अवन्ती खण्ड · अध्याय 181
मधूकतृतीयाव्रतविधानमाहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.181.1)
युधिष्ठिर उवाच। जालेश्वरेऽपि यत्प्रोक्तं त्वया पूर्वं द्विजोत्तम । तत्कथं तु भवेत्पुण्यमृषिसिद्धनिषेवितम्
yudhiṣṭhira uvāca| jāleśvare'pi yatproktaṁ tvayā pūrvaṁ dvijottama | tatkathaṁ tu bhavetpuṇyamṛṣisiddhaniṣevitam
युधिष्ठिर बोले — हे द्विजोत्तम! आपने पहले जो जालेश्वर के विषय में कहा था, वह ऋषियों-सिद्धों द्वारा सेवित पुण्यस्थान किस प्रकार बना?
श्लोक 2 (skanda.5.181.2)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। जालेश्वरात्परं तीर्थं न भूतं न भविष्यति । तस्योत्पत्तिं कथयतः शृणु त्वं पाण्डुनन्दन
śrīmārkaṇḍeya uvāca| jāleśvarātparaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati | tasyotpattiṁ kathayataḥ śṛṇu tvaṁ pāṇḍunandana
श्रीमार्कण्डेय बोले — जालेश्वर से बढ़कर कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा। हे पाण्डुनन्दन! उसकी उत्पत्ति कहता हूँ, सुनो।
श्लोक 3 (skanda.5.181.3)
पुरा ऋषिगणाः सर्वे सेन्द्राश्चैव मरुद्गणाः । तापिता असुरैः सर्वैः क्षयं नीता ह्यनेकशः
purā ṛṣigaṇāḥ sarve sendrāścaiva marudgaṇāḥ | tāpitā asuraiḥ sarvaiḥ kṣayaṁ nītā hyanekaśaḥ
पूर्वकाल में इन्द्र सहित समस्त ऋषिगण तथा मरुद्गण, समस्त असुरों द्वारा पीड़ित होकर अनेक बार क्षय को प्राप्त हुए।
श्लोक 4 (skanda.5.181.4)
बाणासुरप्रभृतिभिर्जम्भशुम्भपुरोगमैः । वध्यमाना ह्यनेकैश्च ब्रह्माणं शरणं गताः
bāṇāsuraprabhṛtibhirjambhaśumbhapurogamaiḥ | vadhyamānā hyanekaiśca brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatāḥ
बाणासुर आदि, जम्भ-शुम्भ आदि दानवों द्वारा मारे जाते हुए, वे ब्रह्मा की शरण में गए।
श्लोक 5 (skanda.5.181.5)
विमानैः पर्वताकारैर्हयैश्चैव गजोपमैः । स्यन्दनैर्नगराकारैः सिंहशार्दूलयोजितैः
vimānaiḥ parvatākārairhayaiścaiva gajopamaiḥ | syandanairnagarākāraiḥ siṁhaśārdūlayojitaiḥ
पर्वताकार विमानों, गजतुल्य घोड़ों, नगराकार रथों पर सिंह-व्याघ्र जुते हुए,
श्लोक 6 (skanda.5.181.6)
कच्छपैर्मकरैश्चान्ये जग्मुरन्ये पदातयः । प्राप्य ते परमं स्थानमशक्यं यदधार्मिकैः
kacchapairmakaraiścānye jagmuranye padātayaḥ | prāpya te paramaṁ sthānamaśakyaṁ yadadhārmikaiḥ
कच्छप-मकरों पर सवार होकर, तथा कुछ पैदल चलकर, वे उस परम स्थान पर पहुँचे, जो अधार्मिकों के लिए अगम्य है।
श्लोक 7 (skanda.5.181.7)
दृष्ट्वा पद्मोद्भवं देवं सर्वलोकस्य शङ्करम् । ते सर्वे तत्र गत्वा तु स्तुतिं चक्रुः समाहिताः
dṛṣṭvā padmodbhavaṁ devaṁ sarvalokasya śaṅkaram | te sarve tatra gatvā tu stutiṁ cakruḥ samāhitāḥ
पद्मोद्भव, सम्पूर्ण लोकों के कल्याणकर्ता देव को देखकर, वे सब वहाँ जाकर एकाग्रचित्त होकर स्तुति करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.5.181.8)
देवा ऊचुः । जयामेय जयाभेद जय सम्भूतिकारक । पद्मयोने सुरश्रेष्ठ त्वां वयं शरणं गताः
devā ūcuḥ | jayāmeya jayābheda jaya sambhūtikāraka | padmayone suraśreṣṭha tvāṁ vayaṁ śaraṇaṁ gatāḥ
देव बोले — 'हे अमेय! जय हो, हे अभेद! जय हो, हे सृष्टिकर्ता! जय हो! हे पद्मयोने, हे देवश्रेष्ठ! हम आपकी शरण में आए हैं।'
श्लोक 9 (skanda.5.181.9)
तच्छ्रुत्वा तु वचो देवो देवानां भावितात्मनाम् । मेघगम्भीरया वाचा प्रत्युवाच पितामहः
tacchrutvā tu vaco devo devānāṁ bhāvitātmanām | meghagambhīrayā vācā pratyuvāca pitāmahaḥ
भावितात्मा देवताओं के वे वचन सुनकर पितामह ब्रह्मा ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में उत्तर दिया —
श्लोक 10 (skanda.5.181.10)
किं वो ह्यागमनं देवाः सर्वेषां च विवर्णता । केनावमानिताः सर्वे शीघ्रं कथयतामराः
kiṁ vo hyāgamanaṁ devāḥ sarveṣāṁ ca vivarṇatā | kenāvamānitāḥ sarve śīghraṁ kathayatāmarāḥ
'हे देवगण! तुम्हारा आगमन क्यों हुआ है और सबके मुख पीले क्यों हैं? किसने तुम्हारा अपमान किया है? हे अमरो! शीघ्र बताओ।'
श्लोक 11 (skanda.5.181.11)
देवा ऊचुः । बाणो नाम महावीर्यो दानवो बलदर्पितः । तेनास्माकं हृतं सर्वं धनरत्नैर्वियोजिताः
devā ūcuḥ | bāṇo nāma mahāvīryo dānavo baladarpitaḥ | tenāsmākaṁ hṛtaṁ sarvaṁ dhanaratnairviyojitāḥ
देव बोले — 'बाण नामक एक महापराक्रमी, बल से उन्मत्त दानव है; उसने हमारा सब कुछ छीन लिया है, हम धन-रत्नों से वंचित हो गए हैं।'
श्लोक 12 (skanda.5.181.12)
देवानां वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः । चिन्तयामास देवेशस्तस्य नाशाय या क्रिया
devānāṁ vacanaṁ śrutvā brahmā lokapitāmahaḥ | cintayāmāsa deveśastasya nāśāya yā kriyā
देवताओं का यह वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा, देवेश, उसके विनाश का उपाय सोचने लगे —
श्लोक 13 (skanda.5.181.13)
अवध्यो दानवः पापः सर्वेषां वै दिवौकसाम् । मुक्त्वा तु शङ्करं देवं न मया न च विष्णुना
avadhyo dānavaḥ pāpaḥ sarveṣāṁ vai divaukasām | muktvā tu śaṅkaraṁ devaṁ na mayā na ca viṣṇunā
'वह पापी दानव समस्त देवताओं के लिए अवध्य है — शंकर देव को छोड़कर, न मेरे द्वारा, न विष्णु द्वारा उसका वध सम्भव है।'
श्लोक 14 (skanda.5.181.14)
तत्रैव सर्वे गच्छामो यत्र देवो महेश्वरः । स गतिश्चैव सर्वेषां विद्यतेऽन्यो न कश्चन
tatraiva sarve gacchāmo yatra devo maheśvaraḥ | sa gatiścaiva sarveṣāṁ vidyate'nyo na kaścana
'हम सब वहीं चलें, जहाँ देव महेश्वर हैं; वे ही सबकी गति हैं, अन्य कोई नहीं है।'
श्लोक 15 (skanda.5.181.15)
एवमुक्त्वा सुरैः सर्वैर्ब्रह्मा वेदविदांवरः । ब्राह्मणैः सह विद्वद्भिरतो यत्र महेश्वरः
evamuktvā suraiḥ sarvairbrahmā vedavidāṁvaraḥ | brāhmaṇaiḥ saha vidvadbhirato yatra maheśvaraḥ
ऐसा कहकर वेदविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा समस्त देवताओं तथा विद्वान ब्राह्मणों सहित जहाँ महेश्वर थे, वहाँ गए,
श्लोक 16 (skanda.5.181.16)
स्तुतिभिश्च सुपुष्टाभिस्तुष्टाव परमेश्वरम्
stutibhiśca supuṣṭābhistuṣṭāva parameśvaram
और सुन्दर स्तुतियों से परमेश्वर को संतुष्ट किया।
श्लोक 17 (skanda.5.181.17)
देवा ऊचुः । जय त्वं देवदेवेश जयोमार्धशरीरधृक् । वृषासन महाबाहो शशाङ्ककृतभूषण
devā ūcuḥ | jaya tvaṁ devadeveśa jayomārdhaśarīradhṛk | vṛṣāsana mahābāho śaśāṅkakṛtabhūṣaṇa
देव बोले — 'हे देवदेवेश! जय हो आपकी, जो उमा को अर्धशरीर में धारण करते हैं! हे महाबाहो, वृषभवाहन, चन्द्रभूषित!'
श्लोक 18 (skanda.5.181.18)
नमः शूलाग्रहस्ताय नमः खट्वाङ्गधारिणे । जय भूतपते देव दक्षयज्ञविनाशन
namaḥ śūlāgrahastāya namaḥ khaṭvāṅgadhāriṇe | jaya bhūtapate deva dakṣayajñavināśana
'शूल के अग्रभाग को हाथ में धारण करने वाले को नमस्कार, खट्वांगधारी को नमस्कार! हे भूतपते, दक्षयज्ञविनाशक देव! जय हो!'
श्लोक 19 (skanda.5.181.19)
पञ्चाक्षर नमो देव पञ्चभूतात्मविग्रह । पञ्चवक्त्रमयेशान वेदैस्त्वं तु प्रगीयसे
pañcākṣara namo deva pañcabhūtātmavigraha | pañcavaktramayeśāna vedaistvaṁ tu pragīyase
'हे पंचाक्षर देव! नमस्कार, पंचभूतमय शरीर वाले! हे पंचमुख ईशान! आप वेदों द्वारा गाए जाते हैं।'
श्लोक 20 (skanda.5.181.20)
सृष्टिपालनसंहारांस्त्वं सदा कुरुषे नमः । अष्टमूर्ते स्मरहर स्मर सत्यं यथा स्तुतः
sṛṣṭipālanasaṁhārāṁstvaṁ sadā kuruṣe namaḥ | aṣṭamūrte smarahara smara satyaṁ yathā stutaḥ
'आप सदा सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, नमस्कार! हे अष्टमूर्ति, कामदेव के संहारक! जैसी स्तुति की गई, वैसा सत्य स्मरण कीजिए।'
श्लोक 21 (skanda.5.181.21)
पञ्चात्मिका तनुर्देव ब्राह्मणैस्ते प्रगीयते । सद्यो वामे तथाघोरे ईशो तत्पुरुषे तथा
pañcātmikā tanurdeva brāhmaṇaiste pragīyate | sadyo vāme tathāghore īśo tatpuruṣe tathā
'हे देव! ब्राह्मणों द्वारा गाया जाने वाला आपका पंचात्मक शरीर — सद्योजात, वामदेव, तथा अघोर, ईशान, तत्पुरुष रूप में —'
श्लोक 22 (skanda.5.181.22)
हेमजाले सुविस्तीर्णे हंसवत्कूजसे हर । एवं स्तुतो मुनिगणैर्ब्रह्माद्यैश्च सुरासुरैः
hemajāle suvistīrṇe haṁsavatkūjase hara | evaṁ stuto munigaṇairbrahmādyaiśca surāsuraiḥ
'— उस विशाल स्वर्णजाल में हंस के समान कूजित होते हैं, हे हर!' इस प्रकार मुनिगणों, ब्रह्मा आदि तथा सुरासुरों द्वारा स्तुत होकर,
श्लोक 23 (skanda.5.181.23)
प्रहृष्टः सुमना भूत्वा सुरसङ्घानुवाच ह
prahṛṣṭaḥ sumanā bhūtvā surasaṅghānuvāca ha
अत्यन्त प्रसन्न तथा सुमना होकर उन्होंने देव-समूह से कहा।
श्लोक 24 (skanda.5.181.24)
ईश्वर उवाच। स्वागतं देवविप्राणां सुप्रभाताद्य शर्वरी । किं कुर्मो वदत क्षिप्रं कोऽन्यः सेव्यः सुरासुरैः
īśvara uvāca| svāgataṁ devaviprāṇāṁ suprabhātādya śarvarī | kiṁ kurmo vadata kṣipraṁ ko'nyaḥ sevyaḥ surāsuraiḥ
ईश्वर बोले — 'देवताओं और ब्राह्मणों का स्वागत है, आज यह रात्रि सुप्रभात हुई। क्या करूँ? शीघ्र कहो। सुरासुरों द्वारा और किसकी सेवा की जाती है?'
