Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 157

रेवा-माहात्म्य वर्णन

अध्याय 156अध्याय-सूचीअध्याय 158

श्लोक 1 (skanda.5.157.1)

सूत उवाच॥

sūta uvāca||

सूतजी बोले।

श्लोक 2 (skanda.5.157.2)

नर्मदायास्तु माहात्म्यं कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत्। तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यत्त्वया परिपृच्छितम्॥

narmadāyāstu māhātmyaṁ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt| tatte'haṁ sampravakṣyāmi yattvayā paripṛcchitam||

कृष्णद्वैपायन व्यास ने नर्मदा का माहात्म्य कहा था; जो तुमने पूछा है वह मैं तुम्हें भली-भाँति कहूँगा।

श्लोक 3 (skanda.5.157.3)

विस्तरं नर्मदायास्तु तीर्थानां मुनिसत्तम। कोऽन्यः शक्तोऽस्ति वै वक्तुमृते ब्रह्माणमीश्वरम्॥

vistaraṁ narmadāyāstu tīrthānāṁ munisattama| ko'nyaḥ śakto'sti vai vaktumṛte brahmāṇamīśvaram||

हे मुनिसत्तम! नर्मदा के तीर्थों का विस्तार, ब्रह्मा भगवान के अतिरिक्त और कौन कहने में समर्थ है?

श्लोक 4 (skanda.5.157.4)

एतमेव पुरा प्रश्नं पृष्टवाञ्जनमेजयः। वैशंपायनसंज्ञं तु शिष्यं द्वैपायनस्य ह॥

etameva purā praśnaṁ pṛṣṭavāñjanamejayaḥ| vaiśaṁpāyanasaṁjñaṁ tu śiṣyaṁ dvaipāyanasya ha||

यही प्रश्न पूर्वकाल में जनमेजय ने द्वैपायन के शिष्य वैशम्पायन नामक ऋषि से पूछा था।

श्लोक 5 (skanda.5.157.5)

रेवातीर्थाश्रितं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि शौनक। पुरा पारीक्षितो राजा यज्ञादीक्षासु दीक्षितः॥

revātīrthāśritaṁ puṇyaṁ tatte vakṣyāmi śaunaka| purā pārīkṣito rājā yajñādīkṣāsu dīkṣitaḥ||

हे शौनक! रेवा-तीर्थ से सम्बद्ध वह पुण्यकथा मैं तुम्हें कहूँगा। पूर्वकाल में परीक्षित्पुत्र राजा (जनमेजय) यज्ञ की दीक्षाओं में दीक्षित थे।

श्लोक 6 (skanda.5.157.6)

संभृते तु हविर्द्रव्ये वर्तमानेषु कर्मसु। आसीनेषु द्विजाग्र्येषु हूयमाने हुताशने॥

saṁbhṛte tu havirdravye vartamāneṣu karmasu| āsīneṣu dvijāgryeṣu hūyamāne hutāśane||

जब हवि-द्रव्य संचित हो चुका था, कर्म चल रहे थे, श्रेष्ठ द्विज आसीन थे, अग्नि में आहुति दी जा रही थी...

श्लोक 7 (skanda.5.157.7)

वर्तमानासु सर्वत्र तथा धर्मकथासु च। श्रूयमाणे तथा शब्दे जनैरुक्ते त्वहर्निशम्॥

vartamānāsu sarvatra tathā dharmakathāsu ca| śrūyamāṇe tathā śabde janairukte tvaharniśam||

...सर्वत्र धर्म-कथाएँ चल रही थीं, तथा दिन-रात लोगों द्वारा कहे गए शब्द सुने जा रहे थे...

