अवन्ती खण्ड · अध्याय 187
पत्रेश्वरतीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.187.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। पत्त्रेश्वरं ततो गच्छेत्सर्वपापप्रणाशनम् । यत्र सिद्धो महाभागश्चित्रसेनसुतो बली
śrīmārkaṇḍeya uvāca| pattreśvaraṁ tato gacchetsarvapāpapraṇāśanam | yatra siddho mahābhāgaścitrasenasuto balī
श्रीमार्कण्डेय बोले — वहाँ से समस्त पापों का नाश करने वाले पत्त्रेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ चित्रसेन के पुत्र, बलशाली महाभाग ने सिद्धि प्राप्त की थी।
श्लोक 2 (skanda.5.187.2)
युधिष्ठिर उवाच। कोऽसौ सिद्धस्तदा ब्रह्मंस्तस्मिंस्तीर्थे महातपाः । पुत्रः कस्य तु को हेतुरेतदिच्छामि वेदितुम्
yudhiṣṭhira uvāca| ko'sau siddhastadā brahmaṁstasmiṁstīrthe mahātapāḥ | putraḥ kasya tu ko heturetadicchāmi veditum
युधिष्ठिर बोले — हे ब्रह्मन्! उस तीर्थ में सिद्धि प्राप्त करने वाला वह महातपस्वी कौन था? वह किसका पुत्र था और इसका क्या कारण था — यह मैं जानना चाहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.5.187.3)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। चित्रोनाम महातेजा इन्द्रस्य दयितः पुरा । तस्य पुत्रो नृपश्रेष्ठ पत्त्रेश्वर इति श्रुतः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| citronāma mahātejā indrasya dayitaḥ purā | tasya putro nṛpaśreṣṭha pattreśvara iti śrutaḥ
श्रीमार्कण्डेय बोले — पूर्वकाल में इन्द्र का प्रिय, महातेजस्वी चित्र नामक गन्धर्व था। हे नृपश्रेष्ठ! उसका पुत्र 'पत्त्रेश्वर' नाम से विख्यात था।
श्लोक 4 (skanda.5.187.4)
रूपवान् सुभगश्चैव सर्वशत्रुभयंकरः । इन्द्रस्य दयितोऽत्यर्थं जय इत्येव चापरः
rūpavān subhagaścaiva sarvaśatrubhayaṁkaraḥ | indrasya dayito'tyarthaṁ jaya ityeva cāparaḥ
वह रूपवान्, सुभग तथा समस्त शत्रुओं को भयभीत करने वाला था; इन्द्र को अत्यन्त प्रिय था, और उसका एक अन्य नाम 'जय' भी था।
श्लोक 5 (skanda.5.187.5)
स कदाचित्सभामध्ये सर्वदेवसमागमे । मेनकानृत्यगीतेन मोहितः सुचिरं किल
sa kadācitsabhāmadhye sarvadevasamāgame | menakānṛtyagītena mohitaḥ suciraṁ kila
एक बार सभा के मध्य, समस्त देवताओं की उपस्थिति में, वह मेनका के नृत्य-गीत से बहुत देर तक मोहित हो गया।
श्लोक 6 (skanda.5.187.6)
तिष्ठते गतमर्यादो गतप्राण इव क्षणात् । तावत्सुरपतिर्देवः शशापाथाजितेन्द्रियम्
tiṣṭhate gatamaryādo gataprāṇa iva kṣaṇāt | tāvatsurapatirdevaḥ śaśāpāthājitendriyam
वह मर्यादा भूलकर मानो क्षणभर के लिए प्राणहीन-सा खड़ा रह गया। तभी देवराज इन्द्र ने उस अजितेन्द्रिय को शाप दे दिया —
श्लोक 7 (skanda.5.187.7)
यस्मात्त्वं स्वर्गसंस्थोऽपि मर्त्यधर्ममुपेयिवान् । तस्मान्मर्त्ये चिरं कालं क्षपयिष्यस्यसंशयम्
yasmāttvaṁ svargasaṁstho'pi martyadharmamupeyivān | tasmānmartye ciraṁ kālaṁ kṣapayiṣyasyasaṁśayam
'चूँकि तुमने स्वर्ग में रहते हुए भी मर्त्यधर्म अपना लिया, इसलिए तुम निःसंदेह दीर्घकाल तक मृत्युलोक में बिताओगे।'
श्लोक 8 (skanda.5.187.8)
एवमुक्तः सुरेन्द्रेण चित्रसेनसुतो युवा । वेपमानः सुरश्रेष्ठः कृताञ्जलिरुवाच ह
evamuktaḥ surendreṇa citrasenasuto yuvā | vepamānaḥ suraśreṣṭhaḥ kṛtāñjaliruvāca ha
देवराज इन्द्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह चित्रसेन का युवा पुत्र, देवश्रेष्ठ, काँपते हुए हाथ जोड़कर बोला —
श्लोक 9 (skanda.5.187.9)
