अवन्ती खण्ड · अध्याय 178
विशल्यासङ्गम माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.178.1)
मार्कण्डेय उवाच। तत्रैव सङ्गमे राजन्भक्त्या परमया नृप । प्राणांस्त्यजन्ति ये मर्त्यास्ते यान्ति परमां गतिम्
mārkaṇḍeya uvāca| tatraiva saṅgame rājanbhaktyā paramayā nṛpa | prāṇāṁstyajanti ye martyāste yānti paramāṁ gatim
मार्कण्डेय बोले — हे राजन्! उसी संगम में जो मनुष्य परम भक्ति से प्राण त्यागते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 2 (skanda.5.178.2)
संन्यस्तसर्वसंकल्पो यस्तु प्राणान्परित्यजेत् । अमरेश्वरमासाद्य स स्वर्गे नियतं वसेत्
saṁnyastasarvasaṁkalpo yastu prāṇānparityajet | amareśvaramāsādya sa svarge niyataṁ vaset
जो मनुष्य समस्त संकल्पों का त्याग करके प्राण त्यागता है, वह अमरेश्वर को प्राप्त करके निश्चित रूप से स्वर्ग में निवास करता है।
श्लोक 3 (skanda.5.178.3)
शैलेन्द्रं यः समासाद्य आत्मानं मुञ्चते नरः । विमानेनार्कवर्णेन स गच्छेदमरावतीम्
śailendraṁ yaḥ samāsādya ātmānaṁ muñcate naraḥ | vimānenārkavarṇena sa gacchedamarāvatīm
जो मनुष्य उस पर्वतराज पर पहुँचकर अपने शरीर को त्याग देता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी विमान में बैठकर अमरावती को जाता है।
श्लोक 4 (skanda.5.178.4)
नरं पतन्तमालोक्य नगादमरकण्टकात् । ब्रुवन्त्यप्सरसः सर्वा मम भर्ता भवेदिति
naraṁ patantamālokya nagādamarakaṇṭakāt | bruvantyapsarasaḥ sarvā mama bhartā bhavediti
अमरकण्टक पर्वत से गिरते हुए मनुष्य को देखकर सभी अप्सराएँ कहती हैं — 'यह मेरा पति बने!'
श्लोक 5 (skanda.5.178.5)
समं जलं धर्मविदो वदन्ति सारस्वतं गाङ्गमिति प्रबुद्धाः । तस्योपरिष्टात्प्रवदन्ति तज्ज्ञा रेवाजलं नात्र विचारणास्ति
samaṁ jalaṁ dharmavido vadanti sārasvataṁ gāṅgamiti prabuddhāḥ | tasyopariṣṭātpravadanti tajjñā revājalaṁ nātra vicāraṇāsti
धर्मज्ञ और प्रबुद्ध लोग सरस्वती और गंगा के जल को समान बताते हैं; परन्तु तत्त्वज्ञ लोग कहते हैं कि रेवा का जल उससे भी बढ़कर है — इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक 6 (skanda.5.178.6)
अनेकविद्याधरकिन्नराद्यैरध्यासितं पुण्यतमाधिवासैः । रेवाजलं धारयतो हि मूर्ध्ना स्थानं सुरेन्द्राधिपतेः समीपे
anekavidyādharakinnarādyairadhyāsitaṁ puṇyatamādhivāsaiḥ | revājalaṁ dhārayato hi mūrdhnā sthānaṁ surendrādhipateḥ samīpe
अनेक विद्याधर, किन्नर आदि पवित्रतम निवासों में वहाँ निवास करते हैं; जो अपने सिर पर रेवा-जल धारण करता है, उसे सुरेन्द्र के समीप स्थान प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (skanda.5.178.7)
नर्मदा सर्वदा सेव्या बहुनोक्तेन किं नृप । यदीच्छेन्न पुनर्द्रष्टुं घोरं संसारसागरम्
narmadā sarvadā sevyā bahunoktena kiṁ nṛpa | yadīcchenna punardraṣṭuṁ ghoraṁ saṁsārasāgaram
नर्मदा का सदा सेवन करना चाहिए, हे राजन्! अधिक कहने से क्या लाभ — यदि इस भयंकर संसार-सागर को फिर कभी न देखने की इच्छा हो, तो।
