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अवन्ती खण्ड · अध्याय 132

सौभाग्येश्वर की महिमा

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

श्लोक 1 (skanda.5.132.1)

ईश्वर उवाच। एकषष्टितमं विद्धि सौभाग्येश्वरमीश्वरम्। यस्य दर्शनमात्रेण सौभाग्य मतुलं लभेत्॥

īśvara uvāca| ekaṣaṣṭitamaṁ viddhi saubhāgyeśvaramīśvaram| yasya darśanamātreṇa saubhāgya matulaṁ labhet||

ईश्वर ने कहा - हे देवी! इकसठवें ईश्वर सौभाग्येश्वर को जानो, जिनके दर्शनमात्र से अनुपम सौभाग्य प्राप्त होता है।

श्लोक 2 (skanda.5.132.2)

प्रधमं प्राकृते कल्पे राजाभूदश्ववाहनः। प्राग्ज्योतिषपुरे रम्ये धर्मात्मा कीर्त्तिवर्द्धनः॥

pradhamaṁ prākṛte kalpe rājābhūdaśvavāhanaḥ| prāgjyotiṣapure ramye dharmātmā kīrttivarddhanaḥ||

प्रथम, प्राकृत कल्प में, अश्ववाहन नामक एक राजा हुआ, जो रमणीय प्राग्ज्योतिषपुर में धर्मात्मा तथा कीर्ति बढ़ाने वाला था।

श्लोक 3 (skanda.5.132.3)

अनेकयज्ञकृत्प्राज्ञः संग्रामेष्वप राजितः। तस्य भार्या विशालाक्षि नाम्ना मदनमञ्जरी॥

anekayajñakṛtprājñaḥ saṁgrāmeṣvapa rājitaḥ| tasya bhāryā viśālākṣi nāmnā madanamañjarī||

वह अनेक यज्ञ करने वाला, प्राज्ञ और युद्धों में अपराजित था। हे विशालाक्षी! उसकी भार्या का नाम मदनमंजरी था।

श्लोक 4 (skanda.5.132.4)

काशिराजसुता सुभ्रू रूपेणातीव शोभना। दक्षा सुशीला धर्मिष्ठा गृहव्यापारको विदा॥

kāśirājasutā subhrū rūpeṇātīva śobhanā| dakṣā suśīlā dharmiṣṭhā gṛhavyāpārako vidā||

वह काशिराज की पुत्री थी, सुंदर भौंहों वाली, रूप में अत्यंत शोभायमान, कुशल, सुशील, धर्मपरायण तथा गृहकार्य में निपुण थी।

श्लोक 5 (skanda.5.132.5)

चतुःषष्टिकलायुक्ता सदा भर्तृहिते रता। पूर्णेन्दुवदना सौम्या सदा मधुरभाषिणी॥

catuḥṣaṣṭikalāyuktā sadā bhartṛhite ratā| pūrṇenduvadanā saumyā sadā madhurabhāṣiṇī||

वह चौंसठ कलाओं से युक्त थी, सदा अपने पति के हित में रत रहती थी, उसका मुख पूर्ण चंद्रमा के समान था, वह सौम्य स्वभाव की तथा सदा मधुरभाषिणी थी।

श्लोक 6 (skanda.5.132.6)

पूर्वकर्मवशाद्देवि दुर्भूगा समजायत। सा नेष्टा तस्य नृपतेर्नेत्रोद्वेगकरी सदा॥

pūrvakarmavaśāddevi durbhūgā samajāyata| sā neṣṭā tasya nṛpaternetrodvegakarī sadā||

किंतु हे देवी! पूर्वजन्म के कर्मों के वशीभूत होकर वह अभागिनी हो गई। वह उस राजा को प्रिय नहीं थी, और सदा उसके नेत्रों को उद्विग्न करने वाली थी।

श्लोक 7 (skanda.5.132.7)

श्रोत्रोद्वेगकरं वाक्यं तस्य राज्ञः करोति सा। ददाह लोचने राजस्तस्याः संदर्शनं सदा॥

śrotrodvegakaraṁ vākyaṁ tasya rājñaḥ karoti sā| dadāha locane rājastasyāḥ saṁdarśanaṁ sadā||

उसकी वाणी सदा राजा के कानों को उद्विग्न करती थी; उसका दर्शन सदा राजा के नेत्रों को जलाने वाला होता था।

श्लोक 8 (skanda.5.132.8)

