अवन्ती खण्ड · अध्याय 176
कपिलासरित्सम्भव वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.176.1)
युधिष्ठिर उवाच। श्रुतं मे विविधाश्चर्यं त्वत्प्रसादाद्द्विजोत्तम । भूयश्च श्रोतुमिच्छामि तन्मे कथय सुव्रत
yudhiṣṭhira uvāca| śrutaṁ me vividhāścaryaṁ tvatprasādāddvijottama | bhūyaśca śrotumicchāmi tanme kathaya suvrata
युधिष्ठिर बोले — हे द्विजोत्तम! आपकी कृपा से मैंने अनेक आश्चर्य सुने हैं; हे सुव्रत! मैं और भी सुनना चाहता हूँ, वह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.5.176.2)
कथमेषा नदी पुण्या सर्वनदीषु चोत्तमा । नर्मदा नाम विख्याता भूयो मे कथयानघ
kathameṣā nadī puṇyā sarvanadīṣu cottamā | narmadā nāma vikhyātā bhūyo me kathayānagha
यह पुण्यमयी, समस्त नदियों में श्रेष्ठ, 'नर्मदा' नाम से विख्यात नदी किस प्रकार है — हे निष्पाप! यह मुझे पुनः बताइए।
श्लोक 3 (skanda.5.176.3)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी । तारयेत्सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च
śrīmārkaṇḍeya uvāca| narmadā saritāṁ śreṣṭhā sarvapāpapraṇāśinī | tārayetsarvabhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca
श्रीमार्कण्डेय बोले — नर्मदा नदियों में श्रेष्ठ, समस्त पापों का नाश करने वाली है; वह स्थावर और जंगम सभी प्राणियों को तार देती है।
श्लोक 4 (skanda.5.176.4)
नर्मदायास्तु माहात्म्यं यत्पूर्वेण मया श्रुतम् । तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप
narmadāyāstu māhātmyaṁ yatpūrveṇa mayā śrutam | tatte'haṁ sampravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā nṛpa
पूर्वकाल में मैंने नर्मदा का जो माहात्म्य सुना था, वह हे राजन्! मैं तुम्हें सुनाता हूँ; एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 5 (skanda.5.176.5)
गङ्गा कनखले पुण्या कुरुक्षेत्रे सरस्वती । ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा
gaṅgā kanakhale puṇyā kurukṣetre sarasvatī | grāme vā yadi vāraṇye puṇyā sarvatra narmadā
गंगा कनखल में पवित्र है, सरस्वती कुरुक्षेत्र में; परन्तु नर्मदा तो ग्राम हो या वन, सर्वत्र ही पवित्र है।
श्लोक 6 (skanda.5.176.6)
त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम् । सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्
tribhiḥ sārasvataṁ toyaṁ saptāhena tu yāmunam | sadyaḥ punāti gāṅgeyaṁ darśanādeva nārmadam
सारस्वत जल तीन दिनों में, यामुन जल सात दिनों में पवित्र करता है; गांगेय जल तत्काल पवित्र करता है, परन्तु नार्मद जल तो केवल दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देता है।
श्लोक 7 (skanda.5.176.7)
कलिङ्गदेशात्पश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके । पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया पदे पदे
kaliṅgadeśātpaścārdhe parvate'marakaṇṭake | puṇyā ca triṣu lokeṣu ramaṇīyā pade pade
कलिंग देश के पश्चिमार्ध में अमरकण्टक पर्वत पर वह तीनों लोकों में पवित्र तथा पग-पग पर रमणीय है।
श्लोक 8 (skanda.5.176.8)
तत्र देवाश्च गन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । तपस्तप्त्वा महाराज सिद्धिं परमिकां गताः
tatra devāśca gandharvā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | tapastaptvā mahārāja siddhiṁ paramikāṁ gatāḥ
हे महाराज! वहाँ देवता, गन्धर्व तथा तपोधन ऋषिगण तप करके परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
श्लोक 9 (skanda.5.176.9)
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नियमस्थो जितेन्द्रियः । उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्
