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अवन्ती खण्ड · अध्याय 174

वाराहकल्पवृत्तान्त वर्णन

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

श्लोक 1 (skanda.5.174.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततस्त्वेकार्णवे तस्मिन्मुमूर्षुरहमातुरः । काकूच्छ्वासस्तरंस्तोयं बाहुभ्यां नृपसत्तम

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tatastvekārṇave tasminmumūrṣurahamāturaḥ | kākūcchvāsastaraṁstoyaṁ bāhubhyāṁ nṛpasattama

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे नृपसत्तम! तब उस एकार्णव में मरणासन्न और व्याकुल मैं, कौवे के समान हांफते हुए, अपनी दोनों भुजाओं से जल में तैर रहा था।

श्लोक 2 (skanda.5.174.2)

शृणोम्यर्णवमध्यस्थो निःशब्दस्तिमिते तदा । अम्भोरवमनौपम्यं दिशो दश विनादिनम्

śṛṇomyarṇavamadhyastho niḥśabdastimite tadā | ambhoravamanaupamyaṁ diśo daśa vinādinam

उस शान्त, स्तब्ध सागर के मध्य खड़ा हुआ मैं तब दसों दिशाओं में गूँजती हुई जल की अनुपम गर्जना सुनने लगा।

श्लोक 3 (skanda.5.174.3)

हंसकुदेन्दुसंकाशां हारगोक्षीरपाण्डुराम् । नानारत्नविचित्राङ्गीं स्वर्णशृङ्गां मनोरमाम्

haṁsakudendusaṁkāśāṁ hāragokṣīrapāṇḍurām | nānāratnavicitrāṅgīṁ svarṇaśṛṅgāṁ manoramām

तब मैंने हंस, कुन्द-पुष्प तथा चन्द्रमा के समान, मोती-हार और गाय के दूध के समान श्वेत, अनेक रत्नों से विचित्र अंगों वाली, स्वर्णिम सींगों वाली एक मनोहर गाय को देखा,

श्लोक 4 (skanda.5.174.4)

सुरैः प्रवालकमयैर्लाङ्गुलध्वजशोभिताम् । प्रलम्बघोणां नर्दन्तीं खुरैरर्णवगाहिनीम्

suraiḥ pravālakamayairlāṅguladhvajaśobhitām | pralambaghoṇāṁ nardantīṁ khurairarṇavagāhinīm

जो देवताओं द्वारा बनाए मूँगे के आभूषणों से सज्जित, ध्वजा-सी सुशोभित पूँछ वाली, लटकते हुए मुख वाली, गर्जना करती हुई तथा खुरों से समुद्र को मथती हुई थी।

श्लोक 5 (skanda.5.174.5)

गां ददर्शाहमुद्विग्नो मामेवाभिमुखीं स्थिताम् । किंकिणीजालमुक्ताभिः स्वर्णघण्टासमावृताम्

gāṁ dadarśāhamudvigno māmevābhimukhīṁ sthitām | kiṁkiṇījālamuktābhiḥ svarṇaghaṇṭāsamāvṛtām

व्याकुल मैंने उस गाय को अपने सम्मुख खड़ी देखा, जो सुनहरी घण्टियों तथा झुनझुनाती हुई घंटियों के जाल से आवृत थी।

श्लोक 6 (skanda.5.174.6)

तस्याश्चरणविक्षेपैः सर्वमेकार्णवं जलम् । विक्षिप्तफेनपुञ्जौघैर्नृत्यन्तीव समं ततः

tasyāścaraṇavikṣepaiḥ sarvamekārṇavaṁ jalam | vikṣiptaphenapuñjaughairnṛtyantīva samaṁ tataḥ

उसके पैरों की चोट से सम्पूर्ण एकार्णव जल फेन-पुंजों के समूह से उछलता हुआ मानो उसके साथ नृत्य कर रहा था।

श्लोक 7 (skanda.5.174.7)

ररास सलिलोत्क्षेपैः क्षोभयन्ती महार्णवम् । सा मामाह महाभाग श्लक्ष्णगम्भीरया गिरा

rarāsa salilotkṣepaiḥ kṣobhayantī mahārṇavam | sā māmāha mahābhāga ślakṣṇagambhīrayā girā

वह जल उछालकर महासागर को क्षुब्ध करती हुई गरजी; हे महाभाग! उसने मुझसे कोमल, गम्भीर वाणी में कहा —

श्लोक 8 (skanda.5.174.8)

मा भैषीर्वत्स वत्सेति मृत्युस्तव न विद्यते । महादेवप्रसादेन न मृत्युस्ते ममापि च

mā bhaiṣīrvatsa vatseti mṛtyustava na vidyate | mahādevaprasādena na mṛtyuste mamāpi ca

'मत डरो, हे वत्स, मत डरो! तुम्हारी मृत्यु नहीं है। महादेव के प्रसाद से न तुम्हारी मृत्यु है, न मेरी।'

श्लोक 9 (skanda.5.174.9)

