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अवन्ती खण्ड · अध्याय 158

मार्कण्डेय-धर्मराज संवाद में कल्पक्षय के समय मार्कण्डेय द्वारा पोत-आरोहण का वृत्तान्त

अध्याय 157अध्याय-सूचीअध्याय 159

श्लोक 1 (skanda.5.158.1)

युधिष्ठिर उवाच। सप्तकल्पक्षया घोरास्त्वया दृष्टा महामुने। न चापीहास्ति भगवन्दीर्घायुरिह कश्चन॥

yudhiṣṭhira uvāca| saptakalpakṣayā ghorāstvayā dṛṣṭā mahāmune| na cāpīhāsti bhagavandīrghāyuriha kaścana||

युधिष्ठिर बोले — हे महामुने! आपने सात कल्पों के भयंकर क्षय देखे हैं; फिर भी, हे भगवन्! यहाँ आपके समान दीर्घायु कोई और नहीं है।

श्लोक 2 (skanda.5.158.2)

त्वया ह्येकार्णवे सुप्तः पद्मनाभः सुरारिहा। दृष्टः सहस्रचरणः सहस्रनयनोदरः॥

tvayā hyekārṇave suptaḥ padmanābhaḥ surārihā| dṛṣṭaḥ sahasracaraṇaḥ sahasranayanodaraḥ||

आपने ही एकार्णव में सोए हुए, देवशत्रुओं के नाशक, सहस्रचरण, सहस्र नेत्रों को उदर में धारण करने वाले पद्मनाभ को देखा है।

श्लोक 3 (skanda.5.158.3)

त्वं किलानुग्रहात्तस्य दह्यमाने चराचरे। न क्षयं समनुप्राप्तो वरदानान्महात्मनः॥

tvaṁ kilānugrahāttasya dahyamāne carācare| na kṣayaṁ samanuprāpto varadānānmahātmanaḥ||

उन्हीं महात्मा की कृपा और वरदान से चराचर जगत के जलते समय भी आपका क्षय नहीं हुआ।

श्लोक 4 (skanda.5.158.4)

किं त्वयाश्चर्यभूतं हि दृष्टं च भ्रमतानघ। एतदाचक्ष्व भगवन्परं कौतूहलं हि मे॥

kiṁ tvayāścaryabhūtaṁ hi dṛṣṭaṁ ca bhramatānagha| etadācakṣva bhagavanparaṁ kautūhalaṁ hi me||

हे अनघ! भ्रमण करते हुए आपने और कौन-सा आश्चर्य देखा? हे भगवन्! यह मुझसे कहिए, मुझे इसमें अत्यन्त कुतूहल है।

श्लोक 5 (skanda.5.158.5)

सम्प्राप्ते च महाघोरे युगस्यान्ते महाक्षये। अनावृष्टिहते लोके पुरा वर्षशताधिके॥

samprāpte ca mahāghore yugasyānte mahākṣaye| anāvṛṣṭihate loke purā varṣaśatādhike||

युग के अन्त में जब महाभयंकर महाप्रलय आया, सौ वर्षों से अधिक अनावृष्टि से पीड़ित लोक में,

श्लोक 6 (skanda.5.158.6)

औषधीनां क्षये घोरे देवदानववर्जिते। निर्वीर्ये निर्वषट्कारे कलिना दूषिते भृशम्॥

auṣadhīnāṁ kṣaye ghore devadānavavarjite| nirvīrye nirvaṣaṭkāre kalinā dūṣite bhṛśam||

औषधियों के भयंकर क्षय में, देव-दानवों से रहित, वीर्यहीन, वषट्कार-रहित, कलि से अत्यन्त दूषित,

श्लोक 7 (skanda.5.158.7)

सरित्सरस्तडागेषु पल्वलोपवनेषु च। संशुष्केषु तदा ब्रह्मन्निराकारे युगक्षये॥

saritsarastaḍāgeṣu palvalopavaneṣu ca| saṁśuṣkeṣu tadā brahmannirākāre yugakṣaye||