tatra snātvā naro rājanniyamastho jitendriyaḥ | upoṣya rajanīmekāṁ kulānāṁ tārayecchatam
हे राजन्! वहाँ स्नान करके नियमपूर्वक जितेन्द्रिय रहकर, एक रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य अपने सौ कुलों को तार देता है।
श्लोक 10 (skanda.5.176.10)
सिद्धिक्षेत्रं परं तात पर्वतो ह्यमरंकटः । सर्वदेवाश्रितो यस्मादृषिभिः परिसेवितः
siddhikṣetraṁ paraṁ tāta parvato hyamaraṁkaṭaḥ | sarvadevāśrito yasmādṛṣibhiḥ parisevitaḥ
हे तात! अमरकण्टक पर्वत परम सिद्धिक्षेत्र है, क्योंकि यह समस्त देवताओं द्वारा आश्रित तथा ऋषियों द्वारा सेवित है।
श्लोक 11 (skanda.5.176.11)
सिद्धविद्याधरा भूतगन्धर्वाः स्थानमुत्तमम् । दृश्यादृश्याश्च राजेन्द्र सेवन्ते सिद्धिकाङ्क्षिणः
siddhavidyādharā bhūtagandharvāḥ sthānamuttamam | dṛśyādṛśyāśca rājendra sevante siddhikāṅkṣiṇaḥ
हे राजेन्द्र! सिद्ध, विद्याधर, भूत-गण, गन्धर्व — दृश्य और अदृश्य दोनों रूप में — सिद्धि की कामना करते हुए इस उत्तम स्थान की सेवा करते हैं।
श्लोक 12 (skanda.5.176.12)
अहं च परमं स्थानं ततः प्रभृति संश्रितः । अत्र प्रणवरूपो वै स्थाने तिष्ठत्युमापतिः
ahaṁ ca paramaṁ sthānaṁ tataḥ prabhṛti saṁśritaḥ | atra praṇavarūpo vai sthāne tiṣṭhatyumāpatiḥ
मैं भी तभी से उस परम स्थान का आश्रय लिए हुए हूँ; यहाँ प्रणवरूप में ही उमापति निवास करते हैं,
श्लोक 13 (skanda.5.176.13)
श्रीकण्ठः सगणः सर्वभूतसङ्घैर्निषेवितः । अस्माद्गिरिवराद्भूप वक्ष्ये तीर्थस्य विस्तरम्
śrīkaṇṭhaḥ sagaṇaḥ sarvabhūtasaṅghairniṣevitaḥ | asmādgirivarādbhūpa vakṣye tīrthasya vistaram
श्रीकण्ठ अपने गणों सहित, समस्त भूत-समूहों द्वारा सेवित हैं। हे राजन्! इस श्रेष्ठ पर्वत से अब मैं तीर्थ का विस्तार वर्णन करूँगा।
श्लोक 14 (skanda.5.176.14)
यानि सन्तीह तीर्थानि पुण्यानि नृपसत्तम । यानि यानीह तीर्थानि नर्मदायास्तटद्वये
yāni santīha tīrthāni puṇyāni nṛpasattama | yāni yānīha tīrthāni narmadāyāstaṭadvaye
हे नृपसत्तम! नर्मदा के दोनों तटों पर जो-जो पुण्य तीर्थ यहाँ स्थित हैं,
श्लोक 15 (skanda.5.176.15)
न तेषां विस्तरं वक्तुं शक्तो ब्रह्मापि भूपते । योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा
na teṣāṁ vistaraṁ vaktuṁ śakto brahmāpi bhūpate | yojanānāṁ śataṁ sāgraṁ śrūyate sariduttamā
हे राजन्! उनका विस्तार बताने में ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं; यह उत्तम नदी सौ योजन से भी अधिक लम्बी सुनी जाती है।
श्लोक 16 (skanda.5.176.16)
विस्तरेण तु राजेन्द्र अर्धयोजनमायता । षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च
vistareṇa tu rājendra ardhayojanamāyatā | ṣaṣṭitīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭyastathaiva ca
हे राजेन्द्र! विस्तार में वह आधा योजन चौड़ी है; उसमें साठ हज़ार तथा साठ करोड़ तीर्थ हैं,
श्लोक 17 (skanda.5.176.17)
पर्वतादुदधिं यावदुभे कूले न संशयः
parvatādudadhiṁ yāvadubhe kūle na saṁśayaḥ
पर्वत से समुद्र तक, दोनों तटों पर — इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक 18 (skanda.5.176.18)
सप्तषष्टिसहस्राणि सप्तषष्टिशतानि च । सप्तषष्टिस्तथा कोट्यो वायुस्तीर्थानि चाब्रवीत्
saptaṣaṣṭisahasrāṇi saptaṣaṣṭiśatāni ca | saptaṣaṣṭistathā koṭyo vāyustīrthāni cābravīt
सड़सठ हज़ार, सड़सठ सौ, तथा सड़सठ करोड़ तीर्थ — ऐसा वायु देव ने कहा था।
श्लोक 19 (skanda.5.176.19)
परं कृतयुगे तानि यान्ति प्रत्यक्षतां नृप । पश्यन्ति मानवाः सर्वे सततं धर्मबुद्धयः
paraṁ kṛtayuge tāni yānti pratyakṣatāṁ nṛpa | paśyanti mānavāḥ sarve satataṁ dharmabuddhayaḥ
हे राजन्! किन्तु ये कृतयुग में ही प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देते हैं; सभी धर्मबुद्धि वाले मनुष्य उन्हें सतत देखते हैं।
