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अवन्ती खण्ड · अध्याय 183

त्रिपुरविध्वंस में ज्वालेश्वर-अमरेश्वर तीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 182अध्याय-सूचीअध्याय 184

श्लोक 1 (skanda.5.183.1)

मार्कण्डेय उवाच। एतस्मिन्नन्तरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः । क्रीडते ह्युमया सार्द्धं नारदस्तत्र चागतः

mārkaṇḍeya uvāca| etasminnantare rudro narmadātaṭamāsthitaḥ | krīḍate hyumayā sārddhaṁ nāradastatra cāgataḥ

मार्कण्डेय बोले — इसी बीच रुद्र नर्मदा के तट पर उमा सहित क्रीड़ा कर रहे थे; तभी नारद वहाँ आए।

श्लोक 2 (skanda.5.183.2)

प्रणम्य देवदेवेशमुमया सह शङ्करम् । व्यज्ञापयत्तदा देवं यद्वृत्तं त्रिपुरे तदा

praṇamya devadeveśamumayā saha śaṅkaram | vyajñāpayattadā devaṁ yadvṛttaṁ tripure tadā

उमा सहित देवदेवेश शंकर को प्रणाम करके उन्होंने देव को बताया कि त्रिपुर में क्या घटित हुआ था —

श्लोक 3 (skanda.5.183.3)

गतोऽहं स्वामिनिर्देशाद्यत्र तद्बाणमन्दिरम् । दृष्टा बाणं यथान्यायं गतो ह्यन्तःपुरं महत्

gato'haṁ svāminirdeśādyatra tadbāṇamandiram | dṛṣṭā bāṇaṁ yathānyāyaṁ gato hyantaḥpuraṁ mahat

'स्वामी की आज्ञा से मैं वहाँ गया, जहाँ बाण का वह भवन है; विधिपूर्वक बाण के दर्शन करके मैं विशाल अन्तःपुर में गया।'

श्लोक 4 (skanda.5.183.4)

तत्र भार्यासहस्राणि दृष्ट्वा बाणस्य धीमतः । यथायोग्यं यथाकाममागतः क्षोभ्य तत्पुरम्

tatra bhāryāsahasrāṇi dṛṣṭvā bāṇasya dhīmataḥ | yathāyogyaṁ yathākāmamāgataḥ kṣobhya tatpuram

'वहाँ बुद्धिमान् बाण की हज़ारों पत्नियों को देखकर, यथोचित और यथेच्छ उस नगर को क्षुब्ध करके मैं लौट आया हूँ।'

श्लोक 5 (skanda.5.183.5)

नारदस्य वचः श्रुत्वा साधु साध्विति पूजयन् । चिन्तयामास देवेशो भ्रमणं त्रिपुरस्य हि

nāradasya vacaḥ śrutvā sādhu sādhviti pūjayan | cintayāmāsa deveśo bhramaṇaṁ tripurasya hi

नारद के वचन सुनकर, 'साधु-साधु' कहकर उनका सम्मान करते हुए देवेश त्रिपुर के भ्रमण के विषय में सोचने लगे —

श्लोक 6 (skanda.5.183.6)

करमुक्तं यथा चक्रं विष्णुना प्रभविष्णुना । महावेगं महायामं रक्षितं तेजसा मम

karamuktaṁ yathā cakraṁ viṣṇunā prabhaviṣṇunā | mahāvegaṁ mahāyāmaṁ rakṣitaṁ tejasā mama

'जैसे प्रभावशाली विष्णु के हाथ से छूटा चक्र महावेगी और महादूरगामी होता है, वैसे ही मेरे तेज से सुरक्षित —'

श्लोक 7 (skanda.5.183.7)

स च मे भक्तिनिरतो बाणो लोके च विश्रुतः । भारती च मया दत्ता ब्राह्मणानां विशेषतः

sa ca me bhaktinirato bāṇo loke ca viśrutaḥ | bhāratī ca mayā dattā brāhmaṇānāṁ viśeṣataḥ

'— वह बाण भी मेरा भक्त और लोक में विख्यात है; और विशेष रूप से ब्राह्मणों को भारती (वाणी) मैंने दी है।'

श्लोक 8 (skanda.5.183.8)

एवं स सुचिरं कालं देवदेवो महेश्वरः । चिन्तयित्वा सुनिर्वाणं कार्यं प्रति जनेश्वरः

evaṁ sa suciraṁ kālaṁ devadevo maheśvaraḥ | cintayitvā sunirvāṇaṁ kāryaṁ prati janeśvaraḥ

इस प्रकार वह देवदेव, जनेश्वर महेश्वर दीर्घकाल तक इस उत्तम कार्य के विषय में विचार करते रहे।

श्लोक 9 (skanda.5.183.9)

ततोऽसौ मन्दरं ध्यात्वा चापे कृत्वा गुणे महीम् । विष्णुं सनातनं देवं बाणे ध्यात्वा त्रिलोचनः

tato'sau mandaraṁ dhyātvā cāpe kṛtvā guṇe mahīm | viṣṇuṁ sanātanaṁ devaṁ bāṇe dhyātvā trilocanaḥ

तब उन्होंने मन्दर पर्वत का ध्यान करके, पृथ्वी को धनुष बनाकर, तथा सनातन देव विष्णु को बाण के रूप में ध्यान करके, त्रिनेत्र ने,

श्लोक 10 (skanda.5.183.10)

फले हुताशनं देवं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । सुपर्णं पुङ्खयोर्मध्ये जवे वायुं प्रकल्प्य च

phale hutāśanaṁ devaṁ jvalantaṁ sarvatomukham | suparṇaṁ puṅkhayormadhye jave vāyuṁ prakalpya ca

फलक में सर्वमुखी, प्रज्वलित अग्निदेव को, पंखों के मध्य में गरुड़ को, तथा वेग के लिए वायु को स्थापित करके,

श्लोक 11 (skanda.5.183.11)

रथं महीमयं कृत्वा धुरि तावश्विनावुभौ । अक्षे सुरेश्वरं देवमग्रकील्यां धनाधिपम्

rathaṁ mahīmayaṁ kṛtvā dhuri tāvaśvināvubhau | akṣe sureśvaraṁ devamagrakīlyāṁ dhanādhipam

पृथ्वीमय रथ बनाकर, धुरी में दोनों अश्विनीकुमारों को, अक्ष में सुरेश्वर इन्द्र को, अगले कील में धनाधिप कुबेर को,

श्लोक 12 (skanda.5.183.12)

यमं तु दक्षिणे पार्श्वे वामे कालं सुदारुणम् । आदित्यचन्द्रौ चक्रे तु गन्धर्वानारकादिषु

yamaṁ tu dakṣiṇe pārśve vāme kālaṁ sudāruṇam | ādityacandrau cakre tu gandharvānārakādiṣu

दक्षिण पार्श्व में यम को, बाएँ अत्यन्त भयंकर काल को, चक्रों में सूर्य-चन्द्र को, गन्धर्व आदि को यथायोग्य स्थापित करके,

श्लोक 13 (skanda.5.183.13)

यन्तारं च सुरज्येष्ठं वेदान्कृत्वा हयोत्तमान् । खलीनादिषु चाङ्गानि रश्मींश्छन्दांसि चाकरोत्

yantāraṁ ca surajyeṣṭhaṁ vedānkṛtvā hayottamān | khalīnādiṣu cāṅgāni raśmīṁśchandāṁsi cākarot

देवश्रेष्ठ ब्रह्मा को सारथि बनाकर, वेदों को श्रेष्ठ अश्व बनाया, लगाम आदि अंगों में रश्मियों को छन्दों से युक्त किया,

श्लोक 14 (skanda.5.183.14)

कृत्वा प्रतोदमोंकारं मुखग्राह्यं महेश्वरः । धातारं चाग्रतः कृत्वा विधातारं च पृष्ठतः

kṛtvā pratodamoṁkāraṁ mukhagrāhyaṁ maheśvaraḥ | dhātāraṁ cāgrataḥ kṛtvā vidhātāraṁ ca pṛṣṭhataḥ

प्रतोद (चाबुक) को ओंकाररूप बनाकर मुख में धारण करते हुए महेश्वर ने आगे धाता को और पीछे विधाता को स्थापित किया,

श्लोक 15 (skanda.5.183.15)

मारुतात्सर्वतो दिग्भ्य ऊर्ध्वयन्त्रे तथैव च । महोरगपिशाचांश्च सिद्धविद्याधरांस्तथा

mārutātsarvato digbhya ūrdhvayantre tathaiva ca | mahoragapiśācāṁśca siddhavidyādharāṁstathā

सभी दिशाओं से वायु को ऊपरी यंत्रों में स्थापित किया, तथा महानागों, पिशाचों, सिद्धों और विद्याधरों को,

श्लोक 16 (skanda.5.183.16)

गणांश्च भूतसङ्घांश्च सर्वे सर्वाङ्गसंधिषु । युगमध्ये स्थितो मेरुर्युगस्याधो महागिरिः

gaṇāṁśca bhūtasaṅghāṁśca sarve sarvāṅgasaṁdhiṣu | yugamadhye sthito meruryugasyādho mahāgiriḥ

गणों और भूतसमूहों को सभी अंग-संधियों में स्थापित किया; युग (जुए) के मध्य मेरु पर्वत स्थित था, युग के नीचे वह महापर्वत;

श्लोक 17 (skanda.5.183.17)

सर्पा यन्त्रस्थिता घोराः शम्ये वरुणनैरृतौ । गायत्री चैव सावित्री स्थिते ते रश्मिबन्धने

sarpā yantrasthitā ghorāḥ śamye varuṇanairṛtau | gāyatrī caiva sāvitrī sthite te raśmibandhane

यंत्र में स्थित घोर सर्प, शमी (लकड़ी) के स्थान पर वरुण-नैर्ऋत, गायत्री और सावित्री रश्मि-बन्धन में स्थित थीं,

श्लोक 18 (skanda.5.183.18)

सत्यं रथध्वजे शौचं दमं रक्षां समन्ततः । रथं देवमयं कृत्वा देवदेवो महेश्वरः

satyaṁ rathadhvaje śaucaṁ damaṁ rakṣāṁ samantataḥ | rathaṁ devamayaṁ kṛtvā devadevo maheśvaraḥ

