अवन्ती खण्ड · अध्याय 182
त्रिपुरक्षोभण वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.182.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। नारदस्य वचः श्रुत्वा राज्ञी वचनमब्रवीत् । प्रसादं कुरु विप्रेन्द्र गृह्ण दानं यथेप्सितम्
śrīmārkaṇḍeya uvāca| nāradasya vacaḥ śrutvā rājñī vacanamabravīt | prasādaṁ kuru viprendra gṛhṇa dānaṁ yathepsitam
श्रीमार्कण्डेय बोले — नारद के वचन सुनकर रानी ने कहा — 'हे विप्रेन्द्र! प्रसन्न होइए, इच्छानुसार दान ग्रहण कीजिए।'
श्लोक 2 (skanda.5.182.2)
सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । तत्ते दारयामि विप्रेन्द्र यच्चान्यदपि दुर्लभम्
suvarṇamaṇiratnāni vastrāṇi vividhāni ca | tatte dārayāmi viprendra yaccānyadapi durlabham
'स्वर्ण, मणि, रत्न तथा विविध वस्त्र — हे विप्रेन्द्र! ये सब मैं आपको देती हूँ, और जो भी अन्य दुर्लभ वस्तु हो, वह भी।'
श्लोक 3 (skanda.5.182.3)
राज्ञ्यास्तु वचनं श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् । अन्येषां दीयतां भद्रे ये द्विजाः क्षीणवृत्तयः
rājñyāstu vacanaṁ śrutvā nārado vākyamabravīt | anyeṣāṁ dīyatāṁ bhadre ye dvijāḥ kṣīṇavṛttayaḥ
रानी के वचन सुनकर नारद ने कहा — 'हे भद्रे! यह उन दूसरे ब्राह्मणों को दो, जिनकी वृत्ति क्षीण है।'
श्लोक 4 (skanda.5.182.4)
वयं तु सर्वसम्पन्ना भक्तिग्राह्याः सदैव हि । इत्युक्ता सा तदा राज्ञी वेदवेदाङ्गपारगान्
vayaṁ tu sarvasampannā bhaktigrāhyāḥ sadaiva hi | ityuktā sā tadā rājñī vedavedāṅgapāragān
'हम तो सर्वसम्पन्न हैं, हमें तो सदा केवल भक्ति से ही ग्रहण किया जा सकता है।' यह सुनकर रानी ने वेद-वेदांगपारंगत ब्राह्मणों को
श्लोक 5 (skanda.5.182.5)
आहूय ब्राह्मणान्निःस्वान्दातुं समुपचक्रमे । यत्किंचिन्नारदेनोक्तं दानसौभाग्यवर्धनम्
āhūya brāhmaṇānniḥsvāndātuṁ samupacakrame | yatkiṁcinnāradenoktaṁ dānasaubhāgyavardhanam
बुलाकर उन निर्धन ब्राह्मणों को दान देना आरम्भ किया; नारद ने दान से सौभाग्य बढ़ाने वाली जो भी बात कही थी,
श्लोक 6 (skanda.5.182.6)
तेन दानेन मे नित्यं प्रीयेतां हरिशङ्करौ । ततो राज्ञी च सा प्राह नारदं मुनिपुंगवम्
tena dānena me nityaṁ prīyetāṁ hariśaṅkarau | tato rājñī ca sā prāha nāradaṁ munipuṁgavam
'उस दान से हरि और शंकर सदा मुझ पर प्रसन्न हों' — यह कहते हुए दान दिया। तत्पश्चात् उस रानी ने मुनिश्रेष्ठ नारद से कहा —
श्लोक 7 (skanda.5.182.7)
राज्ञ्युवाच - दानं दत्तं त्वयोक्तं यद्भर्तृकर्मपरं हि तत् । आजन्मजन्म मे भर्ता भवेद्बाणो द्विजोत्तम
rājñyuvāca - dānaṁ dattaṁ tvayoktaṁ yadbhartṛkarmaparaṁ hi tat | ājanmajanma me bhartā bhavedbāṇo dvijottama
रानी बोली — 'आपके कहने पर जो दान दिया गया है, वह मेरे पति के कल्याण के लिए ही है। हे द्विजोत्तम! जन्म-जन्म में बाण ही मेरे पति हों।'
श्लोक 8 (skanda.5.182.8)
नान्यो हि दैवतं तात मुक्त्वा बाणं द्विजोत्तम । तेन सत्येन मे भर्ता जीवेच्च शरदां शतम्
nānyo hi daivataṁ tāta muktvā bāṇaṁ dvijottama | tena satyena me bhartā jīvecca śaradāṁ śatam
'हे तात! बाण के अतिरिक्त, हे द्विजोत्तम, मेरा और कोई देवता नहीं है। इसी सत्य से मेरे पति सौ वर्षों तक जीवित रहें।'
श्लोक 9 (skanda.5.182.9)
नान्यो धर्मो भवेत्स्त्रीणां दैवतं हि पतिर्यथा । तथापि तव वाक्येन दानं दत्तं यथाविधि
nānyo dharmo bhavetstrīṇāṁ daivataṁ hi patiryathā | tathāpi tava vākyena dānaṁ dattaṁ yathāvidhi
'स्त्रियों के लिए पति के समान अन्य कोई धर्म नहीं है, क्योंकि पति ही उनका देवता है; फिर भी आपके वचन से विधिपूर्वक यह दान दिया गया है।'
श्लोक 10 (skanda.5.182.10)
स्वकं कर्म करिष्यामो भर्तारं प्रति मानद । ब्रह्मर्षे गच्छ चेदानीं त्वमाशीर्वादः प्रदीयताम्
svakaṁ karma kariṣyāmo bhartāraṁ prati mānada | brahmarṣe gaccha cedānīṁ tvamāśīrvādaḥ pradīyatām
'हे मानद! हम अपने पति के प्रति अपना कर्तव्य निभाएँगी। हे ब्रह्मर्षे! अब आप जाइए, और आशीर्वाद प्रदान कीजिए।'
श्लोक 11 (skanda.5.182.11)
तथेति तामनुज्ञाप्य नारदो नृपसत्तम । सर्वासां मानसं हृत्वा अन्यतः कृतमानसः
tatheti tāmanujñāpya nārado nṛpasattama | sarvāsāṁ mānasaṁ hṛtvā anyataḥ kṛtamānasaḥ
हे नृपसत्तम! 'तथास्तु' कहकर उससे विदा लेकर नारद ने उन सभी के मन को हर लिया, तथा स्वयं अन्यत्र मन लगाकर,
श्लोक 12 (skanda.5.182.12)
जगामादर्शनं विप्रः पूज्यमानस्तु खेचरैः । ततो गतमनस्कास्ता भर्तारं प्रति भारत
jagāmādarśanaṁ vipraḥ pūjyamānastu khecaraiḥ | tato gatamanaskāstā bhartāraṁ prati bhārata
आकाशचारी देवगणों द्वारा पूजित होते हुए वह विप्र अदृश्य हो गए। तब, हे भारत! अपने पति के प्रति उन रानियों का मन विचलित हो गया,
श्लोक 13 (skanda.5.182.13)
विवर्णा निष्प्रभा जाता नारदेन विमोहिताः
vivarṇā niṣprabhā jātā nāradena vimohitāḥ
वे नारद द्वारा मोहित होकर विवर्ण तथा निस्तेज हो गईं।