मृर्छां प्राप्नोत्यसह्यां स तस्याः स्पर्शेन भूपतिः। कदा चालोकितो राजा तया प्रेम्णा वरानने। दह्यमानोऽतितीव्रेण वह्निना वाक्यमब्रवीत्॥

mṛrchāṁ prāpnotyasahyāṁ sa tasyāḥ sparśena bhūpatiḥ| kadā cālokito rājā tayā premṇā varānane| dahyamāno'titīvreṇa vahninā vākyamabravīt||

उसके स्पर्श मात्र से राजा असह्य मूर्च्छा को प्राप्त हो जाता था। हे वरानने! एक बार जब उस राजा को उसने प्रेमपूर्वक देखा, तो वह अत्यंत तीव्र अग्नि से जलता हुआ यह वचन बोला।

श्लोक 9 (skanda.5.132.9)

द्वास्थैतां दुर्भगां भार्यामादाय विपिने वने। परित्यजाशु नैतत्ते विचार्यं वचनं मम॥

dvāsthaitāṁ durbhagāṁ bhāryāmādāya vipine vane| parityajāśu naitatte vicāryaṁ vacanaṁ mama||

'हे द्वारपाल! इस अभागिनी भार्या को लेकर सघन वन में शीघ्र त्याग दो; मेरे इस वचन पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है।'

श्लोक 10 (skanda.5.132.10)

ततो नृपस्य वचनमविचार्यमवेक्ष्य सः। द्वास्थस्तत्याज तां सुभ्रूमारोप्य स्यंदनं वने॥

tato nṛpasya vacanamavicāryamavekṣya saḥ| dvāsthastatyāja tāṁ subhrūmāropya syaṁdanaṁ vane||

तब राजा के उस अखंडनीय वचन को देखकर द्वारपाल ने सुंदर भौंहों वाली उस रानी को रथ पर बिठाकर वन में त्याग दिया।

श्लोक 11 (skanda.5.132.11)

सा च त्यक्ता वने शून्ये रुदती च मुहुर्मुहुः। सस्मार तं महीपालं तममन्यत दैवतम्॥

sā ca tyaktā vane śūnye rudatī ca muhurmuhuḥ| sasmāra taṁ mahīpālaṁ tamamanyata daivatam||

वन में उस निर्जन स्थान पर त्यागी गई वह बार-बार रोती हुई, उस राजा का स्मरण करती रही और उसी को अपना देवता मानती रही।

श्लोक 12 (skanda.5.132.12)

अथ सा चारुसर्वांगी तत्रासक्तात्ममानसा। निश्वासपरमा निन्ये दिनशेषं तथा निशाम्॥

atha sā cārusarvāṁgī tatrāsaktātmamānasā| niśvāsaparamā ninye dinaśeṣaṁ tathā niśām||

फिर वह सर्वांगसुंदरी, अपने मन को उसी में आसक्त किए हुए, निरंतर निःश्वास लेते हुए शेष दिन तथा रात्रि व्यतीत करने लगी।

श्लोक 13 (skanda.5.132.13)

निश्वसन्त्यनवद्यांगी हाहेति रुदती मुहुः। मन्दभाग्येति चात्मानं निनिन्द मदिरेक्षणा॥

niśvasantyanavadyāṁgī hāheti rudatī muhuḥ| mandabhāgyeti cātmānaṁ nininda madirekṣaṇā||

वह निर्दोष अंगों वाली बार-बार 'हाय-हाय' कहकर रोती हुई निःश्वास लेती रही, और वह मदिर नेत्रों वाली स्वयं को अभागिनी कहकर धिक्कारती रही।

श्लोक 14 (skanda.5.132.14)

न विहारे न चाहारे रमणीये न तद्वने। न कन्दरेषु शैलानां सा बबन्ध तदा रतिम्। त्यक्ता तेन वरारोहे निनिन्द निजयौवनम्॥

na vihāre na cāhāre ramaṇīye na tadvane| na kandareṣu śailānāṁ sā babandha tadā ratim| tyaktā tena varārohe nininda nijayauvanam||

न विहार में, न भोजन में, न उस रमणीय वन में, न पर्वतों की कंदराओं में उसने तब अपनी रति बांधी; हे वरारोहे! उसके द्वारा त्यागी गई वह अपने ही यौवन को धिक्कारने लगी।

श्लोक 15 (skanda.5.132.15)

दुर्भगाहं क्व जातात्र दुष्टदैववशीकृता। कथं प्राप्तः स मे भर्त्ता तादृशो नृपस त्तमः॥

durbhagāhaṁ kva jātātra duṣṭadaivavaśīkṛtā| kathaṁ prāptaḥ sa me bharttā tādṛśo nṛpasa ttamaḥ||

वह कहने लगी - 'मैं अभागिनी कहां जन्मी, दुष्ट भाग्य के वशीभूत होकर! मुझे वैसा श्रेष्ठ राजा पति कैसे प्राप्त हुआ?'

