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अवन्ती खण्ड · अध्याय 175

वाराहकल्पवृत्तान्त वर्णन (शेष)

अध्याय 174अध्याय-सूचीअध्याय 176

श्लोक 1 (skanda.5.175.1)

युधिष्ठिर उवाच। श्रुता मे विविधा धर्माः संहारास्त्वत्प्रसादतः । कृता देवेन सर्वेण ये च दृष्टास्त्वयानघ

yudhiṣṭhira uvāca| śrutā me vividhā dharmāḥ saṁhārāstvatprasādataḥ | kṛtā devena sarveṇa ye ca dṛṣṭāstvayānagha

युधिष्ठिर बोले — हे निष्पाप! आपकी कृपा से मैंने अनेक धर्मों तथा उस सर्वदेव द्वारा किए गए संहारों को सुना, जिन्हें आपने प्रत्यक्ष देखा है।

श्लोक 2 (skanda.5.175.2)

साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि प्रभावं शार्ङ्गधन्वनः । त्वयानुभूतं विप्रेन्द्र तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि

sāmprataṁ śrotumicchāmi prabhāvaṁ śārṅgadhanvanaḥ | tvayānubhūtaṁ viprendra tanme tvaṁ vaktumarhasi

अब मैं शार्ङ्गधन्वा (विष्णु) के उस प्रभाव को सुनना चाहता हूँ, जिसका आपने स्वयं अनुभव किया; हे विप्रेन्द्र! वह मुझे बताने योग्य है।

श्लोक 3 (skanda.5.175.3)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रजासंहारलक्षणम् । यच्चिह्नं दृश्यते तत्र यथा कल्पो विधीयते

śrīmārkaṇḍeya uvāca| ataḥ paraṁ pravakṣyāmi prajāsaṁhāralakṣaṇam | yaccihnaṁ dṛśyate tatra yathā kalpo vidhīyate

श्रीमार्कण्डेय बोले — अब आगे मैं प्रजा-संहार के लक्षण बताऊँगा, जिनके चिह्न दिखाई देने पर कल्प का अन्त निश्चित होता है।

श्लोक 4 (skanda.5.175.4)

उल्कापाताः सनिर्घाता भूमिकम्पस्तथैव च । पतते पांशुवर्षं च निर्घोषश्चैव दारुणः

ulkāpātāḥ sanirghātā bhūmikampastathaiva ca | patate pāṁśuvarṣaṁ ca nirghoṣaścaiva dāruṇaḥ

उल्कापात, कड़कती गर्जनाएँ, भूकम्प, धूल की वर्षा तथा भयंकर गड़गड़ाहट होने लगती है।

श्लोक 5 (skanda.5.175.5)

यक्षकिन्नरगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः । सर्वे ते प्रलयं यान्ति युगान्ते समुपस्थिते

yakṣakinnaragandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ | sarve te pralayaṁ yānti yugānte samupasthite

यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस — युगान्त उपस्थित होने पर वे सभी प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.5.175.6)

पर्वताः सागरा नद्यः सरांसि विविधानि च । वृक्षाः शेषं समायान्ति वल्लीजातं तृणानि च

parvatāḥ sāgarā nadyaḥ sarāṁsi vividhāni ca | vṛkṣāḥ śeṣaṁ samāyānti vallījātaṁ tṛṇāni ca

पर्वत, समुद्र, नदियाँ, विविध सरोवर, वृक्ष, लताएँ तथा तृण भी अन्त को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 7 (skanda.5.175.7)

एवं हि व्याकुलीभूते सर्वौषधिजलोज्झिते । काष्ठभूते तु संजाते त्रैलोक्ये सचराचरे

evaṁ hi vyākulībhūte sarvauṣadhijalojjhite | kāṣṭhabhūte tu saṁjāte trailokye sacarācare

इस प्रकार जब चराचर तीनों लोक व्याकुल, समस्त औषधियों और जल से रहित तथा काष्ठवत् हो जाते हैं,

श्लोक 8 (skanda.5.175.8)

यावत्पश्यामि मध्याह्ने स्नानकाल उपस्थिते । त्रैलोक्यं ज्वलनाकारं दुर्निरीक्षं दुरासदम्

yāvatpaśyāmi madhyāhne snānakāla upasthite | trailokyaṁ jvalanākāraṁ durnirīkṣaṁ durāsadam

उस समय, मध्याह्न के स्नानकाल में, मैं तीनों लोकों को अग्निमय, अत्यन्त दुर्दर्शनीय तथा दुर्गम्य होते देख रहा था।

श्लोक 9 (skanda.5.175.9)

द्वौ सूर्यौ पूर्वतस्तात पश्चिमोत्तरयोस्तथा । तथैव दक्षिणे द्वौ च सूर्यौ दृष्टौ प्रतापिनौ

dvau sūryau pūrvatastāta paścimottarayostathā | tathaiva dakṣiṇe dvau ca sūryau dṛṣṭau pratāpinau

हे तात! पूर्व में दो सूर्य, तथा पश्चिम और उत्तर में भी वैसे ही; दक्षिण में भी दो तेजस्वी सूर्य दिखाई दिए।

श्लोक 10 (skanda.5.175.10)

द्वौ सूर्यौ नागलोकस्थौ मध्ये द्वौ गगनस्य च । इत्येते द्वादशादित्यास्तपन्ते सर्वतो दिशम्

dvau sūryau nāgalokasthau madhye dvau gaganasya ca | ityete dvādaśādityāstapante sarvato diśam

नागलोक में दो सूर्य तथा आकाश के मध्य में भी दो — इस प्रकार ये बारह आदित्य सभी दिशाओं में तपने लगे।

श्लोक 11 (skanda.5.175.11)

पृथिवीमदहन्सर्वां सशैलवनकाननाम् । नादग्धं दृश्यते किंचिदृते रेवां च मां तथा

pṛthivīmadahansarvāṁ saśailavanakānanām | nādagdhaṁ dṛśyate kiṁcidṛte revāṁ ca māṁ tathā

