अवन्ती खण्ड · अध्याय 168
इक्कीस कल्पों की कथा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.168.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। एवं भगवती पुण्या स्तुता सा मुनिपुंगवैः। चिन्तयामास सर्वेषां दास्यामि वरमुत्तमम्॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| evaṁ bhagavatī puṇyā stutā sā munipuṁgavaiḥ| cintayāmāsa sarveṣāṁ dāsyāmi varamuttamam||
श्रीमार्कण्डेय बोले — इस प्रकार श्रेष्ठ मुनियों द्वारा स्तुत हुई वह पुण्य भगवती देवी ने सोचा — 'मैं सबको उत्तम वर दूँगी।'
श्लोक 2 (skanda.5.168.2)
ततः प्रसुप्तांस्ताञ्ज्ञात्वा रात्रौ देवी जगाम ह। एकैकस्य ऋषेः स्वप्ने दर्शनं चारुहासिनी॥
tataḥ prasuptāṁstāñjñātvā rātrau devī jagāma ha| ekaikasya ṛṣeḥ svapne darśanaṁ cāruhāsinī||
तब उन्हें सोया जानकर देवी ने रात्रि में जाकर, चारुहासिनी ने प्रत्येक ऋषि को स्वप्न में दर्शन दिया।
श्लोक 3 (skanda.5.168.3)
ततोऽर्धरात्रे सम्प्राप्त उत्थिता जलमध्यतः। विमलाम्बरसंवीता दिव्यमालाविभूषिता॥
tato'rdharātre samprāpta utthitā jalamadhyataḥ| vimalāmbarasaṁvītā divyamālāvibhūṣitā||
फिर अर्धरात्रि में वह जल के मध्य से उठ खड़ी हुई, निर्मल वस्त्र धारण किए, दिव्य मालाओं से विभूषित,
श्लोक 4 (skanda.5.168.4)
घृतातपत्रा सुश्रोणी पद्मरागविभूषिता। जगाद मा भैरिति तानेकैकं तु पृथक्पृथक्॥
ghṛtātapatrā suśroṇī padmarāgavibhūṣitā| jagāda mā bhairiti tānekaikaṁ tu pṛthakpṛthak||
चमकते छत्र वाली, सुन्दर कटि, पद्मराग-मणियों से विभूषित; उसने प्रत्येक से पृथक्-पृथक् कहा — 'डरो मत।'
श्लोक 5 (skanda.5.168.5)
वसध्वं मम पार्श्वे तु भयं त्यक्त्वा क्षुधादिजम्॥
vasadhvaṁ mama pārśve tu bhayaṁ tyaktvā kṣudhādijam||
'भूख आदि से उत्पन्न भय त्यागकर मेरे पास ही निवास करो।'
श्लोक 6 (skanda.5.168.6)
एवमुक्त्वा तदा देवी स्वप्नान्ते तान्महामुनीन्। जगामादर्शनं पश्चात्प्रविश्य जलमात्मिकम्॥
evamuktvā tadā devī svapnānte tānmahāmunīn| jagāmādarśanaṁ paścātpraviśya jalamātmikam||
इस प्रकार कहकर तब देवी उन महामुनियों की स्वप्न-समाप्ति पर, अपने जलमय स्वरूप में प्रविष्ट होकर अदृश्य हो गई।
श्लोक 7 (skanda.5.168.7)
ततः प्रभाते मुनयो मिथ ऊचुर्मुदन्विताः। तथा दृष्टा मया दृष्टा स्वप्ने देवी सुदर्शना॥
tataḥ prabhāte munayo mitha ūcurmudanvitāḥ| tathā dṛṣṭā mayā dṛṣṭā svapne devī sudarśanā||
फिर प्रातःकाल मुनि हर्षित होकर आपस में कहने लगे — 'मैंने भी वैसा ही देखा, मैंने भी स्वप्न में सुदर्शना देवी को देखा है।'
श्लोक 8 (skanda.5.168.8)
अभयं दत्तमस्माकं सिद्धिश्चाप्यचिरेण तु। प्रशस्तं दर्शनं तस्या नर्मदाया न संशयः॥