ममाश्रयस्व लाङ्गूलं त्वामतस्तारयाम्यहम् । घोरादस्माद्भयाद्विप्र यावत्संप्लवते जगत्

mamāśrayasva lāṅgūlaṁ tvāmatastārayāmyaham | ghorādasmādbhayādvipra yāvatsaṁplavate jagat

'मेरी पूँछ का आश्रय लो, मैं तुम्हें इस घोर भय से पार कर दूँगी, हे विप्र! जब तक यह संसार जलमग्न है।'

श्लोक 10 (skanda.5.174.10)

क्षुत्तृषाप्रतिघातार्थं स्तनौ मे त्वं पिबस्व ह । पयोऽमृताश्रयं दिव्यं तत्पीत्वा निर्वृतो भव

kṣuttṛṣāpratighātārthaṁ stanau me tvaṁ pibasva ha | payo'mṛtāśrayaṁ divyaṁ tatpītvā nirvṛto bhava

'भूख-प्यास मिटाने के लिए तुम मेरे स्तनों का पान करो; अमृत का आश्रय वह दिव्य दूध पीकर तुम शान्त हो जाओ।'

श्लोक 11 (skanda.5.174.11)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हर्षात्पीतो मया स्तनः । न क्षुत्तृषा पीतमात्रे स्तने मह्यं तदाभवत्

tasyāstadvacanaṁ śrutvā harṣātpīto mayā stanaḥ | na kṣuttṛṣā pītamātre stane mahyaṁ tadābhavat

उसकी यह बात सुनकर मैंने हर्षपूर्वक स्तनपान किया; स्तनपान करते ही मेरी भूख-प्यास मिट गई।

श्लोक 12 (skanda.5.174.12)

दिव्यं प्राणबलं जज्ञे समुद्रप्लवनक्षमम् । ततस्तां प्रत्युवाचेदं का त्वमेकार्णवीकृते

divyaṁ prāṇabalaṁ jajñe samudraplavanakṣamam | tatastāṁ pratyuvācedaṁ kā tvamekārṇavīkṛte

मुझमें समुद्र-प्लवन में समर्थ दिव्य प्राणशक्ति उत्पन्न हो गई। तब मैंने उससे पूछा — 'इस एकार्णव में तुम कौन हो,

श्लोक 13 (skanda.5.174.13)

भ्रमसे ब्रूहि तत्त्वेन विस्मयो मे महान्हृदि । भ्रमतोऽत्र ममार्तस्य मुमूर्षोः प्रहतस्य

bhramase brūhi tattvena vismayo me mahānhṛdi | bhramato'tra mamārtasya mumūrṣoḥ prahatasya

जो यहाँ विचर रही हो? यथार्थ रूप से बताओ, मेरे हृदय में महान् विस्मय है; यहाँ भटकते हुए, दुःखी, मरणासन्न तथा आहत मुझ —'

श्लोक 14 (skanda.5.174.14)

त्वं हि मे शरणं जाता भाग्यशेषेण सुव्रते

tvaṁ hi me śaraṇaṁ jātā bhāgyaśeṣeṇa suvrate

'— मेरे भाग्य-शेष से तुम ही मेरी शरण बनी हो, हे सुव्रते!'

श्लोक 15 (skanda.5.174.15)

गौरुवाच - किमहं विस्मृता तुभ्यं विश्वरूपा महेश्वरी । नर्मदा धर्मदा न्ःणां स्वर्गशर्मबलप्रदा

gauruvāca - kimahaṁ vismṛtā tubhyaṁ viśvarūpā maheśvarī | narmadā dharmadā nḥṇāṁ svargaśarmabalapradā

गौ बोली — 'क्या मैं तुम्हें भुला दी गई? मैं विश्वरूपा महेश्वरी नर्मदा हूँ, जो मनुष्यों को धर्म, स्वर्ग, सुख और बल प्रदान करने वाली हूँ।'

श्लोक 16 (skanda.5.174.16)

दृष्ट्वा त्वां सीदमानं तु रुद्रेणाहं विसर्जिता । तं द्विजं तारयस्वार्ये मा प्राणांस्त्यजतां जले

dṛṣṭvā tvāṁ sīdamānaṁ tu rudreṇāhaṁ visarjitā | taṁ dvijaṁ tārayasvārye mā prāṇāṁstyajatāṁ jale

'तुम्हें डूबते देखकर मुझे रुद्र ने भेजा — ‘हे आर्ये! उस ब्राह्मण को पार कराओ, वह जल में प्राण न त्यागे।’'

श्लोक 17 (skanda.5.174.17)

गोरूपेण विभोर्वाक्यात्त्वत्सकाशमिहागता । मा मृषावचनः शम्भुर्भवेदिति च सत्वरा

gorūpeṇa vibhorvākyāttvatsakāśamihāgatā | mā mṛṣāvacanaḥ śambhurbhavediti ca satvarā

'प्रभु की आज्ञा से गौ का रूप धारण करके मैं शीघ्र तुम्हारे पास आई हूँ, यह सोचकर कि शम्भु का वचन मिथ्या न हो।'

श्लोक 18 (skanda.5.174.18)