उन्होंने पर्वत, वन और काननों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को जला दिया; रेवा और मुझे छोड़कर कुछ भी अदग्ध दिखाई नहीं दे रहा था।

श्लोक 12 (skanda.5.175.12)

पृथिव्यां दह्यमानायां हविर्गन्धश्च जायते । ततो मे शुष्यते गात्रं तृषाप्येवं दुरासदा

pṛthivyāṁ dahyamānāyāṁ havirgandhaśca jāyate | tato me śuṣyate gātraṁ tṛṣāpyevaṁ durāsadā

पृथ्वी के जलने से हवि की गन्ध उठने लगी; तब मेरा शरीर सूखने लगा और असह्य प्यास भी लगी।

श्लोक 13 (skanda.5.175.13)

न हि विन्दामि पानीयं शोषितं च दिवाकरैः । यावत्कमण्डलुं वीक्षे शुष्कं तत्रापि तज्जलम्

na hi vindāmi pānīyaṁ śoṣitaṁ ca divākaraiḥ | yāvatkamaṇḍaluṁ vīkṣe śuṣkaṁ tatrāpi tajjalam

सूर्यों द्वारा सुखाया गया कोई भी जल मुझे नहीं मिल रहा था; यहाँ तक कि जब मैंने अपने कमण्डलु को देखा, तो वहाँ भी जल सूखा हुआ था।

श्लोक 14 (skanda.5.175.14)

ततोऽहं शोकसंतप्तो विशेषात्क्षुत्तृषार्दितः । उत्पपात क्षितेरूर्ध्वं पश्यमानो दिवं प्रति

tato'haṁ śokasaṁtapto viśeṣātkṣuttṛṣārditaḥ | utpapāta kṣiterūrdhvaṁ paśyamāno divaṁ prati

तब मैं शोकसन्तप्त होकर, विशेष रूप से भूख-प्यास से पीड़ित होकर, आकाश की ओर देखते हुए पृथ्वी से ऊपर उड़ गया।

श्लोक 15 (skanda.5.175.15)

तावत्पश्यामि गगने गृहं शृङ्गारभूषितम् । ततस्तज्ज्ञातुकामोऽहं प्रस्थितो राजसत्तम

tāvatpaśyāmi gagane gṛhaṁ śṛṅgārabhūṣitam | tatastajjñātukāmo'haṁ prasthito rājasattama

तभी मैंने आकाश में एक शृंगार से भूषित भवन देखा; तब हे राजसत्तम! उसे जानने की इच्छा से मैं उस ओर चल पड़ा।

श्लोक 16 (skanda.5.175.16)

प्राकारेण विचित्रेण कपाटार्गलभूषितम् । विचित्रशिखरोपेतं द्वारदेशमुपागतः

prākāreṇa vicitreṇa kapāṭārgalabhūṣitam | vicitraśikharopetaṁ dvāradeśamupāgataḥ

विचित्र प्राकार से घिरा, किवाड़-अर्गलाओं से सुसज्जित, विचित्र शिखरों वाले उस भवन के द्वार-प्रदेश में मैं पहुँचा।

श्लोक 17 (skanda.5.175.17)

षडशीतिसहस्राणि योजनानां समुच्छ्रये । तदर्धं तु पृथक्त्वेन काञ्चनं रत्नभूषितम्

ṣaḍaśītisahasrāṇi yojanānāṁ samucchraye | tadardhaṁ tu pṛthaktvena kāñcanaṁ ratnabhūṣitam

वह छियासी हज़ार योजन की ऊँचाई वाला था; और उससे आधा, अलग से, स्वर्णमय तथा रत्नों से भूषित था।

श्लोक 18 (skanda.5.175.18)

तत्र मध्ये परां शय्यां पश्यामि नृपसत्तम । शय्योपरि शयानं तु पुरुषं दिव्यमूर्धजम्

tatra madhye parāṁ śayyāṁ paśyāmi nṛpasattama | śayyopari śayānaṁ tu puruṣaṁ divyamūrdhajam

हे नृपसत्तम! उसके मध्य में मैंने एक परम शय्या देखी, और उस शय्या पर दिव्य केशों वाले एक पुरुष को सोए हुए देखा,

श्लोक 19 (skanda.5.175.19)

विकुञ्चिताग्रकेशान्तं समस्तं योजनायतम् । मुकुटेन विचित्रेण दीप्तिकान्तेन शोभितम्

vikuñcitāgrakeśāntaṁ samastaṁ yojanāyatam | mukuṭena vicitreṇa dīptikāntena śobhitam

जिनके केशों के अग्रभाग घुँघराले थे, जिनका सम्पूर्ण शरीर एक योजन लम्बा था, जो विचित्र, देदीप्यमान मुकुट से सुशोभित थे,

श्लोक 20 (skanda.5.175.20)

श्यामं कमलपत्राभं सुप्रभं च सुनासिकम् । सिंहास्यमायतभुजं गल्लश्मश्रुवराङ्कितम्

śyāmaṁ kamalapatrābhaṁ suprabhaṁ ca sunāsikam | siṁhāsyamāyatabhujaṁ gallaśmaśruvarāṅkitam

जो श्याम वर्ण, कमल-दल के समान, तेजस्वी, सुन्दर नासिका वाले, सिंह के समान मुख, लम्बी भुजाओं वाले, दाढ़ी-कपोलों से सुशोभित थे,

श्लोक 21 (skanda.5.175.21)

त्रिवलीभङ्गसुभगं कर्णकुण्डलभूषितम् । विशालाभं सुपीनाङ्गं पार्श्वस्वावर्तभूषितम्

trivalībhaṅgasubhagaṁ karṇakuṇḍalabhūṣitam | viśālābhaṁ supīnāṅgaṁ pārśvasvāvartabhūṣitam

त्रिवली-भंग से सुन्दर, कर्ण-कुण्डलों से भूषित, विशाल, पुष्ट अंगों वाले, पार्श्व में आवर्त-चिह्नों से सुशोभित थे,

श्लोक 22 (skanda.5.175.22)

