अवन्ती खण्ड · अध्याय 184
कावेरीसङ्गम माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.184.1)
युधिष्ठिर उवाच। कावेरीति च विख्याता त्रिषु लोकेषु सत्तम । माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तस्या मार्कण्ड तत्त्वतः
yudhiṣṭhira uvāca| kāverīti ca vikhyātā triṣu lokeṣu sattama | māhātmyaṁ śrotumicchāmi tasyā mārkaṇḍa tattvataḥ
युधिष्ठिर बोले — हे सत्तम! तीनों लोकों में विख्यात कावेरी नामक नदी है; हे मार्कण्ड! मैं उसका माहात्म्य यथार्थ रूप में सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.5.184.2)
कीदृशं दर्शनं तस्याः फलं स्पर्शेऽथवा विभो । स्नाने जाप्येऽथवा दान उपवासे तथा मुने
kīdṛśaṁ darśanaṁ tasyāḥ phalaṁ sparśe'thavā vibho | snāne jāpye'thavā dāna upavāse tathā mune
हे विभो! उसके दर्शन का, स्पर्श का, स्नान का, जप का, दान का अथवा उपवास का क्या फल है, हे मुने?
श्लोक 3 (skanda.5.184.3)
कथयस्व महाभाग कावेरीसङ्गमे फलम् । धर्मः श्रुतोऽथ दृष्टो वा कथितो वा कृतोऽपि वा
kathayasva mahābhāga kāverīsaṅgame phalam | dharmaḥ śruto'tha dṛṣṭo vā kathito vā kṛto'pi vā
हे महाभाग! कावेरी संगम में जो फल है, वह कहिए। क्या धर्म सुनने मात्र से, देखने से, कहने से अथवा करने से,
श्लोक 4 (skanda.5.184.4)
अनुमोदितो वा विप्रेन्द्र पुनातीति श्रुतं मया । यथा धर्मप्रसङ्गे तु मुने धर्मोऽपि जायते
anumodito vā viprendra punātīti śrutaṁ mayā | yathā dharmaprasaṅge tu mune dharmo'pi jāyate
अथवा अनुमोदन करने मात्र से पवित्र करता है — ऐसा मैंने सुना है, हे विप्रेन्द्र! जैसे धर्म-चर्चा के प्रसंग में भी, हे मुने, धर्म उत्पन्न होता है।
श्लोक 5 (skanda.5.184.5)
स्वर्गश्च नरकश्चैव इत्येवं वैदिकी श्रुतिः
svargaśca narakaścaiva ityevaṁ vaidikī śrutiḥ
स्वर्ग और नरक — ऐसी ही वैदिक श्रुति है।
श्लोक 6 (skanda.5.184.6)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। साधु साधु महाभाग यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना । शृणुष्वैकमना भूत्वा कावेरीफलमुत्तमम्
śrīmārkaṇḍeya uvāca| sādhu sādhu mahābhāga yatpṛṣṭo'haṁ tvayādhunā | śṛṇuṣvaikamanā bhūtvā kāverīphalamuttamam
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे महाभाग! तुमने अब जो प्रश्न पूछा है, वह अति उत्तम है; एकाग्रचित्त होकर कावेरी के उत्तम फल को सुनो।
श्लोक 7 (skanda.5.184.7)
अस्ति यक्षो महासत्त्वः कुबेरोनाम विश्रुतः । सोऽपि तीर्थप्रभावेन राजन्यक्षाधिपोऽभवत्
asti yakṣo mahāsattvaḥ kuberonāma viśrutaḥ | so'pi tīrthaprabhāvena rājanyakṣādhipo'bhavat
कुबेर नामक एक महाबली यक्ष विख्यात है; हे राजन्! वह भी इसी तीर्थ के प्रभाव से यक्षों का अधिपति बना था।
श्लोक 8 (skanda.5.184.8)
तच्छृणुष्व विधानेन भक्त्या परमया नृप । सिद्धिं प्राप्तो महाभाग कावेरीसङ्गमेन तु
tacchṛṇuṣva vidhānena bhaktyā paramayā nṛpa | siddhiṁ prāpto mahābhāga kāverīsaṅgamena tu
हे राजन्! उसे विधिपूर्वक और परम भक्ति के साथ सुनो — हे महाभाग! उसने कावेरी-संगम के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी।