एवमुक्तस्तयाहं तु इन्द्रायुधनिभं शुभम् । लाङ्गूलमव्ययं ज्ञात्वा भुजाभ्यामवलम्बितः

evamuktastayāhaṁ tu indrāyudhanibhaṁ śubham | lāṅgūlamavyayaṁ jñātvā bhujābhyāmavalambitaḥ

उसके ऐसा कहने पर मैंने इन्द्रधनुष के समान, शुभ, अविनाशी उस पूँछ को पहचानकर उसे दोनों भुजाओं से पकड़ लिया।

श्लोक 19 (skanda.5.174.19)

ततोऽतरं तं जलधिं लाङ्गूलध्वजमाश्रितः । असौ देवो महादेव इति मां प्रत्यभाषत

tato'taraṁ taṁ jaladhiṁ lāṅgūladhvajamāśritaḥ | asau devo mahādeva iti māṁ pratyabhāṣata

तत्पश्चात् उस पूँछरूपी ध्वजा का आश्रय लेकर मैं उस सागर को पार करने लगा; उसने मुझसे कहा — 'वह देव महादेव हैं।'

श्लोक 20 (skanda.5.174.20)

ततो युगसहस्रान्तमहं कालं तया सह । व्यचरं वै तमोभूते सर्वतः सलिलावृते

tato yugasahasrāntamahaṁ kālaṁ tayā saha | vyacaraṁ vai tamobhūte sarvataḥ salilāvṛte

तब मैं उसके साथ सहस्र युगों के अन्त तक, उस सर्वथा अन्धकारमय, जलाच्छादित प्रदेश में विचरण करता रहा।

श्लोक 21 (skanda.5.174.21)

महार्णवे ततस्तस्मिन् भ्रमन्गोः पुच्छमाश्रितः । निर्वाते चान्धकारे च निरालोके निरामये

mahārṇave tatastasmin bhramangoḥ pucchamāśritaḥ | nirvāte cāndhakāre ca nirāloke nirāmaye

तत्पश्चात् उस महासागर में गाय की पूँछ का आश्रय लेकर भ्रमण करते हुए, उस निर्वात, अन्धकारमय, प्रकाशरहित तथा निर्विघ्न स्थान में,

श्लोक 22 (skanda.5.174.22)

अकस्मात्सलिले तस्मिन्नतसीपुष्पसन्निभम् । विभिन्नांजनसङ्काशमाकाशमिव निर्मलम्

akasmātsalile tasminnatasīpuṣpasannibham | vibhinnāṁjanasaṅkāśamākāśamiva nirmalam

अकस्मात् उस जल में मैंने अलसी के फूल के समान, टूटे हुए अंजन के समान, आकाश के समान निर्मल,

श्लोक 23 (skanda.5.174.23)

नीलोत्पलदलश्यामं पीतवाससमव्ययम् । किरीटेनार्कवर्णेन विद्युद्विद्योतकारिणा

nīlotpaladalaśyāmaṁ pītavāsasamavyayam | kirīṭenārkavarṇena vidyudvidyotakāriṇā

नीले कमल-दल के समान श्याम, पीताम्बरधारी, अविनाशी, सूर्य के समान वर्ण वाले, बिजली-सी चमकती हुई,

श्लोक 24 (skanda.5.174.24)

भ्राजमानेन शिरसा खमिवात्यन्तरूपिणम् । कुण्डलोद्धष्टगल्लं तु हारोद्द्योतितवक्षसम्

bhrājamānena śirasā khamivātyantarūpiṇam | kuṇḍaloddhaṣṭagallaṁ tu hāroddyotitavakṣasam

देदीप्यमान शिरोभूषण से मानो आकाश-सी अति सुन्दर, कुण्डलों से स्पृष्ट कपोलों वाले, हार से प्रकाशित वक्षस्थल वाले,

श्लोक 25 (skanda.5.174.25)

जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्भूषणैरुपशोभितम् । नागोपधानशयनं सहस्रादित्यवर्चसम्

jāmbūnadamayairdivyairbhūṣaṇairupaśobhitam | nāgopadhānaśayanaṁ sahasrādityavarcasam

जाम्बूनद स्वर्ण के दिव्य आभूषणों से सुशोभित, नागरूपी तकिये पर शयन करते हुए, सहस्र सूर्यों के तेज वाले,

श्लोक 26 (skanda.5.174.26)

अनेकबाहूरुधरं नैकवक्त्रं मनोरमम् । सुप्तमेकार्णवे वीरं सहस्राक्षशिरोधरम्

anekabāhūrudharaṁ naikavaktraṁ manoramam | suptamekārṇave vīraṁ sahasrākṣaśirodharam

अनेक भुजाओं-जंघाओं से युक्त, अनेकमुखी, मनोहर, उस एकार्णव में सोए हुए वीर, सहस्र नेत्रों और सिरों वाले,

श्लोक 27 (skanda.5.174.27)

जटाजूटेन महता स्फुरद्विद्युत्समार्चिषा । एकार्णवं जगत्सर्वं व्याप्य देवं व्यवस्थितम्

jaṭājūṭena mahatā sphuradvidyutsamārciṣā | ekārṇavaṁ jagatsarvaṁ vyāpya devaṁ vyavasthitam