श्लोक 16 (skanda.5.132.16)

धन्योऽयमतिपुण्योऽयं योऽयं यौवनगोचरः। अन्यासामसतीनां च रमिष्यति न संशयः॥

dhanyo'yamatipuṇyo'yaṁ yo'yaṁ yauvanagocaraḥ| anyāsāmasatīnāṁ ca ramiṣyati na saṁśayaḥ||

'धन्य है, अत्यंत पुण्यवान् है यह उसका यौवन, जो निश्चय ही अन्य असती स्त्रियों के साथ रमण करेगा।'

श्लोक 17 (skanda.5.132.17)

अभीष्टा कस्यचित्कांता कांतः कस्याश्चिदीप्सितः। परस्परानुरागाढयं दांपत्यमतिदुर्लभम्॥

abhīṣṭā kasyacitkāṁtā kāṁtaḥ kasyāścidīpsitaḥ| parasparānurāgāḍhayaṁ dāṁpatyamatidurlabham||

'किसी की प्रियतमा उसे अभीष्ट होती है, किसी की प्रियतम कोई कामना होती है; परस्पर अनुराग से युक्त दांपत्य अत्यंत दुर्लभ है।'

श्लोक 18 (skanda.5.132.18)

ममायं वल्लभो राजा न चाहं नृपवल्लभा। परस्परानुरागो हि धन्यानामेव जायते॥

mamāyaṁ vallabho rājā na cāhaṁ nṛpavallabhā| parasparānurāgo hi dhanyānāmeva jāyate||

'यह राजा मेरा प्रिय है, परंतु मैं राजा की प्रिय नहीं हूं; परस्पर अनुराग तो भाग्यवानों को ही प्राप्त होता है।'

श्लोक 19 (skanda.5.132.19)

यद्यद्य स महीपालो न मया संगमेष्यति। तत्कामाग्निरवश्यं मां क्षपयिष्यति दुःसहः॥

yadyadya sa mahīpālo na mayā saṁgameṣyati| tatkāmāgniravaśyaṁ māṁ kṣapayiṣyati duḥsahaḥ||

'यदि आज वह राजा मुझसे नहीं मिलेगा, तो यह असह्य कामाग्नि अवश्य ही मुझे भस्म कर देगी।'

श्लोक 20 (skanda.5.132.20)

रमणीयमभूद्यत्तु पुंस्कोकिलनिनादितम्। हीनं हि वल्लभेनैवं दहतीवाद्य मे वनम्॥

ramaṇīyamabhūdyattu puṁskokilanināditam| hīnaṁ hi vallabhenaivaṁ dahatīvādya me vanam||

'यह वन जो नर-कोकिल के कूजने से रमणीय था, आज प्रियतम से रहित होकर मानो मुझे जला रहा है।'

श्लोक 21 (skanda.5.132.21)

इत्थं सा मदनाविष्टा विलपन्ती पुनःपुनः। ददर्श तापसं तत्र त्रिकालज्ञं दृढव्रतम्॥

itthaṁ sā madanāviṣṭā vilapantī punaḥpunaḥ| dadarśa tāpasaṁ tatra trikālajñaṁ dṛḍhavratam||

इस प्रकार कामाविष्ट होकर बार-बार विलाप करती हुई उसने वहां त्रिकालज्ञ, दृढ़व्रती एक तपस्वी को देखा।

श्लोक 22 (skanda.5.132.22)

मेखलाजिनकौपीनदण्डकाष्ठोपजीवनम्। महौजसं महाभागं मुमुक्षुं मुनिपुंगवम्॥

mekhalājinakaupīnadaṇḍakāṣṭhopajīvanam| mahaujasaṁ mahābhāgaṁ mumukṣuṁ munipuṁgavam||

वह मेखला, मृगचर्म तथा कौपीन धारण किए हुए, दण्ड और काष्ठ पर निर्वाह करने वाला, महातेजस्वी, महाभाग, मुमुक्षु तथा मुनिश्रेष्ठ था।

श्लोक 23 (skanda.5.132.23)

उदयादित्यसंकाशं विभावसुसमद्युतिम्। तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय सा राज्ञी दुर्मता सती॥

udayādityasaṁkāśaṁ vibhāvasusamadyutim| taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya sā rājñī durmatā satī||

वह उगते हुए सूर्य के समान तथा अग्नि के समान तेजस्वी था। उसे देखकर वह मंदभाग्या रानी तुरंत उठ खड़ी हुई।