रथध्वज पर सत्य, चारों ओर रक्षा के लिए शौच और दम — इस प्रकार देवमय रथ बनाकर देवदेव महेश्वर ने,

श्लोक 19 (skanda.5.183.19)

संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । बद्धा परिकरं गाढं जटाजूटं नियम्य च

saṁnaddhaḥ kavacī khaḍgī baddhagodhāṅgulitravān | baddhā parikaraṁ gāḍhaṁ jaṭājūṭaṁ niyamya ca

कवचधारी, खड्गधारी, गोधा-चर्म की अंगुलित्राण बाँधे, कमरबन्द को दृढ़ता से बाँधकर, जटाजूट को नियन्त्रित करके,

श्लोक 20 (skanda.5.183.20)

सज्जं कृत्वा धनुर्दिव्यं योजयित्वा रथोत्तमम् । रथमध्ये स्थितो देवः शुशुभे च युधिष्ठिर

sajjaṁ kṛtvā dhanurdivyaṁ yojayitvā rathottamam | rathamadhye sthito devaḥ śuśubhe ca yudhiṣṭhira

दिव्य धनुष को सज्जित करके उस श्रेष्ठ रथ में योजित होकर, रथ के मध्य में स्थित हुए देव, हे युधिष्ठिर! वे अत्यन्त शोभायमान हुए।

श्लोक 21 (skanda.5.183.21)

धनुषः शब्दनादेनाकम्पयच्च जगत्त्रयम् । स्थानं कृत्वा तु वैशाखं निभृतं संस्थितो हरः

dhanuṣaḥ śabdanādenākampayacca jagattrayam | sthānaṁ kṛtvā tu vaiśākhaṁ nibhṛtaṁ saṁsthito haraḥ

धनुष की टंकार-ध्वनि से उन्होंने तीनों लोकों को कंपा दिया; वैशाख (मुद्रा में) स्थिर स्थान बनाकर हर स्थिर खड़े हुए,

श्लोक 22 (skanda.5.183.22)

निरीक्ष्य सुचिरं कालं कोपसंरक्तलोचनः । ध्यात्वा तं परमं मन्त्रमात्मानं च निरुध्य सः

nirīkṣya suciraṁ kālaṁ kopasaṁraktalocanaḥ | dhyātvā taṁ paramaṁ mantramātmānaṁ ca nirudhya saḥ

दीर्घकाल तक देखते हुए, क्रोध से लाल नेत्रों वाले, उस परम मन्त्र का ध्यान करके तथा स्वयं को संयमित करके,

श्लोक 23 (skanda.5.183.23)

मुमोच सहसा बाणं पुरस्य वधकाङ्क्षया । यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षस्थितानि तु

mumoca sahasā bāṇaṁ purasya vadhakāṅkṣayā | yadā trīṇi sametāni antarikṣasthitāni tu

उन्होंने नगर के वध की इच्छा से सहसा बाण छोड़ा, जब तीनों (नगर) आकाश में एक साथ आ मिले,

श्लोक 24 (skanda.5.183.24)

ततः कालनिमेषार्धं दृष्ट्वैक्यं त्रिपुरस्य च । त्रिपर्वणा त्रिशल्येन ततस्तान्यवसादयत्

tataḥ kālanimeṣārdhaṁ dṛṣṭvaikyaṁ tripurasya ca | triparvaṇā triśalyena tatastānyavasādayat

तब आधे पलक झपकने के समय में त्रिपुर की एकता देखकर उन्होंने त्रिपर्व, त्रिशल्य बाण से उन्हें ध्वस्त कर दिया।

श्लोक 25 (skanda.5.183.25)

ततो लोका भयत्रस्तास्त्रिपुरे भरतोत्तम । सर्वासुरविनाशाय कालरूपा भयावहाः

tato lokā bhayatrastāstripure bharatottama | sarvāsuravināśāya kālarūpā bhayāvahāḥ

हे भरतोत्तम! तब त्रिपुर के लोग भयभीत हो गए, क्योंकि समस्त असुरों के विनाश के लिए कालरूप भयंकर दृश्य दिखाई देने लगे —

श्लोक 26 (skanda.5.183.26)

अट्टहासान् प्रमुञ्चन्ति कष्टरूपा नरास्तदा । निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वन्ति लिपिकर्मसु

aṭṭahāsān pramuñcanti kaṣṭarūpā narāstadā | nimeṣonmeṣaṇaṁ caiva kurvanti lipikarmasu

वे लोग तब कष्टपूर्ण रूप में अट्टहास करने लगे; वे लेखन-कार्य में भी बस पलकें झपकाते रहते —

श्लोक 27 (skanda.5.183.27)

निष्पन्दनयना मर्त्याश्चित्रेष्वालिखिता इव । देवायतनगा देवा रटन्ति प्रहसन्ति च । स्वप्ने पश्यन्ति चात्मानं रक्ताम्बरविभूषितम्

niṣpandanayanā martyāścitreṣvālikhitā iva | devāyatanagā devā raṭanti prahasanti ca | svapne paśyanti cātmānaṁ raktāmbaravibhūṣitam

मानो चित्रों में अंकित मनुष्यों के नेत्र स्तब्ध हो गए हों; मन्दिरों में देवता चिल्लाने और हँसने लगे; लोग स्वप्न में स्वयं को लाल वस्त्रों से भूषित देखने लगे,

श्लोक 28 (skanda.5.183.28)

रक्तमाल्योत्तमाङ्गाश्च पतन्तः कार्दमे ह्रदे । पश्यन्ति नाम चात्मानं सतैलाभ्यङ्गमस्तकम्

raktamālyottamāṅgāśca patantaḥ kārdame hrade | paśyanti nāma cātmānaṁ satailābhyaṅgamastakam

सिर पर लाल माला डाले, कीचड़ भरे तालाब में गिरते हुए; वे स्वयं को सिर में तेल लगाए देखने लगे,

श्लोक 29 (skanda.5.183.29)

पश्यन्ति यानमारूढं रासभैश्च नृपोत्तम । संवर्तको महावायुर्युगान्तप्रतिमो महान्

paśyanti yānamārūḍhaṁ rāsabhaiśca nṛpottama | saṁvartako mahāvāyuryugāntapratimo mahān

हे नृपोत्तम! वे स्वयं को गधों से जुते वाहन पर सवार देखने लगे; युगान्त के समान महान् संवर्तक महावायु ने,

श्लोक 30 (skanda.5.183.30)

गृहानुन्मूलयामास वृक्षजातीननेकशः । भूमिकम्पाः सनिर्घाता उल्कापाताः सहस्रशः

gṛhānunmūlayāmāsa vṛkṣajātīnanekaśaḥ | bhūmikampāḥ sanirghātā ulkāpātāḥ sahasraśaḥ

घरों को उखाड़ फेंका, अनेक प्रकार के वृक्षों को भी; भूकम्प, गड़गड़ाहट तथा हज़ारों उल्कापात होने लगे,

श्लोक 31 (skanda.5.183.31)

रुधिरं वर्षते देवो मिश्रितं कर्करैर्बहु । अग्निकुण्डेषु विप्राणां हुतः सम्यग्घुताशनः

rudhiraṁ varṣate devo miśritaṁ karkarairbahu | agnikuṇḍeṣu viprāṇāṁ hutaḥ samyagghutāśanaḥ

देव (आकाश) ने ककड़ों से मिश्रित बहुत सा रक्त बरसाया; ब्राह्मणों के अग्निकुण्डों में विधिपूर्वक हवन की गई अग्नि,

श्लोक 32 (skanda.5.183.32)

ज्वलते धूमसंयुक्तो विस्फुलिङ्गकणैः सह । कुंजरा विमदा जातास्तुरगाः सत्त्ववर्जिताः

jvalate dhūmasaṁyukto visphuliṅgakaṇaiḥ saha | kuṁjarā vimadā jātāsturagāḥ sattvavarjitāḥ

धुएँ से युक्त, चिंगारियों सहित जलने लगी; हाथी मदरहित हो गए, घोड़े शक्तिहीन हो गए,

श्लोक 33 (skanda.5.183.33)

अवादितानि वाद्यन्ते वादित्राणि सहस्रशः । ध्वजा ह्यकम्पिताः पेतुश्छत्राणि विविधानि च

avāditāni vādyante vāditrāṇi sahasraśaḥ | dhvajā hyakampitāḥ petuśchatrāṇi vividhāni ca

बिना बजाए ही हज़ारों वाद्य बजने लगे; बिना हिलाए ही ध्वजाएँ और विविध छत्र गिरने लगे,

श्लोक 34 (skanda.5.183.34)

ज्वलति पादपास्तत्र पर्णानि च सभं ततः । सर्वं तद्व्याकुलीभूतं हाहाकारसमन्वितम्

jvalati pādapāstatra parṇāni ca sabhaṁ tataḥ | sarvaṁ tadvyākulībhūtaṁ hāhākārasamanvitam

वहाँ वृक्ष और पत्ते जलने लगे, फिर सभा-भवन भी; वह सब व्याकुल हो गया, हाहाकार से भर गया,

श्लोक 35 (skanda.5.183.35)

उद्यानानि विचित्राणि प्रबभञ्ज प्रभञ्जनः । तेन संप्रेरिताः सर्वे ज्वलन्ति विशिखाः शिखाः

udyānāni vicitrāṇi prababhañja prabhañjanaḥ | tena saṁpreritāḥ sarve jvalanti viśikhāḥ śikhāḥ

प्रचण्ड वायु ने विचित्र उद्यानों को तोड़-फोड़ दिया; उससे प्रेरित होकर सभी बाणरूपी ज्वालाएँ और भी भयंकर हो गईं,

श्लोक 36 (skanda.5.183.36)

वृक्षगुल्मलतावल्ल्यो गृहाणि च समन्ततः । दिग्विभागैश्च सर्वैश्च प्रवृत्तो हव्यवाहनः

vṛkṣagulmalatāvallyo gṛhāṇi ca samantataḥ | digvibhāgaiśca sarvaiśca pravṛtto havyavāhanaḥ

वृक्ष, गुल्म, लता, बेलें तथा चारों ओर के घर — सभी दिशाओं में अग्नि फैल गई,

श्लोक 37 (skanda.5.183.37)