बिजली-सी चमकती हुई विशाल जटाओं वाले, एकार्णवमय समस्त जगत् में व्याप्त होकर स्थित उस देव को देखा।

श्लोक 28 (skanda.5.174.28)

ग्रसित्वा शङ्करः सर्वं सदेवासुरमानवम् । प्रपश्याम्यहमीशानं सुप्तमेकार्णवे प्रभुम्

grasitvā śaṅkaraḥ sarvaṁ sadevāsuramānavam | prapaśyāmyahamīśānaṁ suptamekārṇave prabhum

देवों, असुरों और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण जगत् को निगलकर ईशान उस एकार्णव में सोए हुए प्रभु को मैं देख रहा था —

श्लोक 29 (skanda.5.174.29)

सर्वव्यापिनमव्यक्तमनन्तं विश्वतोमुखम् । तस्य पादतलाभ्याशे स्वर्णकेयूरमण्डिताम्

sarvavyāpinamavyaktamanantaṁ viśvatomukham | tasya pādatalābhyāśe svarṇakeyūramaṇḍitām

सर्वव्यापी, अव्यक्त, अनन्त, चतुर्मुख उस प्रभु के चरणों के समीप, स्वर्णिम केयूरों से सुशोभित,

श्लोक 30 (skanda.5.174.30)

विश्वरूपां महाभागां विश्वमायावधारिणीम् । श्रीमयीं ह्रीमयीं देवीं धीमयीं वाङ्मयीं शिवाम्

viśvarūpāṁ mahābhāgāṁ viśvamāyāvadhāriṇīm | śrīmayīṁ hrīmayīṁ devīṁ dhīmayīṁ vāṅmayīṁ śivām

विश्वरूपा, महाभागा, विश्वमाया धारण करने वाली, श्रीमयी, ह्रीमयी, धीमयी, वाङ्मयी, शिवा देवी को,

श्लोक 31 (skanda.5.174.31)

सिद्धिं कीर्तिं रतिं ब्राह्मीं कालरात्रिमयोनिजाम् । तामेवाहं तदात्यन्तमीश्वरान्तिकमास्थिताम्

siddhiṁ kīrtiṁ ratiṁ brāhmīṁ kālarātrimayonijām | tāmevāhaṁ tadātyantamīśvarāntikamāsthitām

सिद्धि, कीर्ति, रति, ब्राह्मी, अयोनिजा कालरात्रि — उन्हीं को मैंने उस समय ईश्वर के अत्यन्त समीप स्थित देखा।

श्लोक 32 (skanda.5.174.32)

अद्राक्षं चन्द्रवदनां धृतिं सर्वेश्वरीमुमाम्

adrākṣaṁ candravadanāṁ dhṛtiṁ sarveśvarīmumām

मैंने चन्द्रमुखी, धृतिरूपा, सर्वेश्वरी उमा को देखा।

श्लोक 33 (skanda.5.174.33)

शान्तं प्रसुप्तं नवहेमवर्णमुमासहायं भगवन्तमीशम् । तमोवृतं पुण्यतमं वरिष्ठं प्रदक्षिणीकृत्य नमस्करोमि

śāntaṁ prasuptaṁ navahemavarṇamumāsahāyaṁ bhagavantamīśam | tamovṛtaṁ puṇyatamaṁ variṣṭhaṁ pradakṣiṇīkṛtya namaskaromi

शान्त, प्रसुप्त, नवीन स्वर्ण के समान वर्ण वाले, उमा-सहित, अन्धकार से आवृत, परम पुण्यमय, सर्वश्रेष्ठ उन भगवान् ईश की मैं प्रदक्षिणा करके नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 34 (skanda.5.174.34)

ततः प्रसुप्तः सहसा विबुद्धो रात्रिक्षये देववरः स्वभावात् । विक्षोभयन् बाहुभिरर्णवाम्भो जगत्प्रणष्टं सलिले विमृश्य

tataḥ prasuptaḥ sahasā vibuddho rātrikṣaye devavaraḥ svabhāvāt | vikṣobhayan bāhubhirarṇavāmbho jagatpraṇaṣṭaṁ salile vimṛśya

तत्पश्चात् वह देवश्रेष्ठ सोए हुए, रात्रि के क्षय होने पर स्वभाव से ही सहसा जाग उठे, तथा अपनी भुजाओं से महासागर के जल को क्षुब्ध करते हुए, जल में नष्ट हुए जगत् का विचार करने लगे।

श्लोक 35 (skanda.5.174.35)

किं कार्यमित्येव विचिन्तयित्वा वाराहरूपोऽभवदद्भुताङ्गः । महाघनाम्भोधरतुल्यवर्चाः प्रलम्बमालाम्बरनिष्कमाली

kiṁ kāryamityeva vicintayitvā vārāharūpo'bhavadadbhutāṅgaḥ | mahāghanāmbhodharatulyavarcāḥ pralambamālāmbaraniṣkamālī

