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अवन्ती खण्ड · अध्याय 185

दारुतीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 184अध्याय-सूचीअध्याय 186

श्लोक 1 (skanda.5.185.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। नर्मदोत्तरकूले तु दारुतीर्थमनुत्तमम् । यत्र सिद्धो महाभाग तपस्तप्त्वा द्विजोत्तमः

śrīmārkaṇḍeya uvāca| narmadottarakūle tu dārutīrthamanuttamam | yatra siddho mahābhāga tapastaptvā dvijottamaḥ

श्रीमार्कण्डेय बोले — नर्मदा के उत्तर तट पर परम श्रेष्ठ दारुतीर्थ है, जहाँ हे महाभाग! एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ने तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी।

श्लोक 2 (skanda.5.185.2)

युधिष्ठिर उवाच। कोऽसौ द्विजवरश्रेष्ठः सिद्धस्तत्र महामुने । दारुकेति सुतः कस्य एतन्मे वक्तुमर्हसि

yudhiṣṭhira uvāca| ko'sau dvijavaraśreṣṭhaḥ siddhastatra mahāmune | dāruketi sutaḥ kasya etanme vaktumarhasi

युधिष्ठिर बोले — हे महामुने! वहाँ सिद्धि प्राप्त करने वाला वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था? वह 'दारु' किसका पुत्र था? यह मुझे बताने योग्य है।

श्लोक 3 (skanda.5.185.3)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। भार्गवे विपुले वंशे धीमतो देवशार्मणः । दारुर्नाम महाभागो वेदवेदाङ्गपारगः

śrīmārkaṇḍeya uvāca| bhārgave vipule vaṁśe dhīmato devaśārmaṇaḥ | dārurnāma mahābhāgo vedavedāṅgapāragaḥ

श्रीमार्कण्डेय बोले — भृगु के विशाल वंश में बुद्धिमान् देवशर्मा के पुत्र, वेद-वेदांगपारंगत, दारु नामक महाभाग हुए थे।

श्लोक 4 (skanda.5.185.4)

ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो विधिक्रमात् । यतिधर्मविधानेन चचार विपुलतपः

brahmacārī gṛhasthaśca vānaprastho vidhikramāt | yatidharmavidhānena cacāra vipulatapaḥ

वे विधिपूर्वक क्रमशः ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ हुए; फिर यति-धर्म की विधि से उन्होंने विशाल तप किया।

श्लोक 5 (skanda.5.185.5)

ध्यायन्वै स महादेवं निराहारो युधिष्ठिर । उवास तीर्थे तस्मिन् वै यावत्प्राणपरिक्षयम्

dhyāyanvai sa mahādevaṁ nirāhāro yudhiṣṭhira | uvāsa tīrthe tasmin vai yāvatprāṇaparikṣayam

हे युधिष्ठिर! महादेव का ध्यान करते हुए, निराहार रहकर, वे प्राण त्यागने तक उसी तीर्थ में निवास करते रहे।

श्लोक 6 (skanda.5.185.6)

तस्य नाम्ना तु तत्तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्र स्नात्वा विधानेन अर्चयेत्पितृदेवताः

tasya nāmnā tu tattīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam | tatra snātvā vidhānena arcayetpitṛdevatāḥ

उन्हीं के नाम से वह तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात हुआ; वहाँ स्नान करके विधिपूर्वक पितरों तथा देवताओं का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 7 (skanda.5.185.7)

सत्यवादी जितक्रोधः सर्वभूतहिते रतः । सर्वान्कामानवाप्नोति राजन्नत्रैव सवर्था

satyavādī jitakrodhaḥ sarvabhūtahite rataḥ | sarvānkāmānavāpnoti rājannatraiva savarthā

हे राजन्! जो सत्यवादी, क्रोधविजयी तथा समस्त प्राणियों के हित में रत रहता है, वह यहाँ सब प्रकार से सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 8 (skanda.5.185.8)

यः कुर्यादुपवासं च सत्यशौचपरायणः । सौत्रामणिफलं चास्य सम्भवत्यविचारितम्

yaḥ kuryādupavāsaṁ ca satyaśaucaparāyaṇaḥ | sautrāmaṇiphalaṁ cāsya sambhavatyavicāritam

जो सत्य और शौच में तत्पर रहकर उपवास करता है, उसे बिना किसी सन्देह के सौत्रामणि यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.5.185.9)

ऋग्वेदजापी ऋग्वेदी साम वा सामपारगः । यजुर्वेदी यजुर्जप्त्वा लभते फलमुत्तमम्

ṛgvedajāpī ṛgvedī sāma vā sāmapāragaḥ | yajurvedī yajurjaptvā labhate phalamuttamam

ऋग्वेद का जप करने वाला ऋग्वेदी, सामवेद में पारंगत सामवेदी अथवा यजुर्वेद का जप करने वाला यजुर्वेदी — यहाँ उत्तम फल प्राप्त करता है।

श्लोक 10 (skanda.5.185.10)

प्राणांस्त्यजति यो मर्त्यस्तस्मिंस्तीर्थे विधानतः । अनिवर्तिका गतिस्तस्य इत्येवं शङ्करोऽब्रवीत्

prāṇāṁstyajati yo martyastasmiṁstīrthe vidhānataḥ | anivartikā gatistasya ityevaṁ śaṅkaro'bravīt

जो मनुष्य विधिपूर्वक उस तीर्थ में प्राण त्यागता है, उसकी गति अनिवर्तक (पुनरावृत्तिरहित) होती है — ऐसा शंकर ने कहा था।

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