Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 134

धनुःसाहस्रेश्वर की महिमा

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135

श्लोक 1 (skanda.5.134.1)

श्रीहर उवाच। धनुःसाहस्रनामानमीश्वरं शृणु पार्वति। त्रिषष्टिसंख्यकं दिव्यं दर्शनात्पापनाशनम्॥

śrīhara uvāca| dhanuḥsāhasranāmānamīśvaraṁ śṛṇu pārvati| triṣaṣṭisaṁkhyakaṁ divyaṁ darśanātpāpanāśanam||

श्रीहर ने कहा - हे पार्वती! धनुःसाहस्र नामक तिरसठवें दिव्य ईश्वर के विषय में सुनो, जिनके दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.134.2)

विदूरथोनाम नृपः ख्यातकीर्त्तिरभूद्भुवि। तस्य पुत्रद्वयं जातं सुनीतिः .सुमतिस्तथा॥

vidūrathonāma nṛpaḥ khyātakīrttirabhūdbhuvi| tasya putradvayaṁ jātaṁ sunītiḥ .sumatistathā||

पृथ्वी पर विदूरथ नामक एक राजा था, जिसकी कीर्ति सुविख्यात थी। उसके दो पुत्र हुए - सुनीति तथा सुमति।

श्लोक 3 (skanda.5.134.3)

एकदा तु वनं यातो मृगयां स विदूरथः। ददर्श गर्त्तं सुमहद्भूमेर्मुखमिवोद्गतम्॥

ekadā tu vanaṁ yāto mṛgayāṁ sa vidūrathaḥ| dadarśa garttaṁ sumahadbhūmermukhamivodgatam||

एक बार मृगया के लिए वन गए हुए विदूरथ ने एक विशाल गर्त देखा, मानो पृथ्वी का मुख ही उभर आया हो।

श्लोक 4 (skanda.5.134.4)

तं दृष्ट्वा चिंतयामास किमेतदिति पार्थिवः। पातालविवरं मन्ये वडवानलसंनिभम्॥

taṁ dṛṣṭvā ciṁtayāmāsa kimetaditi pārthivaḥ| pātālavivaraṁ manye vaḍavānalasaṁnibham||

उसे देखकर राजा ने सोचा - 'यह क्या है?' 'मैं समझता हूं यह पाताल का विवर है, जो वडवानल के समान प्रतीत होता है।'

श्लोक 5 (skanda.5.134.5)

चिंतयन्निव तत्रासौ ददर्श विजने वने। ब्राह्मणं सुव्रतं नाम तपस्विनमकल्मषम्॥

ciṁtayanniva tatrāsau dadarśa vijane vane| brāhmaṇaṁ suvrataṁ nāma tapasvinamakalmaṣam||

इस प्रकार सोचते हुए उसने उस निर्जन वन में सुव्रत नामक एक निष्पाप तपस्वी ब्राह्मण को देखा।

श्लोक 6 (skanda.5.134.6)

स तं पप्रच्छ नृपतिः किमेतदिति भो द्विज॥

sa taṁ papraccha nṛpatiḥ kimetaditi bho dvija||

राजा ने उससे पूछा - 'हे द्विज! यह क्या है?'

श्लोक 7 (skanda.5.134.7)

ब्राह्मण उवाच। दानवः सुमहावीर्यो वसत्युग्रो रसातले। कुजंभोनाम विख्यातो भिनत्ति वसुधामिमाम्॥

brāhmaṇa uvāca| dānavaḥ sumahāvīryo vasatyugro rasātale| kujaṁbhonāma vikhyāto bhinatti vasudhāmimām||

ब्राह्मण ने कहा - 'रसातल में कुजंभ नामक अत्यंत बलशाली, उग्र एवं विख्यात दानव निवास करता है, जो इस पृथ्वी को विदीर्ण करता है।'

श्लोक 8 (skanda.5.134.8)

तमजित्वा कथं राज्यं भोक्ष्यसे वसुधाधिप। तेन विध्वंसिता विप्रा रात्रौ निःसृत्य पार्थिव॥

tamajitvā kathaṁ rājyaṁ bhokṣyase vasudhādhipa| tena vidhvaṁsitā viprā rātrau niḥsṛtya pārthiva||