श्लोक 20 (skanda.5.176.20)
यथायथा कलिर्घोरो वर्तते दारुणो नृप । तथातथाल्पतां यान्ति हीनसत्त्वा यतो नराः
yathāyathā kalirghoro vartate dāruṇo nṛpa | tathātathālpatāṁ yānti hīnasattvā yato narāḥ
हे राजन्! जैसे-जैसे घोर, भयंकर कलियुग बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे मनुष्यों की सत्त्व-क्षीणता के कारण वे तीर्थ अल्प होते जाते हैं।
श्लोक 21 (skanda.5.176.21)
जालेश्वरादितीर्थानि पर्वतेऽस्मिन्नराधिप । पितृतृप्तिप्रदान्याहुः स्वर्गमोक्षप्रदानि च
jāleśvarāditīrthāni parvate'sminnarādhipa | pitṛtṛptipradānyāhuḥ svargamokṣapradāni ca
हे नराधिप! इस पर्वत पर जालेश्वर आदि तीर्थ पितरों को तृप्ति देने वाले तथा स्वर्ग-मोक्ष प्रदान करने वाले कहे गए हैं।
श्लोक 22 (skanda.5.176.22)
श्रेष्ठं दारुवनं तत्र चरुकासंगमः शुभः । उत्तरे नर्मदायास्तु चरुकेश्वरमुत्तमम्
śreṣṭhaṁ dāruvanaṁ tatra carukāsaṁgamaḥ śubhaḥ | uttare narmadāyāstu carukeśvaramuttamam
वहाँ श्रेष्ठ दारुवन है, शुभ चरुका-संगम है; नर्मदा के उत्तर में उत्तम चरुकेश्वर है,
श्लोक 23 (skanda.5.176.23)
दारुकेश्वरतीर्थं च व्यतीपातेश्वरं तथा । पातालेश्वरतीर्थं च कोटियज्ञं तथैव च
dārukeśvaratīrthaṁ ca vyatīpāteśvaraṁ tathā | pātāleśvaratīrthaṁ ca koṭiyajñaṁ tathaiva ca
दारुकेश्वर तीर्थ, तथा व्यतीपातेश्वर, तथा पातालेश्वर तीर्थ, और इसी प्रकार कोटियज्ञ भी है।
श्लोक 24 (skanda.5.176.24)
इति चैवोत्तरे कूले रेवाया नृपसत्तम । अमरेश्वरपार्श्वे च लिङ्गान्यष्टोत्तरं शतम्
iti caivottare kūle revāyā nṛpasattama | amareśvarapārśve ca liṅgānyaṣṭottaraṁ śatam
हे नृपसत्तम! इसी प्रकार रेवा के उत्तर तट पर, अमरेश्वर के पार्श्व में, एक सौ आठ लिंग हैं —
श्लोक 25 (skanda.5.176.25)
वरुणेश्वरमुख्यानि सर्वपापहराणि च
varuṇeśvaramukhyāni sarvapāpaharāṇi ca
वरुणेश्वर आदि प्रमुख, जो सभी पापों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 26 (skanda.5.176.26)
मान्धातृपुरपार्श्वे च सिद्धेश्वरयमेश्वरौ । ओङ्कारात्पूर्वभागे च केदारं तीर्थमुत्तमम्
māndhātṛpurapārśve ca siddheśvarayameśvarau | oṅkārātpūrvabhāge ca kedāraṁ tīrthamuttamam
मान्धातृपुर के पार्श्व में सिद्धेश्वर और यमेश्वर हैं; ओंकार के पूर्व भाग में उत्तम केदार तीर्थ है।
श्लोक 27 (skanda.5.176.27)
तत्समीपे महाराज स्वर्गद्वारमघापहम् । नाम्ना ब्रह्मेश्वरं पुण्यं सप्तसारस्वतं पुरः
tatsamīpe mahārāja svargadvāramaghāpaham | nāmnā brahmeśvaraṁ puṇyaṁ saptasārasvataṁ puraḥ
हे महाराज! उसके समीप पापनाशक स्वर्गद्वार है, तथा पुण्यमय ब्रह्मेश्वर नाम का तीर्थ है, और उसके सामने सप्तसारस्वत है।
श्लोक 28 (skanda.5.176.28)
रुद्राष्टकं च सावित्रं सोमतीर्थं तथैव च । एतानि दक्षिणे तीरे रेवाया भरतर्षभ
rudrāṣṭakaṁ ca sāvitraṁ somatīrthaṁ tathaiva ca | etāni dakṣiṇe tīre revāyā bharatarṣabha
रुद्राष्टक, सावित्र, तथा सोमतीर्थ भी है — हे भरतर्षभ! ये सब रेवा के दक्षिण तट पर हैं।
श्लोक 29 (skanda.5.176.29)
अस्मिंस्तु पर्वते तात रुद्राणां कोटयः स्थिताः । स्नानैस्तुष्टिर्भवेत्तेषां गन्धमाल्यानुलेपनैः
asmiṁstu parvate tāta rudrāṇāṁ koṭayaḥ sthitāḥ | snānaistuṣṭirbhavetteṣāṁ gandhamālyānulepanaiḥ
हे तात! इस पर्वत पर करोड़ों रुद्र स्थित हैं; स्नान, गन्ध, माल्य और अनुलेपन द्वारा उनकी तुष्टि होती है।
श्लोक 30 (skanda.5.176.30)
प्रीतास्तेऽपि भवन्त्यत्र रुद्रा राजन्न संशयः । जपेन पापसंशुद्धिर्ध्यानेनानन्त्यमश्नुते
prītāste'pi bhavantyatra rudrā rājanna saṁśayaḥ | japena pāpasaṁśuddhirdhyānenānantyamaśnute
हे राजन्! वे रुद्र भी यहाँ प्रसन्न होते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं; जप से पाप की शुद्धि होती है, ध्यान से अनन्तता प्राप्त होती है,
