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अवन्ती खण्ड · अध्याय 133

रूपेश्वर की महिमा

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

श्लोक 1 (skanda.5.133.1)

ईश्वर उवाच। द्विषष्टिकं विजानीहि देवं रूपेश्वरं प्रिये। यस्य दर्शनमात्रेण रूपवाञ्जायते नरः॥

īśvara uvāca| dviṣaṣṭikaṁ vijānīhi devaṁ rūpeśvaraṁ priye| yasya darśanamātreṇa rūpavāñjāyate naraḥ||

ईश्वर ने कहा - हे प्रिये! बासठवें देव रूपेश्वर को जानो, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य रूपवान हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.133.2)

पाद्मकल्पे महादेवि पद्मोनाम महीपतिः। पद्मगर्भसमुद्भूतो बभूवातिपराक्रमी। पृथिव्याश्चतुरंताया जातो धर्मरतो बली॥

pādmakalpe mahādevi padmonāma mahīpatiḥ| padmagarbhasamudbhūto babhūvātiparākramī| pṛthivyāścaturaṁtāyā jāto dharmarato balī||

हे महादेवी! पद्म कल्प में पद्म नामक एक राजा हुआ, जो पद्मगर्भ से उत्पन्न, अत्यंत पराक्रमी, चतुरंता पृथ्वी का स्वामी, धर्मपरायण तथा बलवान था।

श्लोक 3 (skanda.5.133.3)

स कदाचिन्महाबाहुः प्रभूतबलवाहनः। वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः॥

sa kadācinmahābāhuḥ prabhūtabalavāhanaḥ| vanaṁ jagāma gahanaṁ hayanāgaśatairvṛtaḥ||

वह महाबाहु राजा एक बार विशाल सेना और वाहनों सहित, सैकड़ों घोड़ों और हाथियों से घिरा हुआ, एक घने वन में गया।

श्लोक 4 (skanda.5.133.4)

बिल्वार्कखदिराकीर्णं कपित्थधवसंकुलम्। मृगसिंहैर्वृतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः॥

bilvārkakhadirākīrṇaṁ kapitthadhavasaṁkulam| mṛgasiṁhairvṛtaṁ ghorairanyaiścāpi vanecaraiḥ||

वह वन बिल्व, अर्क और खदिर वृक्षों से भरा हुआ, कैथ तथा धव वृक्षों से युक्त, तथा भयंकर मृगों, सिंहों एवं अन्य वनचर प्राणियों से घिरा हुआ था।

श्लोक 5 (skanda.5.133.5)

तत्र वन्यसहस्राणि हत्वा सबलवाहनः। राजा मृगप्रसंगेन वनमन्यद्विवेश सः॥

tatra vanyasahasrāṇi hatvā sabalavāhanaḥ| rājā mṛgaprasaṁgena vanamanyadviveśa saḥ||

वहां हजारों वन्यपशुओं का वध कर, सेना और वाहन सहित वह राजा मृगों के पीछे लगकर दूसरे वन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 6 (skanda.5.133.6)

एक एवोत्तमबलः क्षुत्पिपासासमन्वितः। स वनस्यांतमासाद्य महदारण्यमासदत्॥

eka evottamabalaḥ kṣutpipāsāsamanvitaḥ| sa vanasyāṁtamāsādya mahadāraṇyamāsadat||

अत्यंत बलवान होते हुए भी वह अकेला रह गया, भूख-प्यास से व्याकुल होकर वन की सीमा पर पहुंचकर एक विशाल अरण्य में जा पहुंचा।

श्लोक 7 (skanda.5.133.7)

तच्चाप्यतीत्य नृपतिर्ददर्शाश्रममुत्तमम्। मनःप्रह्लादजननं दृष्टिकांतमतीव च॥

taccāpyatītya nṛpatirdadarśāśramamuttamam| manaḥprahlādajananaṁ dṛṣṭikāṁtamatīva ca||

उसे भी पार करके राजा ने एक उत्तम आश्रम देखा, जो मन को आनंदित करने वाला तथा दृष्टि को अत्यंत मनोहर लगने वाला था।

श्लोक 8 (skanda.5.133.8)