'हे वसुधाधिप! उसे जीते बिना तुम राज्य कैसे भोगोगे? हे पार्थिव! रात्रि में निकलकर उसने ब्राह्मणों का विध्वंस किया है।'

श्लोक 9 (skanda.5.134.9)

उपद्रुतास्तथा देशा ध्वस्ताश्चैव तथाश्रमाः। आप्याययति दैत्योऽयं सबली मुशलायुधः॥

upadrutāstathā deśā dhvastāścaiva tathāśramāḥ| āpyāyayati daityo'yaṁ sabalī muśalāyudhaḥ||

'देश उपद्रुत हो गए हैं, तथा आश्रम भी ध्वस्त हो गए हैं; मूसल धारण करने वाला यह बलशाली दैत्य निरंतर बढ़ता जा रहा है।'

श्लोक 10 (skanda.5.134.10)

यदि त्वं घातयस्येनं पातालांतरगोचरम्। ततः समस्तवसुधापतिरेव भविष्यसि॥

yadi tvaṁ ghātayasyenaṁ pātālāṁtaragocaram| tataḥ samastavasudhāpatireva bhaviṣyasi||

'यदि तुम पाताल के भीतर रहने वाले इस दानव का वध कर दो, तो तुम संपूर्ण पृथ्वी के अधिपति बन जाओगे।'

श्लोक 11 (skanda.5.134.11)

इति विप्र वचः श्रुत्वा मंत्रयामास पार्थिवः। मंत्रिभिः सहितोऽमोघं श्रुत्वा मुशलमद्रिजे॥

iti vipra vacaḥ śrutvā maṁtrayāmāsa pārthivaḥ| maṁtribhiḥ sahito'moghaṁ śrutvā muśalamadrije||

हे अद्रिजे! ब्राह्मण के ये वचन सुनकर तथा उस अमोघ मूसल के विषय में सुनकर राजा ने अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा की।

श्लोक 12 (skanda.5.134.12)

तं मंत्रं क्रियमाणं तु सूनुभ्यां सह मंत्रिभिः। तत्पार्श्ववर्त्तिनी कन्या शुश्रावाथ मुदावती॥

taṁ maṁtraṁ kriyamāṇaṁ tu sūnubhyāṁ saha maṁtribhiḥ| tatpārśvavarttinī kanyā śuśrāvātha mudāvatī||

पुत्रों तथा मंत्रियों सहित होने वाली उस मंत्रणा को समीप खड़ी मुदावती नामक कन्या ने सुन लिया।

श्लोक 13 (skanda.5.134.13)

ततः कतिपयाहे तु तां कन्यां जलजेक्षणाम्। जहारोपवनाद्दैत्यः कुजंभः स्वसखीवृताम्॥

tataḥ katipayāhe tu tāṁ kanyāṁ jalajekṣaṇām| jahāropavanāddaityaḥ kujaṁbhaḥ svasakhīvṛtām||

इसके कुछ दिनों बाद उस कमलनयनी कन्या को, जो अपनी सखियों से घिरी हुई थी, कुजंभ दानव उपवन से हर ले गया।

श्लोक 14 (skanda.5.134.14)

एतच्छ्रुत्वा महीपालः क्रोधपर्याकुलेक्षणः। उवाच पुत्रौ जानेऽहं सकुजंभो महासुरः॥

etacchrutvā mahīpālaḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ| uvāca putrau jāne'haṁ sakujaṁbho mahāsuraḥ||

यह सुनकर राजा के नेत्र क्रोध से व्याकुल हो गए, और उन्होंने अपने पुत्रों से कहा - 'मैं जानता हूं कि वह महासुर कुजंभ ही -'

श्लोक 15 (skanda.5.134.15)

दृष्ट्वा भूमौ पुरा गत्तें तत्र संशयिते मयि। कथितो द्विजमुख्येन मया पृष्टेन पुत्रकौ॥

dṛṣṭvā bhūmau purā gatteṁ tatra saṁśayite mayi| kathito dvijamukhyena mayā pṛṣṭena putrakau||

'—हे पुत्रो! पहले पृथ्वी पर उस गर्त को देखकर जब मुझे संशय हुआ था, तब मेरे पूछने पर द्विजश्रेष्ठ ने मुझे यह बताया था।'

श्लोक 16 (skanda.5.134.16)