'अब क्या करना चाहिए' — यह सोचकर उन्होंने अद्भुत अंगों वाला वराह-रूप धारण किया, जिनका तेज महामेघ के समान था, जो लम्बी माला, वस्त्र और स्वर्णमुद्रा-माला से सुशोभित थे,

श्लोक 36 (skanda.5.174.36)

सशङ्खचक्रासिधरः किरीटी सवेदवेदाङ्गमयो महात्मा । त्रैलोक्यनिर्माणकरः पुराणो देवत्रयीरूपधरश्च कार्ये

saśaṅkhacakrāsidharaḥ kirīṭī savedavedāṅgamayo mahātmā | trailokyanirmāṇakaraḥ purāṇo devatrayīrūpadharaśca kārye

शंख, चक्र और तलवार धारण किए हुए, मुकुटधारी, वेद-वेदांगमय वह महात्मा त्रिलोक-निर्माता, पुराण-पुरुष, कार्यवश त्रिदेव का रूप धारण करने वाले थे।

श्लोक 37 (skanda.5.174.37)

स एव रुद्रः स जगज्जहार सृष्ट्यर्थमीशः प्रपितामहोऽभूत् । संरक्षणार्थं जगतः स एव हरिः सुचक्रासिगदाब्जपाणिः

sa eva rudraḥ sa jagajjahāra sṛṣṭyarthamīśaḥ prapitāmaho'bhūt | saṁrakṣaṇārthaṁ jagataḥ sa eva hariḥ sucakrāsigadābjapāṇiḥ

वे स्वयं ही रुद्र हैं, जो जगत् का संहार करते हैं; सृष्टि के लिए वे ही ईश (ब्रह्मा) प्रपितामह हुए; और जगत् के संरक्षण के लिए वे ही चक्र, खड्ग, गदा और कमल हाथों में धारण करने वाले हरि हैं।

श्लोक 38 (skanda.5.174.38)

तेषां विभागो न हि कर्तुमर्हो महात्मनामेकशरीरभाजाम् । मीमांसाहेत्वर्थविशेषतर्कैर्यस्तेषु कुर्यात्प्रविभेदमज्ञः

teṣāṁ vibhāgo na hi kartumarho mahātmanāmekaśarīrabhājām | mīmāṁsāhetvarthaviśeṣatarkairyasteṣu kuryātpravibhedamajñaḥ

उन एक शरीर में स्थित महात्माओं का विभाजन करना उचित नहीं है; जो अज्ञानी मीमांसा-हेतु और विशेष तर्कों से उनमें भेद करता है,

श्लोक 39 (skanda.5.174.39)

स याति घोरं नरकं क्रमेण विभागकृद्द्वेषमतिर्दुरात्मा । या यस्य भक्तिः स तयैव नूनं देहं त्यजन् स्वं ह्यमृतत्वमेति

sa yāti ghoraṁ narakaṁ krameṇa vibhāgakṛddveṣamatirdurātmā | yā yasya bhaktiḥ sa tayaiva nūnaṁ dehaṁ tyajan svaṁ hyamṛtatvameti

वह भेद करने वाला, द्वेषपूर्ण बुद्धि वाला दुरात्मा क्रमशः घोर नरक को जाता है; परन्तु जिसकी जिसमें भक्ति है, वह उसी भक्ति से शरीर त्यागते हुए निश्चय ही अपनी अमरता को प्राप्त करता है।

श्लोक 40 (skanda.5.174.40)

संमोहयन्मूर्तिभिरत्र लोकं स्रष्टा च गोप्ता क्षयकृत्स देवः । तस्मान्न मोहात्मकमाविशेत द्वेषं न कुर्यात्प्रविभिन्नमूर्तिः

saṁmohayanmūrtibhiratra lokaṁ sraṣṭā ca goptā kṣayakṛtsa devaḥ | tasmānna mohātmakamāviśeta dveṣaṁ na kuryātpravibhinnamūrtiḥ

वह देव यहाँ विभिन्न रूपों द्वारा लोक को मोहित करते हुए ही सृष्टिकर्ता, पालक और संहारकर्ता हैं; इसलिए मोहग्रस्त होकर, उनके भिन्न-भिन्न रूप मानकर द्वेष नहीं करना चाहिए।

श्लोक 41 (skanda.5.174.41)

वाराहमीशानवरोऽप्यतोऽसौ रूपं समास्थाय जगद्विधाता । नष्टे त्रिलोकेऽर्णवतोयमग्ने विमार्गितोयौघमयेऽन्तरात्मा

vārāhamīśānavaro'pyato'sau rūpaṁ samāsthāya jagadvidhātā | naṣṭe triloke'rṇavatoyamagne vimārgitoyaughamaye'ntarātmā

इसीलिए ईशानों में श्रेष्ठ, जगत् के विधाता वे प्रभु, तीनों लोकों के नष्ट होने पर, अग्नि-सागर के जल में डूबे हुए संसार को खोजते हुए वराह-रूप धारण करके अन्तरात्मा रूप में,

श्लोक 42 (skanda.5.174.42)