शोभितं कटिभागेन विभक्तं जानुजङ्घयोः । पद्माङ्किततलं देवमाताम्रसुनखाङ्गुलिम्

śobhitaṁ kaṭibhāgena vibhaktaṁ jānujaṅghayoḥ | padmāṅkitatalaṁ devamātāmrasunakhāṅgulim

कटिभाग से सुन्दर, जानु और जंघाओं में सुविभक्त, चरणतल पर कमल-चिह्न वाले, ताम्रवर्ण के सुन्दर नखों-अंगुलियों वाले,

श्लोक 23 (skanda.5.175.23)

मेघनादसुगम्भीरं सर्वावयवसुन्दरम् । शय्यामध्यगतं देवमपश्यं पुरुषोत्तमम्

meghanādasugambhīraṁ sarvāvayavasundaram | śayyāmadhyagataṁ devamapaśyaṁ puruṣottamam

मेघ-गर्जन के समान गम्भीर स्वर वाले, समस्त अंगों में सुन्दर उस पुरुषोत्तम देव को मैंने शय्या के मध्य में लेटा हुआ देखा,

श्लोक 24 (skanda.5.175.24)

शङ्खचक्रगदापाणिं शयानं दक्षिणेन तु । अक्षसूत्रोद्यतकरं सूर्यायुतसमप्रभम्

śaṅkhacakragadāpāṇiṁ śayānaṁ dakṣiṇena tu | akṣasūtrodyatakaraṁ sūryāyutasamaprabham

जो शंख, चक्र, गदा हाथों में धारण किए, दाहिनी करवट लेटे हुए, अक्षमाला उठाए हुए हाथ वाले, दस हज़ार सूर्यों के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 25 (skanda.5.175.25)

तं दृष्ट्वा भक्तिमान्देवं स्तोतुकामो व्यवस्थितः । जयेश जय वागीश जय दिव्याङ्गभूषण

taṁ dṛṣṭvā bhaktimāndevaṁ stotukāmo vyavasthitaḥ | jayeśa jaya vāgīśa jaya divyāṅgabhūṣaṇa

उन्हें देखकर भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने की इच्छा से मैं खड़ा हो गया — 'हे ईश! जय हो, हे वागीश! जय हो, हे दिव्य अंग-भूषण! जय हो —'

श्लोक 26 (skanda.5.175.26)

जय देवपते श्रीमन्साक्षाद्ब्रह्म सनातन । तव लोकाः शरीरस्थास्त्वं गतिः परमेश्वर

jaya devapate śrīmansākṣādbrahma sanātana | tava lokāḥ śarīrasthāstvaṁ gatiḥ parameśvara

'हे देवपते, हे श्रीमन्, हे साक्षात् सनातन ब्रह्म! जय हो। समस्त लोक आपके शरीर में स्थित हैं; आप ही परम गति हैं, हे परमेश्वर!'

श्लोक 27 (skanda.5.175.27)

त्वदाधारा हि देवेश सर्वे लोका व्यवस्थिताः । त्वं श्रेष्ठः सर्वसत्त्वानां त्वं कर्ता धरणीधरः

tvadādhārā hi deveśa sarve lokā vyavasthitāḥ | tvaṁ śreṣṭhaḥ sarvasattvānāṁ tvaṁ kartā dharaṇīdharaḥ

'हे देवेश! आप ही का आश्रय लेकर सभी लोक स्थित हैं; आप ही समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ हैं, आप ही सृष्टिकर्ता तथा पृथ्वीधारक हैं।'

श्लोक 28 (skanda.5.175.28)

त्वं हौत्रमग्निहोत्राणां सूत्रमन्त्रस्त्वमेव च । गोकर्णं भद्रकर्णं च त्वं च माहेश्वरं पदम्

tvaṁ hautramagnihotrāṇāṁ sūtramantrastvameva ca | gokarṇaṁ bhadrakarṇaṁ ca tvaṁ ca māheśvaraṁ padam

'आप ही अग्निहोत्रों का हवन-कर्म हैं, आप ही सूत्र और मन्त्र हैं; आप ही गोकर्ण, भद्रकर्ण तथा माहेश्वर पद हैं।'

श्लोक 29 (skanda.5.175.29)

त्वं कीर्तिः सर्वकीर्तीनां दैन्यपापप्रणाशिनी । त्वं नैमिषं कुरुक्षेत्रं त्वं च विष्णुपदं परम्

tvaṁ kīrtiḥ sarvakīrtīnāṁ dainyapāpapraṇāśinī | tvaṁ naimiṣaṁ kurukṣetraṁ tvaṁ ca viṣṇupadaṁ param

'आप ही समस्त कीर्तियों की कीर्ति हैं, जो दैन्य और पाप का नाश करने वाली है; आप ही नैमिष, कुरुक्षेत्र तथा विष्णु के परम पद हैं।'

श्लोक 30 (skanda.5.175.30)

त्वया तु लीलया देव पदाक्रान्ता च मेदिनी । त्वया बद्धो बलिर्देव त्वयेन्द्रस्य पदं कृतम्

tvayā tu līlayā deva padākrāntā ca medinī | tvayā baddho balirdeva tvayendrasya padaṁ kṛtam

'हे देव! आपने ही लीला से समस्त पृथ्वी को अपने चरण से आक्रान्त कर लिया; आपने ही बलि को बाँधा और इन्द्र को पद प्रदान किया।'

श्लोक 31 (skanda.5.175.31)

त्वं कलिर्द्वापरं देव त्रेता कृतयुगं तथा । प्रलम्बदमनश्च त्वं स्रष्टा त्वं च विनाशकृत्

tvaṁ kalirdvāparaṁ deva tretā kṛtayugaṁ tathā | pralambadamanaśca tvaṁ sraṣṭā tvaṁ ca vināśakṛt

'हे देव! आप ही कलि, द्वापर, त्रेता तथा कृतयुग हैं; आप ही प्रलम्बासुर के दमनकर्ता, सृष्टिकर्ता तथा संहारकर्ता हैं।'

श्लोक 32 (skanda.5.175.32)