स हन्यतां सोऽपहर्त्ता मुदावत्याः सुदुर्मतिः। प्रस्थितौ नृपभक्त्याथ स्वसैन्यपरिवारितौ॥

sa hanyatāṁ so'paharttā mudāvatyāḥ sudurmatiḥ| prasthitau nṛpabhaktyātha svasainyaparivāritau||

'उस दुर्मति को मार डाला जाए, जो मुदावती का अपहरणकर्ता है।' तब राजा के प्रति भक्तिवश वे दोनों पुत्र अपनी-अपनी सेना सहित प्रस्थान कर गए।

श्लोक 17 (skanda.5.134.17)

तौ सुतौ तत्र संप्राप्तौ पाताले पितृशासनात्। युयुधाते कुजंभेन स्वशक्त्या सेनया वृतौ॥

tau sutau tatra saṁprāptau pātāle pitṛśāsanāt| yuyudhāte kujaṁbhena svaśaktyā senayā vṛtau||

पिता की आज्ञा से पाताल में पहुंचे वे दोनों पुत्र अपनी-अपनी सेना से घिरे हुए, अपनी पूरी शक्ति से कुजंभ के साथ युद्ध करने लगे।

श्लोक 18 (skanda.5.134.18)

ततः परिघनिस्त्रिंशशक्तिशूलपरश्वधैः। बाणैश्चिरतरं युद्धं तेषामासीत्सदारुणम्॥

tataḥ parighanistriṁśaśaktiśūlaparaśvadhaiḥ| bāṇaiścirataraṁ yuddhaṁ teṣāmāsītsadāruṇam||

तब लोहे के परिघ, तलवार, शक्ति, त्रिशूल, फरसे तथा बाणों से उनके बीच बहुत देर तक अत्यंत भयंकर युद्ध होता रहा।

श्लोक 19 (skanda.5.134.19)

ततो मायाबलवता तेन दैत्येन तत्क्षणात्। अमोघेनाद्वितीयेन मुशलेन वरानने॥

tato māyābalavatā tena daityena tatkṣaṇāt| amoghenādvitīyena muśalena varānane||

हे वरानने! तब माया से बलशाली उस दैत्य ने अपने अमोघ और अद्वितीय मूसल से उसी क्षण -

श्लोक 20 (skanda.5.134.20)

हत सैन्यौ रणे बद्धौ राजपुत्रौ महाबलौ॥

hata sainyau raṇe baddhau rājaputrau mahābalau||

- उनकी सेनाओं का वध कर दिया, और युद्ध में उन दोनों महाबली राजपुत्रों को बांध लिया।

श्लोक 21 (skanda.5.134.21)

ततः श्रुत्वा महीपालो विवर्णवदनोऽभवत्। बद्धपुत्रः परामार्त्तिं जगाम गिरिपुत्रिके॥

tataḥ śrutvā mahīpālo vivarṇavadano'bhavat| baddhaputraḥ parāmārttiṁ jagāma giriputrike||

हे गिरिपुत्रिके! यह सुनकर राजा का मुख विवर्ण हो गया; अपने पुत्रों के बंदी होने से वह अत्यंत दुःखी हो गया।

श्लोक 22 (skanda.5.134.22)

रुरोद बहुधात्यर्थं पुत्रस्नेहेन पार्थिवः। ततो विलपतस्तस्य मार्कंडेयो महामुनिः। अनेकसृष्टिसंहारदृष्टकार्यपरावरः॥

ruroda bahudhātyarthaṁ putrasnehena pārthivaḥ| tato vilapatastasya mārkaṁḍeyo mahāmuniḥ| anekasṛṣṭisaṁhāradṛṣṭakāryaparāvaraḥ||

पुत्रस्नेह के कारण राजा अत्यंत विलाप करने लगा। तब जब वह इस प्रकार विलाप कर रहा था, अनेक सृष्टियों तथा प्रलयों के आदि-अंत के कार्यों को साक्षात् देखने वाले महामुनि मार्कंडेय -

श्लोक 23 (skanda.5.134.23)

उदितादित्यसंकाशः सप्तकल्पानुगो वशी। आजगाम नृपाभ्याशे विलपंतं ददर्श सः। राजानं कथयामास त्रिकालज्ञो महामुनिः॥

uditādityasaṁkāśaḥ saptakalpānugo vaśī| ājagāma nṛpābhyāśe vilapaṁtaṁ dadarśa saḥ| rājānaṁ kathayāmāsa trikālajño mahāmuniḥ||

- उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी, सात कल्पों तक जीवित रहने वाले, जितेंद्रिय वे मुनि राजा के समीप आए। विलाप करते हुए राजा को देखकर उन त्रिकालज्ञ महामुनि ने राजा से कहा।

श्लोक 24 (skanda.5.134.24)

मा शुचस्त्वं महीपाल क्षत्त्रियोऽसि दृढव्रतः। क्व शोक क्व महीपालो दुर्जयो लोकपालवत्॥

mā śucastvaṁ mahīpāla kṣattriyo'si dṛḍhavrataḥ| kva śoka kva mahīpālo durjayo lokapālavat||

'हे महीपाल! शोक मत करो, तुम दृढ़व्रती क्षत्रिय हो। कहां शोक, और कहां लोकपाल के समान दुर्जय राजा!'

श्लोक 25 (skanda.5.134.25)

शोकं कुपुरुषाचीर्णं त्यज त्वं राजसत्तम। उद्यमं कुरु राजेंद्र कुजंभं घातयिष्यसि॥

śokaṁ kupuruṣācīrṇaṁ tyaja tvaṁ rājasattama| udyamaṁ kuru rājeṁdra kujaṁbhaṁ ghātayiṣyasi||

'हे राजसत्तम! कुपुरुषों द्वारा किए जाने वाले इस शोक को त्याग दो। हे राजेंद्र! उद्यम करो, तुम कुजंभ का वध कर दोगे।'

श्लोक 26 (skanda.5.134.26)

नात्युच्चं मेरुशिखरं नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायः सखा यस्य नास्ति दूरे महोदधिः॥

nātyuccaṁ meruśikharaṁ nātinīcaṁ rasātalam| vyavasāyaḥ sakhā yasya nāsti dūre mahodadhiḥ||

'जिसका सखा उद्यम है, उसके लिए मेरु का शिखर अधिक ऊंचा नहीं, रसातल अधिक नीचा नहीं, तथा महासागर भी दूर नहीं है।'

श्लोक 27 (skanda.5.134.27)

महाकालवने लिंगमाराधय समाहितः। रूपेश्वरस्य देवस्य पार्श्वे दक्षिणतः स्थितम्॥

mahākālavane liṁgamārādhaya samāhitaḥ| rūpeśvarasya devasya pārśve dakṣiṇataḥ sthitam||

'महाकालवन में स्थित उस लिंग की एकाग्रचित्त होकर आराधना करो, जो देव रूपेश्वर के दक्षिण दिशा में स्थित है।'

श्लोक 28 (skanda.5.134.28)

धनुःसाहस्रतुल्यं तु मुशलस्य निवारणम्। धनुः प्राप्स्यसि राजेंद्र कुजंभं विनिपातय॥

dhanuḥsāhasratulyaṁ tu muśalasya nivāraṇam| dhanuḥ prāpsyasi rājeṁdra kujaṁbhaṁ vinipātaya||

'हे राजेंद्र! तुम्हें मूसल का निवारण करने वाला, हजार धनुषों के तुल्य वह धनुष प्राप्त होगा; उससे कुजंभ का विनाश कर दो।'

श्लोक 29 (skanda.5.134.29)

धनुःसाहस्रहस्तैस्तु रक्षितं योधसत्तमैः। लिंगं देवासुरैर्युद्धे सहस्राक्षेण सेवितम्। इंद्रेण च धनुर्लब्धं जंभो वै येन पातितः॥

dhanuḥsāhasrahastaistu rakṣitaṁ yodhasattamaiḥ| liṁgaṁ devāsurairyuddhe sahasrākṣeṇa sevitam| iṁdreṇa ca dhanurlabdhaṁ jaṁbho vai yena pātitaḥ||

'यह लिंग हजार धनुर्धारी श्रेष्ठ योद्धाओं द्वारा रक्षित है; देवासुर संग्राम में सहस्राक्ष इंद्र ने इसकी सेवा की थी, और इंद्र ने ही यहां से वह धनुष प्राप्त किया था, जिससे जंभासुर मारा गया था।'

