अवन्ती खण्ड · अध्याय 15
शंकरादित्य-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.15.1)
सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास महातीर्थं नाम्ना शंकरवापिका। क्रीडमानेन देवेन निर्मितं तीर्थमुत्तमम्
sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa mahātīrthaṁ nāmnā śaṁkaravāpikā| krīḍamānena devena nirmitaṁ tīrthamuttamam
सनत्कुमार ने कहा—हे व्यास, शंकरवापिका नामक महातीर्थ को सुनो; यह उत्तम तीर्थ क्रीड़ारत देव द्वारा निर्मित है।
श्लोक 2 (skanda.5.15.2)
प्रक्षिप्तं देवदेवेन कपालक्षालनं जलम्। वापीगतं कृतं यस्मादतः शंकरवापिका
prakṣiptaṁ devadevena kapālakṣālanaṁ jalam| vāpīgataṁ kṛtaṁ yasmādataḥ śaṁkaravāpikā
देवदेव द्वारा कपाल धोने का जल फेंका गया; जिससे वह वापी में एकत्रित हो गया, इसीलिए इसका नाम शंकरवापिका है।
श्लोक 3 (skanda.5.15.3)
अर्काष्टम्यां नरः स्नात्वा दिशासु विदिशासु च। पूर्वादिक्रमतो यावद्वापीमध्ये तथैव च
arkāṣṭamyāṁ naraḥ snātvā diśāsu vidiśāsu ca| pūrvādikramato yāvadvāpīmadhye tathaiva ca
अर्काष्टमी को मनुष्य स्नान कर, दिशाओं और विदिशाओं में, पूर्व से क्रमशः तथा वापी के मध्य में भी...
श्लोक 4 (skanda.5.15.4)
हविष्यान्नयुतान्व्यास दद्याच्च करकान्नवान्। शाकमूलांश्च विप्रेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु
haviṣyānnayutānvyāsa dadyācca karakānnavān| śākamūlāṁśca viprebhyastasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
...हे व्यास, हविष्यान्न तथा नवीन जलपूर्ण करक, तथा शाक-मूल ब्राह्मणों को देना चाहिए; इसका पुण्यफल सुनो।
श्लोक 5 (skanda.5.15.5)
परत्र चेह ये लोकाः सर्वभावसमन्विताः। तत्रतत्र समायाति भुनक्त्यैश्वर्यमुत्तमम्
paratra ceha ye lokāḥ sarvabhāvasamanvitāḥ| tatratatra samāyāti bhunaktyaiśvaryamuttamam
इस लोक और परलोक में जो भी सर्वभावसम्पन्न लोक हैं, वहाँ-वहाँ वह जाता है और उत्तम ऐश्वर्य भोगता है।
श्लोक 6 (skanda.5.15.6)
ये नरा कीर्तयिष्यंति माहात्म्यमतिभाविकाः। रुद्रलोकेऽपि ते पूज्यास्तेभ्योऽपि सततं नमः
ye narā kīrtayiṣyaṁti māhātmyamatibhāvikāḥ| rudraloke'pi te pūjyāstebhyo'pi satataṁ namaḥ
जो अतिभावुक मनुष्य इस माहात्म्य का कीर्तन करेंगे, वे रुद्रलोक में भी पूज्य होते हैं; उन्हें सतत नमस्कार है।
श्लोक 7 (skanda.5.15.7)
सनत्कुमार उवाच। ततो वै देवदेवेशः पिनाकी वृषभध्वजः। तुष्टाव प्रयतो भूत्वा देवदेवं दिवाकरम्
sanatkumāra uvāca| tato vai devadeveśaḥ pinākī vṛṣabhadhvajaḥ| tuṣṭāva prayato bhūtvā devadevaṁ divākaram
सनत्कुमार ने कहा—तब देवदेवेश पिनाकी वृषभध्वज ने प्रयत्नपूर्वक शुद्ध होकर देवदेव दिवाकर की स्तुति की।
श्लोक 8 (skanda.5.15.8)
आजगाम दिवानाथः संतुष्टः प्राह शंकरम्
ājagāma divānāthaḥ saṁtuṣṭaḥ prāha śaṁkaram
दिवानाथ [सूर्य] प्रसन्न होकर आए और शंकर से कहने लगे।
श्लोक 9 (skanda.5.15.9)
सूर्य उवाच। वरं वरय भूतेश वरदोऽस्मि ददामि ते। तमाह वरदश्चेत्त्वं याच्यमानं कुरुष्व मे
sūrya uvāca| varaṁ varaya bhūteśa varado'smi dadāmi te| tamāha varadaścettvaṁ yācyamānaṁ kuruṣva me
सूर्य ने कहा—'हे भूतेश, वर माँगो; मैं वरदाता हूँ, मैं तुम्हें देता हूँ।' उनसे शंकर ने कहा—'यदि तुम वरदाता हो, तो मेरी याचना पूर्ण करो।'
श्लोक 10 (skanda.5.15.10)
अंशेन स्थीयतामत्र हितार्थं सर्वदेहिनाम्। अवतीर्णो रविस्तत्र श्रुत्वा माहेश्वरं वचः
aṁśena sthīyatāmatra hitārthaṁ sarvadehinām| avatīrṇo ravistatra śrutvā māheśvaraṁ vacaḥ