श्लोक 24 (skanda.5.132.24)

विनयेनोपसंयम्य प्रणिपत्याभिवाद्य च। वियोगकारणं राज्ञः पप्रच्छ प्रणता सती॥

vinayenopasaṁyamya praṇipatyābhivādya ca| viyogakāraṇaṁ rājñaḥ papraccha praṇatā satī||

विनयपूर्वक अपने को संयत करके, प्रणाम कर तथा अभिवादन करके, उस साध्वी ने विनम्र होकर अपने वियोग का कारण उस मुनि से पूछा।

श्लोक 25 (skanda.5.132.25)

भगवन्काशिराजस्य सुताहमतिवल्लभा। भगिनी शत्रुसेनस्य मातुश्चातीव वल्लभा॥

bhagavankāśirājasya sutāhamativallabhā| bhaginī śatrusenasya mātuścātīva vallabhā||

'हे भगवन्! मैं काशिराज की अत्यंत प्रिय पुत्री हूं, शत्रुसेन की बहन हूं, तथा अपनी माता की भी अत्यंत प्रिय हूं।'

श्लोक 26 (skanda.5.132.26)

अश्ववाहनसंज्ञेन नृपेणोढा महामुने। धर्मतो धर्मकल्पेन प्रजपतिसमेन तु॥

aśvavāhanasaṁjñena nṛpeṇoḍhā mahāmune| dharmato dharmakalpena prajapatisamena tu||

'हे महामुने! मुझे अश्ववाहन नामक राजा के साथ, प्रजापति के समान धर्मपरायण विधि से, धर्मपूर्वक विवाहित किया गया।'

श्लोक 27 (skanda.5.132.27)

सा किमर्थं न चाभीष्टा जाताऽहं तस्य भूपतेः। स चातीव ममाभीष्टो नृपतिः सर्वदा विभो॥

sā kimarthaṁ na cābhīṣṭā jātā'haṁ tasya bhūpateḥ| sa cātīva mamābhīṣṭo nṛpatiḥ sarvadā vibho||

'हे विभो! फिर मैं उस राजा को प्रिय क्यों नहीं हुई, जबकि वह राजा सदा मुझे अत्यंत प्रिय है?'

श्लोक 28 (skanda.5.132.28)

दुर्भगाहं कथं जाता कर्मणा केन तापस। कथं भवति वश्यो मे भर्त्ता नृपतिसत्तमः। सौभाग्यं च कथं मे स्यादिति सत्यं च कथ्यताम्॥

durbhagāhaṁ kathaṁ jātā karmaṇā kena tāpasa| kathaṁ bhavati vaśyo me bharttā nṛpatisattamaḥ| saubhāgyaṁ ca kathaṁ me syāditi satyaṁ ca kathyatām||

'हे तपस्विन्! मैं किस कर्म से अभागिनी हुई? वह श्रेष्ठ राजा मेरा पति मेरे वश में कैसे हो? तथा मुझे सौभाग्य कैसे प्राप्त हो, यह सत्य बताइए।'

श्लोक 29 (skanda.5.132.29)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स मुनिः संशितव्रतः। ज्ञानेन कथयामास तस्या दौर्भाग्यकारणम्॥

tasyāstadvacanaṁ śrutvā sa muniḥ saṁśitavrataḥ| jñānena kathayāmāsa tasyā daurbhāgyakāraṇam||

उसके वे वचन सुनकर उस संशितव्रत मुनि ने अपने ज्ञान से उसके दौर्भाग्य का कारण बता दिया।

श्लोक 30 (skanda.5.132.30)

पाणिग्रहणकाले त्वं ग्रहैः पापैर्विलोकिता। भर्ता ते नृपतिः पुत्रि ग्रहैः सौम्यैर्विलोकितः॥

pāṇigrahaṇakāle tvaṁ grahaiḥ pāpairvilokitā| bhartā te nṛpatiḥ putri grahaiḥ saumyairvilokitaḥ||

'हे पुत्री! तुम्हारे पाणिग्रहण के समय तुम्हें पापग्रहों ने देखा था, जबकि तुम्हारे पति राजा को सौम्य ग्रहों ने देखा था।'

श्लोक 31 (skanda.5.132.31)

तेन ते वल्लभो राजा न त्वं भूपस्य वल्लभा। इति तस्य वचः श्रुत्वा सा राज्ञी दीनमानसा। पप्रच्छ विनयोपेता भक्तिनम्रात्मकन्धरा॥

tena te vallabho rājā na tvaṁ bhūpasya vallabhā| iti tasya vacaḥ śrutvā sā rājñī dīnamānasā| papraccha vinayopetā bhaktinamrātmakandharā||