सर्वं किंशुकपर्णाभं प्रज्वलच्चैव दृश्यते । गृहाद्गृहं तदा गन्तुं नैव धूमेन शक्यते

sarvaṁ kiṁśukaparṇābhaṁ prajvalaccaiva dṛśyate | gṛhādgṛhaṁ tadā gantuṁ naiva dhūmena śakyate

सब कुछ किंशुक के पत्तों के समान जलता हुआ दिखाई देने लगा; धुएँ के कारण घर-घर जाना असम्भव हो गया,

श्लोक 38 (skanda.5.183.38)

हरकोपाग्निनिर्दग्धाः क्रन्दन्ते त्रिपुरे जनाः । प्रदीप्तं सर्वतो दिक्षु दह्यते त्रिपुरं परम्

harakopāgninirdagdhāḥ krandante tripure janāḥ | pradīptaṁ sarvato dikṣu dahyate tripuraṁ param

हर के क्रोध की अग्नि से जले हुए लोग त्रिपुर में क्रन्दन करने लगे; समस्त दिशाओं में प्रज्वलित होकर वह श्रेष्ठ त्रिपुर जलने लगा,

श्लोक 39 (skanda.5.183.39)

पतन्ति शिखराग्राणि विशीर्णानि सहस्रशः । पावको धूमसंपृक्तो दह्यमानः समन्ततः

patanti śikharāgrāṇi viśīrṇāni sahasraśaḥ | pāvako dhūmasaṁpṛkto dahyamānaḥ samantataḥ

शिखरों के अग्रभाग टूट-टूटकर हज़ारों की संख्या में गिरने लगे; धुएँ से मिश्रित अग्नि चारों ओर जलती रही,

श्लोक 40 (skanda.5.183.40)

नृत्यन्वै व्याप्तदिग्देशः कान्तारेष्वभिधावति । देवागारेषु सर्वेषु गृहेष्वट्टालकेषु च

nṛtyanvai vyāptadigdeśaḥ kāntāreṣvabhidhāvati | devāgāreṣu sarveṣu gṛheṣvaṭṭālakeṣu ca

मानो नृत्य करती हुई, सम्पूर्ण दिशाओं को व्याप्त करके, वह वनों, समस्त देवालयों, घरों और अट्टालिकाओं में दौड़ने लगी,

श्लोक 41 (skanda.5.183.41)

प्रवृत्तो हुतभुक्तत्र पुरे कालप्रचोदितः । ददाह लोकान्सर्वत्र हरकोपप्रकोपितः

pravṛtto hutabhuktatra pure kālapracoditaḥ | dadāha lokānsarvatra harakopaprakopitaḥ

काल द्वारा प्रेरित वह अग्नि उस नगर में फैलकर, हर के क्रोध से प्रकुपित होकर सर्वत्र लोगों को जलाने लगी।

श्लोक 42 (skanda.5.183.42)

दहते त्रैपुरं लोकं बालवृद्धसमन्वितम् । सपुरं सगृहद्वारं सवाहनवनं नृप

dahate traipuraṁ lokaṁ bālavṛddhasamanvitam | sapuraṁ sagṛhadvāraṁ savāhanavanaṁ nṛpa

हे राजन्! उसने बाल-वृद्धों सहित त्रिपुर के लोगों को, नगर, घर-द्वार, वाहन और वनों सहित जला डाला।

श्लोक 43 (skanda.5.183.43)

केचिद्भोजनसक्ताश्च पानासक्तास्तथापरे । अपरा नृत्यगीतेषु संसक्ता वारयोषितः

kecidbhojanasaktāśca pānāsaktāstathāpare | aparā nṛtyagīteṣu saṁsaktā vārayoṣitaḥ

कुछ भोजन में लगे थे, अन्य पान में लगे थे; कुछ वारांगनाएँ नृत्य-गीत में मग्न थीं,

श्लोक 44 (skanda.5.183.44)

अन्योन्यं च परिष्वज्य हुताशनशिखार्दिताः । दह्यमाना नृपश्रेष्ठ सर्वे गच्छन्त्यचेतनाः

anyonyaṁ ca pariṣvajya hutāśanaśikhārditāḥ | dahyamānā nṛpaśreṣṭha sarve gacchantyacetanāḥ

हे नृपश्रेष्ठ! अग्नि की लपटों से पीड़ित होकर परस्पर आलिंगन करते हुए, जलते हुए सभी लोग अचेत होकर गिरने लगे।

श्लोक 45 (skanda.5.183.45)

अथान्ये दानवास्तत्र दह्यन्तेऽग्निविमोहिताः । न शक्ताश्चान्यतो गन्तुं धूमेनाकुलिताननाः । हंसकारण्डवाकीर्णा नलिन्यो हेमपङ्कजाः

athānye dānavāstatra dahyante'gnivimohitāḥ | na śaktāścānyato gantuṁ dhūmenākulitānanāḥ | haṁsakāraṇḍavākīrṇā nalinyo hemapaṅkajāḥ

फिर वहाँ अन्य दानव भी अग्नि से मोहित होकर जलने लगे, धुएँ से व्याकुल मुख वाले, कहीं और जाने में असमर्थ; हंस-कारण्डवों से भरी, स्वर्णकमलों वाली सरोवरें,

श्लोक 46 (skanda.5.183.46)

दह्यन्ते विविधास्तत्र वाप्यः कूपाश्च भारत । दृश्यन्तेऽनलदग्धानि पुरोद्यानानि दीर्घिकाः । अम्लानैः पङ्कजैश्छन्ना विस्तीर्णावसुयोजनाः

dahyante vividhāstatra vāpyaḥ kūpāśca bhārata | dṛśyante'naladagdhāni purodyānāni dīrghikāḥ | amlānaiḥ paṅkajaiśchannā vistīrṇāvasuyojanāḥ

हे भारत! वहाँ विविध बावड़ियाँ और कुएँ जलने लगे; नगर के उद्यान और आठ योजन तक फैले हुए, कुम्हलाए न हुए कमलों से आच्छादित सरोवर अग्नि से जले हुए दिखाई देने लगे,

श्लोक 47 (skanda.5.183.47)

गिरिकूटनिभास्तत्र प्रासादा रत्नशोभिताः । दृश्यन्तेऽनलसंदग्धा विशीर्णा धरणीतले

girikūṭanibhāstatra prāsādā ratnaśobhitāḥ | dṛśyante'nalasaṁdagdhā viśīrṇā dharaṇītale

वहाँ पर्वत-शिखरों के समान, रत्नों से सुशोभित भवन अग्नि से जले हुए, धरातल पर टूटे हुए दिखाई देने लगे।

श्लोक 48 (skanda.5.183.48)

नरस्त्रीबालवृद्धेषु दह्यमानेषु सर्वतः । निर्दयं ज्वलते वह्निर्हाहाकारो महानभूत् । काचिच्च सुखसंसुप्ताप्रमत्तान्या नृपोत्तम

narastrībālavṛddheṣu dahyamāneṣu sarvataḥ | nirdayaṁ jvalate vahnirhāhākāro mahānabhūt | kācicca sukhasaṁsuptāpramattānyā nṛpottama

चारों ओर स्त्री-पुरुष-बालक-वृद्धों के जलने पर, निर्दय अग्नि जलती रही, महान् हाहाकार हुआ; एक सुखनिद्रा में सोई हुई स्त्री, दूसरी असावधान,

श्लोक 49 (skanda.5.183.49)

क्रीडित्वा च सुविस्तीर्णशयनस्था वराङ्गना । काचित्सुप्ता विशालाक्षी हारावलिविभूषिता । धूमेनाकुलिता दीना न्यपतद्धव्यवाहने

krīḍitvā ca suvistīrṇaśayanasthā varāṅganā | kācitsuptā viśālākṣī hārāvalivibhūṣitā | dhūmenākulitā dīnā nyapataddhavyavāhane

क्रीड़ा करके विशाल शय्या पर लेटी सुन्दरी, एक सोई हुई विशालाक्षी मोतियों की माला से भूषित, धुएँ से व्याकुल, दीन होकर अग्नि में गिर पड़ी,

श्लोक 50 (skanda.5.183.50)

काचित्तस्मिन्पुरे दीप्ते पुत्रस्नेहानुलालसा । पुत्रमालिङ्गते गाढं दह्यते त्रिपुरेऽग्निना

kācittasminpure dīpte putrasnehānulālasā | putramāliṅgate gāḍhaṁ dahyate tripure'gninā

उस जलते हुए नगर में एक स्त्री पुत्र-स्नेह में लालायित होकर, अपने पुत्र को कसकर आलिंगन करते हुए त्रिपुर की अग्नि में जल गई,

श्लोक 51 (skanda.5.183.51)

काचित्कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता । भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तस्य चोपरि

kācitkanakavarṇābhā indranīlavibhūṣitā | bhartāraṁ patitaṁ dṛṣṭvā patitā tasya copari

एक स्वर्णवर्णा, इन्द्रनील से भूषित स्त्री अपने गिरे हुए पति को देखकर उसी के ऊपर गिर पड़ी,

श्लोक 52 (skanda.5.183.52)

काचिदादित्यवर्णाभा प्रसुप्ता तु प्रियोपरि । अग्निज्वालाहता गाढं कंठमालिङ्गते नृप

kācidādityavarṇābhā prasuptā tu priyopari | agnijvālāhatā gāḍhaṁ kaṁṭhamāliṅgate nṛpa

हे राजन्! सूर्यवर्णा एक स्त्री अपने प्रिय के ऊपर सोई हुई, अग्नि-ज्वाला से आहत होकर उसके कण्ठ का कसकर आलिंगन करती है,

श्लोक 53 (skanda.5.183.53)

मेधवर्णा परा नारी चलत्कनकमेखला । श्वेतवस्त्रोत्तरीया तु पपात धरणीतले

medhavarṇā parā nārī calatkanakamekhalā | śvetavastrottarīyā tu papāta dharaṇītale

मेघवर्णा एक अन्य स्त्री, हिलते हुए स्वर्ण-करधनी वाली, श्वेत उत्तरीय वस्त्र में, धरती पर गिर पड़ी,

श्लोक 54 (skanda.5.183.54)

काचित्कुन्देन्दुवर्णाभा नीलरत्नविभूषिता । शिरसा प्राञ्जलिर्भूत्वा विज्ञापयति पावकम्

kācitkundenduvarṇābhā nīlaratnavibhūṣitā | śirasā prāñjalirbhūtvā vijñāpayati pāvakam

