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अवन्ती खण्ड · अध्याय 166

श्रीनर्मदा-माहात्म्य वर्णन

अध्याय 165अध्याय-सूचीअध्याय 167

श्लोक 1 (skanda.5.166.1)

युधिष्ठिर उवाच। अहो महत्पुण्यतमा विशिष्टा क्षयं न याता इह या युगान्ते। तस्मात्सदा सेव्यतमा मुनीन्द्रैर्ध्यानार्चनस्नानपरायणैश्च॥

yudhiṣṭhira uvāca| aho mahatpuṇyatamā viśiṣṭā kṣayaṁ na yātā iha yā yugānte| tasmātsadā sevyatamā munīndrairdhyānārcanasnānaparāyaṇaiśca||

युधिष्ठिर बोले — अहो! यह अत्यन्त पुण्यमयी, विशिष्ट नदी युग के अन्त में भी क्षय को प्राप्त नहीं हुई! इसीलिए यह ध्यान, अर्चना और स्नान में तत्पर मुनीन्द्रों द्वारा सदा सेव्य है।

श्लोक 2 (skanda.5.166.2)

यामाश्रित्य गता मोक्षमृषयो धर्मवत्सलाः। ये त्वयोक्तास्तु नियमा ऋषीणां वेदनिर्मिताः॥

yāmāśritya gatā mokṣamṛṣayo dharmavatsalāḥ| ye tvayoktāstu niyamā ṛṣīṇāṁ vedanirmitāḥ||

जिसका आश्रय लेकर धर्मवत्सल ऋषि मोक्ष को प्राप्त हुए, आपने जो वेदनिर्मित नियम ऋषियों के कहे,

श्लोक 3 (skanda.5.166.3)

मोक्षावाप्तिर्भवेद्येषां नियमैश्च पृथग्विधैः। दशद्वादशभिर्वापि षड्भिरष्टाभिरेव वा॥

mokṣāvāptirbhavedyeṣāṁ niyamaiśca pṛthagvidhaiḥ| daśadvādaśabhirvāpi ṣaḍbhiraṣṭābhireva vā||

जिन नाना नियमों से मोक्ष की प्राप्ति होती है — चाहे दस या बारह वर्षों में, या छह या आठ में,

श्लोक 4 (skanda.5.166.4)

त्रिभिस्तथा चतुर्भिर्वा वर्षैर्मासैस्तथैव च। मुच्यन्ते कलिदोषैस्ते देवेशानसमर्चनात्॥

tribhistathā caturbhirvā varṣairmāsaistathaiva ca| mucyante kalidoṣaiste deveśānasamarcanāt||

या तीन या चार वर्षों में, या इसी प्रकार महीनों में — वे देवेश की अर्चना से कलियुग के दोषों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.166.5)

ब्रह्माणं वा सुरश्रेष्ठ केशवं वा जगद्गुरुम्। अर्चयन्पापमखिलं जहात्येव न संशयः॥

brahmāṇaṁ vā suraśreṣṭha keśavaṁ vā jagadgurum| arcayanpāpamakhilaṁ jahātyeva na saṁśayaḥ||

हे सुरश्रेष्ठ! ब्रह्मा की या जगद्गुरु केशव की अर्चना करते हुए मनुष्य निःसंदेह सम्पूर्ण पाप का त्याग कर देता है।

श्लोक 6 (skanda.5.166.6)

एतद्विस्तरतः सर्वं कथयस्व ममानघ। यस्मिन्संसारगहने निमग्नाः सर्वजन्तवः। ते कथं त्रिदिवं प्राप्ता इति मे संशयो वद॥

etadvistarataḥ sarvaṁ kathayasva mamānagha| yasminsaṁsāragahane nimagnāḥ sarvajantavaḥ| te kathaṁ tridivaṁ prāptā iti me saṁśayo vada||

हे अनघ! यह सब मुझे विस्तार से कहिए। जिस संसार-गहन वन में सभी प्राणी डूबे हुए हैं, वे किस प्रकार स्वर्ग को प्राप्त हुए — यह मेरा संशय दूर कीजिए।

श्लोक 7 (skanda.5.166.7)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। जन्मान्तरैरनेकैस्तु मानुष्यमुपलभ्यते। भक्तिरुत्पद्यते चात्र कथंचिदपि शङ्करे॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| janmāntarairanekaistu mānuṣyamupalabhyate| bhaktirutpadyate cātra kathaṁcidapi śaṅkare||

श्रीमार्कण्डेय बोले — अनेक जन्मों के पश्चात् मनुष्यत्व प्राप्त होता है, और यहाँ किसी प्रकार शंकर में भक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 8 (skanda.5.166.8)

तीर्थदानोपवासानां यज्ञैर्देवद्विजार्चनैः। अवाप्तिर्जायते पुंसां श्रद्धया परया नृप॥

tīrthadānopavāsānāṁ yajñairdevadvijārcanaiḥ| avāptirjāyate puṁsāṁ śraddhayā parayā nṛpa||

हे राजन्! तीर्थ, दान, उपवास, यज्ञ, तथा देव-द्विजों की अर्चना से पुरुषों को परम श्रद्धा से ही सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 9 (skanda.5.166.9)

तस्माच्छ्रद्धा प्रकर्तव्या मानवैर्धर्मवत्सलैः। ईशोऽपि श्रद्धया साध्यस्तेन श्रद्धा विशिष्यते॥

tasmācchraddhā prakartavyā mānavairdharmavatsalaiḥ| īśo'pi śraddhayā sādhyastena śraddhā viśiṣyate||

इसीलिए धर्मवत्सल मनुष्यों को श्रद्धा रखनी चाहिए; ईश्वर भी श्रद्धा से ही साध्य हैं, इसीलिए श्रद्धा सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 10 (skanda.5.166.10)

अन्यथा निष्फलं सर्वं श्रद्धाहीनं तु भारत। तस्मात्समाश्रयेद्भक्तिं रुद्रस्य परमेष्ठिनः॥

anyathā niṣphalaṁ sarvaṁ śraddhāhīnaṁ tu bhārata| tasmātsamāśrayedbhaktiṁ rudrasya parameṣṭhinaḥ||

हे भारत! अन्यथा श्रद्धाहीन सब कुछ निष्फल है। इसलिए परमेष्ठी रुद्र की भक्ति का आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.5.166.11)

तेषांहि सफलं जन्म येषां भक्तिरचञ्चला। सा चैव त्रिविधा भक्तिः सात्त्विकी राजसी तथा॥

teṣāṁhi saphalaṁ janma yeṣāṁ bhaktiracañcalā| sā caiva trividhā bhaktiḥ sāttvikī rājasī tathā||