श्लोक 8 (skanda.5.178.8)
त्रयाणामपि लोकानां महती पावनी स्मृता । यत्र तत्र मृतस्यापि ध्रुवं गाणेश्वरी गतिः
trayāṇāmapi lokānāṁ mahatī pāvanī smṛtā | yatra tatra mṛtasyāpi dhruvaṁ gāṇeśvarī gatiḥ
वह तीनों लोकों की महान् पावनी मानी गई है; जहाँ कहीं भी मृत्यु हो, वहाँ निश्चय ही गणेश्वर (शिवगणों) की गति प्राप्त होती है।
श्लोक 9 (skanda.5.178.9)
अनेकयज्ञायतनैर्वृताङ्गी न ह्यत्र किंचिद्यदतीर्थमस्ति । तस्यास्तु तीरे भवता यदुक्तं तपस्विनो वाप्यतपस्विनो वा
anekayajñāyatanairvṛtāṅgī na hyatra kiṁcidyadatīrthamasti | tasyāstu tīre bhavatā yaduktaṁ tapasvino vāpyatapasvino vā
अनेक यज्ञस्थलों से घिरी हुई इस नदी में ऐसा कुछ भी नहीं है जो तीर्थ न हो। इसके तट पर आपने जो कुछ कहा — तपस्वी हो या अतपस्वी —
श्लोक 10 (skanda.5.178.10)
म्रियन्ति ये पापकृतो मनुष्यास्ते स्वर्गमायान्ति यथाऽमरेन्द्राः
mriyanti ye pāpakṛto manuṣyāste svargamāyānti yathā'marendrāḥ
जो पापी मनुष्य भी वहाँ मरते हैं, वे देवराजों के समान स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 11 (skanda.5.178.11)
एवं तु कपिला चैव विशल्या राजसत्तम । ईश्वरेण पुरा सृष्टा लोकानां हितकाम्यया
evaṁ tu kapilā caiva viśalyā rājasattama | īśvareṇa purā sṛṣṭā lokānāṁ hitakāmyayā
हे राजसत्तम! इस प्रकार कपिला तथा विशल्या दोनों को पूर्वकाल में ईश्वर ने लोकों के हित की कामना से रचा था।
श्लोक 12 (skanda.5.178.12)
तत्र स्नात्वा नरो राजन्सोपवासो जितेन्द्रियः । अश्वमेधस्य महतोऽसंशयं फलमाप्नुयात्
tatra snātvā naro rājansopavāso jitendriyaḥ | aśvamedhasya mahato'saṁśayaṁ phalamāpnuyāt
हे राजन्! वहाँ स्नान करके उपवासपूर्वक जितेन्द्रिय मनुष्य निःसंदेह महान् अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 13 (skanda.5.178.13)
अनाशकं च यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप । सर्वपापविनिर्मुक्तो याति वै शिवमन्दिरम्
anāśakaṁ ca yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa | sarvapāpavinirmukto yāti vai śivamandiram
हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अनशन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवमन्दिर को जाता है।
श्लोक 14 (skanda.5.178.14)
पृथिव्यां सागरान्तायां स्नानदानेन यत्फलम् । विशल्यासङ्गमे स्नात्वा सकृत्तत्फलमश्नुते
pṛthivyāṁ sāgarāntāyāṁ snānadānena yatphalam | viśalyāsaṅgame snātvā sakṛttatphalamaśnute
समुद्रपर्यन्त पृथ्वी पर स्नान-दान से जो फल मिलता है, विशल्यासंगम में एक बार स्नान करने से वही फल प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.5.178.15)
एवं पुण्या पवित्रा च कथिता तव भूपते । भूयो मां पृच्छसि च यत्तच्चैव कथयाम्यहम्
evaṁ puṇyā pavitrā ca kathitā tava bhūpate | bhūyo māṁ pṛcchasi ca yattaccaiva kathayāmyaham
हे भूपते! इस प्रकार इसकी पुण्यता और पवित्रता आपसे कही गई। अब आप मुझसे पुनः जो कुछ पूछेंगे, वह भी मैं कहूँगा।