एक कुन्द-चन्द्र वर्णा, नीलरत्न से भूषित स्त्री, सिर पर हाथ जोड़कर अग्नि से प्रार्थना करती है,

श्लोक 55 (skanda.5.183.55)

कस्याश्चिज्ज्वलते वस्त्रं केशाः कस्याश्च भारत । ज्वलज्ज्वलनसङ्काशैर्हेमभाण्डैस्त्रसंहित च

kasyāścijjvalate vastraṁ keśāḥ kasyāśca bhārata | jvalajjvalanasaṅkāśairhemabhāṇḍaistrasaṁhita ca

हे भारत! किसी का वस्त्र जल रहा था, किसी के केश; प्रज्वलित अग्नि के समान चमकते स्वर्ण-पात्रों से भरा वह दृश्य भय से युक्त था,

श्लोक 56 (skanda.5.183.56)

काचित्प्रभूतदुःखार्ता विललाप वराङ्गना । भस्मीभूतं पतिं दृष्ट्वा क्रन्दन्ती कुररी यथा

kācitprabhūtaduḥkhārtā vilalāpa varāṅganā | bhasmībhūtaṁ patiṁ dṛṣṭvā krandantī kurarī yathā

अत्यन्त दुःख से पीड़ित एक सुन्दरी अपने पति को भस्म हुआ देखकर कुररी पक्षी के समान क्रन्दन करती हुई विलाप करने लगी,

श्लोक 57 (skanda.5.183.57)

आलिङ्ग्य गाढं सहसा पतिता तस्य मूर्धनि । काचिच्च बहुदुःखार्ता व्यलपत्स्त्री स्ववेश्मनि

āliṅgya gāḍhaṁ sahasā patitā tasya mūrdhani | kācicca bahuduḥkhārtā vyalapatstrī svaveśmani

उसने सहसा उसे कसकर आलिंगन करके उसके सिर पर गिर पड़ी; एक अन्य स्त्री अत्यन्त दुःखी होकर अपने घर में विलाप करने लगी,

श्लोक 58 (skanda.5.183.58)

भस्मसाच्च कृतं दृष्ट्वा क्रन्दते कुररी यथा । मातरं पितरं काचिद्दृष्ट्वा विगतचेतनम्

bhasmasācca kṛtaṁ dṛṣṭvā krandate kurarī yathā | mātaraṁ pitaraṁ kāciddṛṣṭvā vigatacetanam

अपने घर को भस्म हुआ देखकर वह कुररी के समान क्रन्दन करती है; कोई अपनी माता या पिता को मृतप्राय देखकर,

श्लोक 59 (skanda.5.183.59)

वेपते पतिता भूमौ खेदिता वडवा यथा । इतश्चेतश्च काचिच्च दह्यमाना वराङ्गना

vepate patitā bhūmau kheditā vaḍavā yathā | itaścetaśca kācicca dahyamānā varāṅganā

थकी हुई घोड़ी के समान काँपती हुई भूमि पर गिर पड़ी; इधर-उधर एक जलती हुई सुन्दरी,

श्लोक 60 (skanda.5.183.60)

नापश्यद्बालमुत्सङ्गे विपरीतमुखी स्थिता । कुम्भिलस्य गृहं दग्धं पतितं धरणीतले

nāpaśyadbālamutsaṅge viparītamukhī sthitā | kumbhilasya gṛhaṁ dagdhaṁ patitaṁ dharaṇītale

अपनी गोद में बालक को न देखकर विपरीत मुख किए खड़ी रही; कुम्भिल नामक दानव का घर जलकर धरातल पर गिर पड़ा,

श्लोक 61 (skanda.5.183.61)

कूष्माण्डस्य च धूम्रस्य कुहकस्य बकस्य च । विरूपनयनस्यापि विरूपाक्षस्य चैव हि

kūṣmāṇḍasya ca dhūmrasya kuhakasya bakasya ca | virūpanayanasyāpi virūpākṣasya caiva hi

तथा कूष्माण्ड, धूम्र, कुहक, बक, विरूपनयन और विरूपाक्ष के घर भी,

श्लोक 62 (skanda.5.183.62)

शुम्भो डिम्भश्च रौद्रश्च प्रह्लादश्चासुरोत्तमः । दण्डपाणिर्विपाणिश्च सिंहवक्त्रस्तथानघ

śumbho ḍimbhaśca raudraśca prahlādaścāsurottamaḥ | daṇḍapāṇirvipāṇiśca siṁhavaktrastathānagha

शुम्भ, डिम्भ, रौद्र, असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद, दण्डपाणि, विपाणि, तथा हे निष्पाप! सिंहवक्त्र के भी,

श्लोक 63 (skanda.5.183.63)

दुन्दुभश्चैव संह्रादो डिण्डिर्मुण्डिस्तथैव च । बाणभ्राता च बाणश्च क्रव्यादव्याघ्रवक्त्रकौ

dundubhaścaiva saṁhrādo ḍiṇḍirmuṇḍistathaiva ca | bāṇabhrātā ca bāṇaśca kravyādavyāghravaktrakau

दुन्दुभ, संह्राद, डिण्डि, मुण्डि, बाण का भाई तथा स्वयं बाण, क्रव्याद और व्याघ्रवक्त्र के भी —

श्लोक 64 (skanda.5.183.64)

एवमन्येऽपि ये केचिद्दानवा बलदर्पिताः । तेषां गृहे तथा वह्निर्ज्वलते निर्दयो नृप । दह्यमानाः स्त्रियस्तात विलपन्ति गृहे गृहे

evamanye'pi ye keciddānavā baladarpitāḥ | teṣāṁ gṛhe tathā vahnirjvalate nirdayo nṛpa | dahyamānāḥ striyastāta vilapanti gṛhe gṛhe

हे राजन्! इस प्रकार अन्य जो भी बलदर्पित दानव थे, उनके घरों में भी वह निर्दय अग्नि जलती रही; हे तात! जलती हुई स्त्रियाँ घर-घर विलाप करती रहीं,

श्लोक 65 (skanda.5.183.65)

करुणाक्षरवादिन्यो निराधारा गताः शिवम् । यदि वैरं सुरारेश्च पुरुषोपरिपावक

karuṇākṣaravādinyo nirādhārā gatāḥ śivam | yadi vairaṁ surāreśca puruṣoparipāvaka

करुण स्वरों में बोलती हुई, निराधार होकर वे शिव की शरण में गईं — 'यदि सुरों के शत्रु से वैर है, हे पुरुषों पर बरसने वाली अग्नि,'

श्लोक 66 (skanda.5.183.66)

स्त्रियः किमपराध्यन्ति गृहपञ्जरकोकिलाः । अनिर्दयो नृशंसस्त्वं कस्ते कोपः स्त्रियं प्रति

striyaḥ kimaparādhyanti gṛhapañjarakokilāḥ | anirdayo nṛśaṁsastvaṁ kaste kopaḥ striyaṁ prati

'तो स्त्रियों ने क्या अपराध किया है, जो घर की पिंजरे में बन्द कोयल के समान हैं? तुम इतने निर्दय, क्रूर क्यों हो? स्त्रियों के प्रति तुम्हारा यह क्रोध किसलिए?'

श्लोक 67 (skanda.5.183.67)

किं त्वया न श्रुतं लोके अवध्याः सर्वथा स्त्रियः । किं तु तुभ्यं गुणो ह्यस्ति दहने पवनेरितः

kiṁ tvayā na śrutaṁ loke avadhyāḥ sarvathā striyaḥ | kiṁ tu tubhyaṁ guṇo hyasti dahane pavaneritaḥ

'क्या तुमने संसार में नहीं सुना कि स्त्रियाँ सर्वथा अवध्य हैं? वायु से प्रेरित होकर जलाने में तुम्हें क्या गुण प्राप्त होता है?'

श्लोक 68 (skanda.5.183.68)

न कारुण्यं त्वया किंचिद्दाक्षिण्यं च स्त्रियं प्रति । दयां म्लेच्छा हि कुर्वन्ति वचनं वीक्ष्य योषिताम्

na kāruṇyaṁ tvayā kiṁciddākṣiṇyaṁ ca striyaṁ prati | dayāṁ mlecchā hi kurvanti vacanaṁ vīkṣya yoṣitām

'तुम्हें स्त्रियों के प्रति कोई करुणा या दाक्षिण्य नहीं है; म्लेच्छ भी स्त्रियों की बात सुनकर उन पर दया करते हैं।'

श्लोक 69 (skanda.5.183.69)

म्लेच्छानामपि च म्लेच्छो दुर्निवार्यो ह्यचेतनः । एवं विलपमानानां स्त्रीणां तत्रैव भारत

mlecchānāmapi ca mleccho durnivāryo hyacetanaḥ | evaṁ vilapamānānāṁ strīṇāṁ tatraiva bhārata

'तुम तो म्लेच्छों के भी म्लेच्छ हो, दुर्निवार्य और अचेतन हो!' हे भारत! इस प्रकार वहीं विलाप करती हुई स्त्रियों के बीच,

श्लोक 70 (skanda.5.183.70)

ज्वालाकलापबहुलः प्रज्वलत्येव पावकः । एवं दृष्ट्वा ततो बाणो दह्यमान उवाच ह

jvālākalāpabahulaḥ prajvalatyeva pāvakaḥ | evaṁ dṛṣṭvā tato bāṇo dahyamāna uvāca ha

ज्वालाओं के समूह से भरी अग्नि निरन्तर प्रज्वलित होती रही। यह देखकर जलते हुए बाण ने कहा —

श्लोक 71 (skanda.5.183.71)

अवज्ञाय विनष्टोऽहं पापात्मा हरमञ्जसा । मया पापेन मूर्खेण ये लोका नाशिता ध्रुवम्

avajñāya vinaṣṭo'haṁ pāpātmā haramañjasā | mayā pāpena mūrkheṇa ye lokā nāśitā dhruvam

'मैं अवज्ञा करके पापात्मा होकर वस्तुतः शीघ्र ही हर द्वारा नष्ट हो गया। मुझ पापी, मूर्ख के कारण जो लोक निश्चय ही नष्ट हुए हैं —'

श्लोक 72 (skanda.5.183.72)

गोब्राह्मणा हता नित्यमिह लोके परत्र च । नाशितान्यन्नपानानि मठारामाश्रमास्तथा

gobrāhmaṇā hatā nityamiha loke paratra ca | nāśitānyannapānāni maṭhārāmāśramāstathā

'— इस लोक और परलोक दोनों में गौ-ब्राह्मण सदा के लिए मारे गए हैं; अन्न-पान नष्ट हो गए हैं, तथा मठ, आराम, आश्रम भी;'

श्लोक 73 (skanda.5.183.73)

ऋषीणामाश्रमाश्चैव देवारामा गणालयाः । तेन पापेन मे ध्वंसस्तपसश्च बलस्य च

ṛṣīṇāmāśramāścaiva devārāmā gaṇālayāḥ | tena pāpena me dhvaṁsastapasaśca balasya ca

'ऋषियों के आश्रम, देव-उद्यान, गण-निवास भी — उसी पाप से मेरे तप और बल का विध्वंस हुआ है।'

श्लोक 74 (skanda.5.183.74)

किं धनेन करिष्यामि राज्येणान्तःपुरेण च

kiṁ dhanena kariṣyāmi rājyeṇāntaḥpureṇa ca

'धन से, राज्य से, अन्तःपुर से मैं क्या करूँगा?'

