अवन्ती खण्ड · अध्याय 188
अग्नितीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.188.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र अग्नितीर्थमनुत्तमम् । यत्र संनिहितो ह्यग्निर्गतः कामेन मोहितः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra agnitīrthamanuttamam | yatra saṁnihito hyagnirgataḥ kāmena mohitaḥ
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे राजेन्द्र! वहाँ से परम श्रेष्ठ अग्नितीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ काम से मोहित अग्निदेव सदा निवास करते हैं।
श्लोक 2 (skanda.5.188.2)
युधिष्ठिर उवाच। कथं देवो जगद्धाता कामेन कलुषीकृतः । कथं च नित्यदा वास एकस्थानेषु जायते
yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ devo jagaddhātā kāmena kaluṣīkṛtaḥ | kathaṁ ca nityadā vāsa ekasthāneṣu jāyate
युधिष्ठिर बोले — जगत् के धाता देव काम से कैसे कलुषित हुए? और उनका एक ही स्थान पर सदा निवास कैसे होता है?
श्लोक 3 (skanda.5.188.3)
एतत्त्वाश्चर्यमतुलं सर्वलोकेष्वनुत्तमम् । कथयस्व महाभाग परं कौतूहलं मम
etattvāścaryamatulaṁ sarvalokeṣvanuttamam | kathayasva mahābhāga paraṁ kautūhalaṁ mama
यह सम्पूर्ण लोकों में अद्वितीय, अनुपम आश्चर्य है। हे महाभाग! यह मुझे बताइए, इसमें मेरा बड़ा कौतूहल है।
श्लोक 4 (skanda.5.188.4)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। साधु साधु महाप्राज्ञ पृष्टः प्रश्नस्त्वयानघ । कथयामि यथापूर्वं श्रुतमेतन्महेश्वरात्
śrīmārkaṇḍeya uvāca| sādhu sādhu mahāprājña pṛṣṭaḥ praśnastvayānagha | kathayāmi yathāpūrvaṁ śrutametanmaheśvarāt
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे निष्पाप महाप्राज्ञ! तुमने बहुत सुन्दर प्रश्न पूछा है। जैसा मैंने पूर्वकाल में महेश्वर से सुना था, वैसा ही तुम्हें सुनाता हूँ।
श्लोक 5 (skanda.5.188.5)
आसीत्कृतयुगे राजा नाम्ना दुर्योधनो महान् । हस्त्यश्वरथसम्पूर्णो मेदिनीपरिपालकः
āsītkṛtayuge rājā nāmnā duryodhano mahān | hastyaśvarathasampūrṇo medinīparipālakaḥ
कृतयुग में दुर्योधन नामक एक महान् राजा था, जो हाथी, घोड़े और रथों से सम्पन्न तथा पृथ्वी का पालनकर्ता था।
श्लोक 6 (skanda.5.188.6)
रूपयौवनसम्पन्नं दृष्ट्वा तं पृथिवीपतिम् । दिव्योपभोगसम्पन्नं प्रार्थयामास नर्मदा
rūpayauvanasampannaṁ dṛṣṭvā taṁ pṛthivīpatim | divyopabhogasampannaṁ prārthayāmāsa narmadā
रूप और यौवन से सम्पन्न, दिव्य भोगों से युक्त उस राजा को देखकर नर्मदा ने उसे वरण किया।
श्लोक 7 (skanda.5.188.7)
स तु तां चकमे कन्यां त्यक्त्वाऽन्यं प्रमदाजनम् । मुदा परमया युक्तो माहिष्मत्याः पतिर्नृप
sa tu tāṁ cakame kanyāṁ tyaktvā'nyaṁ pramadājanam | mudā paramayā yukto māhiṣmatyāḥ patirnṛpa