त्वया वै धार्यते लोकास्त्वं कालः सर्वसंक्षयः । त्वया हि देव सृष्टास्ताः सर्वा वै देवयोनयः

tvayā vai dhāryate lokāstvaṁ kālaḥ sarvasaṁkṣayaḥ | tvayā hi deva sṛṣṭāstāḥ sarvā vai devayonayaḥ

'आप ही से सभी लोक धारण किए जाते हैं; आप ही काल हैं, समस्त प्राणियों का संक्षय हैं; हे देव! आपने ही उन समस्त देवयोनियों की रचना की है।'

श्लोक 33 (skanda.5.175.33)

त्वं पन्थाः सर्वलोकानां त्वं च मोक्षः परा गतिः । ब्रह्मा त्वदुद्भवो देवो रजोरूपः सनातनः । रुद्रः क्रोधोद्भवोऽप्येवं त्वं च सत्त्वे व्यवस्थितः

tvaṁ panthāḥ sarvalokānāṁ tvaṁ ca mokṣaḥ parā gatiḥ | brahmā tvadudbhavo devo rajorūpaḥ sanātanaḥ | rudraḥ krodhodbhavo'pyevaṁ tvaṁ ca sattve vyavasthitaḥ

'आप ही समस्त लोकों का मार्ग हैं, आप ही मोक्ष तथा परम गति हैं; आपसे ही उत्पन्न रजोगुणमय सनातन देव ब्रह्मा हैं, तथा क्रोध से उत्पन्न रुद्र भी; और आप स्वयं सत्त्वगुण में स्थित हैं।'

श्लोक 34 (skanda.5.175.34)

एतच्चराचरं देव क्रीडनार्थं त्वया कृतम् । एवं संतप्तदेहेन स्तुतो देवो मया प्रभुः

etaccarācaraṁ deva krīḍanārthaṁ tvayā kṛtam | evaṁ saṁtaptadehena stuto devo mayā prabhuḥ

'हे देव! यह चराचर जगत् आपने केवल लीलामात्र के लिए रचा है।' इस प्रकार संतप्त शरीर से मैंने प्रभु उस देव की स्तुति की —

श्लोक 35 (skanda.5.175.35)

भक्त्या परमया राजन्सर्वभूतपतिः प्रभुः । स्तुवन्वै तत्र पश्यामि वारिपूर्णांस्ततो घटान्

bhaktyā paramayā rājansarvabhūtapatiḥ prabhuḥ | stuvanvai tatra paśyāmi vāripūrṇāṁstato ghaṭān

हे राजन्! परम भक्ति से मैं सर्वभूतपति प्रभु की स्तुति करता हुआ वहाँ जल से भरे घड़ों को देखने लगा।

श्लोक 36 (skanda.5.175.36)

ततो मया विस्मृता या तृषा सा वर्धिता पुनः । उपासर्पं ततस्तस्य पार्श्वं वै पुरुषस्य हि

tato mayā vismṛtā yā tṛṣā sā vardhitā punaḥ | upāsarpaṁ tatastasya pārśvaṁ vai puruṣasya hi

तब मैं जो प्यास भूल चुका था, वह पुनः बढ़ गई; तब मैं उस पुरुष के समीप सरकने लगा,

श्लोक 37 (skanda.5.175.37)

पानीयं पातुकामेन चिन्तितं च मया पुनः । नापश्यत हि मां चैष सुप्तोऽपि न च बुध्यते

pānīyaṁ pātukāmena cintitaṁ ca mayā punaḥ | nāpaśyata hi māṁ caiṣa supto'pi na ca budhyate

जल पीने की इच्छा से; और मैंने पुनः सोचा — यह न तो मुझे देखता है, और सोया होने पर भी जागता नहीं है।

श्लोक 38 (skanda.5.175.38)

यस्तु पापेन संमूढः सुखं सुप्तं प्रबोधयेत् । जायते तस्य पापस्य ब्रह्महत्याफलं महत्

yastu pāpena saṁmūḍhaḥ sukhaṁ suptaṁ prabodhayet | jāyate tasya pāpasya brahmahatyāphalaṁ mahat

जो कोई पाप से मोहित होकर सुखपूर्वक सोए हुए को जगाता है, उसे उस पाप का ब्रह्महत्या के समान महान् फल भोगना पड़ता है।

श्लोक 39 (skanda.5.175.39)

एवं संचिन्त्यमाने तु द्वितीयो ह्यागतः पुमान् । नेक्षते जल्पते किंचिद्वामस्कन्धे मृगाजिनी

evaṁ saṁcintyamāne tu dvitīyo hyāgataḥ pumān | nekṣate jalpate kiṁcidvāmaskandhe mṛgājinī

इस प्रकार सोचते हुए, तभी दूसरा पुरुष आया, जो न कुछ देखता था, न कुछ बोलता था, जिसके बाएँ कंधे पर मृगचर्म था,

श्लोक 40 (skanda.5.175.40)

जटी कमण्डलुधरो दण्डी मेखलया वृतः । भस्मोन्मृदितसर्वाङ्गो महातेजास्त्रिलोचनः

jaṭī kamaṇḍaludharo daṇḍī mekhalayā vṛtaḥ | bhasmonmṛditasarvāṅgo mahātejāstrilocanaḥ

जो जटाधारी, कमण्डलुधारी, दण्डधारी, मेखलायुक्त, समस्त अंगों में भस्म लगाए, महातेजस्वी तथा त्रिनेत्रधारी था।

श्लोक 41 (skanda.5.175.41)

यावत्तं स्तोतुकामोऽहमपश्यं स्वच्छचक्षुषा । तावत्सर्वाङ्गसम्भूत्यामहत्या रूपसम्पदा

yāvattaṁ stotukāmo'hamapaśyaṁ svacchacakṣuṣā | tāvatsarvāṅgasambhūtyāmahatyā rūpasampadā

जब मैं स्वच्छ नेत्रों से उनकी स्तुति करने की इच्छा से उन्हें देख रहा था, तभी उनके समस्त अंगों से उत्पन्न महान् रूपसम्पदा से,

श्लोक 42 (skanda.5.175.42)