श्लोक 8 (skanda.5.157.8)

यज्ञभूमौ कुलपते दीयतां भुज्यतामिति। विविधांश्च विनोदान्वै कुर्वाणेषु विनोदिषु॥

yajñabhūmau kulapate dīyatāṁ bhujyatāmiti| vividhāṁśca vinodānvai kurvāṇeṣu vinodiṣu||

'यज्ञभूमि में दिया जाए, खिलाया जाए' — हे कुलपते! विनोदकर्ता विविध विनोद कर रहे थे।

श्लोक 9 (skanda.5.157.9)

एवंविधे वर्तमाने यज्ञे स्वर्गसदःसमे। वैशंपायनमासीनं पप्रच्छ जनमेजयः॥

evaṁvidhe vartamāne yajñe svargasadaḥsame| vaiśaṁpāyanamāsīnaṁ papraccha janamejayaḥ||

स्वर्ग की सभा के समान इस प्रकार यज्ञ चलते हुए, जनमेजय ने वहाँ बैठे वैशम्पायन से पूछा।

श्लोक 10 (skanda.5.157.10)

जनमेजय उवाच। द्वैपायनप्रसादेन ज्ञानवानसि मे मतः। वैशंपायन तस्मात्त्वां पृच्छामि ऋषिसन्निधौ॥

janamejaya uvāca| dvaipāyanaprasādena jñānavānasi me mataḥ| vaiśaṁpāyana tasmāttvāṁ pṛcchāmi ṛṣisannidhau||

जनमेजय बोले — द्वैपायन की कृपा से आप ज्ञानवान माने जाते हैं; हे वैशम्पायन! इसीलिए मैं ऋषियों के समीप आपसे पूछता हूँ।

श्लोक 11 (skanda.5.157.11)

ब्रूहि मे त्वं पुरावृत्तं पितृणां तीर्थसेवनम्। चिरं नानाविधान्क्लेशान् प्राप्तास्त इति मे श्रुतम्॥

brūhi me tvaṁ purāvṛttaṁ pitṛṇāṁ tīrthasevanam| ciraṁ nānāvidhānkleśān prāptāsta iti me śrutam||

मुझे मेरे पितरों के पूर्ववृत्तान्त, तीर्थ-सेवन के विषय में कहिए। मैंने सुना है कि उन्होंने दीर्घकाल तक नाना प्रकार के क्लेश सहे।

श्लोक 12 (skanda.5.157.12)

कथं द्यूतजिताः पार्था मम पूर्वपितामहाः। आसमुद्रां महीं विप्र भ्रमन्तस्तीर्थलोभतः॥

kathaṁ dyūtajitāḥ pārthā mama pūrvapitāmahāḥ| āsamudrāṁ mahīṁ vipra bhramantastīrthalobhataḥ||

हे विप्र! द्यूत में पराजित मेरे पूर्वज पाण्डव तीर्थ-लोभ से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी पर कैसे भ्रमण करते रहे?

श्लोक 13 (skanda.5.157.13)

केन ते सहितास्तात भूमिभागाननेकशः। चेरुः कथय तत्सर्वं सर्वज्ञोऽसि मतो मम॥

kena te sahitāstāta bhūmibhāgānanekaśaḥ| ceruḥ kathaya tatsarvaṁ sarvajño'si mato mama||

हे तात! वे किसके साथ रहकर अनेक भूभागों में विचरे — वह सब कहिए, मैं मानता हूँ आप सर्वज्ञ हैं।

श्लोक 14 (skanda.5.157.14)

वैशंपायन उवाच॥

vaiśaṁpāyana uvāca||

वैशम्पायन बोले।

श्लोक 15 (skanda.5.157.15)

कथयिष्यामि भूनाथ यत्पृष्टं तु त्वयाऽनघ। नमस्कृत्य विरूपाक्षं वेदव्यासं महाकविम्॥

kathayiṣyāmi bhūnātha yatpṛṣṭaṁ tu tvayā'nagha| namaskṛtya virūpākṣaṁ vedavyāsaṁ mahākavim||

हे भूनाथ! हे अनघ! विरूपाक्ष (शिव) और महाकवि वेदव्यास को नमस्कार करके, तुमने जो पूछा है वह मैं कहूँगा।

श्लोक 16 (skanda.5.157.16)

पितामहास्तु ते पञ्च पाण्डवाः सह कृष्णया। उषित्वा ब्राह्मणैः सार्धं काम्यके वन उत्तमे॥

pitāmahāstu te pañca pāṇḍavāḥ saha kṛṣṇayā| uṣitvā brāhmaṇaiḥ sārdhaṁ kāmyake vana uttame||

तुम्हारे पितामह, वे पाँचों पाण्डव, कृष्णा (द्रौपदी) सहित, ब्राह्मणों के साथ उत्तम काम्यक वन में निवास करके...

