काशी खण्ड · अध्याय 92
नर्मदेश्वराख्यान
श्लोक 1 (skanda.4.92.1)
।। स्कंद उवाच ।। ।। नर्मदेशस्य माहात्म्यं कथयामि मुने तव ।। यस्य स्मरणमात्रेण महापातकसंक्षयः
|| skaṁda uvāca || || narmadeśasya māhātmyaṁ kathayāmi mune tava || yasya smaraṇamātreṇa mahāpātakasaṁkṣayaḥ
स्कन्द ने कहा — नर्मदेश की महिमा मैं तुम्हें बताता हूँ, हे मुने, जिसके स्मरण मात्र से महापातकों का नाश हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.4.92.2)
अस्य वाराहकल्पस्य प्रवेशे मुनिपुंगवैः ।। आपृच्छि का सरिच्छ्रेष्ठा वद तां त्वं मृकंडज
asya vārāhakalpasya praveśe munipuṁgavaiḥ || āpṛcchi kā saricchreṣṭhā vada tāṁ tvaṁ mṛkaṁḍaja
इस वाराह-कल्प के आरम्भ में श्रेष्ठ मुनियों ने पूछा था — कौन-सी नदी सर्वश्रेष्ठ है? हे मृकण्डु-पुत्र, वह मुझे बताओ।
श्लोक 3 (skanda.4.92.3)
मार्कंडेय उवाच ।। ।। शृणुध्वं मुनयः सर्वे संति नद्यः परःशतम् ।। सर्वा अप्यघहारिण्यः सर्वा अपि वृषप्रदाः
mārkaṁḍeya uvāca || || śṛṇudhvaṁ munayaḥ sarve saṁti nadyaḥ paraḥśatam || sarvā apyaghahāriṇyaḥ sarvā api vṛṣapradāḥ
मार्कण्डेय ने कहा — सुनो, हे सब मुनियो, सौ से अधिक नदियाँ हैं, सभी पाप हरने वाली, सभी धर्म देने वाली हैं।
श्लोक 4 (skanda.4.92.4)
सर्वाभ्योपि नदीभ्यश्च श्रेष्ठाः सर्वाः समुद्रगाः।। ततोपि हि महाश्रेष्ठाः सरित्सु सरिदुत्तमाः
sarvābhyopi nadībhyaśca śreṣṭhāḥ sarvāḥ samudragāḥ|| tatopi hi mahāśreṣṭhāḥ saritsu sariduttamāḥ
सभी नदियों में समुद्र में मिलने वाली नदियाँ श्रेष्ठ हैं; उनमें भी नदियों में महाश्रेष्ठ, उत्तम नदियाँ हैं —
श्लोक 5 (skanda.4.92.5)
गंगा च यमुनाचाथ नर्मदा च सरस्वती ।। चतुष्टयमिदं पुण्यं धुनीषु मुनिपुंगवाः
gaṁgā ca yamunācātha narmadā ca sarasvatī || catuṣṭayamidaṁ puṇyaṁ dhunīṣu munipuṁgavāḥ
— गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती — ये चार पुण्य नदियाँ हैं, हे मुनि-श्रेष्ठो।
श्लोक 6 (skanda.4.92.6)
ऋग्वेदमूर्तिर्गंगा स्याद्यमुना च यजुर्ध्रुवम् ।। नर्मदा साममूर्तिस्तु स्यादथर्वा सरस्वती
ṛgvedamūrtirgaṁgā syādyamunā ca yajurdhruvam || narmadā sāmamūrtistu syādatharvā sarasvatī
गंगा ऋग्वेद की मूर्ति है, यमुना निश्चय ही यजुर्वेद की; नर्मदा साम की मूर्ति है, और सरस्वती अथर्व की।
श्लोक 7 (skanda.4.92.7)
गंगा सर्वसरिद्योनिः समुद्रस्यापि पूरणी ।। गंगाया न लभेत्साम्यं काचिदत्र सरिद्वरा ।।
gaṁgā sarvasaridyoniḥ samudrasyāpi pūraṇī || gaṁgāyā na labhetsāmyaṁ kācidatra saridvarā ||
गंगा सब नदियों का उद्गम है, समुद्र को भी भरने वाली है; गंगा की समानता यहाँ कोई भी श्रेष्ठ नदी नहीं पा सकती।
श्लोक 8 (skanda.4.92.8)
किंतु पूर्वं तपस्तप्त्वा रेवया बह्वनेहसम् ।। वरदानोन्मुखो धाता प्रार्थितश्चेति सत्तम