भित्त्वार्णवं तोयमथान्तरस्थं विवेश पातालतलं क्षणेन । जले निमग्नां धरणीं समस्तां समस्पृशत्पङ्कजपत्रनेत्राम्

bhittvārṇavaṁ toyamathāntarasthaṁ viveśa pātālatalaṁ kṣaṇena | jale nimagnāṁ dharaṇīṁ samastāṁ samaspṛśatpaṅkajapatranetrām

समुद्र के जल को भेदते हुए क्षणभर में पाताल-तल में प्रविष्ट हुए, और जल में डूबी हुई कमल-दल-नेत्रों वाली सम्पूर्ण पृथ्वी को उन्होंने स्पर्श किया,

श्लोक 43 (skanda.5.174.43)

विशीर्णशैलोपलशृङ्गकूटां वसुंधरां तां प्रलये प्रलीनाम् । दंष्ट्रैकया विष्णुरतुल्यसाहसः समुद्दधार स्वयमेव देवः

viśīrṇaśailopalaśṛṅgakūṭāṁ vasuṁdharāṁ tāṁ pralaye pralīnām | daṁṣṭraikayā viṣṇuratulyasāhasaḥ samuddadhāra svayameva devaḥ

जिसके पर्वत, शिलाएँ, शिखर और कूट प्रलय में विशीर्ण होकर विलीन हो चुके थे — उस पृथ्वी को अतुल साहसी विष्णु देव ने स्वयं अपनी एक दाढ़ से उठा लिया।

श्लोक 44 (skanda.5.174.44)

सा तस्य दंष्ट्राग्रविलम्बिताङ्गी कैलासशृङ्गाग्रगतेव ज्योत्स्ना । विभ्राजते साप्यसमानमूर्तिः शशाङ्कशृङ्गे च तडिद्विलग्ना

sā tasya daṁṣṭrāgravilambitāṅgī kailāsaśṛṅgāgragateva jyotsnā | vibhrājate sāpyasamānamūrtiḥ śaśāṅkaśṛṅge ca taḍidvilagnā

उनकी दाढ़ के अग्रभाग पर लटकी हुई वह पृथ्वी, कैलास शिखर के अग्रभाग पर स्थित चाँदनी के समान, तथा चन्द्रमा के सींग पर लगी बिजली के समान अपने अनुपम रूप से सुशोभित हो रही थी।

श्लोक 45 (skanda.5.174.45)

तामुज्जहारार्णवतोयमग्नां करी निमग्नामिव हस्तिनीं हठात् । नावं विशीर्णामिव तोयमध्यादुदीर्णसत्त्वोऽनुपमप्रभावः

tāmujjahārārṇavatoyamagnāṁ karī nimagnāmiva hastinīṁ haṭhāt | nāvaṁ viśīrṇāmiva toyamadhyādudīrṇasattvo'nupamaprabhāvaḥ

जैसे हाथी बलपूर्वक डूबी हुई हथिनी को उठा लेता है, या तीव्र बल एवं अनुपम प्रभाव वाला कोई पुरुष जल के मध्य से टूटी हुई नाव को उठा लेता है, वैसे ही उन्होंने समुद्र के जल में डूबी उस पृथ्वी को उठा लिया।

श्लोक 46 (skanda.5.174.46)

स तां समुत्तार्य महाजलौघात्समुद्रमार्यो व्यभजत्समस्तम् । महार्णवेष्वेव महार्णवाम्भो निक्षेपयामास पुनर्नदीषु

sa tāṁ samuttārya mahājalaughātsamudramāryo vyabhajatsamastam | mahārṇaveṣveva mahārṇavāmbho nikṣepayāmāsa punarnadīṣu

उस महान् जलराशि से उसे ऊपर उठाकर उस आर्य देव ने सम्पूर्ण समुद्र को विभाजित कर दिया, तथा महासागरों के जल को पुनः महासागरों में और नदियों में स्थापित कर दिया।

श्लोक 47 (skanda.5.174.47)

शीर्णांश्च शैलान्स चकार भूयो द्वीपान्समस्तांश्च तथार्णवांश्च । शैलोपलैर्ये विचिताः समन्ताच्छिलोच्चयांस्तान्स चकार कल्पे

śīrṇāṁśca śailānsa cakāra bhūyo dvīpānsamastāṁśca tathārṇavāṁśca | śailopalairye vicitāḥ samantācchiloccayāṁstānsa cakāra kalpe

उन्होंने पुनः टूटे हुए पर्वतों को, समस्त द्वीपों को, तथा समुद्रों को भी बनाया; जो चारों ओर शिलाखण्डों से भरे हुए पर्वत-समूह थे, उन्हें उन्होंने उस कल्प में पुनः रचा।

श्लोक 48 (skanda.5.174.48)

अनेकरूपं प्रविभज्य देहं चकार देवेन्द्रगणान्समस्तान् । मुखाच्च वह्निर्मनसश्च चन्द्रश्चक्षोश्च सूर्यः सहसा बभूव

anekarūpaṁ pravibhajya dehaṁ cakāra devendragaṇānsamastān | mukhācca vahnirmanasaśca candraścakṣośca sūryaḥ sahasā babhūva