श्लोक 31 (skanda.5.176.31)
दानेन भोगानाप्नोति इत्येवं शङ्करोऽब्रवीत् । पर्वतात्पश्चिमे देशे स्वयं देवो महेश्वरः । स्थितः प्रणवरूपोऽसौ जगदादिः सनातनः
dānena bhogānāpnoti ityevaṁ śaṅkaro'bravīt | parvatātpaścime deśe svayaṁ devo maheśvaraḥ | sthitaḥ praṇavarūpo'sau jagadādiḥ sanātanaḥ
और दान से भोगों की प्राप्ति होती है — ऐसा शंकर ने कहा था। पर्वत के पश्चिम भाग में स्वयं देव महेश्वर प्रणवरूप में, जगत् के सनातन आदि-कारण के रूप में स्थित हैं।
श्लोक 32 (skanda.5.176.32)
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । पितृकार्यं प्रकुर्वीत विधिदृष्टेन कर्मणा
tatra snātvā śucirbhūtvā brahmacārī jitendriyaḥ | pitṛkāryaṁ prakurvīta vidhidṛṣṭena karmaṇā
वहाँ स्नान करके, शुद्ध होकर, ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय होकर विधिविहित कर्म से पितृकार्य करना चाहिए।
श्लोक 33 (skanda.5.176.33)
तिलोदकेन तत्रैव तर्पयेत्पितृदेवताः । आ सप्तमं कुलं तस्य स्वर्गे मोदति पाण्डव
tilodakena tatraiva tarpayetpitṛdevatāḥ | ā saptamaṁ kulaṁ tasya svarge modati pāṇḍava
वहीं तिल-जल से पितरों तथा देवताओं का तर्पण करना चाहिए; हे पाण्डव! उससे उसके सात पीढ़ी तक के पूर्वज स्वर्ग में आनन्दित होते हैं।
श्लोक 34 (skanda.5.176.34)
आत्मना सह भोगांश्च विविधान् लभते सुखी । षष्टिवर्षसहस्राणि क्रीडते सुरपूजितः
ātmanā saha bhogāṁśca vividhān labhate sukhī | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi krīḍate surapūjitaḥ
वह सुखी होकर स्वयं के साथ विविध भोगों को प्राप्त करता है; वह साठ हज़ार वर्षों तक देवताओं द्वारा पूजित होकर क्रीड़ा करता है।
श्लोक 35 (skanda.5.176.35)
मोदते सुचिरं कालं पितृपूजाफलधितः । ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो जायते विमले कुले
modate suciraṁ kālaṁ pitṛpūjāphaladhitaḥ | tataḥ svargātparibhraṣṭo jāyate vimale kule
वह पितृ-पूजा के फल का आश्रय लेकर दीर्घकाल तक आनन्दित रहता है; तत्पश्चात् स्वर्ग से च्युत होकर वह निर्मल कुल में जन्म लेता है।
श्लोक 36 (skanda.5.176.36)
धनवान्दानशीलश्च नीरोगो लोकपूजितः । पुनः स्मरति तत्तीर्थं गमनं कुरुते पुनः
dhanavāndānaśīlaśca nīrogo lokapūjitaḥ | punaḥ smarati tattīrthaṁ gamanaṁ kurute punaḥ
वह धनवान्, दानशील, नीरोग तथा लोकपूजित होता है; वह पुनः उस तीर्थ का स्मरण करता है और पुनः वहाँ यात्रा करता है।
श्लोक 37 (skanda.5.176.37)
द्वितीये जन्मनि भवेद्ध्रदस्यानुचरोत्कटः । तथैव ब्रह्मचर्येण सोपवासो जितेन्द्रियः
dvitīye janmani bhaveddhradasyānucarotkaṭaḥ | tathaiva brahmacaryeṇa sopavāso jitendriyaḥ
दूसरे जन्म में वह उस ह्रद का प्रमुख अनुचर बनता है, और उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, उपवास तथा जितेन्द्रियता से रहता है।
श्लोक 38 (skanda.5.176.38)
सर्वहिंसानिवृत्तस्तु लभते फलमुत्तमम् । एवं धर्मसमाचारो यस्तु प्राणान्परित्यजेत्
sarvahiṁsānivṛttastu labhate phalamuttamam | evaṁ dharmasamācāro yastu prāṇānparityajet
समस्त हिंसा से निवृत्त होकर वह उत्तम फल प्राप्त करता है। इस प्रकार जो धर्माचरण करता हुआ वहाँ प्राण त्यागता है,
श्लोक 39 (skanda.5.176.39)
तस्य पुण्यफलं यद्वै तन्निबोध नराधिप । शतं वर्षसहस्राणि स्वर्गे मोदति पाण्डव
tasya puṇyaphalaṁ yadvai tannibodha narādhipa | śataṁ varṣasahasrāṇi svarge modati pāṇḍava
हे नराधिप! उसके पुण्य-फल को जानो; हे पाण्डव! वह एक लाख वर्षों तक स्वर्ग में आनन्दित रहता है।
श्लोक 40 (skanda.5.176.40)
अप्सरोगणसंकीर्णे दिव्यशब्दानुनादिते । दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गो दिव्यालङ्कारभूषितः
