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अवन्ती खण्ड · अध्याय 177

विशल्यासम्भव वर्णन

अध्याय 176अध्याय-सूचीअध्याय 178

श्लोक 1 (skanda.5.177.1)

श्री मार्कण्डेय उवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि सा विशल्या ह्यभूद्यथा । आश्चर्यभूता लोकस्य सर्वपापक्षयंकरी

śrī mārkaṇḍeya uvāca| ataḥ paraṁ pravakṣyāmi sā viśalyā hyabhūdyathā | āścaryabhūtā lokasya sarvapāpakṣayaṁkarī

श्रीमार्कण्डेय बोले — अब इसके आगे मैं बताऊँगा कि वह विशल्या नदी किस प्रकार उत्पन्न हुई — जो लोक के लिए आश्चर्यरूप तथा समस्त पापों का क्षय करने वाली है।

श्लोक 2 (skanda.5.177.2)

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो मुख्यो ह्यग्निरजायत । मुख्यो वह्निरितिप्रोक्त ऋषिः परमधार्मिकः

brahmaṇo mānasaḥ putro mukhyo hyagnirajāyata | mukhyo vahniritiprokta ṛṣiḥ paramadhārmikaḥ

ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में मुख्य अग्नि उत्पन्न हुए; 'मुख्य वह्नि' नामक वह ऋषि परम धार्मिक थे।

श्लोक 3 (skanda.5.177.3)

तस्य स्वाहाभवत्पत्नी स्मृता दाक्षायणी तु सा । तस्यां मुख्या महाराज त्रयः पुत्रास्तदाऽभवन्

tasya svāhābhavatpatnī smṛtā dākṣāyaṇī tu sā | tasyāṁ mukhyā mahārāja trayaḥ putrāstadā'bhavan

उनकी पत्नी स्वाहा हुई, जो दक्ष की पुत्री कही जाती है; हे महाराज! उनसे उनके तीन प्रमुख पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 4 (skanda.5.177.4)

अग्निराहवनीयस्तु दक्षिणाग्निस्तथैव च । गार्हपत्यस्तृतीयस्तु त्रैलोक्यं यैश्च धार्यते

agnirāhavanīyastu dakṣiṇāgnistathaiva ca | gārhapatyastṛtīyastu trailokyaṁ yaiśca dhāryate

आहवनीय अग्नि, दक्षिणाग्नि, तथा तीसरे गार्हपत्य अग्नि — इन्हीं से तीनों लोक धारण किए जाते हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.177.5)

तथा वै गार्हपत्योऽग्निर्जज्ञे पुत्रद्वयं शुभम् । पद्मकः शङ्कुनामा च तावुभावग्निसत्तमौ

tathā vai gārhapatyo'gnirjajñe putradvayaṁ śubham | padmakaḥ śaṅkunāmā ca tāvubhāvagnisattamau

गार्हपत्य अग्नि से दो शुभ पुत्र उत्पन्न हुए — पद्मक और शंकु नामक, दोनों ही अग्नियों में श्रेष्ठ।

श्लोक 6 (skanda.5.177.6)

वसन्नग्निर्नदीतीरे समाश्रित्य महत्तपः । रुद्रमाराधयामास जितात्मा सुसमाहितः

vasannagnirnadītīre samāśritya mahattapaḥ | rudramārādhayāmāsa jitātmā susamāhitaḥ

नदी के तट पर निवास करते हुए महान् तप का आश्रय लेकर, जितात्मा और सुसमाहित होकर उसने रुद्र की आराधना की।

श्लोक 7 (skanda.5.177.7)

दशवर्षसहस्राणि चचार विपुलं तपः । तमुवाच महादेवः प्रसन्नो वृषभध्वजः

daśavarṣasahasrāṇi cacāra vipulaṁ tapaḥ | tamuvāca mahādevaḥ prasanno vṛṣabhadhvajaḥ

दस हज़ार वर्षों तक उसने विपुल तप किया; तब प्रसन्न होकर वृषभध्वज महादेव ने उससे कहा —

श्लोक 8 (skanda.5.177.8)

