अवन्ती खण्ड · अध्याय 165
नर्मदा-स्नान-फल की श्रुति-कथा
श्लोक 1 (skanda.5.165.1)
युधिष्ठिर उवाच। कस्मिन्कल्पे महाभागा नर्मदेयं द्विजोत्तम। विभक्ता ऋषिभिः सर्वैस्तपोयुक्तैर्महात्मभिः॥
yudhiṣṭhira uvāca| kasminkalpe mahābhāgā narmadeyaṁ dvijottama| vibhaktā ṛṣibhiḥ sarvaistapoyuktairmahātmabhiḥ||
युधिष्ठिर बोले — हे द्विजोत्तम! किस कल्प में यह महाभागा नर्मदा तपोयुक्त महात्मा ऋषियों द्वारा विभक्त की गई?
श्लोक 2 (skanda.5.165.2)
एतद्विस्तरतः सर्वं ब्रूहि मे वदतां वर। कल्पान्ते यद्भवेत्कष्टं लोकानां तत्त्वमेव च॥
etadvistarataḥ sarvaṁ brūhi me vadatāṁ vara| kalpānte yadbhavetkaṣṭaṁ lokānāṁ tattvameva ca||
हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! यह सब मुझे विस्तार से कहिए — कल्प के अन्त में लोकों को जो कष्ट होता है, उसका तत्त्व भी कहिए।
श्लोक 3 (skanda.5.165.3)
अतीते तु पुरा कल्पे यथेयं वर्ततेऽनघ। अस्यान्त्यस्य च कल्पस्य व्यवस्थां कथय प्रभो। एवमुक्तः सभामध्ये मार्कण्डो वाक्यमब्रवीत्॥
atīte tu purā kalpe yatheyaṁ vartate'nagha| asyāntyasya ca kalpasya vyavasthāṁ kathaya prabho| evamuktaḥ sabhāmadhye mārkaṇḍo vākyamabravīt||
हे अनघ! बीते हुए पूर्व कल्प में यह जैसे रही, तथा इस अन्तिम कल्प की व्यवस्था भी, हे प्रभो! कहिए। इस प्रकार पूछे जाने पर सभा के मध्य मार्कण्डेय ने यह वचन कहा।
श्लोक 4 (skanda.5.165.4)
मार्कण्डेय उवाच। वक्ष्येऽहं श्रूयतां सर्वैः कथेयं पूर्वतः श्रुता॥
mārkaṇḍeya uvāca| vakṣye'haṁ śrūyatāṁ sarvaiḥ katheyaṁ pūrvataḥ śrutā||
मार्कण्डेय बोले — मैं कहूँगा, सब सुनें — यह कथा जैसी पहले मैंने सुनी थी।
श्लोक 5 (skanda.5.165.5)
महत्कथेयं वैशिष्टी कल्पादस्मात्परं तु या। लोकक्षयकरो घोर आसीत्कालः सुदारुणः॥
mahatkatheyaṁ vaiśiṣṭī kalpādasmātparaṁ tu yā| lokakṣayakaro ghora āsītkālaḥ sudāruṇaḥ||
यह महत् और विशिष्ट कथा है, जो इस कल्प के पश्चात् की है — लोकों का विनाश करने वाला एक अत्यन्त भयंकर काल आया था।
श्लोक 6 (skanda.5.165.6)
तस्मिन्नपि महाघोरे यथेयं वा मृता सती। परितुष्टैर्विभक्ता च शृणुध्वं तां कथामिमाम्॥
tasminnapi mahāghore yatheyaṁ vā mṛtā satī| parituṣṭairvibhaktā ca śṛṇudhvaṁ tāṁ kathāmimām||
उस महाभयंकर काल में भी वह जैसे मृतप्राय होकर भी, संतुष्ट ऋषियों द्वारा विभक्त हुई — यह कथा सुनो।
श्लोक 7 (skanda.5.165.7)
युगान्ते समनुप्राप्ते पितामहदिनत्रये। मानसा ब्रह्मणः पुत्राः साक्षाद्ब्रह्मेव सत्तमाः॥
yugānte samanuprāpte pitāmahadinatraye| mānasā brahmaṇaḥ putrāḥ sākṣādbrahmeva sattamāḥ||
युग के अन्त में, पितामह के तीसरे दिन में, ब्रह्मा के मानस-पुत्र, स्वयं ब्रह्मा के समान श्रेष्ठ,
श्लोक 8 (skanda.5.165.8)
सनकाद्या महात्मानो ये च वैमानिका गणाः। यमेन्द्रवरुणाद्याश्च लोकपाला दिनत्रये॥
sanakādyā mahātmāno ye ca vaimānikā gaṇāḥ| yamendravaruṇādyāśca lokapālā dinatraye||
सनक आदि महात्मा, तथा विमानों में रहने वाले गण, यम-इन्द्र-वरुण आदि लोकपाल, उस तीसरे दिन में,
श्लोक 9 (skanda.5.165.9)
कालापेक्षास्तु तिष्ठन्ति लोकवृत्तान्ततत्पराः। ततः कल्पक्षये प्राप्ते तेषां ज्ञानमनुत्तमम्॥
kālāpekṣāstu tiṣṭhanti lokavṛttāntatatparāḥ| tataḥ kalpakṣaye prāpte teṣāṁ jñānamanuttamam||
काल की प्रतीक्षा करते हुए, लोक के अन्तिम वृत्तान्त में तत्पर रहते हैं। फिर कल्प का क्षय आने पर उनका वह अनुपम ज्ञान...