apsarogaṇasaṁkīrṇe divyaśabdānunādite | divyagandhānuliptāṅgo divyālaṅkārabhūṣitaḥ
अप्सराओं के समूहों से भरे, दिव्य ध्वनियों से गूँजते हुए स्वर्ग में, दिव्य सुगन्ध से लिप्त शरीर वाला, दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर,
श्लोक 41 (skanda.5.176.41)
क्रीडते दैवतैः सार्द्धं सिद्धगन्धर्वसंस्तुतः । ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो राजा भवति वीर्यवान्
krīḍate daivataiḥ sārddhaṁ siddhagandharvasaṁstutaḥ | tataḥ svargātparibhraṣṭo rājā bhavati vīryavān
वह देवताओं के साथ क्रीड़ा करता है, सिद्धों और गन्धर्वों द्वारा स्तुत होता है; तत्पश्चात् स्वर्ग से च्युत होकर वह पराक्रमी राजा बनता है,
श्लोक 42 (skanda.5.176.42)
हस्त्यश्वरथयानैश्च धर्मज्ञः शास्त्रतत्परः । गृहे स्तम्भशताकीर्णे सौवर्णे रजतान्विते
hastyaśvarathayānaiśca dharmajñaḥ śāstratatparaḥ | gṛhe stambhaśatākīrṇe sauvarṇe rajatānvite
हाथी, घोड़े, रथ और वाहनों से युक्त, धर्मज्ञ, शास्त्रों में तत्पर, सौ खम्भों से भरे, स्वर्ण-रजत से युक्त भवन में निवास करता है,
श्लोक 43 (skanda.5.176.43)
सप्ताष्टभूमिसुद्वारे दासीदाससमाकुले । मत्तमातङ्गनिःश्वासैर्वाजिहेषितनादितैः
saptāṣṭabhūmisudvāre dāsīdāsasamākule | mattamātaṅganiḥśvāsairvājiheṣitanāditaiḥ
सात-आठ मंजिलों वाले, सुन्दर द्वारों वाले, दास-दासियों से भरे, मतवाले हाथियों की साँसों तथा घोड़ों की हिनहिनाहट से गूँजते हुए,
श्लोक 44 (skanda.5.176.44)
क्षुभ्यते तस्य तद्द्वारमिन्द्रस्य भुवनं यथा । राजराजेश्वरः श्रीमान्सर्वस्त्रीजनवल्लभः
kṣubhyate tasya taddvāramindrasya bhuvanaṁ yathā | rājarājeśvaraḥ śrīmānsarvastrījanavallabhaḥ
जिसका वह द्वार इन्द्र के भवन के समान चहल-पहल से भरा रहता है; वह राजराजेश्वर, श्रीमान्, समस्त स्त्रियों द्वारा प्रिय बनता है।
श्लोक 45 (skanda.5.176.45)
तस्मिन्गृहे वसित्वा तु क्रीडाभोगसमन्वितः । जीवेद्वर्षशतं साग्रं सर्वव्याधिविवर्जितः
tasmingṛhe vasitvā tu krīḍābhogasamanvitaḥ | jīvedvarṣaśataṁ sāgraṁ sarvavyādhivivarjitaḥ
उस भवन में निवास करते हुए, क्रीड़ा और भोग से युक्त होकर, वह सौ वर्षों से भी अधिक समय तक समस्त व्याधियों से रहित जीवित रहता है।
श्लोक 46 (skanda.5.176.46)
एवं तेषां भवेत्सर्वं ये मृता ह्यमरेश्वरे । अग्निप्रवेशं यः कुर्याद्भक्त्या ह्यमरकण्टके
evaṁ teṣāṁ bhavetsarvaṁ ye mṛtā hyamareśvare | agnipraveśaṁ yaḥ kuryādbhaktyā hyamarakaṇṭake
अमरेश्वर में मरने वाले सभी को ऐसा ही सब प्राप्त होता है। जो भक्तिपूर्वक अमरकण्टक में अग्नि-प्रवेश करता है,
श्लोक 47 (skanda.5.176.47)
स मृतः स्वर्गमाप्नोति यास्यते परमां गतिम् । स्नानं दानं जपो होमः शुभं वा यदि वाशुभम्
sa mṛtaḥ svargamāpnoti yāsyate paramāṁ gatim | snānaṁ dānaṁ japo homaḥ śubhaṁ vā yadi vāśubham
वह मरणोपरान्त स्वर्ग प्राप्त करता है, परम गति को प्राप्त होता है। स्नान, दान, जप, होम — शुभ हो या अशुभ —
श्लोक 48 (skanda.5.176.48)
पुराणे श्रूयते राजन्सर्वं कोटिगुणं भवेत् । तस्यास्तीरे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्यये
purāṇe śrūyate rājansarvaṁ koṭiguṇaṁ bhavet | tasyāstīre tu ye vṛkṣāḥ patitāḥ kālaparyaye
पुराण में सुना जाता है, हे राजन्! कि यहाँ सब कुछ करोड़ों गुना हो जाता है। उसके तट पर जो वृक्ष काल के प्रभाव से गिर जाते हैं,
श्लोक 49 (skanda.5.176.49)
नर्मदातोयसंस्पृष्टास्ते यान्ति परमां गतिम् । अनिवृत्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा
narmadātoyasaṁspṛṣṭāste yānti paramāṁ gatim | anivṛttikā gatistasya pavanasyāmbare yathā
नर्मदा के जल से स्पृष्ट होकर वे परम गति को प्राप्त होते हैं; उनकी गति अनिवर्तक होती है, जैसे आकाश में वायु की।