abhayaṁ dattamasmākaṁ siddhiścāpyacireṇa tu| praśastaṁ darśanaṁ tasyā narmadāyā na saṁśayaḥ||
'हमें अभय दिया गया है, और शीघ्र ही सिद्धि भी मिलेगी। नर्मदा का वह दर्शन प्रशस्त था, इसमें संशय नहीं।'
श्लोक 9 (skanda.5.168.9)
अथान्यदिवसे राजन्मत्स्यानां रूपमुत्तमम्। पश्यन्ति सपरीवाराः स्वकीयाश्रमसन्निधौ॥
athānyadivase rājanmatsyānāṁ rūpamuttamam| paśyanti saparīvārāḥ svakīyāśramasannidhau||
फिर हे राजन्! दूसरे दिन उन्होंने परिवार सहित अपने-अपने आश्रमों के समीप मछलियों का उत्तम रूप देखा।
श्लोक 10 (skanda.5.168.10)
तान्दृष्ट्वा विस्मयाविष्टा मत्स्यांस्तत्र महर्षयः। पूजयामासुरव्यग्रा हव्यकव्येन देवताः॥
tāndṛṣṭvā vismayāviṣṭā matsyāṁstatra maharṣayaḥ| pūjayāmāsuravyagrā havyakavyena devatāḥ||
उन मछलियों को देखकर विस्मित महर्षियों ने वहाँ शांत होकर हव्य-कव्य से देवताओं की पूजा की।
श्लोक 11 (skanda.5.168.11)
तान्मत्स्यसङ्घान्सम्प्राप्य महादेव्याः प्रसादतः। सपुत्रदारभृत्यास्ते वर्तयन्ति पृथक्पृथक्॥
tānmatsyasaṅghānsamprāpya mahādevyāḥ prasādataḥ| saputradārabhṛtyāste vartayanti pṛthakpṛthak||
महादेवी की कृपा से उन मत्स्य-समूहों को पाकर वे पुत्र-पत्नी-भृत्यों सहित पृथक्-पृथक् जीवन-निर्वाह करने लगे।
श्लोक 12 (skanda.5.168.12)
दिने दिने तथाप्येवमाश्रमेषु द्विजातयः। मत्स्यानां सञ्चयं दृष्ट्वा विस्मिताश्चाभवंस्तदा॥
dine dine tathāpyevamāśrameṣu dvijātayaḥ| matsyānāṁ sañcayaṁ dṛṣṭvā vismitāścābhavaṁstadā||
दिन-प्रतिदिन इसी प्रकार आश्रमों में द्विजगण मछलियों का संचय देखकर विस्मित होते रहे।
श्लोक 13 (skanda.5.168.13)
मृतांस्तांस्तु सुपुष्टाङ्गान् पाठीनांश्च विशेषतः। द्वारे द्वारे चाश्रमाणां तापसानां युधिष्ठिर॥
mṛtāṁstāṁstu supuṣṭāṅgān pāṭhīnāṁśca viśeṣataḥ| dvāre dvāre cāśramāṇāṁ tāpasānāṁ yudhiṣṭhira||
हे युधिष्ठिर! उन तपस्वियों के आश्रमों के द्वार-द्वार पर सुपुष्ट अंगों वाली मरी हुई मछलियाँ, विशेषतः पाठीन मछलियाँ मिलती थीं।
श्लोक 14 (skanda.5.168.14)
हृष्टपुष्टास्तदा सर्वे नर्मदातीरवासिनः। ऋषयस्ते भयं सर्वे तत्यजुः क्षुत्तृषोद्भवम्॥
hṛṣṭapuṣṭāstadā sarve narmadātīravāsinaḥ| ṛṣayaste bhayaṁ sarve tatyajuḥ kṣuttṛṣodbhavam||
तब नर्मदा-तट-निवासी वे सभी ऋषि हृष्ट-पुष्ट होकर भूख-प्यास से उत्पन्न भय को त्याग बैठे।
श्लोक 15 (skanda.5.168.15)
ते जपन्तस्तपन्तश्च तिष्ठन्ति भरतर्षभ। अर्चयन्ति पितॄन्देवान्नर्मदातटमाश्रिताः॥
te japantastapantaśca tiṣṭhanti bharatarṣabha| arcayanti pitḥndevānnarmadātaṭamāśritāḥ||
हे भरतर्षभ! वे जप-तप करते हुए वहाँ रहे, नर्मदा-तट का आश्रय लेकर पितरों और देवताओं की अर्चना करते हुए।