अपश्यं संवृतां नारीं सर्वाभरणभूषिताम् । दृष्ट्वा तां पतितो भूमौ जयस्वेति ब्रुवंस्ततः

apaśyaṁ saṁvṛtāṁ nārīṁ sarvābharaṇabhūṣitām | dṛṣṭvā tāṁ patito bhūmau jayasveti bruvaṁstataḥ

मैंने एक आच्छादित, समस्त आभूषणों से भूषित नारी को देखा। उसे देखकर मैं भूमि पर गिर पड़ा और 'जय हो' कहने लगा —

श्लोक 43 (skanda.5.175.43)

जय रुद्राङ्गसम्भूते जयवाहिनि सनातनि । जय कौमारि माहेन्द्रि वैष्णवी वारुणी तथा

jaya rudrāṅgasambhūte jayavāhini sanātani | jaya kaumāri māhendri vaiṣṇavī vāruṇī tathā

'जय हो, रुद्र के अंग से उत्पन्न, विजय की वाहिनी, सनातनी को! जय हो, कौमारी, माहेन्द्री, वैष्णवी तथा वारुणी को!'

श्लोक 44 (skanda.5.175.44)

जय कौबेरि सावित्रि जय धात्रि वरानने । तृष्णया तप्तदेहस्य रक्षां कुरु चराचरे

jaya kauberi sāvitri jaya dhātri varānane | tṛṣṇayā taptadehasya rakṣāṁ kuru carācare

'जय हो, कौबेरी, सावित्री को! जय हो, हे धात्री, हे वरानने! प्यास से सन्तप्त-शरीर मेरी, हे चराचर की रक्षक, रक्षा कीजिए।'

श्लोक 45 (skanda.5.175.45)

श्रीदेव्युवाच - प्रसन्ना विप्रशार्दूल तव वाक्यैः सुशोभनैः । वर्तते मानसे यत्ते मया ज्ञातं द्विजोत्तम

śrīdevyuvāca - prasannā vipraśārdūla tava vākyaiḥ suśobhanaiḥ | vartate mānase yatte mayā jñātaṁ dvijottama

श्रीदेवी बोलीं — 'हे विप्रशार्दूल! तुम्हारे सुन्दर वचनों से मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो है, हे द्विजोत्तम! वह मुझे ज्ञात है।'

श्लोक 46 (skanda.5.175.46)

शृणु विप्र ममाप्यस्ति व्रतमेतत्सुदारुणम् । स्त्रीलघुत्वान्मयारब्धं दुष्करं मन्दमेधया

śṛṇu vipra mamāpyasti vratametatsudāruṇam | strīlaghutvānmayārabdhaṁ duṣkaraṁ mandamedhayā

'हे विप्र! सुनो, मेरा भी यह अत्यन्त कठोर व्रत है, जो स्त्री-स्वभाव की लघुता के कारण मुझ मन्दबुद्धि द्वारा आरम्भ किया गया, दुष्कर व्रत —'

श्लोक 47 (skanda.5.175.47)

यदि भावी च मे पुत्रो धर्मिष्ठो लोकविश्रुतः । विप्रस्य तु स्तनं दत्त्वा पश्चाद्दास्यामि बालके

yadi bhāvī ca me putro dharmiṣṭho lokaviśrutaḥ | viprasya tu stanaṁ dattvā paścāddāsyāmi bālake

'— कि यदि मुझे धर्मात्मा तथा लोकविख्यात पुत्र होगा, तो मैं पहले किसी ब्राह्मण को स्तनपान कराकर बाद में अपने बालक को कराऊँगी।'

श्लोक 48 (skanda.5.175.48)

स मे पुत्रः समुत्पन्नो यथोक्तो मे महामुने । स्तनं पिब त्वं विप्रेन्द्र यदि जीवितुमिच्छसि

sa me putraḥ samutpanno yathokto me mahāmune | stanaṁ piba tvaṁ viprendra yadi jīvitumicchasi

'हे महामुने! वैसा ही मेरा पुत्र उत्पन्न हुआ है, जैसा मुझसे कहा गया था। हे विप्रेन्द्र! यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो मेरा स्तन-पान करो।'

श्लोक 49 (skanda.5.175.49)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। अकार्यमेतद्विप्राणां यस्त्विमं पिबते स्तनम् । पुनश्चैवोपनयनं व्रतसिद्धिं न गच्छति

śrīmārkaṇḍeya uvāca| akāryametadviprāṇāṁ yastvimaṁ pibate stanam | punaścaivopanayanaṁ vratasiddhiṁ na gacchati

श्रीमार्कण्डेय बोले — 'ब्राह्मणों के लिए यह अकार्य है, जो यह स्तन पीता है; उसे फिर से उपनयन करना पड़ता है, और उसकी व्रत-सिद्धि नहीं होती।'

श्लोक 50 (skanda.5.175.50)

ब्राह्मणत्वं त्रिभिर्लोकैर्दुर्लभं पद्मलोचने । संस्कारैः संस्कृतो विप्रो यैश्च जायेत तच्छृणु

brāhmaṇatvaṁ tribhirlokairdurlabhaṁ padmalocane | saṁskāraiḥ saṁskṛto vipro yaiśca jāyeta tacchṛṇu

'हे कमलनयने! ब्राह्मणत्व तीनों लोकों में दुर्लभ है; जिन संस्कारों से ब्राह्मण संस्कृत होकर जन्म लेता है, वह सुनो।'

श्लोक 51 (skanda.5.175.51)

प्रथमं चैव नारीषु संस्कारैर्बीजवापतम् । बीजप्रक्षेपणादेव बीजक्षेपः स उच्यते

prathamaṁ caiva nārīṣu saṁskārairbījavāpatam | bījaprakṣepaṇādeva bījakṣepaḥ sa ucyate

'पहला, स्त्रियों में बीज-वपन का संस्कार है; बीज के प्रक्षेपण से ही उसे बीज-क्षेप कहा जाता है।'

श्लोक 52 (skanda.5.175.52)