हे ब्रह्मन्! नदी, सरोवर, तालाब, पल्वल और उपवन सूख जाने पर, युग के उस निराकार क्षय में,

श्लोक 8 (skanda.5.158.8)

जनं प्राप्ते महर्लोके ब्रह्मक्षत्रविशादयः। ऋषयश्च महात्मानो दिव्यतेजःसमन्विताः॥

janaṁ prāpte maharloke brahmakṣatraviśādayaḥ| ṛṣayaśca mahātmāno divyatejaḥsamanvitāḥ||

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि तथा दिव्य तेज से युक्त महात्मा ऋषि जनलोक-महर्लोक को प्राप्त हो जाने पर,

श्लोक 9 (skanda.5.158.9)

स्थितानि कानि भूतानि गतान्येव महामुने। एतत्सर्वं महाभाग कथयस्व पृथक्पृथक्॥

sthitāni kāni bhūtāni gatānyeva mahāmune| etatsarvaṁ mahābhāga kathayasva pṛthakpṛthak||

हे महामुने! कौन-से प्राणी वहाँ स्थित रहे और कौन-से चले गए? हे महाभाग! यह सब मुझे पृथक्-पृथक् कहिए।

श्लोक 10 (skanda.5.158.10)

भूतानि कानि विप्रेन्द्र कथं सिद्धिमवाप्नुयात्। ब्रह्मविष्ण्विन्द्ररुद्राणां काले प्राप्ते सुदारुणे॥

bhūtāni kāni viprendra kathaṁ siddhimavāpnuyāt| brahmaviṣṇvindrarudrāṇāṁ kāle prāpte sudāruṇe||

हे विप्रेन्द्र! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और रुद्र का वह अत्यन्त भयंकर काल आने पर कौन-से प्राणी सिद्धि को प्राप्त होते हैं और कैसे?

श्लोक 11 (skanda.5.158.11)

एवमुक्तस्ततः सोऽथ धर्मराजेन धीमता। मार्कण्डः प्रत्युवाचेदमृषिसंघैः समावृतः॥

evamuktastataḥ so'tha dharmarājena dhīmatā| mārkaṇḍaḥ pratyuvācedamṛṣisaṁghaiḥ samāvṛtaḥ||

बुद्धिमान धर्मराज द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, ऋषि-समूहों से घिरे मार्कण्डेय ने यह उत्तर दिया।

श्लोक 12 (skanda.5.158.12)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। शृण्वन्तु ऋषयः सर्वे त्वया सह नरेश्वर। महत्पुराणं पूर्वोक्तं शंभुना वायुदैवते॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| śṛṇvantu ṛṣayaḥ sarve tvayā saha nareśvara| mahatpurāṇaṁ pūrvoktaṁ śaṁbhunā vāyudaivate||

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे नरेश्वर! सभी ऋषि आपके साथ सुनें — यह महापुराण पूर्वकाल में शम्भु द्वारा वायुदेव से कहा गया था।

श्लोक 13 (skanda.5.158.13)

वायोः सकाशात्स्कन्देन श्रुतमेतत्पुरातनम्। वसिष्ठः श्रुतवांस्तस्मात्पराशरस्ततः परम्॥

vāyoḥ sakāśātskandena śrutametatpurātanam| vasiṣṭhaḥ śrutavāṁstasmātparāśarastataḥ param||

वायु से यह प्राचीन पुराण स्कन्द ने सुना, उनसे वसिष्ठ ने सुना, फिर उनसे पराशर ने,

श्लोक 14 (skanda.5.158.14)

तस्माच्च जातूकर्ण्येन तस्माच्चैव महर्षिभिः। एवं परम्पराप्रोक्तं शतसंख्यैर्द्विजोत्तमैः॥

tasmācca jātūkarṇyena tasmāccaiva maharṣibhiḥ| evaṁ paramparāproktaṁ śatasaṁkhyairdvijottamaiḥ||