श्लोक 10 (skanda.5.165.10)
सर्वेषां नश्यते चायुर्युगरूपानुसारतः। भूर्लोकं ते परित्यज्य अगमंश्च भुवं तदा॥
sarveṣāṁ naśyate cāyuryugarūpānusārataḥ| bhūrlokaṁ te parityajya agamaṁśca bhuvaṁ tadā||
...और सबकी आयु युग के स्वरूप के अनुसार नष्ट हो जाती है। तब वे भूर्लोक को त्यागकर भुवर्लोक को गए,
श्लोक 11 (skanda.5.165.11)
स्वर्लोकं च महश्चैव जनश्चैव तपस्तदा। आश्रयं सत्यलोकं च सर्वलोकमनुत्तमम्॥
svarlokaṁ ca mahaścaiva janaścaiva tapastadā| āśrayaṁ satyalokaṁ ca sarvalokamanuttamam||
फिर स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तप-लोक को, और अन्त में सत्यलोक का आश्रय लिया — सब लोकों में श्रेष्ठ।
श्लोक 12 (skanda.5.165.12)
कालं युगसहस्रान्तं पुत्रपौत्रसमन्विताः। सत्यलोके च तिष्ठन्ति यावत्संजायते जगत्॥
kālaṁ yugasahasrāntaṁ putrapautrasamanvitāḥ| satyaloke ca tiṣṭhanti yāvatsaṁjāyate jagat||
पुत्र-पौत्रों सहित सहस्र युगों तक वे सत्यलोक में रहते हैं, जब तक जगत पुनः उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 13 (skanda.5.165.13)
ब्रह्मपुत्राश्च ये केचित्कल्पादौ न भवन्ति ह। त्रैलोक्यं ते परित्यज्य अनाधारं भवन्ति च॥
brahmaputrāśca ye kecitkalpādau na bhavanti ha| trailokyaṁ te parityajya anādhāraṁ bhavanti ca||
किन्तु जो ब्रह्मा के पुत्र कल्प के आरम्भ में उत्पन्न नहीं हुए थे, वे तीनों लोकों को त्यागकर आश्रयहीन हो जाते हैं।
श्लोक 14 (skanda.5.165.14)
तैः सार्धं ये तु ते विप्रा अन्ये चापि तपोधनाः। यक्षरक्षःपिशाचाश्च अन्ये वैमानिका गणाः॥
taiḥ sārdhaṁ ye tu te viprā anye cāpi tapodhanāḥ| yakṣarakṣaḥpiśācāśca anye vaimānikā gaṇāḥ||
उनके साथ जो विप्र थे, तथा अन्य तपोधन भी, यक्ष-राक्षस-पिशाच, तथा विमानगामी अन्य गण,
श्लोक 15 (skanda.5.165.15)
ऋषयश्च महाभागा वर्णाश्चान्ये पृथग्विधाः। सीदन्ति भूम्यां सहिता ये चान्ये तलवासिनः॥
ṛṣayaśca mahābhāgā varṇāścānye pṛthagvidhāḥ| sīdanti bhūmyāṁ sahitā ye cānye talavāsinaḥ||
महाभाग ऋषि, तथा अन्य पृथक्-पृथक् वर्ण — पृथ्वी पर रहने वाले सब, तथा पाताल-वासी भी कष्ट भोगते हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.165.16)
अनावृष्टिरभूत्तत्र महती शतवार्षिकी। लोकक्षयकरी रौद्रा वृक्षवीरुद्विनाशिनी॥
anāvṛṣṭirabhūttatra mahatī śatavārṣikī| lokakṣayakarī raudrā vṛkṣavīrudvināśinī||
वहाँ सौ वर्षों तक चलने वाला महान अनावृष्टि हुआ, लोकों का नाश करने वाला, भयंकर, वृक्ष-लताओं का विनाश करने वाला,
श्लोक 17 (skanda.5.165.17)
त्रैलोक्यसंक्षोभकरी सप्तार्णवविशोषणी। ततो लोकाः क्षुधाविष्टा भ्रमन्तीव दिशो दश॥
trailokyasaṁkṣobhakarī saptārṇavaviśoṣaṇī| tato lokāḥ kṣudhāviṣṭā bhramantīva diśo daśa||
त्रिलोक को क्षुब्ध करने वाला, सातों समुद्रों को सुखाने वाला। तब लोग भूख से व्याकुल होकर दसों दिशाओं में मानो भ्रमण करने लगे,
श्लोक 18 (skanda.5.165.18)
कंदैर्मूलैः फलैर्वापि वर्तयन्ते सुदुःखिताः। सरितः सागराः कूपाः सेवन्ते पावनानि च॥
kaṁdairmūlaiḥ phalairvāpi vartayante suduḥkhitāḥ| saritaḥ sāgarāḥ kūpāḥ sevante pāvanāni ca||
कन्द, मूल, फलों से अत्यन्त दुःखी होकर जीवन-निर्वाह करने लगे; नदी, समुद्र, कुओं तथा अन्य पवित्र जलों का सेवन करने लगे।
श्लोक 19 (skanda.5.165.19)
तत्रापि सर्वे शुष्यन्ति सरिद्भिः सह सागराः। ततो यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले॥
tatrāpi sarve śuṣyanti saridbhiḥ saha sāgarāḥ| tato yānyalpasārāṇi sattvāni pṛthivītale||
किन्तु वहाँ भी नदियों सहित सभी समुद्र सूखने लगे। तब पृथ्वी-तल पर जिन प्राणियों में अल्प सामर्थ्य था,
श्लोक 20 (skanda.5.165.20)
तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते भिन्नान्युरुजलेन वै। अथ संक्षीयमाणासु सरित्सु सह सागरैः॥