भोभो ब्रूहि महाभाग यत्ते मनसि वर्तते । दाता ह्यहमसंदेहो यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

bhobho brūhi mahābhāga yatte manasi vartate | dātā hyahamasaṁdeho yadyapi syātsudurlabham

'हे महाभाग! कहो, तुम्हारे मन में क्या है। मैं निश्चय ही देने वाला हूँ, चाहे वह कितनी भी दुर्लभ वस्तु क्यों न हो।'

श्लोक 9 (skanda.5.177.9)

अग्निरुवाच - नर्मदेयं महाभागा सरितो याश्च षोडश । भवन्तु मम पत्न्यस्तास्त्वत्प्रसादान्महेश्वर

agniruvāca - narmadeyaṁ mahābhāgā sarito yāśca ṣoḍaśa | bhavantu mama patnyastāstvatprasādānmaheśvara

अग्नि बोले — 'हे महेश्वर! यह महाभागा नर्मदा तथा अन्य सोलह नदियाँ, आपकी कृपा से मेरी पत्नियाँ बनें।'

श्लोक 10 (skanda.5.177.10)

तासु वै चिन्तितान् पुत्रानग्र्यानुत्पादयाम्यहम् । एष एव वरो देव दीयतां मे महेश्वर

tāsu vai cintitān putrānagryānutpādayāmyaham | eṣa eva varo deva dīyatāṁ me maheśvara

'उनमें मैं जिन श्रेष्ठ पुत्रों की कामना करता हूँ, उन्हें उत्पन्न करूँगा — हे महेश्वर! यही मेरा वर है, यह मुझे प्रदान कीजिए।'

श्लोक 11 (skanda.5.177.11)

ईश्वर उवाच। एतास्तु धिष्णिनाम्न्यो वै भविष्यन्ति सरिद्वराः । पत्न्यस्तव विशालाक्ष्यो वेदे ख्याता न संशयः

īśvara uvāca| etāstu dhiṣṇināmnyo vai bhaviṣyanti saridvarāḥ | patnyastava viśālākṣyo vede khyātā na saṁśayaḥ

ईश्वर बोले — 'ये विशालाक्षी श्रेष्ठ नदियाँ, जो वेद में प्रसिद्ध हैं, निःसंदेह तुम्हारी पत्नियाँ बनेंगी और धिष्णी नाम से जानी जाएँगी।'

श्लोक 12 (skanda.5.177.12)

तासां पुत्रा भविष्यन्ति ह्यग्नयो येऽध्वरे स्मृताः । धिष्ण्यानाम सुविख्याता यावदाभूतसम्प्लवम्

tāsāṁ putrā bhaviṣyanti hyagnayo ye'dhvare smṛtāḥ | dhiṣṇyānāma suvikhyātā yāvadābhūtasamplavam

'यज्ञ में स्मरण की जाने वाली अग्नियाँ ही इनके पुत्र होंगी, जो प्रलयकाल तक धिष्ण्य नाम से सुविख्यात रहेंगी।'

श्लोक 13 (skanda.5.177.13)

एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत । नर्मदा च सरिच्छ्रेष्ठा तस्य भार्या बभूव ह

evamuktvā mahādevastatraivāntaradhīyata | narmadā ca saricchreṣṭhā tasya bhāryā babhūva ha

ऐसा कहकर महादेव वहीं अन्तर्धान हो गए; और नदियों में श्रेष्ठ नर्मदा उनकी पत्नी बनी।

श्लोक 14 (skanda.5.177.14)

कावेरी कृष्णवेणी च रेवा च यमुना तथा । गोदावरी वितस्ता च चन्द्रभागा इरावती

kāverī kṛṣṇaveṇī ca revā ca yamunā tathā | godāvarī vitastā ca candrabhāgā irāvatī

कावेरी, कृष्णवेणी, रेवा तथा यमुना; गोदावरी, वितस्ता, चन्द्रभागा तथा इरावती;

श्लोक 15 (skanda.5.177.15)

