अवन्ती खण्ड · अध्याय 180
नीलगङ्गा संगम माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.180.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ओंकारात्पूर्वभागे वै सङ्गमो लोकविश्रुतः । रेवया संगता यत्र नीलगङ्गा नृपोत्तम
śrīmārkaṇḍeya uvāca| oṁkārātpūrvabhāge vai saṅgamo lokaviśrutaḥ | revayā saṁgatā yatra nīlagaṅgā nṛpottama
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे नृपश्रेष्ठ! ओंकारेश्वर के पूर्व भाग में लोकविख्यात संगम है, जहाँ नीलगङ्गा रेवा से मिलती है।
श्लोक 2 (skanda.5.180.2)
तत्र स्नात्वा जपित्वा च कोऽर्थोऽलभ्यो भवेद्भुवि । षष्टिर्वर्षसहस्राणि नीलकण्ठपुरे वसेत्
tatra snātvā japitvā ca ko'rtho'labhyo bhavedbhuvi | ṣaṣṭirvarṣasahasrāṇi nīlakaṇṭhapure vaset
वहाँ स्नान और जप करने पर पृथ्वी पर कौन-सा फल दुर्लभ रह जाता है? मनुष्य साठ हज़ार वर्षों तक नीलकण्ठपुर में निवास करता है।
श्लोक 3 (skanda.5.180.3)
तर्पयित्वा पितॄञ्श्राद्धे तिलमिश्रैर्जलैरपि । उद्धरेदात्मना सार्धं पुरुषानेकविंशतिम्
tarpayitvā pitṝñśrāddhe tilamiśrairjalairapi | uddharedātmanā sārdhaṁ puruṣānekaviṁśatim
वहाँ श्राद्ध में तिल मिले जल से पितरों का तर्पण करके मनुष्य अपने सहित इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है।