श्लोक 9 (skanda.5.184.9)
कावेर्या नर्मदायास्तु सङ्गमे लोकविश्रुते । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कुबेरः सत्यविक्रमः
kāveryā narmadāyāstu saṅgame lokaviśrute | tatra snātvā śucirbhūtvā kuberaḥ satyavikramaḥ
लोकविख्यात कावेरी-नर्मदा संगम में स्नान करके, पवित्र होकर, सत्यपराक्रमी कुबेर ने,
श्लोक 10 (skanda.5.184.10)
विधिवन्नियमं कृत्वा शास्त्रयुक्त्या नरोत्तम । आराधयन्महादेवमेकचित्तः सनातनम्
vidhivanniyamaṁ kṛtvā śāstrayuktyā narottama | ārādhayanmahādevamekacittaḥ sanātanam
हे नरोत्तम! शास्त्रविधि के अनुसार नियमपूर्वक व्रत करके, एकाग्रचित्त होकर सनातन महादेव की आराधना की।
श्लोक 11 (skanda.5.184.11)
एकाहारो वसन्मासं तथा षष्ठाह्नकालिकः । पक्षोपवासी न्यवसत्कंचित्कालं नृपोत्तम
ekāhāro vasanmāsaṁ tathā ṣaṣṭhāhnakālikaḥ | pakṣopavāsī nyavasatkaṁcitkālaṁ nṛpottama
हे नृपोत्तम! वह एक माह तक एकाहारी रहा, फिर छठे दिन भोजन करने वाला हुआ, और कुछ समय तक पक्षोपवासी होकर रहा।
श्लोक 12 (skanda.5.184.12)
मूलशाकफलैश्चान्यं कालं नयति बुद्धिमान् । किंचित्कालं वसंस्तत्र तीर्थे शैवालभोजनः
mūlaśākaphalaiścānyaṁ kālaṁ nayati buddhimān | kiṁcitkālaṁ vasaṁstatra tīrthe śaivālabhojanaḥ
वह बुद्धिमान् कुछ समय मूल, शाक और फलों से बिताता रहा; कुछ समय तक उस तीर्थ में शैवाल खाकर रहा।
श्लोक 13 (skanda.5.184.13)
पराकेणानयत्कालं कृच्छ्रेणापि च मानद । चान्द्रायणेन चाप्यन्यमन्यं वाय्वम्बुभोजनः
parākeṇānayatkālaṁ kṛcchreṇāpi ca mānada | cāndrāyaṇena cāpyanyamanyaṁ vāyvambubhojanaḥ
हे मानद! उसने कुछ समय पराक-व्रत से, कुछ कृच्छ्र-व्रत से, कुछ चान्द्रायण-व्रत से, तथा कुछ समय केवल वायु और जल का सेवन करते हुए बिताया।
श्लोक 14 (skanda.5.184.14)
एवं तत्र नरश्रेष्ठ कामरागविवर्जितः । स्थितो वर्षशतं साग्रं कर्षयन्स्वं तथा वपुः
evaṁ tatra naraśreṣṭha kāmarāgavivarjitaḥ | sthito varṣaśataṁ sāgraṁ karṣayansvaṁ tathā vapuḥ
हे नरश्रेष्ठ! इस प्रकार काम और राग से रहित होकर वह अपने शरीर को क्षीण करते हुए सौ वर्षों से भी अधिक समय तक वहाँ स्थित रहा।
श्लोक 15 (skanda.5.184.15)
ततो वर्षशतस्यान्ते देवदेवो महेश्वरः । तुष्टस्तु परया भक्त्या तमुवाच हसन्निव
tato varṣaśatasyānte devadevo maheśvaraḥ | tuṣṭastu parayā bhaktyā tamuvāca hasanniva
तत्पश्चात् सौ वर्ष पूर्ण होने पर देवाधिदेव महेश्वर उसकी परम भक्ति से संतुष्ट होकर मानो मुस्कराते हुए उससे बोले —
श्लोक 16 (skanda.5.184.16)
भोभो यक्ष महासत्त्व वरं वरय सुव्रत । परितुष्टोऽस्मि ते भक्त्या तव दास्ये यथेप्सितम्
bhobho yakṣa mahāsattva varaṁ varaya suvrata | parituṣṭo'smi te bhaktyā tava dāsye yathepsitam
'हे महाबली यक्ष, हे सुव्रत! वर माँगो, मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, जो तुम चाहोगे वह दूँगा।'
श्लोक 17 (skanda.5.184.17)
यक्ष उवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश उमया सह शङ्कर । अद्यप्रभृति सर्वेषां यक्षाणामधिपो भवे