श्लोक 25 (skanda.5.181.25)
किं दुःखं को नु सन्तापः कुतो वो भयमागतम् । कथयध्वं महाभागाः कारणं यन्मनोगतम्
kiṁ duḥkhaṁ ko nu santāpaḥ kuto vo bhayamāgatam | kathayadhvaṁ mahābhāgāḥ kāraṇaṁ yanmanogatam
'क्या दुःख है, क्या सन्ताप है, तुम्हें कहाँ से भय आया है? हे महाभागो! जो कारण तुम्हारे मन में है, वह बताओ।'
श्लोक 26 (skanda.5.181.26)
एवमुक्तास्तु रुद्रेण प्रत्यवोचन्सुरर्षभाः । स्वान्स्वान्देहान्दर्शयन्तो लज्जमाना अधोमुखाः
evamuktāstu rudreṇa pratyavocansurarṣabhāḥ | svānsvāndehāndarśayanto lajjamānā adhomukhāḥ
रुद्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर देवश्रेष्ठ लज्जित होकर, मुख नीचा किए हुए, अपने-अपने शरीर दिखाते हुए उत्तर देने लगे —
श्लोक 27 (skanda.5.181.27)
अस्ति घोरो महावीर्यो दानवो बलदर्पितः । बाणो नामेति विख्यातो यस्य तत्त्रिपुरं महत्
asti ghoro mahāvīryo dānavo baladarpitaḥ | bāṇo nāmeti vikhyāto yasya tattripuraṁ mahat
'बाण नाम से विख्यात एक घोर, महापराक्रमी, बल से उन्मत्त दानव है, जिसका वह विशाल त्रिपुर है।'
श्लोक 28 (skanda.5.181.28)
तेन वै सुतपस्तप्तं दशवर्षशतानि हि । तस्य तुष्टोऽभवद्ब्रह्मा नियमेन दमेन च
tena vai sutapastaptaṁ daśavarṣaśatāni hi | tasya tuṣṭo'bhavadbrahmā niyamena damena ca
'उसने एक हज़ार वर्षों तक उत्तम तप किया था; उसके नियम और संयम से ब्रह्मा प्रसन्न हुए।'
श्लोक 29 (skanda.5.181.29)
पुराणि तान्यभेद्यानि ददौ कामगमानि वै । आयसं राजतं चैव सौवर्णं च तथापरम्
purāṇi tānyabhedyāni dadau kāmagamāni vai | āyasaṁ rājataṁ caiva sauvarṇaṁ ca tathāparam
'उन्होंने उसे इच्छानुसार गमन करने वाले, अभेद्य नगर दिए — लोहे का, चाँदी का, तथा दूसरा स्वर्ण का भी।'
श्लोक 30 (skanda.5.181.30)
त्रिपुरं ब्रह्मणा सृष्टं भ्रमत्तत्कामगामि च । तस्यैव तु बलोत्कृष्टास्त्रिपुरे दानवाः स्थिताः
tripuraṁ brahmaṇā sṛṣṭaṁ bhramattatkāmagāmi ca | tasyaiva tu balotkṛṣṭāstripure dānavāḥ sthitāḥ
'ब्रह्मा द्वारा रचित वह त्रिपुर इच्छानुसार भ्रमण करता है; उसी के बलशाली दानव उस त्रिपुर में स्थित हैं।'
श्लोक 31 (skanda.5.181.31)
त्रैलोक्यं सकलं देव पीडयन्ति महासुराः । दण्डपाशासिशस्त्राणि अविकारे विकुर्वते । त्रिपुरं दानवैर्जुष्टं भ्रमत्तच्चक्रसंनिभम्
trailokyaṁ sakalaṁ deva pīḍayanti mahāsurāḥ | daṇḍapāśāsiśastrāṇi avikāre vikurvate | tripuraṁ dānavairjuṣṭaṁ bhramattaccakrasaṁnibham
'हे देव! वे महासुर सम्पूर्ण त्रिलोक को पीड़ित करते हैं, दण्ड, पाश, खड्ग आदि शस्त्रों से निर्दोषों को क्षति पहुँचाते हैं। दानवों से भरा वह त्रिपुर चक्र के समान भ्रमण करता है।'
श्लोक 32 (skanda.5.181.32)
क्वचिद्दृश्यमदृश्यं वा मृगतृष्णैव लक्ष्यते
kvaciddṛśyamadṛśyaṁ vā mṛgatṛṣṇaiva lakṣyate
'कहीं दिखाई देता है, कहीं अदृश्य हो जाता है, मानो मृगतृष्णा हो।'
श्लोक 33 (skanda.5.181.33)
यस्मिन्पतति तद्दिव्यं दृप्तस्य त्रिपुरं महत् । न तत्र ब्राह्मणा देवा गावो नैव तु जन्तवः
yasminpatati taddivyaṁ dṛptasya tripuraṁ mahat | na tatra brāhmaṇā devā gāvo naiva tu jantavaḥ
'उस मदोन्मत्त के जिस दिव्य महान् त्रिपुर पर वह गिरता है, वहाँ न ब्राह्मण, न देव, न गायें, न कोई प्राणी बचते हैं।'
श्लोक 34 (skanda.5.181.34)
न तत्र दृश्यते किंचित्पतेद्यत्र पुरत्रयम् । नद्यो ग्रामाश्च देशाश्च बहवो भस्मसात्कृताः
na tatra dṛśyate kiṁcitpatedyatra puratrayam | nadyo grāmāśca deśāśca bahavo bhasmasātkṛtāḥ
'जहाँ वह त्रिपुर गिरता है, वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता; अनेक नदियाँ, ग्राम और देश भस्म हो चुके हैं।'
श्लोक 35 (skanda.5.181.35)
सुवर्णं रजतं चैव मणिमौक्तिकमेव च । स्त्रीरत्नं शोभनं यच्च तत्सर्वं कर्षते बलात्
suvarṇaṁ rajataṁ caiva maṇimauktikameva ca | strīratnaṁ śobhanaṁ yacca tatsarvaṁ karṣate balāt
'स्वर्ण, चाँदी, मणि-मोती तथा जो भी सुन्दर स्त्री-रत्न है, वह सब वह बलपूर्वक हर लेता है।'
श्लोक 36 (skanda.5.181.36)
न शस्त्रेण न चास्त्रेण न दिवा निशि वा हर । शक्यते देवसङ्घैश्च निहन्तुं स कथंचन
na śastreṇa na cāstreṇa na divā niśi vā hara | śakyate devasaṅghaiśca nihantuṁ sa kathaṁcana
'हे हर! न शस्त्र से, न अस्त्र से, न दिन में, न रात में — देवसमूहों द्वारा किसी भी प्रकार उसका वध सम्भव नहीं है।'
श्लोक 37 (skanda.5.181.37)
तद्दहस्व महादेव त्वं हि नः परमा गतिः । एवं प्रसादं देवेश सर्वेषां कर्तुमर्हसि
taddahasva mahādeva tvaṁ hi naḥ paramā gatiḥ | evaṁ prasādaṁ deveśa sarveṣāṁ kartumarhasi
'उसे भस्म कीजिए, हे महादेव! आप ही हमारी परम गति हैं। हे देवेश! इस प्रकार सबका कल्याण कीजिए।'
श्लोक 38 (skanda.5.181.38)
येन देवाश्च गन्धर्वा ऋषयश्च तपोधनाः । परां धृतिं समायान्ति तत्प्रभो कर्तुमर्हसि
yena devāśca gandharvā ṛṣayaśca tapodhanāḥ | parāṁ dhṛtiṁ samāyānti tatprabho kartumarhasi
'जिससे देवता, गन्धर्व तथा तपोधन ऋषि परम धैर्य प्राप्त करें, हे प्रभो! वह कीजिए।'
श्लोक 39 (skanda.5.181.39)
ईश्वर उवाच। एतत्सर्वं करिष्यामि मा विषादं गमिष्यथ । अचिरेणैव कालेन कुर्यां युष्मत्सुखावहम्
īśvara uvāca| etatsarvaṁ kariṣyāmi mā viṣādaṁ gamiṣyatha | acireṇaiva kālena kuryāṁ yuṣmatsukhāvaham
ईश्वर बोले — 'यह सब मैं करूँगा, विषाद मत करो; अल्प समय में ही मैं तुम्हारे सुख का उपाय करूँगा।'
श्लोक 40 (skanda.5.181.40)
आश्वासयित्वा तान्देवान्सर्वानिन्द्रपुरोगमान् । चिन्तयामास देवेशस्त्रिपुरस्य वधं प्रति
āśvāsayitvā tāndevānsarvānindrapurogamān | cintayāmāsa deveśastripurasya vadhaṁ prati
इन्द्र आदि समस्त देवताओं को आश्वासन देकर देवेश त्रिपुर के वध के विषय में सोचने लगे —
श्लोक 41 (skanda.5.181.41)
कथं केन प्रकारेण हन्तव्यं त्रिपुरं मया । तमेकं नारदं मुक्त्वा नान्योपायो विधीयते
kathaṁ kena prakāreṇa hantavyaṁ tripuraṁ mayā | tamekaṁ nāradaṁ muktvā nānyopāyo vidhīyate
'किस उपाय से मुझे त्रिपुर का वध करना चाहिए? नारद के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।'
श्लोक 42 (skanda.5.181.42)
एवं संस्तभ्य चात्मानं ततो ध्यातः स नारदः । तत्क्षणादेव सम्प्राप्तो वायुभूतो महातपाः
evaṁ saṁstabhya cātmānaṁ tato dhyātaḥ sa nāradaḥ | tatkṣaṇādeva samprāpto vāyubhūto mahātapāḥ
इस प्रकार आत्मस्थिर होकर उन्होंने नारद का ध्यान किया; तभी वायु के समान वेगवान्, महातपस्वी नारद वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 43 (skanda.5.181.43)
कमण्डलुधरो देवस्त्रिदण्डी ज्ञानकोविदः । योगपट्टाक्षसूत्रेण छत्रेणैव विराजितः
kamaṇḍaludharo devastridaṇḍī jñānakovidaḥ | yogapaṭṭākṣasūtreṇa chatreṇaiva virājitaḥ
कमण्डलुधारी, त्रिदण्डधारी, ज्ञान में निपुण वह देव, योगपट्ट, अक्षमाला तथा छत्र से सुशोभित,
श्लोक 44 (skanda.5.181.44)
जटाजूटाबद्धशिरा ज्वलनार्कसमप्रभः । त्रिधा प्रदक्षिणीकृत्य दण्डवत्पतितो भुवि
jaṭājūṭābaddhaśirā jvalanārkasamaprabhaḥ | tridhā pradakṣiṇīkṛtya daṇḍavatpatito bhuvi
जटाजूट से बँधे सिर वाले, अग्नि-सूर्य के समान तेजस्वी; तीन बार प्रदक्षिणा करके वे भूमि पर दण्डवत् गिरे।
श्लोक 45 (skanda.5.181.45)
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा नारदो भगवान्मुनिः । स्तोत्रेण महता शर्वः स्तुतो भक्त्या महामनाः
kṛtāñjalipuṭo bhūtvā nārado bhagavānmuniḥ | stotreṇa mahatā śarvaḥ stuto bhaktyā mahāmanāḥ
हाथ जोड़कर भगवान् मुनि नारद ने महान् स्तोत्र से भक्तिपूर्वक शिव की स्तुति की —
श्लोक 46 (skanda.5.181.46)
नारद उवाच। जय शम्भो विरूपाक्ष जय देव त्रिलोचन । जय शङ्कर ईशान रुद्रेश्वर नमोऽस्तु ते
nārada uvāca| jaya śambho virūpākṣa jaya deva trilocana | jaya śaṅkara īśāna rudreśvara namo'stu te
नारद बोले — 'जय हो, हे शम्भो, विरूपाक्ष! जय हो, हे त्रिनेत्र देव! जय हो, हे शंकर, ईशान, रुद्रेश्वर! आपको नमस्कार हो।'