पुष्पितैः पादपैः कीर्णमतीव सुखशाद्वलम्। ततोऽगच्छन्महाबाहुरेकोऽमात्यान्विसृज्य तान्॥

puṣpitaiḥ pādapaiḥ kīrṇamatīva sukhaśādvalam| tato'gacchanmahābāhureko'mātyānvisṛjya tān||

वह पुष्पित वृक्षों से भरा हुआ तथा अत्यंत सुखद घास के मैदानों वाला था। तब वह महाबाहु राजा अपने मंत्रियों को छोड़कर अकेला ही आगे बढ़ा।

श्लोक 9 (skanda.5.133.9)

नापश्यदाश्रमे तस्मिंस्तमृषिं संशितव्रतम्। उवाच क इहेत्युच्चैर्वनं संनाद्यन्निव॥

nāpaśyadāśrame tasmiṁstamṛṣiṁ saṁśitavratam| uvāca ka ihetyuccairvanaṁ saṁnādyanniva||

उस आश्रम में उसे संशितव्रत ऋषि दिखाई नहीं दिए। उसने ऊंचे स्वर में पुकारा - 'यहां कौन है?' मानो उस वचन से वन गुंजायमान हो उठा।

श्लोक 10 (skanda.5.133.10)

श्रुत्वाथ तं तथा शब्दं कन्या श्रीरिव रूपिणी। निश्चक्रामाश्रमात्तस्मात्तापसाकारधारिणी॥

śrutvātha taṁ tathā śabdaṁ kanyā śrīriva rūpiṇī| niścakrāmāśramāttasmāttāpasākāradhāriṇī||

उस ध्वनि को सुनकर लक्ष्मी के समान रूपवती एक कन्या, जो तापसी वेश धारण किए हुए थी, उस आश्रम से बाहर निकली।

श्लोक 11 (skanda.5.133.11)

सा तं दृष्ट्वैव राजानं पद्मगर्भसमुद्भवम्। आसनेनार्चयित्वा च पप्रच्छ नाम तं तदा॥

sā taṁ dṛṣṭvaiva rājānaṁ padmagarbhasamudbhavam| āsanenārcayitvā ca papraccha nāma taṁ tadā||

पद्मगर्भ से उत्पन्न उस राजा को देखते ही उसने आसन देकर उसका सत्कार किया और तब उसका नाम पूछा।

श्लोक 12 (skanda.5.133.12)

उवाच स्मयमानाथ किं कार्यं क्रियतामिति। तामब्रवीत्ततो राजा कन्यां मधुरभाषिणीम्॥

uvāca smayamānātha kiṁ kāryaṁ kriyatāmiti| tāmabravīttato rājā kanyāṁ madhurabhāṣiṇīm||

मुस्कुराते हुए उसने कहा - 'आपका क्या कार्य किया जाए?' तब राजा ने उस मधुरभाषिणी कन्या से कहा।

श्लोक 13 (skanda.5.133.13)

दृष्ट्वा चैवानवद्यांगीं यथावत्प्रतिपूजितः। आगतोऽहं महाभागे मुनिश्रेष्ठमुपासितुम्॥

dṛṣṭvā caivānavadyāṁgīṁ yathāvatpratipūjitaḥ| āgato'haṁ mahābhāge muniśreṣṭhamupāsitum||

'हे महाभागे! तुम्हें देखकर, यथाविधि सत्कारित होकर, मैं मुनिश्रेष्ठ की सेवा करने आया हूं।'

श्लोक 14 (skanda.5.133.14)

क्व गतो भगवान्भद्रे तन्ममाचक्ष्व शोभने। एवमुक्ता तु सा कन्या तेन राज्ञा तदाश्रमे। हसंती प्रत्युवाचेदं वाक्यं समधुराक्षरम्॥

kva gato bhagavānbhadre tanmamācakṣva śobhane| evamuktā tu sā kanyā tena rājñā tadāśrame| hasaṁtī pratyuvācedaṁ vākyaṁ samadhurākṣaram||

'हे भद्रे! हे शोभने! वे भगवान कहां गए हैं, मुझे बताइए।' उस आश्रम में राजा के इस प्रकार कहने पर वह कन्या मुस्कुराते हुए इन मधुर वचनों में उत्तर देने लगी।

श्लोक 15 (skanda.5.133.15)