तदन्ते च महाभागे गर्भाधानं द्वितीयकम् । पुंसवनं तृतीयं तु सीमन्तं च चतुर्थकम्

tadante ca mahābhāge garbhādhānaṁ dvitīyakam | puṁsavanaṁ tṛtīyaṁ tu sīmantaṁ ca caturthakam

'हे महाभागे! उसके बाद दूसरा गर्भाधान है; तीसरा पुंसवन, तथा चौथा सीमन्तोन्नयन है।'

श्लोक 53 (skanda.5.175.53)

पञ्चमं जातकर्म स्यान्नाम वै षष्ठमुच्यते । निष्क्रामः सप्तमश्चैव ह्यन्नप्राशनमष्टमम्

pañcamaṁ jātakarma syānnāma vai ṣaṣṭhamucyate | niṣkrāmaḥ saptamaścaiva hyannaprāśanamaṣṭamam

'पाँचवाँ जातकर्म, छठा नामकरण कहा जाता है; सातवाँ निष्क्रमण, तथा आठवाँ अन्नप्राशन है।'

श्लोक 54 (skanda.5.175.54)

नवमं वै चूडकर्म दशमं मौञ्जिबन्धनम् । ऐषिकं दार्विकं चैव सौमिकं भौमिकं तथा

navamaṁ vai cūḍakarma daśamaṁ mauñjibandhanam | aiṣikaṁ dārvikaṁ caiva saumikaṁ bhaumikaṁ tathā

'नौवाँ चूड़ाकर्म, दसवाँ मौञ्जीबन्धन है; तत्पश्चात् ऐषिक, दार्विक, तथा सौमिक और भौमिक संस्कार हैं,'

श्लोक 55 (skanda.5.175.55)

पत्नीसंयोजनं चान्यद्दैवकर्म ततः परम् । मानुष्यं पितृकर्म स्याद्दशमाष्टासु शोभने

patnīsaṁyojanaṁ cānyaddaivakarma tataḥ param | mānuṣyaṁ pitṛkarma syāddaśamāṣṭāsu śobhane

'तथा पत्नी-संयोजन, फिर दैवकर्म, और मानवकर्म, फिर पितृकर्म — हे शोभना! ये दस-आठ संस्कार हैं।'

श्लोक 56 (skanda.5.175.56)

भूतं भव्यं तथेष्टं च पार्वणं च ततः परम्

bhūtaṁ bhavyaṁ tatheṣṭaṁ ca pārvaṇaṁ ca tataḥ param

'भूत, भव्य, इष्ट, तथा उसके बाद पार्वण संस्कार हैं —'

श्लोक 57 (skanda.5.175.57)

श्राद्धं श्रावण्यामाग्रयणं च चैत्राश्वयुज्यां दशपौर्णमास्याम् । निरूढपशुसवनसौत्रामण्यग्निष्टोमात्यग्निष्टोमाः

śrāddhaṁ śrāvaṇyāmāgrayaṇaṁ ca caitrāśvayujyāṁ daśapaurṇamāsyām | nirūḍhapaśusavanasautrāmaṇyagniṣṭomātyagniṣṭomāḥ

'श्रावणी में श्राद्ध, आग्रयण, चैत्र-आश्विन में, तथा दश-पौर्णमास्य में; निरूढपशुबन्ध, सौत्रामणी, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम —'

श्लोक 58 (skanda.5.175.58)

षोडषीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामोदशवाजपेयाः । सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमङ्गलमकार्पण्यमस्पृहेति

ṣoḍaṣīvājapeyātirātrāptoryāmodaśavājapeyāḥ | sarvabhūteṣu kṣāntiranasūyā śaucamaṅgalamakārpaṇyamaspṛheti

'षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र, आप्तोर्याम, दशवाजपेय — तथा समस्त प्राणियों के प्रति क्षमा, अनसूया, शौच, मांगल्य, अकार्पण्य और निःस्पृहता —'

श्लोक 59 (skanda.5.175.59)

एभिरष्टचत्वारिंशद्भिः संस्कारैः संकृतो ब्राह्मणो भवति

ebhiraṣṭacatvāriṁśadbhiḥ saṁskāraiḥ saṁkṛto brāhmaṇo bhavati

'इन अड़तालीस संस्कारों से संस्कृत होकर ही मनुष्य ब्राह्मण बनता है।'

श्लोक 60 (skanda.5.175.60)

एवं ज्ञात्वा महाभागे न तु मां पातुमर्हसि । शिशुपेयं स्तनं भद्रे कथं वै मद्विधः पिबेत्

evaṁ jñātvā mahābhāge na tu māṁ pātumarhasi | śiśupeyaṁ stanaṁ bhadre kathaṁ vai madvidhaḥ pibet

'हे महाभागे! यह सब जानकर तुम्हें मुझे पान नहीं कराना चाहिए। हे भद्रे! शिशुओं के योग्य यह स्तन-पान मेरे जैसे व्यक्ति के लिए कैसे उचित होगा?'

श्लोक 61 (skanda.5.175.61)

ममैतद्वचनं श्रुत्वा नारी वचनमब्रवीत्

mamaitadvacanaṁ śrutvā nārī vacanamabravīt

मेरे इस वचन को सुनकर उस नारी ने यह वचन कहा —

श्लोक 62 (skanda.5.175.62)

यदि त्वं न पिबेः स्तन्यं पयो बालो मरिष्यति । श्रूयते त्रिषु लोकेषु वेदेषु च स्मृतिष्वपि । मुच्यते सर्वपापेभ्यो भ्रूणहत्या न मुञ्चति

yadi tvaṁ na pibeḥ stanyaṁ payo bālo mariṣyati | śrūyate triṣu lokeṣu vedeṣu ca smṛtiṣvapi | mucyate sarvapāpebhyo bhrūṇahatyā na muñcati

'यदि तुम स्तन्य-दूध न पिओगे, तो यह बालक मर जाएगा। तीनों लोकों में, वेदों में तथा स्मृतियों में भी सुना जाता है कि मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो सकता है, किन्तु भ्रूणहत्या से नहीं होता।'