श्लोक 47 (skanda.5.181.47)
त्वं पतिस्त्वं जगत्कर्ता त्वमेव लयकृद्विभो । त्वमेव जगतां नाथो दुष्टातकनिषूदनः
tvaṁ patistvaṁ jagatkartā tvameva layakṛdvibho | tvameva jagatāṁ nātho duṣṭātakaniṣūdanaḥ
'आप ही स्वामी हैं, आप ही जगत् के रचयिता, आप ही संहारकर्ता हैं, हे प्रभो! आप ही जगत् के नाथ, दुष्टों के नाशक हैं।'
श्लोक 48 (skanda.5.181.48)
त्वं नः पाहि सुरेशान त्रयीमूर्ते सनातन । भवमूर्ते भवारे त्वं भजतामभयो भव
tvaṁ naḥ pāhi sureśāna trayīmūrte sanātana | bhavamūrte bhavāre tvaṁ bhajatāmabhayo bhava
'हे सुरेशान! हमारी रक्षा कीजिए, हे त्रयीमूर्ते, सनातन! हे भवमूर्ते, भव के शत्रु! अपने भक्तों को अभय दीजिए।'
श्लोक 49 (skanda.5.181.49)
भवभावविनाशार्थं भव त्वां शरणं भजे । किमर्थं चिन्तितो देव आज्ञा मे दीयतां प्रभो
bhavabhāvavināśārthaṁ bhava tvāṁ śaraṇaṁ bhaje | kimarthaṁ cintito deva ājñā me dīyatāṁ prabho
'हे भव! संसार-भाव के विनाश के लिए मैं आपकी शरण लेता हूँ। किसलिए मुझे स्मरण किया गया, हे प्रभो? मुझे आज्ञा दीजिए।'
श्लोक 50 (skanda.5.181.50)
कस्य संक्षोभये चित्तं को वाद्य पततु क्षितौ । कमद्य कलहेनाहं योजये जयतांवर
kasya saṁkṣobhaye cittaṁ ko vādya patatu kṣitau | kamadya kalahenāhaṁ yojaye jayatāṁvara
'किसका चित्त क्षुब्ध करूँ? आज कौन पृथ्वी पर गिरे? हे विजयी श्रेष्ठ! आज मैं किसे कलह में लगाऊँ?'
श्लोक 51 (skanda.5.181.51)
नारदस्य वचः श्रुत्वा देवदेवो महेश्वरः । उत्फुल्लनयनो भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्
nāradasya vacaḥ śrutvā devadevo maheśvaraḥ | utphullanayano bhūtvā idaṁ vacanamabravīt
नारद के वचन सुनकर देवदेव महेश्वर ने प्रफुल्लित नेत्रों से यह वचन कहा —
श्लोक 52 (skanda.5.181.52)
स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ सदैव कलहप्रिय । वीणावादनतत्त्वज्ञ ब्रह्मपुत्र सनातन
svāgataṁ te muniśreṣṭha sadaiva kalahapriya | vīṇāvādanatattvajña brahmaputra sanātana
ईश्वर बोले — 'हे मुनिश्रेष्ठ, सदा कलहप्रिय! तुम्हारा स्वागत है। हे वीणावादन में निपुण, ब्रह्मपुत्र, सनातन!'
श्लोक 53 (skanda.5.181.53)
गच्छ नारद शीघ्रं त्वं यत्र तत्त्रिपुरं महत् । बाणस्य दानवेन्द्रस्य सर्वलोकभयावहम्
gaccha nārada śīghraṁ tvaṁ yatra tattripuraṁ mahat | bāṇasya dānavendrasya sarvalokabhayāvaham
'हे नारद! शीघ्र वहाँ जाओ, जहाँ बाण नामक दानवेन्द्र का वह विशाल त्रिपुर है, जो समस्त लोकों के लिए भयंकर है।'
श्लोक 54 (skanda.5.181.54)
भर्तारो देवतातुल्याः स्त्रियस्तत्राप्सरःसमाः । तासां वै तेजसा चैव भ्रमते त्रिपुरं महत्
bhartāro devatātulyāḥ striyastatrāpsaraḥsamāḥ | tāsāṁ vai tejasā caiva bhramate tripuraṁ mahat
'वहाँ पति देवतुल्य हैं, और स्त्रियाँ अप्सराओं के समान हैं; उन्हीं के तेज से वह विशाल त्रिपुर भ्रमण करता है।'
श्लोक 55 (skanda.5.181.55)
न शक्यते कथं भेत्तुं सर्वोपायैर्द्विजोत्तम । गत्वा त्वं मोहय क्षिप्रं पृथग्धर्मैरनेकधा
na śakyate kathaṁ bhettuṁ sarvopāyairdvijottama | gatvā tvaṁ mohaya kṣipraṁ pṛthagdharmairanekadhā
'हे द्विजोत्तम! किसी भी उपाय से उसे भेदना सम्भव नहीं है। जाकर तुम अनेक प्रकार के भिन्न उपायों से शीघ्र उन्हें मोहित करो।'
श्लोक 56 (skanda.5.181.56)
नारद उवाच। तव वाक्येन देवेश भेदयामि पुरोत्तमम् । अभेद्यं बहुधोपायैर्यत्तु देवैः सवासवैः
nārada uvāca| tava vākyena deveśa bhedayāmi purottamam | abhedyaṁ bahudhopāyairyattu devaiḥ savāsavaiḥ
नारद बोले — 'हे देवेश! आपके वचन से, जो अनेकों उपायों से देवगणों तथा इन्द्र द्वारा भी अभेद्य है, उस श्रेष्ठ नगर को मैं भेद दूँगा।'
श्लोक 57 (skanda.5.181.57)
एवमुक्त्वा गतो भूप शतयोजनमायतम् । बाणस्य तत्पुरश्रेष्ठमृद्धिवृद्धिसमायुतम्
evamuktvā gato bhūpa śatayojanamāyatam | bāṇasya tatpuraśreṣṭhamṛddhivṛddhisamāyutam
हे राजन्! ऐसा कहकर वे उस सौ योजन विस्तृत, बाण के अत्यन्त समृद्ध श्रेष्ठ नगर को गए,
श्लोक 58 (skanda.5.181.58)
कृतकौतुकसम्बाधं नानाधातुविचित्रितम् । अनेकहर्म्यसंछन्नमनेकायतनोज्ज्वलम्
kṛtakautukasambādhaṁ nānādhātuvicitritam | anekaharmyasaṁchannamanekāyatanojjvalam
जो उत्सवों से भरपूर, नाना धातुओं से चित्रित, अनेक भवनों से आच्छादित, अनेक मन्दिरों से उज्ज्वल था,
श्लोक 59 (skanda.5.181.59)
द्वारतोरणसंयुक्तं कपाटार्गलभूषितम् । बहुयन्त्रसमोपेतं प्राकारपरिखोज्ज्वलम्
dvāratoraṇasaṁyuktaṁ kapāṭārgalabhūṣitam | bahuyantrasamopetaṁ prākāraparikhojjvalam
द्वार-तोरणों से युक्त, किवाड़-अर्गलाओं से भूषित, अनेक यंत्रों से समन्वित, प्राकार और खाइयों से उज्ज्वल था,
श्लोक 60 (skanda.5.181.60)
वापीकृपतडागैश्च देवतायतनैर्युतम् । हंसकारण्डवाकीर्णं पद्मिनीखण्डमण्डितम्
vāpīkṛpataḍāgaiśca devatāyatanairyutam | haṁsakāraṇḍavākīrṇaṁ padminīkhaṇḍamaṇḍitam
बावड़ियों, कुओं, तालाबों तथा देवमन्दिरों से युक्त, हंस-कारण्डवों से व्याप्त, कमल-खण्डों से मण्डित था,
श्लोक 61 (skanda.5.181.61)
अनेकवनशोभाढ्यं नानाविहगमण्डितम् । एवं गुणगणाकीर्णं बाणस्य पुरमुत्तमम्
anekavanaśobhāḍhyaṁ nānāvihagamaṇḍitam | evaṁ guṇagaṇākīrṇaṁ bāṇasya puramuttamam
अनेक वनों की शोभा से समृद्ध, नाना पक्षियों से सुशोभित — इस प्रकार गुणों के समूह से भरा हुआ बाण का उत्तम नगर था।
श्लोक 62 (skanda.5.181.62)
तस्य मध्ये महाकायं सप्तकक्षं सुशोभितम् । बाणस्य भवनं दिव्यं सर्वं काञ्चनभूषितम्
tasya madhye mahākāyaṁ saptakakṣaṁ suśobhitam | bāṇasya bhavanaṁ divyaṁ sarvaṁ kāñcanabhūṣitam
उसके मध्य में विशालकाय, सप्तकक्षों वाला, अत्यन्त सुशोभित, स्वर्ण से भूषित बाण का दिव्य भवन था,
श्लोक 63 (skanda.5.181.63)
मौक्तिकादामशोभाढ्यं वज्रवैडूर्यभूषितम् । रुक्मपट्टतलाकीर्णं रत्नभूम्या सुशोभितम्
mauktikādāmaśobhāḍhyaṁ vajravaiḍūryabhūṣitam | rukmapaṭṭatalākīrṇaṁ ratnabhūmyā suśobhitam
जो मोतियों की मालाओं से समृद्ध, वज्र-वैडूर्य से भूषित, स्वर्णपट्टों से आच्छादित भूमि तथा रत्नमय भूतल से सुशोभित था,
श्लोक 64 (skanda.5.181.64)
मत्तमातङ्गनिःश्वासैः स्यन्दनैः संकुलीकृतम् । हयहेषितशब्दैश्च नारीणां नूपुरस्वनैः
mattamātaṅganiḥśvāsaiḥ syandanaiḥ saṁkulīkṛtam | hayaheṣitaśabdaiśca nārīṇāṁ nūpurasvanaiḥ
जो मतवाले हाथियों की श्वास तथा रथों से भरा हुआ, घोड़ों की हिनहिनाहट और स्त्रियों की नूपुर-ध्वनि से गूँजता था,
श्लोक 65 (skanda.5.181.65)
खड्गतोमरहस्तैश्च वज्राङ्कुशशरायुधैः । रक्षितं घोररूपैश्च दानवैर्बलदर्पितैः
khaḍgatomarahastaiśca vajrāṅkuśaśarāyudhaiḥ | rakṣitaṁ ghorarūpaiśca dānavairbaladarpitaiḥ
खड्ग-तोमर हाथों में लिए, वज्र-अंकुश-बाण जैसे आयुधों से युक्त, बलमत्त, भयंकर रूप वाले दानवों द्वारा रक्षित था —
श्लोक 66 (skanda.5.181.66)
एवं गुणगणाकीर्णं बाणस्य भवनोत्तमम् । कैलासशिखरप्रख्यं महेन्द्रभवनोपमम्
evaṁ guṇagaṇākīrṇaṁ bāṇasya bhavanottamam | kailāsaśikharaprakhyaṁ mahendrabhavanopamam
इस प्रकार गुणों के समूह से भरा हुआ बाण का उत्तम भवन कैलास शिखर के समान, महेन्द्र के भवन के तुल्य था।
श्लोक 67 (skanda.5.181.67)
नारदो गगने शीघ्रमगमत्पुरसंमुखः । द्वारदेशं समासाद्य क्षत्तारं वाक्यमब्रवीत्
nārado gagane śīghramagamatpurasaṁmukhaḥ | dvāradeśaṁ samāsādya kṣattāraṁ vākyamabravīt
नारद शीघ्र ही आकाश-मार्ग से उस नगर के सम्मुख गए, और द्वार-प्रदेश में पहुँचकर द्वारपाल से यह वचन कहा —
श्लोक 68 (skanda.5.181.68)
भोभोः क्षत्तर्महाबुद्धे राजकार्यविशारद । शीघ्रं बाणाय चाचक्ष्व नारदो द्वारि तिष्ठति
bhobhoḥ kṣattarmahābuddhe rājakāryaviśārada | śīghraṁ bāṇāya cācakṣva nārado dvāri tiṣṭhati
'हे महाबुद्धिमान् द्वारपाल, राजकार्य में निपुण! शीघ्र बाण को सूचित करो कि नारद द्वार पर खड़े हैं।'
श्लोक 69 (skanda.5.181.69)
स वन्दयित्वा चरणौ नारदस्य त्वरान्वितः । सभामध्यगतं बाणं विज्ञप्तुमुपचक्रमे