tānyevāgre pralīyante bhinnānyurujalena vai| atha saṁkṣīyamāṇāsu saritsu saha sāgaraiḥ||
वे पहले ही जल के अभाव से अपने शरीर टूटकर नष्ट हो गए। फिर जब समुद्रों सहित नदियाँ क्षीण होती जा रही थीं,
श्लोक 21 (skanda.5.165.21)
ऋषीणां षष्टिसाहस्रं कुरुक्षेत्रनिवासिनाम्। ये च वैखानसा विप्रा दन्तोलूखलिनस्तथा॥
ṛṣīṇāṁ ṣaṣṭisāhasraṁ kurukṣetranivāsinām| ye ca vaikhānasā viprā dantolūkhalinastathā||
कुरुक्षेत्र-निवासी साठ हज़ार ऋषि, तथा वैखानस विप्र, तथा जो दाँतों से ही अन्न पीसते थे,
श्लोक 22 (skanda.5.165.22)
हिमाचलगुहागुह्ये ये वसन्ति तपोधनाः। सर्वे ते मामुपागम्य क्षुत्तृषार्तास्तपोधनाः॥
himācalaguhāguhye ye vasanti tapodhanāḥ| sarve te māmupāgamya kṣuttṛṣārtāstapodhanāḥ||
और जो हिमालय की गुप्त गुफाओं में रहने वाले तपोधन थे — वे सब भूख-प्यास से पीड़ित तपस्वी मेरे पास आए।
श्लोक 23 (skanda.5.165.23)
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सीदयामो महामुने। सरित्सागरशैलान्तं जगत्संशुष्यते द्विज॥
ūcuḥ prāñjalayaḥ sarve sīdayāmo mahāmune| saritsāgaraśailāntaṁ jagatsaṁśuṣyate dvija||
अंजलि जोड़कर सबने कहा — 'हे महामुने! हम नष्ट हो रहे हैं। हे द्विज! नदी-समुद्र-पर्वत तक जगत सूख रहा है।'
श्लोक 24 (skanda.5.165.24)
कुत्र यास्याम सहिता यावत्कालस्य पर्ययः। दीर्घायुरसि विप्रेन्द्र न मृतस्त्वं युगक्षये॥
kutra yāsyāma sahitā yāvatkālasya paryayaḥ| dīrghāyurasi viprendra na mṛtastvaṁ yugakṣaye||
'हम कहाँ मिलकर जाएँ जब तक इस काल का पर्यय न हो? हे विप्रेन्द्र! आप दीर्घायु हैं, युगक्षय में भी आप नहीं मरे।'
श्लोक 25 (skanda.5.165.25)
भूतं भव्यं भविष्यच्च सर्वं तव हृदि स्थितम्। तस्मात्त्वं वेत्सि सर्वं च कथयस्व महाव्रत॥
bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyacca sarvaṁ tava hṛdi sthitam| tasmāttvaṁ vetsi sarvaṁ ca kathayasva mahāvrata||
'भूत, वर्तमान और भविष्य सब आपके हृदय में स्थित है; इसलिए आप सब जानते हैं। हे महाव्रत! कहिए।'
श्लोक 26 (skanda.5.165.26)
कीदृक्कालं महाभाग क्षपिष्यामोऽथ सुव्रत। अनावृष्टिहतं सर्वं सीदते सचराचरम्॥
kīdṛkkālaṁ mahābhāga kṣapiṣyāmo'tha suvrata| anāvṛṣṭihataṁ sarvaṁ sīdate sacarācaram||
'हे महाभाग, हे सुव्रत! हमें कितने समय तक ऐसे रहना होगा? अनावृष्टि से पीड़ित सम्पूर्ण चराचर नष्ट हो रहा है।'
श्लोक 27 (skanda.5.165.27)
परित्राहि महाभाग न यथा याम संक्षयम्। ततः संचिन्त्य मनसा त्वरन्विप्रानथाब्रवम्॥
paritrāhi mahābhāga na yathā yāma saṁkṣayam| tataḥ saṁcintya manasā tvaranviprānathābravam||
'हे महाभाग! हमारी रक्षा कीजिए, जिससे हम सम्पूर्ण विनाश को प्राप्त न हों।' तब मैंने मन में विचार करके, शीघ्रता से विप्रों से कहा —
श्लोक 28 (skanda.5.165.28)
कुरुक्षेत्रं त्यजध्वं च पुत्रदारसमन्विताः। त्यक्त्वोदीचीं दिशं सर्वे यामो याम्यामनुत्तमाम्॥
kurukṣetraṁ tyajadhvaṁ ca putradārasamanvitāḥ| tyaktvodīcīṁ diśaṁ sarve yāmo yāmyāmanuttamām||
'पुत्र-पत्नी सहित कुरुक्षेत्र को त्याग दो। उत्तर दिशा को त्यागकर हम सब उत्तम दक्षिण दिशा को चलें।'
श्लोक 29 (skanda.5.165.29)
नगरग्रामघोषाढ्यां पुरपत्तनशोभिताम्। गच्छामो नर्मदातीरं बहुसिद्धनिषेवितम्॥
nagaragrāmaghoṣāḍhyāṁ purapattanaśobhitām| gacchāmo narmadātīraṁ bahusiddhaniṣevitam||
'नगर-ग्राम-गोष्ठों से समृद्ध, पुर-पत्तनों से शोभित — हम नर्मदा के तट पर चलें, जो बहुत से सिद्धों द्वारा सेवित है,'
श्लोक 30 (skanda.5.165.30)
रुद्राङ्गीं तां महापुण्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्। पश्यामस्तां महाभागां न्यग्रोधावारसंकुलाम्॥
rudrāṅgīṁ tāṁ mahāpuṇyāṁ sarvapāpapraṇāśinīm| paśyāmastāṁ mahābhāgāṁ nyagrodhāvārasaṁkulām||