श्लोक 50 (skanda.5.176.50)
पतनं कुरुते यस्तु तस्मिंस्तीर्थे नराधिप । कन्यास्त्रीणि सहस्राणि पाताले भोगभागिनः
patanaṁ kurute yastu tasmiṁstīrthe narādhipa | kanyāstrīṇi sahasrāṇi pātāle bhogabhāginaḥ
हे नराधिप! जो उस तीर्थ में गिरकर प्राण त्यागता है, तीन हज़ार कन्याएँ पाताल में उसकी सेवा में,
श्लोक 51 (skanda.5.176.51)
तिष्ठन्ति भवने तस्य प्रेषणे प्रार्थयन्ति च । दिव्यभोगैः सुसम्पन्नः क्रीडते कालम्
tiṣṭhanti bhavane tasya preṣaṇe prārthayanti ca | divyabhogaiḥ susampannaḥ krīḍate kālam
उसके भवन में उपस्थित रहती हैं और उसकी आज्ञा माँगती हैं; दिव्य भोगों से सुसम्पन्न होकर वह दीर्घकाल तक क्रीड़ा करता है।
श्लोक 52 (skanda.5.176.52)
पृथिव्यां ह्यासमुद्रायां तादृशो नैव जायते । यादृशोऽयं नरश्रेष्ठ पर्वतोऽमरकण्टकः
pṛthivyāṁ hyāsamudrāyāṁ tādṛśo naiva jāyate | yādṛśo'yaṁ naraśreṣṭha parvato'marakaṇṭakaḥ
समुद्रपर्यन्त पृथ्वी पर इसके समान अन्य कोई पर्वत उत्पन्न नहीं हुआ; हे नरश्रेष्ठ! ऐसा ही यह अमरकण्टक पर्वत है।
श्लोक 53 (skanda.5.176.53)
तत्र तीर्थं तु विज्ञेयं पर्वतस्यानु पश्चिमे । ह्रदो जालेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः
tatra tīrthaṁ tu vijñeyaṁ parvatasyānu paścime | hrado jāleśvaro nāma triṣu lokeṣu viśrutaḥ
वहाँ पर्वत के पश्चिम भाग में एक तीर्थ जानना चाहिए — जालेश्वर नामक वह ह्रद तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 54 (skanda.5.176.54)
तत्र पिण्डप्रदानेन सन्ध्योपासनकेन तु । पितरो द्वादशाब्दानि तर्पितास्तु भवन्ति वै
tatra piṇḍapradānena sandhyopāsanakena tu | pitaro dvādaśābdāni tarpitāstu bhavanti vai
वहाँ पिण्डदान तथा सन्ध्या-उपासना करने से पितर बारह वर्षों तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 55 (skanda.5.176.55)
दक्षिणे नर्मदातीरे कपिला तु महानदी । सरलार्जुनसंछन्ना खदिरैरुपशोभिता
dakṣiṇe narmadātīre kapilā tu mahānadī | saralārjunasaṁchannā khadirairupaśobhitā
नर्मदा के दक्षिण तट पर कपिला नामक महानदी है, जो सरल और अर्जुन वृक्षों से आच्छादित तथा खदिर वृक्षों से सुशोभित है,
श्लोक 56 (skanda.5.176.56)
माधवीसल्लकीभिश्च वल्लीभिश्चाप्यलंकृता । श्वापदैर्गर्जमानैश्च गोमायुवानरादिभिः
mādhavīsallakībhiśca vallībhiścāpyalaṁkṛtā | śvāpadairgarjamānaiśca gomāyuvānarādibhiḥ
माधवी और सल्लकी लताओं से भी अलंकृत, गर्जना करते हिंसक पशुओं, गीदड़ों, वानरों आदि से,
श्लोक 57 (skanda.5.176.57)
पक्षिजातिविशेषैश्च नित्यं प्रमुदिता नृप । साग्रं कोटिशतं तत्र ऋषीणामिति शुश्रुम
pakṣijātiviśeṣaiśca nityaṁ pramuditā nṛpa | sāgraṁ koṭiśataṁ tatra ṛṣīṇāmiti śuśruma
तथा विशेष पक्षी-जातियों से सदा हर्षित रहती है, हे राजन्! वहाँ हमने सुना है कि दस अरब से भी अधिक ऋषियों ने,
श्लोक 58 (skanda.5.176.58)
तपस्तप्त्वा गतं मोक्षं येषां जन्म न चागमः । येन तत्र तपस्तप्तं कपिलेन महात्मना
tapastaptvā gataṁ mokṣaṁ yeṣāṁ janma na cāgamaḥ | yena tatra tapastaptaṁ kapilena mahātmanā
तप करके मोक्ष प्राप्त किया, जिन्हें पुनः जन्म नहीं लेना पड़ा। जिन महात्मा कपिल ने वहाँ तप किया था,
श्लोक 59 (skanda.5.176.59)
तत्र तच्चाभवत्तीर्थं पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । येन सा कापिलैस्तात सेविता ऋषिभिः पुरा
tatra taccābhavattīrthaṁ puṇyaṁ siddhaniṣevitam | yena sā kāpilaistāta sevitā ṛṣibhiḥ purā
वहीं वह पुण्यमय, सिद्धों से सेवित तीर्थ बना। हे तात! चूँकि वह पहले कापिल ऋषियों द्वारा सेवित था,
श्लोक 60 (skanda.5.176.60)
तेन सा कपिला नाम गीता पापक्षयंकरी । तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानाममरेश्वरे