sa vandayitvā caraṇau nāradasya tvarānvitaḥ | sabhāmadhyagataṁ bāṇaṁ vijñaptumupacakrame
उसने शीघ्रतापूर्वक नारद के चरणों की वन्दना करके सभामध्य में बैठे बाण को सूचित करना आरम्भ किया,
श्लोक 70 (skanda.5.181.70)
वेपमानाङ्गयष्टिस्तु करेणापिहिताननः । शृण्वतां सर्वयोधानामिदं वचनमब्रवीत्
vepamānāṅgayaṣṭistu kareṇāpihitānanaḥ | śṛṇvatāṁ sarvayodhānāmidaṁ vacanamabravīt
कांपते हुए शरीर से, हाथ से मुख ढककर, समस्त योद्धाओं के सुनते हुए उसने यह वचन कहा —
श्लोक 71 (skanda.5.181.71)
वन्दितो देवगन्धर्वैर्यक्षकिन्नरदानवैः । कलिप्रियो दुराराध्यो नारदो द्वारि तिष्ठति
vandito devagandharvairyakṣakinnaradānavaiḥ | kalipriyo durārādhyo nārado dvāri tiṣṭhati
'देवों, गन्धर्वों, यक्षों, किन्नरों और दानवों द्वारा वन्दित, कलहप्रिय, दुराराध्य नारद द्वार पर खड़े हैं।'
श्लोक 72 (skanda.5.181.72)
द्वारपालस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा बाणस्त्वरान्वितः । द्वाःस्थमाह महादैत्यः सविस्मयमिदं तदा
dvārapālasya tadvākyaṁ śrutvā bāṇastvarānvitaḥ | dvāḥsthamāha mahādaityaḥ savismayamidaṁ tadā
द्वारपाल के उस वचन को सुनकर बाण महादैत्य ने तत्परतापूर्वक और आश्चर्यचकित होकर द्वारपाल से कहा —
श्लोक 73 (skanda.5.181.73)
बाण उवाच। ब्रह्मपुत्रं सतेजस्कं दुःसहं दुरतिक्रमम् । प्रवेशय महाभागं किमर्थं वारितो बहिः
bāṇa uvāca| brahmaputraṁ satejaskaṁ duḥsahaṁ duratikramam | praveśaya mahābhāgaṁ kimarthaṁ vārito bahiḥ
बाण बोला — 'तेजस्वी, दुःसह, दुरतिक्रम्य ब्रह्मपुत्र महाभाग को प्रवेश कराओ। उन्हें बाहर क्यों रोका गया?'
श्लोक 74 (skanda.5.181.74)
श्रुत्वा प्रभोर्वचस्तस्य प्रावेशयदुदीरितम् । गत्वा वेगेन महता नारदं गृहमागतम्
śrutvā prabhorvacastasya prāveśayadudīritam | gatvā vegena mahatā nāradaṁ gṛhamāgatam
अपने स्वामी का वचन सुनकर उसने तुरन्त बड़े वेग से जाकर गृह में आए नारद को प्रवेश कराया।
श्लोक 75 (skanda.5.181.75)
दृष्ट्वा देवर्षिमायान्तं नारदं सुरपूजितम् । साहसोत्थाय संहृष्टो ववन्दे चरणौ मुनेः
dṛṣṭvā devarṣimāyāntaṁ nāradaṁ surapūjitam | sāhasotthāya saṁhṛṣṭo vavande caraṇau muneḥ
देवताओं द्वारा पूजित देवर्षि नारद को आता देखकर बाण साहस से उठकर हर्षित हुआ और मुनि के चरणों में वन्दना की।
श्लोक 76 (skanda.5.181.76)
ददौ चासनमर्घ्यं च पाद्यं पूजां यथाविधि । न्यवेदयच्च तद्राज्यमात्मानं बान्धवैः सह
dadau cāsanamarghyaṁ ca pādyaṁ pūjāṁ yathāvidhi | nyavedayacca tadrājyamātmānaṁ bāndhavaiḥ saha
उसने विधिपूर्वक आसन, अर्घ्य, पाद्य तथा पूजा अर्पित की, और अपना राज्य तथा स्वयं को बन्धुओं सहित समर्पित किया।
श्लोक 77 (skanda.5.181.77)
पप्रच्छ कुशलं चापि मुनिं बाणासुरः स्वयम्
papraccha kuśalaṁ cāpi muniṁ bāṇāsuraḥ svayam
बाणासुर ने स्वयं मुनि से कुशल-क्षेम भी पूछा।
श्लोक 78 (skanda.5.181.78)
नारद उवाच। साधु साधु महाबाहो दनोर्वंशविवर्द्धन । कोऽन्यस्त्रिभुवने श्लाघ्यस्त्वां मुक्त्वा दनुपुंगव
nārada uvāca| sādhu sādhu mahābāho danorvaṁśavivarddhana | ko'nyastribhuvane ślāghyastvāṁ muktvā danupuṁgava
नारद बोले — 'हे महाबाहो, दनु-वंश-वर्धन! साधु-साधु! तीनों लोकों में तुम्हें छोड़कर, हे दनुपुंगव, और कौन प्रशंसनीय है?'
श्लोक 79 (skanda.5.181.79)
पूजितोऽहं दनुश्रेष्ठ धनरत्नैः सुशोभनैः । राज्येन चात्मना वापि ह्येवं कः पूजयेत्परः
pūjito'haṁ danuśreṣṭha dhanaratnaiḥ suśobhanaiḥ | rājyena cātmanā vāpi hyevaṁ kaḥ pūjayetparaḥ
'हे दनुश्रेष्ठ! मैं सुन्दर धन-रत्नों से, तुम्हारे राज्य और स्वयं तुमसे पूजित हुआ हूँ — इस प्रकार अन्य कौन मेरा सत्कार करेगा?'
श्लोक 80 (skanda.5.181.80)
न मे कार्यं हि भोगेन भुङ्क्ष्व राज्यमनामयम् । त्वद्दर्शनोत्सुकः प्राप्तो दृष्ट्वा देवं महेश्वरम्
na me kāryaṁ hi bhogena bhuṅkṣva rājyamanāmayam | tvaddarśanotsukaḥ prāpto dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram
'मुझे भोग की आवश्यकता नहीं, तुम निरामय राज्य भोगो। देव महेश्वर के दर्शन करके, तुम्हारे दर्शन की उत्सुकता में यहाँ आया हूँ।'
श्लोक 81 (skanda.5.181.81)
भ्रमते त्रिपुरं लोके स्त्रीसतीत्वान्मया श्रुतम् । तान्द्रष्टुकामः सम्प्राप्तस्त्वद्दारान्दानवेश्वर
bhramate tripuraṁ loke strīsatītvānmayā śrutam | tāndraṣṭukāmaḥ samprāptastvaddārāndānaveśvara
'सुना है कि स्त्रियों के सतीत्व के कारण त्रिपुर लोक में भ्रमण करता है; हे दानवेश्वर! तुम्हारी पत्नियों को देखने की इच्छा से मैं आया हूँ।'
श्लोक 82 (skanda.5.181.82)
मन्यसे यदि मे शीघ्रं दर्शयस्व च माचिरम् । नारदस्य वचः श्रुत्वा कञ्चुकिं समुदीक्ष्य वै
manyase yadi me śīghraṁ darśayasva ca māciram | nāradasya vacaḥ śrutvā kañcukiṁ samudīkṣya vai
'यदि उचित समझो तो उन्हें मुझे शीघ्र दिखाओ, विलम्ब न करो।' नारद के वचन सुनकर, अन्तःपुर के एक वृद्ध, दण्डधारी, गुणवान् कंचुकी की ओर देखते हुए,
श्लोक 83 (skanda.5.181.83)
अन्तःपुरचरं वृद्धं दण्डपाणिं गुणान्वितम् । उवाच राजा हृष्टात्मा शब्देनापूरयन्दिशः
antaḥpuracaraṁ vṛddhaṁ daṇḍapāṇiṁ guṇānvitam | uvāca rājā hṛṣṭātmā śabdenāpūrayandiśaḥ
हर्षित मन वाले राजा ने दिशाओं को अपनी ध्वनि से भरते हुए कहा —
श्लोक 84 (skanda.5.181.84)
नारदाय महादेवीं दर्शयस्वेह कञ्चुकिन् । अन्तःपुरचरैः सर्वैः समेतामविशङ्कितः
nāradāya mahādevīṁ darśayasveha kañcukin | antaḥpuracaraiḥ sarvaiḥ sametāmaviśaṅkitaḥ
'हे कंचुकिन्! नारद को महादेवी का दर्शन कराओ, अन्तःपुर की सभी परिचारिकाओं सहित, बिना किसी शंका के।'
श्लोक 85 (skanda.5.181.85)
नाथस्याज्ञां पुरस्कृत्य गृहीत्वा नारदं करे । प्रविश्याकथयद्देव्यै नारदोऽयं समागतः
nāthasyājñāṁ puraskṛtya gṛhītvā nāradaṁ kare | praviśyākathayaddevyai nārado'yaṁ samāgataḥ
स्वामी की आज्ञा को शिरोधार्य करके, नारद को हाथ से पकड़कर, प्रवेश करके उसने देवी से कहा — 'नारद पधारे हैं।'
श्लोक 86 (skanda.5.181.86)
दृष्ट्वा देवी मुनिश्रेष्ठं कृत्वा पादाभिवन्दनम् । आसनं काञ्चनं शुभ्रमर्घ्यपाद्यादिकं ददौ
dṛṣṭvā devī muniśreṣṭhaṁ kṛtvā pādābhivandanam | āsanaṁ kāñcanaṁ śubhramarghyapādyādikaṁ dadau
मुनिश्रेष्ठ को देखकर देवी ने चरण-वन्दना करके स्वर्ण का उज्ज्वल आसन तथा अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पित किया।
श्लोक 87 (skanda.5.181.87)
तस्यै स भगवांस्तुष्टो ह्याशीर्वादमदात्परम् । नान्या देवि त्रिलोकेऽपि त्वत्समा दृश्यतेऽङ्गना
tasyai sa bhagavāṁstuṣṭo hyāśīrvādamadātparam | nānyā devi triloke'pi tvatsamā dṛśyate'ṅganā
उससे प्रसन्न होकर उस भगवान् ने उसे परम आशीर्वाद दिया — 'हे देवि! तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई अन्य स्त्री दिखाई नहीं देती —'
श्लोक 88 (skanda.5.181.88)
पतिव्रता शुभाचारा सत्यशौचसमन्विता । यस्याः प्रभावात्त्रिपुरं भ्रमते चक्रवत्सदा
pativratā śubhācārā satyaśaucasamanvitā | yasyāḥ prabhāvāttripuraṁ bhramate cakravatsadā
'— पतिव्रता, शुभाचारिणी, सत्य-शौच से युक्त, जिसके प्रभाव से त्रिपुर चक्र के समान सदा भ्रमण करता है।'
श्लोक 89 (skanda.5.181.89)
तच्छ्रुत्वा वचनं देवी नारदस्य सुदान्वितम् । पर्यपृच्छदृषिं भक्त्या धर्मं धर्मभृतांवरा
tacchrutvā vacanaṁ devī nāradasya sudānvitam | paryapṛcchadṛṣiṁ bhaktyā dharmaṁ dharmabhṛtāṁvarā
नारद का यह उदार वचन सुनकर धर्मधारकों में श्रेष्ठ वह देवी भक्तिपूर्वक ऋषि से धर्म के विषय में पूछने लगी —
श्लोक 90 (skanda.5.181.90)
राज्ञ्युवाच - भगवन्मानुषे लोके देवास्तुष्यन्ति कैर्व्रतैः । कानि दानानि दीयन्ते येषां च स्यान्महत्फलम्
rājñyuvāca - bhagavanmānuṣe loke devāstuṣyanti kairvrataiḥ | kāni dānāni dīyante yeṣāṁ ca syānmahatphalam
रानी बोली — 'हे भगवन्! मनुष्यलोक में देवता किन व्रतों से प्रसन्न होते हैं? कौन-से दान दिए जाते हैं, जिनका महान् फल होता है?'