'इसी कारण राजा तुम्हें प्रिय है, परंतु तुम राजा को प्रिय नहीं हो।' उसके ये वचन सुनकर वह दीनमना रानी विनयपूर्वक, भक्ति से नम्र होकर पुनः पूछने लगी।

श्लोक 32 (skanda.5.132.32)

भगवन्केन दानेन स्नानेन नियमेन च। कर्मणा केन सौभाग्यं परमं हि कथं भवेत्॥

bhagavankena dānena snānena niyamena ca| karmaṇā kena saubhāgyaṁ paramaṁ hi kathaṁ bhavet||

'हे भगवन्! किस दान से, किस स्नान से, किस नियम से तथा किस कर्म से परम सौभाग्य प्राप्त हो सकता है?'

श्लोक 33 (skanda.5.132.33)

इति तस्या वचः श्रुत्वा स मुनिः संशितव्रतः। कथयामास माहात्म्यं सौभाग्यं येन लभ्यते॥

iti tasyā vacaḥ śrutvā sa muniḥ saṁśitavrataḥ| kathayāmāsa māhātmyaṁ saubhāgyaṁ yena labhyate||

उसके वे वचन सुनकर उस संशितव्रत मुनि ने वह माहात्म्य बताया, जिससे सौभाग्य प्राप्त होता है।

श्लोक 34 (skanda.5.132.34)

महाकालवने पुत्रि लिगं सौभाग्यदायकम्। मतंगेश्वरपार्श्वे तु विद्यतेऽभीष्टदायकम्। तस्य दर्शनमात्रेण सौभाग्यं समवाप्स्यसि॥

mahākālavane putri ligaṁ saubhāgyadāyakam| mataṁgeśvarapārśve tu vidyate'bhīṣṭadāyakam| tasya darśanamātreṇa saubhāgyaṁ samavāpsyasi||

'हे पुत्री! महाकालवन में सौभाग्य देने वाला एक लिंग मतंगेश्वर के समीप स्थित है, जो अभीष्ट फल देने वाला है। उसके दर्शनमात्र से तुम सौभाग्य प्राप्त करोगी।'

श्लोक 35 (skanda.5.132.35)

इंद्राण्याराधितं लिंगं पुरा सौभाग्यकारणात्। सौभाग्यं परमं लब्धं नष्टः शक्रोऽपि लब्धवान्। तस्माद्गच्छ ममादेशान्महाकालवनं शुभम्॥

iṁdrāṇyārādhitaṁ liṁgaṁ purā saubhāgyakāraṇāt| saubhāgyaṁ paramaṁ labdhaṁ naṣṭaḥ śakro'pi labdhavān| tasmādgaccha mamādeśānmahākālavanaṁ śubham||

'प्राचीन काल में इंद्राणी ने सौभाग्य प्राप्ति हेतु इस लिंग की आराधना की थी, और उन्हें परम सौभाग्य प्राप्त हुआ था; इंद्र भी विनष्ट होकर पुनः वैभव को प्राप्त हुए। अतः मेरे आदेश से तुम शुभ महाकालवन को जाओ।'

श्लोक 36 (skanda.5.132.36)

सौभाग्यं भविता तत्र कांतेन सह दर्शनम्। पुत्रो भविष्यति शुभे तस्य लिंगस्य दर्शनात्॥

saubhāgyaṁ bhavitā tatra kāṁtena saha darśanam| putro bhaviṣyati śubhe tasya liṁgasya darśanāt||

'वहां तुम्हें सौभाग्य तथा अपने प्रियतम के साथ मिलन प्राप्त होगा; हे शुभे! उस लिंग के दर्शन से तुम्हें पुत्र भी प्राप्त होगा।'

श्लोक 37 (skanda.5.132.37)

इत्युक्ता सा तदा तेन तापसेन वरानने। विद्यते यत्र तल्लिंगं महाकालवनं गता॥

ityuktā sā tadā tena tāpasena varānane| vidyate yatra talliṁgaṁ mahākālavanaṁ gatā||

हे वरानने! उस तपस्वी के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह तब महाकालवन गई, जहां वह लिंग स्थित था।

श्लोक 38 (skanda.5.132.38)

ददर्श प्रणयोपेता लिंगं सौभाग्यदायकम्। दर्शनात्तस्य लिंगस्य राजा सस्मार तां प्रियाम्॥

dadarśa praṇayopetā liṁgaṁ saubhāgyadāyakam| darśanāttasya liṁgasya rājā sasmāra tāṁ priyām||