श्लोक 16 (skanda.5.168.16)
तैर्जपद्भिस्तपद्भिश्च सततं द्विजसत्तमैः। भ्राजते सा सरिच्छ्रेष्ठा ताराभिर्द्यौर्ग्रहैरिव॥
tairjapadbhistapadbhiśca satataṁ dvijasattamaiḥ| bhrājate sā saricchreṣṭhā tārābhirdyaurgrahairiva||
जप-तप में निरत उन श्रेष्ठ द्विजों से वह श्रेष्ठ नदी तारों और ग्रहों से युक्त आकाश के समान शोभित होती थी।
श्लोक 17 (skanda.5.168.17)
तत्र तैर्बहुलैः शुभ्रैर्ब्राह्मणैर्वेदपरागैः। नर्मदा धर्मदा पूर्वं संविभक्ता यथाक्रमम्॥
tatra tairbahulaiḥ śubhrairbrāhmaṇairvedaparāgaiḥ| narmadā dharmadā pūrvaṁ saṁvibhaktā yathākramam||
वहाँ उन बहुत से शुभ्र, वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा धर्मदा नर्मदा पूर्वकाल में क्रमशः विभक्त की गई,
श्लोक 18 (skanda.5.168.18)
ऋषिभिर्दशकोटिभिर्नर्मदातीरवासिभिः। विभक्तेयं विभक्ताङ्गी नर्मदा शर्मदा नृणाम्॥
ṛṣibhirdaśakoṭibhirnarmadātīravāsibhiḥ| vibhakteyaṁ vibhaktāṅgī narmadā śarmadā nṛṇām||
नर्मदा-तट-निवासी दस करोड़ ऋषियों द्वारा; इस प्रकार अंगों में विभक्त, मनुष्यों को सुख देने वाली नर्मदा विभक्त हुई।
श्लोक 19 (skanda.5.168.19)
यज्ञोपवीतैश्च शुभैरक्षसूत्रैश्च भारत। कूलद्वये महापुण्या नर्मदोदधिगामिनी॥
yajñopavītaiśca śubhairakṣasūtraiśca bhārata| kūladvaye mahāpuṇyā narmadodadhigāminī||
हे भारत! शुभ यज्ञोपवीतों और अक्षमालाओं सहित, दोनों तटों पर वह महापुण्य नर्मदा समुद्र की ओर बहती रही,
श्लोक 20 (skanda.5.168.20)
पृथगायतनैः शुभ्रैर्लिङ्गैर्वालुकमृन्मयैः। भ्राजते या सरिच्छ्रेष्ठा नक्षत्रैरिव शर्वरी॥
pṛthagāyatanaiḥ śubhrairliṅgairvālukamṛnmayaiḥ| bhrājate yā saricchreṣṭhā nakṣatrairiva śarvarī||
पृथक्-पृथक् शुभ मंदिरों में बालू और मिट्टी से बने लिंगों से — वह श्रेष्ठ नदी नक्षत्रों से युक्त रात्रि के समान शोभित होती थी।
श्लोक 21 (skanda.5.168.21)
एवं त ऋषयः सर्वे तर्पयन्तः सुरान्पितॄन्। न्यवसन्नर्मदातीरे यावदाभूतसम्प्लवम्॥
evaṁ ta ṛṣayaḥ sarve tarpayantaḥ surānpitḥn| nyavasannarmadātīre yāvadābhūtasamplavam||
इस प्रकार वे सभी ऋषि देवताओं और पितरों को तृप्त करते हुए प्रलय-काल तक नर्मदा-तट पर निवास करते रहे।
श्लोक 22 (skanda.5.168.22)
किंचिद्गते ततस्तस्मिन्घोरे वर्षशताधिके। अर्धरात्रे तदा कन्या जलादुत्तीर्य भारत॥
kiṁcidgate tatastasminghore varṣaśatādhike| ardharātre tadā kanyā jalāduttīrya bhārata||
हे भारत! उस भयंकर सौ से अधिक वर्षों के बीत जाने पर, अर्धरात्रि में वह कन्या जल से ऊपर उठकर,
श्लोक 23 (skanda.5.168.23)
विद्युत्पुंजसमाभासा व्यालयज्ञोपवीतिनी। त्रिशूलाग्रकरा सौम्या तानुवाच ऋषींस्तदा॥
