अवन्ती खण्ड · अध्याय 186
ब्रह्मावर्ततीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.186.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेच्च राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । ब्रह्मावर्तमिति ख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchecca rājendra tīrthaṁ trailokyaviśrutam | brahmāvartamiti khyātaṁ sarvapāpapraṇāśanam
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे राजेन्द्र! उसके बाद त्रिलोकविख्यात, सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला 'ब्रह्मावर्त' नामक तीर्थ है, वहाँ जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.5.186.2)
तत्र संनिहितो ब्रह्मा नित्यसेवी युधिष्ठिर । ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बचकार भ्रमणं सदा
tatra saṁnihito brahmā nityasevī yudhiṣṭhira | ūrdhvabāhurnirālambacakāra bhramaṇaṁ sadā
हे युधिष्ठिर! वहाँ ब्रह्मा नित्य निवास करते हुए सेवा करते हैं; ऊर्ध्वबाहु होकर, बिना किसी सहारे के, वे सदा परिक्रमा करते रहते हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.186.3)
एकाहारवशेऽतिष्ठद्द्वादशाब्दं महाव्रती । अत्र तीर्थे विधानेन चिन्तयन् वै महेश्वरम्
ekāhāravaśe'tiṣṭhaddvādaśābdaṁ mahāvratī | atra tīrthe vidhānena cintayan vai maheśvaram
महाव्रती ब्रह्मा एकाहारी रहकर बारह वर्षों तक वहाँ ठहरे रहे, इस तीर्थ में विधिपूर्वक महेश्वर का ध्यान करते हुए।
श्लोक 4 (skanda.5.186.4)
तेन तत्पुण्यमाख्यातं ब्रह्मावर्तमिति प्रभो । तत्र स्नात्वा विधानेन तर्पयेत्पितृदेवताः
tena tatpuṇyamākhyātaṁ brahmāvartamiti prabho | tatra snātvā vidhānena tarpayetpitṛdevatāḥ
हे प्रभो! उन्हीं के कारण वह पवित्र स्थान 'ब्रह्मावर्त' नाम से प्रसिद्ध हुआ; वहाँ स्नान करके विधिपूर्वक पितरों और देवताओं का तर्पण करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.5.186.5)
अर्चयेद्देवमीशानं विष्णुं वा परमेश्वरम् । यत्फलं सर्वयज्ञानां विधिवद्दक्षिणावताम्
arcayeddevamīśānaṁ viṣṇuṁ vā parameśvaram | yatphalaṁ sarvayajñānāṁ vidhivaddakṣiṇāvatām
देव ईशान अथवा परमेश्वर विष्णु का पूजन करना चाहिए। विधिपूर्वक दक्षिणा सहित किए गए समस्त यज्ञों का जो फल है,
श्लोक 6 (skanda.5.186.6)
तत्फलं समवाप्नोति तत्तीर्थस्य प्रभावतः । यस्मिंस्तीर्थे तु यो देवो दानवो वा द्विजोऽथ वा
tatphalaṁ samavāpnoti tattīrthasya prabhāvataḥ | yasmiṁstīrthe tu yo devo dānavo vā dvijo'tha vā
वह फल उस तीर्थ के प्रभाव से प्राप्त हो जाता है। जिस तीर्थ में जो देवता, दानव अथवा ब्राह्मण
श्लोक 7 (skanda.5.186.7)
सिद्धस्तेनैव तन्नाम्ना ख्यातं लोके महच्च तत् । न जलं न स्थलं नाम क्षेत्रं वा ह्यूषराणि च
siddhastenaiva tannāmnā khyātaṁ loke mahacca tat | na jalaṁ na sthalaṁ nāma kṣetraṁ vā hyūṣarāṇi ca
सिद्ध हुआ, उसी के नाम से वह महान् तीर्थ लोक में विख्यात हुआ। न जल, न स्थल, न कोई नामधारी क्षेत्र, और न ही ऊसर भूमि —
श्लोक 8 (skanda.5.186.8)
पवित्रत्वं लभन्त्येते पौरुषेण विना नृणाम् । सामर्थ्यान्निश्चयाद्धैर्यात्सिध्यन्ति पुरुषा नृप
pavitratvaṁ labhantyete pauruṣeṇa vinā nṛṇām | sāmarthyānniścayāddhairyātsidhyanti puruṣā nṛpa
ये मनुष्य के पौरुष के बिना पवित्रता प्राप्त नहीं कर पातीं। हे राजन्! सामर्थ्य, निश्चय और धैर्य से ही मनुष्य सिद्धि प्राप्त करते हैं।
श्लोक 9 (skanda.5.186.9)
प्रमादात्तस्य लोभेन पतन्ति नरके ध्रुवम्
pramādāttasya lobhena patanti narake dhruvam
प्रमाद तथा लोभ से मनुष्य निश्चित रूप से नरक में गिरते हैं।
श्लोक 10 (skanda.5.186.10)
संनिरुध्येन्द्रियग्रामं यत्र यत्र वसेन्मुनिः । तत्र तत्र कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च
saṁnirudhyendriyagrāmaṁ yatra yatra vasenmuniḥ | tatra tatra kurukṣetraṁ naimiṣaṁ puṣkarāṇi ca
इन्द्रियसमूह को वश में करके मुनि जहाँ-जहाँ निवास करता है, वहाँ-वहाँ कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर के समान पवित्रता होती है।