yakṣa uvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa umayā saha śaṅkara | adyaprabhṛti sarveṣāṁ yakṣāṇāmadhipo bhave
यक्ष बोला — 'हे देवेश! यदि आप उमा सहित प्रसन्न हैं, हे शंकर! तो आज से मैं समस्त यक्षों का अधिपति बनूँ।'
श्लोक 18 (skanda.5.184.18)
अक्षयश्चाव्ययश्चैव तव भक्तिपुरःसरः । धर्मे मतिं च मे नित्यं ददस्व परमेश्वर
akṣayaścāvyayaścaiva tava bhaktipuraḥsaraḥ | dharme matiṁ ca me nityaṁ dadasva parameśvara
'यह अधिपत्य अक्षय और अव्यय हो, सदा आपकी भक्ति से युक्त रहे; हे परमेश्वर! मुझे सदा धर्म में बुद्धि प्रदान कीजिए।'
श्लोक 19 (skanda.5.184.19)
ईश्वर उवाच। यत्त्वया प्रार्थितं सर्वं फलं धर्मस्य तत्तथा । इत्येवमुक्त्वा तं तत्र जगामादर्शनं हरः
īśvara uvāca| yattvayā prārthitaṁ sarvaṁ phalaṁ dharmasya tattathā | ityevamuktvā taṁ tatra jagāmādarśanaṁ haraḥ
ईश्वर बोले — 'तुमने जो कुछ माँगा, वह सब धर्म के फल सहित तुम्हें प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर हर वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 20 (skanda.5.184.20)
सोऽपि स्नात्वा विधानेन संतर्प्य पितृदेवताः । आमन्त्रयित्वा तत्तीर्थं कृतार्थश्च गृहं ययौ
so'pi snātvā vidhānena saṁtarpya pitṛdevatāḥ | āmantrayitvā tattīrthaṁ kṛtārthaśca gṛhaṁ yayau
वह भी विधिपूर्वक स्नान करके, पितरों और देवताओं का तर्पण करके, उस तीर्थ से विदा लेकर कृतार्थ होकर अपने घर गया।
श्लोक 21 (skanda.5.184.21)
पूजितस्तत्र यक्षैस्तु सोऽभिषिक्तो विधानतः । चकार विपुलं तत्र राज्यमीप्सितमुत्तमम्
pūjitastatra yakṣaistu so'bhiṣikto vidhānataḥ | cakāra vipulaṁ tatra rājyamīpsitamuttamam
वहाँ यक्षों द्वारा पूजित होकर वह विधिपूर्वक अभिषिक्त हुआ, और उसने वहाँ विशाल, अभीष्ट तथा उत्तम राज्य किया।
श्लोक 22 (skanda.5.184.22)
तत्र चान्ये सुराः सिद्धा यक्षगन्धर्वकिंनराः । गणाश्चाप्सरसां तत्र ऋषयश्च तथानघ
tatra cānye surāḥ siddhā yakṣagandharvakiṁnarāḥ | gaṇāścāpsarasāṁ tatra ṛṣayaśca tathānagha
हे निष्पाप! वहाँ अन्य देवता, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, अप्सराओं के समूह तथा ऋषिगण भी निवास करते हैं,
श्लोक 23 (skanda.5.184.23)
कावेरीसङ्गमं तेन सर्वपापहरं विदुः । स्वर्गाणामपि सर्वेषां द्वारमेतद्युधिष्ठिर
kāverīsaṅgamaṁ tena sarvapāpaharaṁ viduḥ | svargāṇāmapi sarveṣāṁ dvārametadyudhiṣṭhira
और इसीलिए वे कावेरी-संगम को सर्वपापहारी मानते हैं; हे युधिष्ठिर! यह समस्त स्वर्गों का द्वार है।
श्लोक 24 (skanda.5.184.24)
ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम् । कावेरीसङ्गमे स्नात्वा यैर्दत्तं हि तिलोदकम्
te dhanyāste mahātmānasteṣāṁ janma sujīvitam | kāverīsaṅgame snātvā yairdattaṁ hi tilodakam
वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म और जीवन सफल है, जिन्होंने कावेरी-संगम में स्नान करके तिल-जल का तर्पण किया है।
श्लोक 25 (skanda.5.184.25)