tena sā kapilā nāma gītā pāpakṣayaṁkarī | tatra koṭiśataṁ sāgraṁ tīrthānāmamareśvare
इसीलिए वह 'कपिला' नाम से कही गई, जो पापों का नाश करने वाली है। वहाँ अमरेश्वर में दस अरब से भी अधिक तीर्थ हैं;
श्लोक 61 (skanda.5.176.61)
अहोरात्रोषितो भूत्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । दानं च विधिवद्दत्त्वा यथाशक्त्या द्विजोत्तमे
ahorātroṣito bhūtvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ | dānaṁ ca vidhivaddattvā yathāśaktyā dvijottame
वहाँ दिन-रात उपवास करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; और अपनी शक्ति के अनुसार किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को विधिपूर्वक दान देकर,
श्लोक 62 (skanda.5.176.62)
ईश्वरानुग्रहात्सर्वं तत्र कोटिगुणं भवेत् । यस्मादनक्षरं रूपं प्रणवस्येह भारत
īśvarānugrahātsarvaṁ tatra koṭiguṇaṁ bhavet | yasmādanakṣaraṁ rūpaṁ praṇavasyeha bhārata
ईश्वर की कृपा से वहाँ सब कुछ करोड़ गुना हो जाता है। हे भारत! चूँकि यहाँ प्रणव का निराकार रूप है,
श्लोक 63 (skanda.5.176.63)
शिवस्वरूपस्य ततः कृतमात्राक्षरं भवेत् । तिर्यञ्चः पशवश्चैव वृक्षा गुल्मलतादयः
śivasvarūpasya tataḥ kṛtamātrākṣaraṁ bhavet | tiryañcaḥ paśavaścaiva vṛkṣā gulmalatādayaḥ
जो शिव के स्वरूप का ही है, इसलिए वह साकार अक्षर रूप बन जाता है। पशु-पक्षी, वृक्ष, गुल्म-लताएँ आदि —
श्लोक 64 (skanda.5.176.64)
तेऽपि तत्र क्षयं याताः स्वर्गं यान्ति न संशयः । विशल्या तत्र या प्रोक्ता तत्रैव तु महानदी
te'pi tatra kṣayaṁ yātāḥ svargaṁ yānti na saṁśayaḥ | viśalyā tatra yā proktā tatraiva tu mahānadī
वे भी वहाँ मृत्यु प्राप्त करके स्वर्ग को जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। वहाँ जो विशल्या नामक महानदी कही गई है,
श्लोक 65 (skanda.5.176.65)
स्नात्वा दत्त्वा यथान्यायं तत्रापि सुकृती भवेत् । तत्र देवगणाः सर्वे सकिन्नरमहोरगाः
snātvā dattvā yathānyāyaṁ tatrāpi sukṛtī bhavet | tatra devagaṇāḥ sarve sakinnaramahoragāḥ
वहाँ भी विधिपूर्वक स्नान-दान करने से मनुष्य पुण्यशाली बनता है। वहाँ समस्त देवगण, किन्नर, महानागों सहित,
श्लोक 66 (skanda.5.176.66)
यक्षराक्षसगन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । सर्वे समागतास्तां वै पश्यन्ति ह्यमरेश्वरे
yakṣarākṣasagandharvā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | sarve samāgatāstāṁ vai paśyanti hyamareśvare
यक्ष, राक्षस, गन्धर्व तथा तपोधन ऋषिगण — सभी एकत्र होकर अमरेश्वर में उसके दर्शन करते हैं।
श्लोक 67 (skanda.5.176.67)
तैश्च सर्वैः समागम्य वन्दितौ तौ शुभौ कटौ । पुरा युगे महाघोरे सर्वलोकभयंकरे
taiśca sarvaiḥ samāgamya vanditau tau śubhau kaṭau | purā yuge mahāghore sarvalokabhayaṁkare
उन सबके साथ मिलकर उन दोनों शुभ नदियों की वन्दना की गई। पूर्वकाल में, सम्पूर्ण लोकों को भयभीत करने वाले घोर युग में,
श्लोक 68 (skanda.5.176.68)
नर्मदायाः सुतस्तत्र सशल्यो विशलीकृतः । सर्वदेवैश्च ऋषिभिर्विशल्या तेन सा स्मृता
narmadāyāḥ sutastatra saśalyo viśalīkṛtaḥ | sarvadevaiśca ṛṣibhirviśalyā tena sā smṛtā
नर्मदा का शल्ययुक्त पुत्र वहीं विशल्य बनाया गया; इसीलिए समस्त देवताओं और ऋषियों द्वारा वह 'विशल्या' कही गई।
श्लोक 69 (skanda.5.176.69)
युधिष्ठिर उवाच। उत्पन्ना तु कथं तात विशल्या कपिला कथम् । कथं वा नर्मदापुत्रः शल्ययुक्तोऽभवन्मुने
yudhiṣṭhira uvāca| utpannā tu kathaṁ tāta viśalyā kapilā katham | kathaṁ vā narmadāputraḥ śalyayukto'bhavanmune
युधिष्ठिर बोले — हे तात! विशल्या और कपिला किस प्रकार उत्पन्न हुईं? और हे मुने! नर्मदा का पुत्र किस प्रकार शल्ययुक्त हुआ?