कन्याहं पृथिवीपाल कौमारब्रह्मचारिणः। तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य मनस्विनः॥

kanyāhaṁ pṛthivīpāla kaumārabrahmacāriṇaḥ| tapasvino dhṛtimato dharmajñasya manasvinaḥ||

'हे पृथ्वीपाल! मैं आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने वाले, धैर्यवान, धर्मज्ञ तथा मनस्वी एक तपस्वी की पुत्री हूं।'

श्लोक 16 (skanda.5.133.16)

सुता कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप। कण्वं हि पितरमन्ये पितरं स्वमजानती॥

sutā kaṇvasya māmevaṁ viddhi tvaṁ manujādhipa| kaṇvaṁ hi pitaramanye pitaraṁ svamajānatī||

'हे मनुजाधिप! मुझे कण्व की पुत्री जानिए। अपने वास्तविक पिता को न जानती हुई मैं कण्व को ही अपना पिता मानती हूं।'

श्लोक 17 (skanda.5.133.17)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा नृपेणोक्तं वरानने। सुव्यक्तं राजपुत्री त्वं यथा कल्याणि भाषसे॥

tasyāstadvacanaṁ śrutvā nṛpeṇoktaṁ varānane| suvyaktaṁ rājaputrī tvaṁ yathā kalyāṇi bhāṣase||

उसके ये वचन सुनकर राजा ने हे वरानने! कहा - 'हे कल्याणि! जिस प्रकार तुम बोलती हो, उससे स्पष्ट है कि तुम राजकन्या हो।'

श्लोक 18 (skanda.5.133.18)

भार्या मे भव सुश्रोणि ब्रूहि किं करवाणि ते। सुवर्णरत्नवासांसि कुंडले परिहारके॥

bhāryā me bhava suśroṇi brūhi kiṁ karavāṇi te| suvarṇaratnavāsāṁsi kuṁḍale parihārake||

'हे सुश्रोणि! मेरी पत्नी बनो; बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूं? स्वर्ण, रत्न, वस्त्र, कुंडल अथवा आभूषण -'

श्लोक 19 (skanda.5.133.19)

आहरामि तवाद्याहं भार्या मे भव शोभने। गांधर्वेण च मां भीरु विवाहेनैव सुंदरि। विवाहानां च रंभोरु गांधर्वः श्रेष्ठ उच्यते॥

āharāmi tavādyāhaṁ bhāryā me bhava śobhane| gāṁdharveṇa ca māṁ bhīru vivāhenaiva suṁdari| vivāhānāṁ ca raṁbhoru gāṁdharvaḥ śreṣṭha ucyate||

'—आज ही मैं तुम्हारे लिए ले आऊंगा; हे शोभने! मेरी पत्नी बनो। हे भीरु! हे सुंदरि! गांधर्व विवाह से ही मुझसे विवाह करो; हे रंभोरु! विवाहों में गांधर्व विवाह ही श्रेष्ठ कहा गया है।'

श्लोक 20 (skanda.5.133.20)

नृपस्य वचनं श्रुत्वा कन्या वचनमब्रवीत्। मुहूर्त्तं संप्रतीक्षस्व स मां तुभ्यं प्रदास्यति॥

nṛpasya vacanaṁ śrutvā kanyā vacanamabravīt| muhūrttaṁ saṁpratīkṣasva sa māṁ tubhyaṁ pradāsyati||

राजा के ये वचन सुनकर कन्या ने कहा - 'क्षणभर प्रतीक्षा कीजिए; वे मुझे आपको प्रदान कर देंगे।'

श्लोक 21 (skanda.5.133.21)

राजोवाच। इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानमनिंदिते। तदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वया मेऽपहृतं मनः॥

rājovāca| icchāmi tvāṁ varārohe bhajamānamaniṁdite| tadarthaṁ māṁ sthitaṁ viddhi tvayā me'pahṛtaṁ manaḥ||

राजा ने कहा - 'हे वरारोहे! हे अनिंदिते! मैं तुम्हारी सेवा में तत्पर होकर तुम्हें चाहता हूं; जान लो कि मैं इसी के लिए यहां ठहरा हूं, तुमने मेरा मन हर लिया है।'

श्लोक 22 (skanda.5.133.22)

