥ

हंस, भानु, सहस्रांशु, तपन, तापन, रवि, विकर्तन, विवस्वान्, विश्वकर्मा, विभावसु —

श्लोक 78 (skanda.4.9.78)

विश्वरूपो विश्वकर्ता मार्तंडो मिहिरोंऽशुमान् । आदित्यश्चोष्णगुः सूर्योऽर्यमा ब्रध्नो दिवाकरः

viśvarūpo viśvakartā mārtaṁḍo mihiroṁ'śumān ādityaścoṣṇaguḥ sūryo'ryamā bradhno divākaraḥ

विश्वरूप, विश्वकर्ता, मार्तंड, मिहिर, अंशुमान्, आदित्य, उष्णगु, सूर्य, अर्यमा, ब्रध्न, दिवाकर —

श्लोक 79 (skanda.4.9.79)

द्वादशात्मा सप्तहयो भास्करो हस्करः खगः । सुरः प्रभाकरः श्रीमाँल्लोकचक्षुर्ग्रहेश्वरः

dvādaśātmā saptahayo bhāskaro haskaraḥ khagaḥ suraḥ prabhākaraḥ śrīmā~llokacakṣurgraheśvaraḥ

द्वादशात्मा, सप्तहय, भास्कर, हस्कर, खग, सुर, प्रभाकर, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर —

श्लोक 80 (skanda.4.9.80)

त्रिलोकेशो लोकसाक्षीतमोरिः शाश्वतः शुचिः । गभस्तिहस्तस्तीव्रांशुस्तरणिः सुमहोरणिः

trilokeśo lokasākṣītamoriḥ śāśvataḥ śuciḥ gabhastihastastīvrāṁśustaraṇiḥ sumahoraṇiḥ

त्रिलोकेश, लोकसाक्षी, तमोरि, शाश्वत, शुचि, गभस्तिहस्त, तीव्रांशु, तरणि, सुमहोरणि —

श्लोक 81 (skanda.4.9.81)

द्युमणिर्हरिदश्वोर्को भानुमान्भयनाशनः। छन्दोश्वो वेदवेद्यश्च भास्वान्पूषा वृषाकपिः

dyumaṇirharidaśvorko bhānumānbhayanāśanaḥ chandośvo vedavedyaśca bhāsvānpūṣā vṛṣākapiḥ

द्युमणि, हरिदश्व, अर्क, भानुमान्, भयनाशन, छन्दोश्व, वेदवेद्य, भास्वान्, पूषा, वृषाकपि —

श्लोक 82 (skanda.4.9.82)

एकचक्ररथो मित्रो मंदेहारिस्तमिस्रहा । दैत्यहा पापहर्ता च धर्मोधर्म प्रकाशकः

ekacakraratho mitro maṁdehāristamisrahā daityahā pāpahartā ca dharmodharma prakāśakaḥ

एकचक्ररथ, मित्र, मंदेहारि, तमिस्रहा, दैत्यहा, पापहर्ता, तथा धर्माधर्म-प्रकाशक —

श्लोक 83 (skanda.4.9.83)

हेलिकश्चित्रभानुश्च कलिघ्नस्तार्क्ष्यवाहनः । दिक्पतिः पद्मिनीनाथः कुशेशयकरो हरिः

helikaścitrabhānuśca kalighnastārkṣyavāhanaḥ dikpatiḥ padminīnāthaḥ kuśeśayakaro hariḥ

हेलिक, चित्रभानु, कलिघ्न, तार्क्ष्यवाहन, दिक्पति, पद्मिनीनाथ, कुशेशयकर, हरि —

श्लोक 84 (skanda.4.9.84)

घर्मरश्मिर्दुर्निरीक्ष्यश्चंडांशुः कश्यपात्मजः । एभिः सप्ततिसंख्याकैः पुण्यैः सूर्यस्य नामभिः

gharmaraśmirdurnirīkṣyaścaṁḍāṁśuḥ kaśyapātmajaḥ ebhiḥ saptatisaṁkhyākaiḥ puṇyaiḥ sūryasya nāmabhiḥ

घर्मरश्मि, दुर्निरीक्ष्य, चंडांशु, कश्यपात्मज — इन सूर्य के सत्तर पुण्य नामों के द्वारा,

श्लोक 85 (skanda.4.9.85)

प्रणवादि चतुर्थ्यंतैर्नमस्कार समन्वितैः । प्रत्येकमुच्चरन्नाम दृष्ट्वादृष्ट्वा दिवाकरम्

praṇavādi caturthyaṁtairnamaskāra samanvitaiḥ pratyekamuccarannāma dṛṣṭvādṛṣṭvā divākaram

प्रत्येक नाम को प्रणवादि तथा चतुर्थ्यंत रूप में, नमस्कार सहित उच्चारण करते हुए, चाहे सूर्य दिखाई दें या न दिखाई दें,

श्लोक 86 (skanda.4.9.86)

विगृह्य पाणियुग्मेन ताम्रपात्रं सुनिर्मलम् । जानुभ्यामवनिं गत्वा परिपूर्य जलेन च

vigṛhya pāṇiyugmena tāmrapātraṁ sunirmalam jānubhyāmavaniṁ gatvā paripūrya jalena ca

दोनों हाथों से स्वच्छ ताम्रपात्र को ग्रहण करके, दोनों घुटनों से भूमि पर बैठकर, तथा उसे जल से भरकर,