जिनकी भक्ति अचंचल है, उन्हीं का जन्म सफल है। वह भक्ति भी तीन प्रकार की है — सात्त्विकी, राजसी,

श्लोक 12 (skanda.5.166.12)

तामसी सर्वलोकस्य त्रिविधं च फलं लभेत्। ते कर्मफलसंयोगादावर्तन्ते पुनःपुनः॥

tāmasī sarvalokasya trividhaṁ ca phalaṁ labhet| te karmaphalasaṁyogādāvartante punaḥpunaḥ||

और तामसी — सम्पूर्ण लोक को तीन प्रकार का फल प्राप्त होता है। वे कर्मफल के संयोग से बार-बार लौटते हैं।

श्लोक 13 (skanda.5.166.13)

जन्मान्तरशतैस्तेषां ज्ञानिनां देवयाजिनाम्। देवत्रये भवेद्भक्तिः क्षयात्पापस्य कर्मणः॥

janmāntaraśataisteṣāṁ jñānināṁ devayājinām| devatraye bhavedbhaktiḥ kṣayātpāpasya karmaṇaḥ||

सैकड़ों जन्मों के पश्चात् ज्ञानी देव-यजनकर्ताओं की, पापकर्म के क्षय होने से, तीनों देवों में भक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 14 (skanda.5.166.14)

ईशानात्तु पुनर्मोक्षो जायते छिन्नसंशयः। ये पुनर्नर्मदातीरमाश्रित्य द्विजपुंगवाः॥

īśānāttu punarmokṣo jāyate chinnasaṁśayaḥ| ye punarnarmadātīramāśritya dvijapuṁgavāḥ||

किन्तु ईशान से ही पुनः संशयरहित मोक्ष उत्पन्न होता है। किन्तु जो श्रेष्ठ द्विज नर्मदा-तट का आश्रय लेकर,

श्लोक 15 (skanda.5.166.15)

त्रयीमार्गमसन्दिग्धास्ते यान्ति परमां गतिम्। एकाग्रमनसो ये तु शङ्करं शिवमव्ययम्॥

trayīmārgamasandigdhāste yānti paramāṁ gatim| ekāgramanaso ye tu śaṅkaraṁ śivamavyayam||

त्रयी-मार्ग (वेदत्रयी) का असंदिग्ध पालन करते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं। और जो एकाग्र मन से अव्यय शंकर शिव की,

श्लोक 16 (skanda.5.166.16)

अर्चयन्तीह निरताः क्षिप्रं सिध्यन्ति ते जनाः। कालेन महता सिद्धिर्जायतेऽन्यत्र देहिनाम्॥

arcayantīha niratāḥ kṣipraṁ sidhyanti te janāḥ| kālena mahatā siddhirjāyate'nyatra dehinām||

यहाँ अर्चना में तत्पर रहते हैं, वे शीघ्र सिद्ध हो जाते हैं। अन्यत्र देहधारियों की सिद्धि बहुत काल में होती है,

श्लोक 17 (skanda.5.166.17)

नर्मदायाः पुनस्तीरे क्षिप्रं सिद्धिरवाप्यते। षड्भिर्वर्षैस्तु सिध्यन्ति ये तु सांख्यविदो जनाः॥

narmadāyāḥ punastīre kṣipraṁ siddhiravāpyate| ṣaḍbhirvarṣaistu sidhyanti ye tu sāṁkhyavido janāḥ||

किन्तु नर्मदा के तट पर शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। जो सांख्यवेत्ता जन हैं, वे छह वर्षों में सिद्ध होते हैं;

श्लोक 18 (skanda.5.166.18)

वैष्णवा ज्ञानसम्पन्नास्तेऽपि सिध्यन्ति चाग्रतः। सर्वयोगविदो ये च समुद्रमिव सिन्धवः॥

vaiṣṇavā jñānasampannāste'pi sidhyanti cāgrataḥ| sarvayogavido ye ca samudramiva sindhavaḥ||

ज्ञानसम्पन्न वैष्णव उससे भी पहले सिद्ध हो जाते हैं। और जो सब योगों के ज्ञाता हैं, वे समुद्र में मिलती नदियों के समान,

श्लोक 19 (skanda.5.166.19)

एकीभवन्ति कल्पान्ते योगे माहेश्वरे गताः। सर्वेषामेव योगानां योगो माहेश्वरो वरः॥

ekībhavanti kalpānte yoge māheśvare gatāḥ| sarveṣāmeva yogānāṁ yogo māheśvaro varaḥ||

माहेश्वर योग को प्राप्त होकर कल्पान्त में एक हो जाते हैं। सब योगों में माहेश्वर योग श्रेष्ठ है।

श्लोक 20 (skanda.5.166.20)

तमासाद्य विमुच्यन्ते येऽपि स्युः पापयोनयः। शिवमर्च्य नदीकूले जायन्ते ते न योनिषु॥

tamāsādya vimucyante ye'pi syuḥ pāpayonayaḥ| śivamarcya nadīkūle jāyante te na yoniṣu||

उसे प्राप्त करके पापयोनि में जन्मे लोग भी मुक्त हो जाते हैं। नदी के तट पर शिव की पूजा करके वे फिर योनियों में जन्म नहीं लेते।

श्लोक 21 (skanda.5.166.21)

गतिरेषा दुरारोहा सर्वपापक्षयंकरी। मुच्यन्ते मङ्क्षु संसाराद्रेवामाश्रित्य जन्तवः॥

gatireṣā durārohā sarvapāpakṣayaṁkarī| mucyante maṅkṣu saṁsārādrevāmāśritya jantavaḥ||

यह गति दुर्लभ है, किन्तु सब पापों का क्षय करने वाली है। रेवा का आश्रय लेकर प्राणी शीघ्र ही संसार से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 22 (skanda.5.166.22)

तस्मात्स्नायी भवेन्नित्यं तथा भस्मविलेपनः। नर्मदातीरमासाद्य क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयात्॥

tasmātsnāyī bhavennityaṁ tathā bhasmavilepanaḥ| narmadātīramāsādya kṣipraṁ siddhimavāpnuyāt||

इसलिए नित्य स्नान करने वाला और भस्म-विलेपन करने वाला, नर्मदा-तट पर पहुँचकर शीघ्र सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (skanda.5.166.23)

त्रिकालं पूजयेच्छान्तो यो नरो लिङ्गमादरात्। सर्वरोगविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्॥

trikālaṁ pūjayecchānto yo naro liṅgamādarāt| sarvarogavinirmuktaḥ sa yāti paramāṁ gatim||

जो शान्त मनुष्य आदरपूर्वक त्रिकाल लिंग की पूजा करता है, वह सर्वरोगों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 24 (skanda.5.166.24)