श्लोक 91 (skanda.5.181.91)
उपवासाश्च ये केचित्स्त्रीधर्मे कथिता बुधैः । यैः कृतैः स्वर्गमायान्ति सुकृतिन्यः स्त्रियो यथा
upavāsāśca ye kecitstrīdharme kathitā budhaiḥ | yaiḥ kṛtaiḥ svargamāyānti sukṛtinyaḥ striyo yathā
'तथा स्त्रियों के धर्म में विद्वानों द्वारा बताए गए जो उपवास हैं, जिन्हें करके पुण्यशालिनी स्त्रियाँ स्वर्ग को प्राप्त होती हैं,'
श्लोक 92 (skanda.5.181.92)
यत्तत्सर्वं महाभाग कथयस्व यथातथम् । श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं कथयस्वाविशङ्कितः
yattatsarvaṁ mahābhāga kathayasva yathātatham | śrotumicchāmyahaṁ sarvaṁ kathayasvāviśaṅkitaḥ
'हे महाभाग! वह सब यथार्थ रूप में बताइए। मैं सब कुछ सुनना चाहती हूँ; बिना संकोच के कहिए।'
श्लोक 93 (skanda.5.181.93)
नारद उवाच। साधु साधु महाभागे प्रश्नोऽयं वेदितस्त्वया । यं श्रुत्वा सर्वनारीणां धर्मवृद्धिस्तु जायते
nārada uvāca| sādhu sādhu mahābhāge praśno'yaṁ veditastvayā | yaṁ śrutvā sarvanārīṇāṁ dharmavṛddhistu jāyate
नारद बोले — 'हे महाभागे! तुमने यह प्रश्न बहुत सुन्दर पूछा है, जिसे सुनकर समस्त स्त्रियों के धर्म की वृद्धि होगी।'
श्लोक 94 (skanda.5.181.94)
उपवासैश्च दानैश्च पतिपुत्रौ वशानुगौ । बान्धवैः पूज्यते नित्यं यैः कृतैः कथयामि ते
upavāsaiśca dānaiśca patiputrau vaśānugau | bāndhavaiḥ pūjyate nityaṁ yaiḥ kṛtaiḥ kathayāmi te
'उपवास और दान से पति-पुत्र वश में रहते हैं, और सदा बन्धुओं द्वारा पूजित होती है — जिन कर्मों से यह होता है, वह तुम्हें बताता हूँ।'
श्लोक 95 (skanda.5.181.95)
दुर्भगा सुभगा यैस्तु सुभगा दुर्भगा भवेत् । पुत्रिणी पुत्ररहिता ह्यपुत्रा पुत्रिणी तथा
durbhagā subhagā yaistu subhagā durbhagā bhavet | putriṇī putrarahitā hyaputrā putriṇī tathā
'जिनसे अभागिन सौभाग्यशालिनी बनती है, और सौभाग्यशालिनी अभागिन बन जाती है; पुत्रवती पुत्रहीन, और पुत्रहीन पुत्रवती बनती है,'
श्लोक 96 (skanda.5.181.96)
भर्तारं लभते कन्या तथान्या भर्तृवर्जिता । कृताकृतैश्च जायन्ते तन्निबोधस्व सुन्दरि
bhartāraṁ labhate kanyā tathānyā bhartṛvarjitā | kṛtākṛtaiśca jāyante tannibodhasva sundari
'कन्या पति प्राप्त करती है, और अन्य पतिविहीन हो जाती है — यह सब किए गए और न किए गए कर्मों से होता है, हे सुन्दरी! इसे समझो।'
श्लोक 97 (skanda.5.181.97)
तिलधेनुं सुवर्णं च रूप्यं गा वाससी तथा । पानीयं भूमिदानं च गन्धधूपानुलेपनम्
tiladhenuṁ suvarṇaṁ ca rūpyaṁ gā vāsasī tathā | pānīyaṁ bhūmidānaṁ ca gandhadhūpānulepanam
'तिल की धेनु, स्वर्ण, चाँदी, गाय, वस्त्र, जल, भूमिदान, गन्ध-धूप-अनुलेपन,'
श्लोक 98 (skanda.5.181.98)
पादुकोपानहौ छत्रं पुण्यानि व्यञ्जनानि च । पादाभ्यङ्गं शिरोऽभ्यङ्गं स्नानं शय्यासनानि च
pādukopānahau chatraṁ puṇyāni vyañjanāni ca | pādābhyaṅgaṁ śiro'bhyaṅgaṁ snānaṁ śayyāsanāni ca
'पादुका, जूते, छत्र, पवित्र व्यंजन, पादाभ्यंग, शिरोऽभ्यंग, स्नान, शय्या-आसन —'
श्लोक 99 (skanda.5.181.99)
एतानि ये प्रयच्छन्ति नोपसर्पन्ति ते यमम् । मधु माषं पयः सर्पिर्लवणं गुडमौषधम्
etāni ye prayacchanti nopasarpanti te yamam | madhu māṣaṁ payaḥ sarpirlavaṇaṁ guḍamauṣadham
'जो इन्हें देते हैं, वे यम के पास नहीं जाते। मधु, उड़द, दूध, घी, नमक, गुड़, औषधि,'
श्लोक 100 (skanda.5.181.100)
पानीयं भूमिदानं च शालीनिक्षुरसांस्तथा । आरक्तवाससी श्लक्ष्णे दम्पत्योर्ललितादिने
pānīyaṁ bhūmidānaṁ ca śālīnikṣurasāṁstathā | āraktavāsasī ślakṣṇe dampatyorlalitādine
'जल, भूमिदान, तथा चावल-गन्ने का रस भी; ललिता-पूजा के दिन दम्पति के लिए दो कोमल लाल वस्त्र —'
श्लोक 101 (skanda.5.181.101)
सौभाग्यं जायते चैव इह लोके परत्र च । ब्राह्मणे वृत्तसम्पन्ने सुरूपे च गुणान्विते
saubhāgyaṁ jāyate caiva iha loke paratra ca | brāhmaṇe vṛttasampanne surūpe ca guṇānvite
'— जो सुशील, सुरूप, गुणवान् ब्राह्मण को दिए जाते हैं, उससे इस लोक और परलोक दोनों में सौभाग्य प्राप्त होता है।'
श्लोक 102 (skanda.5.181.102)
तिथौ यस्यामिदं देयं तत्ते राज्ञि वदाम्यहम् । प्रतिपत्सु च या नारी पूर्वाह्णे च शुचिव्रता
tithau yasyāmidaṁ deyaṁ tatte rājñi vadāmyaham | pratipatsu ca yā nārī pūrvāhṇe ca śucivratā
'हे रानी! किस तिथि में यह देना चाहिए, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। प्रतिपदा को शुचिव्रता स्त्री पूर्वाह्ण में'
श्लोक 103 (skanda.5.181.103)
इन्धनं ब्राह्मणे दद्यात्प्रीयतां मे हुताशनः । तस्या जन्मानि षट्त्रिंशदङ्गप्रत्यङ्गसन्धिषु
indhanaṁ brāhmaṇe dadyātprīyatāṁ me hutāśanaḥ | tasyā janmāni ṣaṭtriṁśadaṅgapratyaṅgasandhiṣu
'ब्राह्मण को इन्धन दे — “मुझ पर अग्नि प्रसन्न हों।” इससे छत्तीस जन्मों तक उसके अंग-प्रत्यंग के सन्धिस्थानों में'
श्लोक 104 (skanda.5.181.104)
न रजो नैव सन्तापो जायते राजवल्लभे । द्वितीयायां तु या नारी नवनीतमुदान्विता
na rajo naiva santāpo jāyate rājavallabhe | dvitīyāyāṁ tu yā nārī navanītamudānvitā
'न मल उत्पन्न होता है, न सन्ताप — वह राजा को प्रिय होती है। द्वितीया को जो स्त्री आनन्दित होकर मक्खन'
श्लोक 105 (skanda.5.181.105)
ददाति द्विजमुख्याय सुकुमारतनुर्भवेत् । लवणं विप्रवर्याय तृतीयायां प्रयच्छति
dadāti dvijamukhyāya sukumāratanurbhavet | lavaṇaṁ vipravaryāya tṛtīyāyāṁ prayacchati
'श्रेष्ठ ब्राह्मण को देती है, वह कोमल शरीर वाली होती है। तृतीया को श्रेष्ठ ब्राह्मण को नमक देती है —'
श्लोक 106 (skanda.5.181.106)
गौरी मे प्रीयतां देवी तस्याः पुण्यफलं शृणु । कौमारिका पतिं प्राप्य तेन सार्द्धमुमा यथा
gaurī me prīyatāṁ devī tasyāḥ puṇyaphalaṁ śṛṇu | kaumārikā patiṁ prāpya tena sārddhamumā yathā
'“गौरी देवी मुझ पर प्रसन्न हों।” उसका पुण्यफल सुनो — कुमारी पति प्राप्त करके उसी के साथ उमा के समान'
श्लोक 107 (skanda.5.181.107)
क्रीडत्यविधवा चापि लभते सा महद्यशः । नक्तं कृत्वा चतुर्थ्यां वै दद्याद्विप्राय मोदकान्
krīḍatyavidhavā cāpi labhate sā mahadyaśaḥ | naktaṁ kṛtvā caturthyāṁ vai dadyādviprāya modakān
'क्रीड़ा करती है, और विधवा नहीं होकर महान् यश प्राप्त करती है। चतुर्थी को रात्रि-भोजन करके ब्राह्मण को मोदक देना चाहिए —'
श्लोक 108 (skanda.5.181.108)
प्रीयतां मम देवेशो गणनाथो विनायकः । तस्यास्तेन फलेनाशु सर्वकर्मसु भामिनि
prīyatāṁ mama deveśo gaṇanātho vināyakaḥ | tasyāstena phalenāśu sarvakarmasu bhāmini
'“मेरे गणनाथ, विनायक देवेश प्रसन्न हों।” उस फल से शीघ्र ही, हे भामिनि! सभी कार्यों में'
श्लोक 109 (skanda.5.181.109)
विघ्नं न जायते क्वापि एवमाह पितामहः । पञ्चमीं तु ततः प्राप्य ब्राह्मणे तिलदा तु या
vighnaṁ na jāyate kvāpi evamāha pitāmahaḥ | pañcamīṁ tu tataḥ prāpya brāhmaṇe tiladā tu yā
'विघ्न कहीं भी उत्पन्न नहीं होता — ऐसा पितामह ने कहा। फिर पंचमी को जो ब्राह्मण को तिल देती है,'
श्लोक 110 (skanda.5.181.110)
सा भवेद्रूपसम्पन्ना यथा चैव तिलोत्तमा । षष्ठ्यां तु या मधूकस्य फलदा तु भवेत्सदा
sā bhavedrūpasampannā yathā caiva tilottamā | ṣaṣṭhyāṁ tu yā madhūkasya phaladā tu bhavetsadā