'—रुद्र के अंग से उत्पन्न, महापुण्य, सर्वपापनाशिनी। हम उस महाभागा को देखें, जो न्यग्रोध-वनों से भरी है,'
श्लोक 31 (skanda.5.165.31)
माहेश्वरैर्भागवतैः सांख्यैः सिद्धैः सुसेविताम्। अनावृष्टिभयाद्भीताः कूलयोरुभयोरपि॥
māheśvarairbhāgavataiḥ sāṁkhyaiḥ siddhaiḥ susevitām| anāvṛṣṭibhayādbhītāḥ kūlayorubhayorapi||
'—माहेश्वरों, भागवतों, सांख्यों और सिद्धों द्वारा भली-भाँति सेवित। अनावृष्टि के भय से डरकर, दोनों तटों पर,'
श्लोक 32 (skanda.5.165.32)
आश्रमे ह्याश्रमान्दिव्यान्कारयामो जितव्रताः। एवमुक्तास्तु ते सर्वे समेतानुचरैः सह॥
āśrame hyāśramāndivyānkārayāmo jitavratāḥ| evamuktāstu te sarve sametānucaraiḥ saha||
'—व्रतों को जीतकर हम दिव्य आश्रम पर आश्रम बनाएँ।' इस प्रकार कहे जाने पर वे सब, अपने अनुचरों सहित,
श्लोक 33 (skanda.5.165.33)
नर्मदातीरमासाद्य स्थिताः सर्वेऽकुतोभयाः। किंचित्पूर्वमनुस्मृत्य पुरा कल्पादिभिर्भयम्॥
narmadātīramāsādya sthitāḥ sarve'kutobhayāḥ| kiṁcitpūrvamanusmṛtya purā kalpādibhirbhayam||
नर्मदा के तट पर पहुँचकर सब निर्भय होकर वहाँ रहे, कल्प के आरम्भ के उस भय को थोड़ा स्मरण करते हुए।
श्लोक 34 (skanda.5.165.34)
प्राप्तास्तु नर्मदातीरमादावेव कलौ युगे। ततो वर्षशतं पूर्णं दिव्यं रेवातटेऽवसन्॥
prāptāstu narmadātīramādāveva kalau yuge| tato varṣaśataṁ pūrṇaṁ divyaṁ revātaṭe'vasan||
वे कलियुग के आरम्भ में ही नर्मदा-तट पर पहुँचे। फिर वे रेवा-तट पर सौ दिव्य वर्ष तक रहे,
श्लोक 35 (skanda.5.165.35)
षड्विंशच्च सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च। तत्राश्चर्यं मया दृष्टमृषीणां वसतां नृप॥
ṣaḍviṁśacca sahasrāṇi varṣāṇāṁ mānuṣāṇi ca| tatrāścaryaṁ mayā dṛṣṭamṛṣīṇāṁ vasatāṁ nṛpa||
अर्थात् छब्बीस हज़ार मानव वर्ष। हे राजन्! वहाँ रहते हुए ऋषियों का मैंने एक आश्चर्य देखा।
श्लोक 36 (skanda.5.165.36)
अनावृष्टिहते लोके संशुष्के स्थावरे चरे। भिन्ने युगादिकलने हाहाभूते विचेतने॥
anāvṛṣṭihate loke saṁśuṣke sthāvare care| bhinne yugādikalane hāhābhūte vicetane||
अनावृष्टि से पीड़ित, स्थावर-जंगम सूखे हुए, युग के आरम्भ की गणना भंग हुई, हाहाकार से युक्त, चेतनाशून्य लोक में,
श्लोक 37 (skanda.5.165.37)
चातुर्वर्णे प्रलीने तु नष्टे होमबलिक्रमे। निःस्वाहे निर्वषट्कारे शौचाचारविवर्जिते॥
cāturvarṇe pralīne tu naṣṭe homabalikrame| niḥsvāhe nirvaṣaṭkāre śaucācāravivarjite||
चारों वर्णों के लीन हो जाने पर, होम-बलि का क्रम नष्ट हो जाने पर, स्वाहा-वषट्कार रहित, शौच-आचार से रहित,
श्लोक 38 (skanda.5.165.38)
इयमेका सरिच्छ्रेष्ठा ऋषिकोटिनिषेविता। नान्या काचित्त्रिलोकेऽपि रमणीया नरेश्वर॥
iyamekā saricchreṣṭhā ṛṣikoṭiniṣevitā| nānyā kācittriloke'pi ramaṇīyā nareśvara||
यह एक ही नदी, नदियों में श्रेष्ठ, करोड़ों ऋषियों से सेवित, शेष रही। हे नरेश्वर! त्रिलोक में इसके समान रमणीय अन्य कोई नहीं थी।
श्लोक 39 (skanda.5.165.39)
यथेयं पुण्यसलिला इन्द्रस्येवामरावती। देवतायतनैः शुभ्रैराश्रमैश्च सुकल्पितैः॥
yatheyaṁ puṇyasalilā indrasyevāmarāvatī| devatāyatanaiḥ śubhrairāśramaiśca sukalpitaiḥ||
जैसे यह पुण्यजला इन्द्र की अमरावती के समान थी; शुभ्र देवमंदिरों और सुसज्जित आश्रमों से,
श्लोक 40 (skanda.5.165.40)
शोभते नर्मदा देवी स्वर्गे मन्दाकिनी यथा। यावद्वृक्षा महाशैला यावत्सागरसंभवा॥
śobhate narmadā devī svarge mandākinī yathā| yāvadvṛkṣā mahāśailā yāvatsāgarasaṁbhavā||
नर्मदा देवी उस प्रकार शोभित होती थी जैसे स्वर्ग में मन्दाकिनी। जहाँ तक वृक्ष और महापर्वत हैं, जहाँ तक समुद्र का प्रारम्भ है,
श्लोक 41 (skanda.5.165.41)
उभयोः कूलयोस्तावन्मण्डितायतनैः शुभैः। हूयद्भिरग्निहोत्रैश्च हविर्धूमसमाकुला॥
