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अवन्ती खण्ड · अध्याय 163

बक-कल्प में उत्पत्ति का वर्णन

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164

श्लोक 1 (skanda.5.163.1)

मार्कण्डेय उवाच। नष्टे लोके पुनश्चान्ये सलिलेन समावृते। महार्णवस्य मध्यस्थो बाहुभ्यामतरं जलम्॥

mārkaṇḍeya uvāca| naṣṭe loke punaścānye salilena samāvṛte| mahārṇavasya madhyastho bāhubhyāmataraṁ jalam||

मार्कण्डेय बोले — लोक के नष्ट होने पर, जल से पुनः आवृत होने पर, महासागर के मध्य में स्थित मैं भुजाओं से जल तैरता रहा।

श्लोक 2 (skanda.5.163.2)

दिव्ये वर्षशते पूर्णे श्रान्तोऽहं नृपसत्तम। ध्यातुं समारभं देवं महदर्णवतारणम्॥

divye varṣaśate pūrṇe śrānto'haṁ nṛpasattama| dhyātuṁ samārabhaṁ devaṁ mahadarṇavatāraṇam||

हे नृपसत्तम! सौ दिव्य वर्ष बीतने पर थका हुआ मैं महासागर से तारने वाले देव का ध्यान करने लगा।

श्लोक 3 (skanda.5.163.3)

ध्यायमानस्ततः काले अपश्यं पक्षिणं परम्। हारकुन्देन्दुसंकाशं बकं गोक्षीरपाण्डुरम्॥

dhyāyamānastataḥ kāle apaśyaṁ pakṣiṇaṁ param| hārakundendusaṁkāśaṁ bakaṁ gokṣīrapāṇḍuram||

ध्यान करते हुए मैंने एक श्रेष्ठ पक्षी देखा, हार, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा के समान, गाय के दूध जैसा श्वेत — एक बगुला।

श्लोक 4 (skanda.5.163.4)

ततोऽहं विस्मयाविष्टस्तं बकं समुदीक्ष्य वै। अस्मिन्महार्णवे घोरे कुतोऽयं पक्षिसंभवः॥

tato'haṁ vismayāviṣṭastaṁ bakaṁ samudīkṣya vai| asminmahārṇave ghore kuto'yaṁ pakṣisaṁbhavaḥ||

तब मैं विस्मित होकर उस बगुले को देखते हुए सोचने लगा — इस भयंकर महासागर में यह पक्षी कहाँ से आया?

श्लोक 5 (skanda.5.163.5)

तरन्बाहुभिरश्रान्तस्तं बकं प्रत्यभाषिषि। पाक्षरूपं समास्थाय कस्त्वमेकार्णवीकृते॥

taranbāhubhiraśrāntastaṁ bakaṁ pratyabhāṣiṣi| pākṣarūpaṁ samāsthāya kastvamekārṇavīkṛte||

भुजाओं से अथक तैरते हुए मैंने उस बगुले से कहा — 'पक्षी रूप धारण करके इस एकार्णव में तुम कौन हो,

श्लोक 6 (skanda.5.163.6)

भ्रमसे दिव्ययोगात्मन्मोहयन्निव मां प्रभो। एतत्कथय मे सर्वं योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते॥

bhramase divyayogātmanmohayanniva māṁ prabho| etatkathaya me sarvaṁ yo'si so'si namo'stu te||

'हे प्रभो! दिव्य योग से मुझे मानो मोहित करते हुए भ्रमण कर रहे हो? यह सब मुझे बताओ — जो भी तुम हो, तुम्हें नमस्कार है।'

श्लोक 7 (skanda.5.163.7)

सोऽब्रवीन्मां महादेवो ब्रह्माहं विष्णुरेव च। जगत्सर्वं मया वत्स संहृतं किं न बुध्यसे॥

so'bravīnmāṁ mahādevo brahmāhaṁ viṣṇureva ca| jagatsarvaṁ mayā vatsa saṁhṛtaṁ kiṁ na budhyase||

वे महादेव मुझसे बोले — 'मैं ब्रह्मा हूँ, और मैं ही विष्णु भी हूँ; हे वत्स! सम्पूर्ण जगत मेरे द्वारा संहृत किया गया है — क्या तुम नहीं जानते?'