श्लोक 17 (skanda.5.157.17)

प्रधानोद्दालके तत्र कश्यपोऽथ महामतिः। विभाण्डकश्च राजेन्द्र मुरुश्चैव महामुनिः॥

pradhānoddālake tatra kaśyapo'tha mahāmatiḥ| vibhāṇḍakaśca rājendra muruścaiva mahāmuniḥ||

वहाँ प्रधान उद्दालक, महामति कश्यप, और हे राजेन्द्र! विभाण्डक तथा महामुनि मुरु,

श्लोक 18 (skanda.5.157.18)

पुलस्त्यो लोमशश्चैव तथान्ये पुत्रपौत्रिणः। स्नात्वा निःशेषतीर्थेषु गतास्ते विन्ध्यपर्वतम्॥

pulastyo lomaśaścaiva tathānye putrapautriṇaḥ| snātvā niḥśeṣatīrtheṣu gatāste vindhyaparvatam||

पुलस्त्य, लोमश, तथा पुत्र-पौत्रों सहित अन्य ऋषि — सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करके वे विन्ध्य पर्वत को गए।

श्लोक 19 (skanda.5.157.19)

ते च तत्राश्रमं पुण्यं सर्वैर्वृक्षैः समाकुलम्। चम्पकैः कर्णकारैश्च पुन्नागैर्नागकेसरैः॥

te ca tatrāśramaṁ puṇyaṁ sarvairvṛkṣaiḥ samākulam| campakaiḥ karṇakāraiśca punnāgairnāgakesaraiḥ||

और वहाँ उन्होंने एक पवित्र आश्रम देखा, जो चम्पा, कर्णिकार, पुन्नाग और नागकेसर आदि सब वृक्षों से भरा था,

श्लोक 20 (skanda.5.157.20)

बकुलैः कोविदारैश्च दाडिमैरुपशोभितम्। पुष्पितैरर्जुनैश्चैव बिल्वपाटलकेतकैः॥

bakulaiḥ kovidāraiśca dāḍimairupaśobhitam| puṣpitairarjunaiścaiva bilvapāṭalaketakaiḥ||

बकुल, कोविदार और अनार से सुशोभित, फूले हुए अर्जुन, बिल्व, पाटल और केतकी के वृक्षों से युक्त,

श्लोक 21 (skanda.5.157.21)

कदम्बाम्रमधूकैश्च निम्बजम्बीरतिन्दुकैः। नालिकेरैः कपित्थैश्च खर्जूरपनसैस्तथा॥

kadambāmramadhūkaiśca nimbajambīratindukaiḥ| nālikeraiḥ kapitthaiśca kharjūrapanasaistathā||

कदम्ब, आम, महुआ, नीम, जम्बीर और तेंदू, नारियल और कैथ, तथा खजूर और कटहल के वृक्षों से युक्त,

श्लोक 22 (skanda.5.157.22)

नानाद्रुमलताकीर्णं नानावल्लीभिरावृतम्। सपुष्पं फलितं कान्तं वनं चैत्ररथं यथा॥

nānādrumalatākīrṇaṁ nānāvallībhirāvṛtam| sapuṣpaṁ phalitaṁ kāntaṁ vanaṁ caitrarathaṁ yathā||

अनेक वृक्षों और लताओं से भरा, अनेक बेलों से आवृत, फूलों और फलों से युक्त, चैत्ररथ वन के समान मनोहर।

श्लोक 23 (skanda.5.157.23)

जलाश्रयैस्तु विपुलैः पद्मिनीखण्डमण्डितम्। सितोत्पलैश्च संछन्नं नीलपीतैः सितारुणैः॥

jalāśrayaistu vipulaiḥ padminīkhaṇḍamaṇḍitam| sitotpalaiśca saṁchannaṁ nīlapītaiḥ sitāruṇaiḥ||