ubhayoḥ kūlayostāvanmaṇḍitāyatanaiḥ śubhaiḥ| hūyadbhiragnihotraiśca havirdhūmasamākulā||
उतने दोनों तटों पर वह शुभ मंदिरों से सुसज्जित थी; अग्निहोत्रों की आहुतियों के धुएँ से भरी हुई,
श्लोक 42 (skanda.5.165.42)
बभूव नर्मदा देवी प्रावृट्काल इव शर्वरी। देवतायतनैर्नैकैः पूजासंस्कारशोभिता॥
babhūva narmadā devī prāvṛṭkāla iva śarvarī| devatāyatanairnaikaiḥ pūjāsaṁskāraśobhitā||
नर्मदा देवी वर्षाकाल की रात्रि के समान हो गई थी; अनेक देवमंदिरों के पूजा-संस्कारों से सुशोभित,
श्लोक 43 (skanda.5.165.43)
सरिद्भिर्भ्राजते श्रेष्ठा पुरी शाक्री च भास्करी। केचित्पञ्चाग्नितपसः केचिदप्यग्निहोत्रिणः॥
saridbhirbhrājate śreṣṭhā purī śākrī ca bhāskarī| kecitpañcāgnitapasaḥ kecidapyagnihotriṇaḥ||
वह नदियों में श्रेष्ठ इन्द्र की पुरी या सूर्य की पुरी के समान चमकती थी। कुछ पंचाग्नि-तपस्वी थे, कुछ अग्निहोत्री,
श्लोक 44 (skanda.5.165.44)
केचिद्धूमकमश्नन्ति तपस्युग्रे व्यवस्थिताः। आत्मयज्ञरताः केचिदपरे भक्तिभागिनः॥
keciddhūmakamaśnanti tapasyugre vyavasthitāḥ| ātmayajñaratāḥ kecidapare bhaktibhāginaḥ||
कुछ केवल धुआँ खाते हुए उग्र तप में स्थित थे; कुछ आत्म-यज्ञ में रत, अन्य भक्ति में भागी थे,
श्लोक 45 (skanda.5.165.45)
वैष्णवज्ञानमासाद्य केचिच्छैवं व्रतं तथा। एकरात्रं द्विरात्रं च केचित्षष्ठाहभोजनाः॥
vaiṣṇavajñānamāsādya kecicchaivaṁ vrataṁ tathā| ekarātraṁ dvirātraṁ ca kecitṣaṣṭhāhabhojanāḥ||
कुछ को वैष्णव ज्ञान प्राप्त था, कुछ को शैव व्रत; कुछ एक रात, दो रात उपवास करते, कुछ छठे दिन भोजन करते,
श्लोक 46 (skanda.5.165.46)
चान्द्रायणविधानैश्च कृच्छ्रिणश्चातिकृच्छ्रिणः। एवंविधैस्तपोभिश्च नर्मदातीरशोभितैः॥
cāndrāyaṇavidhānaiśca kṛcchriṇaścātikṛcchriṇaḥ| evaṁvidhaistapobhiśca narmadātīraśobhitaiḥ||
चान्द्रायण-विधानों से कृच्छ्र और अतिकृच्छ्र व्रत करते थे। इस प्रकार के तपों से नर्मदा-तट सुशोभित था,
श्लोक 47 (skanda.5.165.47)
यजद्भिः शंकरं देवं केशवं भाति नित्यदा। एकत्वे च पृथक्त्वे च यजतां च महेश्वरम्॥
yajadbhiḥ śaṁkaraṁ devaṁ keśavaṁ bhāti nityadā| ekatve ca pṛthaktve ca yajatāṁ ca maheśvaram||
शंकर देव या केशव की यजना करने वालों द्वारा वह सदा शोभित रहता था। एकत्व में या पृथक्त्व में महेश्वर की यजना करने वाले,
श्लोक 48 (skanda.5.165.48)
कलौ युगे महाघोरे प्राप्ताः सिद्धिमनुत्तमाम्। यस्य यस्य हि या भक्तिर्विज्ञानं यस्य यादृशम्॥
kalau yuge mahāghore prāptāḥ siddhimanuttamām| yasya yasya hi yā bhaktirvijñānaṁ yasya yādṛśam||
उस अत्यन्त भयंकर कलियुग में भी अनुपम सिद्धि को प्राप्त हुए। जिस-जिस की जैसी भक्ति थी, जिस-जिस का जैसा ज्ञान था,
श्लोक 49 (skanda.5.165.49)
यस्मिन्यस्मिंश्च देवे तु तांतामीशोऽददात्प्रभुः। स्वभावैकतया भक्त्या तामेत्यान्तः प्रलीयते॥
yasminyasmiṁśca deve tu tāṁtāmīśo'dadātprabhuḥ| svabhāvaikatayā bhaktyā tāmetyāntaḥ pralīyate||
और जिस-जिस देवता में उसकी श्रद्धा थी, प्रभु ईश ने उसे वही प्रदान किया; अपने स्वभाव की एकता से भक्ति द्वारा वह उसी को प्राप्त होकर अन्ततः उसी में लीन होता है।
श्लोक 50 (skanda.5.165.50)
संसारे परिवर्तन्ते ये पृथग्भाजिनो नराः। ये महावृक्षमीशानं त्यक्त्वा शाखावलम्बिनः॥
saṁsāre parivartante ye pṛthagbhājino narāḥ| ye mahāvṛkṣamīśānaṁ tyaktvā śākhāvalambinaḥ||
जो मनुष्य पृथक्-पृथक् भाग लेने वाले हैं, वे संसार में घूमते रहते हैं — जो महावृक्ष ईशान को त्यागकर उसकी शाखाओं का अवलम्बन लेते हैं,
श्लोक 51 (skanda.5.165.51)
पुनरावर्तमानास्ते जायन्ते हि चतुर्युगे। देवान्ते स्थावरान्ते च संसारे चाभ्रमन्क्रमात्॥
punarāvartamānāste jāyante hi caturyuge| devānte sthāvarānte ca saṁsāre cābhramankramāt||