षड्भिः सिध्यति मसैस्तु यद्यपि स्यात्स पापकृत्। ये पुनः शुद्धमनसो मासैः शुध्यन्ति ते त्रिभिः॥

ṣaḍbhiḥ sidhyati masaistu yadyapi syātsa pāpakṛt| ye punaḥ śuddhamanaso māsaiḥ śudhyanti te tribhiḥ||

पापी होते हुए भी वह छह महीनों में सिद्ध हो जाता है; जो शुद्ध मन वाले हैं, वे तीन महीनों में शुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.5.166.25)

यथा दिनकरस्पृष्टं हिमं शैलाद्विशीर्यन्ते। तद्वद्विलीयते पापं स्पृष्टं भस्मकणैः शुभैः॥

yathā dinakaraspṛṣṭaṁ himaṁ śailādviśīryante| tadvadvilīyate pāpaṁ spṛṣṭaṁ bhasmakaṇaiḥ śubhaiḥ||

जैसे सूर्य से स्पर्शित हिम पर्वत से पिघल जाता है, वैसे ही शुभ भस्म-कणों से स्पर्शित पाप विलीन हो जाता है।

श्लोक 26 (skanda.5.166.26)

वैनतेयभयत्रस्ता यथा नश्यन्ति पन्नगाः। तद्वत्पापानि नश्यन्ति भस्मनाभ्युक्षितानि ह॥

vainateyabhayatrastā yathā naśyanti pannagāḥ| tadvatpāpāni naśyanti bhasmanābhyukṣitāni ha||

जैसे गरुड़ के भय से भयभीत सर्प भाग जाते हैं, वैसे ही भस्म से छिड़के गए पाप भाग जाते हैं।

श्लोक 27 (skanda.5.166.27)

नर्मदातोयपूतेन भस्मनोद्धूलयन्ति ये। सद्यस्ते पापसङ्घाच्च मुच्यन्ते नात्र संशयः॥

narmadātoyapūtena bhasmanoddhūlayanti ye| sadyaste pāpasaṅghācca mucyante nātra saṁśayaḥ||

जो नर्मदा-जल से पवित्र भस्म धारण करते हैं, वे तत्काल पाप-समूह से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 28 (skanda.5.166.28)

व्रतं पाशुपतं भक्तया यथोक्तं पालयन्ति ये। शूद्रान्नेन विहीनास्तु ते यान्ति परमां गतिम्॥

vrataṁ pāśupataṁ bhaktayā yathoktaṁ pālayanti ye| śūdrānnena vihīnāstu te yānti paramāṁ gatim||

जो भक्तिपूर्वक यथोक्त पाशुपत व्रत का पालन करते हैं, शूद्र-अन्न से रहित होकर, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 29 (skanda.5.166.29)

अमृतं ब्राह्मणस्यान्नं क्षत्रियान्नं पयः स्मृतम्। वैश्यान्नमन्नमेव स्याच्छूद्रान्नं रुधिरं स्मृतम्॥

amṛtaṁ brāhmaṇasyānnaṁ kṣatriyānnaṁ payaḥ smṛtam| vaiśyānnamannameva syācchūdrānnaṁ rudhiraṁ smṛtam||

ब्राह्मण का अन्न अमृत है, क्षत्रिय का अन्न दूध के समान स्मृत है; वैश्य का अन्न सामान्य अन्न ही है, शूद्र का अन्न रक्त के समान स्मृत है।

श्लोक 30 (skanda.5.166.30)

शूद्रान्नरससंपुष्टा ये म्रियन्ते द्विजोत्तमाः। ते तपोज्ञानहीनास्तु काका गृध्रा भवन्ति ते॥

śūdrānnarasasaṁpuṣṭā ye mriyante dvijottamāḥ| te tapojñānahīnāstu kākā gṛdhrā bhavanti te||

शूद्र-अन्न के रस से पुष्ट होकर जो श्रेष्ठ द्विज मरते हैं, वे तप-ज्ञान से हीन होकर कौआ या गिद्ध बन जाते हैं।

श्लोक 31 (skanda.5.166.31)

दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठति। यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥

duṣkṛtaṁ hi manuṣyāṇāmannamāśritya tiṣṭhati| yo yasyānnaṁ samaśnāti sa tasyāśnāti kilbiṣam||

मनुष्यों का दुष्कृत उनके अन्न में ही निवास करता है; जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भी खाता है।

श्लोक 32 (skanda.5.166.32)

विशेषाद्यतिधर्मेण तपोलौल्यं समाश्रिताः। नरकं यान्त्यसन्दिग्धमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत्॥

viśeṣādyatidharmeṇa tapolaulyaṁ samāśritāḥ| narakaṁ yāntyasandigdhamityevaṁ śaṅkaro'bravīt||

विशेषतः यति-धर्म का पालन करते हुए तप के लोभ में पड़े लोग निःसंदेह नरक जाते हैं — ऐसा स्वयं शंकर ने कहा।

श्लोक 33 (skanda.5.166.33)

ईदृग्रूपाश्च ये विप्राः पाशुपत्ये व्यवस्थिताः। ते महत्पापसंघातं दहन्त्येव न संशयः॥

īdṛgrūpāśca ye viprāḥ pāśupatye vyavasthitāḥ| te mahatpāpasaṁghātaṁ dahantyeva na saṁśayaḥ||

किन्तु जो इस प्रकार के विप्र पाशुपत-मार्ग में स्थित हैं, वे बड़े से बड़े पाप-समूह को भी निःसंदेह जला देते हैं।

श्लोक 34 (skanda.5.166.34)

विडम्बेन च संयुक्ता लौलुप्येन च पीडिताः। असंग्राह्या इत्येवं श्रुतिनोदना॥

viḍambena ca saṁyuktā laulupyena ca pīḍitāḥ| asaṁgrāhyā ityevaṁ śrutinodanā||

जो पाखण्ड से युक्त और लोभ से पीड़ित हैं, वे ग्राह्य नहीं हैं — ऐसा श्रुति का आदेश है।

श्लोक 35 (skanda.5.166.35)

मातापितृकृतैर्दोषैरन्ये केचित्स्वकर्मजैः। नष्टा ज्ञानावलेपेन अहङ्कारेणऽपरे॥

mātāpitṛkṛtairdoṣairanye kecitsvakarmajaiḥ| naṣṭā jñānāvalepena ahaṅkāreṇa'pare||

कुछ माता-पिता के कृत दोषों से, कुछ अपने कर्मजनित दोषों से नष्ट होते हैं; कुछ मिथ्या ज्ञान के अभिमान से, कुछ अहंकार से।

श्लोक 36 (skanda.5.166.36)

शाङ्करे प्रस्थिता धर्मे ये स्मृत्यर्थबहिष्कृताः। क्लिश्यमानास्तु कलेन ते यान्ति परमां गतिम्॥