दश पूर्वे परे तात मातृतः पितृतस्तथा । पितरः पितामहास्तेन उद्धृता नरकार्णवात्
daśa pūrve pare tāta mātṛtaḥ pitṛtastathā | pitaraḥ pitāmahāstena uddhṛtā narakārṇavāt
हे तात! माता और पिता दोनों की ओर से दस-दस पूर्व और पर पीढ़ियाँ, अर्थात् पितर और पितामह, उससे नरक-सागर से उद्धारित हो जाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.5.184.26)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नायीत मानवः । अर्चयेदीश्वरं देवं यदीच्छेच्छाश्वतीं गतिम्
tasmātsarvaprayatnena tatra snāyīta mānavaḥ | arcayedīśvaraṁ devaṁ yadīcchecchāśvatīṁ gatim
अतः मनुष्य को सम्पूर्ण प्रयत्न से वहाँ स्नान करना चाहिए, और यदि शाश्वत गति की इच्छा हो तो ईश्वर देव का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.5.184.27)
कावेरीसङ्गमे राजन्स्नानदानार्चनं नरैः । कृतं भक्त्या नरश्रेष्ठ अश्वमेधाधिकं फलम्
kāverīsaṅgame rājansnānadānārcanaṁ naraiḥ | kṛtaṁ bhaktyā naraśreṣṭha aśvamedhādhikaṁ phalam
हे राजन्! कावेरी-संगम में मनुष्यों द्वारा भक्तिपूर्वक किया गया स्नान, दान और पूजन, हे नरश्रेष्ठ! अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल देता है।
श्लोक 28 (skanda.5.184.28)
होमेन चाक्षयः स्वर्गो जपादायुर्विवर्धते । ध्यानतो नित्यमायाति पदं शिवकलात्मकम्
homena cākṣayaḥ svargo japādāyurvivardhate | dhyānato nityamāyāti padaṁ śivakalātmakam
होम से अक्षय स्वर्ग, जप से आयु की वृद्धि, और ध्यान से सदा शिव के अंशरूप पद की प्राप्ति होती है।
श्लोक 29 (skanda.5.184.29)
अग्निप्रवेशं यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नरेश्वर । अग्निलोके वसेत्तावद्यावदाभूतसम्प्लवम्
agnipraveśaṁ yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe nareśvara | agniloke vasettāvadyāvadābhūtasamplavam
हे नरेश्वर! जो उस तीर्थ में अग्नि-प्रवेश करता है, वह प्रलयकाल तक अग्निलोक में निवास करता है।
श्लोक 30 (skanda.5.184.30)
अनाशकं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप । तस्य पुण्यफलं यद्वै तच्छृणुष्व नरोत्तम
anāśakaṁ tu yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa | tasya puṇyaphalaṁ yadvai tacchṛṇuṣva narottama
हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अनशन करता है, हे नरोत्तम! उसके पुण्य-फल के बारे में सुनो।
श्लोक 31 (skanda.5.184.31)
गन्धर्वाप्सरःसंकीर्णे विमाने सूर्यसन्निभे । वीज्यमानो वरस्त्रीभिर्दैवतैः सह मोदते
gandharvāpsaraḥsaṁkīrṇe vimāne sūryasannibhe | vījyamāno varastrībhirdaivataiḥ saha modate
गन्धर्वों और अप्सराओं से भरे, सूर्य के समान तेजस्वी विमान में, सुन्दर स्त्रियों द्वारा पंखा झला जाता हुआ, वह देवताओं के साथ आनन्द भोगता है।
श्लोक 32 (skanda.5.184.32)
षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च । क्रीडते रुद्रलोकस्थस्तदन्ते भुवि चागतः
ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi ṣaṣṭivarṣaśatāni ca | krīḍate rudralokasthastadante bhuvi cāgataḥ