अपने शरीर को अनेक रूपों में विभाजित करके उन्होंने समस्त देवेन्द्र-गणों की रचना की; उनके मुख से अग्नि, मन से चन्द्रमा तथा नेत्र से सूर्य सहसा उत्पन्न हुए।

श्लोक 49 (skanda.5.174.49)

जज्ञेऽथ तस्येश्वरयोगमूर्तेः प्रध्यायमानस्य सुरेन्द्रसङ्घः । वेदाश्च यज्ञाश्च तथैव वर्णास्तथा हि सर्वौषधयो रसाश्च

jajñe'tha tasyeśvarayogamūrteḥ pradhyāyamānasya surendrasaṅghaḥ | vedāśca yajñāśca tathaiva varṇāstathā hi sarvauṣadhayo rasāśca

उस ध्यानमग्न ईश्वर-योगमूर्ति से देवगण, वेद, यज्ञ, वर्ण, तथा सम्पूर्ण औषधियाँ और रस उत्पन्न हुए।

श्लोक 50 (skanda.5.174.50)

जगत्समस्तं मनसा बभूव यत्स्थावरं किंचिदिहाण्डजं वा । जरायुजं स्वेदजमुद्भिज्जं वा यत्किंचिदा कीटपिपीलकाद्यम्

jagatsamastaṁ manasā babhūva yatsthāvaraṁ kiṁcidihāṇḍajaṁ vā | jarāyujaṁ svedajamudbhijjaṁ vā yatkiṁcidā kīṭapipīlakādyam

उनके मन से यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ — जो भी यहाँ स्थावर, अण्डज, जरायुज, स्वेदज अथवा उद्भिज्ज है, कीट-चींटी तक जो कुछ भी है।

श्लोक 51 (skanda.5.174.51)

ततो विजज्ञे मनसा क्षणेन अनेकरूपाः सहसा महेशा । चकार यन्मूर्तिभिरव्ययात्मा अष्टाभिराविश्य पुनः स तत्र

tato vijajñe manasā kṣaṇena anekarūpāḥ sahasā maheśā | cakāra yanmūrtibhiravyayātmā aṣṭābhirāviśya punaḥ sa tatra

फिर क्षणभर में मन से अनेक रूपों वाले महेश उत्पन्न हुए; उस अव्यय आत्मा ने पुनः वहाँ आठ रूपों में प्रवेश करके यह सब किया।

श्लोक 52 (skanda.5.174.52)

लीलां चकाराथ समृद्धतेजा अतोऽत्र मे पश्यत एव विप्राः । तेषां मया दर्शनमेव सर्वं यावन्मुहूर्तात्समकारि भूप

līlāṁ cakārātha samṛddhatejā ato'tra me paśyata eva viprāḥ | teṣāṁ mayā darśanameva sarvaṁ yāvanmuhūrtātsamakāri bhūpa

तत्पश्चात् उस समृद्ध तेजस्वी देव ने लीला की; हे विप्रो! यह सब मेरे देखते-देखते ही हुआ; हे भूप! उन सभी के दर्शन का यह सब कार्य मुहूर्तमात्र में सम्पन्न हो गया।

श्लोक 53 (skanda.5.174.53)

कृत्वा त्वशेषं किल लीलयैव स देवदेवो जगतां विधाता । सर्वत्रदृक्सर्वग एव देवो जगाम चादर्शनमादिकर्ता

kṛtvā tvaśeṣaṁ kila līlayaiva sa devadevo jagatāṁ vidhātā | sarvatradṛksarvaga eva devo jagāma cādarśanamādikartā

इस प्रकार वह देवाधिदेव, जगत् के विधाता, केवल लीला से ही यह सम्पूर्ण कार्य करके, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी वह आदिकर्ता देव पुनः अदृश्य हो गए।

श्लोक 54 (skanda.5.174.54)

यत्तन्मुहूर्तादिह नामरूपं तावत्प्रपश्यामि जगत्तथैव । द्वीपैः समुद्रैरभिसंवृतं हि नक्षत्रतारादिविमानकीर्णम्

yattanmuhūrtādiha nāmarūpaṁ tāvatprapaśyāmi jagattathaiva | dvīpaiḥ samudrairabhisaṁvṛtaṁ hi nakṣatratārādivimānakīrṇam

उसी मुहूर्त में मैं पुनः इस नाम-रूपमय जगत् को उसी प्रकार देखने लगा — द्वीपों और समुद्रों से घिरा हुआ, नक्षत्रों, तारों और विमानों से व्याप्त,

श्लोक 55 (skanda.5.174.55)

वियत्पयोदग्रहचक्रचित्रं नानाविधैः प्राणिगणैर्वृतं च । तां वै न पश्यामि महानुभावां गोरूपिणीं सर्वसुरेश्वरीं च

viyatpayodagrahacakracitraṁ nānāvidhaiḥ prāṇigaṇairvṛtaṁ ca | tāṁ vai na paśyāmi mahānubhāvāṁ gorūpiṇīṁ sarvasureśvarīṁ ca