विपाशा कौशिकी चैव सरयूः शतरुद्रिका । शिप्रा सरस्वती चैव ह्रादिनी पावनी तथा

vipāśā kauśikī caiva sarayūḥ śatarudrikā | śiprā sarasvatī caiva hrādinī pāvanī tathā

विपाशा तथा कौशिकी; सरयू तथा शतरुद्रिका; शिप्रा तथा सरस्वती; तथा ह्रादिनी और पावनी —

श्लोक 16 (skanda.5.177.16)

एताः षोडशा नद्यो वै भार्यार्थं संव्यवस्थिताः । तदात्मानं विभज्याशु धिष्णीषु स महाद्युतिः

etāḥ ṣoḍaśā nadyo vai bhāryārthaṁ saṁvyavasthitāḥ | tadātmānaṁ vibhajyāśu dhiṣṇīṣu sa mahādyutiḥ

ये सोलह नदियाँ उसकी पत्नियों के रूप में स्थापित हुईं; तब वह महातेजस्वी अग्नि तुरन्त स्वयं को विभाजित करके उन धिष्णियों में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 17 (skanda.5.177.17)

व्यभिचारात्तु भर्तुर्वै नर्मदाद्यासु धिष्णिषु । उत्पन्नाः शुचयः पुत्राः सर्वे ते धिष्ण्यपाः स्मृताः

vyabhicārāttu bharturvai narmadādyāsu dhiṣṇiṣu | utpannāḥ śucayaḥ putrāḥ sarve te dhiṣṇyapāḥ smṛtāḥ

पति के इस प्रकार नर्मदा आदि धिष्णियों में संयुक्त होने से उनसे पवित्र पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी 'धिष्ण्यप' कहलाए।

श्लोक 18 (skanda.5.177.18)

तस्याश्च नर्मदायास्तु धिष्णीन्द्रो नाम विश्रुतः । बभूव पुत्रो बलवान्रूपेणाप्रतिमो नृप

tasyāśca narmadāyāstu dhiṣṇīndro nāma viśrutaḥ | babhūva putro balavānrūpeṇāpratimo nṛpa

हे राजन्! उस नर्मदा से भी 'धिष्णीन्द्र' नाम से विख्यात एक बलवान्, रूप में अनुपम पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 19 (skanda.5.177.19)

ततो देवासुरं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् । मयतारकमित्येवं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्

tato devāsuraṁ yuddhamabhavallomaharṣaṇam | mayatārakamityevaṁ triṣu lokeṣu viśrutam

तत्पश्चात् देवों और असुरों के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध हुआ, जो तीनों लोकों में 'मय-तारक युद्ध' के नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 20 (skanda.5.177.20)

तत्र दैत्यैर्महाघोरैर्मयतारपुरोगमैः । ताडितास्ते सुरास्त्रस्ता विष्णुं वै शरणं ययुः

tatra daityairmahāghorairmayatārapurogamaiḥ | tāḍitāste surāstrastā viṣṇuṁ vai śaraṇaṁ yayuḥ

उसमें मय-तार आदि अत्यन्त भयंकर दैत्यों द्वारा पीटे गए त्रस्त देवगण विष्णु की शरण में गए।

श्लोक 21 (skanda.5.177.21)

त्रायस्व नो हृषीकेशा घोरादस्मान्महाभयात् । दैत्यान्सर्वान्संहरस्व मयतारपुरोगमान्

trāyasva no hṛṣīkeśā ghorādasmānmahābhayāt | daityānsarvānsaṁharasva mayatārapurogamān

'हे हृषीकेश! इस घोर महाभय से हमारी रक्षा कीजिए; मय-तार आदि समस्त दैत्यों का संहार कीजिए।'

श्लोक 22 (skanda.5.177.22)

एवमुक्तः स भगवान्दिशो दश व्यलोकयत् । ततो भगवता दृष्टौ रणे पावकमारुतौ

evamuktaḥ sa bhagavāndiśo daśa vyalokayat | tato bhagavatā dṛṣṭau raṇe pāvakamārutau

ऐसा कहे जाने पर उन भगवान् ने दसों दिशाओं में दृष्टि डाली; तब भगवान् ने युद्ध के लिए उपयुक्त अग्नि और वायु को देखा।