उनसे जातूकर्ण्य ने, और उनसे ही महर्षियों ने — इस प्रकार शतशः श्रेष्ठ द्विजों द्वारा परम्परा से कहा गया।

श्लोक 15 (skanda.5.158.15)

संहिता शतसाहस्री पुरोक्ता शंभुना किल। आलोड्य सर्वशास्त्राणि वदार्थं तत्त्वतः पुरा॥

saṁhitā śatasāhasrī puroktā śaṁbhunā kila| āloḍya sarvaśāstrāṇi vadārthaṁ tattvataḥ purā||

वह लाख श्लोकों वाली संहिता पूर्वकाल में शम्भु द्वारा ही कही गई थी, समस्त शास्त्रों का मन्थन करके, उसके तत्त्वार्थ को बताते हुए।

श्लोक 16 (skanda.5.158.16)

युगरूपेण सा पश्चाच्चतुर्धा विनियोजिता। मदप्रज्ञानुसारेण नराणां तु महर्षिभिः॥

yugarūpeṇa sā paścāccaturdhā viniyojitā| madaprajñānusāreṇa narāṇāṁ tu maharṣibhiḥ||

बाद में वह युगों के अनुरूप महर्षियों द्वारा मनुष्यों की बुद्धि के अनुसार चार भागों में विभाजित की गई।

श्लोक 17 (skanda.5.158.17)

आराध्य पशुभर्तारं मया पूर्वं महेश्वरम्। पुराणं श्रुतमेतद्धि तत्ते वक्ष्याम्यशेषतः॥

ārādhya paśubhartāraṁ mayā pūrvaṁ maheśvaram| purāṇaṁ śrutametaddhi tatte vakṣyāmyaśeṣataḥ||

पहले मैंने पशुपति महेश्वर की आराधना करके यह पुराण सुना था; वही मैं तुम्हें सम्पूर्णतः कहूँगा।

श्लोक 18 (skanda.5.158.18)

यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुः सर्वपापैर्नरेश्वर। मानसैः कर्मजैश्चैव सप्तजन्मसु संचितैः॥

yacchrutvā mucyate jantuḥ sarvapāpairnareśvara| mānasaiḥ karmajaiścaiva saptajanmasu saṁcitaiḥ||

हे नरेश्वर! जिसे सुनकर प्राणी सात जन्मों में संचित मानसिक और कर्मजन्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 19 (skanda.5.158.19)

सप्तकल्पक्षया घोरा मया दृष्टाः पुनःपुनः। प्रसादाद्देवदेवस्य विष्णोश्च परमेष्ठिनः॥

saptakalpakṣayā ghorā mayā dṛṣṭāḥ punaḥpunaḥ| prasādāddevadevasya viṣṇośca parameṣṭhinaḥ||

देवदेव विष्णु और परमेष्ठी की कृपा से मैंने सात कल्पों के भयंकर क्षय बार-बार देखे हैं।

श्लोक 20 (skanda.5.158.20)

द्वादशादित्यनिर्दग्धे जगत्येकार्णवीकृते। श्रान्तोऽहं विभ्रमंस्तत्र तरन्बाहुभिरर्णवम्॥

dvādaśādityanirdagdhe jagatyekārṇavīkṛte| śrānto'haṁ vibhramaṁstatra taranbāhubhirarṇavam||

जब बारह आदित्यों से जगत जलकर एकार्णव हो गया, तब मैं थका हुआ वहाँ भुजाओं से समुद्र तैरते हुए भ्रमण कर रहा था।

श्लोक 21 (skanda.5.158.21)

अथाहं सलिले राजन्नादित्यसमरूपिणम्। पुरा पुरुषमद्राक्षमनादिनिधनं प्रभुम्॥

athāhaṁ salile rājannādityasamarūpiṇam| purā puruṣamadrākṣamanādinidhanaṁ prabhum||