śāṅkare prasthitā dharme ye smṛtyarthabahiṣkṛtāḥ| kliśyamānāstu kalena te yānti paramāṁ gatim||

जो शैव धर्म में लगे हैं, यद्यपि स्मृति के अर्थ से बहिष्कृत हैं, कलि से क्लेश पाते हुए भी वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 37 (skanda.5.166.37)

अश्रद्दधानाः पुरुषा मूर्खा दम्भविवर्धिताः। न सिध्यन्ति दुरात्मानः कुदृष्टान्तार्थकीर्तनाः॥

aśraddadhānāḥ puruṣā mūrkhā dambhavivardhitāḥ| na sidhyanti durātmānaḥ kudṛṣṭāntārthakīrtanāḥ||

अश्रद्धालु, मूर्ख, पाखण्ड से बढ़े हुए, कुदृष्टान्तों का कीर्तन करने वाले दुरात्मा पुरुष सिद्ध नहीं होते।

श्लोक 38 (skanda.5.166.38)

महाभाग्येऽपि तीर्थस्य शाङ्करं व्रतमास्थिताः। वियोनिं यान्त्यसन्दिग्धं लौलुप्येन समन्विताः॥

mahābhāgye'pi tīrthasya śāṅkaraṁ vratamāsthitāḥ| viyoniṁ yāntyasandigdhaṁ laulupyena samanvitāḥ||

तीर्थ के महाभाग्य में भी शैव व्रत में स्थित होकर भी जो लोभ से युक्त रहते हैं, वे निःसंदेह कुयोनि में जन्म लेते हैं।

श्लोक 39 (skanda.5.166.39)

न तीर्थैर्न च दानैश्च दुष्कृतं हि विलुप्यते। अज्ञानाच्च प्रमादाच्च कृतं पापं विनश्यति॥

na tīrthairna ca dānaiśca duṣkṛtaṁ hi vilupyate| ajñānācca pramādācca kṛtaṁ pāpaṁ vinaśyati||

न तीर्थों से, न दानों से दुष्कृत मिटता है; केवल अज्ञान और प्रमाद से किया गया पाप ही नष्ट होता है।

श्लोक 40 (skanda.5.166.40)

एवं ज्ञात्वा तु विधिना वर्तितव्यं द्विजातिभिः। परं ब्रह्म जपद्भिश्च वार्तितव्यं मुहुर्मुहुः॥

evaṁ jñātvā tu vidhinā vartitavyaṁ dvijātibhiḥ| paraṁ brahma japadbhiśca vārtitavyaṁ muhurmuhuḥ||

यह जानकर द्विजों को विधिपूर्वक आचरण करना चाहिए, तथा बार-बार परब्रह्म का जप करते रहना चाहिए।

श्लोक 41 (skanda.5.166.41)

ऊर्ध्वरूपं विरूपाक्षं योऽधीते रुद्रमेव च। ईशानं पश्यते साक्षात्षण्मासात्सङ्गवर्जितः॥

ūrdhvarūpaṁ virūpākṣaṁ yo'dhīte rudrameva ca| īśānaṁ paśyate sākṣātṣaṇmāsātsaṅgavarjitaḥ||

जो ऊर्ध्व-स्तोत्र, विरूपाक्ष तथा रुद्र का अध्ययन करता है, वह छह महीनों में आसक्ति-रहित होकर साक्षात् ईशान का दर्शन पाता है।

श्लोक 42 (skanda.5.166.42)

संहिताया दशावृत्तीर्यः करोति सुसंयतः। नर्मदातटमाश्रित्य स मुच्येत्सर्वपातकैः॥

saṁhitāyā daśāvṛttīryaḥ karoti susaṁyataḥ| narmadātaṭamāśritya sa mucyetsarvapātakaiḥ||

जो सुसंयत होकर संहिता का दस बार पाठ करता है, नर्मदा-तट का आश्रय लेकर, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 43 (skanda.5.166.43)

पुराणसंहितां वापि शैवीं वा वैष्णवीमपि। यः पठेन्नर्मदातीरे शिवाग्रे स शिवात्मकः॥

purāṇasaṁhitāṁ vāpi śaivīṁ vā vaiṣṇavīmapi| yaḥ paṭhennarmadātīre śivāgre sa śivātmakaḥ||

जो पुराण-संहिता को, शैव हो या वैष्णव, नर्मदा-तट पर शिव के सम्मुख पढ़ता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है।

श्लोक 44 (skanda.5.166.44)

आ भूतसंक्षयं यावत्स्वर्गलोके महीयते। संसाख्यसनं हातुं पुरा प्रोक्तं तु नन्दिना॥

ā bhūtasaṁkṣayaṁ yāvatsvargaloke mahīyate| saṁsākhyasanaṁ hātuṁ purā proktaṁ tu nandinā||

वह प्रलयकाल तक स्वर्गलोक में सम्मानित रहता है। इस संसार-नामक बन्धन को त्यागने का उपाय पूर्वकाल में नन्दी ने कहा था —

श्लोक 45 (skanda.5.166.45)

देवर्षिसिद्धगन्धर्वसमवाये शिवालये। नन्दिगीतामिमां राजञ्छृणुष्वैकमनाः शुभाम्॥

devarṣisiddhagandharvasamavāye śivālaye| nandigītāmimāṁ rājañchṛṇuṣvaikamanāḥ śubhām||

देव, ऋषि, सिद्ध, गन्धर्वों की सभा में, शिव के धाम में। हे राजन्! एकाग्रचित्त होकर नन्दी की इस शुभ गीता को सुनो,

श्लोक 46 (skanda.5.166.46)

स्वर्गमोक्षप्रदां पुण्यां संसारभयनाशिनीम्॥

svargamokṣapradāṁ puṇyāṁ saṁsārabhayanāśinīm||

जो स्वर्ग-मोक्ष प्रदान करने वाली, पुण्य, संसार के भय का नाश करने वाली है।

श्लोक 47 (skanda.5.166.47)

संसारगह्वरगुहां प्रविहातुमेतां चेदिच्छथ प्रतिपदं भवतापखिन्नाः। नानाविधैर्निजकृतैर्बहुकर्मपाशैर्बद्धाः सुखाय शृणुतैकहितं मयोक्तम्॥

saṁsāragahvaraguhāṁ pravihātumetāṁ cedicchatha pratipadaṁ bhavatāpakhinnāḥ| nānāvidhairnijakṛtairbahukarmapāśairbaddhāḥ sukhāya śṛṇutaikahitaṁ mayoktam||