श्लोक 8 (skanda.5.163.8)

तव माता पिताहं वै विश्वस्य च महामुने। कारुण्यं मम संजातं दृष्ट्वा मग्नं महार्णवे॥

tava mātā pitāhaṁ vai viśvasya ca mahāmune| kāruṇyaṁ mama saṁjātaṁ dṛṣṭvā magnaṁ mahārṇave||

'हे महामुने! मैं ही तुम्हारा और विश्व का माता-पिता हूँ। तुम्हें महासागर में डूबा देखकर मुझमें करुणा उत्पन्न हुई।'

श्लोक 9 (skanda.5.163.9)

पक्षिरूपं समास्थाय अतोऽत्राहं समागतः। किमर्थमातुरो भूत्वा भ्रमसीत्थं महार्णवे॥

pakṣirūpaṁ samāsthāya ato'trāhaṁ samāgataḥ| kimarthamāturo bhūtvā bhramasītthaṁ mahārṇave||

'इसीलिए पक्षी रूप धारण करके मैं यहाँ आया हूँ। तुम व्याकुल होकर इस प्रकार महासागर में क्यों भ्रमण करते हो?'

श्लोक 10 (skanda.5.163.10)

शीघ्रं प्रविश मत्पक्षौ येन विश्रमसे द्विज। एवमुक्तस्ततस्तेन देवेनाहं नरेश्वर॥

śīghraṁ praviśa matpakṣau yena viśramase dvija| evamuktastatastena devenāhaṁ nareśvara||

'हे द्विज! शीघ्र ही मेरे दोनों पंखों के भीतर प्रवेश करो, जिससे तुम विश्राम कर सको।' हे नरेश्वर! उस देव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर मैं...

श्लोक 11 (skanda.5.163.11)

ततोऽहं तस्य पक्षान्ते प्रलीनस्तु भ्रमञ्जले। काले युगसाहस्रान्ते अश्रान्तोऽर्णवमध्यगः॥

tato'haṁ tasya pakṣānte pralīnastu bhramañjale| kāle yugasāhasrānte aśrānto'rṇavamadhyagaḥ||

...उनके पंखों में समाकर जल में भ्रमण करता रहा, सहस्र युगों के बीतने तक, अथक भाव से महासागर के मध्य में।

श्लोक 12 (skanda.5.163.12)

ततः शृणोमि सहसा दिक्षु सर्वासु सुव्रत। किंचिन्नूपुरसंमिश्रमद्भुतं शब्दमुत्तमम्॥

tataḥ śṛṇomi sahasā dikṣu sarvāsu suvrata| kiṁcinnūpurasaṁmiśramadbhutaṁ śabdamuttamam||

हे सुव्रत! फिर मैंने सहसा सभी दिशाओं में नूपुरों की ध्वनि से मिश्रित एक अद्भुत, उत्तम शब्द सुना।

श्लोक 13 (skanda.5.163.13)

तदार्णवजलं सर्वं संक्षिप्तं सहसाभवत्। किमेतदिति संचिन्त्य दिशः समवलोकयम्॥

tadārṇavajalaṁ sarvaṁ saṁkṣiptaṁ sahasābhavat| kimetaditi saṁcintya diśaḥ samavalokayam||

तब सम्पूर्ण महासागर का जल सहसा संकुचित हो गया। 'यह क्या है' सोचकर मैंने दिशाओं की ओर देखा।

श्लोक 14 (skanda.5.163.14)

दश कन्यास्ततो दिक्षु आगताश्च महार्णवे। वस्त्रालंकारसहिता दिग्भ्यो नूपुरभूषिताः॥

daśa kanyāstato dikṣu āgatāśca mahārṇave| vastrālaṁkārasahitā digbhyo nūpurabhūṣitāḥ||