साठ हज़ार वर्ष तथा छह हज़ार वर्ष तक वह रुद्रलोक में क्रीड़ा करता है, और उसके अन्त में पृथ्वी पर आता है।
श्लोक 33 (skanda.5.184.33)
भोगवान्दानशीलश्च जायते पृथिवीपतिः । आधिशोकविनिर्मुक्तो जीवेच्च शरदां शतम्
bhogavāndānaśīlaśca jāyate pṛthivīpatiḥ | ādhiśokavinirmukto jīvecca śaradāṁ śatam
वह भोगवान्, दानशील तथा पृथ्वीपति के रूप में जन्म लेता है, मानसिक व्यथा और शोक से मुक्त होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है।
श्लोक 34 (skanda.5.184.34)
एवं गुणगणाकीर्णा कावेरी सा सरिन्नृप । त्रिषु लोकेषु विख्याता नर्मदासङ्गमे सदा
evaṁ guṇagaṇākīrṇā kāverī sā sarinnṛpa | triṣu lokeṣu vikhyātā narmadāsaṅgame sadā
हे राजन्! इस प्रकार गुणों के समूह से परिपूर्ण वह कावेरी नदी नर्मदा से संगम स्थल पर सदा तीनों लोकों में विख्यात है।
श्लोक 35 (skanda.5.184.35)
जितवाक्कायचित्ताश्च ध्येयध्यानरतास्तथा । कावेरीसङ्गमे तात तेऽपि मोक्षमवाप्नुयुः
jitavākkāyacittāśca dhyeyadhyānaratāstathā | kāverīsaṅgame tāta te'pi mokṣamavāpnuyuḥ
हे तात! जो वाणी, शरीर और मन को वश में करके ध्येय के ध्यान में रत रहते हैं, वे कावेरी-संगम में भी मोक्ष प्राप्त करते हैं।
श्लोक 36 (skanda.5.184.36)
शृणु तेऽन्यत्प्रवक्ष्यामि आश्चर्यं नृपसत्तम । त्रिषु लोकेषु का त्वन्या दृश्यते सरिता समा
śṛṇu te'nyatpravakṣyāmi āścaryaṁ nṛpasattama | triṣu lokeṣu kā tvanyā dṛśyate saritā samā
हे नृपसत्तम! अब एक और आश्चर्य सुनो — तीनों लोकों में इसके समान अन्य कौन-सी नदी दिखाई देती है?
श्लोक 37 (skanda.5.184.37)
लब्धं यैर्नर्मदातोयं ये च कुर्युः प्रदक्षिणम् । ये पिबन्ति जलं तत्र ते पुण्या नात्र संशयः
labdhaṁ yairnarmadātoyaṁ ye ca kuryuḥ pradakṣiṇam | ye pibanti jalaṁ tatra te puṇyā nātra saṁśayaḥ
जिन्होंने नर्मदा का जल प्राप्त किया, जो उसकी प्रदक्षिणा करते हैं, तथा जो वहाँ उसका जल पीते हैं, वे निःसंदेह पुण्यशाली हैं।
श्लोक 38 (skanda.5.184.38)
न तेषां सन्ततिच्छेदो दश जन्मानि पञ्च च । तेषां पापं विलीयेत हिमं सूर्योदये यथा
na teṣāṁ santaticchedo daśa janmāni pañca ca | teṣāṁ pāpaṁ vilīyeta himaṁ sūryodaye yathā
उनकी पन्द्रह जन्मों तक संतति का विच्छेद नहीं होता; उनका पाप उसी प्रकार विलीन हो जाता है जैसे सूर्योदय होने पर हिम पिघल जाता है।
श्लोक 39 (skanda.5.184.39)
गङ्गायमुनसङ्गे वै यत्फलं लभते नरः । तत्फलं लभते मर्त्यः कावेरीस्नानमाचरन्
gaṅgāyamunasaṅge vai yatphalaṁ labhate naraḥ | tatphalaṁ labhate martyaḥ kāverīsnānamācaran
गंगा-यमुना के संगम में स्नान से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वही फल कावेरी में स्नान करने वाले मनुष्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 40 (skanda.5.184.40)
भौमे तु भूतजायोगे व्यतीपाते च संक्रमे । राहुसोमसमायोगे तदेवाष्टगुणं स्मृतम्
bhaume tu bhūtajāyoge vyatīpāte ca saṁkrame | rāhusomasamāyoge tadevāṣṭaguṇaṁ smṛtam
मंगलवार को भूतजाति-योग में, व्यतीपात में, संक्रान्ति में, अथवा राहु-चन्द्र के समायोग में, वही फल आठ गुना कहा गया है।