'वह तिलोत्तमा के समान रूपसम्पन्न होती है। षष्ठी को जो सदा मधूक-वृक्ष का फल देती है,'
श्लोक 111 (skanda.5.181.111)
उद्दिश्य चाग्निजं देवं ब्राह्मणे वेदपारगे । तस्याः पुत्रो यथा स्कन्दो देवसङ्घेषु चोत्तमः
uddiśya cāgnijaṁ devaṁ brāhmaṇe vedapārage | tasyāḥ putro yathā skando devasaṅgheṣu cottamaḥ
'अग्निजन्य देव (स्कन्द) को उद्दिष्ट करके, वेदपारंगत ब्राह्मण को — उसका पुत्र स्कन्द के समान देवगणों में श्रेष्ठ'
श्लोक 112 (skanda.5.181.112)
उत्पद्यते महाराजः सर्वलोकेषु पूजितः । सप्तम्यां या द्विजश्रेष्ठं सुवर्णेन प्रपूजयेत्
utpadyate mahārājaḥ sarvalokeṣu pūjitaḥ | saptamyāṁ yā dvijaśreṣṭhaṁ suvarṇena prapūjayet
'महाराज होकर उत्पन्न होता है, समस्त लोकों में पूजित। सप्तमी को जो द्विजश्रेष्ठ को स्वर्ण से पूजित करती है —'
श्लोक 113 (skanda.5.181.113)
उद्दिश्य जगतो नाथं देवदेवं दिवाकरम् । तस्य पुण्यफलं यद्वै कथितं द्विजसत्तमैः
uddiśya jagato nāthaṁ devadevaṁ divākaram | tasya puṇyaphalaṁ yadvai kathitaṁ dvijasattamaiḥ
'जगत् के नाथ देवदेव सूर्य को उद्दिष्ट करके — द्विजसत्तमों द्वारा कहे गए उसके पुण्यफल'
श्लोक 114 (skanda.5.181.114)
तत्ते राज्ञि प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः सति । दद्रूचित्रककुष्ठानि मण्डलानि विचर्चिका
tatte rājñi pravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanāḥ sati | dadrūcitrakakuṣṭhāni maṇḍalāni vicarcikā
'को, हे रानी! तुम्हें बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो, हे सती! दद्रु, चित्रक, कुष्ठ, मण्डल, विचर्चिका'
श्लोक 115 (skanda.5.181.115)
न भवन्तीह चाङ्गेषु पूर्वकर्मार्जितान्यपि । कृष्णां धेनुं तथाष्टम्यां या प्रयच्छति भामिनी
na bhavantīha cāṅgeṣu pūrvakarmārjitānyapi | kṛṣṇāṁ dhenuṁ tathāṣṭamyāṁ yā prayacchati bhāminī
'जैसे पूर्वकर्मार्जित रोग भी अंगों में उत्पन्न नहीं होते। अष्टमी को जो स्त्री काली गाय देती है'
श्लोक 116 (skanda.5.181.116)
ब्राह्मणे वृत्तसम्पन्ने प्रीयतां मे महेश्वरः । तस्या जन्मार्जितं पापं नश्यते विभवान्विता
brāhmaṇe vṛttasampanne prīyatāṁ me maheśvaraḥ | tasyā janmārjitaṁ pāpaṁ naśyate vibhavānvitā
'सदाचारी ब्राह्मण को — “मुझ पर महेश्वर प्रसन्न हों” — उसका जन्मार्जित पाप नष्ट हो जाता है और वह ऐश्वर्ययुक्त बनती है;'
श्लोक 117 (skanda.5.181.117)
जायते नात्र सन्देहो यस्माद्दानमनुत्तमम् । गन्धधूपं तु या नारी भक्त्या विप्राय दापयेत्
jāyate nātra sandeho yasmāddānamanuttamam | gandhadhūpaṁ tu yā nārī bhaktyā viprāya dāpayet
'इसमें कोई सन्देह नहीं, क्योंकि यह दान अनुपम है। नवमी को जो स्त्री भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को गन्ध-धूप'
श्लोक 118 (skanda.5.181.118)
कात्यायनीं समुद्दिश्य नवम्यां शृणु यत्फलम् । तस्या भ्राता पिता पुत्रः पतिर्वा रणमुत्तमम्
kātyāyanīṁ samuddiśya navamyāṁ śṛṇu yatphalam | tasyā bhrātā pitā putraḥ patirvā raṇamuttamam
'कात्यायनी को उद्दिष्ट करके देती है — उसका फल सुनो: उसका भाई, पिता, पुत्र अथवा पति महासंग्राम में'
श्लोक 119 (skanda.5.181.119)
प्राप्यते नैव सीदन्ति तेन दानेन रक्षिताः । इक्षुदण्डरसं देवि दशम्यां या प्रयच्छति
prāpyate naiva sīdanti tena dānena rakṣitāḥ | ikṣudaṇḍarasaṁ devi daśamyāṁ yā prayacchati
'कभी पराजित नहीं होते, उस दान से रक्षित रहते हैं। हे देवि! दशमी को जो इक्षु-दण्ड का रस देती है'
श्लोक 120 (skanda.5.181.120)
लोकपालान्समुद्दिश्य ब्राह्मणे व्यङ्गवर्जिते । तेन दानेन सा नित्यं सर्वलोकस्य वल्लभा
lokapālānsamuddiśya brāhmaṇe vyaṅgavarjite | tena dānena sā nityaṁ sarvalokasya vallabhā
'लोकपालों को उद्दिष्ट करके, किसी निर्दोष ब्राह्मण को — उस दान से वह सदा सम्पूर्ण लोक की प्रिय बनती है;'
श्लोक 121 (skanda.5.181.121)
जायते नात्र सन्देह इत्येवं शङ्करोऽब्रवीत् । एकादश्यामुपोष्याथ द्वादश्यामुदकप्रदा
jāyate nātra sandeha ityevaṁ śaṅkaro'bravīt | ekādaśyāmupoṣyātha dvādaśyāmudakapradā
'इसमें कोई सन्देह नहीं — ऐसा शंकर ने कहा। एकादशी को उपवास करके द्वादशी को जल देने वाली,'
श्लोक 122 (skanda.5.181.122)
नारायणं समुद्दिश्य ब्राह्मणे विष्णुतत्परे । सा सदा स्पर्शसम्भाषैर्द्रावयेद्भावयेज्जनम्
nārāyaṇaṁ samuddiśya brāhmaṇe viṣṇutatpare | sā sadā sparśasambhāṣairdrāvayedbhāvayejjanam
'नारायण को उद्दिष्ट करके, विष्णुभक्त ब्राह्मण को — वह सदा अपने स्पर्श और वाणी से लोगों को द्रवित तथा भावुक करती है,'
श्लोक 123 (skanda.5.181.123)
यस्माद्दानं महर्लोके ह्यनन्तमुदके भवेत् । पादाभ्यङ्गं शिरोऽभ्यङ्गं काममुद्दिश्य वै द्विजे
yasmāddānaṁ maharloke hyanantamudake bhavet | pādābhyaṅgaṁ śiro'bhyaṅgaṁ kāmamuddiśya vai dvije
'क्योंकि वह दान महर्लोक में अनन्त जल के समान हो जाता है। त्रयोदशी को काम को उद्दिष्ट करके ब्राह्मण को'
श्लोक 124 (skanda.5.181.124)
ददाति च त्रयोदश्यां भक्त्या परमयाङ्गना । यस्यां यस्यां मृता जायेद्भूयो योन्यां तु जन्मनि
dadāti ca trayodaśyāṁ bhaktyā paramayāṅganā | yasyāṁ yasyāṁ mṛtā jāyedbhūyo yonyāṁ tu janmani
'पादाभ्यंग तथा शिरोऽभ्यंग परम भक्ति से देती है — जिस-जिस योनि में उसका पुनर्जन्म हो, मरने के बाद,'
श्लोक 125 (skanda.5.181.125)
तस्यां तस्यां तु सा भर्तुर्न वियुज्येत कर्हिचित् । तथाप्येवं चतुर्दश्यां दद्यात्पात्रमुपानहौ
tasyāṁ tasyāṁ tu sā bharturna viyujyeta karhicit | tathāpyevaṁ caturdaśyāṁ dadyātpātramupānahau
'उस-उसमें वह कभी अपने पति से वियुक्त नहीं होती। इसी प्रकार चतुर्दशी को पात्र और जूते देने चाहिए,'
श्लोक 126 (skanda.5.181.126)
ब्रह्मणे धर्ममुद्दिश्य तस्या लोका ह्यनामयाः । एवं च पक्षपक्षान्ते श्राद्धे तर्पेद्द्विजोत्तमान्
brahmaṇe dharmamuddiśya tasyā lokā hyanāmayāḥ | evaṁ ca pakṣapakṣānte śrāddhe tarpeddvijottamān
'धर्म के निमित्त ब्राह्मण को — उसके लोक निरामय होते हैं। और इस प्रकार प्रत्येक पक्ष के अन्त में श्राद्ध में द्विजोत्तमों को तृप्त करना चाहिए;'
श्लोक 127 (skanda.5.181.127)
अव्युच्छिन्ना सदा राज्ञि सन्ततिर्जायते भुवि । एवं ते तिथिमाहात्म्यं दानयोगेन भाषितम्
avyucchinnā sadā rājñi santatirjāyate bhuvi | evaṁ te tithimāhātmyaṁ dānayogena bhāṣitam
'हे रानी! उसकी संतति पृथ्वी पर सदा अखण्डित रहती है। इस प्रकार तुम्हें तिथियों का यह दान-सहित माहात्म्य बताया गया।'
श्लोक 128 (skanda.5.181.128)
तथा वनस्पतीनां तु आराधनविधिं शृणु । जम्बूं निम्बतरुं चैव तिन्दुकं मधुकं तथा
tathā vanaspatīnāṁ tu ārādhanavidhiṁ śṛṇu | jambūṁ nimbataruṁ caiva tindukaṁ madhukaṁ tathā
'अब वनस्पतियों की आराधना-विधि सुनो — जामुन, नीम, तेंदू, तथा महुआ वृक्ष,'
श्लोक 129 (skanda.5.181.129)
आम्रं चामलकं चैव शाल्मलिं वटपिप्पलौ । शमीबिल्वामलीवृक्षं कदलीं पाटलीं तथा
āmraṁ cāmalakaṁ caiva śālmaliṁ vaṭapippalau | śamībilvāmalīvṛkṣaṁ kadalīṁ pāṭalīṁ tathā
'आम, आँवला, शाल्मलि, बरगद-पीपल; शमी, बेल, अमली वृक्ष, केला, तथा पाटली वृक्ष —'