तब दस कन्याएँ दिशाओं से महासागर में आईं, वस्त्र-अलंकारों सहित, प्रत्येक दिशा से नूपुरों से भूषित।

श्लोक 15 (skanda.5.163.15)

काचिच्चन्द्रसमाभासा काचिदादित्यसप्रभा। काचिदंजनपुञ्जाभा काचिद्रक्तोत्पलप्रभा॥

kāciccandrasamābhāsā kācidādityasaprabhā| kācidaṁjanapuñjābhā kācidraktotpalaprabhā||

कोई चन्द्रमा के समान आभा वाली, कोई सूर्य के समान तेजस्वी; कोई अंजन-समूह के समान श्याम, कोई लाल कमल के समान लालिमा वाली थी।

श्लोक 16 (skanda.5.163.16)

नानारूपधरा सौम्या नानाभरणभूषिता। अर्घ्यपाद्यादिभिर्माल्यैर्बकमभ्यर्च्य सुव्रताः॥

nānārūpadharā saumyā nānābharaṇabhūṣitā| arghyapādyādibhirmālyairbakamabhyarcya suvratāḥ||

नाना रूप धारण किए, सौम्य, नाना आभूषणों से भूषित — उन सुव्रता स्त्रियों ने अर्घ्य-पाद्य आदि तथा मालाओं से बगुले की पूजा करके,

श्लोक 17 (skanda.5.163.17)

ततस्तं पर्वताकारं गुह्यं पक्षिणमव्ययम्। प्रविवेश महाघोरं पर्वतो ह्यर्णवं स्वराट्॥

tatastaṁ parvatākāraṁ guhyaṁ pakṣiṇamavyayam| praviveśa mahāghoraṁ parvato hyarṇavaṁ svarāṭ||

फिर वह पर्वताकार, गुह्य, अव्यय, स्वराट् पक्षी उस अत्यन्त भयंकर महासागर में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 18 (skanda.5.163.18)

योजनानां सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च। त्रिंशद्योजनसाहस्रं यावद्भूमण्डलं त्विति॥

yojanānāṁ sahasrāṇi tāvantyeva śatāni ca| triṁśadyojanasāhasraṁ yāvadbhūmaṇḍalaṁ tviti||

हज़ारों-हज़ारों योजन, तथा उतने ही सैकड़ों, यहाँ तक कि तीस हज़ार योजन तक, वह भूमण्डल तक गया।

श्लोक 19 (skanda.5.163.19)

ततो भूमण्डलं दिव्यं पञ्चरत्नसमाकुलम्। दिव्यस्फटिकसोपानं रुक्मस्तंभमनोरमम्॥

tato bhūmaṇḍalaṁ divyaṁ pañcaratnasamākulam| divyasphaṭikasopānaṁ rukmastaṁbhamanoramam||

तब मैंने पाँच रत्नों से भरा, दिव्य स्फटिक-सोपानों वाला, स्वर्ण-स्तंभों से मनोहर एक दिव्य भूमण्डल देखा,

श्लोक 20 (skanda.5.163.20)

योजनानां सहस्रं तु विस्तराद्द्विगुणायतम्। वापीकूपसमाकीर्णं प्रासादाट्टालकावृतम्॥

yojanānāṁ sahasraṁ tu vistarāddviguṇāyatam| vāpīkūpasamākīrṇaṁ prāsādāṭṭālakāvṛtam||

सहस्र योजन विस्तार वाला, उससे दुगुना लम्बा, बावड़ियों और कुओं से भरा, प्रासादों और अट्टालिकाओं से घिरा,

श्लोक 21 (skanda.5.163.21)

कल्पवृक्षसमाकीर्णं ध्वजषष्टिविभूषितम्। तस्मिन्पुरवरे रम्ये नानारत्नोपशोभितम्॥

kalpavṛkṣasamākīrṇaṁ dhvajaṣaṣṭivibhūṣitam| tasminpuravare ramye nānāratnopaśobhitam||

कल्पवृक्षों से भरा, साठ ध्वजाओं से सुशोभित; उस रमणीय श्रेष्ठ नगर में नाना रत्नों से सुशोभित,