विशाल जलाशयों से युक्त, कमलिनी-खण्डों से सुसज्जित, श्वेत, नील, पीत, और लाल कमलों से आच्छादित,

श्लोक 24 (skanda.5.157.24)

हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्। आडीकाकबलाकाभिः सेवितं कोकिलादिभिः॥

haṁsakāraṇḍavākīrṇaṁ cakravākopaśobhitam| āḍīkākabalākābhiḥ sevitaṁ kokilādibhiḥ||

हंस और कारण्डव पक्षियों से भरा, चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित, बगुले-बलाकाओं तथा कोयल आदि से सेवित।

श्लोक 25 (skanda.5.157.25)

सिंहैर्व्याघ्रैर्वराहैश्च गजैश्चैव महोत्कटैः। महिषैश्च महाकायैः कुरङ्गैश्चित्रकैः शशैः॥

siṁhairvyāghrairvarāhaiśca gajaiścaiva mahotkaṭaiḥ| mahiṣaiśca mahākāyaiḥ kuraṅgaiścitrakaiḥ śaśaiḥ||

सिंह, व्याघ्र, वराह, विशाल गजराज, महाकाय भैंसे, हिरण, चित्ते और खरगोशों से युक्त,

श्लोक 26 (skanda.5.157.26)

गण्डकैश्चैव खड्गैश्च गोमायुसुरभी युतम्। सारङ्गैर्मल्लकैश्चैव द्विपदैश्च चतुष्पदैः॥

gaṇḍakaiścaiva khaḍgaiśca gomāyusurabhī yutam| sāraṅgairmallakaiścaiva dvipadaiśca catuṣpadaiḥ||

गैंडे, खड्गी, सियार तथा गोसमूह से युक्त, सारंग और मल्लक मृगों से युक्त, तथा द्विपद और चतुष्पद प्राणियों से युक्त,

श्लोक 27 (skanda.5.157.27)

तथाच कोकिलाकीर्णं मनःकान्तं सुशोभितम्। जीवंजीवकसंघैश्च नानापक्षिसमायुतम्॥

tathāca kokilākīrṇaṁ manaḥkāntaṁ suśobhitam| jīvaṁjīvakasaṁghaiśca nānāpakṣisamāyutam||

इसी प्रकार कोयलों से भरा, मन को प्रिय, सुशोभित, जीवंजीवक पक्षी-समूहों तथा नाना पक्षियों से युक्त था।

श्लोक 28 (skanda.5.157.28)

दुःखशोकविनिर्मुक्तं सत्त्वोत्कटमनोरमम्। क्षुत्तृषारहितं कान्तं सर्वव्याधिविवर्जितम्॥

duḥkhaśokavinirmuktaṁ sattvotkaṭamanoramam| kṣuttṛṣārahitaṁ kāntaṁ sarvavyādhivivarjitam||

दुःख-शोक से रहित, प्राणियों से भरा हुआ मनोरम, भूख-प्यास से रहित, मनोहर, समस्त व्याधियों से वर्जित।

श्लोक 29 (skanda.5.157.29)

सिंहीस्तनं पिबन्त्यत्र कुरंगाः स्नेहसंयुतम्। मार्जारमूषकौ चोभाववलेहत उन्मुखौ॥

siṁhīstanaṁ pibantyatra kuraṁgāḥ snehasaṁyutam| mārjāramūṣakau cobhāvavalehata unmukhau||

वहाँ हिरण सिंहनी का स्नेहयुक्त दूध पीते हैं, और बिल्ली-चूहा दोनों मुख उठाकर एक-दूसरे को चाटते हैं।

श्लोक 30 (skanda.5.157.30)

पञ्चास्याः पोतकेभाश्च भोगिनस्तु कलापिनः। दृष्ट्वा तद्विपिनं रम्यं प्रविष्टाः पाण्डुनन्दनाः॥

pañcāsyāḥ potakebhāśca bhoginastu kalāpinaḥ| dṛṣṭvā tadvipinaṁ ramyaṁ praviṣṭāḥ pāṇḍunandanāḥ||