श्लोक 130 (skanda.5.181.130)
अन्यान्पुण्यतमान्वृक्षानुपेत्य स्वर्गमाप्नुयात्
anyānpuṇyatamānvṛkṣānupetya svargamāpnuyāt
'इन तथा अन्य परम पुण्यमय वृक्षों का आश्रय लेकर स्वर्ग प्राप्त होता है।'
श्लोक 131 (skanda.5.181.131)
नारद उवाच। चैत्रे मासे तु या नारी कुर्याद्व्रतमनुत्तमम् । तस्य व्रतस्य चान्यानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्
nārada uvāca| caitre māse tu yā nārī kuryādvratamanuttamam | tasya vratasya cānyāni kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm
नारद बोले — 'जो स्त्री चैत्र मास में यह श्रेष्ठ व्रत करती है, उस व्रत की सोलहवीं कला के बराबर भी अन्य व्रत नहीं पहुँचते।'
श्लोक 132 (skanda.5.181.132)
श्रुतेन येन सुभगे दुर्भगत्वं न पश्यति । यथा हिमं रविं प्राप्य विलयं याति भूतले
śrutena yena subhage durbhagatvaṁ na paśyati | yathā himaṁ raviṁ prāpya vilayaṁ yāti bhūtale
'हे सुभगे! जिसके सुनने मात्र से दुर्भाग्य दिखाई नहीं देता, जैसे सूर्य को पाकर हिम पृथ्वी पर विलीन हो जाता है,'
श्लोक 133 (skanda.5.181.133)
तथा दुःखं च दौर्भाग्यं व्रतादस्माद्विलीयते । मधुकाख्यां तु ललितामाराधयति येन वै
tathā duḥkhaṁ ca daurbhāgyaṁ vratādasmādvilīyate | madhukākhyāṁ tu lalitāmārādhayati yena vai
'वैसे ही इस व्रत से दुःख और दुर्भाग्य विलीन हो जाते हैं। जो मधूक नामक ललिता (देवी) की आराधना करती है,'
श्लोक 134 (skanda.5.181.134)
विधिं तं शृणु सुभगे कथ्यमानं सुखावहम् । चैत्रे शुक्लतृतीयायां सुस्नाता शुद्धमानसा
vidhiṁ taṁ śṛṇu subhage kathyamānaṁ sukhāvaham | caitre śuklatṛtīyāyāṁ susnātā śuddhamānasā
'उस सुखदायक विधि को सुनो, हे सुभगे! चैत्र मास की शुक्ल तृतीया को भली-भाँति स्नान करके, शुद्ध मन से,'
श्लोक 135 (skanda.5.181.135)
प्रतिमां मधुवृक्षस्य शाङ्करीमुमया सह । कारयित्वा द्विजवरैः प्रतिष्ठाप्य यथाविधि
pratimāṁ madhuvṛkṣasya śāṅkarīmumayā saha | kārayitvā dvijavaraiḥ pratiṣṭhāpya yathāvidhi
'मधुवृक्ष की शांकरी प्रतिमा उमा सहित श्रेष्ठ ब्राह्मणों से बनवाकर, विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके,'
श्लोक 136 (skanda.5.181.136)
सुगन्धिकुसुमैर्धूपैस्तथा कर्पूरकुङ्कुमैः । पूजयेद्विधिना देवं मन्त्रयुक्तेन भामिनी
sugandhikusumairdhūpaistathā karpūrakuṅkumaiḥ | pūjayedvidhinā devaṁ mantrayuktena bhāminī
'सुगन्धित फूलों, धूप, कपूर और कुंकुम से, मंत्रयुक्त विधि से देव का पूजन स्त्री को करना चाहिए।'
श्लोक 137 (skanda.5.181.137)
पादौ नमः शिवायेति मेढ्रे वै मन्मथाय च । कालोदरायेत्युदरं नीलकंठाय कण्ठकम्
pādau namaḥ śivāyeti meḍhre vai manmathāya ca | kālodarāyetyudaraṁ nīlakaṁṭhāya kaṇṭhakam
'चरणों को “नमः शिवाय” से, कटि को कामदेव को, उदर को “कालोदराय” से, कण्ठ को नीलकंठ को —'
श्लोक 138 (skanda.5.181.138)
शिरः सर्वात्मने पूज्य उमां पश्चात्प्रपूजयेत् । क्षामोदरायैह्युदरं सुकण्ठायै च कण्ठकम्
śiraḥ sarvātmane pūjya umāṁ paścātprapūjayet | kṣāmodarāyaihyudaraṁ sukaṇṭhāyai ca kaṇṭhakam
'शिर को “सर्वात्मने” कहकर पूजित करे, फिर उमा का पूजन करे — उदर को “क्षामोदरायै”, कण्ठ को “सुकण्ठायै”,'
श्लोक 139 (skanda.5.181.139)
शिरः सौभाग्यदायिन्यै पश्चादर्घ्यं प्रदापयेत्
śiraḥ saubhāgyadāyinyai paścādarghyaṁ pradāpayet
'शिर को “सौभाग्यदायिन्यै” कहकर पूजित करे, फिर अर्घ्य प्रदान करे —'
श्लोक 140 (skanda.5.181.140)
नमस्ते देवदेवेश उमावर जगत्पते । अर्घ्येणानेन मे सर्वं दौर्भाग्यं नाशय प्रभो । इति अर्घ्यमन्त्रः
namaste devadeveśa umāvara jagatpate | arghyeṇānena me sarvaṁ daurbhāgyaṁ nāśaya prabho | iti arghyamantraḥ
'“हे देवदेवेश, उमावर, जगत्पते! आपको नमस्कार है। इस अर्घ्य से मेरा सारा दुर्भाग्य नष्ट कीजिए, हे प्रभो।” — यह अर्घ्य-मंत्र है।'
श्लोक 141 (skanda.5.181.141)
अर्घ्यं दत्त्वा ततः पश्चात्करकं वारिपूरितम् । मधूकपात्रोपभृतं सहिरण्यं तु शक्तितः
arghyaṁ dattvā tataḥ paścātkarakaṁ vāripūritam | madhūkapātropabhṛtaṁ sahiraṇyaṁ tu śaktitaḥ
'अर्घ्य देकर फिर जल से भरा घड़ा, मधुक-पात्र में रखा हुआ, यथाशक्ति सोने सहित,'
श्लोक 142 (skanda.5.181.142)
करकं वारिसम्पूर्णं सौभाग्येन तु संयुतम् । दत्तं तु ललिते तुभ्यं सौभाग्यादिविवर्धनम् । इति करकदानमन्त्रः
karakaṁ vārisampūrṇaṁ saubhāgyena tu saṁyutam | dattaṁ tu lalite tubhyaṁ saubhāgyādivivardhanam | iti karakadānamantraḥ
'जल से भरा, सौभाग्य से युक्त वह घड़ा — “हे ललिते! तुम्हें यह दिया जाता है, सौभाग्य आदि को बढ़ाने वाला” — यह घड़ा-दान का मंत्र है।'
श्लोक 143 (skanda.5.181.143)
मन्त्रेणानेन विप्राय दद्यात्करकमुत्तमम् । लवणं वर्जयेच्छुक्लां यावदन्यां तृतीयिकाम्
mantreṇānena viprāya dadyātkarakamuttamam | lavaṇaṁ varjayecchuklāṁ yāvadanyāṁ tṛtīyikām
'इस मंत्र से ब्राह्मण को उत्तम घड़ा देना चाहिए। अगली तृतीया तक शुक्ल पक्ष में नमक का त्याग करना चाहिए।'
श्लोक 144 (skanda.5.181.144)
क्षमाप्य देवीं देवेशां नक्तमद्यात्स्वयं हविः । अनेन विधिना सार्धं मासि मासि ह्यपक्रमेत्
kṣamāpya devīṁ deveśāṁ naktamadyātsvayaṁ haviḥ | anena vidhinā sārdhaṁ māsi māsi hyapakramet
'देवी से क्षमा माँगकर रात्रि में स्वयं हवि खानी चाहिए। इसी विधि से महीने-महीने आगे बढ़ना चाहिए।'
श्लोक 145 (skanda.5.181.145)
फाल्गुनस्य तृतीयायां शुक्लायां तु समाप्यते । वैशाखे लवणं देयं ज्येष्ठे चाज्यं प्रदीयते
phālgunasya tṛtīyāyāṁ śuklāyāṁ tu samāpyate | vaiśākhe lavaṇaṁ deyaṁ jyeṣṭhe cājyaṁ pradīyate
'यह व्रत फाल्गुन की शुक्ल तृतीया को समाप्त होता है। वैशाख में नमक, ज्येष्ठ में घी देना चाहिए,'
श्लोक 146 (skanda.5.181.146)
आषाढे मासि निष्पावाः पयो देयं तु श्रावणे । मुद्गा देया नभस्ये तु शालिमाश्वयुजे तथा
āṣāḍhe māsi niṣpāvāḥ payo deyaṁ tu śrāvaṇe | mudgā deyā nabhasye tu śālimāśvayuje tathā
'आषाढ़ में सेम, श्रावण में दूध देना चाहिए; भाद्रपद में मूँग, आश्विन में चावल,'
श्लोक 147 (skanda.5.181.147)
कार्त्तिके शर्करापात्रं करकं रससंभृतम् । मार्गशीर्षे तु कार्पासं करकं घृतसंयुतम्
kārttike śarkarāpātraṁ karakaṁ rasasaṁbhṛtam | mārgaśīrṣe tu kārpāsaṁ karakaṁ ghṛtasaṁyutam
'कार्तिक में शक्कर का पात्र तथा रस से भरा घड़ा; मार्गशीर्ष में कपास तथा घी से भरा घड़ा,'
श्लोक 148 (skanda.5.181.148)
पौषे तु कुङ्कुमं देयं माघे पात्रं तिलैर्भृतम् । फाल्गुने मासि सम्प्राप्ते पात्रं मोदकसंभृतम्
pauṣe tu kuṅkumaṁ deyaṁ māghe pātraṁ tilairbhṛtam | phālgune māsi samprāpte pātraṁ modakasaṁbhṛtam
'पौष में कुंकुम, माघ में तिल से भरा पात्र; फाल्गुन मास आने पर मोदकों से भरा पात्र देना चाहिए।'
श्लोक 149 (skanda.5.181.149)
पश्चात्तृतीयादेयं यत्तत्पूर्वस्यां विवर्जयेत् । विधानमासां सर्वासां सामान्यं मनसः प्रिये
paścāttṛtīyādeyaṁ yattatpūrvasyāṁ vivarjayet | vidhānamāsāṁ sarvāsāṁ sāmānyaṁ manasaḥ priye
'बाद की तृतीया को जो देना हो, वह पहली में न दे। सभी महीनों की यह सामान्य विधि है, हे मनःप्रिये!'