vidyutpuṁjasamābhāsā vyālayajñopavītinī| triśūlāgrakarā saumyā tānuvāca ṛṣīṁstadā||
बिजली के समूह के समान तेजस्वी, सर्प का यज्ञोपवीत पहने, हाथ में त्रिशूल की नोक लिए, सौम्य वह उन ऋषियों से बोली —
श्लोक 24 (skanda.5.168.24)
आगच्छध्वं मुनिगणा विशध्वं मामयोनिजाम्। समेताः पुत्रदारैश्च ततः सिद्धिमवाप्स्यथ॥
āgacchadhvaṁ munigaṇā viśadhvaṁ māmayonijām| sametāḥ putradāraiśca tataḥ siddhimavāpsyatha||
'हे मुनिगण! आओ, अयोनिजा मुझमें प्रवेश करो, पुत्र-पत्नियों सहित; तब तुम सिद्धि प्राप्त करोगे।'
श्लोक 25 (skanda.5.168.25)
यस्य यस्य हि या वाञ्छा तस्य तां तां ददाम्यहम्। विष्णुं ब्रह्माणमीशानमन्यं वा सुरमुत्तमम्॥
yasya yasya hi yā vāñchā tasya tāṁ tāṁ dadāmyaham| viṣṇuṁ brahmāṇamīśānamanyaṁ vā suramuttamam||
'जिस-जिस की जो-जो इच्छा है, वह मैं उसे देती हूँ — विष्णु, ब्रह्मा, ईशान, या अन्य कोई श्रेष्ठ देवता।'
श्लोक 26 (skanda.5.168.26)
तत्र सर्वान्नयिष्यामि प्रसन्ना वरदा ह्यहम्। प्राणायामपरा भूत्वा मां विशध्वं समाहिताः॥
tatra sarvānnayiṣyāmi prasannā varadā hyaham| prāṇāyāmaparā bhūtvā māṁ viśadhvaṁ samāhitāḥ||
'मैं तुम सबको वहाँ ले जाऊँगी, प्रसन्न और वरदायिनी होकर। प्राणायाम में तत्पर होकर समाहित मन से मुझमें प्रवेश करो,'
श्लोक 27 (skanda.5.168.27)
सह पुत्रैश्च दारैश्च त्यक्त्वाश्रमपदानि च। कालक्षेपो न कर्तव्यः प्रलयोऽयमुपस्थितः॥
saha putraiśca dāraiśca tyaktvāśramapadāni ca| kālakṣepo na kartavyaḥ pralayo'yamupasthitaḥ||
'—पुत्र-पत्नियों सहित, आश्रम-पदों को त्यागकर। समय नष्ट नहीं करना चाहिए, यह प्रलय अब निकट है।'
श्लोक 28 (skanda.5.168.28)
संहारः सर्वभूतानां कल्पदाहः सुदारुणः। एकाहमभवं पूर्वं महाघोरे जनक्षये॥
saṁhāraḥ sarvabhūtānāṁ kalpadāhaḥ sudāruṇaḥ| ekāhamabhavaṁ pūrvaṁ mahāghore janakṣaye||
'समस्त प्राणियों का संहार, अति भयंकर कल्प-दाह आने वाला है। मैं पहले भी उस महाभयंकर प्राणी-क्षय में अकेली रह गई थी;'
श्लोक 29 (skanda.5.168.29)
शेषा नद्यः समुद्राश्च सर्व एव क्षयंगताः। वरदानान्महेशस्य तेनाहं न क्षयं गता॥
śeṣā nadyaḥ samudrāśca sarva eva kṣayaṁgatāḥ| varadānānmaheśasya tenāhaṁ na kṣayaṁ gatā||
'—शेष नदियाँ और समुद्र सब क्षय को प्राप्त हो गए; महेश के वरदान से मैं अकेली क्षय को प्राप्त नहीं हुई।'
श्लोक 30 (skanda.5.168.30)
अमृतः शाश्वतो देवः स्थाणुरीशः सनातनः। स पूजितः प्रार्थितो वा किं न दद्याद्द्विजोत्तमाः॥
amṛtaḥ śāśvato devaḥ sthāṇurīśaḥ sanātanaḥ| sa pūjitaḥ prārthito vā kiṁ na dadyāddvijottamāḥ||
'हे श्रेष्ठ द्विजो! वह अमर, शाश्वत देव, अचल ईश, सनातन — पूजित या प्रार्थित होकर वह क्या नहीं देगा?'