वे बार-बार लौटते हुए चार युगों में जन्म लेते हैं; देवगति के अन्त और स्थावर-गति के अन्त तक क्रमशः संसार में भ्रमण करते हैं,
श्लोक 52 (skanda.5.165.52)
पुनर्जन्म पुनः स्वर्गे पुनर्घोरे च रौरवे। ये पुनर्देवमीशानं भवं भक्तिसुसंस्थिताः॥
punarjanma punaḥ svarge punarghore ca raurave| ye punardevamīśānaṁ bhavaṁ bhaktisusaṁsthitāḥ||
पुनः जन्म, पुनः स्वर्ग, पुनः भयंकर रौरव नरक में। किन्तु जो पुनः देव ईशान भव की, भक्ति में सुस्थित होकर,
श्लोक 53 (skanda.5.165.53)
यजन्ति नर्मदातीरे न पुनस्ते भवन्ति च। आ देहपतनात्केचिदुपासन्तः परं गताः॥
yajanti narmadātīre na punaste bhavanti ca| ā dehapatanātkecidupāsantaḥ paraṁ gatāḥ||
नर्मदा-तट पर यजना करते हैं, वे पुनः जन्म नहीं लेते। कुछ ने देहपात तक उपासना करते हुए परम पद प्राप्त किया।
श्लोक 54 (skanda.5.165.54)
केचिद्द्वादशभिर्वर्षैः षड्भरन्ये तपोधनाः। त्रिभिः संवत्सरैः केचित्केचित्संवत्सरेण तु॥
keciddvādaśabhirvarṣaiḥ ṣaḍbharanye tapodhanāḥ| tribhiḥ saṁvatsaraiḥ kecitkecitsaṁvatsareṇa tu||
कुछ तपोधनों ने बारह वर्षों में, कुछ ने छह वर्षों में, कुछ ने तीन वर्षों में, और कुछ ने एक ही वर्ष में,
श्लोक 55 (skanda.5.165.55)
षड्भिर्मासैस्तु संसिद्धास्त्रिभिर्मासैस्तथापरे। मुनयो देवमाश्रित्य नर्मदां च यशस्विनीम्॥
ṣaḍbhirmāsaistu saṁsiddhāstribhirmāsaistathāpare| munayo devamāśritya narmadāṁ ca yaśasvinīm||
कुछ ने छह महीनों में, अन्य कुछ ने तीन महीनों में सिद्धि प्राप्त की — वे मुनि उस देव तथा यशस्विनी नर्मदा का आश्रय लेकर।
श्लोक 56 (skanda.5.165.56)
छित्त्वा संसारदोषांश्च अगमन्ब्रह्म शाश्वतम्। एवं कलियुगे घोरे शतशोऽथ सहस्रशः॥
chittvā saṁsāradoṣāṁśca agamanbrahma śāśvatam| evaṁ kaliyuge ghore śataśo'tha sahasraśaḥ||
संसार के दोषों को काटकर वे शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त हुए। इस प्रकार भयंकर कलियुग में सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में,
श्लोक 57 (skanda.5.165.57)
नर्मदातीरमाश्रित्य मुनयो रुद्रमाविशन्॥
narmadātīramāśritya munayo rudramāviśan||
मुनि नर्मदा-तट का आश्रय लेकर रुद्र में समा गए।
श्लोक 58 (skanda.5.165.58)
ये नर्मदातीरमुपेत्य विप्राः शैवे व्रते यत्नमुपप्रपन्नाः। त्रिकालमम्भः प्रविगाह्य भक्त्या देवं समभ्यर्च्य शिवं व्रजन्ति॥
ye narmadātīramupetya viprāḥ śaive vrate yatnamupaprapannāḥ| trikālamambhaḥ pravigāhya bhaktyā devaṁ samabhyarcya śivaṁ vrajanti||
जो विप्र नर्मदा-तट पर आकर शैव व्रत में यत्नपूर्वक लगे रहते हैं, त्रिकाल जल में स्नान करके भक्तिपूर्वक देव की अर्चना करके, वे शिव को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 59 (skanda.5.165.59)
ध्यानार्चनैर्जाप्यमहाव्रतैश्च नारायणं वा सततं स्मरन्ति। ते धौतपाण्डुरपटा इव राजहंसाः संसारसागरजलस्य तरन्ति पारम्॥
dhyānārcanairjāpyamahāvrataiśca nārāyaṇaṁ vā satataṁ smaranti| te dhautapāṇḍurapaṭā iva rājahaṁsāḥ saṁsārasāgarajalasya taranti pāram||
जो ध्यान, अर्चना, जप और महाव्रतों से नारायण का सतत स्मरण करते हैं, वे धुले हुए श्वेत वस्त्रों वाले राजहंसों के समान संसार-सागर के जल के पार उतर जाते हैं।
श्लोक 60 (skanda.5.165.60)
सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुत्क्षिप्य भुजमुच्यते। इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥
satyaṁ satyaṁ punaḥ satyamutkṣipya bhujamucyate| idamekaṁ suniṣpannaṁ dhyeyo nārāyaṇaḥ sadā||
सत्य, सत्य, फिर सत्य — भुजा उठाकर यह कहा जाता है: यह एक ही सुनिश्चित है कि नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 61 (skanda.5.165.61)
यो वा हरं पूजयते जितात्मा मासं च पक्षं च वसेन्नरेन्द्र। रेवां समाश्रित्य महानुभावः स देवदेवोऽथ भवेत्पिनाकी॥