श्लोक 23 (skanda.5.177.23)

आहूतौ विष्णुना तौ तु सकाशं जग्मतुः क्षणात् । स्थितौ तौ प्रणतौ चाग्रे देवदेवस्य धीमतः

āhūtau viṣṇunā tau tu sakāśaṁ jagmatuḥ kṣaṇāt | sthitau tau praṇatau cāgre devadevasya dhīmataḥ

विष्णु द्वारा बुलाए जाने पर वे दोनों क्षणभर में उनके समीप पहुँचे और उस बुद्धिमान् देवाधिदेव के सामने प्रणतमस्तक होकर खड़े हो गए।

श्लोक 24 (skanda.5.177.24)

ततो धिष्णिः पावकेन्द्रो देवेनोक्तो महात्मना । निर्दहेमान्महाघोरान्नार्मदेय महासुरान्

tato dhiṣṇiḥ pāvakendro devenokto mahātmanā | nirdahemānmahāghorānnārmadeya mahāsurān

तब उस महात्मा देव ने अग्निश्रेष्ठ धिष्णि (धिष्णीन्द्र) से कहा — 'हे नार्मदेय! इन अत्यन्त भयंकर महासुरों को भस्म कर दो।'

श्लोक 25 (skanda.5.177.25)

अथैवमुक्तौ तौ देवौ रणे पावकमारुतौ । दैत्यान् ददहतुः सर्वान्मयतारपुरोगमान्

athaivamuktau tau devau raṇe pāvakamārutau | daityān dadahatuḥ sarvānmayatārapurogamān

इस प्रकार आज्ञा पाकर वे अग्नि और वायु देव युद्ध में मय-तार आदि समस्त दैत्यों को भस्म करने लगे।

श्लोक 26 (skanda.5.177.26)

दह्यमानास्तु ते सर्वे शस्त्रैरग्निं त्ववेष्टयन् । दिव्यैरग्न्यर्कसङ्काशैः शतशोऽथ सहस्रशः

dahyamānāstu te sarve śastrairagniṁ tvaveṣṭayan | divyairagnyarkasaṅkāśaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

जलते हुए वे सभी दैत्य सैकड़ों-हज़ारों दिव्य, अग्नि तथा सूर्य के समान तेजस्वी शस्त्रों से अग्नि को घेरने लगे।

श्लोक 27 (skanda.5.177.27)

तांश्चाग्निः शस्त्रनिकरैर्निर्ददाह महासुरान् । ज्वालामालाकुलं सर्वं वायुना निर्मितं तदा

tāṁścāgniḥ śastranikarairnirdadāha mahāsurān | jvālāmālākulaṁ sarvaṁ vāyunā nirmitaṁ tadā

उन शस्त्रों के समूहों सहित उन महासुरों को अग्निदेव ने भस्म कर दिया; तब वायु द्वारा प्रज्वलित सम्पूर्ण वातावरण ज्वाला-मालाओं से व्याप्त हो गया।

श्लोक 28 (skanda.5.177.28)

दह्यमानास्ततो दैत्या अग्निज्वालासमावृताः । प्रविश्य पातालतलं जले लीनाः सहस्रशः

dahyamānāstato daityā agnijvālāsamāvṛtāḥ | praviśya pātālatalaṁ jale līnāḥ sahasraśaḥ

तब जलते हुए, अग्नि की ज्वालाओं से घिरे वे दैत्य पाताल-तल में प्रवेश कर गए, और हज़ारों की संख्या में जल में विलीन हो गए।

श्लोक 29 (skanda.5.177.29)

ततः कुमारमग्निं तु नर्मदापुत्रमव्ययम् । पूजयित्वा सुराः सर्वे जग्मुस्ते त्रिदशालयम्

tataḥ kumāramagniṁ tu narmadāputramavyayam | pūjayitvā surāḥ sarve jagmuste tridaśālayam

तत्पश्चात् नर्मदा के उस अव्यय बालक अग्नि (धिष्णीन्द्र) की पूजा करके समस्त देवगण त्रिदशालय (स्वर्ग) को लौट गए।