आत्मनो बंधुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः। आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः॥

ātmano baṁdhurātmaiva gatirātmaiva cātmanaḥ| ātmanaivātmano dānaṁ kartumarhasi dharmataḥ||

'अपना ही आत्मा अपना बंधु है, अपना ही आत्मा अपनी गति है; धर्मपूर्वक तुम्हें स्वयं ही अपने आपको समर्पित कर देना चाहिए।'

श्लोक 23 (skanda.5.133.23)

कन्योवाच। यदि धर्मपथस्त्वेष यदि चात्मा प्रभुर्मम। सत्यं मे प्रतिजानीहि दत्तमात्मानमद्य मे॥

kanyovāca| yadi dharmapathastveṣa yadi cātmā prabhurmama| satyaṁ me pratijānīhi dattamātmānamadya me||

कन्या ने कहा - 'यदि यही धर्मपथ है, और यदि मेरा आत्मा ही मेरा स्वामी है, तो मुझसे सत्य प्रतिज्ञा कीजिए; आज मैं स्वयं को आपको समर्पित करती हूं।'

श्लोक 24 (skanda.5.133.24)

इति तस्या वचः श्रुत्वा परिणीता नृपेण हि। गांधर्वेण विवाहेन कामासक्तेन पार्वति॥

iti tasyā vacaḥ śrutvā pariṇītā nṛpeṇa hi| gāṁdharveṇa vivāhena kāmāsaktena pārvati||

हे पार्वती! उसके ये वचन सुनकर काम में आसक्त उस राजा ने गांधर्व विवाह-विधि से उससे विवाह कर लिया।

श्लोक 25 (skanda.5.133.25)

कामिता सा नृपेणेव ततो गंतुं समुद्यतः। एतस्मिन्नंतरे देवि कण्वश्चाश्रममभ्यगात्॥

kāmitā sā nṛpeṇeva tato gaṁtuṁ samudyataḥ| etasminnaṁtare devi kaṇvaścāśramamabhyagāt||

इस प्रकार उससे रमण कर राजा जाने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच, हे देवी! कण्व मुनि आश्रम में लौट आए।

श्लोक 26 (skanda.5.133.26)

सा कन्या पितरं दृष्ट्वा ह्रिया नोपजगाम तम्। विज्ञायाथ च तां विप्रो दिव्यज्ञानो महातपाः॥

sā kanyā pitaraṁ dṛṣṭvā hriyā nopajagāma tam| vijñāyātha ca tāṁ vipro divyajñāno mahātapāḥ||

उस कन्या ने अपने पिता को देखकर लज्जावश उनके पास नहीं गई। तब दिव्यज्ञान संपन्न, महातपस्वी उस विप्र ने सब कुछ जान लिया।

श्लोक 27 (skanda.5.133.27)

उवाच परमं कुद्धस्तां कन्यां काममोहिताम्। त्वयापि दुष्टे रहसि मामवज्ञाय यत्कृतः॥

uvāca paramaṁ kuddhastāṁ kanyāṁ kāmamohitām| tvayāpi duṣṭe rahasi māmavajñāya yatkṛtaḥ||

अत्यंत क्रोधित होकर उन्होंने काममोहित उस कन्या से कहा - 'हे दुष्टे! तूने भी एकांत में मेरी अवहेलना कर जो यह किया है -'

श्लोक 28 (skanda.5.133.28)

स्वयं स्वयंवरो मोहात्तस्मात्कृष्णा भविष्यसि। कुत्सिता निर्घृणा दीना निर्लज्जा रूपवर्जिता॥

svayaṁ svayaṁvaro mohāttasmātkṛṣṇā bhaviṣyasi| kutsitā nirghṛṇā dīnā nirlajjā rūpavarjitā||

'—मोहवश स्वयं ही स्वयंवर कर लिया, इसलिए तू काली, कुत्सित, निर्दय, दीन, निर्लज्ज तथा रूपहीन हो जाएगी।'

श्लोक 29 (skanda.5.133.29)

अयं ते नृपतिर्भर्त्ता दुष्टरूपो भविष्यति॥

ayaṁ te nṛpatirbharttā duṣṭarūpo bhaviṣyati||

'तेरा यह राजा पति भी कुरूप हो जाएगा।'