श्लोक 22 (skanda.5.163.22)

तथान्यच्च पुरं रम्यं पताकोज्ज्वलवेदिकम्। शतयोजनविस्तीर्णं तावद्द्विगुणमायतम्॥

tathānyacca puraṁ ramyaṁ patākojjvalavedikam| śatayojanavistīrṇaṁ tāvaddviguṇamāyatam||

और वैसा ही एक अन्य रमणीय नगर, पताकाओं से उज्ज्वल वेदिकाओं वाला, सौ योजन विस्तार वाला, उससे दुगुना लम्बा।

श्लोक 23 (skanda.5.163.23)

पुरमध्ये ततस्तस्मिन्नदी परमशोभना। महती पुण्यसलिला नानारत्नशिला तथा॥

puramadhye tatastasminnadī paramaśobhanā| mahatī puṇyasalilā nānāratnaśilā tathā||

उस नगर के मध्य में एक परम शोभायमान नदी थी, महती, पुण्य जल वाली, नाना रत्न-शिलाओं से युक्त।

श्लोक 24 (skanda.5.163.24)

तस्यास्तीरे मया दृष्टं तडित्सूर्यसमप्रभम्। इन्द्रनीलमहानीलैश्चितं रत्नैः समन्ततः॥

tasyāstīre mayā dṛṣṭaṁ taḍitsūryasamaprabham| indranīlamahānīlaiścitaṁ ratnaiḥ samantataḥ||

उसके तट पर मैंने बिजली और सूर्य के समान तेजस्वी, इन्द्रनील-महानील रत्नों से चारों ओर चित्रित एक लिंग देखा,

श्लोक 25 (skanda.5.163.25)

क्वचिद्वह्निसमाकारं क्वचिदिन्द्रायुधप्रभम्। क्वचिद्धूम्रं क्वचित्पीतं क्वचिद्रक्तं क्वचित्सितम्॥

kvacidvahnisamākāraṁ kvacidindrāyudhaprabham| kvaciddhūmraṁ kvacitpītaṁ kvacidraktaṁ kvacitsitam||

कहीं अग्नि के समान, कहीं इन्द्रधनुष के समान तेजस्वी; कहीं धूम्रवर्ण, कहीं पीत, कहीं लाल, कहीं श्वेत,

श्लोक 26 (skanda.5.163.26)

नानावर्णैः समायुक्तं लिङ्गमद्भुतदर्शनम्। ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसाध्यैश्च समन्तात्परिवारितम्॥

nānāvarṇaiḥ samāyuktaṁ liṅgamadbhutadarśanam| brahmaviṣṇvindrasādhyaiśca samantātparivāritam||

नाना वर्णों से युक्त, अद्भुत दर्शन वाला लिंग, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और साध्यगणों से चारों ओर घिरा हुआ,

श्लोक 27 (skanda.5.163.27)

नन्दीश्वरगणाध्यक्षैश्चेन्द्रादित्यैश्च तद्वृतम्। पश्यामि लिङ्गमीशानं महालिङ्गं तमेव च॥

nandīśvaragaṇādhyakṣaiścendrādityaiśca tadvṛtam| paśyāmi liṅgamīśānaṁ mahāliṅgaṁ tameva ca||

नन्दीश्वर, गणाध्यक्षों तथा इन्द्र-आदित्यों से वृत — मैंने उस ईशान के लिंग को, उस महालिंग को देखा।

श्लोक 28 (skanda.5.163.28)

परिवार्य ततस्तं तु प्रसुप्तान्देवदानवान्। निमीलिताक्षान्पश्यामि दिव्याभरणभूषितान्॥

parivārya tatastaṁ tu prasuptāndevadānavān| nimīlitākṣānpaśyāmi divyābharaṇabhūṣitān||

उसे घेरे हुए मैंने सोए हुए देव-दानवों को देखा, नेत्र मुँदे हुए, दिव्य आभूषणों से भूषित।

श्लोक 29 (skanda.5.163.29)