श्लोक 31 (skanda.5.168.31)
एवमुक्त्वा ऋषीव्रेवा प्रविवेश जलं ततः। करात्तशूला सा देवी व्यालयज्ञोपवीतिनी॥
evamuktvā ṛṣīvrevā praviveśa jalaṁ tataḥ| karāttaśūlā sā devī vyālayajñopavītinī||
इस प्रकार कहकर रेवा देवी तब जल में प्रविष्ट हो गई — वह देवी हाथ में त्रिशूल लिए, सर्प का यज्ञोपवीत पहने।
श्लोक 32 (skanda.5.168.32)
ततस्ते तद्वचः श्रुत्वा विस्मयापन्नमानसाः। अभिवन्द्य च मां सर्वे क्षामयन्तः पुनः पुनः॥
tataste tadvacaḥ śrutvā vismayāpannamānasāḥ| abhivandya ca māṁ sarve kṣāmayantaḥ punaḥ punaḥ||
तब वे उसका वचन सुनकर मन में विस्मित होकर, मुझे बार-बार वंदन करते हुए क्षमा माँगने लगे,
श्लोक 33 (skanda.5.168.33)
क्षम्यतां नो यदुक्तं हि वसतां तव संश्रये। गृहांस्त्यक्त्वा महाभागाः सशिष्याः सहबान्धवाः॥
kṣamyatāṁ no yaduktaṁ hi vasatāṁ tava saṁśraye| gṛhāṁstyaktvā mahābhāgāḥ saśiṣyāḥ sahabāndhavāḥ||
'हमें क्षमा करें — आपके संश्रय में रहते हुए जो कहा गया।' तब वे महाभाग, शिष्यों और बन्धुओं सहित, घरों को त्यागकर,
श्लोक 34 (skanda.5.168.34)
जप्त्वा चैकाक्षरं ब्रह्म हृदि ध्यात्वा महेश्वरम्। स्नात्वा च मन्त्रपूताभिरथ चाद्भिर्जितव्रताः॥
japtvā caikākṣaraṁ brahma hṛdi dhyātvā maheśvaram| snātvā ca mantrapūtābhiratha cādbhirjitavratāḥ||
एकाक्षर ब्रह्म (ॐ) का जप करके, हृदय में महेश्वर का ध्यान करके, तथा मंत्र-पवित्र जल में स्नान करके, व्रत-पूर्ण होकर,
श्लोक 35 (skanda.5.168.35)
विविशुर्नर्मदातोयं सपक्षा इव पर्वताः। द्योतयन्तो दिशः सर्वाः कुशहस्ताः सहाग्रयः॥
viviśurnarmadātoyaṁ sapakṣā iva parvatāḥ| dyotayanto diśaḥ sarvāḥ kuśahastāḥ sahāgrayaḥ||
पंखधारी पर्वतों के समान, कुश हाथ में लिए, अपने अग्रणियों सहित सब दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नर्मदा के जल में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 36 (skanda.5.168.36)
गतेषु तेषु राजेन्द्र अहमेकः स्थितस्तदा। अमरेशं समासाद्य पूजयन्नर्मदां नदीम्॥
gateṣu teṣu rājendra ahamekaḥ sthitastadā| amareśaṁ samāsādya pūjayannarmadāṁ nadīm||
हे राजेन्द्र! उनके चले जाने पर मैं अकेला ही वहाँ रहा, अमरेश्वर के पास जाकर नर्मदा नदी की पूजा करते हुए।
श्लोक 37 (skanda.5.168.37)
अनुभूताः सप्तकल्पा मायूराद्या मया नृप। प्रसादाद्वेधसः सर्वे रेवया सह भारत॥
anubhūtāḥ saptakalpā māyūrādyā mayā nṛpa| prasādādvedhasaḥ sarve revayā saha bhārata||
हे राजन्, हे भारत! मायूर आदि सात कल्प मैंने विधाता की कृपा से रेवा के साथ अनुभव किए।
श्लोक 38 (skanda.5.168.38)
जन्मतोऽद्य दिनं यावन्न जानेऽस्याः पुरास्थितिम्॥
janmato'dya dinaṁ yāvanna jāne'syāḥ purāsthitim||
जन्म से आज तक मैं इसकी पूर्वस्थिति (पूर्व इतिहास) को पूरी तरह नहीं जानता।
श्लोक 39 (skanda.5.168.39)
इयं हि शांकरी शक्तिः कला शम्भोरिलाह्वया। नर्मदा दुरितध्वंसकारिणी भवतारिणी॥