श्लोक 63 (skanda.5.175.63)

भवित्री तव हत्या च महाभागवतः पुनः । जन्मानि च शतान्यष्टौ क्लिश्यते भ्रूणहत्यया

bhavitrī tava hatyā ca mahābhāgavataḥ punaḥ | janmāni ca śatānyaṣṭau kliśyate bhrūṇahatyayā

'यह हत्या भी तुम्हें, हे महाभागवत, प्राप्त होगी। भ्रूणहत्या के कारण आठ सौ जन्मों तक क्लेश भोगना पड़ता है।'

श्लोक 64 (skanda.5.175.64)

मृतः शुनत्वं चाप्नोति वर्षाणां तु शतत्रयम् । ततस्तस्य क्षये जाते काकयोनिं व्रजेत्पुनः

mṛtaḥ śunatvaṁ cāpnoti varṣāṇāṁ tu śatatrayam | tatastasya kṣaye jāte kākayoniṁ vrajetpunaḥ

'मृत्यु के बाद वह तीन सौ वर्षों तक कुत्ते की योनि प्राप्त करता है; उसका क्षय होने पर वह पुनः काक-योनि में जाता है।'

श्लोक 65 (skanda.5.175.65)

तत्रापि च शतान्यष्टौ क्लिश्यते पापकर्मणि । वराहो दश जन्मानि तदन्ते जायते कृमिः

tatrāpi ca śatānyaṣṭau kliśyate pāpakarmaṇi | varāho daśa janmāni tadante jāyate kṛmiḥ

'वहाँ भी आठ सौ वर्षों तक अपने पापकर्म से क्लेश भोगता है; फिर दस जन्मों तक शूकर बनता है, तत्पश्चात् कीड़ा बनता है।'

श्लोक 66 (skanda.5.175.66)

ततश्चारोहिणीं प्राप्य गोगजाश्वनृजन्मभाक् । श्रूयते श्रुतिशास्त्रेषु वेदेषु च परंतप

tataścārohiṇīṁ prāpya gogajāśvanṛjanmabhāk | śrūyate śrutiśāstreṣu vedeṣu ca paraṁtapa

'हे परन्तप! फिर आरोहिणी क्रम को प्राप्त होकर वह गाय, हाथी, घोड़े तथा मनुष्य की योनियों में जन्म लेता है — ऐसा श्रुति-शास्त्रों तथा वेदों में सुना जाता है।'

श्लोक 67 (skanda.5.175.67)

सर्वपापाधिकं पापं बालहत्या द्विजोत्तम । बालहत्यायुतो विप्रः पच्यते नरके ध्रुवम्

sarvapāpādhikaṁ pāpaṁ bālahatyā dvijottama | bālahatyāyuto vipraḥ pacyate narake dhruvam

'हे द्विजोत्तम! बालहत्या समस्त पापों से बढ़कर पाप है। बालहत्या से युक्त ब्राह्मण निश्चित रूप से नरक में पकाया जाता है।'

श्लोक 68 (skanda.5.175.68)

वर्षाणि च शतान्यष्टौ प्राप्नोति यमयातनाम् । तस्मादल्पतरो दोषः पिबतो मे स्तनं तव

varṣāṇi ca śatānyaṣṭau prāpnoti yamayātanām | tasmādalpataro doṣaḥ pibato me stanaṁ tava

'वह आठ सौ वर्षों तक यमयातना भोगता है। अतः मेरा स्तन-पान करने का दोष उससे बहुत कम है।'

श्लोक 69 (skanda.5.175.69)

तथैवापिबतः पापं जायते बहुवर्षिकम् । क्षुधातृषाविरामस्ते पुण्यं च पिबतः स्तनम्

tathaivāpibataḥ pāpaṁ jāyate bahuvarṣikam | kṣudhātṛṣāvirāmaste puṇyaṁ ca pibataḥ stanam

'इसी प्रकार न पीने का पाप बहुत वर्षों तक बना रहता है; परन्तु स्तन-पान करने से तुम्हारी भूख-प्यास शान्त होगी और पुण्य भी होगा।'

श्लोक 70 (skanda.5.175.70)

अतो न चेतः संदिग्धं कर्तव्यमिह कर्हिचित् । एहि विप्र यथाकामं बालार्थे पिब मे स्तनम्

ato na cetaḥ saṁdigdhaṁ kartavyamiha karhicit | ehi vipra yathākāmaṁ bālārthe piba me stanam

'अतः इसमें मन में कोई सन्देह नहीं करना चाहिए। आओ, हे विप्र! बालक के लिए इच्छानुसार मेरा स्तन-पान करो।'

श्लोक 71 (skanda.5.175.71)

ततोऽहं वचनं श्रुत्वा स्तनं पातुं समुद्यतः । न च तृप्तिं विजानामि पिबतः स्तनमुत्तमम्

tato'haṁ vacanaṁ śrutvā stanaṁ pātuṁ samudyataḥ | na ca tṛptiṁ vijānāmi pibataḥ stanamuttamam

तब मैं यह वचन सुनकर स्तन-पान करने के लिए तत्पर हुआ; परन्तु उस उत्तम स्तन का पान करते हुए मुझे कभी तृप्ति का अनुभव नहीं हुआ।

श्लोक 72 (skanda.5.175.72)

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि भारतैवं शतानि च । ततः प्रबुद्धोत्सङ्गेऽहं मायानिद्राविमोहितः

triṁśadvarṣasahasrāṇi bhārataivaṁ śatāni ca | tataḥ prabuddhotsaṅge'haṁ māyānidrāvimohitaḥ

हे भारत! इस प्रकार तीस हज़ार वर्ष तथा इतनी ही सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो गए; तत्पश्चात् मायानिद्रा से मोहित मैं उनकी गोद में जाग उठा।

श्लोक 73 (skanda.5.175.73)

निद्राविगतमोहोऽहं यावत्पश्यामि पाण्डव । तावत्सुप्तं न पश्यामि न च तं बालकं विभो

nidrāvigatamoho'haṁ yāvatpaśyāmi pāṇḍava | tāvatsuptaṁ na paśyāmi na ca taṁ bālakaṁ vibho