ततस्ताः पद्मपत्राक्ष्यो नार्यः परमसंमताः। नद्यास्तस्या जले स्नात्वा दिव्यपुष्पैर्मनोरमैः॥

tatastāḥ padmapatrākṣyo nāryaḥ paramasaṁmatāḥ| nadyāstasyā jale snātvā divyapuṣpairmanoramaiḥ||

फिर वे कमलपत्राक्षी, परम सम्मानित नारियाँ, उस नदी के जल में स्नान करके, मनोहर दिव्य पुष्पों से,

श्लोक 30 (skanda.5.163.30)

दत्त्वार्घपाद्यं विधिवल्लिंगस्य सह पक्षिणा। अर्चयन्तीर्वरारोहा दश ताः प्रमदोत्तमाः॥

dattvārghapādyaṁ vidhivalliṁgasya saha pakṣiṇā| arcayantīrvarārohā daśa tāḥ pramadottamāḥ||

लिंग को विधिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य देकर, वे दस श्रेष्ठ वरारोहा स्त्रियाँ पक्षी सहित उसकी पूजा करने लगीं।

श्लोक 31 (skanda.5.163.31)

ततस्त्वभ्यर्च्य तल्लिङ्गं तस्मिन्नेव पुरोत्तमे। सर्वा अदर्शनं जग्मुर्विद्युतोऽभ्रगणेष्विव॥

tatastvabhyarcya talliṅgaṁ tasminneva purottame| sarvā adarśanaṁ jagmurvidyuto'bhragaṇeṣviva||

फिर उस लिंग की पूजा करके, उसी श्रेष्ठ नगर में, वे सब मेघ-समूहों में बिजली के समान अदृश्य हो गईं।

श्लोक 32 (skanda.5.163.32)

न चासौ पक्षिराट्तस्मिन्न स्त्रियो न च देवताः। तदेवैकं स्थितं लिङ्गमर्चयन्विस्मयान्वितः॥

na cāsau pakṣirāṭtasminna striyo na ca devatāḥ| tadevaikaṁ sthitaṁ liṅgamarcayanvismayānvitaḥ||

न वह पक्षिराज वहाँ रहा, न स्त्रियाँ, न देवता; केवल वही एक लिंग स्थित रहा, जिसकी मैंने विस्मित होकर पूजा की।

श्लोक 33 (skanda.5.163.33)

ततोऽहं दुःखमूढात्मा रुद्रमायेति चिन्तयन्। ततः कन्याः समुत्तीर्य दिव्यांबरविभूषणाः॥

tato'haṁ duḥkhamūḍhātmā rudramāyeti cintayan| tataḥ kanyāḥ samuttīrya divyāṁbaravibhūṣaṇāḥ||

तब दुःख से मूढ़ मन वाला मैं 'यह रुद्र की माया है' यह सोचता रहा। फिर वे कन्याएँ, दिव्य वस्त्र-आभूषणों से युक्त, प्रकट होकर,

श्लोक 34 (skanda.5.163.34)

भासयन्त्यो जगत्सर्वं विद्युतोऽभ्रगणानिव। पद्मैर्हिरण्मयैर्दिव्यैरर्चयित्वा शुभाननाः॥

bhāsayantyo jagatsarvaṁ vidyuto'bhragaṇāniva| padmairhiraṇmayairdivyairarcayitvā śubhānanāḥ||

मेघों में बिजली के समान सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करती हुई, दिव्य स्वर्ण-कमलों से पूजा करके, वे शुभमुखी...

श्लोक 35 (skanda.5.163.35)

विविशुस्तज्जलं क्षिप्रं समंताद्वरभूषणाः। तस्मिन्पुरवरे चान्ये तामेवाहं पुनःपुनः॥

viviśustajjalaṁ kṣipraṁ samaṁtādvarabhūṣaṇāḥ| tasminpuravare cānye tāmevāhaṁ punaḥpunaḥ||

...उत्तम आभूषणों सहित शीघ्र ही चारों ओर से उस जल में प्रविष्ट हो गईं। उस श्रेष्ठ नगर में मैं बार-बार उसी एक को...