श्लोक 30 (skanda.5.134.30)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स राजाथ विदूरथः। जगाम त्वरितो देवि महाकालवनं शुभम्॥

tasya tadvacanaṁ śrutvā sa rājātha vidūrathaḥ| jagāma tvarito devi mahākālavanaṁ śubham||

उनके ये वचन सुनकर राजा विदूरथ तब हे देवी! शीघ्रतापूर्वक शुभ महाकालवन को गया।

श्लोक 31 (skanda.5.134.31)

ददर्श तत्र तल्लिंगं पूजयामास भक्तितः। तस्य तुष्टस्तदा देवो ददौ दिव्यं धनुस्तदा॥

dadarśa tatra talliṁgaṁ pūjayāmāsa bhaktitaḥ| tasya tuṣṭastadā devo dadau divyaṁ dhanustadā||

वहां उसने उस लिंग का दर्शन किया और भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की; उससे प्रसन्न होकर देव ने उसे एक दिव्य धनुष प्रदान किया।

श्लोक 32 (skanda.5.134.32)

धनुःसाहस्रतुल्यं च मुशलस्य निवारणम्। धनुर्लब्ध्वा तदा राजा बद्धगोधांगुलित्रवान्। जगाम धीरः पातालं तेन गर्तेन सत्वरम्॥

dhanuḥsāhasratulyaṁ ca muśalasya nivāraṇam| dhanurlabdhvā tadā rājā baddhagodhāṁgulitravān| jagāma dhīraḥ pātālaṁ tena gartena satvaram||

वह धनुष हजार धनुषों के तुल्य तथा मूसल का निवारण करने वाला था। उस धनुष को प्राप्त कर, अंगुलित्राण बांधकर, वह धीर राजा उसी गर्त के मार्ग से शीघ्र पाताल को गया।

श्लोक 33 (skanda.5.134.33)

ततो ज्यास्वनमत्युग्रं स चक्रे पार्थिवस्तदा। येन पातालमखिलमासीदापूरितांतरम्॥

tato jyāsvanamatyugraṁ sa cakre pārthivastadā| yena pātālamakhilamāsīdāpūritāṁtaram||

वहां राजा ने अपने धनुष की अत्यंत भयंकर टंकार की, जिससे संपूर्ण पाताल का अंतर्भाग गूंज उठा।

श्लोक 34 (skanda.5.134.34)

ततो ज्यास्वनमाकर्ण्य कुजंभो दानवेश्वरः। आजगामातिकोपेन स्वसैन्यपरिवारितः॥

tato jyāsvanamākarṇya kujaṁbho dānaveśvaraḥ| ājagāmātikopena svasainyaparivāritaḥ||

उस टंकार को सुनकर दानवेश्वर कुजंभ अत्यंत क्रोध से अपनी सेना सहित वहां आ पहुंचा।

श्लोक 35 (skanda.5.134.35)

ततो युद्धमभूत्तस्य सह राज्ञा वरानने। दिनानि त्रीणि स यदा योधितस्तेन दानवः॥

tato yuddhamabhūttasya saha rājñā varānane| dināni trīṇi sa yadā yodhitastena dānavaḥ||

हे वरानने! तब उसका राजा के साथ युद्ध हुआ; उस दानव से राजा तीन दिनों तक युद्ध करता रहा।

श्लोक 36 (skanda.5.134.36)

ततः कोपपरीतात्मा मुशलायाभ्यधावत। गंधैर्माल्यैस्तथा धूपैः पूज्यमानः स तिष्ठति॥

tataḥ kopaparītātmā muśalāyābhyadhāvata| gaṁdhairmālyaistathā dhūpaiḥ pūjyamānaḥ sa tiṣṭhati||

तब क्रोध से व्याप्त होकर वह अपने मूसल की ओर दौड़ा, जो गंध, माला तथा धूप से पूजित होता हुआ वहां रखा था।

श्लोक 37 (skanda.5.134.37)

यावद्गृह्णाति मुशलं तावत्सा च मुदावती। पस्पर्श चंदनव्याजैरनेकैश्च पुनःपुनः॥

yāvadgṛhṇāti muśalaṁ tāvatsā ca mudāvatī| pasparśa caṁdanavyājairanekaiśca punaḥpunaḥ||