श्लोक 30 (skanda.5.133.30)

इत्युक्ता तत्क्षणाज्जाता सा कन्या रूपवर्जिता। कुरूपो नृपतिर्जातः शापात्तस्य महात्मनः॥

ityuktā tatkṣaṇājjātā sā kanyā rūpavarjitā| kurūpo nṛpatirjātaḥ śāpāttasya mahātmanaḥ||

इस प्रकार शापित होते ही वह कन्या उसी क्षण रूपहीन हो गई; और उस महात्मा के शाप से राजा भी कुरूप हो गया।

श्लोक 31 (skanda.5.133.31)

अथ प्रसादयामास सा कन्या पितरं तदा। बालानभिज्ञा मूढाहं मन्मथेन प्रपीडिता॥

atha prasādayāmāsa sā kanyā pitaraṁ tadā| bālānabhijñā mūḍhāhaṁ manmathena prapīḍitā||

तब उस कन्या ने अपने पिता को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया - 'बालिका के समान अनजान, मूढ़ मैं कामदेव से पीड़ित हो गई थी।'

श्लोक 32 (skanda.5.133.32)

अज्ञानाच्च कृतं पापं तात त्वं क्षंतुमर्हसि। अयं महीपतिस्तात प्रत्यग्लीनो महाव्रतः॥

ajñānācca kṛtaṁ pāpaṁ tāta tvaṁ kṣaṁtumarhasi| ayaṁ mahīpatistāta pratyaglīno mahāvrataḥ||

'हे तात! अज्ञानवश यह पाप हुआ है, आप क्षमा करने योग्य हैं। हे तात! यह महाव्रती राजा भी लज्जित हो चुका है।'

श्लोक 33 (skanda.5.133.33)

न चाहं प्रार्थिता तेन मयासौ प्रार्थितो नृपः। तस्मादनुग्रहं तात कर्त्तुमर्हसि चावयोः॥

na cāhaṁ prārthitā tena mayāsau prārthito nṛpaḥ| tasmādanugrahaṁ tāta karttumarhasi cāvayoḥ||

'मुझसे उसने प्रार्थना नहीं की थी, बल्कि मैंने ही उस राजा से प्रार्थना की थी। अतः हे तात! आप हम दोनों पर अनुग्रह कीजिए।'

श्लोक 34 (skanda.5.133.34)

इति तस्या वचः श्रुत्वा स विप्रोऽतिकृपान्वितः। उवाच स्वां दुहितरमाश्वास्यैवं पुनःपुनः॥

iti tasyā vacaḥ śrutvā sa vipro'tikṛpānvitaḥ| uvāca svāṁ duhitaramāśvāsyaivaṁ punaḥpunaḥ||

उसके ये वचन सुनकर वह विप्र अत्यंत करुणा से भर गए और अपनी पुत्री को बार-बार सांत्वना देते हुए कहने लगे।

श्लोक 35 (skanda.5.133.35)

नैव वागनृतं पुत्रि यावदद्य स्मराम्यहम्। दैवमत्र परं मन्ये धिग्बुद्धिं धिक्पराक्रमम्॥

naiva vāganṛtaṁ putri yāvadadya smarāmyaham| daivamatra paraṁ manye dhigbuddhiṁ dhikparākramam||

'हे पुत्री! जहां तक मुझे स्मरण है, मेरा वचन कभी असत्य नहीं हुआ। मैं यहां दैव को ही प्रबल मानता हूं - बुद्धि को धिक्कार है, पराक्रम को धिक्कार है।'

श्लोक 36 (skanda.5.133.36)

अकार्यं कारितो येन बलादहमनिंदिते। उपदेशं प्रदास्यामि तत्त्वं कर्तुमिहार्हसि॥

akāryaṁ kārito yena balādahamaniṁdite| upadeśaṁ pradāsyāmi tattvaṁ kartumihārhasi||

'हे अनिंदिते! जिसके कारण मुझसे यह अनुचित कार्य करवाया गया, उसका मैं उपाय बताऊंगा; उसे तुम्हें यहां करना चाहिए।'

श्लोक 37 (skanda.5.133.37)