iyaṁ hi śāṁkarī śaktiḥ kalā śambhorilāhvayā| narmadā duritadhvaṁsakāriṇī bhavatāriṇī||
यह इला नाम की शांकरी शक्ति है, शम्भु की एक कला; नर्मदा, पाप-नाशक, भव-तारिणी।
श्लोक 40 (skanda.5.168.40)
यदाहमपि नाभूवं पुराकल्पेषु पाण्डव। चतुर्दशसु कल्पेषु तेष्वियं सुखसंस्थिता॥
yadāhamapi nābhūvaṁ purākalpeṣu pāṇḍava| caturdaśasu kalpeṣu teṣviyaṁ sukhasaṁsthitā||
हे पाण्डव! जब मैं भी पूर्व-कल्पों में नहीं था, तब भी चौदह कल्पों में यह सुखपूर्वक स्थित रही।
श्लोक 41 (skanda.5.168.41)
चतुर्दश पुरा कल्पा न मृता येषु नर्मदा। तानहं सम्प्रवक्ष्यामि देवी प्राह यथा मम॥
caturdaśa purā kalpā na mṛtā yeṣu narmadā| tānahaṁ sampravakṣyāmi devī prāha yathā mama||
जिन चौदह पूर्व कल्पों में नर्मदा नहीं मरी, उन्हें मैं कहूँगा — जैसे देवी ने मुझसे कहा था।
श्लोक 42 (skanda.5.168.42)
कापिलं प्रथमं विद्धि प्राजापत्यं द्वितीयकम्। ब्राह्मं सौम्यं च सावित्रं बार्हस्पत्यं प्रभासकम्॥
kāpilaṁ prathamaṁ viddhi prājāpatyaṁ dvitīyakam| brāhmaṁ saumyaṁ ca sāvitraṁ bārhaspatyaṁ prabhāsakam||
पहला कापिल कल्प जानो, दूसरा प्राजापत्य; फिर ब्राह्म, सौम्य, सावित्र, बार्हस्पत्य, प्रभासक,
श्लोक 43 (skanda.5.168.43)
माहेन्द्रमग्निकल्पं च जयन्तं मारुतं तथा। वैष्णवं बहुरूपं च ज्यौतिषं च चतुर्दशम्॥
māhendramagnikalpaṁ ca jayantaṁ mārutaṁ tathā| vaiṣṇavaṁ bahurūpaṁ ca jyautiṣaṁ ca caturdaśam||
माहेन्द्र, अग्नि-कल्प, जयन्त, तथा मारुत, वैष्णव, बहुरूप, और चौदहवाँ ज्यौतिष कल्प।
श्लोक 44 (skanda.5.168.44)
एते कल्पा मया ख्याता न मृता येषु नर्मदा। मायूरं पञ्चदशमं कौर्मं चैवात्र षोडशम्॥
ete kalpā mayā khyātā na mṛtā yeṣu narmadā| māyūraṁ pañcadaśamaṁ kaurmaṁ caivātra ṣoḍaśam||
ये कल्प मैंने कहे, जिनमें नर्मदा नहीं मरी। मायूर पन्द्रहवाँ, और कौर्म यहाँ सोलहवाँ,
श्लोक 45 (skanda.5.168.45)
बकं मात्स्यं च पाद्मं च वटकल्पं च भारत। एकविंशतिमं चैतं वाराहं सांप्रतीनकम्॥
bakaṁ mātsyaṁ ca pādmaṁ ca vaṭakalpaṁ ca bhārata| ekaviṁśatimaṁ caitaṁ vārāhaṁ sāṁpratīnakam||
हे भारत! बक, मात्स्य, पाद्म, तथा वट-कल्प; और यह इक्कीसवाँ वर्तमान वाराह कल्प —
श्लोक 46 (skanda.5.168.46)
इमे सप्त मया साकं रेवया परिशीलिताः। एकविंशतिकल्पास्तु नर्मदायाः शिवाङ्गतः॥
ime sapta mayā sākaṁ revayā pariśīlitāḥ| ekaviṁśatikalpāstu narmadāyāḥ śivāṅgataḥ||
ये सात कल्प मैंने स्वयं रेवा के साथ अनुभव किए। शिव के अंग से उत्पन्न नर्मदा के ये इक्कीस कल्प,
श्लोक 47 (skanda.5.168.47)
संजाताया नृपश्रेष्ठ मया दृष्टा ह्यनेकशः। कथिता नृपतिश्रेष्ठ भूयः किं कथयामि ते॥
saṁjātāyā nṛpaśreṣṭha mayā dṛṣṭā hyanekaśaḥ| kathitā nṛpatiśreṣṭha bhūyaḥ kiṁ kathayāmi te||
हे नृपश्रेष्ठ! मैंने अनेक बार देखे हैं। हे नृपतिश्रेष्ठ! यह मैंने कह दिया — और क्या कहूँ?