kiṁtu pūrvaṁ tapastaptvā revayā bahvanehasam || varadānonmukho dhātā prārthitaśceti sattama
परन्तु पूर्वकाल में रेवा (नर्मदा) ने बहुत काल तक तप करके, वर देने को उद्यत ब्रह्मा से प्रार्थना की, हे सत्तम —
श्लोक 9 (skanda.4.92.9)
गंगा साम्यं विधे देहि प्रसन्नोसि यदि प्रभो ।। ब्रह्मणाथ ततः प्रोक्ता नर्मदा स्मितपूर्वकम्
gaṁgā sāmyaṁ vidhe dehi prasannosi yadi prabho || brahmaṇātha tataḥ proktā narmadā smitapūrvakam
"हे विधि, मुझे गंगा की समता दीजिए, यदि आप प्रसन्न हैं, हे प्रभो।" तब ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए नर्मदा से कहा —
श्लोक 10 (skanda.4.92.10)
यदि त्र्यक्षसमत्वं तु लभ्यतेऽन्येन केनचित् ।। तदा गंगासमत्वं च लभ्यते सरितान्यया
yadi tryakṣasamatvaṁ tu labhyate'nyena kenacit || tadā gaṁgāsamatvaṁ ca labhyate saritānyayā
"यदि त्र्यक्ष (शिव) की समानता किसी अन्य को प्राप्त हो सकती है, तभी किसी अन्य नदी को गंगा की समानता प्राप्त हो सकती है।"
श्लोक 11 (skanda.4.92.11)
पुरुषोत्तम तुल्यः स्यात्पुरुषोन्यो यदि क्वचित ।। स्रोतस्विनी तदा साम्यं लभते गंगया परा
puruṣottama tulyaḥ syātpuruṣonyo yadi kvacita || srotasvinī tadā sāmyaṁ labhate gaṁgayā parā
"यदि पुरुषोत्तम के तुल्य कोई अन्य पुरुष कहीं हो सके, तभी कोई श्रेष्ठ स्रोतस्विनी गंगा की समता पा सकेगी।"
श्लोक 12 (skanda.4.92.12)
यदि गौरी समा नारी क्वचिदन्या भवेदिह ।। अन्या धुनीह स्वर्धुन्यास्तदा साम्यमुपैष्यति
yadi gaurī samā nārī kvacidanyā bhavediha || anyā dhunīha svardhunyāstadā sāmyamupaiṣyati
"यदि गौरी के समान कोई अन्य नारी कहीं हो, तभी कोई अन्य नदी यहाँ स्वर्ग-नदी (गंगा) की समता पाएगी।"
श्लोक 13 (skanda.4.92.13)
यदि काशीपुरी तुल्या भवेदस्या क्वचित्पुरी ।। तदा स्वर्गतरंगिण्याः साम्यमन्या नदी लभेत्
yadi kāśīpurī tulyā bhavedasyā kvacitpurī || tadā svargataraṁgiṇyāḥ sāmyamanyā nadī labhet
"यदि काशी-पुरी के तुल्य कहीं कोई नगरी हो, तभी कोई अन्य नदी स्वर्ग-गंगा की समता पाएगी।"
श्लोक 14 (skanda.4.92.14)
निशम्येति विधेर्वाक्यं नर्मदा सरिदुत्तमा ।। धातुर्वरं परित्यज्य प्राप्ता वाराणसीं पुरीम्
niśamyeti vidhervākyaṁ narmadā sariduttamā || dhāturvaraṁ parityajya prāptā vārāṇasīṁ purīm
ब्रह्मा का यह वचन सुनकर, नदियों में श्रेष्ठ नर्मदा ने ब्रह्मा के वर को त्यागकर वाराणसी नगरी की यात्रा की।
श्लोक 15 (skanda.4.92.15)
सर्वेभ्योपि हि पुण्येभ्यः काश्यां लिंगप्रतिष्ठितेः ।। अपरा न समुद्दिष्टा कैश्चिच्छ्रेयस्करी क्रिया
sarvebhyopi hi puṇyebhyaḥ kāśyāṁ liṁgapratiṣṭhiteḥ || aparā na samuddiṣṭā kaiścicchreyaskarī kriyā
क्योंकि सभी पुण्य कर्मों में से काशी में लिंग-प्रतिष्ठा से बढ़कर किसी ने भी कोई अन्य कल्याणकारी क्रिया नहीं बताई है।
श्लोक 16 (skanda.4.92.16)