नन्दी ने कहा — यदि तुम इस संसार-गुफा को त्यागना चाहते हो, हर पग पर भव-ताप से खिन्न, अपने ही किए हुए नाना कर्म-पाशों से बद्ध, तो सुख के लिए मेरा यह एक हितकारी वचन सुनो।

श्लोक 48 (skanda.5.166.48)

शक्र वक्रगतिं मा गा मा कृथा यम यातनाम्। चेतः प्रचेतः शमय लौलुप्यं त्यज वित्तप॥

śakra vakragatiṁ mā gā mā kṛthā yama yātanām| cetaḥ pracetaḥ śamaya laulupyaṁ tyaja vittapa||

हे शक्र! टेढ़े मार्ग पर मत जाओ; हे यम! यातना मत दो। हे चित्त! विचारों को शान्त करो; हे कुबेर! लोभ त्याग दो।

श्लोक 49 (skanda.5.166.49)

दीनानाथविशिष्टेभ्यो धनं सर्वं परित्यज। यदि संसारजलधेर्वीचीप्रेङ्खोल्लनातुरः॥

dīnānāthaviśiṣṭebhyo dhanaṁ sarvaṁ parityaja| yadi saṁsārajaladhervīcīpreṅkhollanāturaḥ||

दीन-अनाथों और सुपात्रों को सब धन दान कर दो — यदि तुम संसार-सागर की लहरों के हिचकोलों से पीड़ित हो।

श्लोक 50 (skanda.5.166.50)

जन्मोद्विग्नं मृतेस्त्रस्तं ग्रस्तं कामादिभिर्नरम्। स्रस्तं यो न यमादिभ्यः पिनाकी पाति पावनः॥

janmodvignaṁ mṛtestrastaṁ grastaṁ kāmādibhirnaram| srastaṁ yo na yamādibhyaḥ pinākī pāti pāvanaḥ||

जन्म से उद्विग्न, मृत्यु से त्रस्त, काम आदि से ग्रस्त, गिरे हुए मनुष्य को यम आदि से पिनाकधारी पावन शिव के अतिरिक्त कोई नहीं बचाता।

श्लोक 51 (skanda.5.166.51)

मा धेहि गर्वं कीनाश हास्यं यास्यसि पीडयन्। प्राणिनं सर्वशरणं तद्भावि शरणं तव॥

mā dhehi garvaṁ kīnāśa hāsyaṁ yāsyasi pīḍayan| prāṇinaṁ sarvaśaraṇaṁ tadbhāvi śaraṇaṁ tava||

हे यम! अभिमान मत करो, पीड़ा देते हुए तुम हास्यास्पद हो जाओगे। हर प्राणी के लिए एक शरण है, वही तुम्हारी भी शरण होगी।

श्लोक 52 (skanda.5.166.52)

कालः करालको बालः को मृत्युः को यमाधमः। शिवविष्णुपराणां हि नराणां किं भयं भवेत्॥

kālaḥ karālako bālaḥ ko mṛtyuḥ ko yamādhamaḥ| śivaviṣṇuparāṇāṁ hi narāṇāṁ kiṁ bhayaṁ bhavet||

काल क्या है, बाल मृत्यु क्या है, नीच यम कौन है — शिव-विष्णु में परायण मनुष्यों को क्या भय हो सकता है?

श्लोक 53 (skanda.5.166.53)

भवभारार्तजन्तूनां रेवातीरनिवासिनाम्। भर्गश्च भगवांश्चैव भवभीतिविभेदनौ॥

bhavabhārārtajantūnāṁ revātīranivāsinām| bhargaśca bhagavāṁścaiva bhavabhītivibhedanau||

भव के भार से पीड़ित, रेवा-तट-निवासी प्राणियों के लिए भर्ग (शिव) और भगवान (विष्णु) दोनों ही भव-भय के विदारक हैं।

श्लोक 54 (skanda.5.166.54)

शिवं भज शिवं ध्याय शिवं स्तुहि शिवं यज। शिवं नम वराक त्वं ज्ञानं मोक्षं यदीच्छसि॥

śivaṁ bhaja śivaṁ dhyāya śivaṁ stuhi śivaṁ yaja| śivaṁ nama varāka tvaṁ jñānaṁ mokṣaṁ yadīcchasi||

शिव को भजो, शिव का ध्यान करो, शिव की स्तुति करो, शिव की यजना करो; हे बेचारे! यदि ज्ञान और मोक्ष चाहते हो तो शिव को नमन करो।

श्लोक 55 (skanda.5.166.55)

पठ पञ्चाननं शास्त्रं मन्त्रं पञ्चाक्षरं जप। धेहि पञ्चात्मकं तत्त्वं यज पञ्चाननं परम्॥

paṭha pañcānanaṁ śāstraṁ mantraṁ pañcākṣaraṁ japa| dhehi pañcātmakaṁ tattvaṁ yaja pañcānanaṁ param||

पंचानन के शास्त्र को पढ़ो, पंचाक्षर मंत्र का जप करो; पंचात्मक तत्त्व का ध्यान करो, परम पंचानन की यजना करो।

श्लोक 56 (skanda.5.166.56)

किं तैः कर्मगणैः शोच्यैर्नानाभावविशेषितैः। यदि पञ्चाननः श्रीमान् सेव्यते सर्वथा शिवः॥

kiṁ taiḥ karmagaṇaiḥ śocyairnānābhāvaviśeṣitaiḥ| yadi pañcānanaḥ śrīmān sevyate sarvathā śivaḥ||

नाना भावों से विशिष्ट उन शोचनीय कर्म-समूहों से क्या लाभ, यदि श्रीमान पंचानन शिव की सर्वथा सेवा की जाए?

श्लोक 57 (skanda.5.166.57)

किं संसारगजोन्मत्तबृंहितैर्निभृतैरपि। यदि पञ्चाननो देवो भावगन्धोपसेवितः॥

kiṁ saṁsāragajonmattabṛṁhitairnibhṛtairapi| yadi pañcānano devo bhāvagandhopasevitaḥ||

संसार-रूपी उन्मत्त हाथी की निरन्तर चिंघाड़ से भी क्या, यदि पंचानन देव भाव की सुगंध मात्र से ही सेवित हो जाएँ?