श्लोक 36 (skanda.5.163.36)

पश्यामि ह्यमरां कन्यामर्चयन्तीं महेश्वरम्। ततोऽहं तां वरारोहामपृच्छं कमलेक्षणाम्॥

paśyāmi hyamarāṁ kanyāmarcayantīṁ maheśvaram| tato'haṁ tāṁ varārohāmapṛcchaṁ kamalekṣaṇām||

...उस अमर कन्या को महेश्वर की पूजा करते हुए देखता रहा। तब मैंने उस कमलनयना वरारोहा से पूछा —

श्लोक 37 (skanda.5.163.37)

का त्वमस्मिन्पुरे देवि वससे शिवमर्चती। ताश्चागताः स्त्रियः सर्वाः क्व गतास्ते गणेश्वराः॥

kā tvamasminpure devi vasase śivamarcatī| tāścāgatāḥ striyaḥ sarvāḥ kva gatāste gaṇeśvarāḥ||

'हे देवि! तुम कौन हो, जो इस नगर में शिव की अर्चना करती हुई निवास करती हो? वे जो सब स्त्रियाँ आई थीं, और वे गणेश्वर, कहाँ गए?'

श्लोक 38 (skanda.5.163.38)

नमोऽस्तु ते महाभागे ब्रूहि पुण्ये महेश्वरि। तव प्रसादाद्विज्ञातुमेतदिच्छामि सुव्रते। दयां कृत्वा महादेवि कथयस्व ममानघे॥

namo'stu te mahābhāge brūhi puṇye maheśvari| tava prasādādvijñātumetadicchāmi suvrate| dayāṁ kṛtvā mahādevi kathayasva mamānaghe||

'हे महाभागे! तुम्हें नमस्कार है; हे पुण्ये महेश्वरि! कहो। हे सुव्रते! मैं तुम्हारी कृपा से यह जानना चाहता हूँ। हे अनघे, हे महादेवि! दया करके मुझे बताओ।'

श्लोक 39 (skanda.5.163.39)

श्र्युवाच। विस्मृताहं कथं विप्र दृष्ट्वा कल्पे पुरातने। मा तेऽभूत्स्मृतिविभ्रंशः सा चाहं कल्पवाहिनी॥

śryuvāca| vismṛtāhaṁ kathaṁ vipra dṛṣṭvā kalpe purātane| mā te'bhūtsmṛtivibhraṁśaḥ sā cāhaṁ kalpavāhinī||

श्री (देवी) बोली — 'हे विप्र! प्राचीन कल्प में मुझे देखकर तुम कैसे भूल गए? तुम्हारी स्मृति भ्रष्ट न हो — मैं ही वह कल्पों में बहने वाली नदी हूँ।'

श्लोक 40 (skanda.5.163.40)

नर्मदा नाम विख्याता रुद्रदेहाद्विनिःसृता। यास्ताः कन्यास्त्वया दृष्टा ह्यर्चयन्त्यो महेश्वरम्॥

narmadā nāma vikhyātā rudradehādviniḥsṛtā| yāstāḥ kanyāstvayā dṛṣṭā hyarcayantyo maheśvaram||

'नर्मदा नाम से विख्यात, रुद्र के शरीर से निकली हुई। तुमने जिन कन्याओं को महेश्वर की अर्चना करते देखा है —'

श्लोक 41 (skanda.5.163.41)

याभिस्त्विह समानीतः पक्षिराजसमन्विताः। दिशस्ता विद्धि सर्वेशाः सर्वास्त्वं मुनिसत्तम॥

yābhistviha samānītaḥ pakṣirājasamanvitāḥ| diśastā viddhi sarveśāḥ sarvāstvaṁ munisattama||

'—जिनके द्वारा पक्षिराज सहित वे यहाँ लाए गए, हे मुनिसत्तम! जानो कि वे सब दिशाएँ ही हैं, सबकी स्वामिनी।'

श्लोक 42 (skanda.5.163.42)