अथ सा नर्मदा पुण्या विधिपूर्वां प्रतिष्ठितिम् ।। व्यधात्पिलिपिलातीर्थे त्रिविषिष्टपसमीपतः
atha sā narmadā puṇyā vidhipūrvāṁ pratiṣṭhitim || vyadhātpilipilātīrthe triviṣiṣṭapasamīpataḥ
तब उस पुण्य नर्मदा ने त्रिविष्टप के निकट पिलिपिला-तीर्थ में विधिपूर्वक [लिंग की] प्रतिष्ठा की।
श्लोक 17 (skanda.4.92.17)
ततः शंभुः प्रसन्नोभूऽत्तस्यै नद्यै शुभात्मने ।। वरं वृणीष्व सुभगे यत्तुभ्यं रोचतेऽनघे
tataḥ śaṁbhuḥ prasannobhū'ttasyai nadyai śubhātmane || varaṁ vṛṇīṣva subhage yattubhyaṁ rocate'naghe
तब शम्भु उस शुभात्मा नदी पर प्रसन्न हुए — "वर माँगो, हे सुभगे, हे निष्पाप, जो तुम्हें रुचे।"
श्लोक 18 (skanda.4.92.18)
सरिद्वरा निशम्येति रेवा प्राह महेश्वरम् ।। किं वरेणेह देवेश भृशं तुच्छेन धूर्जटे ।।
saridvarā niśamyeti revā prāha maheśvaram || kiṁ vareṇeha deveśa bhṛśaṁ tucchena dhūrjaṭe ||
यह सुनकर नदियों में श्रेष्ठ रेवा ने महेश्वर से कहा — "यहाँ वर से क्या, हे धूर्जटे, वह तो अत्यन्त तुच्छ है।"
श्लोक 19 (skanda.4.92.19)
निर्द्वंद्वा त्वत्पदद्वंद्वे भक्तिरस्तु महेश्वर ।। श्रुत्वेति नितरां तुष्टो रेवागिरमनुत्तमाम्
nirdvaṁdvā tvatpadadvaṁdve bhaktirastu maheśvara || śrutveti nitarāṁ tuṣṭo revāgiramanuttamām
"आपके दोनों चरणों में मेरी निर्द्वन्द्व भक्ति हो, हे महेश्वर।" यह अत्यन्त उत्तम वचन सुनकर, अत्यन्त प्रसन्न होकर,
श्लोक 20 (skanda.4.92.20)
प्रोवाच च सरिच्छेष्ठे त्वयोक्तं यत्तथास्तु तत् ।। गृहाण पुण्यनिलये वितरामि वरांतरम्
provāca ca sariccheṣṭhe tvayoktaṁ yattathāstu tat || gṛhāṇa puṇyanilaye vitarāmi varāṁtaram
उन्होंने उस श्रेष्ठ नदी से कहा — "जो तुमने कहा, वैसा ही हो; हे पुण्य-निलये, ग्रहण करो, मैं एक और वर देता हूँ।"
श्लोक 21 (skanda.4.92.21)
यावंत्यो दृषदः संति तव रोधसि नर्मदे ।। तावंत्यो लिंगरूपिण्यो भविष्यंति वरान्मम
yāvaṁtyo dṛṣadaḥ saṁti tava rodhasi narmade || tāvaṁtyo liṁgarūpiṇyo bhaviṣyaṁti varānmama
"हे नर्मदे, तुम्हारे तट पर जितनी शिलाएँ हैं, वे सब मेरे वर से लिंग-रूप हो जाएँगी।"
श्लोक 22 (skanda.4.92.22)
अन्यं च ते वरं दद्या तमप्याकर्णयोत्तमम् ।। दुष्प्रापं यज्ञतपसां राशिभिः परमार्थतः
anyaṁ ca te varaṁ dadyā tamapyākarṇayottamam || duṣprāpaṁ yajñatapasāṁ rāśibhiḥ paramārthataḥ
"और मैं तुम्हें एक और वर दूँगा, उसे भी सुनो — वह उत्तम वर, यज्ञों और तपस्याओं की राशियों से भी परमार्थतः दुष्प्राप्य है।"
श्लोक 23 (skanda.4.92.23)
सद्यः पापहरा गंगा सप्ताहेन कलिंदजा ।। त्र्यहात्सरस्वती रेवे त्वं तु दर्शनमात्रतः ।।
sadyaḥ pāpaharā gaṁgā saptāhena kaliṁdajā || tryahātsarasvatī reve tvaṁ tu darśanamātrataḥ ||
"गंगा तत्काल पाप हरती है, कलिन्द-पुत्री (यमुना) सात दिन में, सरस्वती तीन दिन में; परन्तु तुम, हे रेवा, दर्शन-मात्र से ही।"