महाकालवने पुण्ये लिंगं रूपप्रदायकम्। पशुपेश्वरपूर्वे तु विद्यतेऽभीष्टदायकम्॥

mahākālavane puṇye liṁgaṁ rūpapradāyakam| paśupeśvarapūrve tu vidyate'bhīṣṭadāyakam||

'पवित्र महाकालवन में पशुपेश्वर के पूर्व में रूप प्रदान करने वाला एक लिंग है, जो अभीष्ट फल देने वाला है।'

श्लोक 38 (skanda.5.133.38)

तत्त्वं गच्छ त्वरा युक्ता सह भर्त्रा नृपेण हि। रूपं प्राप्स्यसि दुष्प्राप्यं लिंगदर्शनमात्रतः॥

tattvaṁ gaccha tvarā yuktā saha bhartrā nṛpeṇa hi| rūpaṁ prāpsyasi duṣprāpyaṁ liṁgadarśanamātrataḥ||

'तुम शीघ्रतापूर्वक अपने पति राजा के साथ वहां जाओ; लिंग के दर्शनमात्र से तुम्हें दुर्लभ रूप प्राप्त होगा।'

श्लोक 39 (skanda.5.133.39)

इत्युक्ता सा तदा कन्या सह भर्त्रा गता प्रिये। महाकालवने रम्ये यत्र लिंगमनुत्तमम्॥

ityuktā sā tadā kanyā saha bhartrā gatā priye| mahākālavane ramye yatra liṁgamanuttamam||

हे प्रिये! इस प्रकार कहे जाने पर वह कन्या तब अपने पति के साथ रमणीय महाकालवन गई, जहां वह सर्वोत्तम लिंग स्थित था।

श्लोक 40 (skanda.5.133.40)

ददर्श परया भक्त्या स च राजा नरोत्तमः। तत्क्षणाद्दिव्यदेहा सा रूपेणातिमनोहरा। दिव्यवस्त्रपरीधाना दिव्यालंकारभूषिता॥

dadarśa parayā bhaktyā sa ca rājā narottamaḥ| tatkṣaṇāddivyadehā sā rūpeṇātimanoharā| divyavastraparīdhānā divyālaṁkārabhūṣitā||

उस नरश्रेष्ठ राजा ने परम भक्ति से उसका दर्शन किया। उसी क्षण वह दिव्य देह वाली, अत्यंत मनोहर रूप वाली, दिव्य वस्त्र धारण किए, दिव्य आभूषणों से विभूषित हो गई।

श्लोक 41 (skanda.5.133.41)

स च राजा तथा जातः कंदर्पसदृशाकृतिः। रूपेणाप्रतिमो लोके तस्य लिंगस्य दर्शनात्॥

sa ca rājā tathā jātaḥ kaṁdarpasadṛśākṛtiḥ| rūpeṇāpratimo loke tasya liṁgasya darśanāt||

उस लिंग के दर्शन से राजा भी कामदेव के समान आकृति वाला तथा रूप में संसार में अद्वितीय हो गया।

श्लोक 42 (skanda.5.133.42)

अतो लोकेषु विख्यातो देवो रूपेश्वरः प्रिये। रूपदो धनदोऽत्यर्थं पुत्रदः स्वर्गदस्तथा॥

ato lokeṣu vikhyāto devo rūpeśvaraḥ priye| rūpado dhanado'tyarthaṁ putradaḥ svargadastathā||

हे प्रिये! इसीलिए वह देव लोकों में रूपेश्वर के नाम से विख्यात हुआ - जो रूप, अत्यधिक धन, पुत्र तथा स्वर्ग प्रदान करने वाला है।

श्लोक 43 (skanda.5.133.43)

स च राजा स्वकं प्राप्तो राष्ट्रं सस्यादिसंयुतम्। प्रियया परया सार्धं चक्रे राज्यमकंटकम्॥

sa ca rājā svakaṁ prāpto rāṣṭraṁ sasyādisaṁyutam| priyayā parayā sārdhaṁ cakre rājyamakaṁṭakam||

वह राजा फसलों आदि से समृद्ध अपने राज्य को प्राप्त कर, अपनी परम प्रिया के साथ निष्कंटक राज्य करने लगा।

श्लोक 44 (skanda.5.133.44)

