काशी खण्ड · अध्याय 91
गंगेश्वर-महिमाख्यान
श्लोक 1 (skanda.4.91.1)
।। स्कंद उवाच ।। ।। पार्वतीशस्य महिमा कथितस्ते मयानघ ।। मुने निशामयेदानीं गंगेश्वरसमुद्भवम्
|| skaṁda uvāca || || pārvatīśasya mahimā kathitaste mayānagha || mune niśāmayedānīṁ gaṁgeśvarasamudbhavam
स्कन्द ने कहा — पार्वतीश की महिमा तुम्हें मैंने बता दी, हे निष्पाप; अब, हे मुने, गंगेश्वर की उत्पत्ति सुनो।
श्लोक 2 (skanda.4.91.2)
यं श्रुत्वा यत्रकुत्रापि गंगास्नानफलं लभेत् ।। चक्रपुष्करिणीतीर्थं यदा गंगा समागता ।।
yaṁ śrutvā yatrakutrāpi gaṁgāsnānaphalaṁ labhet || cakrapuṣkariṇītīrthaṁ yadā gaṁgā samāgatā ||
जिसे सुनकर मनुष्य कहीं भी हो, गंगा-स्नान का फल पाता है। जब गंगा चक्रपुष्करिणी तीर्थ में आईं,
श्लोक 3 (skanda.4.91.3)
तेन दैलीपिना सार्धमस्मिन्नानंदकानने ।। क्षेत्रप्रभावमतुलं ज्ञात्वा शंभुपरिग्रहात्
tena dailīpinā sārdhamasminnānaṁdakānane || kṣetraprabhāvamatulaṁ jñātvā śaṁbhuparigrahāt
उस दिलीप-पुत्र (भगीरथ) के साथ इस आनन्द-कानन में, शम्भु के अनुग्रह से क्षेत्र के अतुल प्रभाव को जानकर,
श्लोक 4 (skanda.4.91.4)
स्मृत्वा लिंगप्रतिष्ठायाः काश्यां लोकोत्तरं फलम् ।। गंगया स्थापितं लिंगं विश्वेशात्पूर्वतः शुभम्
smṛtvā liṁgapratiṣṭhāyāḥ kāśyāṁ lokottaraṁ phalam || gaṁgayā sthāpitaṁ liṁgaṁ viśveśātpūrvataḥ śubham
काशी में लिंग-प्रतिष्ठा के लोकोत्तर फल का स्मरण करके, गंगा ने विश्वेश से पूर्व दिशा में एक शुभ लिंग स्थापित किया।
श्लोक 5 (skanda.4.91.5)
गंगेश्वरस्य लिंगस्य काश्यां दृष्टिः सुदुर्लभा ।। तिथौ दशहरायां च यो गंगेशं समर्चयेत्
gaṁgeśvarasya liṁgasya kāśyāṁ dṛṣṭiḥ sudurlabhā || tithau daśaharāyāṁ ca yo gaṁgeśaṁ samarcayet
काशी में गंगेश्वर लिंग का दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है। दशहरा तिथि को जो गंगेश की भलीभाँति पूजा करेगा,
श्लोक 6 (skanda.4.91.6)
तस्य जन्मसहस्रस्य पापं संक्षीयते क्षणात् ।। कलौ गंगेश्वरं लिंगं गुप्तप्रायं भविष्यति
tasya janmasahasrasya pāpaṁ saṁkṣīyate kṣaṇāt || kalau gaṁgeśvaraṁ liṁgaṁ guptaprāyaṁ bhaviṣyati
उसके हज़ार जन्मों का पाप क्षण भर में क्षीण हो जाता है। कलियुग में गंगेश्वर लिंग प्रायः गुप्त-सा हो जाएगा।
श्लोक 7 (skanda.4.91.7)
तस्य संदर्शनं पुंसां जायते पुण्यहेतवे ।। दृष्टं गंगेश्वरं लिंगं येन काश्यां सुदुर्लभम्
tasya saṁdarśanaṁ puṁsāṁ jāyate puṇyahetave || dṛṣṭaṁ gaṁgeśvaraṁ liṁgaṁ yena kāśyāṁ sudurlabham
उसका दर्शन मनुष्यों के लिए पुण्य का हेतु बनता है; जिसने काशी में अत्यन्त दुर्लभ गंगेश्वर लिंग देखा है,
श्लोक 8 (skanda.4.91.8)
प्रत्यक्षरूपिणी गंगा तेन दृष्टा न संशयः ।। कलौ सुदुर्लभा गंगा सर्वकल्मषहारिणी
pratyakṣarūpiṇī gaṁgā tena dṛṣṭā na saṁśayaḥ || kalau sudurlabhā gaṁgā sarvakalmaṣahāriṇī
उसने साक्षात्-रूपिणी गंगा को ही देखा है, इसमें संशय नहीं। कलियुग में सर्व-पाप-हारिणी गंगा अत्यन्त दुर्लभ —
श्लोक 9 (skanda.4.91.9)
भविष्यति न संदेहो मित्रावरुणनंदन।। ततोपि तिष्ये संप्राप्ते काश्यत्यंतं सुदुर्लभा
bhaviṣyati na saṁdeho mitrāvaruṇanaṁdana|| tatopi tiṣye saṁprāpte kāśyatyaṁtaṁ sudurlabhā
— होगी, इसमें संशय नहीं है, हे मित्रावरुण-नन्दन (अगस्त्य)। उससे भी अधिक, तिष्य (पुष्य नक्षत्र) आने पर काशी में वह अत्यन्त दुर्लभ हो जाती है।
श्लोक 10 (skanda.4.91.10)
ततोपि दुर्लभं काश्यां लिंगं गंगेश्वराभिधम् ।। यस्य संदर्शनं पुंसां भवेत्पापक्षयाय वै
tatopi durlabhaṁ kāśyāṁ liṁgaṁ gaṁgeśvarābhidham || yasya saṁdarśanaṁ puṁsāṁ bhavetpāpakṣayāya vai
उससे भी दुर्लभ है काशी में 'गंगेश्वर' नामक लिंग, जिसका दर्शन मनुष्यों के पापों के क्षय के लिए होता है।
श्लोक 11 (skanda.4.91.11)
श्रुत्वा गंगेश माहात्म्यं न नरो निरयी भवेत् ।। लभेच्च पुण्यसंभारं चिंतितं चाधिगच्छति
śrutvā gaṁgeśa māhātmyaṁ na naro nirayī bhavet || labhecca puṇyasaṁbhāraṁ ciṁtitaṁ cādhigacchati
गंगेश की यह महिमा सुनकर मनुष्य नरक-गामी नहीं होता, और पुण्य-राशि पाकर जो चाहे वह प्राप्त कर लेता है।