श्लोक 87 (skanda.4.9.87)

करवीरादि कुसुमै रक्तचंदनमिश्रितैः । दूर्वांकुरैरक्षतैश्च निक्षिप्तैः पात्रमध्यतः

karavīrādi kusumai raktacaṁdanamiśritaiḥ dūrvāṁkurairakṣataiśca nikṣiptaiḥ pātramadhyataḥ

करवीरादि पुष्पों को लाल चन्दन से मिलाकर, दूर्वांकुर और अक्षतों को पात्र के मध्य में रखकर,

श्लोक 88 (skanda.4.9.88)

दद्यादर्घ्यमनर्घ्याय सवित्रे ध्यानपूर्वकम् । उपमौलि समानीय तत्पात्रं नान्यदृङ्मनाः

dadyādarghyamanarghyāya savitre dhyānapūrvakam upamauli samānīya tatpātraṁ nānyadṛṅmanāḥ

अनर्घ्य सविता को ध्यानपूर्वक अर्घ्य देना चाहिए, पात्र को सिर के समीप ले जाकर, मन और दृष्टि को अन्यत्र न लगाते हुए,

श्लोक 89 (skanda.4.9.89)

प्रतिमंत्रं नमस्कुर्यादुदयास्तमये रविम् । अनया नामसप्तत्या महामंत्ररहस्यया

pratimaṁtraṁ namaskuryādudayāstamaye ravim anayā nāmasaptatyā mahāmaṁtrarahasyayā

तथा उदय और अस्त के समय प्रत्येक मंत्र से सूर्य को नमस्कार करे — इस महामंत्र-रहस्यभूत सत्तर नामों के द्वारा।

श्लोक 90 (skanda.4.9.90)

एवं कुर्वन्नरो जातु न दरिद्रो न दुःखभाक् । व्याधिभिर्मुच्यते घोरैरपिजन्मांतरार्जितैः

evaṁ kurvannaro jātu na daridro na duḥkhabhāk vyādhibhirmucyate ghorairapijanmāṁtarārjitaiḥ

इस प्रकार आचरण करने वाला मनुष्य कभी दरिद्र नहीं होता, न दुःखभागी होता है; वह जन्मांतर में अर्जित घोर व्याधियों से भी मुक्त हो जाता है।

श्लोक 91 (skanda.4.9.91)

विनौषधैर्विना वैद्यैर्विनापथ्यपरिग्रहैः । कालेन निधनं प्राप्तः सूर्यलोके महीयते

vinauṣadhairvinā vaidyairvināpathyaparigrahaiḥ kālena nidhanaṁ prāptaḥ sūryaloke mahīyate

बिना औषधि, बिना वैद्य, बिना पथ्य के भी, काल आने पर मृत्यु को प्राप्त होकर वह सूर्यलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 92 (skanda.4.9.92)

इत्येकदेशः कथितो भानुलोकस्य सत्तम । महातेजोनिधेरस्य कोविशेषमवैत्यहो

ityekadeśaḥ kathito bhānulokasya sattama mahātejonidherasya koviśeṣamavaityaho

हे सत्तम, इस प्रकार भानुलोक का एक अंश ही कहा गया; अहो, इस महातेजोनिधि की विशेषता को कौन जान सकता है?

श्लोक 93 (skanda.4.9.93)

स्वकर्णविषयीकुर्वन्नितिपुण्यकथामिमाम् । क्षणादालोकयांचक्रे महेंद्रस्य महापुरीम्

svakarṇaviṣayīkurvannitipuṇyakathāmimām kṣaṇādālokayāṁcakre maheṁdrasya mahāpurīm

इस पुण्यकथा को अपने कानों का विषय बनाते हुए, उसने क्षणभर में ही महेन्द्र की महापुरी को देख लिया।

श्लोक 94 (skanda.4.9.94)

अगस्तिरुवाच । श्रुत्वा सौरीं कथमेतामप्सरोलोकसंयुताम् । न दरिद्रो भवेत्क्वापि नाधर्मेषु प्रवर्तते

agastiruvāca śrutvā saurīṁ kathametāmapsarolokasaṁyutām na daridro bhavetkvāpi nādharmeṣu pravartate

अगस्त्य ने कहा — अप्सरालोक सहित इस सौर कथा को सुनकर मनुष्य कहीं भी दरिद्र नहीं होता, और अधर्म में प्रवृत्त नहीं होता।

श्लोक 95 (skanda.4.9.95)

ब्राह्मणैः सततं श्राव्यमिदमाख्यानमुत्तमम् । वेदपाठेन यत्पुण्यं तत्पुण्यफलदायकम्

brāhmaṇaiḥ satataṁ śrāvyamidamākhyānamuttamam vedapāṭhena yatpuṇyaṁ tatpuṇyaphaladāyakam

ब्राह्मणों को यह उत्तम आख्यान सदा सुनना चाहिए; वेदपाठ से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्यफल यह प्रदान करता है।

श्लोक 96 (skanda.4.9.96)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शृण्वंतोऽध्यायमुत्तमम् । पातकानि विसृज्येह गतिं यास्यंत्यनुत्तमाम्

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śṛṇvaṁto'dhyāyamuttamam pātakāni visṛjyeha gatiṁ yāsyaṁtyanuttamām

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इस उत्तम अध्याय को सुनते हुए, यहाँ अपने पापों को त्यागकर, सर्वोत्तम गति को प्राप्त करेंगे।

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