श्लोक 41 (skanda.5.184.41)
अशीतिश्च यवाः प्रोक्ता गङ्गायामुनसङ्गमे । कावेरीनर्मदायोगे तदेवाष्टगुणं स्मृतम्
aśītiśca yavāḥ proktā gaṅgāyāmunasaṅgame | kāverīnarmadāyoge tadevāṣṭaguṇaṁ smṛtam
गंगा-यमुना संगम में अस्सी यव के बराबर पुण्य कहा गया है; कावेरी-नर्मदा संगम में वही पुण्य आठ गुना कहा गया है।
श्लोक 42 (skanda.5.184.42)
गङ्गा षष्टिसहस्रैस्तु क्षेत्रपालैः प्रपूज्यते । तदर्धैरन्यतीर्थानि रक्षन्ते नात्र संशयः
gaṅgā ṣaṣṭisahasraistu kṣetrapālaiḥ prapūjyate | tadardhairanyatīrthāni rakṣante nātra saṁśayaḥ
गंगा साठ हज़ार क्षेत्रपालों द्वारा पूजित है; उनसे आधे क्षेत्रपालों द्वारा अन्य तीर्थ निःसंदेह रक्षित हैं।
श्लोक 43 (skanda.5.184.43)
अमरेश्वरे तु सरितां ये योगाः परिकीर्तिताः । ते त्वशीतिसहस्रैस्तु क्षेत्रपालैस्तु रक्षिताः
amareśvare tu saritāṁ ye yogāḥ parikīrtitāḥ | te tvaśītisahasraistu kṣetrapālaistu rakṣitāḥ
किन्तु अमरेश्वर में जो नदी-संगम कहे गए हैं, वे अस्सी हज़ार क्षेत्रपालों द्वारा रक्षित हैं।
श्लोक 44 (skanda.5.184.44)
तथामरेश्वरे याम्ये लिङ्गं वै चपलेश्वरम् । द्वितीयं चण्डहस्ताख्यं द्वे लिङ्गे तीर्थरक्षके
tathāmareśvare yāmye liṅgaṁ vai capaleśvaram | dvitīyaṁ caṇḍahastākhyaṁ dve liṅge tīrtharakṣake
इसी प्रकार अमरेश्वर के दक्षिण में 'चपलेश्वर' नामक लिंग है, और दूसरा 'चण्डहस्त' नामक — ये दोनों लिंग तीर्थ के रक्षक हैं।
श्लोक 45 (skanda.5.184.45)
शिवेन स्थापिते पूर्वं कावेर्याद्यभिरक्षके । लक्षेण रक्षिता देवी नर्मदा बहुकल्पगा
śivena sthāpite pūrvaṁ kāveryādyabhirakṣake | lakṣeṇa rakṣitā devī narmadā bahukalpagā
पूर्वकाल में शिव द्वारा कावेरी आदि की रक्षा के लिए इन्हें स्थापित किया गया था; अनेक कल्पों तक विद्यमान रहने वाली देवी नर्मदा एक लाख रक्षकों द्वारा सुरक्षित है।
श्लोक 46 (skanda.5.184.46)
धनुषां षष्ट्यभियुतैः पुरुषैरीशयोजितैः । ओं कारशतसाहस्रैः पर्वतश्चाभिरक्षितः
dhanuṣāṁ ṣaṣṭyabhiyutaiḥ puruṣairīśayojitaiḥ | oṁ kāraśatasāhasraiḥ parvataścābhirakṣitaḥ
ईश द्वारा नियुक्त साठ हज़ार धनुष-प्रमाण पुरुषों तथा एक लाख ओंकार-जप द्वारा वह पर्वत रक्षित है।
श्लोक 47 (skanda.5.184.47)
अन्यदेशकृतं पापमस्मिन् क्षेत्रे विनश्यति । अस्मिंस्तीर्थे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति
anyadeśakṛtaṁ pāpamasmin kṣetre vinaśyati | asmiṁstīrthe kṛtaṁ pāpaṁ vajralepo bhaviṣyati
अन्य देश में किया गया पाप इस क्षेत्र में नष्ट हो जाता है; किन्तु इसी तीर्थ में किया गया पाप वज्रलेप के समान अमिट हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.5.184.48)
एषा ते कथिता तात कावेरी सरितां वरा । रुद्रदेहसमुत्पन्ना तेन पुण्या सरिद्वरा
eṣā te kathitā tāta kāverī saritāṁ varā | rudradehasamutpannā tena puṇyā saridvarā
हे तात! इस प्रकार तुम्हें नदियों में श्रेष्ठ यह कावेरी बताई गई; वह रुद्र के शरीर से उत्पन्न हुई है, इसीलिए वह श्रेष्ठ नदी पुण्यशालिनी है।