राज्यं कृत्वा गतः स्वर्गं भार्यया सह पार्वति। देदीप्यमानो वपुषा द्वितीय इव भास्करः॥

rājyaṁ kṛtvā gataḥ svargaṁ bhāryayā saha pārvati| dedīpyamāno vapuṣā dvitīya iva bhāskaraḥ||

हे पार्वती! राज्य करने के पश्चात् वह अपनी भार्या सहित स्वर्ग को गया, अपने शरीर से मानो दूसरे सूर्य के समान देदीप्यमान होता हुआ।

श्लोक 45 (skanda.5.133.45)

विमानेन सुदीप्तेन वंद्यमानो दिवालये। दर्शनात्तस्य लिंगस्य प्राप्तः पदमनामयम्॥

vimānena sudīptena vaṁdyamāno divālaye| darśanāttasya liṁgasya prāptaḥ padamanāmayam||

अत्यंत तेजस्वी विमान से जाकर, स्वर्गलोक में वंदित होते हुए, उस लिंग के दर्शन से उसने अविनाशी पद प्राप्त किया।

श्लोक 46 (skanda.5.133.46)

ये पश्यंति विशालाक्षि देवं रूपेश्वरं शिवम्। न ते रूपेण हीयंते यशसा च कुलेन च॥

ye paśyaṁti viśālākṣi devaṁ rūpeśvaraṁ śivam| na te rūpeṇa hīyaṁte yaśasā ca kulena ca||

'हे विशालाक्षी! जो देव रूपेश्वर शिव का दर्शन करते हैं, वे रूप, यश तथा कुल से कभी हीन नहीं होते।'

श्लोक 47 (skanda.5.133.47)

सदा रूपकरं लिंगं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्। ये पश्यंति वरारोहे तेषां लोकाः सदाऽक्षयाः॥

sadā rūpakaraṁ liṁgaṁ bhuktimuktiphalapradam| ye paśyaṁti varārohe teṣāṁ lokāḥ sadā'kṣayāḥ||

'हे वरारोहे! जो इस सदा रूप देने वाले, भोग और मोक्ष का फल देने वाले लिंग का दर्शन करते हैं, उनके लोक सदा अक्षय रहते हैं।'

श्लोक 48 (skanda.5.133.48)

येऽर्चयंति नरा नित्यं देवं रूपेश्वरं परम्। तेऽर्चिता यांति यानेन मम लोकं सनातनम्॥

ye'rcayaṁti narā nityaṁ devaṁ rūpeśvaraṁ param| te'rcitā yāṁti yānena mama lokaṁ sanātanam||

'जो मनुष्य नित्य परम देव रूपेश्वर की पूजा करते हैं, वे स्वयं पूजित होकर विमान द्वारा मेरे सनातन लोक को जाते हैं।'

श्लोक 49 (skanda.5.133.49)

स एव सुकृती लोके कुलं तेनाप्यलंकृतम्। यः पूजयति रूपेशं रूपसौभाग्यदायकम्॥

sa eva sukṛtī loke kulaṁ tenāpyalaṁkṛtam| yaḥ pūjayati rūpeśaṁ rūpasaubhāgyadāyakam||

'वही मनुष्य लोक में सुकृती है, तथा उसी से कुल भी सुशोभित होता है, जो रूप और सौभाग्य प्रदान करने वाले रूपेश की पूजा करता है।'

श्लोक 50 (skanda.5.133.50)

यः पूजयति देवेशं प्रसंगादपि पार्वति। धनवान्रूपवान्सोऽपि राजा भवति भूतले॥

yaḥ pūjayati deveśaṁ prasaṁgādapi pārvati| dhanavānrūpavānso'pi rājā bhavati bhūtale||

'हे पार्वती! जो प्रसंगवश भी देवेश की पूजा करता है, वह भी पृथ्वी पर धनवान, रूपवान तथा राजा बन जाता है।'

श्लोक 51 (skanda.5.133.51)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। रूपेश्वरस्य देवस्य धनुःसाहस्रकं शृणु॥

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| rūpeśvarasya devasya dhanuḥsāhasrakaṁ śṛṇu||

हे देवी! यह मैंने तुम्हें भगवान रूपेश्वर का पापनाशक प्रभाव बताया; अब धनुःसाहस्रक के विषय में सुनो।

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