yo vā haraṁ pūjayate jitātmā māsaṁ ca pakṣaṁ ca vasennarendra| revāṁ samāśritya mahānubhāvaḥ sa devadevo'tha bhavetpinākī||
हे नरेन्द्र! जो जितात्मा होकर हर की पूजा करता है और एक मास या एक पक्ष तक रेवा का आश्रय लेकर वहाँ रहता है, वह महानुभाव मानो पिनाकधारी देवदेव ही बन जाता है।
श्लोक 62 (skanda.5.165.62)
कीटाः पतंगाश्च पिपीलिकाश्च ये वै म्रियन्तेऽम्भसि नर्मदायाः। ते दिव्यरूपास्तु कुलप्रसूताः शतं समा धर्मपरा भवन्ति॥
kīṭāḥ pataṁgāśca pipīlikāśca ye vai mriyante'mbhasi narmadāyāḥ| te divyarūpāstu kulaprasūtāḥ śataṁ samā dharmaparā bhavanti||
जो कीट, पतंग और चींटियाँ नर्मदा के जल में मरते हैं, वे दिव्य रूप धारण करके कुल में उत्पन्न होते हैं और सौ वर्ष तक धर्मपरायण रहते हैं।
श्लोक 63 (skanda.5.165.63)
कालेन वृक्षाः प्रपतन्ति येऽपि महातरंगौघनिकृत्तमूलाः। ते नर्मदांभोभिरपास्तपापा देदीप्यमानास्त्रिदिवं प्रयान्ति॥
kālena vṛkṣāḥ prapatanti ye'pi mahātaraṁgaughanikṛttamūlāḥ| te narmadāṁbhobhirapāstapāpā dedīpyamānāstridivaṁ prayānti||
जो वृक्ष काल पाकर गिर जाते हैं, जिनकी जड़ें महातरंगों के प्रवाह से कट जाती हैं, वे नर्मदा के जल से पापमुक्त होकर देदीप्यमान होते हुए स्वर्ग को जाते हैं।
श्लोक 64 (skanda.5.165.64)
अकामकामाश्च तथा सकामा रेवान्तमाश्रित्य म्रियन्ति तीरे। जडान्धमूकास्त्रिदिवं प्रयान्ति किमत्र विप्रा भवभावयुक्ताः॥
akāmakāmāśca tathā sakāmā revāntamāśritya mriyanti tīre| jaḍāndhamūkāstridivaṁ prayānti kimatra viprā bhavabhāvayuktāḥ||
निष्काम हों या सकाम, जो रेवा की सीमा का आश्रय लेकर उसके तट पर मरते हैं, वे जड़, अंधे, गूँगे भी स्वर्ग को जाते हैं — फिर भाव से युक्त विप्रों की तो बात ही क्या?
श्लोक 65 (skanda.5.165.65)
मासोपवासैरपि शोषिताङ्गा न तां गतिं यान्ति विमुक्तदेहाः। म्रियन्ति रेवाजलपूतकायाः शिवार्चने केशवभावयुक्ताः॥
māsopavāsairapi śoṣitāṅgā na tāṁ gatiṁ yānti vimuktadehāḥ| mriyanti revājalapūtakāyāḥ śivārcane keśavabhāvayuktāḥ||
मास भर के उपवासों से भी जिनके अंग सूख जाते हैं, वे शरीर-मुक्त होकर भी वह गति नहीं पाते, जो रेवा के जल से पवित्र शरीर होकर शिव-अर्चना या केशव-भाव में लीन होकर मरते हैं, वे पाते हैं।
श्लोक 66 (skanda.5.165.66)
नीवारश्यामाकयवेङ्गुदाद्यैरन्यैर्मुनीन्द्रा इह वर्तयन्ति। आप्रित्य कूलं त्रिदशानुगीतं ते नर्मदाया न विशन्ति मृत्युम्॥
nīvāraśyāmākayaveṅgudādyairanyairmunīndrā iha vartayanti| āpritya kūlaṁ tridaśānugītaṁ te narmadāyā na viśanti mṛtyum||
जो श्रेष्ठ मुनि यहाँ नीवार, श्यामाक, जौ, इंगुदी आदि से जीवन-निर्वाह करते हैं, त्रिदशों द्वारा गाए गए उसके तट का आश्रय लेकर, वे नर्मदा के कारण साधारण मृत्यु में प्रवेश नहीं करते।
श्लोक 67 (skanda.5.165.67)
भ्रमन्ति ये तीरमुपेत्य देव्यास्त्रिकालदेवार्चनसत्यपूताः। विण्मूत्रचर्मास्थितिरोपधानाः कुक्षौ युवत्या न वसन्ति भूयः॥
bhramanti ye tīramupetya devyāstrikāladevārcanasatyapūtāḥ| viṇmūtracarmāsthitiropadhānāḥ kukṣau yuvatyā na vasanti bhūyaḥ||
जो देवी के तट पर आकर, त्रिकाल देव-अर्चना और सत्य से पवित्र होकर विचरण करते हैं, वे विष्ठा-मूत्र-चर्म-अस्थि से बने शरीर को त्यागकर पुनः किसी युवती की कोख में नहीं रहते।
श्लोक 68 (skanda.5.165.68)
किं यज्ञदानैर्बहुभिश्च तेषां निषेवितैस्तीर्थवरैः समस्तैः। रेवातटं दक्षिणमुत्तरं वा सेवन्ति ते रुद्रचरानुपूर्वम्॥
kiṁ yajñadānairbahubhiśca teṣāṁ niṣevitaistīrthavaraiḥ samastaiḥ| revātaṭaṁ dakṣiṇamuttaraṁ vā sevanti te rudracarānupūrvam||
जो दक्षिण या उत्तर रेवा-तट का सेवन करते हुए रुद्र के मार्ग का अनुसरण करते हैं, उन्हें बहुत से यज्ञ-दानों तथा समस्त श्रेष्ठ तीर्थों के सेवन से क्या प्रयोजन?