श्लोक 58 (skanda.5.166.58)

रे मूढ किं विषादेन प्राप्य कर्मकदर्थनाम्। भवानीवल्लभं भीमं जप त्वं भयनाशनम्॥

re mūḍha kiṁ viṣādena prāpya karmakadarthanām| bhavānīvallabhaṁ bhīmaṁ japa tvaṁ bhayanāśanam||

हे मूढ़! कर्म की विडम्बना पाकर विषाद से क्या लाभ? भवानी के प्रिय, भय के नाशक भीम का जप करो।

श्लोक 59 (skanda.5.166.59)

नर्मदातीरनिलयं दुःखौघविलयंकरम्। स्वर्गमोक्षप्रदं भर्गं भज मूढ सुरेश्वरम्॥

narmadātīranilayaṁ duḥkhaughavilayaṁkaram| svargamokṣapradaṁ bhargaṁ bhaja mūḍha sureśvaram||

हे मूढ़! नर्मदा-तट-निवासी, दुःख-समूह का नाश करने वाले, स्वर्ग-मोक्ष प्रदान करने वाले सुरेश्वर भर्ग को भजो।

श्लोक 60 (skanda.5.166.60)

विहाय रेवां सुरसिन्धुसेव्यां तत्तीरसंस्थं च हरं हरिं च। उन्मत्तवद्भावविवर्जितस्त्वं क्व यासि रे मूढ दिगन्तराणि॥

vihāya revāṁ surasindhusevyāṁ tattīrasaṁsthaṁ ca haraṁ hariṁ ca| unmattavadbhāvavivarjitastvaṁ kva yāsi re mūḍha digantarāṇi||

देवगंगा से भी सेव्य रेवा और उसके तट पर स्थित हर-हरि को छोड़कर, हे मूढ़! भाव-रहित होकर उन्मत्त के समान तुम किन दिशाओं में जाते हो?

श्लोक 61 (skanda.5.166.61)

भज रेवाजलं पुण्यं यज रुद्रं सनातनम्। जप पञ्चाक्षरीं विद्यां व्रज स्थानं च वाञ्छितम्॥

bhaja revājalaṁ puṇyaṁ yaja rudraṁ sanātanam| japa pañcākṣarīṁ vidyāṁ vraja sthānaṁ ca vāñchitam||

रेवा के पुण्य जल का आश्रय लो, सनातन रुद्र की यजना करो; पंचाक्षरी विद्या का जप करो, अभीष्ट स्थान को प्राप्त करो।

श्लोक 62 (skanda.5.166.62)

क्लेशयित्वा निजं कायमुपायैर्बहुभिस्तु किम्। भज रेवां शिवं प्राप्य सुखसाध्यं परं पदम्॥

kleśayitvā nijaṁ kāyamupāyairbahubhistu kim| bhaja revāṁ śivaṁ prāpya sukhasādhyaṁ paraṁ padam||

अनेक उपायों से अपने शरीर को क्लेश देने से क्या लाभ? रेवा का आश्रय लो, शिव को पाकर सुखसाध्य परम पद प्राप्त करो।

श्लोक 63 (skanda.5.166.63)

एवं कैलासमासाद्य नदीं स शिवसन्निधौ। जगौ यल्लोकपालानां तन्मयोक्तं तवाधुना॥

evaṁ kailāsamāsādya nadīṁ sa śivasannidhau| jagau yallokapālānāṁ tanmayoktaṁ tavādhunā||

इस प्रकार नन्दी ने कैलास पहुँचकर, शिव की उपस्थिति में लोकपालों को जो गीत गाया, वही अब मैंने तुम्हें कहा है।

श्लोक 64 (skanda.5.166.64)

मार्कण्डेय उवाच। स्नानदानपरो यस्तु नित्यं धर्ममनुव्रतः। नर्मदातीरमाश्रित्य मुच्यते सर्वपातकैः॥

mārkaṇḍeya uvāca| snānadānaparo yastu nityaṁ dharmamanuvrataḥ| narmadātīramāśritya mucyate sarvapātakaiḥ||

मार्कण्डेय बोले — जो स्नान-दान में तत्पर, नित्य धर्म का अनुसरण करने वाला है, वह नर्मदा-तट का आश्रय लेकर सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 65 (skanda.5.166.65)

विधिहीनो जपेन्नित्यं वेदान्सर्वाञ्छतं समाः। मृत्युलाङ्गलजाप्येन समो योऽप्यधिको गुणैः॥

vidhihīno japennityaṁ vedānsarvāñchataṁ samāḥ| mṛtyulāṅgalajāpyena samo yo'pyadhiko guṇaiḥ||

विधि-रहित व्यक्ति यदि सौ वर्षों तक नित्य सम्पूर्ण वेदों का जप करे, तो क्या वह मृत्युलांगल-जप के समान या उससे भी अधिक गुणवान होगा?

श्लोक 66 (skanda.5.166.66)

बीजयोन्यविशुद्धस्तु यथा रुद्रं न विन्दति। तथा लाङ्गलमन्त्रोऽपि न तिष्ठति गतायुषि॥

bījayonyaviśuddhastu yathā rudraṁ na vindati| tathā lāṅgalamantro'pi na tiṣṭhati gatāyuṣi||

जैसे बीज और योनि से अशुद्ध व्यक्ति रुद्र को नहीं पाता, वैसे ही लांगल-मंत्र भी आयु समाप्त हो जाने पर स्थिर नहीं रहता।

श्लोक 67 (skanda.5.166.67)

गायत्रीजपसंयुक्तः संयमी ह्यधिको गुणैः। अग्निमीडे इषेत्वो वा अग्न आयाहि नित्यदा॥

gāyatrījapasaṁyuktaḥ saṁyamī hyadhiko guṇaiḥ| agnimīḍe iṣetvo vā agna āyāhi nityadā||

गायत्री-जप से युक्त संयमी व्यक्ति ही अधिक गुणवान है; 'अग्निमीळे', 'इषेत्वोर्जे', अथवा 'अग्न आयाहि' का नित्य जप करने वाला भी।

श्लोक 68 (skanda.5.166.68)

शन्नो देवीति कूलस्थो जपेन्मुच्येत किल्बिषैः॥

śanno devīti kūlastho japenmucyeta kilbiṣaiḥ||

तट पर स्थित होकर 'शं नो देवीः' का जप करने वाला भी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 69 (skanda.5.166.69)

साङ्गोपाङ्गांस्तथा वेदाञ्जपन्नित्यं समाहितः। न तत्फलमवाप्नोति गायत्र्या संयमी यथा॥

sāṅgopāṅgāṁstathā vedāñjapannityaṁ samāhitaḥ| na tatphalamavāpnoti gāyatryā saṁyamī yathā||

अंग-उपांग सहित वेदों का नित्य समाहित होकर जप करने वाला भी वह फल नहीं पाता, जो संयमी गायत्री से पाता है।

श्लोक 70 (skanda.5.166.70)

रुद्राध्यायं सकृज्जप्त्वा विप्रो वेदसमन्वितः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥

rudrādhyāyaṁ sakṛjjaptvā vipro vedasamanvitaḥ| mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati||

वेद-सम्पन्न विप्र, रुद्राध्याय का एक बार भी जप करके, सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु-लोक को जाता है।

श्लोक 71 (skanda.5.166.71)