किंतु जब तक वह मूसल को ग्रहण करता, तब तक मुदावती ने चंदन आदि लगाने के बहाने उसे बार-बार छुआ।

श्लोक 38 (skanda.5.134.38)

ततः स गत्वा युयुधे मुसलेनासुरेश्वरः। तदा मुसलपातास्ते धनुषा निष्प्रभीकृताः॥

tataḥ sa gatvā yuyudhe musalenāsureśvaraḥ| tadā musalapātāste dhanuṣā niṣprabhīkṛtāḥ||

तब वह असुरेश्वर अपने मूसल सहित युद्ध करने गया; परंतु तब उस मूसल के प्रहार धनुष के द्वारा निष्प्रभावी कर दिए गए।

श्लोक 39 (skanda.5.134.39)

धनुर्ज्याघातशब्देन पतिते भूतले तदा। गतो वैवस्वतं लोकं कुजंभोनाम दानवः॥

dhanurjyāghātaśabdena patite bhūtale tadā| gato vaivasvataṁ lokaṁ kujaṁbhonāma dānavaḥ||

तब धनुष की प्रत्यंचा के प्रहार शब्द से वह पृथ्वी पर गिर पड़ा, और कुजंभ नामक वह दानव यमलोक को चला गया।

श्लोक 40 (skanda.5.134.40)

ततोऽपतत्पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपतेः। जगुर्गंधर्वपतयो देववाद्यानि सस्वनुः॥

tato'patatpuṣpavṛṣṭistasyopari mahīpateḥ| jagurgaṁdharvapatayo devavādyāni sasvanuḥ||

तब उस राजा पर पुष्पों की वर्षा हुई, गंधर्वपति गान करने लगे, तथा दिव्य वाद्य बज उठे।

श्लोक 41 (skanda.5.134.41)

स चापि राजा तं हत्वा पुत्रौ लब्ध्वा सुतां तदा। मुदावतीं मुदा युक्तो हर्षगद्गदनिर्भरः॥

sa cāpi rājā taṁ hatvā putrau labdhvā sutāṁ tadā| mudāvatīṁ mudā yukto harṣagadgadanirbharaḥ||

उस दानव का वध कर, अपने दोनों पुत्रों को तथा मुदावती कन्या को प्राप्त कर, वह राजा हर्ष से गद्गद होकर आनंदित हुआ।

श्लोक 42 (skanda.5.134.42)

पुत्राभ्यां सहितो देवि सुसंपूर्णमनोरथः। सांतःपुरपरीवारः पुनरायाद्वरानने॥

putrābhyāṁ sahito devi susaṁpūrṇamanorathaḥ| sāṁtaḥpuraparīvāraḥ punarāyādvarānane||

हे देवी! अपने दोनों पुत्रों सहित, अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर, हे वरानने! वह अपने अंतःपुर परिवार सहित पुनः लौट आया -

श्लोक 43 (skanda.5.134.43)

महाकालवने रम्ये यत्र तल्लिंगमुत्तमम्। पूजयामास रत्नैश्च वस्त्रैराभरणैस्तथा॥

mahākālavane ramye yatra talliṁgamuttamam| pūjayāmāsa ratnaiśca vastrairābharaṇaistathā||

- रमणीय महाकालवन में, जहां वह उत्तम लिंग स्थित था, और उसकी रत्न, वस्त्र तथा आभूषणों से पूजा की।

श्लोक 44 (skanda.5.134.44)

ततः स पूजितो देवैः शक्रेण च पुनःपुनः। अस्य लिंगस्य माहात्म्याद्धनुः प्राप्तं नृपेण॥

tataḥ sa pūjito devaiḥ śakreṇa ca punaḥpunaḥ| asya liṁgasya māhātmyāddhanuḥ prāptaṁ nṛpeṇa||

तत्पश्चात् देवताओं तथा इंद्र के द्वारा वह बार-बार पूजित हुआ; इस लिंग की महिमा से ही राजा को वह धनुष प्राप्त हुआ था।

श्लोक 45 (skanda.5.134.45)

कुजंभोऽपि हतो दैत्यो देवविद्वेषकारकः। धनुःसाहस्रनामायमतः ख्यातिं गमिष्यति॥

kujaṁbho'pi hato daityo devavidveṣakārakaḥ| dhanuḥsāhasranāmāyamataḥ khyātiṁ gamiṣyati||