प्रेमपूर्वक उसने सौभाग्य देने वाले उस लिंग का दर्शन किया। उसी लिंग के दर्शन से राजा को भी अपनी प्रिया का स्मरण हो आया।

श्लोक 39 (skanda.5.132.39)

पप्रच्छ जमदग्निं तु क्व गता मे प्रिया विभो। भक्षिता विपिने विप्र सिंहव्याघ्रनिशाचरैः॥

papraccha jamadagniṁ tu kva gatā me priyā vibho| bhakṣitā vipine vipra siṁhavyāghraniśācaraiḥ||

उसने जमदग्नि से पूछा - 'हे विभो! मेरी प्रिया कहां गई? हे विप्र! क्या वह वन में सिंह, व्याघ्र अथवा निशाचरों द्वारा खा ली गई?'

श्लोक 40 (skanda.5.132.40)

मया त्यक्ता नृशंसेन अहं तस्यास्तु वल्लभः। एवं ब्रुवाणो नृपतिः प्रत्युक्तो जमदग्निना॥

mayā tyaktā nṛśaṁsena ahaṁ tasyāstu vallabhaḥ| evaṁ bruvāṇo nṛpatiḥ pratyukto jamadagninā||

'मुझ क्रूर के द्वारा त्यागी गई वह, फिर भी मैं उसका प्रियतम हूं।' इस प्रकार कहते हुए राजा को जमदग्नि ने उत्तर दिया।

श्लोक 41 (skanda.5.132.41)

न भक्षिता सा भूपाल सिंहव्याघ्रनिशाचरैः। सा चाविप्लुतचारित्रा त्वद्भक्ता च पतिव्रता॥

na bhakṣitā sā bhūpāla siṁhavyāghraniśācaraiḥ| sā cāviplutacāritrā tvadbhaktā ca pativratā||

'हे भूपाल! वह न तो सिंह, व्याघ्र अथवा निशाचरों द्वारा खाई गई, और न ही उसका चरित्र भ्रष्ट हुआ; वह तुम्हारी भक्त तथा पतिव्रता है।'

श्लोक 42 (skanda.5.132.42)

महाकालवनं राजन्गता सौभाग्यकाम्यया। भार्या रक्ष्या महीपाल इति सा श्रुतिरुत्तमा॥

mahākālavanaṁ rājangatā saubhāgyakāmyayā| bhāryā rakṣyā mahīpāla iti sā śrutiruttamā||

'हे राजन्! वह सौभाग्य की कामना से महाकालवन गई है। हे महीपाल! भार्या की रक्षा करनी चाहिए - यही उत्तम श्रुति-वचन है।'

श्लोक 43 (skanda.5.132.43)

भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता। आत्मा हि जायते तस्यां सा रक्ष्यातो नरेश्वर॥

bhāryāyāṁ rakṣyamāṇāyāṁ prajā bhavati rakṣitā| ātmā hi jāyate tasyāṁ sā rakṣyāto nareśvara||

'भार्या की रक्षा किए जाने पर संतान सुरक्षित रहती है, क्योंकि उसी में स्वयं का अंश जन्म लेता है; इसलिए हे नरेश्वर! वह रक्षणीय है।'

श्लोक 44 (skanda.5.132.44)

धर्महानिश्चानुदिनमभार्यस्य भवेन्नृप। नित्यक्रियाया विभ्रंशः स चापि पतनाय वै॥

dharmahāniścānudinamabhāryasya bhavennṛpa| nityakriyāyā vibhraṁśaḥ sa cāpi patanāya vai||

'हे राजन्! जिसकी पत्नी नहीं है, उसका प्रतिदिन धर्म का ह्रास होता है; नित्यकर्मों में भी विभ्रंश होता है, जो पतन का कारण बनता है।'

श्लोक 45 (skanda.5.132.45)

पत्न्यानुकूलया भाव्यं यथाशीलेऽपि भर्त्तरि। दुःशीला दुर्भगा भार्या पोषणीया नरेश्वर॥

patnyānukūlayā bhāvyaṁ yathāśīle'pi bharttari| duḥśīlā durbhagā bhāryā poṣaṇīyā nareśvara||

'पति चाहे जैसे भी स्वभाव का हो, पत्नी को उसके अनुकूल होना चाहिए; हे नरेश्वर! दुःशीला और अभागिनी पत्नी का भी पालन करना चाहिए।'

श्लोक 46 (skanda.5.132.46)

इति तस्य वचः श्रुत्वा समायातो नरेश्वरः। महाकालवने रम्ये ददर्श स्वां प्रियां तदा॥

iti tasya vacaḥ śrutvā samāyāto nareśvaraḥ| mahākālavane ramye dadarśa svāṁ priyāṁ tadā||