'यहाँ अपनी कला सहित समस्त प्राणियों के हित के लिए स्थित रहो।' महेश्वर का यह वचन सुनकर सूर्य वहाँ अवतरित हुए।
श्लोक 11 (skanda.5.15.11)
ततो देवाधिदेवस्य शंकरस्य महौजसः। वाक्येन भास्करस्तत्र ययौ ख्यातिं महाद्युतिः
tato devādhidevasya śaṁkarasya mahaujasaḥ| vākyena bhāskarastatra yayau khyātiṁ mahādyutiḥ
तब महातेजस्वी देवाधिदेव शंकर के वचन से वहाँ महाद्युति भास्कर को ख्याति प्राप्त हुई।
श्लोक 12 (skanda.5.15.12)
शंकरादित्यनामेति लोकानुग्रहकारकः। देवा दैत्याश्च गंधर्वा विस्मिताः सह किन्नरैः
śaṁkarādityanāmeti lokānugrahakārakaḥ| devā daityāśca gaṁdharvā vismitāḥ saha kinnaraiḥ
शंकरादित्य नाम से वे लोकानुग्रहकारी हुए; देव, दैत्य, गन्धर्व किन्नरों सहित विस्मित हो गए।
श्लोक 13 (skanda.5.15.13)
अहो धन्यमिदं स्थानं यत्रास्ते त्रिपुरांतकः। भास्करोऽपि च तत्रस्थस्तीर्थमध्ये च वर्तते
aho dhanyamidaṁ sthānaṁ yatrāste tripurāṁtakaḥ| bhāskaro'pi ca tatrasthastīrthamadhye ca vartate
'आश्चर्य है, धन्य है यह स्थान, जहाँ त्रिपुरान्तक विराजमान हैं; और यहाँ भास्कर भी तीर्थ के मध्य में विद्यमान हैं।'
श्लोक 14 (skanda.5.15.14)
ततस्तुष्टाश्च ते सर्वे ब्रह्माद्याः सुरसत्तमाः। देवेशं पूजयामासुरादित्यं शंकरं तथा
tatastuṣṭāśca te sarve brahmādyāḥ surasattamāḥ| deveśaṁ pūjayāmāsurādityaṁ śaṁkaraṁ tathā
तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि समस्त श्रेष्ठ देवगण प्रसन्न होकर देवेश तथा आदित्य-शंकर की पूजा करने लगे।
श्लोक 15 (skanda.5.15.15)
मूर्तिमंतश्च ते देवा अवतीर्य च शोभनम्। स्थापयित्वाऽब्रवीद्वाक्यं येऽत्र स्नास्यंति मानवाः
mūrtimaṁtaśca te devā avatīrya ca śobhanam| sthāpayitvā'bravīdvākyaṁ ye'tra snāsyaṁti mānavāḥ
वे मूर्तिमान् देवगण सुन्दर रूप में अवतीर्ण होकर, वहाँ स्थापित होकर बोले—'जो मनुष्य यहाँ स्नान करेंगे...'
श्लोक 16 (skanda.5.15.16)
न दुःखं जायते तेषां जरामरण शोकजम्। सर्वयज्ञेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम्। तस्माच्चैवाधिकं ह्यत्र शंकरादित्यदर्शनात्
na duḥkhaṁ jāyate teṣāṁ jarāmaraṇa śokajam| sarvayajñeṣu yatpuṇyaṁ sarvadāneṣu yatphalam| tasmāccaivādhikaṁ hyatra śaṁkarādityadarśanāt
'...उन्हें जरा, मृत्यु और शोक से उत्पन्न दुःख नहीं होगा। समस्त यज्ञों का जो पुण्य है, समस्त दानों का जो फल है...'
श्लोक 17 (skanda.5.15.17)
व्याधयो नाधयश्चैव दारिद्र्यं न कदाचन। ऐश्वर्यं चातुलं तेषां जायते भुवि सर्वदा
vyādhayo nādhayaścaiva dāridryaṁ na kadācana| aiśvaryaṁ cātulaṁ teṣāṁ jāyate bhuvi sarvadā
'...उससे भी अधिक फल यहाँ शंकरादित्य के दर्शन से प्राप्त होता है। न व्याधियाँ, न मानसिक पीड़ाएँ, न कभी दरिद्रता...'
श्लोक 18 (skanda.5.15.18)
न रोगो न च दारिद्र्यं वियोगो न च बन्धुभिः। जायते मुनिशार्दूल शंकरादित्यदर्शनात्
na rogo na ca dāridryaṁ viyogo na ca bandhubhiḥ| jāyate muniśārdūla śaṁkarādityadarśanāt
'...उन्हें होती है; और पृथ्वी पर उन्हें सदा अतुल ऐश्वर्य प्राप्त होता है। हे मुनिशार्दूल, शंकरादित्य के दर्शन से न रोग होता है, न दरिद्रता, न बन्धुजनों से वियोग होता है।'
श्लोक 19 (skanda.5.15.19)
इत्येवं देवदेवेन पुरा वै शूलपाणिना। शंकरादित्यनाम्ना च स्थापितं परमं पदम्
ityevaṁ devadevena purā vai śūlapāṇinā| śaṁkarādityanāmnā ca sthāpitaṁ paramaṁ padam
इस प्रकार पूर्वकाल में देवदेव शूलपाणि द्वारा शंकरादित्य के नाम से यह परम पद स्थापित किया गया।