अन्यद्वै जप्यसंस्थानं सूक्तमारण्यकं तथा। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥

anyadvai japyasaṁsthānaṁ sūktamāraṇyakaṁ tathā| mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati||

अन्य कोई निश्चित जप्य सूक्त, या आरण्यक सूक्त भी, [जो जपता है] वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णु-लोक को जाता है।

श्लोक 72 (skanda.5.166.72)

यत्किंचित्क्रियते जाप्यं यच्च दानं प्रदीयते। नर्मदाजलमाश्रित्य तत्सर्वं चाक्षयं भवेत्॥

yatkiṁcitkriyate jāpyaṁ yacca dānaṁ pradīyate| narmadājalamāśritya tatsarvaṁ cākṣayaṁ bhavet||

जो भी जप किया जाता है, और जो भी दान दिया जाता है, नर्मदा-जल का आश्रय लेकर वह सब अक्षय हो जाता है।

श्लोक 73 (skanda.5.166.73)

एवंविधैर्व्रतैर्नित्यं नर्मदां ये समाश्रिताः। ते मृता वैष्णवं यान्ति पदं वा शैवमव्ययम्॥

evaṁvidhairvratairnityaṁ narmadāṁ ye samāśritāḥ| te mṛtā vaiṣṇavaṁ yānti padaṁ vā śaivamavyayam||

ऐसे व्रतों से नित्य जो नर्मदा का आश्रय लेते हैं, वे मरने पर वैष्णव पद को, या अव्यय शैव पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 74 (skanda.5.166.74)

सत्यलोकं नराः केचित्सूर्यलोकं तथापरे। अप्सरोगणसंवीता यावदाभूतसम्प्लवम्॥

satyalokaṁ narāḥ kecitsūryalokaṁ tathāpare| apsarogaṇasaṁvītā yāvadābhūtasamplavam||

कुछ मनुष्य सत्यलोक को, कुछ सूर्यलोक को, अप्सरा-समूहों से घिरे होकर, प्रलयकाल तक जाते हैं।

श्लोक 75 (skanda.5.166.75)

एवं वै वर्तमानेऽस्मिंल्लोके तु नृपपुंगव। ऋषीणां दशकोट्यस्तु कुरुक्षेत्रनिवासिनाम्॥

evaṁ vai vartamāne'smiṁlloke tu nṛpapuṁgava| ṛṣīṇāṁ daśakoṭyastu kurukṣetranivāsinām||

हे नृपपुंगव! इसी प्रकार इस लोक के चलते हुए, कुरुक्षेत्र-निवासी दस करोड़ ऋषि,

श्लोक 76 (skanda.5.166.76)

मया सह महाभाग नर्मदातटमाश्रिताः। फलमूलकृताहारा अर्चयन्तः स्थिताः शिवम्॥

mayā saha mahābhāga narmadātaṭamāśritāḥ| phalamūlakṛtāhārā arcayantaḥ sthitāḥ śivam||

हे महाभाग! मेरे साथ नर्मदा-तट का आश्रय लेकर, फल-मूल का आहार करते हुए वहाँ शिव की अर्चना करते रहे।

श्लोक 77 (skanda.5.166.77)

तच्च वर्षशतं दिव्यं कालसंख्यानुमानतः। षड्विंशतिसहस्राणि तानि मानुषसंख्यया॥

tacca varṣaśataṁ divyaṁ kālasaṁkhyānumānataḥ| ṣaḍviṁśatisahasrāṇi tāni mānuṣasaṁkhyayā||

वह सौ दिव्य वर्ष था, काल की गणना के अनुसार — मानव-गणना से छब्बीस हज़ार वर्ष।

श्लोक 78 (skanda.5.166.78)

ततस्तस्यामतीतायां सन्ध्यायां नृपसत्तम। शेषं मानुष्यमेकं तु काले वर्षशतं स्थितम्॥

tatastasyāmatītāyāṁ sandhyāyāṁ nṛpasattama| śeṣaṁ mānuṣyamekaṁ tu kāle varṣaśataṁ sthitam||

हे नृपसत्तम! फिर उस सन्ध्या-काल के बीत जाने पर, मनुष्यों की एक ही पीढ़ी शेष रही, सौ वर्षों तक स्थित रहकर,

श्लोक 79 (skanda.5.166.79)

ततोऽभवदनावृष्टिर्लोकक्षयकरी तदा। यया यातं जगत्सर्वं क्षयं भूयो हि दारुणम्॥

tato'bhavadanāvṛṣṭirlokakṣayakarī tadā| yayā yātaṁ jagatsarvaṁ kṣayaṁ bhūyo hi dāruṇam||

फिर लोकों का नाश करने वाला अनावृष्टि हुआ, जिससे सम्पूर्ण जगत पुनः भयंकर क्षय को प्राप्त हुआ।

श्लोक 80 (skanda.5.166.80)

ये पूर्वमिह संसिद्धा ऋषयो वेदपारगाः। तेषां प्रभावाद्भगवान् ववर्ष बलवृत्रहा॥

ye pūrvamiha saṁsiddhā ṛṣayo vedapāragāḥ| teṣāṁ prabhāvādbhagavān vavarṣa balavṛtrahā||

जो वेदपारगामी ऋषि पहले यहाँ सिद्ध हो चुके थे, उन्हीं के प्रभाव से बल-वृत्र के हन्ता भगवान इन्द्र ने वर्षा की,

श्लोक 81 (skanda.5.166.81)

महती भूरिसलिला समन्ताद्वृष्टिराहिता। ततो वृष्ट्या तु तेषां वै वर्तनं समजायत॥

mahatī bhūrisalilā samantādvṛṣṭirāhitā| tato vṛṣṭyā tu teṣāṁ vai vartanaṁ samajāyata||

एक महती, बहुजलवाली वृष्टि चारों ओर हुई; फिर उस वृष्टि से उनका जीवन-निर्वाह हो गया।

श्लोक 82 (skanda.5.166.82)

पुनर्युगान्ते सम्प्राप्ते किंचिच्छेषे कलौ युगे। निःशेषमभवत्सर्वं शुष्कं स्थावरजङ्गमम्॥

punaryugānte samprāpte kiṁciccheṣe kalau yuge| niḥśeṣamabhavatsarvaṁ śuṣkaṁ sthāvarajaṅgamam||

फिर युग के अन्त में, कलियुग का कुछ अंश शेष रहने पर, स्थावर-जंगम सब कुछ सूख गया,

श्लोक 83 (skanda.5.166.83)

निर्वृक्षौषधगुल्मं च तृणवीरुद्विवर्जितम्। अनावृष्टिहतं सर्वं भूमण्डलमभूद्भृशम्॥

nirvṛkṣauṣadhagulmaṁ ca tṛṇavīrudvivarjitam| anāvṛṣṭihataṁ sarvaṁ bhūmaṇḍalamabhūdbhṛśam||