उसके ये वचन सुनकर राजा तुरंत रमणीय महाकालवन में आया और वहां उसने अपनी प्रिया को देखा।

श्लोक 47 (skanda.5.132.47)

सौभाग्यालंकृतां सुभ्रू पूजयंतीं महेश्वरम्। दृष्ट्वा स्नेहेन चालिंग्य प्रत्युवाच स तां प्रियाम्॥

saubhāgyālaṁkṛtāṁ subhrū pūjayaṁtīṁ maheśvaram| dṛṣṭvā snehena cāliṁgya pratyuvāca sa tāṁ priyām||

सौभाग्य से सुशोभित, महेश्वर की पूजा करती हुई उस सुंदर भौंहों वाली को देखकर उसने स्नेहपूर्वक आलिंगन किया और अपनी प्रिया से कहा।

श्लोक 48 (skanda.5.132.48)

विरहेण त्वदीयेन संतप्तोऽहं वरानने। अद्य मे सफलं चक्षुर्जीवितं च सुजीवितम्॥

viraheṇa tvadīyena saṁtapto'haṁ varānane| adya me saphalaṁ cakṣurjīvitaṁ ca sujīvitam||

'हे वरानने! तुम्हारे वियोग से मैं संतप्त रहा हूं। आज मेरे नेत्र सफल हुए तथा मेरा जीवन सुफल हो गया।'

श्लोक 49 (skanda.5.132.49)

यत्त्वां पश्यामि सुभगे कृतार्थोहं कृतस्त्वया। एवं दृष्टातिहर्षेण सा ददर्श तदा पतिम्। उवाच च प्रसीदेति भूयो भूयो मुदान्विता॥

yattvāṁ paśyāmi subhage kṛtārthohaṁ kṛtastvayā| evaṁ dṛṣṭātiharṣeṇa sā dadarśa tadā patim| uvāca ca prasīdeti bhūyo bhūyo mudānvitā||

'हे सुभगे! कि मैं तुम्हें देख रहा हूं, इसी से मैं कृतार्थ हुआ, तुम्हारे ही द्वारा कृतार्थ किया गया।' इस प्रकार अत्यंत हर्ष से देखी गई वह तब अपने पति को निहारती हुई बार-बार आनंदपूर्वक कहने लगी - 'प्रसन्न होइए।'

श्लोक 50 (skanda.5.132.50)

ततः स राजा रभसात्परिष्वज्याह भामिनीम्। प्रिये प्रसन्न एवाहं भूयो भूयो ब्रवीमि किम्॥

tataḥ sa rājā rabhasātpariṣvajyāha bhāminīm| priye prasanna evāhaṁ bhūyo bhūyo bravīmi kim||

तब राजा ने उतावली से उस भामिनी का आलिंगन कर कहा - 'हे प्रिये! मैं तो प्रसन्न ही हूं, मैं बार-बार क्या कहूं?'

श्लोक 51 (skanda.5.132.51)

ततः समागमो जातो जातः पुत्रोऽतिधार्मिकः। तस्य लिंगस्य माहात्म्याद्दत्तोनाम स गीयते॥

tataḥ samāgamo jāto jātaḥ putro'tidhārmikaḥ| tasya liṁgasya māhātmyāddattonāma sa gīyate||

तत्पश्चात् उनका मिलन हुआ और अत्यंत धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुआ; उस लिंग की महिमा से वह दत्त नाम से गाया जाता है।

श्लोक 52 (skanda.5.132.52)

सौभाग्यमतुलं लब्धं तया देव्या हिमात्मजे। सौभाग्येश्वरसंज्ञं तु ततःप्रभृति भूतले॥

saubhāgyamatulaṁ labdhaṁ tayā devyā himātmaje| saubhāgyeśvarasaṁjñaṁ tu tataḥprabhṛti bhūtale||

हे हिमात्मजे! उस रानी को अनुपम सौभाग्य प्राप्त हुआ, और तभी से पृथ्वी पर वह लिंग सौभाग्येश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 53 (skanda.5.132.53)

ये पश्यंति विशालाक्षि सौभाग्येश्वरमीश्वरम्। तेषां कुले न दौर्भाग्यं जायते पर्वतात्मजे॥

ye paśyaṁti viśālākṣi saubhāgyeśvaramīśvaram| teṣāṁ kule na daurbhāgyaṁ jāyate parvatātmaje||

'हे विशालाक्षी, हे पर्वतात्मजे! जो कोई सौभाग्येश्वर ईश्वर का दर्शन करते हैं, उनके कुल में कभी दौर्भाग्य उत्पन्न नहीं होता।'