हे राजन्! तब मैंने जल में सूर्य के समान तेजस्वी, अनादि-अनन्त प्रभु पुरुष को देखा।

श्लोक 22 (skanda.5.158.22)

शृङ्गं चैवाद्रिराजस्य भासयन्तं दिशो दश। द्वितीयोऽन्यो मनुर्दृष्टः पुत्रपौत्रसमन्वितः॥

śṛṅgaṁ caivādrirājasya bhāsayantaṁ diśo daśa| dvitīyo'nyo manurdṛṣṭaḥ putrapautrasamanvitaḥ||

वे पर्वतराज के शिखर को तथा दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। वहाँ मैंने पुत्र-पौत्रों सहित एक दूसरे मनु को भी देखा।

श्लोक 23 (skanda.5.158.23)

अगाधे भ्रमते सोऽपि तमोभूते महार्णवे। अविश्रमन्मुहूर्तं तु चक्रारूढ इव भ्रमन्॥

agādhe bhramate so'pi tamobhūte mahārṇave| aviśramanmuhūrtaṁ tu cakrārūḍha iva bhraman||

वे भी उस अगाध, अंधकारमय महासागर में, चक्र पर चढ़े हुए के समान बिना विश्राम किए भ्रमण कर रहे थे।

श्लोक 24 (skanda.5.158.24)

अथाहं भयादुद्विग्नस्तरन्बाहुभिरर्णवम्। तत्रस्थोऽहं महामत्स्यमपश्यं मदसंयुतम्॥

athāhaṁ bhayādudvignastaranbāhubhirarṇavam| tatrastho'haṁ mahāmatsyamapaśyaṁ madasaṁyutam||

तब मैं भय से उद्विग्न होकर भुजाओं से समुद्र तैरते हुए वहाँ खड़ा था, तभी मैंने मदमत्त महामत्स्य को देखा।

श्लोक 25 (skanda.5.158.25)

ततोऽब्रवीत्स मां दृष्ट्वा एह्येहीति च भारत। परं प्रधानः सर्वेषां मत्स्यरूपो महेश्वरः॥

tato'bravītsa māṁ dṛṣṭvā ehyehīti ca bhārata| paraṁ pradhānaḥ sarveṣāṁ matsyarūpo maheśvaraḥ||

हे भारत! मुझे देखकर सबमें प्रधान वह मत्स्यरूपधारी महेश्वर बोले — 'आओ, आओ'।

श्लोक 26 (skanda.5.158.26)

ततोऽहं त्वरया गत्वा तन्मुखे मनुजेश्वर। सुश्रान्तो विगतज्ञानः परं निर्वेदमागतः॥

tato'haṁ tvarayā gatvā tanmukhe manujeśvara| suśrānto vigatajñānaḥ paraṁ nirvedamāgataḥ||

हे मनुजेश्वर! तब मैं शीघ्रता से उनके मुख में जाकर, अत्यन्त थका हुआ, चेतनाशून्य, परम निर्वेद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 27 (skanda.5.158.27)

ततोऽद्राक्षं समुद्रान्ते महदावर्तसंकुलाम्। उद्यत्तरंगसलिलां फेनपुञ्जाट्टहासिनीम्॥

tato'drākṣaṁ samudrānte mahadāvartasaṁkulām| udyattaraṁgasalilāṁ phenapuñjāṭṭahāsinīm||

तब मैंने समुद्र के किनारे बड़े-बड़े भँवरों से भरी, उठती तरंगों वाले जल की, फेन-समूहों से मानो अट्टहास करती हुई...