श्लोक 24 (skanda.4.92.24)
अपरं च वरं दद्यां नर्मदे दर्शनाघहे ।। भवत्या स्थापितं लिंगं नर्मदेश्वरसंजकम्
aparaṁ ca varaṁ dadyāṁ narmade darśanāghahe || bhavatyā sthāpitaṁ liṁgaṁ narmadeśvarasaṁjakam
"और एक और वर दूँगा, हे नर्मदे, दर्शन-मात्र से पाप हरने वाली — तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंग 'नर्मदेश्वर' नाम से प्रसिद्ध होगा।"
श्लोक 25 (skanda.4.92.25)
यत्तल्लिंगं महापुण्यं मुक्तिं दास्यति शाश्वतीम ।। अस्य लिंगस्य ये भक्तास्तान्दृष्ट्वा सूर्यनंदनः
yattalliṁgaṁ mahāpuṇyaṁ muktiṁ dāsyati śāśvatīma || asya liṁgasya ye bhaktāstāndṛṣṭvā sūryanaṁdanaḥ
"वह महापुण्य लिंग शाश्वत मुक्ति देगा। इस लिंग के जो भक्त हैं, उन्हें देखकर सूर्य-नन्दन (यम) —"
श्लोक 26 (skanda.4.92.26)
प्रणमिष्यंति यत्नेन महाश्रेयोभिवृद्धये ।। संति लिंगान्यनेकानि काश्यां देवि पदेपदे
praṇamiṣyaṁti yatnena mahāśreyobhivṛddhaye || saṁti liṁgānyanekāni kāśyāṁ devi padepade
"— महाकल्याण की वृद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक उन्हें प्रणाम करेगा। काशी में, हे देवी, पग-पग पर अनेक लिंग हैं,"
श्लोक 27 (skanda.4.92.27)
परं हि नर्मदेशस्य महिमा कोपि चाद्भुतः ।। इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तस्मिँल्लिंगे लयं ययौ
paraṁ hi narmadeśasya mahimā kopi cādbhutaḥ || ityuktvā devadeveśastasmi~lliṁge layaṁ yayau
"परन्तु नर्मदेश की महिमा तो कुछ अद्भुत ही है।" यह कहकर देवदेवेश उस लिंग में लीन हो गए।
श्लोक 28 (skanda.4.92.28)
नर्मदापि प्रहृष्टासीत्पावित्र्यं प्राप्य चाद्भुतम् ।। स्वदेशं च परिप्राप्ता दृष्टमात्राघहारिणी
narmadāpi prahṛṣṭāsītpāvitryaṁ prāpya cādbhutam || svadeśaṁ ca pariprāptā dṛṣṭamātrāghahāriṇī
नर्मदा भी अद्भुत पावित्र्य पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुई, और दर्शन-मात्र से पाप हरने वाली होकर अपने देश को लौट गई।
श्लोक 29 (skanda.4.92.29)
वाक्यं मृकंडजमुनेस्तेपि श्रुत्वा मुनीश्वराः ।। प्रहृष्टचेतसो जाताश्चक्रुः स्वं स्वं ततो हितम्
vākyaṁ mṛkaṁḍajamunestepi śrutvā munīśvarāḥ || prahṛṣṭacetaso jātāścakruḥ svaṁ svaṁ tato hitam
मृकण्डु-पुत्र मुनि (मार्कण्डेय) का यह वचन सुनकर वे मुनीश्वर भी प्रसन्न-चित्त होकर अपने-अपने कल्याण में लग गए।
श्लोक 30 (skanda.4.92.30)
।। स्कंद उवाच ।। ।। नर्मदेशस्य माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तियुतो नरः ।। पापकंचुकमुत्सृज्य प्राप्स्यति ज्ञानमुत्तमम्
|| skaṁda uvāca || || narmadeśasya māhātmyaṁ śrutvā bhaktiyuto naraḥ || pāpakaṁcukamutsṛjya prāpsyati jñānamuttamam
स्कन्द ने कहा — नर्मदेश की महिमा सुनकर भक्तियुक्त मनुष्य पाप के आवरण को त्यागकर उत्तम ज्ञान प्राप्त करेगा।