तिर्यक्पक्षिस्वरूपेण महायोगी महेश्वरः। एभिः शिवपुराद्विप्र आनीतः स महेश्वरः॥

tiryakpakṣisvarūpeṇa mahāyogī maheśvaraḥ| ebhiḥ śivapurādvipra ānītaḥ sa maheśvaraḥ||

'तिर्यक् पक्षी के रूप में महायोगी महेश्वर को, हे विप्र! इन्हीं के द्वारा शिवपुर से यहाँ लाया गया।'

श्लोक 43 (skanda.5.163.43)

सैष देवो महादेवो लिङ्गमूर्तिर्व्यवस्थितः। अर्च्यते ब्रह्मविष्ण्विन्द्रैः सुरासुरजगद्गुरुः॥

saiṣa devo mahādevo liṅgamūrtirvyavasthitaḥ| arcyate brahmaviṣṇvindraiḥ surāsurajagadguruḥ||

'वे ही महादेव लिंग-मूर्ति में स्थित हैं; देव-असुर-जगत के गुरु उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र पूजते हैं।'

श्लोक 44 (skanda.5.163.44)

लयमायाति यस्माद्धि जगत्सर्वं चराचरम्। तेन लिङ्गमिति प्रोक्तं पुराणज्ञैर्महर्षिभिः॥

layamāyāti yasmāddhi jagatsarvaṁ carācaram| tena liṅgamiti proktaṁ purāṇajñairmaharṣibhiḥ||

'चूँकि सम्पूर्ण चराचर जगत उसी में लय को प्राप्त होता है, इसीलिए पुराणज्ञ महर्षियों ने उसे लिंग कहा है।'

श्लोक 45 (skanda.5.163.45)

तेन देवगणाः सर्वे संक्षिप्ता मायया पुरा। प्रलीनाश्चैव लोकेश न दृश्यन्ते हि सांप्रतम्॥

tena devagaṇāḥ sarve saṁkṣiptā māyayā purā| pralīnāścaiva lokeśa na dṛśyante hi sāṁpratam||

'उन्हीं के द्वारा सब देवगण पूर्वकाल में माया से संकुचित किए गए थे; हे लोकेश! वे लीन होकर अभी नहीं दिखाई देते।'

श्लोक 46 (skanda.5.163.46)

पुनर्दृश्या भविष्यन्ति सृजमानाः स्वयंभुवा। साहं लिङ्गार्चनपरा नर्मदा नाम नामतः॥

punardṛśyā bhaviṣyanti sṛjamānāḥ svayaṁbhuvā| sāhaṁ liṅgārcanaparā narmadā nāma nāmataḥ||

'वे स्वयंभू (ब्रह्मा) द्वारा सृजे जाकर पुनः दिखाई देंगे। मैं वही, लिंग-अर्चना में तत्पर, नाम से नर्मदा हूँ।'

श्लोक 47 (skanda.5.163.47)

कालं युगसहस्रस्य रुद्रस्य परिचारिका। अस्य प्रसादादमरस्तथा त्वं द्विजपुंगव॥

kālaṁ yugasahasrasya rudrasya paricārikā| asya prasādādamarastathā tvaṁ dvijapuṁgava||

'सहस्र-युग-काल तक रुद्र की परिचारिका हूँ। हे द्विजपुंगव! इन्हीं की कृपा से तुम भी अमर हो।'

श्लोक 48 (skanda.5.163.48)

सत्यार्जवदयायुक्तः सिद्धोऽसि त्वं शिवार्चनात्। एवमुक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत॥

satyārjavadayāyuktaḥ siddho'si tvaṁ śivārcanāt| evamuktvā tu sā devī tatraivāntaradhīyata||

'सत्य, सरलता और दया से युक्त तुम शिव-अर्चना से सिद्ध हो गए हो।' ऐसा कहकर वह देवी वहीं अन्तर्धान हो गई।

श्लोक 49 (skanda.5.163.49)