श्लोक 28 (skanda.5.158.28)

नदीं कामगमां पुण्यां झषमीनसमाकुलाम्। नद्यास्तस्यास्तु मध्यस्था प्रमदा कामरूपिणी॥

nadīṁ kāmagamāṁ puṇyāṁ jhaṣamīnasamākulām| nadyāstasyāstu madhyasthā pramadā kāmarūpiṇī||

...इच्छानुसार गमन करने वाली, पुण्य, मछलियों से भरी नदी को देखा। उस नदी के मध्य में इच्छानुसार रूप धरने वाली एक स्त्री खड़ी थी,

श्लोक 29 (skanda.5.158.29)

नीलोत्पलदलश्यामा महत्प्रक्षोभवाहिनी। दिव्यहाटकचित्राङ्गी कनकोज्ज्वलशोभिता॥

nīlotpaladalaśyāmā mahatprakṣobhavāhinī| divyahāṭakacitrāṅgī kanakojjvalaśobhitā||

नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्याम, महाप्रक्षोभ को वहन करने वाली, दिव्य स्वर्ण से चित्रित अंगों वाली, कनक की उज्ज्वल शोभा से युक्त।

श्लोक 30 (skanda.5.158.30)

द्वाभ्यां संगृह्य जानुभ्यां महत्पोतं व्यवस्थिता। तां मनुः प्रत्युवाचेदं का त्वं दिव्यवराङ्गने॥

dvābhyāṁ saṁgṛhya jānubhyāṁ mahatpotaṁ vyavasthitā| tāṁ manuḥ pratyuvācedaṁ kā tvaṁ divyavarāṅgane||

अपने दोनों घुटनों से एक बड़े पोत को पकड़े हुए वह खड़ी थी। मनु ने उससे कहा — 'हे दिव्य श्रेष्ठ नारी! तुम कौन हो,

श्लोक 31 (skanda.5.158.31)

तिष्ठसे केन कार्येण त्वमत्र सुरसुन्दरि। सुरासुरगणे नष्टे भ्रमसे लीलयार्णवे॥

tiṣṭhase kena kāryeṇa tvamatra surasundari| surāsuragaṇe naṣṭe bhramase līlayārṇave||

हे देवसुन्दरि! तुम यहाँ किस कार्य के लिए खड़ी हो? देव-दानवों के नष्ट हो जाने पर तुम इस समुद्र में लीलापूर्वक भ्रमण करती हो।

श्लोक 32 (skanda.5.158.32)

सरितः सागराः शैलाः क्षयं प्राप्ता ह्यनेकशः। त्वमेका तु कथं साध्वि तिष्ठसे कारणं महत्। श्रोतुमिच्छाम्यहं देवि कथयस्व ह्यशेषतः॥

saritaḥ sāgarāḥ śailāḥ kṣayaṁ prāptā hyanekaśaḥ| tvamekā tu kathaṁ sādhvi tiṣṭhase kāraṇaṁ mahat| śrotumicchāmyahaṁ devi kathayasva hyaśeṣataḥ||

नदियाँ, समुद्र, पर्वत — सब अनेकशः नष्ट हो चुके हैं। हे साध्वि! तुम अकेली कैसे शेष रही — इसका बड़ा कारण होगा; हे देवि! मैं सुनना चाहता हूँ, सम्पूर्णतः कहो।'

श्लोक 33 (skanda.5.158.33)

अबलोवाच। ईश्वराङ्गसमुद्भूता ह्यमृतानाम विश्रुता। सरित्पापहरा पुण्या मामाश्रित्य भयं कुतः॥

abalovāca| īśvarāṅgasamudbhūtā hyamṛtānāma viśrutā| saritpāpaharā puṇyā māmāśritya bhayaṁ kutaḥ||

स्त्री बोली — 'मैं ईश्वर के अंग से उत्पन्न, अमरों में विख्यात, पापहारिणी पुण्य नदी हूँ; मेरा आश्रय लेकर भय कैसा?