वृक्ष-औषधि-गुल्मों से रहित, तृण-लताओं से रहित; अनावृष्टि से पीड़ित सम्पूर्ण भूमण्डल हो गया।

श्लोक 84 (skanda.5.166.84)

ततस्ते ऋषयः सर्वे क्षुत्तृषार्ताः सहस्रशः। युगस्वभावमाविष्टा हीनसत्त्वा अभवन्नृप॥

tataste ṛṣayaḥ sarve kṣuttṛṣārtāḥ sahasraśaḥ| yugasvabhāvamāviṣṭā hīnasattvā abhavannṛpa||

तब वे सभी ऋषि, हज़ारों की संख्या में, भूख-प्यास से पीड़ित, युग के स्वभाव से आविष्ट होकर, हे राजन्! सत्त्वहीन हो गए।

श्लोक 85 (skanda.5.166.85)

नष्टहोमस्वधाकारे युगान्ते समुपस्थिते। किं कार्यं क्व नु यास्यामः कोऽस्माकं शरणं भवेत्॥

naṣṭahomasvadhākāre yugānte samupasthite| kiṁ kāryaṁ kva nu yāsyāmaḥ ko'smākaṁ śaraṇaṁ bhavet||

होम-स्वधाकार के नष्ट हो जाने पर, युग का अन्त आने पर, वे कहने लगे — 'क्या करें, कहाँ जाएँ, हमारी शरण कौन होगी?'

श्लोक 86 (skanda.5.166.86)

तानहं प्रत्युवाचेदं मा भैष्टेति पुनःपुनः। ईदृग्विधा मया दृष्टा बहवः कालपर्ययाः॥

tānahaṁ pratyuvācedaṁ mā bhaiṣṭeti punaḥpunaḥ| īdṛgvidhā mayā dṛṣṭā bahavaḥ kālaparyayāḥ||

मैंने उनसे बार-बार कहा — 'डरो मत। मैंने ऐसे बहुत से काल-परिवर्तन देखे हैं।'

श्लोक 87 (skanda.5.166.87)

नर्मदातीरमाश्रित्य ते सर्वे गमिता मया। एषा हि शरणं देवी सम्प्राप्ते हि युगक्षये॥

narmadātīramāśritya te sarve gamitā mayā| eṣā hi śaraṇaṁ devī samprāpte hi yugakṣaye||

मैं उन सबको नर्मदा-तट का आश्रय लेकर ले गया। युग के क्षय के समय यह देवी ही शरण है।

श्लोक 88 (skanda.5.166.88)

नान्या गतिरिहास्माकं विद्यते द्विजसत्तमाः। जनित्री सर्वभूतानां विशेषेण द्विजोत्तमाः॥

nānyā gatirihāsmākaṁ vidyate dvijasattamāḥ| janitrī sarvabhūtānāṁ viśeṣeṇa dvijottamāḥ||

हे श्रेष्ठ द्विजो! यहाँ हमारे लिए और कोई गति नहीं है; वह सम्पूर्ण प्राणियों की, विशेषतः द्विजों की जननी है।

श्लोक 89 (skanda.5.166.89)

पितामहा ये पितरो ये चान्ये प्रपितामहाः। ते समस्ता गताः स्वर्गं समाश्रित्य महानदीम्॥

pitāmahā ye pitaro ye cānye prapitāmahāḥ| te samastā gatāḥ svargaṁ samāśritya mahānadīm||

जो पितामह, पिता, तथा अन्य प्रपितामह थे, वे सभी उस महानदी का आश्रय लेकर स्वर्ग को गए।

श्लोक 90 (skanda.5.166.90)

भृग्वाद्याः सप्त ये त्वासन्मम पूर्वपितामहाः। धौमृणी च महाभागा मम भार्या शुचिस्मिता। मनस्वती च या मता भार्गवोऽङ्गिरसस्तथा॥

bhṛgvādyāḥ sapta ye tvāsanmama pūrvapitāmahāḥ| dhaumṛṇī ca mahābhāgā mama bhāryā śucismitā| manasvatī ca yā matā bhārgavo'ṅgirasastathā||

भृगु आदि सात जो मेरे पूर्वपितामह थे; महाभागा धौम्रिणी, शुचिस्मिता मेरी पत्नी; तथा मनस्वती, और भार्गव, अंगिरस भी,

श्लोक 91 (skanda.5.166.91)

पुलस्त्यः पुलहश्चैव वसिष्ठात्रेयकाश्यपाः। तथान्ये च महाभागा नियमव्रतचारिणः। अन्ये च शतसाहस्रा अत्र सिद्धिं समागताः॥

pulastyaḥ pulahaścaiva vasiṣṭhātreyakāśyapāḥ| tathānye ca mahābhāgā niyamavratacāriṇaḥ| anye ca śatasāhasrā atra siddhiṁ samāgatāḥ||

पुलस्त्य, पुलह, वसिष्ठ, आत्रेय, कश्यप; तथा नियम-व्रत का पालन करने वाले अन्य महाभाग; और अन्य लाखों-सैकड़ों जन यहीं सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 92 (skanda.5.166.92)

तस्मादियं महाभागा न मोक्तव्या कदाचन। नान्या काचिन्नदी शक्ता लोकत्रयफलप्रदा॥

tasmādiyaṁ mahābhāgā na moktavyā kadācana| nānyā kācinnadī śaktā lokatrayaphalapradā||

इसलिए यह महाभागा कभी नहीं छोड़ी जानी चाहिए; कोई अन्य नदी तीनों लोकों का फल देने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 93 (skanda.5.166.93)

द्वन्द्वैरनेकैर्बहुभिः क्षुत्तृषाद्यैर्महाभयैः। मुच्यन्ते ते नराः सद्यो नर्मदातीरवासिनः॥

dvandvairanekairbahubhiḥ kṣuttṛṣādyairmahābhayaiḥ| mucyante te narāḥ sadyo narmadātīravāsinaḥ||

भूख-प्यास आदि अनेक महाभयंकर द्वन्द्वों से नर्मदा-तट-निवासी मनुष्य तत्काल मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 94 (skanda.5.166.94)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेवितव्या सरिद्वरा। वाञ्छद्भिः परमं श्रेय इह लोके परत्र च॥

tasmātsarvaprayatnena sevitavyā saridvarā| vāñchadbhiḥ paramaṁ śreya iha loke paratra ca||

इसलिए, इस लोक और परलोक में परम कल्याण चाहने वालों को सर्व प्रयत्न से इस श्रेष्ठ नदी की सेवा करनी चाहिए।

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