हे राजन्! उसने भी अन्य समस्त स्त्रियों को त्यागकर उस कन्या की कामना की, और परम प्रसन्नता से युक्त होकर वह माहिष्मती का स्वामी बना।
श्लोक 8 (skanda.5.188.8)
रमते स तया सार्द्धं काले वै नृपसत्तम । नर्मदा जनयामास कन्यां पद्मदलेक्षणाम्
ramate sa tayā sārddhaṁ kāle vai nṛpasattama | narmadā janayāmāsa kanyāṁ padmadalekṣaṇām
हे नृपसत्तम! वह समय पाकर उसके साथ रमण करता रहा, और नर्मदा ने कमल-दल के समान नेत्रों वाली एक कन्या को जन्म दिया।
श्लोक 9 (skanda.5.188.9)
अङ्गप्रत्यङ्गसम्पन्ना यस्माल्लोकेषु विश्रुता । तस्यां पिता च माता च चक्रतुः प्रेमबन्धनम्
aṅgapratyaṅgasampannā yasmāllokeṣu viśrutā | tasyāṁ pitā ca mātā ca cakratuḥ premabandhanam
वह सर्वांगसुन्दरी लोकों में विख्यात हुई; उसके माता-पिता दोनों उसे स्नेह-बन्धन में बाँधकर रखते थे।
श्लोक 10 (skanda.5.188.10)
कालेनातिसुदीर्घेण यौवनस्था वराङ्गना । प्रार्थ्यमानापि राजन्वै नात्मानं दातुमिच्छति
kālenātisudīrgheṇa yauvanasthā varāṅganā | prārthyamānāpi rājanvai nātmānaṁ dātumicchati
बहुत दीर्घ काल बीतने पर वह सुन्दरी युवावस्था को प्राप्त हुई; हे राजन्! अनेक द्वारा माँगे जाने पर भी वह स्वयं को किसी को देना नहीं चाहती थी।
श्लोक 11 (skanda.5.188.11)
ततोऽन्यदिवसे वह्निर्द्विजरूपो महातपाः । राजानं प्रार्थयामास रहो गत्वा शनैः शनैः
tato'nyadivase vahnirdvijarūpo mahātapāḥ | rājānaṁ prārthayāmāsa raho gatvā śanaiḥ śanaiḥ
तत्पश्चात् एक दिन महातपस्वी अग्निदेव ब्राह्मण-रूप धारण करके, एकान्त में धीरे-धीरे जाकर राजा से प्रार्थना करने लगे।
श्लोक 12 (skanda.5.188.12)
भोभो रघुकुलश्रेष्ठ द्विजोऽहं मन्दसन्ततिः । दरिद्रो ह्यसहायश्च भार्यार्थे वरयामि ताम्
bhobho raghukulaśreṣṭha dvijo'haṁ mandasantatiḥ | daridro hyasahāyaśca bhāryārthe varayāmi tām
'हे श्रेष्ठ राजन्! मैं अल्प संतति वाला, दरिद्र और असहाय ब्राह्मण हूँ; पत्नी के लिए मैं उस कन्या को माँगता हूँ।'
श्लोक 13 (skanda.5.188.13)
कन्या सुदर्शना नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि । तां ददस्व महाभाग वर्धते तव मन्दिरे
kanyā sudarśanā nāma rūpeṇāpratimā bhuvi | tāṁ dadasva mahābhāga vardhate tava mandire
'सुदर्शना नामक वह कन्या, जो पृथ्वी पर रूप में अनुपम है, उसे मुझे दीजिए, हे महाभाग! वह आपके ही महल में बड़ी हो रही है।'
श्लोक 14 (skanda.5.188.14)
ब्रह्मचर्येण निर्विण्ण एकाकी कामपीडितः । याचमानस्य मे तात प्रसादं कर्तुमर्हसि
brahmacaryeṇa nirviṇṇa ekākī kāmapīḍitaḥ | yācamānasya me tāta prasādaṁ kartumarhasi
'ब्रह्मचर्य से खिन्न, अकेला और काम से पीड़ित होकर मैं याचना कर रहा हूँ; हे तात! मुझ पर कृपा कीजिए।'
श्लोक 15 (skanda.5.188.15)