श्लोक 150 (skanda.5.181.150)
प्रतिमां मधुवृक्षस्य तामेव प्रतिपूजयेत् । तस्मै सर्वं तु विप्राय आचार्याय प्रदीयते
pratimāṁ madhuvṛkṣasya tāmeva pratipūjayet | tasmai sarvaṁ tu viprāya ācāryāya pradīyate
'उसी मधुवृक्ष की प्रतिमा का पूजन बना रहे। वह सब कुछ उस आचार्य ब्राह्मण को दिया जाता है।'
श्लोक 151 (skanda.5.181.151)
ततः संवत्सरस्यान्ते उद्यापनविधिं शृणु । मधुवृक्षं ततो गत्वा बहुसम्भारसंवृतः
tataḥ saṁvatsarasyānte udyāpanavidhiṁ śṛṇu | madhuvṛkṣaṁ tato gatvā bahusambhārasaṁvṛtaḥ
'तत्पश्चात् वर्ष के अन्त में उद्यापन-विधि सुनो — मधुवृक्ष के पास जाकर, अनेक सामग्री सहित,'
श्लोक 152 (skanda.5.181.152)
निखनेत्प्रतिमां मध्ये माधूकीं मधुकस्य च । तत्रस्थं पूजयेत्सर्वमुमादेहार्द्धधारिणम्
nikhanetpratimāṁ madhye mādhūkīṁ madhukasya ca | tatrasthaṁ pūjayetsarvamumādehārddhadhāriṇam
'मधूक-वृक्ष की प्रतिमा को वहीं मध्य में स्थापित करके, वहाँ उमा-देह के अर्धधारक (अर्धनारीश्वर) का पूर्ण पूजन करे,'
श्लोक 153 (skanda.5.181.153)
पूजोपहारैर्विपुलैः कुङ्कुमेन पुनःपुनः । श्लक्ष्णाभिः पुष्पमालाभिः कौसुम्भैः केसरेण च
pūjopahārairvipulaiḥ kuṅkumena punaḥpunaḥ | ślakṣṇābhiḥ puṣpamālābhiḥ kausumbhaiḥ kesareṇa ca
'विपुल पूजोपहारों से, बार-बार कुंकुम से, कोमल पुष्पमालाओं से, कुसुम्भ-वस्त्रों तथा केसर से,'
श्लोक 154 (skanda.5.181.154)
कौसुम्भे वाससी शुभ्रे अतसीपुष्पसन्निभे । परिधाप्य तां प्रतिमां दम्पती रविसंख्यया
kausumbhe vāsasī śubhre atasīpuṣpasannibhe | paridhāpya tāṁ pratimāṁ dampatī ravisaṁkhyayā
'अलसी-पुष्प के समान श्वेत कुसुम्भ वस्त्रों से उस दम्पति-प्रतिमा को वस्त्र पहनाकर, सूर्य-संख्या के अनुसार (बारह),'
श्लोक 155 (skanda.5.181.155)
उपानद्युगलैश्छत्रैः कण्ठसूत्रैः सकण्ठिकैः । कटकैरङ्गुलीयैश्च शयनीयैः शुभास्तृतैः
upānadyugalaiśchatraiḥ kaṇṭhasūtraiḥ sakaṇṭhikaiḥ | kaṭakairaṅgulīyaiśca śayanīyaiḥ śubhāstṛtaiḥ
'जूतों के जोड़े, छत्र, कण्ठसूत्र, कण्ठी, कड़े, अंगूठियाँ, तथा सुन्दर बिछौने वाली शय्याएँ,'
श्लोक 156 (skanda.5.181.156)
कुङ्कुमेन विलिप्ताङ्गौ बहुपुष्पैश्च पूजितौ । भोजयेद्विविधै रत्नैर्मधूकावासके स्थितौ
kuṅkumena viliptāṅgau bahupuṣpaiśca pūjitau | bhojayedvividhai ratnairmadhūkāvāsake sthitau
'कुंकुम से लिप्त अंगों वाले, अनेक फूलों से पूजित उन दोनों को मधूक-निवास में स्थित कराके विविध रत्नों से भोजन कराए।'
श्लोक 157 (skanda.5.181.157)
भुक्तोत्थितौ तु विश्राम्य शय्यासु च क्षमापयेत् । गुरुमूलं यतः सर्वं गुरुर्ज्ञेयो महेश्वरः
bhuktotthitau tu viśrāmya śayyāsu ca kṣamāpayet | gurumūlaṁ yataḥ sarvaṁ gururjñeyo maheśvaraḥ
'भोजन के बाद उठकर विश्राम करके शय्याओं पर उनसे क्षमा माँगे; क्योंकि सबका मूल गुरु है, और गुरु महेश्वर ही जानने योग्य हैं।'
श्लोक 158 (skanda.5.181.158)
प्रीते गुरौ ततः सर्वं जगत्प्रीतं सुरासुरम् । यद्यदिष्टतमं लोके यत्किंचिद्दयितं गृहे
prīte gurau tataḥ sarvaṁ jagatprītaṁ surāsuram | yadyadiṣṭatamaṁ loke yatkiṁciddayitaṁ gṛhe
'गुरु के प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत्, सुर और असुर, प्रसन्न हो जाता है। संसार में जो कुछ अत्यन्त प्रिय हो, घर में जो भी दुलारा हो,'
श्लोक 159 (skanda.5.181.159)
तत्सर्वं गुरवे देयमात्मनः श्रेय इच्छता । इदं तु धनिभिर्देयमन्यैर्देयं यथोच्यते
tatsarvaṁ gurave deyamātmanaḥ śreya icchatā | idaṁ tu dhanibhirdeyamanyairdeyaṁ yathocyate
'वह सब अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले को गुरु को दे देना चाहिए। यह धनवानों द्वारा देय है; अन्यों को जितना कहा गया, उतना देना चाहिए।'
श्लोक 160 (skanda.5.181.160)
दाम्पत्यमेकं विधिवत्प्रतिपूज्य शुभव्रतैः । द्वितीयं गुरुदाम्पत्यं वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्
dāmpatyamekaṁ vidhivatpratipūjya śubhavrataiḥ | dvitīyaṁ gurudāmpatyaṁ vittaśāṭhyaṁ vivarjayet
'विधिपूर्वक एक दम्पति-युगल का शुभ व्रतों से पूजन करके, दूसरे गुरु-दम्पति के प्रति धन-कंजूसी का त्याग करे।'
श्लोक 161 (skanda.5.181.161)
ततः क्षमापयेद्देवीं देवं च ब्राह्मणं गुरुम् । यथा त्वं देवि ललिते न वियुक्तासि शम्भुना
tataḥ kṣamāpayeddevīṁ devaṁ ca brāhmaṇaṁ gurum | yathā tvaṁ devi lalite na viyuktāsi śambhunā
'तत्पश्चात् देवी, देव तथा गुरु ब्राह्मण से क्षमा माँगे — “जैसे तुम, हे देवि ललिते, शम्भु से कभी वियुक्त नहीं हुईं,'
श्लोक 162 (skanda.5.181.162)
तथा मे पतिपुत्राणामवियोगः प्रदीयताम् । अनेन विधिना कृत्वा तृतीयां मधुसंज्ञिकाम्
tathā me patiputrāṇāmaviyogaḥ pradīyatām | anena vidhinā kṛtvā tṛtīyāṁ madhusaṁjñikām
'वैसे ही मेरे पति और पुत्रों का वियोग न हो, यह प्रदान करो।“ इस विधि से मधु-संज्ञक तृतीया व्रत करके,'
श्लोक 163 (skanda.5.181.163)
इन्द्राणी चेन्द्रपत्नीत्वमवाप सुतमुत्तमम् । सौभाग्यं सर्वलोकेषु सर्वर्द्धिसुखमुत्तमम्
indrāṇī cendrapatnītvamavāpa sutamuttamam | saubhāgyaṁ sarvalokeṣu sarvarddhisukhamuttamam
इन्द्राणी ने इन्द्र की पत्नी होने का पद, श्रेष्ठ पुत्र, समस्त लोकों में सौभाग्य तथा सर्वऋद्धि-सुख प्राप्त किया।
श्लोक 164 (skanda.5.181.164)
अनेन विधिना या तु कुमारी व्रतमाचरेत् । शोभनं पतिमाप्नोति यथेन्द्राण्या शतक्रतुः
anena vidhinā yā tu kumārī vratamācaret | śobhanaṁ patimāpnoti yathendrāṇyā śatakratuḥ
इसी विधि से जो कुमारी यह व्रत करती है, वह इन्द्राणी की तरह शतक्रतु (इन्द्र) के समान सुन्दर पति प्राप्त करती है।
श्लोक 165 (skanda.5.181.165)
दुर्भगा सुभगत्वं च सुभगा पुत्रिणी भवेत् । पुत्रिण्यक्षयमाप्नोति न शोकं पश्यति क्वचित्
durbhagā subhagatvaṁ ca subhagā putriṇī bhavet | putriṇyakṣayamāpnoti na śokaṁ paśyati kvacit
अभागिन सौभाग्यशालिनी बन जाती है, और सौभाग्यशालिनी पुत्रवती बनती है; पुत्रवती अक्षय सुख प्राप्त करती है और कभी शोक नहीं देखती।
श्लोक 166 (skanda.5.181.166)
अनेकजन्मजनितं दौर्भाग्यं नश्यति ध्रुवम् । मृता तु त्रिदिवं प्राप्य उमया सह मोदते
anekajanmajanitaṁ daurbhāgyaṁ naśyati dhruvam | mṛtā tu tridivaṁ prāpya umayā saha modate
अनेक जन्मों से चला आया दुर्भाग्य निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है; मरने के बाद वह स्वर्ग को प्राप्त होकर उमा के साथ आनन्दित होती है।
श्लोक 167 (skanda.5.181.167)
कल्पकोटिशतं साग्रं भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान् । पुनस्तु सम्भवे लोके पार्थिवं पतिमाप्नुयात्
kalpakoṭiśataṁ sāgraṁ bhuktvā bhogān yathepsitān | punastu sambhave loke pārthivaṁ patimāpnuyāt
सौ करोड़ से अधिक कल्पों तक इच्छित भोगों को भोगकर, वह पुनः संसार में जन्म लेकर राजा को पति के रूप में प्राप्त करती है।
श्लोक 168 (skanda.5.181.168)
सुभगा रूपसम्पन्ना पार्थिवं जनयेत्सुतम्
subhagā rūpasampannā pārthivaṁ janayetsutam
सौभाग्यशालिनी, रूपसम्पन्न वह राजपुत्र को जन्म देती है।
श्लोक 169 (skanda.5.181.169)
एतत्ते कथितं सर्वं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । अन्यत्पृच्छस्व सुभगे वाञ्छितं यद्धृदि स्थितम्
etatte kathitaṁ sarvaṁ vratānāmuttamaṁ vratam | anyatpṛcchasva subhage vāñchitaṁ yaddhṛdi sthitam
यह सब तुम्हें बताया गया — व्रतों में यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है। हे सुभगे! जो भी अन्य तुम्हारे हृदय में अभीष्ट हो, वह पूछो।