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अवन्ती खण्ड · अध्याय 179

कर-नर्मदा संगम माहात्म्य वर्णन

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

श्लोक 1 (skanda.5.179.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। सङ्गमः करनर्मदयोः पुरे मान्धातृसंज्ञिते । गत्वा स्नात्वा तपयित्वा पितॄन्विष्णुपुरं नयेत्

śrīmārkaṇḍeya uvāca| saṅgamaḥ karanarmadayoḥ pure māndhātṛsaṁjñite | gatvā snātvā tapayitvā pitḥnviṣṇupuraṁ nayet

श्रीमार्कण्डेय बोले — मान्धाता नामक नगर में कर और नर्मदा नदियों का संगम है। वहाँ जाकर, स्नान करके और तर्पण करके मनुष्य अपने पितरों को विष्णुलोक पहुँचाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.179.2)

मर्दयित्वा करौ पूर्वं विष्णुर्दैत्यजिघांसया । चक्रं जग्राह तत्रैव स्वेदाज्जाता सरिद्वरा

mardayitvā karau pūrvaṁ viṣṇurdaityajighāṁsayā | cakraṁ jagrāha tatraiva svedājjātā saridvarā

पूर्वकाल में दैत्य का वध करने की इच्छा से विष्णु ने अपने दोनों हाथों को रगड़कर वहीं चक्र ग्रहण किया था; उसी पसीने से यह श्रेष्ठ नदी उत्पन्न हुई।

श्लोक 3 (skanda.5.179.3)

संगता रेवया तत्र स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते

saṁgatā revayā tatra snātvā pāpaiḥ pramucyate

वहाँ रेवा से मिलकर स्नान करने पर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

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