श्लोक 75 (skanda.5.183.75)

वरं शङ्करपादौ च शरणं यामि मूढधीः । न माता न पिता चैव न बन्धुर्नापरो जनः

varaṁ śaṅkarapādau ca śaraṇaṁ yāmi mūḍhadhīḥ | na mātā na pitā caiva na bandhurnāparo janaḥ

'बेहतर है कि मैं शंकर के चरणों की शरण लूँ, मैं मूढ़बुद्धि। न माता, न पिता, न बन्धु, न कोई अन्य जन —'

श्लोक 76 (skanda.5.183.76)

मुक्त्वा चैव महेशानं परमार्तिहरं परम् । आत्मना च कृतं पापमात्मनैव तु भुज्यते

muktvā caiva maheśānaṁ paramārtiharaṁ param | ātmanā ca kṛtaṁ pāpamātmanaiva tu bhujyate

'— महेशान को छोड़कर, जो परम पीड़ाहर हैं, कोई सहायक नहीं है; क्योंकि स्वयं किया गया पाप स्वयं ही भोगना पड़ता है।'

श्लोक 77 (skanda.5.183.77)

अहं पुनः समस्तैश्च दह्यामि सह साधुभिः । एवमुक्त्वा शिवं लिङ्गं कृत्वा तन्मस्तकोपरि

ahaṁ punaḥ samastaiśca dahyāmi saha sādhubhiḥ | evamuktvā śivaṁ liṅgaṁ kṛtvā tanmastakopari

'मैं भी इन सब साधुजनों के साथ जल जाऊँ।' ऐसा कहकर उन्होंने शिवलिंग बनाकर उसे अपने सिर पर रखा,

श्लोक 78 (skanda.5.183.78)

निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं पावकेनावगुण्ठितः । स खिन्नः स्विन्नगात्रस्तु प्रस्खलंस्तु मुहुर्मुहुः

nirjagāma gṛhācchīghraṁ pāvakenāvaguṇṭhitaḥ | sa khinnaḥ svinnagātrastu praskhalaṁstu muhurmuhuḥ

और अग्नि से आवृत होकर वे शीघ्र ही घर से बाहर निकल पड़े; थके हुए, पसीने से तर शरीर वाले, बार-बार लड़खड़ाते हुए,

श्लोक 79 (skanda.5.183.79)

हरं गद्गदया वाचा स्तुवन्वै शरणं ययौ । त्वत्कोपानलनिर्दग्धो यदि वध्योऽस्मि शङ्कर

haraṁ gadgadayā vācā stuvanvai śaraṇaṁ yayau | tvatkopānalanirdagdho yadi vadhyo'smi śaṅkara

गद्गद वाणी से हर की स्तुति करते हुए वे शरण में गए — 'हे शंकर! यदि मैं आपके क्रोध की अग्नि से जलकर वध्य ही हूँ,'

श्लोक 80 (skanda.5.183.80)

त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं प्रणश्यतु । अर्चितं मे सुरश्रेष्ठ ध्यातं भक्त्या मया विभो

tvatprasādānmahādeva mā me liṅgaṁ praṇaśyatu | arcitaṁ me suraśreṣṭha dhyātaṁ bhaktyā mayā vibho

'तो हे महादेव, आपकी कृपा से मेरा लिंग नष्ट न हो। हे देवश्रेष्ठ, हे प्रभो! मैंने इसकी पूजा की है, भक्तिपूर्वक ध्यान किया है।'

श्लोक 81 (skanda.5.183.81)

प्राणादिष्टतमं देव तस्माद्रक्षितुमर्हसि । यदि तेऽहमनुग्राह्यो वध्यो वा सुरसत्तम

prāṇādiṣṭatamaṁ deva tasmādrakṣitumarhasi | yadi te'hamanugrāhyo vadhyo vā surasattama

'प्राणों से भी अधिक प्रिय यह, हे देव! अतः आपको इसकी रक्षा करनी चाहिए। चाहे मैं आपसे अनुग्रह पाने योग्य हूँ या वध्य, हे सुरश्रेष्ठ,'

श्लोक 82 (skanda.5.183.82)

प्रतिजन्म महादेव त्वद्भक्तिरचलास्तु मे । पशुकीटपतङ्गेषु तिर्यग्योनिगतेषु च । स्वकर्मणा महादेव त्वद्भक्तिरचलास्तु मे

pratijanma mahādeva tvadbhaktiracalāstu me | paśukīṭapataṅgeṣu tiryagyonigateṣu ca | svakarmaṇā mahādeva tvadbhaktiracalāstu me

'हे महादेव! हर जन्म में मेरी आपके प्रति भक्ति अचल रहे। पशु, कीट, पतंग तथा तिर्यक् योनियों में भी, अपने ही कर्म से, हे महादेव! मेरी आपके प्रति भक्ति अचल रहे।'

श्लोक 83 (skanda.5.183.83)

एवमुक्त्वा महाभागो बाणो भक्तिमतां वरः । स्तोत्रेण देवदेवेशं छन्दयामास भारत

evamuktvā mahābhāgo bāṇo bhaktimatāṁ varaḥ | stotreṇa devadeveśaṁ chandayāmāsa bhārata

हे भारत! ऐसा कहकर भक्तों में श्रेष्ठ महाभाग बाण ने स्तोत्र से देवदेवेश को प्रसन्न करने का प्रयास किया —

श्लोक 84 (skanda.5.183.84)

बाण उवाच। शिव शङ्कर सर्वहराय नमो भवभीतभयार्तिहराय नमः । कुसुमायुधदेहविनाशंकर प्रमदाप्रियकामक देव नमः

bāṇa uvāca| śiva śaṅkara sarvaharāya namo bhavabhītabhayārtiharāya namaḥ | kusumāyudhadehavināśaṁkara pramadāpriyakāmaka deva namaḥ

बाण बोला — 'हे शिव, शंकर, सर्वहर्ता! नमस्कार। संसार से भयभीत लोगों के भय-पीड़ा को हरने वाले को नमस्कार! हे कामदेव के शरीर के विनाशक, स्त्रियों के प्रिय काम के देव! नमस्कार!'

श्लोक 85 (skanda.5.183.85)

जय पार्वतीश परमार्थसार जय विरचितभीमभुजङ्गहार । जय निर्मलभस्मविलिप्तगात्र जय मन्त्रमूल जगदेकपात्र

jaya pārvatīśa paramārthasāra jaya viracitabhīmabhujaṅgahāra | jaya nirmalabhasmaviliptagātra jaya mantramūla jagadekapātra

'जय हो, हे पार्वतीश, परमार्थ के सार! जय हो, भयंकर सर्पों की माला धारण करने वाले! जय हो, निर्मल भस्म से लिप्त अंगों वाले! जय हो, मन्त्रों के मूल, जगत् के एकमात्र आश्रय!'

श्लोक 86 (skanda.5.183.86)

जय विषधरकपिलजटाकलाप जय भैरवविघृतपिनाकचाप । जय विषमनयनपरिमुक्तसङ्ग जय शङ्कर धृतगाङ्गतरङ्ग

jaya viṣadharakapilajaṭākalāpa jaya bhairavavighṛtapinākacāpa | jaya viṣamanayanaparimuktasaṅga jaya śaṅkara dhṛtagāṅgataraṅga

'जय हो, विषधर सर्प से युक्त कपिल जटाओं वाले! जय हो, भैरव द्वारा धारण किए गए पिनाक धनुष वाले! जय हो, विषम नेत्र से मुक्त संगति वाले! जय हो, शंकर, गंगा की तरंगों को धारण करने वाले!'

श्लोक 87 (skanda.5.183.87)

जय भीमरूप खट्वाङ्गहस्त शशिशेखर जय जगतां प्रशस्त । जय सुखरेश सुरलोकसार जय सर्वसकलनिर्दग्धसार

jaya bhīmarūpa khaṭvāṅgahasta śaśiśekhara jaya jagatāṁ praśasta | jaya sukhareśa suralokasāra jaya sarvasakalanirdagdhasāra

'जय हो, भयंकर रूप, खट्वांगधारी, चन्द्रमौलि! जय हो, जगत् द्वारा प्रशंसित! जय हो, सुखों के स्वामी, देवलोक के सार! जय हो, समस्त जलते हुए में भी अदग्ध रहने वाले सार!'

श्लोक 88 (skanda.5.183.88)

जय कीर्तनीय जगतां पवित्र जय वृषाङ्क बहुविधचरित्र । जय विरचितनरकङ्कालमाल अघासुरदेहकङ्कालकाल

jaya kīrtanīya jagatāṁ pavitra jaya vṛṣāṅka bahuvidhacaritra | jaya viracitanarakaṅkālamāla aghāsuradehakaṅkālakāla

'जय हो, जगत् द्वारा कीर्तनीय, पवित्र! जय हो, वृषभचिह्न, अनेक प्रकार के चरित्रों वाले! जय हो, नरकंकाल की माला धारण करने वाले, अघासुर के शरीर के लिए काल!'