श्लोक 70 (skanda.5.176.70)
आश्चर्यभूतं लोकस्य श्रोतुमिच्छामि सुव्रत
āścaryabhūtaṁ lokasya śrotumicchāmi suvrata
यह लोक के लिए आश्चर्यजनक कथा है, हे सुव्रत! मैं इसे सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 71 (skanda.5.176.71)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। पुरा दाक्षायणी नाम सहिता शूलपाणिना । क्रीडित्वा नर्मदातोये परया च मुदा नृप
śrīmārkaṇḍeya uvāca| purā dākṣāyaṇī nāma sahitā śūlapāṇinā | krīḍitvā narmadātoye parayā ca mudā nṛpa
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे राजन्! पूर्वकाल में दाक्षायणी शूलपाणि के साथ नर्मदा के जल में परम आनन्द से क्रीड़ा करके,
श्लोक 72 (skanda.5.176.72)
जलादुत्तीर्य सहसा वस्त्रमन्यत्समाहरत् । देव्यास्तु स्नानवस्त्रं तत्पीडितं लीलया नृप
jalāduttīrya sahasā vastramanyatsamāharat | devyāstu snānavastraṁ tatpīḍitaṁ līlayā nṛpa
जल से बाहर निकलकर तुरन्त दूसरा वस्त्र धारण किया। हे राजन्! देवी के उस स्नान-वस्त्र को लीलापूर्वक निचोड़ा गया,
श्लोक 73 (skanda.5.176.73)
सहितानुचरीभिस्तु इन्द्रायुधनिभं भृशम् । तस्मिन्निष्पीड्यमाने तु वारि यन्निःसृतं तदा
sahitānucarībhistu indrāyudhanibhaṁ bhṛśam | tasminniṣpīḍyamāne tu vāri yanniḥsṛtaṁ tadā
अनुचरियों सहित, इन्द्रधनुष के समान अत्यन्त तेजस्वी उस वस्त्र को; उसे निचोड़ने पर उससे जो जल निकला,
श्लोक 74 (skanda.5.176.74)
तस्मादियं सरिज्जज्ञे कपिलाख्या महानदी । संयोगादङ्गरागस्य वस्त्रोद्यत्कपिलं जलम्
tasmādiyaṁ sarijjajñe kapilākhyā mahānadī | saṁyogādaṅgarāgasya vastrodyatkapilaṁ jalam
उसी से यह कपिला नामक महानदी उत्पन्न हुई। अंगराग के संयोग से वस्त्र से निकला वह जल कपिल वर्ण का हो गया,
श्लोक 75 (skanda.5.176.75)
गलितं तेन कपिला वर्णतो नामतोऽभवत् । तथा गन्धरसैर्युक्तं नानापुष्पैस्तु वासितम्
galitaṁ tena kapilā varṇato nāmato'bhavat | tathā gandharasairyuktaṁ nānāpuṣpaistu vāsitam
उस प्रकार बहकर वह वर्ण के कारण 'कपिला' नाम से प्रसिद्ध हुई। वह गन्ध-रस से युक्त तथा नाना पुष्पों से सुवासित भी थी,
श्लोक 76 (skanda.5.176.76)
नानावर्णारुणं शुभ्रं वस्त्राद्यद्वारि निःसृतम् । पीड्यमानं करैः शुभ्रैस्तैस्तु पल्लवकोमलैः
nānāvarṇāruṇaṁ śubhraṁ vastrādyadvāri niḥsṛtam | pīḍyamānaṁ karaiḥ śubhraistaistu pallavakomalaiḥ
नाना वर्णों की अरुण-श्वेत, वस्त्र से निकली वह जलधारा, कोमल पल्लव के समान कोमल उन उज्ज्वल हाथों से निचोड़ी जाती हुई,
श्लोक 77 (skanda.5.176.77)
कपिलं जलमिश्रैस्तु तस्मादेषा सरिद्वरा । कपिला चोच्यते तज्ज्ञैः पुराणार्थविशारदैः
kapilaṁ jalamiśraistu tasmādeṣā saridvarā | kapilā cocyate tajjñaiḥ purāṇārthaviśāradaiḥ
कपिल वर्ण के जल से मिश्रित हो गई; इसीलिए यह श्रेष्ठ नदी पुराणों के अर्थ में निपुण विद्वानों द्वारा 'कपिला' कही जाती है।
श्लोक 78 (skanda.5.176.78)
एषा वै वस्त्रसम्भूता नर्मदातोयसम्भवा । महापुण्यतमा ज्ञेया कपिला सरिदुत्तमा
eṣā vai vastrasambhūtā narmadātoyasambhavā | mahāpuṇyatamā jñeyā kapilā sariduttamā
यह वस्त्र से उत्पन्न, नर्मदा के जल से उद्भूत, महापुण्यमयी कपिला नामक श्रेष्ठ नदी जाननी चाहिए।