श्लोक 34 (skanda.5.158.34)

साहं पोतमिमं तुभ्यं गृहीत्वा ह्यागता द्विज। न ह्यस्य पोतस्य क्षयो यत्र तिष्ठति शंकरः॥

sāhaṁ potamimaṁ tubhyaṁ gṛhītvā hyāgatā dvija| na hyasya potasya kṣayo yatra tiṣṭhati śaṁkaraḥ||

हे द्विज! मैं तुम्हारे लिए ही यह पोत लेकर आई हूँ। इस पोत का कभी क्षय नहीं होता, क्योंकि इसमें स्वयं शंकर विराजमान हैं।'

श्लोक 35 (skanda.5.158.35)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः। मनुना सह राजेन्द्र पोतारूढो ह्यहं तदा॥

tasyāstadvacanaṁ śrutvā vismayotphullalocanaḥ| manunā saha rājendra potārūḍho hyahaṁ tadā||

हे राजेन्द्र! उसका वह वचन सुनकर, आश्चर्य से विस्फारित नेत्रों वाला मैं तब मनु के साथ उस पोत पर चढ़ गया।

श्लोक 36 (skanda.5.158.36)

कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणम्य शिरसा विभुम्। व्यापिनं परमेशानमस्तौषमभयप्रदम्॥

kṛtāñjalipuṭo bhūtvā praṇamya śirasā vibhum| vyāpinaṁ parameśānamastauṣamabhayapradam||

अंजलि जोड़कर, सिर झुकाकर व्यापक परमेश्वर को प्रणाम करके, मैंने अभय देने वाले उन प्रभु की स्तुति की।

श्लोक 37 (skanda.5.158.37)

सद्योजाताय देवाय वामदेवाय वै नमः। भवे भवे नमस्तुभ्यं भक्तिगम्याय ते नमः॥

sadyojātāya devāya vāmadevāya vai namaḥ| bhave bhave namastubhyaṁ bhaktigamyāya te namaḥ||

सद्योजात देव को नमस्कार, वामदेव को नमस्कार; हे भव-भव में विद्यमान! तुम्हें नमस्कार, भक्ति से ही प्राप्य तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 38 (skanda.5.158.38)

भूर्भुवाय नमस्तुभ्यं रामज्येष्ठाय वै नमः। नमस्ते भद्रकालाय कलिरूपाय वै नमः॥

bhūrbhuvāya namastubhyaṁ rāmajyeṣṭhāya vai namaḥ| namaste bhadrakālāya kalirūpāya vai namaḥ||

भूः-भुवः स्वरूप तुम्हें नमस्कार, रामों में ज्येष्ठ को नमस्कार; भद्रकाल को नमस्कार, कालस्वरूप को नमस्कार।

श्लोक 39 (skanda.5.158.39)

अचिन्त्याव्यक्तरूपाय महादेवाय धामने। विद्महे देवदेवाय तन्नो रुद्र नमोनमः॥

acintyāvyaktarūpāya mahādevāya dhāmane| vidmahe devadevāya tanno rudra namonamaḥ||

अचिन्त्य, अव्यक्तरूप महादेव, तेजोधाम — हम उन देवदेव को जानते हैं; उन रुद्र को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 40 (skanda.5.158.40)

जगत्सृष्टिविनाशानां कारणाय नमोनमः। एवं स्तुतो महादेवः पूर्वं सृष्टया मयानघ॥

jagatsṛṣṭivināśānāṁ kāraṇāya namonamaḥ| evaṁ stuto mahādevaḥ pūrvaṁ sṛṣṭayā mayānagha||

जगत की सृष्टि और विनाश के कारण को बार-बार नमस्कार। हे अनघ! इस प्रकार पूर्वकाल में मैंने उस सृष्टि में महादेव की स्तुति की।

श्लोक 41 (skanda.5.158.41)

प्रसन्नो मावदत्पश्चाद्वरं वरय सुव्रत॥

prasanno māvadatpaścādvaraṁ varaya suvrata||

प्रसन्न होकर उन्होंने बाद में मुझसे कहा — 'हे सुव्रत! वर माँगो।'

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