श्लोक 89 (skanda.5.183.89)

जय नीलकंठ वरवृषभगमन जय सकललोकदुरितानुशमन । जय सिद्धसुरासुरविनतचरण जय रुद्र रौद्रभवजलधितरण

jaya nīlakaṁṭha varavṛṣabhagamana jaya sakalalokaduritānuśamana | jaya siddhasurāsuravinatacaraṇa jaya rudra raudrabhavajaladhitaraṇa

'जय हो, नीलकंठ, श्रेष्ठ वृषभवाहन! जय हो, समस्त लोकों के दुःखों को शान्त करने वाले! जय हो, सिद्धों-सुरों-असुरों द्वारा नमित चरण वाले! जय हो, रुद्र, भयंकर संसार-सागर के तारक!'

श्लोक 90 (skanda.5.183.90)

जय गिरिश सुरेश्वरमाननीय जय सूक्ष्मरूप संचितनीय । जय दग्धत्रिपुर विश्वसत्त्व जय सकलशास्त्रपरमार्थतत्त्व

jaya giriśa sureśvaramānanīya jaya sūkṣmarūpa saṁcitanīya | jaya dagdhatripura viśvasattva jaya sakalaśāstraparamārthatattva

'जय हो, गिरीश, देवेश्वरों द्वारा माननीय! जय हो, सूक्ष्मरूप, चिन्तन योग्य! जय हो, त्रिपुर के दाहक, विश्व के सत्त्व! जय हो, समस्त शास्त्रों के परमार्थ-तत्त्व!'

श्लोक 91 (skanda.5.183.91)

जय दुरवबोध संसारतार कलिकलुषमहार्णवघोरतार । जय सुरासुरदेवगणेश नमो हयवानरसिंहगजेन्द्रमुख

jaya duravabodha saṁsāratāra kalikaluṣamahārṇavaghoratāra | jaya surāsuradevagaṇeśa namo hayavānarasiṁhagajendramukha

'जय हो, दुर्बोध, संसार से पार उतारने वाले, कलियुग के कलुषमय महासागर से भयंकर पार करने वाले! जय हो, सुर-असुर-देवगणों के ईश! अश्व, वानर, सिंह और गजेन्द्र-मुख वाले को नमस्कार!'

श्लोक 92 (skanda.5.183.92)

अतिह्रस्वस्थूलसुदीर्घतम उपलब्धिर्न शक्यते ते ह्यमरैः । प्रणतोऽस्मि निरञ्जन ते चरणौ जय साम्ब सुलोचनकान्तिहर

atihrasvasthūlasudīrghatama upalabdhirna śakyate te hyamaraiḥ | praṇato'smi nirañjana te caraṇau jaya sāmba sulocanakāntihara

'अत्यन्त सूक्ष्म, स्थूल अथवा अत्यन्त दीर्घ आपका स्वरूप देवताओं द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता। हे निरंजन! मैं आपके चरणों में प्रणत हूँ। जय हो, हे साम्ब, सुन्दर नेत्रों की कान्ति हरने वाले!'

श्लोक 93 (skanda.5.183.93)

अप्राप्य त्वां किमत्यन्तमुच्छ्रयी न विनाशयेत् । अतिप्रमाथि च तदा तपो महत्सुदारुणम्

aprāpya tvāṁ kimatyantamucchrayī na vināśayet | atipramāthi ca tadā tapo mahatsudāruṇam

'क्या आपको प्राप्त किए बिना अत्यधिक उत्कर्ष (अहंकार) मनुष्य का विनाश नहीं कर देता? और तब अत्यन्त कठोर तप भी अत्यन्त विघ्नकारी बन जाता है।'

श्लोक 94 (skanda.5.183.94)

न पुत्रबान्धवा दारा न समस्तः सुहृज्जनः । सङ्कटेऽभ्युपगच्छन्ति व्रजन्तमेकगामिनम्

na putrabāndhavā dārā na samastaḥ suhṛjjanaḥ | saṅkaṭe'bhyupagacchanti vrajantamekagāminam

'न पुत्र, न बन्धु, न पत्नी, न समस्त मित्रजन — संकट में अकेले जाते हुए मनुष्य के साथ कोई नहीं जाता।'

श्लोक 95 (skanda.5.183.95)

यदेव कर्म कैवल्यं कृतं तेन शुभाशुभम् । तदेव सार्थवत्तस्य भवत्यग्रे तु गच्छतः

yadeva karma kaivalyaṁ kṛtaṁ tena śubhāśubham | tadeva sārthavattasya bhavatyagre tu gacchataḥ

'जो भी शुभ-अशुभ कर्म अकेले किया गया हो, वही आगे जाते हुए उस मनुष्य के लिए सार्थक होता है।'

श्लोक 96 (skanda.5.183.96)

निर्धनस्यैव चरतो न भयं विद्यते क्वचित् । धनीभयैर्न मुच्येत धनं तस्मात्त्यजाम्यहम्

nirdhanasyaiva carato na bhayaṁ vidyate kvacit | dhanībhayairna mucyeta dhanaṁ tasmāttyajāmyaham

'निर्धन होकर विचरण करने वाले को कहीं भी भय नहीं होता; धनवान् कभी भय से मुक्त नहीं होता — इसलिए मैं धन का त्याग करता हूँ।'

श्लोक 97 (skanda.5.183.97)

लुब्धाः पापानि कुर्वन्ति शुद्धांशा नैव मानवाः । श्रुत्वा धर्मस्य सर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्य तत्

lubdhāḥ pāpāni kurvanti śuddhāṁśā naiva mānavāḥ | śrutvā dharmasya sarvasvaṁ śrutvā caivāvadhārya tat

'लोभी लोग पाप करते हैं, शुद्ध अंश वाले मनुष्य कभी नहीं करते। धर्म का सम्पूर्ण सार सुनकर तथा उसे भली-भाँति समझकर —'

श्लोक 98 (skanda.5.183.98)

त्वं विष्णुस्त्वं जगन्नाथो ब्रह्मरूपः सनातनः । इन्द्रस्त्वं देवदेवेश सुरनाथ नमोऽस्तु ते

tvaṁ viṣṇustvaṁ jagannātho brahmarūpaḥ sanātanaḥ | indrastvaṁ devadeveśa suranātha namo'stu te

'— आप ही विष्णु हैं, आप ही जगन्नाथ, सनातन ब्रह्मरूप हैं; आप ही इन्द्र हैं, हे देवदेवेश, सुरनाथ! आपको नमस्कार हो।'

श्लोक 99 (skanda.5.183.99)

त्वं क्षितिर्वरुणश्चैव पवनस्त्वं हुताशनः । त्वं दीक्षा यजमानश्च आकाशं सोम एव च

tvaṁ kṣitirvaruṇaścaiva pavanastvaṁ hutāśanaḥ | tvaṁ dīkṣā yajamānaśca ākāśaṁ soma eva ca

'आप ही पृथ्वी, वरुण, वायु तथा अग्नि हैं; आप ही दीक्षा और यजमान हैं, आकाश और सोम भी आप ही हैं।'

श्लोक 100 (skanda.5.183.100)

त्वं सूर्यस्त्वं तु वित्तेशो यमस्त्वं गुरुरेव च । त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं त्रैलोक्यं भास्वता यथा

tvaṁ sūryastvaṁ tu vitteśo yamastvaṁ gurureva ca | tvayā vyāptaṁ jagatsarvaṁ trailokyaṁ bhāsvatā yathā

'आप ही सूर्य, कुबेर, यम तथा गुरु हैं। जैसे तेजस्वी सूर्य से यह संसार व्याप्त है, वैसे ही आपसे यह सम्पूर्ण जगत्, तीनों लोक व्याप्त हैं।'

श्लोक 101 (skanda.5.183.101)

एतद्बाणकृतं स्तोत्रं श्रुत्वा देवो महेश्वरः । क्रोधं मुक्त्वा प्रसन्नात्मा तदा वचनमब्रवीत्

etadbāṇakṛtaṁ stotraṁ śrutvā devo maheśvaraḥ | krodhaṁ muktvā prasannātmā tadā vacanamabravīt

बाण द्वारा किए गए इस स्तोत्र को सुनकर देव महेश्वर ने क्रोध त्यागकर, प्रसन्नचित्त होकर तब यह वचन कहा —

श्लोक 102 (skanda.5.183.102)

ईश्वर उवाच। न भेतव्यं न भेतव्यमद्यप्रभृति दानव । सौवर्णे भवने तिष्ठ मम पार्श्वेऽथवा पुनः

īśvara uvāca| na bhetavyaṁ na bhetavyamadyaprabhṛti dānava | sauvarṇe bhavane tiṣṭha mama pārśve'thavā punaḥ

ईश्वर बोले — 'हे दानव! आज से मत डरो, मत डरो। तुम अपने स्वर्णभवन में रहो, अथवा पुनः मेरे पास,'

श्लोक 103 (skanda.5.183.103)

पुत्रपौत्रप्रपौत्रैश्च बान्धवैः सह भार्यया । अद्यप्रभृति वत्स त्वमवध्यः सर्वशत्रुषु

putrapautraprapautraiśca bāndhavaiḥ saha bhāryayā | adyaprabhṛti vatsa tvamavadhyaḥ sarvaśatruṣu

'पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, बन्धुओं और पत्नी सहित। हे वत्स! आज से तुम समस्त शत्रुओं के लिए अवध्य हो।'

श्लोक 104 (skanda.5.183.104)

मार्कण्डेय उवाच। भूयस्तस्य वरो दत्तो देवदेवेन भारत । स्वर्गे मर्त्ये च पाताले पूजितः ससुरासुरैः

mārkaṇḍeya uvāca| bhūyastasya varo datto devadevena bhārata | svarge martye ca pātāle pūjitaḥ sasurāsuraiḥ

मार्कण्डेय बोले — हे भारत! देवदेव द्वारा उसे और भी वर दिया गया: स्वर्ग, मृत्युलोक तथा पाताल में सुर-असुरों द्वारा पूजित होकर,

श्लोक 105 (skanda.5.183.105)

अक्षयश्चाव्ययश्चैव वस त्वं वै यथासुखम् । ततो निवारयामास रुद्रः सप्तशिखं तदा

akṣayaścāvyayaścaiva vasa tvaṁ vai yathāsukham | tato nivārayāmāsa rudraḥ saptaśikhaṁ tadā