हे पाण्डव! निद्रा का मोह दूर होने पर जब मैंने देखा, तो न तो वह सोया हुआ पुरुष दिखाई दिया, न ही वह बालक।

श्लोक 74 (skanda.5.175.74)

चतुरस्तांश्च वै कुम्भान् पश्यामि तत्र भारत । न च पश्यामि तां देवीं गता वै कुत्रचिच्च ते

caturastāṁśca vai kumbhān paśyāmi tatra bhārata | na ca paśyāmi tāṁ devīṁ gatā vai kutracicca te

हे भारत! वहाँ मैंने केवल चार चतुष्कोण घड़े देखे; परन्तु उस देवी को कहीं नहीं देखा — वह कहीं चली गई थीं।

श्लोक 75 (skanda.5.175.75)

एवं विमृश्यमानस्य चिन्तयानस्य तिष्ठतः । ईषद्धसितया वाचा देवी वचनमब्रवीत्

evaṁ vimṛśyamānasya cintayānasya tiṣṭhataḥ | īṣaddhasitayā vācā devī vacanamabravīt

इस प्रकार सोचते-विचारते हुए मेरे खड़े रहने पर, देवी ने कुछ मुस्कराती हुई वाणी में यह वचन कहा —

श्लोक 76 (skanda.5.175.76)

श्रीदेव्युवाच - कृष्णः स पुरुषः सुप्तो द्वितीयोऽप्यागतो हरः । ये चत्वारश्च ते कुम्भाः समुद्रास्ते द्विजोत्तम

śrīdevyuvāca - kṛṣṇaḥ sa puruṣaḥ supto dvitīyo'pyāgato haraḥ | ye catvāraśca te kumbhāḥ samudrāste dvijottama

श्रीदेवी बोलीं — 'हे द्विजोत्तम! जो कृष्णवर्ण पुरुष सोए हुए थे, वे स्वयं विष्णु थे; दूसरे जो आए, वे हर (शिव) थे; और जो चार घड़े तुमने देखे, वे चार समुद्र हैं।'

श्लोक 77 (skanda.5.175.77)

यश्च बालस्त्वया दृष्टो ब्राह्मा लोकपितामहः । अहं च पृथिवी ज्ञेया सप्तद्वीपा सर्वता

yaśca bālastvayā dṛṣṭo brāhmā lokapitāmahaḥ | ahaṁ ca pṛthivī jñeyā saptadvīpā sarvatā

'जो बालक तुमने देखा, वे लोक-पितामह ब्रह्मा थे। और मुझे तुम्हें सप्तद्वीपा, सर्वस्वरूपा पृथ्वी जानना चाहिए।'

श्लोक 78 (skanda.5.175.78)

या गता त्वां परित्यज्य भूतले सुप्रतिष्ठिता । इमां च प्रेक्षसे विप्र नर्मदां सरितां वराम्

yā gatā tvāṁ parityajya bhūtale supratiṣṭhitā | imāṁ ca prekṣase vipra narmadāṁ saritāṁ varām

'जो तुम्हें त्यागकर चली गई, वह अब पृथ्वीतल पर सुप्रतिष्ठित है; और हे विप्र! जिस नदियों में श्रेष्ठ नर्मदा को तुम अभी देख रहे हो,

श्लोक 79 (skanda.5.175.79)

सर्वसत्त्वोपकाराय बृहते पुण्यलक्षणा । रेवानदी तु विख्याता न मृता तेन नर्मदा

sarvasattvopakārāya bṛhate puṇyalakṣaṇā | revānadī tu vikhyātā na mṛtā tena narmadā

वह समस्त प्राणियों के उपकार के लिए विशाल, पुण्य-लक्षणा है; वह रेवा नाम से विख्यात है, और चूँकि वह मरी नहीं, इसीलिए वह नर्मदा भी कहलाती है।'

श्लोक 80 (skanda.5.175.80)

एवं ज्ञात्वा शमं गच्छ स्वस्थो भव महामुने । इत्युक्त्वा मां तदा देवी तत्रैवान्तरधीयत

evaṁ jñātvā śamaṁ gaccha svastho bhava mahāmune | ityuktvā māṁ tadā devī tatraivāntaradhīyata

'यह जानकर शान्त हो जाओ, हे महामुने! स्वस्थ बनो।' ऐसा कहकर देवी तभी वहीं अन्तर्धान हो गईं।

श्लोक 81 (skanda.5.175.81)

एवं हि शेते भगवान्सत्त्वस्थः प्रलये सदा । सत्त्वरूपो महादेवो यदाधारे जगत्स्थितम्

evaṁ hi śete bhagavānsattvasthaḥ pralaye sadā | sattvarūpo mahādevo yadādhāre jagatsthitam

इस प्रकार भगवान् सत्त्वगुण में स्थित होकर प्रलयकाल में सदा शयन करते हैं — वे सत्त्वरूप महादेव, जिनके आधार पर यह जगत् स्थित है।

श्लोक 82 (skanda.5.175.82)

एवं मयानुभूतं तु दृष्टमाश्चर्यमुत्तमम् । सर्वपापहरं पुण्यं कथितं ते नरोत्तम

evaṁ mayānubhūtaṁ tu dṛṣṭamāścaryamuttamam | sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ kathitaṁ te narottama

हे नरोत्तम! इस प्रकार मैंने जो अनुभव किया और देखा, वह परम आश्चर्य, समस्त पापों का नाश करने वाला तथा पुण्यमय वृत्तान्त तुम्हें कह दिया।

श्लोक 83 (skanda.5.175.83)

विष्णोश्चरितमित्युक्तं यत्त्वया परिपृच्छितम् । भूय एव महाबाहो किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

viṣṇoścaritamityuktaṁ yattvayā paripṛcchitam | bhūya eva mahābāho kimanyacchrotumicchasi

जो तुमने विष्णु के चरित्र के विषय में पूछा था, वह इस प्रकार कहा गया। हे महाबाहो! अब और क्या सुनने की इच्छा है?

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