सिंह हाथी के बच्चों के साथ और सर्प मोरों के साथ रहते हैं। उस रमणीय वन को देखकर पाण्डुनन्दन उसमें प्रविष्ट हुए।

श्लोक 31 (skanda.5.157.31)

मार्कण्डं दृष्टवांस्तत्र तरुणादित्यसन्निभम्। ऋषिभिः सेव्यमानं तु नानाशास्त्रविशारदैः॥

mārkaṇḍaṁ dṛṣṭavāṁstatra taruṇādityasannibham| ṛṣibhiḥ sevyamānaṁ tu nānāśāstraviśāradaiḥ||

वहाँ उन्होंने उदीयमान सूर्य के समान तेजस्वी मार्कण्डेय को देखा, जो नाना शास्त्रों में विशारद ऋषियों से सेवित थे,

श्लोक 32 (skanda.5.157.32)

कुलीनैः सत्त्वसम्पन्नैः शौचाचारसमन्वितैः। धीसंगतैः क्षमायुक्तैस्त्रिसंध्यं जपतत्परैः॥

kulīnaiḥ sattvasampannaiḥ śaucācārasamanvitaiḥ| dhīsaṁgataiḥ kṣamāyuktaistrisaṁdhyaṁ japatatparaiḥ||

कुलीन, सत्त्वसम्पन्न, शौच-आचार से युक्त, बुद्धिमान, क्षमावान, त्रिकाल-संध्या में जप में तत्पर ऋषियों से सेवित,

श्लोक 33 (skanda.5.157.33)

ऋग्यजुःसामविहितैर्मन्त्रैर्होमपरायणैः। केचित्पञ्चाग्निमध्यस्थाः केचिदेकान्तसंस्थिताः॥

ṛgyajuḥsāmavihitairmantrairhomaparāyaṇaiḥ| kecitpañcāgnimadhyasthāḥ kecidekāntasaṁsthitāḥ||

ऋग्, यजुः, साम में विहित मन्त्रों से होम में तत्पर; कुछ पंचाग्नि के मध्य स्थित, कुछ एकान्त में स्थित,

श्लोक 34 (skanda.5.157.34)

ऊर्ध्वबाहुनिरालम्बा आदित्यभ्रमणाः परे। सायंप्रातर्भुजश्चान्ये एकाहारास्तथा परे॥

ūrdhvabāhunirālambā ādityabhramaṇāḥ pare| sāyaṁprātarbhujaścānye ekāhārāstathā pare||

कुछ ऊर्ध्व बाहु किए बिना सहारे के, दूसरे सूर्य के साथ घूमने वाले; कुछ प्रातः-सायं ही भोजन करने वाले, दूसरे एक बार भोजन करने वाले,

श्लोक 35 (skanda.5.157.35)

द्वादशाहात्तथा चान्ये अन्ये मासार्धभोजनाः। दर्शे दर्शे तथा चान्ये अन्ये शैवालभोजनाः॥

dvādaśāhāttathā cānye anye māsārdhabhojanāḥ| darśe darśe tathā cānye anye śaivālabhojanāḥ||

कुछ बारह दिनों में एक बार, कुछ पखवाड़े में एक बार भोजन करने वाले; कुछ केवल अमावस्या को, कुछ शैवाल खाने वाले,

श्लोक 36 (skanda.5.157.36)

पिण्याकमपरेऽभुजन् केचित्पालाशभोजनाः। अपरे नियताहारा वायुभक्ष्याम्बुभोजनाः॥

piṇyākamapare'bhujan kecitpālāśabhojanāḥ| apare niyatāhārā vāyubhakṣyāmbubhojanāḥ||

कुछ केवल खली खाने वाले, कुछ पलाश के पत्ते खाने वाले; दूसरे नियमित आहार वाले, वायु या केवल जल पर जीवित रहने वाले।

श्लोक 37 (skanda.5.157.37)

एवंभूतैस्तथा वृद्धैः सेव्यते मुनिपुंगवैः। ततो धर्मसुतः श्रीमानाश्रमं तं प्रविश्य सः॥

evaṁbhūtaistathā vṛddhaiḥ sevyate munipuṁgavaiḥ| tato dharmasutaḥ śrīmānāśramaṁ taṁ praviśya saḥ||