श्लोक 30 (skanda.5.177.30)

सशल्यस्तु महातेजा रेवापुत्रो वृतोऽग्निभिः । नर्मदामागतः क्षिप्रं मातरं द्रष्टुमुत्सुकः

saśalyastu mahātejā revāputro vṛto'gnibhiḥ | narmadāmāgataḥ kṣipraṁ mātaraṁ draṣṭumutsukaḥ

किन्तु शस्त्र-शल्यों से युक्त, अग्नियों से घिरा हुआ वह महातेजस्वी रेवा-पुत्र, अपनी माता के दर्शन के लिए उत्सुक होकर शीघ्र ही नर्मदा के पास आया।

श्लोक 31 (skanda.5.177.31)

तं दृष्ट्वा पुत्रमायान्तं शस्त्रौघेण परिक्षतम् । नर्मदा पुण्यसलिला अभ्युत्थाय सुविस्मिता

taṁ dṛṣṭvā putramāyāntaṁ śastraugheṇa parikṣatam | narmadā puṇyasalilā abhyutthāya suvismitā

शस्त्रों के प्रहारों से घायल अपने पुत्र को आता देखकर पुण्यसलिला नर्मदा अत्यन्त विस्मित होकर उठ खड़ी हुई,

श्लोक 32 (skanda.5.177.32)

पर्यष्वजत बाहुभ्यां प्रस्नवापीडितस्तनी । सशल्यं पुत्रमादाय कापिलं ह्रदमाविशत्

paryaṣvajata bāhubhyāṁ prasnavāpīḍitastanī | saśalyaṁ putramādāya kāpilaṁ hradamāviśat

और स्तनों से दूध टपकाती हुई उसने उसे दोनों भुजाओं से आलिंगन किया; शल्ययुक्त पुत्र को लेकर वह कापिल ह्रद में प्रविष्ट हुई।

श्लोक 33 (skanda.5.177.33)

प्रविष्टमात्रे तु ह्रदे कापिले पापनाशिनि । सशल्यं तं विशल्यं च क्षणात्कृतवती तदा

praviṣṭamātre tu hrade kāpile pāpanāśini | saśalyaṁ taṁ viśalyaṁ ca kṣaṇātkṛtavatī tadā

उस पापनाशक कापिल ह्रद में प्रवेश करते ही, उसने शल्ययुक्त उस पुत्र को क्षणभर में शल्यरहित (विशल्य) कर दिया।

श्लोक 34 (skanda.5.177.34)

स विशल्योऽभवद्यस्मात्प्राप्य तस्याः शिवं जलम् । कपिला नामतस्तेन विशल्या चोच्यते बुधैः

sa viśalyo'bhavadyasmātprāpya tasyāḥ śivaṁ jalam | kapilā nāmatastena viśalyā cocyate budhaiḥ

चूँकि उसकी उस शिव-जल को प्राप्त करके वह विशल्य बना, इसीलिए विद्वान उस स्थान को 'कपिला' तथा 'विशल्या' दोनों नामों से पुकारते हैं।

श्लोक 35 (skanda.5.177.35)

अन्येऽपि तत्र ये स्नाताः शुचयस्तु समाहिताः । पापशल्यैः प्रमुच्यन्ते मृता यान्ति सुरालयम्

anye'pi tatra ye snātāḥ śucayastu samāhitāḥ | pāpaśalyaiḥ pramucyante mṛtā yānti surālayam

वहाँ स्नान करने वाले अन्य शुचि तथा समाहित-चित्त मनुष्य भी पाप-शल्यों से मुक्त होकर, मरने के बाद देवलोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 36 (skanda.5.177.36)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं पुरा त्वया । उत्पत्तिकारणं तात विशल्याया नरेश्वर

etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'haṁ purā tvayā | utpattikāraṇaṁ tāta viśalyāyā nareśvara

हे तात, हे नरेश्वर! तुमने पूर्वकाल में जो विशल्या की उत्पत्ति का कारण पूछा था, वह यह सब तुम्हें बता दिया गया।

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