श्लोक 54 (skanda.5.132.54)

भविष्यति न दारिद्र्यं वियोगो न च बन्धुभिः। पुत्रमित्रकलत्राणां लिंगस्य च समर्चनात्॥

bhaviṣyati na dāridryaṁ viyogo na ca bandhubhiḥ| putramitrakalatrāṇāṁ liṁgasya ca samarcanāt||

'लिंग की भलीभांति पूजा करने से न दरिद्रता होगी, न बंधुओं से वियोग होगा, न पुत्र, मित्र और पत्नी से।'

श्लोक 55 (skanda.5.132.55)

नोपसर्गभयं तेषां ये पश्यंति वरानने। सौभाग्येश्वरसंज्ञं तु न ग्रहादिभयं भवेत्॥

nopasargabhayaṁ teṣāṁ ye paśyaṁti varānane| saubhāgyeśvarasaṁjñaṁ tu na grahādibhayaṁ bhavet||

'हे वरानने! जो सौभाग्येश्वर नामक लिंग का दर्शन करते हैं, उन्हें उपद्रव का भय नहीं होता, न ग्रहादि का भय होता है।'

श्लोक 56 (skanda.5.132.56)

सर्वबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसमन्वितः। मनुष्यो जायते देवि सौभाग्येश्वरदर्शनात्। संपूज्यः सर्वलोकेषु सौभाग्येकनिधिर्भवेत्॥

sarvabādhāvinirmukto dhanadhānyasamanvitaḥ| manuṣyo jāyate devi saubhāgyeśvaradarśanāt| saṁpūjyaḥ sarvalokeṣu saubhāgyekanidhirbhavet||

'हे देवी! सौभाग्येश्वर के दर्शन से मनुष्य समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य से संपन्न होता है; वह समस्त लोकों में पूज्य तथा सौभाग्य का एकमात्र निधि बन जाता है।'

श्लोक 57 (skanda.5.132.57)

जायते भूपतिर्लोके सार्वभौमो वरानने। नापुत्रा नाधना नारी न दीना न च दुःखिता। जायते दुर्भगा नैव सौभाग्येश्वरदर्शनात्॥

jāyate bhūpatirloke sārvabhaumo varānane| nāputrā nādhanā nārī na dīnā na ca duḥkhitā| jāyate durbhagā naiva saubhāgyeśvaradarśanāt||

'हे वरानने! वह इस लोक में सार्वभौम राजा बनता है। सौभाग्येश्वर के दर्शन से स्त्री न तो पुत्रहीन होती है, न निर्धन, न दीन, न दुःखी, न ही कभी अभागिनी होती है।'

श्लोक 58 (skanda.5.132.58)

न वैधव्यं न च व्याधिर्नाकालमरणं श्रिये। न पुत्रभर्तृजं दुःखं जायते लिंगदर्शनात्॥

na vaidhavyaṁ na ca vyādhirnākālamaraṇaṁ śriye| na putrabhartṛjaṁ duḥkhaṁ jāyate liṁgadarśanāt||

'लिंग के दर्शन से न वैधव्य होता है, न रोग, न असमय मृत्यु, न पुत्र या पति से उत्पन्न दुःख होता है।'

श्लोक 59 (skanda.5.132.59)

यथा लक्ष्मीर्हरेर्नित्यं सावित्री ब्रह्मणः स्मृता। रोहिणी वल्लभा चेंदोः शची शक्रस्य वल्लभा। तथा सा जायते नारी सौभाग्येश्वरदर्शनात्॥

yathā lakṣmīrharernityaṁ sāvitrī brahmaṇaḥ smṛtā| rohiṇī vallabhā ceṁdoḥ śacī śakrasya vallabhā| tathā sā jāyate nārī saubhāgyeśvaradarśanāt||

'जैसे लक्ष्मी सदा हरि की प्रिय हैं, सावित्री ब्रह्मा की स्मृत हैं, रोहिणी चंद्रमा की प्रिया हैं, तथा शची इंद्र की प्रिया हैं - वैसे ही सौभाग्येश्वर के दर्शन से स्त्री अपने पति की प्रिय बन जाती है।'

श्लोक 60 (skanda.5.132.60)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। सौभाग्येश्वरदेवस्य शृणु रूपेश्वरं प्रिये॥

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| saubhāgyeśvaradevasya śṛṇu rūpeśvaraṁ priye||

हे देवी! यह मैंने तुम्हें भगवान सौभाग्येश्वर का पापनाशक प्रभाव बताया; अब हे प्रिये! रूपेश्वर के विषय में सुनो।

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