ताः स्त्रियः स च देवेशो बकरूपो महेश्वरः। तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा अवतीर्य महानदीम्॥

tāḥ striyaḥ sa ca deveśo bakarūpo maheśvaraḥ| tasyāstadvacanaṁ śrutvā avatīrya mahānadīm||

वे स्त्रियाँ, तथा वह बकरूपधारी देवेश महेश्वर भी अन्तर्धान हो गए। उसके वचन सुनकर, महानदी में उतरकर,

श्लोक 50 (skanda.5.163.50)

स्नात्वा समर्चय त्वं हि विधिना मन्त्रपूर्वकम्। ततोऽहं सहसा तस्मात्समुत्तीर्य जलाशयात्॥

snātvā samarcaya tvaṁ hi vidhinā mantrapūrvakam| tato'haṁ sahasā tasmātsamuttīrya jalāśayāt||

'स्नान करके विधिपूर्वक मन्त्रों सहित अर्चना करो' — फिर मैं सहसा उस जलाशय से बाहर निकला।

श्लोक 51 (skanda.5.163.51)

न च पश्यामि तल्लिङ्गं न च तां निम्नगां नृप। तदैव लोकाः संजाताः क्षितिश्चैव सकानना॥

na ca paśyāmi talliṅgaṁ na ca tāṁ nimnagāṁ nṛpa| tadaiva lokāḥ saṁjātāḥ kṣitiścaiva sakānanā||

हे राजन्! मुझे न वह लिंग दिखाई दिया, न वह नदी। उसी क्षण लोक फिर से बन गए, वन सहित पृथ्वी भी,

श्लोक 52 (skanda.5.163.52)

ऋक्षचन्द्रार्कविततं तदेव च नभस्तलम्। यथापूर्वमदृष्टं तु तथैव च पुनः कृतम्। नतोऽहं मनसा देवमपूजयं महेश्वरम्॥

ṛkṣacandrārkavitataṁ tadeva ca nabhastalam| yathāpūrvamadṛṣṭaṁ tu tathaiva ca punaḥ kṛtam| nato'haṁ manasā devamapūjayaṁ maheśvaram||

तारा-चन्द्र-सूर्य से व्याप्त वही आकाश-तल भी; जैसा पहले अदृश्य था, वैसा ही फिर बनाया गया। मैंने नमस्कार करते हुए मन से महेश्वर की पूजा की।

श्लोक 53 (skanda.5.163.53)

एवं बके पुरा कल्पे मया दृष्टेयमव्यया। नर्मदा मर्त्यलोकस्य महापातकनाशिनी॥

evaṁ bake purā kalpe mayā dṛṣṭeyamavyayā| narmadā martyalokasya mahāpātakanāśinī||

इस प्रकार पूर्वकाल के बक-कल्प में मैंने इस अव्यय नर्मदा को देखा — मर्त्यलोक के लिए महापातकनाशिनी।

श्लोक 54 (skanda.5.163.54)

तस्माद्धर्मपरैर्विप्रैः क्षत्रशूद्रविशादिभिः। सदा सेव्या महाभागा धर्मवृद्ध्यर्थकारिभिः॥

tasmāddharmaparairvipraiḥ kṣatraśūdraviśādibhiḥ| sadā sevyā mahābhāgā dharmavṛddhyarthakāribhiḥ||

इसलिए धर्मपरायण ब्राह्मणों, क्षत्रियों, शूद्रों, वैश्यों आदि, तथा धर्म की वृद्धि चाहने वालों को उस महाभागा की सदा सेवा करनी चाहिए।

श्लोक 55 (skanda.5.163.55)

येऽपि भक्तया सकृत्तोये नर्मदाया महेश्वरम्। स्नात्वा ते सर्वं पापं नाशयन्त्यसंशयम्॥

ye'pi bhaktayā sakṛttoye narmadāyā maheśvaram| snātvā te sarvaṁ pāpaṁ nāśayantyasaṁśayam||

जो भी भक्तिपूर्वक एक बार भी नर्मदा के जल में स्नान करके महेश्वर की पूजा करते हैं, वे निःसंदेह अपने सब पापों का नाश कर देते हैं।

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