श्लोक 69 (skanda.5.165.69)
ते वञ्चिताः पङ्गुजडान्धभूता लोकेषु मर्त्याः पशुभिश्च तुल्याः। ये नाश्रिता रुद्रशरीरभूतां सोपानपङ्क्तिं त्रिदिवस्य रेवाम्॥
te vañcitāḥ paṅgujaḍāndhabhūtā lokeṣu martyāḥ paśubhiśca tulyāḥ| ye nāśritā rudraśarīrabhūtāṁ sopānapaṅktiṁ tridivasya revām||
जो मनुष्य रुद्र के शरीर से उत्पन्न, स्वर्ग की सीढ़ी-रूप रेवा का आश्रय नहीं लेते, वे लोक में ठगे हुए, लंगड़े, जड़, अंधे और पशुओं के समान हैं।
श्लोक 70 (skanda.5.165.70)
युगं कलिं घोरमिमं य इच्छेद्द्रष्टुं कदाचिन्न पुनर्द्विजेन्द्रः। स नर्मदातीरमुपेत्य सर्वं सम्पूजयेत्सर्वविमुक्तसंगः॥
yugaṁ kaliṁ ghoramimaṁ ya iccheddraṣṭuṁ kadācinna punardvijendraḥ| sa narmadātīramupetya sarvaṁ sampūjayetsarvavimuktasaṁgaḥ||
हे द्विजेन्द्र! जो कभी इस भयंकर कलियुग को फिर कभी न देखना चाहे, वह नर्मदा-तट पर आकर सर्व संग से मुक्त होकर सबकी पूजा करे।
श्लोक 71 (skanda.5.165.71)
विघ्नैरनेकैरतियोज्यमाना ये तीरमुझन्ति न नर्मदायाः। ते चैव सर्वस्य हितार्थभूता वन्द्याश्च ते सर्वजनस्य मान्याः॥
vighnairanekairatiyojyamānā ye tīramujhanti na narmadāyāḥ| te caiva sarvasya hitārthabhūtā vandyāśca te sarvajanasya mānyāḥ||
जो अनेक विघ्नों से अत्यधिक बाधित होकर भी नर्मदा-तट को नहीं छोड़ते, वे सबके हित के साधन बन जाते हैं, तथा सर्वजन द्वारा वन्दनीय और मान्य होते हैं।
श्लोक 72 (skanda.5.165.72)
भृग्वत्रिगार्गेयवशिष्ठकङ्काः शतैः समेतैर्नियतास्त्वसंख्यैः। सिद्धिं परां ते हि जलप्लुताङ्गाः प्राप्तास्तु लोकान्मरुतां न चान्ये॥
bhṛgvatrigārgeyavaśiṣṭhakaṅkāḥ śataiḥ sametairniyatāstvasaṁkhyaiḥ| siddhiṁ parāṁ te hi jalaplutāṅgāḥ prāptāstu lokānmarutāṁ na cānye||
भृगु, अत्रि, गार्ग्य, वसिष्ठ, कंक — सैकड़ों तथा असंख्य नियमित ऋषियों सहित, वे जल में डूबे अंग वाले परम सिद्धि तथा मरुतों के लोक को प्राप्त हुए, अन्य नहीं।
श्लोक 73 (skanda.5.165.73)
ज्ञानं महत्पुण्यतमं पवित्रं पठन्त्यदो नित्यविशुद्धसत्त्वाः। गतिं परां यान्ति महानुभावा रुद्रस्य वाक्यं हि यथा प्रमाणम्॥
jñānaṁ mahatpuṇyatamaṁ pavitraṁ paṭhantyado nityaviśuddhasattvāḥ| gatiṁ parāṁ yānti mahānubhāvā rudrasya vākyaṁ hi yathā pramāṇam||
जो नित्य विशुद्ध सत्त्व वाले इस महान, अत्यन्त पुण्य, पवित्र ज्ञान को पढ़ते हैं, वे महानुभाव परम गति को प्राप्त होते हैं — क्योंकि रुद्र का वचन ही प्रमाण है।