देवद्वेषी कुजंभ दैत्य भी मारा गया; अतः यह लिंग धनुःसाहस्र नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त होगा।

श्लोक 46 (skanda.5.134.46)

भक्त्या ये पूजयिष्यंति धनुःसाहस्रमीश्वरम्। यास्यन्ति शत्रवस्तेषां क्षयं नैवात्र संशयः॥

bhaktyā ye pūjayiṣyaṁti dhanuḥsāhasramīśvaram| yāsyanti śatravasteṣāṁ kṣayaṁ naivātra saṁśayaḥ||

'जो भक्तिपूर्वक धनुःसाहस्र ईश्वर की पूजा करेंगे, उनके शत्रु निश्चय ही नष्ट हो जाएंगे, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 47 (skanda.5.134.47)

अर्चिते देवदेवेशे धनुःसाहस्रिके शिवे। अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्वरदाश्च न संशयः॥

arcite devadeveśe dhanuḥsāhasrike śive| arcitāḥ sarvadevāḥ syurvaradāśca na saṁśayaḥ||

'देवदेवेश धनुःसाहस्रिक शिव की पूजा किए जाने पर, निःसंदेह समस्त देवगण पूजित होकर वरदाता हो जाते हैं।'

श्लोक 48 (skanda.5.134.48)

प्रातर्मध्येऽपराह्णे च धनुःसाहस्रकं शिवम्। ये नमन्ति नरा नित्यं न ते नरकभोगिनः॥

prātarmadhye'parāhṇe ca dhanuḥsāhasrakaṁ śivam| ye namanti narā nityaṁ na te narakabhoginaḥ||

'जो मनुष्य प्रातः, मध्याह्न तथा सायं धनुःसाहस्रक शिव को नित्य नमस्कार करते हैं, वे कभी नरक भोगने वाले नहीं होते।'

श्लोक 49 (skanda.5.134.49)

तीर्थानां च यथा गंगा रक्षिता योधसत्तमैः। तथायं रक्षको देवो नाम्ना धनुःसहस्रकः॥

tīrthānāṁ ca yathā gaṁgā rakṣitā yodhasattamaiḥ| tathāyaṁ rakṣako devo nāmnā dhanuḥsahasrakaḥ||

'जैसे तीर्थों में गंगा श्रेष्ठ योद्धाओं द्वारा रक्षित है, वैसे ही धनुःसहस्रक नामक यह देव भी रक्षक है।'

श्लोक 50 (skanda.5.134.50)

तत्र गंगादितीर्थानि विद्यन्ते विविधानि च। सुरहस्यातिपुण्यानि सद्यः पापहराणि च॥

tatra gaṁgāditīrthāni vidyante vividhāni ca| surahasyātipuṇyāni sadyaḥ pāpaharāṇi ca||

'वहां गंगा आदि विविध तीर्थ विद्यमान हैं, जो देवताओं के अत्यंत रहस्यमय, परम पुण्यकारी तथा तत्काल पाप हरने वाले हैं।'

श्लोक 51 (skanda.5.134.51)

तेषां फलं विनिर्दिष्टं ये पश्यन्ति तु भक्तितः। धनुःसाहस्रकं नाम सदा शत्रुक्षयंकरम्॥

teṣāṁ phalaṁ vinirdiṣṭaṁ ye paśyanti tu bhaktitaḥ| dhanuḥsāhasrakaṁ nāma sadā śatrukṣayaṁkaram||

'जो भक्तिपूर्वक सदा शत्रुओं का नाश करने वाले धनुःसाहस्रक नामक लिंग का दर्शन करते हैं, उनके लिए उन तीर्थों का फल निर्दिष्ट किया गया है।'

श्लोक 52 (skanda.5.134.52)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापना शनः। धनुःसाहस्रदेवस्य देवं पशुपतिं शृणु॥

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanā śanaḥ| dhanuḥsāhasradevasya devaṁ paśupatiṁ śṛṇu||

हे देवी! यह मैंने तुम्हें भगवान धनुःसाहस्र का पापनाशक प्रभाव बताया; अब देव पशुपति के विषय में सुनो।

अध्याय 133अध्याय-सूचीअध्याय 135