'अक्षय और अव्यय होकर सुखपूर्वक निवास करो।' तत्पश्चात् रुद्र ने उस सप्तशिखा अग्नि को तब रोक दिया,

श्लोक 106 (skanda.5.183.106)

तृतीयं रक्षितं तस्य पुरं देवेन शम्भुना । ज्वालामालाकुलं चान्यत्पतितं धरणीतले

tṛtīyaṁ rakṣitaṁ tasya puraṁ devena śambhunā | jvālāmālākulaṁ cānyatpatitaṁ dharaṇītale

और शम्भु देव द्वारा उसका तीसरा नगर सुरक्षित रखा गया; अन्य दो, ज्वाला-मालाओं से व्याप्त होकर, धरातल पर गिर पड़े।

श्लोक 107 (skanda.5.183.107)

अर्धेन प्रस्थितादूर्ध्वं तस्य ज्वाला दिवं गताः । हाहाकारो महांस्तत्र ऋषिसङ्घैरुदीरितः

ardhena prasthitādūrdhvaṁ tasya jvālā divaṁ gatāḥ | hāhākāro mahāṁstatra ṛṣisaṅghairudīritaḥ

उसका आधा भाग ऊपर उठकर आकाश में गया, उसकी ज्वालाएँ दिव में पहुँचीं; वहाँ ऋषिसमूहों द्वारा महान् हाहाकार किया गया,

श्लोक 108 (skanda.5.183.108)

दैवतैश्च महाभागैः सिद्धविद्याधरादिभिः । एकं तु पतितं तत्र श्रीशैले खण्डमुत्तरम्

daivataiśca mahābhāgaiḥ siddhavidyādharādibhiḥ | ekaṁ tu patitaṁ tatra śrīśaile khaṇḍamuttaram

तथा महाभाग देवताओं, सिद्धों, विद्याधरों आदि द्वारा भी। उनमें से एक खण्ड श्रीशैल पर गिरा — वह उत्तरी खण्ड था;

श्लोक 109 (skanda.5.183.109)

द्वितीयं पतितं राजञ्छैले ह्यमरकण्टके । प्रज्वलत्पतितं तत्र तेन ज्वालेश्वरं स्मृतम्

dvitīyaṁ patitaṁ rājañchaile hyamarakaṇṭake | prajvalatpatitaṁ tatra tena jvāleśvaraṁ smṛtam

हे राजन्! दूसरा खण्ड अमरकण्टक पर्वत पर गिरा, वहाँ प्रज्वलित होता हुआ गिरा; इसीलिए वह 'ज्वालेश्वर' नाम से जाना गया।

श्लोक 110 (skanda.5.183.110)

दग्धे तु त्रिपुरे राजन्पतिते खण्ड उत्तमे । रुद्रो देवः स्थितस्तत्र ज्वालामालानिवारकः

dagdhe tu tripure rājanpatite khaṇḍa uttame | rudro devaḥ sthitastatra jvālāmālānivārakaḥ

हे राजन्! त्रिपुर के जलने पर, वह उत्तम खण्ड गिरने पर, रुद्र देव वहीं स्थित हो गए, ज्वाला-मालाओं को शान्त करने वाले,

श्लोक 111 (skanda.5.183.111)

हाहाकारपराणां तु ऋषीणां रक्षणाय च । स्वयं मूर्तिर्महेशानुमावृषभसंयुतः

hāhākāraparāṇāṁ tu ṛṣīṇāṁ rakṣaṇāya ca | svayaṁ mūrtirmaheśānumāvṛṣabhasaṁyutaḥ

हाहाकार में डूबे ऋषियों की रक्षा के लिए; स्वयं महेशान की मूर्ति, उमा तथा वृषभ सहित।

श्लोक 112 (skanda.5.183.112)

मनसापि स्मरेद्यस्तु भक्त्या ह्यमरकण्टकम् । चान्द्रायणाधिकं पुण्यं स लभेन्नात्र संशयः

manasāpi smaredyastu bhaktyā hyamarakaṇṭakam | cāndrāyaṇādhikaṁ puṇyaṁ sa labhennātra saṁśayaḥ

जो कोई मन में भी भक्तिपूर्वक अमरकण्टक का स्मरण करता है, वह चान्द्रायण व्रत से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है — इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 113 (skanda.5.183.113)

अतिपुण्यो गिरिश्रेष्ठो यस्माद्भरतसत्तम । अस्मान्नित्यं भवेद्राजन्सर्वपापक्षयंकरः

atipuṇyo giriśreṣṭho yasmādbharatasattama | asmānnityaṁ bhavedrājansarvapāpakṣayaṁkaraḥ

हे भरतसत्तम! वह पर्वत-श्रेष्ठ अत्यन्त पुण्यमय है, क्योंकि इससे सदा, हे राजन्! समस्त पापों का नाश करने वाला (प्रभाव) उत्पन्न होता है।

श्लोक 114 (skanda.5.183.114)

नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः । नानागुल्मलताकीर्णो नानावल्लीभिरावृतः

nānādrumalatākīrṇo nānāpuṣpopaśobhitaḥ | nānāgulmalatākīrṇo nānāvallībhirāvṛtaḥ

नाना वृक्षों-लताओं से आच्छादित, नाना पुष्पों से सुशोभित, नाना गुल्म-लताओं से व्याप्त, नाना बेलों से आवृत,

श्लोक 115 (skanda.5.183.115)

सिंहव्याघ्रसमाकीर्णो मृगयूथैरलंकृतः । श्वापदानां च घोषेण नित्यं प्रमुदितोऽभवत्

siṁhavyāghrasamākīrṇo mṛgayūthairalaṁkṛtaḥ | śvāpadānāṁ ca ghoṣeṇa nityaṁ pramudito'bhavat

सिंह-व्याघ्रों से भरा, मृग-समूहों से सुशोभित, हिंसक पशुओं की गर्जना से नित्य आनन्दित रहता है।

श्लोक 116 (skanda.5.183.116)

ब्रह्मेन्द्रविष्णुप्रमुखैर्ह्यमरैश्च सहस्रशः । सेव्यते देवदेवेशः शङ्करस्तत्र पर्वते

brahmendraviṣṇupramukhairhyamaraiśca sahasraśaḥ | sevyate devadeveśaḥ śaṅkarastatra parvate

ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु आदि हज़ारों देवगणों द्वारा वहाँ पर्वत पर देवदेवेश शंकर की सेवा की जाती है।

श्लोक 117 (skanda.5.183.117)

पतनं कुरुते योऽस्मिन्पर्वतेऽमरकण्टके । क्रीडते क्रमशो राजन्भुवनानि चतुर्दश

patanaṁ kurute yo'sminparvate'marakaṇṭake | krīḍate kramaśo rājanbhuvanāni caturdaśa

जो इस अमरकण्टक पर्वत पर पतन (मृत्यु) करता है, हे राजन्! वह क्रमशः चौदहों भुवनों में क्रीड़ा करता है —

श्लोक 118 (skanda.5.183.118)

ऐन्द्रं वाह्नं च कौबेरं वायव्यं याम्यमेव च । नैरृत्यं वारुणं चैव सौम्यं सौरं तथैव च

aindraṁ vāhnaṁ ca kauberaṁ vāyavyaṁ yāmyameva ca | nairṛtyaṁ vāruṇaṁ caiva saumyaṁ sauraṁ tathaiva ca

इन्द्रलोक, अग्निलोक, कुबेरलोक, वायुलोक तथा यमलोक; नैर्ऋत, वरुणलोक, तथा सोमलोक और सूर्यलोक भी,

श्लोक 119 (skanda.5.183.119)

ब्राह्मं च पदमक्लिष्टं वैष्णवं तदनन्तरम् । उमारुद्रं महाभाग ऐश्वरं तदनन्तरम्

brāhmaṁ ca padamakliṣṭaṁ vaiṣṇavaṁ tadanantaram | umārudraṁ mahābhāga aiśvaraṁ tadanantaram

अक्लिष्ट ब्रह्मलोक, तथा तत्पश्चात् वैष्णवलोक; हे महाभाग! उमा-रुद्र लोक, फिर ऐश्वरलोक,

श्लोक 120 (skanda.5.183.120)

परं सदाशिवं शान्तं सूक्ष्मं ज्योतिरतीन्द्रियम् । तस्मिन्याति लयं धीरो विधिना नात्र संशयः

paraṁ sadāśivaṁ śāntaṁ sūkṣmaṁ jyotiratīndriyam | tasminyāti layaṁ dhīro vidhinā nātra saṁśayaḥ

और अन्त में परम शान्त, सूक्ष्म, इन्द्रियातीत सदाशिव-ज्योति — उसमें विधिपूर्वक धीर पुरुष लय को प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 121 (skanda.5.183.121)

युधिष्ठिर उवाच। कोऽप्यत्र विधिरुद्दिष्टः पतने ऋषिसत्तम । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व संशयोऽस्ति महामुने

yudhiṣṭhira uvāca| ko'pyatra vidhiruddiṣṭaḥ patane ṛṣisattama | etanme sarvamācakṣva saṁśayo'sti mahāmune

युधिष्ठिर बोले — हे ऋषिसत्तम! क्या इस पतन (मृत्यु) के लिए कोई विधि निर्दिष्ट है? यह मुझे सम्पूर्ण बताइए, हे महामुने! मुझे संशय है।

श्लोक 122 (skanda.5.183.122)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। शृणुष्व कथयिष्यामि तं विधिं पाण्डुनन्दन । यत्कृत्वा प्रथमं कर्म निपतेत्तदनन्तरम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca| śṛṇuṣva kathayiṣyāmi taṁ vidhiṁ pāṇḍunandana | yatkṛtvā prathamaṁ karma nipatettadanantaram

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे पाण्डुनन्दन! सुनो, वह विधि मैं बताता हूँ, जिसे करके प्रथम कर्म के बाद वह पतन करना चाहिए।

श्लोक 123 (skanda.5.183.123)

कृत्वा कृच्छ्रत्रयं पूर्वं जप्त्वा लक्षं दशैव तु । शाकयावकभुक्चैव शुचिस्त्रिषवणो नृप

kṛtvā kṛcchratrayaṁ pūrvaṁ japtvā lakṣaṁ daśaiva tu | śākayāvakabhukcaiva śucistriṣavaṇo nṛpa