मेघों और ग्रहचक्र से चित्रित आकाश वाला, तथा नाना प्रकार के प्राणिसमूहों से भरा हुआ। किन्तु उस महाप्रभावशालिनी, गौरूपिणी, सर्वदेवेश्वरी को मैं अब वहाँ नहीं देख पा रहा था।

श्लोक 56 (skanda.5.174.56)

क्व सांप्रतं सेति विचिन्त्य राजन्विभ्रान्तचित्तस्त्वभवं तदैव । दिशो विभागानवलोकयानृते पुनस्तां कथमीश्वराङ्गीम्

kva sāṁprataṁ seti vicintya rājanvibhrāntacittastvabhavaṁ tadaiva | diśo vibhāgānavalokayānṛte punastāṁ kathamīśvarāṅgīm

'वह अब कहाँ है' — यह सोचकर, हे राजन्! मेरा चित्त उसी क्षण भ्रमित हो गया; दिशाओं के विभागों को देखते हुए मैं सोचने लगा कि उस ईश्वर-अंगिनी को पुनः कैसे देखूँ।

श्लोक 57 (skanda.5.174.57)

पश्यामि तामत्र पुनश्च शुभ्रां महाभ्रनीलां शुचिशुभ्रतोयाम् । वृक्षैरनेकैरुपशोभिताङ्गीं गजैस्तुरङ्गैर्विहगैर्वृतां च

paśyāmi tāmatra punaśca śubhrāṁ mahābhranīlāṁ śuciśubhratoyām | vṛkṣairanekairupaśobhitāṅgīṁ gajaisturaṅgairvihagairvṛtāṁ ca

तब मैंने वहाँ उसे पुनः देखा — शुभ्र, महामेघ के समान नीली, पवित्र-उज्ज्वल जलवाली, अनेक वृक्षों से सुशोभित अंगों वाली, हाथियों, घोड़ों और पक्षियों से घिरी हुई।

श्लोक 58 (skanda.5.174.58)

यथा पुरातीरमुपेत्य देव्याः समास्थितश्चाप्यमरकण्टके तु । तथैव पश्यामि सुखोपविष्ट आत्मानमव्यग्रमवाप्तसौख्यम्

yathā purātīramupetya devyāḥ samāsthitaścāpyamarakaṇṭake tu | tathaiva paśyāmi sukhopaviṣṭa ātmānamavyagramavāptasaukhyam

जैसे पहले उस देवी के तट पर पहुँचकर मैं अमरकण्टक में स्थित हुआ था, वैसे ही अब भी मैं स्वयं को सुखपूर्वक बैठा हुआ, अव्यग्र तथा सुख प्राप्त हुआ देखता हूँ।

श्लोक 59 (skanda.5.174.59)

तथैव पुण्या मलतोयवाहां दृष्ट्वा पुनः कल्पपरिक्षयेऽपि । अम्बामिवार्यामनुकम्पमानामक्षीणतोयां विरुजां विशोकः

tathaiva puṇyā malatoyavāhāṁ dṛṣṭvā punaḥ kalpaparikṣaye'pi | ambāmivāryāmanukampamānāmakṣīṇatoyāṁ virujāṁ viśokaḥ

इस प्रकार कल्प के अन्त में भी उस पुण्यमयी, मल को बहा ले जाने वाली नदी को पुनः देखकर, स्नेहमयी आर्य माता के समान करुणामयी, अक्षीण-जल, रोगरहित उस नदी को देखकर मैं शोकरहित हो गया।

श्लोक 60 (skanda.5.174.60)

एवं महत्पुण्यतमं च कल्पं पठन्ति शृण्वन्ति च ये द्विजेन्द्राः । महावराहस्य महेश्वरस्य दिने दिने ते विमला भवन्ति

evaṁ mahatpuṇyatamaṁ ca kalpaṁ paṭhanti śṛṇvanti ca ye dvijendrāḥ | mahāvarāhasya maheśvarasya dine dine te vimalā bhavanti

इस प्रकार महापुण्यमय महावराह-रूपी महेश्वर के इस कल्प-वृत्तान्त को जो श्रेष्ठ ब्राह्मण पढ़ते या सुनते हैं, वे प्रतिदिन निर्मल हो जाते हैं।

श्लोक 61 (skanda.5.174.61)

अशुभशतसहस्रं ते विधूय प्रपन्नास्त्रिदिवममरजुष्टं सिद्धगन्धर्वयुक्तम् । विमलशशिनिभाभिः सर्व एवाप्सरोभिः सह विविधविलासैः स्वर्गसौख्यं लभन्ते

aśubhaśatasahasraṁ te vidhūya prapannāstridivamamarajuṣṭaṁ siddhagandharvayuktam | vimalaśaśinibhābhiḥ sarva evāpsarobhiḥ saha vividhavilāsaiḥ svargasaukhyaṁ labhante

वे लाखों अशुभ कर्मों को धोकर, देवताओं द्वारा सेवित, सिद्धों-गन्धर्वों से युक्त स्वर्गलोक को प्राप्त होकर, निर्मल चन्द्रमा के समान समस्त अप्सराओं के साथ विविध विलासों से युक्त होकर स्वर्ग-सुख को प्राप्त करते हैं।

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