पत्त्रेश्वर उवाच। मया पापेन मूढेन अजितेन्द्रियचेतसा । प्राप्तं वै यत्फलं तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि
pattreśvara uvāca| mayā pāpena mūḍhena ajitendriyacetasā | prāptaṁ vai yatphalaṁ tasya prasādaṁ kartumarhasi
पत्त्रेश्वर बोला — 'मुझ पापी, मूढ़, अजितेन्द्रिय-चित्त को जो यह फल प्राप्त हुआ है, इसमें कृपा कीजिए।'
श्लोक 10 (skanda.5.187.10)
शक्र उवाच। नर्मदातटमाश्रित्य द्वादशाब्दं जितेन्द्रियः । आराधय शिवं शान्तं पुनः प्राप्स्यसि सद्गतिम्
śakra uvāca| narmadātaṭamāśritya dvādaśābdaṁ jitendriyaḥ | ārādhaya śivaṁ śāntaṁ punaḥ prāpsyasi sadgatim
शक्र बोले — 'नर्मदा के तट का आश्रय लेकर, जितेन्द्रिय होकर बारह वर्षों तक शान्त शिव की आराधना करो; तुम पुनः सद्गति को प्राप्त करोगे।'
श्लोक 11 (skanda.5.187.11)
सत्यशौचरतानां च धर्मिष्ठानां जितात्मनाम् । लोकोऽयं पापिनां नैव इति शास्त्रस्य निश्चयः
satyaśaucaratānāṁ ca dharmiṣṭhānāṁ jitātmanām | loko'yaṁ pāpināṁ naiva iti śāstrasya niścayaḥ
'यह लोक सत्य और शौच में रत, धर्मिष्ठ तथा जितात्मा पुरुषों के लिए है, पापियों के लिए कभी नहीं — यही शास्त्र का निश्चय है।'
श्लोक 12 (skanda.5.187.12)
एवमुक्ते महाराज सहस्राक्षेण धीमता । गन्धर्वतनयो धीमान्प्रणम्यागात्तु भूतलम्
evamukte mahārāja sahasrākṣeṇa dhīmatā | gandharvatanayo dhīmānpraṇamyāgāttu bhūtalam
हे महाराज! बुद्धिमान् सहस्राक्ष इन्द्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह बुद्धिमान् गन्धर्वपुत्र प्रणाम करके पृथ्वीतल पर आया।
श्लोक 13 (skanda.5.187.13)
रेवाया विमले तोये ब्रह्मावर्तसमीपतः । स्नात्वा जप्त्वा विधानेन अर्चयित्वा च शङ्करम्
revāyā vimale toye brahmāvartasamīpataḥ | snātvā japtvā vidhānena arcayitvā ca śaṅkaram
ब्रह्मावर्त के समीप रेवा के निर्मल जल में स्नान करके, विधिपूर्वक जप करके और शंकर का पूजन करके,
श्लोक 14 (skanda.5.187.14)
वाय्वम्बुपिण्याकफलैश्च पुष्पैः पर्णैश्च मूलाशनयावकेन । तताप पञ्चाग्नितपोभिरुग्रैस्ततश्च तोषं समगात्स देवः
vāyvambupiṇyākaphalaiśca puṣpaiḥ parṇaiśca mūlāśanayāvakena | tatāpa pañcāgnitapobhirugraistataśca toṣaṁ samagātsa devaḥ
वायु, जल, खली, फल, फूल, पत्ते, मूल तथा जौ के सत्तू का आहार करते हुए उसने भीषण पंचाग्नि-तप किया, और तब वह देव प्रसन्न हो गए।
श्लोक 15 (skanda.5.187.15)
पिनाकपाणिं वरदं त्रिशूलिनमुमापतिं ह्यन्धकनाशनं च । चन्द्रार्धमौलिं गजकृत्तिवाससं दृष्ट्वा पपाताग्रगतं समीक्ष्य
pinākapāṇiṁ varadaṁ triśūlinamumāpatiṁ hyandhakanāśanaṁ ca | candrārdhamauliṁ gajakṛttivāsasaṁ dṛṣṭvā papātāgragataṁ samīkṣya
पिनाकधारी, वरदाता, त्रिशूलधारी, उमापति, अन्धकासुर के विनाशक, अर्धचन्द्र-मौलि तथा गजचर्म वस्त्रधारी शिव को अपने सम्मुख देखकर वह भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 16 (skanda.5.187.16)
ईश्वर उवाच। वरं वृणीष्व भद्रं ते वरदोऽहं तवानघ । यमिच्छसि ददाम्यद्य नात्र कार्या विचारणा
īśvara uvāca| varaṁ vṛṇīṣva bhadraṁ te varado'haṁ tavānagha | yamicchasi dadāmyadya nātra kāryā vicāraṇā
ईश्वर बोले — 'हे निष्पाप! वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हारे लिए वरदाता हूँ। जो तुम चाहो, आज मैं वही देता हूँ, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।'
श्लोक 17 (skanda.5.187.17)
पत्त्रेश्वर उवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम । अत्र त्वं सततं तीर्थे मम नाम्ना भव प्रभो