हे राजन्! पहले तीन कृच्छ्र व्रत करके, दस लाख जप करके, शाक-यावक का भोजन करते हुए, शुद्ध होकर, त्रिकाल स्नान करते हुए,

श्लोक 124 (skanda.5.183.124)

त्रिकालमर्चयेदीशं देवदेवं त्रिलोचनम् । दशांशेन तु राजेन्द्र होमं तत्रैव कारयेत्

trikālamarcayedīśaṁ devadevaṁ trilocanam | daśāṁśena tu rājendra homaṁ tatraiva kārayet

त्रिकाल त्रिनेत्र देवदेव ईश की पूजा करनी चाहिए। हे राजेन्द्र! उसके दसवें अंश से वहीं होम करना चाहिए,

श्लोक 125 (skanda.5.183.125)

लक्षवारं जपेद्देवं गन्धमाल्यैश्च पूजयेत् । रात्रौ स्वप्ने तदा पश्येद्विमानस्थं ततः क्षिपेत्

lakṣavāraṁ japeddevaṁ gandhamālyaiśca pūjayet | rātrau svapne tadā paśyedvimānasthaṁ tataḥ kṣipet

एक लाख बार देव का जप करना चाहिए, गन्ध-माल्य से पूजा करनी चाहिए। तब रात्रि में स्वप्न में स्वयं को विमान में बैठा देखे, और फिर पतन करे।

श्लोक 126 (skanda.5.183.126)

अनेनैव विधानेन आत्मानं यस्तु निक्षिपेत् । स्वर्गलोकमनुप्राप्य क्रीडते त्रिदशैः सह

anenaiva vidhānena ātmānaṁ yastu nikṣipet | svargalokamanuprāpya krīḍate tridaśaiḥ saha

इसी विधि से जो अपने आपको गिराता है, वह स्वर्गलोक प्राप्त करके देवताओं के साथ क्रीड़ा करता है,

श्लोक 127 (skanda.5.183.127)

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि त्रिंशत्कोट्यस्तथैव च । मुक्त्वा मनोरमान्भोगांस्तदा गच्छेन्महीतलम्

triṁśadvarṣasahasrāṇi triṁśatkoṭyastathaiva ca | muktvā manoramānbhogāṁstadā gacchenmahītalam

तीस हज़ार वर्ष तथा उतने ही तीस करोड़ वर्ष; मनोरम भोगों को भोगकर तब वह पृथ्वीतल पर आता है,

श्लोक 128 (skanda.5.183.128)

पृथिवीमेकच्छत्रेण भुनक्ति लोकपूजितः । व्याधिशोकविनिर्मुक्तो जीवेच्च शरदां शतम्

pṛthivīmekacchatreṇa bhunakti lokapūjitaḥ | vyādhiśokavinirmukto jīvecca śaradāṁ śatam

और लोकपूजित होकर एकछत्र पृथ्वी का शासन करता है; व्याधि-शोक से मुक्त होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

श्लोक 129 (skanda.5.183.129)

ज्वालेश्वरं तु तत्तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्र ज्वाला नदी पार्थ प्रस्रुता शिवनिर्मिता

jvāleśvaraṁ tu tattīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam | tatra jvālā nadī pārtha prasrutā śivanirmitā

वह ज्वालेश्वर तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात है; हे पार्थ! वहाँ शिव द्वारा निर्मित ज्वाला नामक नदी प्रवाहित होती है,

श्लोक 130 (skanda.5.183.130)

निर्वाप्य तद्बाणपुरं रेवया सह संगता । तत्र स्नात्वा महाराज विधिना मन्त्रसंयुतः

nirvāpya tadbāṇapuraṁ revayā saha saṁgatā | tatra snātvā mahārāja vidhinā mantrasaṁyutaḥ

जिसने उस बाणपुर को शान्त करके रेवा से संगम किया। हे महाराज! वहाँ विधिपूर्वक मन्त्रसहित स्नान करके,

श्लोक 131 (skanda.5.183.131)

तिलसंमिश्रतोयेन तर्पयेत्पितृदेवताः । पिण्डदानेन च पितॄन् पौण्डरीकफलं लभेत्

tilasaṁmiśratoyena tarpayetpitṛdevatāḥ | piṇḍadānena ca pitṝn pauṇḍarīkaphalaṁ labhet

तिलमिश्रित जल से पितरों-देवताओं का तर्पण करना चाहिए। पिण्डदान से पितरों को तृप्त करने पर पौण्डरीक यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 132 (skanda.5.183.132)

अनाशकं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप । मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति

anāśakaṁ tu yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa | mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṁ sa gacchati

हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अनशन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को जाता है।

श्लोक 133 (skanda.5.183.133)

अमराणां शतैश्चैव सेवितो ह्यमरेश्वरः । तथैव ऋषिसङ्घैश्च तेन पुण्यतमो महान्

amarāṇāṁ śataiścaiva sevito hyamareśvaraḥ | tathaiva ṛṣisaṅghaiśca tena puṇyatamo mahān

अमरेश्वर सैकड़ों अमरों द्वारा तथा इसी प्रकार ऋषिसमूहों द्वारा सेवित है, इसीलिए वह अत्यन्त पुण्यमय महान् है।

श्लोक 134 (skanda.5.183.134)

समन्ताद्योजनं तीर्थं पुण्यं ह्यमरकण्टकम् । रुद्रकोटिसमोपेतं तेन तत्पुण्यमुत्तमम्

samantādyojanaṁ tīrthaṁ puṇyaṁ hyamarakaṇṭakam | rudrakoṭisamopetaṁ tena tatpuṇyamuttamam

अमरकण्टक का यह पुण्य तीर्थ चारों ओर एक योजन तक फैला है; करोड़ों रुद्रों से युक्त होने के कारण वह परम पुण्यमय है।

श्लोक 135 (skanda.5.183.135)

तस्य पर्वतराजस्य यः करोति प्रदक्षिणम् । प्रदक्षिणीकृता तेन पृथिवी नात्र संशयः

tasya parvatarājasya yaḥ karoti pradakṣiṇam | pradakṣiṇīkṛtā tena pṛthivī nātra saṁśayaḥ

जो उस पर्वतराज की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 136 (skanda.5.183.136)

वाचिकं मानसं चैव कायिकं त्रिविधं च यत् । नश्यते पातकं सर्वमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत्

vācikaṁ mānasaṁ caiva kāyikaṁ trividhaṁ ca yat | naśyate pātakaṁ sarvamityevaṁ śaṅkaro'bravīt

वाचिक, मानसिक तथा कायिक — तीनों प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं — ऐसा शंकर ने कहा था।

श्लोक 137 (skanda.5.183.137)

अमरेश्वरपार्श्वे च तीर्थं शक्रेश्वरं नृप । तपस्तप्त्वा पुरा तत्र शक्रेण स्थापितं किल

amareśvarapārśve ca tīrthaṁ śakreśvaraṁ nṛpa | tapastaptvā purā tatra śakreṇa sthāpitaṁ kila

हे राजन्! अमरेश्वर के पार्श्व में शक्रेश्वर नामक तीर्थ है, जो पूर्वकाल में तप करके शक्र द्वारा वहाँ स्थापित किया गया था।

श्लोक 138 (skanda.5.183.138)

कुशावर्तं नाम तीर्थं ब्रह्मणा च कृतं शुभम् । ब्रह्मकुण्डमिति ख्यातं हंसतीर्थं तथा परम्

kuśāvartaṁ nāma tīrthaṁ brahmaṇā ca kṛtaṁ śubham | brahmakuṇḍamiti khyātaṁ haṁsatīrthaṁ tathā param

कुशावर्त नामक तीर्थ ब्रह्मा द्वारा बनाया गया शुभ स्थान है; 'ब्रह्मकुण्ड' के नाम से विख्यात, तथा दूसरा हंसतीर्थ भी है।

श्लोक 139 (skanda.5.183.139)

अम्बरीषस्य तीर्थं च महाकालेश्वरं तथा । कावेर्याः पूर्वभागे च तीर्थं वै मातृकेश्वरम्

ambarīṣasya tīrthaṁ ca mahākāleśvaraṁ tathā | kāveryāḥ pūrvabhāge ca tīrthaṁ vai mātṛkeśvaram

अम्बरीष का तीर्थ, तथा महाकालेश्वर भी है; कावेरी के पूर्व भाग में मातृकेश्वर नामक तीर्थ है।

श्लोक 140 (skanda.5.183.140)

एतानि दक्षिणे तीरे रेवाया भरतर्षभ । संसेवनस्नानदानैः पापसङ्घहराणि च

etāni dakṣiṇe tīre revāyā bharatarṣabha | saṁsevanasnānadānaiḥ pāpasaṅghaharāṇi ca

हे भरतर्षभ! ये सब रेवा के दक्षिण तट पर हैं, जो सेवन, स्नान और दान से पापों के समूह को हरने वाले हैं।

श्लोक 141 (skanda.5.183.141)

भृगुतुङ्गे महाराज प्रसिद्धो भैरवः शिवः । तस्य याम्यविभागे च तीर्थं वै चपलेश्वरम्

bhṛgutuṅge mahārāja prasiddho bhairavaḥ śivaḥ | tasya yāmyavibhāge ca tīrthaṁ vai capaleśvaram

हे महाराज! भृगुतुंग पर्वत पर प्रसिद्ध भैरव-शिव विराजमान हैं; उसके दक्षिण भाग में चपलेश्वर नामक तीर्थ है।

श्लोक 142 (skanda.5.183.142)

एतौ स्थितौ दुःखहरौ रेवाया उत्तरे तटे । तावभ्यर्च्य तथा नत्वा सम्यग्यात्राफलं भवेत् । अदृष्टपूजितौ तौ हि नराणां विघ्नकारकौ

etau sthitau duḥkhaharau revāyā uttare taṭe | tāvabhyarcya tathā natvā samyagyātrāphalaṁ bhavet | adṛṣṭapūjitau tau hi narāṇāṁ vighnakārakau

ये दोनों, दुःखहारी, रेवा के उत्तर तट पर स्थित हैं; इनका पूजन और वन्दन करने से ही यात्रा का सम्यक् फल प्राप्त होता है — बिना दर्शन-पूजन के ये दोनों मनुष्यों के लिए विघ्नकारक हो जाते हैं।

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