वे इस प्रकार के वृद्ध श्रेष्ठ मुनियों द्वारा सेवित थे। तब श्रीमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिर उस आश्रम में प्रविष्ट होकर,

श्लोक 38 (skanda.5.157.38)

दृष्ट्वा मुनिवरं शान्तं ध्यायमानं परं पदम्। प्रादक्षिण्येन सहसा दण्डवत्पतितोऽग्रतः॥

dṛṣṭvā munivaraṁ śāntaṁ dhyāyamānaṁ paraṁ padam| prādakṣiṇyena sahasā daṇḍavatpatito'grataḥ||

परम पद का ध्यान करते हुए शान्त मुनिश्रेष्ठ को देखकर, प्रदक्षिणा करके तुरन्त ही दण्डवत् प्रणाम करते हुए सामने गिर पड़े।

श्लोक 39 (skanda.5.157.39)

भक्त्यानुपतितं दृष्ट्वा चिरादादाय लोचनम्। को भवानित्युवाचेदं धर्मं धीमानपृच्छत॥

bhaktyānupatitaṁ dṛṣṭvā cirādādāya locanam| ko bhavānityuvācedaṁ dharmaṁ dhīmānapṛcchata||

भक्तिपूर्वक गिरे हुए उन्हें देखकर, बहुत देर बाद आँख खोलकर, बुद्धिमान मुनि ने धर्मपुत्र से पूछा — 'आप कौन हैं?'

श्लोक 40 (skanda.5.157.40)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दारकस्तत्समीपगः। आहायं धर्मराजस्ते दर्शनार्थं समागतः॥

tasya tadvacanaṁ śrutvā dārakastatsamīpagaḥ| āhāyaṁ dharmarājaste darśanārthaṁ samāgataḥ||

उनका वह वचन सुनकर पास खड़े एक बालक ने कहा — 'यह धर्मराज आपके दर्शन के लिए आए हैं।'

श्लोक 41 (skanda.5.157.41)

तच्छ्रुत्वादारकेणोक्तं वचनं प्राह सादरः। एह्येहि वत्सवत्सेति किंचित्स्थानाच्चलन्मुनिः। तं तु स्नेहादुपाघ्राय आसने उपवेशयत्॥

tacchrutvādārakeṇoktaṁ vacanaṁ prāha sādaraḥ| ehyehi vatsavatseti kiṁcitsthānāccalanmuniḥ| taṁ tu snehādupāghrāya āsane upaveśayat||

बालक द्वारा कहा गया वह वचन सुनकर मुनि ने आदरपूर्वक कहा — 'आओ आओ वत्स, वत्स' — और अपने स्थान से थोड़ा हटकर, उन्हें स्नेह से आघ्राण (मस्तक चूमकर) कर आसन पर बैठाया।

श्लोक 42 (skanda.5.157.42)

उपविष्टे सभायां तु पूजां कृत्वा यथाविधि। वन्यैर्धान्यैः फलैर्मूलै रसैश्चैव पृथग्विधैः॥

upaviṣṭe sabhāyāṁ tu pūjāṁ kṛtvā yathāvidhi| vanyairdhānyaiḥ phalairmūlai rasaiścaiva pṛthagvidhaiḥ||

सभा में बैठाए जाने पर, विधिपूर्वक पूजा करके, वन्य धान्य, फल, मूल तथा नाना प्रकार के रसों से...

श्लोक 43 (skanda.5.157.43)

पाण्डवा ब्राह्मणैः सार्द्धं यथायोग्यं प्रपूजिताः। मुहूर्तादथ विश्रम्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥

pāṇḍavā brāhmaṇaiḥ sārddhaṁ yathāyogyaṁ prapūjitāḥ| muhūrtādatha viśramya dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ||

पाण्डवों को, ब्राह्मणों सहित, यथायोग्य पूजित किया गया। तब मुहूर्त भर विश्राम करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने,

श्लोक 44 (skanda.5.157.44)