pattreśvara uvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa yadi deyo varo mama | atra tvaṁ satataṁ tīrthe mama nāmnā bhava prabho
पत्त्रेश्वर बोला — 'हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो हे प्रभो! इस तीर्थ में सदा मेरे नाम से आप विराजमान रहिए।'
श्लोक 18 (skanda.5.187.18)
एतच्छ्रुत्वा महादेवो हर्षगद्गदया गिरा । तथेत्युक्त्वा ययौ हृष्ट उमया सह शङ्करः
etacchrutvā mahādevo harṣagadgadayā girā | tathetyuktvā yayau hṛṣṭa umayā saha śaṅkaraḥ
यह सुनकर हर्ष से गद्गद वाणी में महादेव ने 'तथास्तु' कहा, और प्रसन्न होकर शंकर उमा के साथ वहीं स्थापित हो गए।
श्लोक 19 (skanda.5.187.19)
सोऽपि तत्तीर्थमाप्लुत्य गते देवे दिवं प्रति । स्नात्वा जाप्यविधानेन तर्पयित्वा पितॄन् पुनः
so'pi tattīrthamāplutya gate deve divaṁ prati | snātvā jāpyavidhānena tarpayitvā pitṝn punaḥ
देव के दिव्यलोक की ओर जाने पर, वह भी उस तीर्थ में स्नान करके, जप-विधि से तथा पुनः पितरों का तर्पण करके,
श्लोक 20 (skanda.5.187.20)
स्थापयामास देवेशं तस्मिंस्तीर्थे विधानतः । पत्त्रेश्वरं तु विख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत
sthāpayāmāsa deveśaṁ tasmiṁstīrthe vidhānataḥ | pattreśvaraṁ tu vikhyātaṁ triṣu lokeṣu bhārata
विधिपूर्वक उस तीर्थ में देवेश की स्थापना की; हे भारत! वह तीर्थ 'पत्त्रेश्वर' नाम से तीनों लोकों में विख्यात हुआ।
श्लोक 21 (skanda.5.187.21)
इन्द्रलोकं गतः शापान्मुक्तः सोऽपि नरेश्वर । हृष्टः प्रमुदितो रम्यं जयशब्दादिमङ्गलैः
indralokaṁ gataḥ śāpānmuktaḥ so'pi nareśvara | hṛṣṭaḥ pramudito ramyaṁ jayaśabdādimaṅgalaiḥ
हे नरेश्वर! शाप से मुक्त होकर वह भी इन्द्रलोक को प्राप्त हुआ, हर्षित और आनन्दित होकर, जयकार आदि मंगलध्वनियों के साथ।
श्लोक 22 (skanda.5.187.22)
एष ते कथितः प्रश्नः पृष्टो यो वै युधिष्ठिर । तत्र स्नानेन चैकेन सर्वपापैः प्रमुच्यते
eṣa te kathitaḥ praśnaḥ pṛṣṭo yo vai yudhiṣṭhira | tatra snānena caikena sarvapāpaiḥ pramucyate
हे युधिष्ठिर! यह वही प्रश्न है जो तुमने पूछा था, वह कह दिया गया; वहाँ केवल एक स्नान से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 23 (skanda.5.187.23)
यस्त्वर्चयेन्महादेवं तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर । स्नात्वाभ्यर्च्य पितॄन् देवान् सोऽश्वमेधफलं लभेत्
yastvarcayenmahādevaṁ tasmiṁstīrthe yudhiṣṭhira | snātvābhyarcya pitḥn devān so'śvamedhaphalaṁ labhet
हे युधिष्ठिर! जो उस तीर्थ में महादेव का पूजन करता है, स्नान करके पितरों और देवताओं की अर्चना करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 24 (skanda.5.187.24)
मृतो वर्षशतं साग्रं क्रीडित्वा च शिवे पुरे । राजा वा राजतुल्यो वा पश्चान्मर्त्येषु जायते
mṛto varṣaśataṁ sāgraṁ krīḍitvā ca śive pure | rājā vā rājatulyo vā paścānmartyeṣu jāyate
मरणोपरान्त शिवपुरी में सौ वर्षों से अधिक क्रीड़ा करके, वह पुनः मर्त्यलोक में राजा अथवा राजतुल्य होकर जन्म लेता है।
श्लोक 25 (skanda.5.187.25)
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो जीवेच्च शरदः शतम् । व्याधिशोकविनिर्मुक्तः पुनः स्मरति तज्जलम्
vedavedāṅgatattvajño jīvecca śaradaḥ śatam | vyādhiśokavinirmuktaḥ punaḥ smarati tajjalam
वह वेद-वेदांगों के तत्त्व का ज्ञाता होता है, सौ वर्षों तक जीवित रहता है, व्याधि-शोक से मुक्त रहता है, और सदा उस तीर्थ-जल का स्मरण करता है।