पृच्छति स्म मुनिश्रेष्ठं कौतूहलसमन्वितः। भगवन्सर्वलोकानां दीर्घायुस्त्वं मतो मम॥

pṛcchati sma muniśreṣṭhaṁ kautūhalasamanvitaḥ| bhagavansarvalokānāṁ dīrghāyustvaṁ mato mama||

कुतूहलपूर्वक श्रेष्ठ मुनि से पूछा — 'हे भगवन्! मैं आपको समस्त लोकों में दीर्घायु मानता हूँ।'

श्लोक 45 (skanda.5.157.45)

सप्तकल्पानशेषेण कथयस्व ममानघ। कल्पक्षयेऽपि लोकस्य स्थावरस्येतरस्य च॥

saptakalpānaśeṣeṇa kathayasva mamānagha| kalpakṣaye'pi lokasya sthāvarasyetarasya ca||

हे अनघ! मुझसे सातों कल्पों का सम्पूर्ण वृत्तान्त कहिए — कल्प के क्षय होने पर भी स्थावर-जंगम लोक के...

श्लोक 46 (skanda.5.157.46)

न विनष्टोऽसि विप्रेन्द्र कथं वा केन हेतुना। गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्रान्ताश्च या मुने॥

na vinaṣṭo'si viprendra kathaṁ vā kena hetunā| gaṅgādyāḥ saritaḥ sarvāḥ samudrāntāśca yā mune||

...आप, हे विप्रेन्द्र! नष्ट क्यों नहीं हुए, किस कारण से? और हे मुने! गंगा आदि जो सब नदियाँ समुद्र में मिलती हैं,

श्लोक 47 (skanda.5.157.47)

तासां मध्ये स्थिताः काः स्वित्काश्चैव प्रलयं गताः। का नु पुण्यजला नित्यं कानु न क्षयमागता॥

tāsāṁ madhye sthitāḥ kāḥ svitkāścaiva pralayaṁ gatāḥ| kā nu puṇyajalā nityaṁ kānu na kṣayamāgatā||

उनमें से कौन-सी शेष रहीं और कौन-सी प्रलय को प्राप्त हुईं? कौन सदा पुण्यजला है और कौन कभी क्षय को नहीं प्राप्त हुई?

श्लोक 48 (skanda.5.157.48)

एतत्कथय मे तात प्रसन्नेनान्तरात्मना। श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण ऋषिभिः सह बान्धवैः॥

etatkathaya me tāta prasannenāntarātmanā| śrotumicchāmyaśeṣeṇa ṛṣibhiḥ saha bāndhavaiḥ||

हे तात! यह मुझे प्रसन्न अन्तरात्मा से कहिए। मैं ऋषियों और बन्धुओं सहित इसे सम्पूर्णतः सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 49 (skanda.5.157.49)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। साधुसाधु महाप्राज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर। कथयामि यथा न्यायं यत्पृच्छसि ममानघ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| sādhusādhu mahāprājña dharmaputra yudhiṣṭhira| kathayāmi yathā nyāyaṁ yatpṛcchasi mamānagha||

श्रीमार्कण्डेय बोले — साधु साधु, हे महाप्राज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर! हे अनघ! तुमने जो पूछा है वह मैं यथावत् कहता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.5.157.50)

सर्वपापहरं पुण्यं पुराणं रुद्रभाषितम्। यः शृणोति नरो भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु॥

sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ purāṇaṁ rudrabhāṣitam| yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu||

यह रुद्र-भाषित पुराण सर्वपापहारी और पुण्यकारक है; जो पुरुष इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके पुण्यफल को सुनो।

श्लोक 51 (skanda.5.157.51)

अश्वमेध सहस्रेण वाजपेयशतेन च। तत्फलं समवाप्नोति राजन्नास्त्यत्र संशयः॥

aśvamedha sahasreṇa vājapeyaśatena ca| tatphalaṁ samavāpnoti rājannāstyatra saṁśayaḥ||

हे राजन्! वह सहस्र अश्वमेध तथा शत वाजपेय यज्ञों का फल प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 52 (skanda.5.157.52)

ब्रह्मघ्नश्च सुरापी च स्तेयी गोघ्नश्च यो नरः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रस्य वचनं यथा॥

brahmaghnaśca surāpī ca steyī goghnaśca yo naraḥ| mucyate sarvapāpebhyo rudrasya vacanaṁ yathā||

ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर तथा गोहत्यारा पुरुष भी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — ऐसा रुद्र का वचन है।

श्लोक 53 (skanda.5.157.53)

गङ्गा तु सरितां श्रेष्ठा तथा चैव सरस्वती। कावेरी देविका चैव सिन्धुः सालकुटी तथा॥

gaṅgā tu saritāṁ śreṣṭhā tathā caiva sarasvatī| kāverī devikā caiva sindhuḥ sālakuṭī tathā||

गंगा नदियों में श्रेष्ठ है, वैसे ही सरस्वती भी; कावेरी, देविका, सिन्धु, तथा सालकुटी भी,

श्लोक 54 (skanda.5.157.54)

सरयूः शतरुद्रा च मही चर्मिलया सह। गोदावरी तथा पुण्या तथैव यमुना नदी॥

sarayūḥ śatarudrā ca mahī carmilayā saha| godāvarī tathā puṇyā tathaiva yamunā nadī||

सरयू, शतरुद्रा, चर्मिला सहित मही, तथा पुण्य गोदावरी, और यमुना नदी भी,

श्लोक 55 (skanda.5.157.55)

पयोष्णी च शतद्रुश्च तथा धर्मनदी शुभा। एताश्चान्याश्च सरितः सर्वपापहराः स्मृताः॥

payoṣṇī ca śatadruśca tathā dharmanadī śubhā| etāścānyāśca saritaḥ sarvapāpaharāḥ smṛtāḥ||

पयोष्णी, शतद्रु, तथा शुभ धर्मनदी — ये तथा अन्य नदियाँ सर्वपापहारी स्मृत हैं।

श्लोक 56 (skanda.5.157.56)

किं तु ते कारणं तात वक्ष्यामि नृपसत्तम। समुद्राः सरितः सर्वाः कल्पे कल्पे क्षयं गताः॥

kiṁ tu te kāraṇaṁ tāta vakṣyāmi nṛpasattama| samudrāḥ saritaḥ sarvāḥ kalpe kalpe kṣayaṁ gatāḥ||

किन्तु हे तात, हे नृपसत्तम! इसका कारण मैं कहूँगा — समुद्र सहित सभी नदियाँ प्रत्येक कल्प में नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 57 (skanda.5.157.57)

सप्तकल्पक्षये क्षीणे न मृता तेन नर्मदा। नर्मदैकैव राजेन्द्र परं तिष्ठेत्सरिद्वरा॥

saptakalpakṣaye kṣīṇe na mṛtā tena narmadā| narmadaikaiva rājendra paraṁ tiṣṭhetsaridvarā||

सात कल्पों के क्षय होने पर भी नर्मदा नहीं मरी। हे राजेन्द्र! नर्मदा ही अकेली श्रेष्ठ नदी शेष रहती है।

श्लोक 58 (skanda.5.157.58)

तोयपूर्णा महाभाग मुनिसंघैरभिष्टुता। गंगाद्याः सरितश्चान्याः कल्पे कल्पे क्षयं गताः॥

toyapūrṇā mahābhāga munisaṁghairabhiṣṭutā| gaṁgādyāḥ saritaścānyāḥ kalpe kalpe kṣayaṁ gatāḥ||

हे महाभाग! वह जल से पूर्ण, मुनि-समूहों से स्तुत रहती है, जबकि गंगा आदि अन्य नदियाँ प्रत्येक कल्प में नष्ट हो जाती हैं।

श्लोक 59 (skanda.5.157.59)

एषा देवी पुरा दृष्टा तेन वक्ष्यामि तेऽनघ॥

eṣā devī purā dṛṣṭā tena vakṣyāmi te'nagha||

इस देवी को मैंने पूर्वकाल में देखा था; इसलिए हे अनघ! मैं तुम्हें उसके विषय में कहूँगा।

अध्याय 156अध्याय-सूचीअध्याय 158