राजोवाच - नाहं द्रव्यविहीनस्य असवर्णस्य कर्हिचित् । दास्यामि स्वां सुतां शुभ्रां गम्यतां द्विजपुंगव
rājovāca - nāhaṁ dravyavihīnasya asavarṇasya karhicit | dāsyāmi svāṁ sutāṁ śubhrāṁ gamyatāṁ dvijapuṁgava
राजा बोला — 'मैं धनहीन तथा असमान वर्ण के व्यक्ति को अपनी उज्ज्वल कन्या कभी नहीं दूँगा। हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप जाइए।'
श्लोक 16 (skanda.5.188.16)
एवमुक्तस्तदा वह्निः परां पीडामुपागतः । न किंचिदुक्त्वा राजानं तत्रैवान्तरधीयत
evamuktastadā vahniḥ parāṁ pīḍāmupāgataḥ | na kiṁciduktvā rājānaṁ tatraivāntaradhīyata
ऐसा कहे जाने पर अग्निदेव अत्यन्त पीड़ा को प्राप्त हुए; राजा से कुछ और कहे बिना ही वे वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 17 (skanda.5.188.17)
गते चादर्शनं विप्रे राजा मन्त्रिपुरोहितैः । मन्त्रयित्वाथ काले तु तुष्टो मखमुखे स्थितः
gate cādarśanaṁ vipre rājā mantripurohitaiḥ | mantrayitvātha kāle tu tuṣṭo makhamukhe sthitaḥ
विप्र के अदृश्य हो जाने पर राजा ने मन्त्रियों और पुरोहित के साथ विचार-विमर्श किया; तत्पश्चात् समय आने पर वह प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ के आरम्भ में उपस्थित हुआ।
श्लोक 18 (skanda.5.188.18)
यजतश्च मखे भक्त्या ब्राह्मणैः सह भारत । ततश्चादर्शनं वह्निः सर्वेषां पश्यतामगात्
yajataśca makhe bhaktyā brāhmaṇaiḥ saha bhārata | tataścādarśanaṁ vahniḥ sarveṣāṁ paśyatāmagāt
हे भारत! ब्राह्मणों के साथ भक्तिपूर्वक यज्ञ करते समय, अग्निदेव सबकी आँखों के सामने ही अदृश्य हो गए।
श्लोक 19 (skanda.5.188.19)
विप्रा दुर्मनसो भूत्वा गता राज्ञो हि मन्दिरम् । वह्निनाशं विमनसो राजानमिदमब्रुवन्
viprā durmanaso bhūtvā gatā rājño hi mandiram | vahnināśaṁ vimanaso rājānamidamabruvan
ब्राह्मण दुखी होकर राजा के महल में गए, और मन में व्यथित होकर अग्नि के नष्ट होने की बात राजा से इस प्रकार कही —
श्लोक 20 (skanda.5.188.20)
ब्राह्मणा ऊचुः । दुर्योधन महाराज श्रूयतां महदद्भुतम् । न श्रुतं न च दृष्टं वा कौतुकं नृपपुंगव
brāhmaṇā ūcuḥ | duryodhana mahārāja śrūyatāṁ mahadadbhutam | na śrutaṁ na ca dṛṣṭaṁ vā kautukaṁ nṛpapuṁgava
ब्राह्मण बोले — 'हे महाराज दुर्योधन! एक महान् आश्चर्य सुनिए। हे नृपश्रेष्ठ! यह कौतुक न तो कभी सुना गया है, न देखा गया है।'
श्लोक 21 (skanda.5.188.21)
अग्निकार्यप्रवृत्तानां सर्वेषां विधिवन्नृप । केनापि हेतुना वह्निर्दृश्यते न ज्वलत्युत
agnikāryapravṛttānāṁ sarveṣāṁ vidhivannṛpa | kenāpi hetunā vahnirdṛśyate na jvalatyuta
'हे राजन्! विधिपूर्वक अग्निकार्य में प्रवृत्त हम सबके होते हुए भी, किसी कारणवश अग्नि न तो दिखाई देते हैं, न प्रज्वलित होते हैं।'
श्लोक 22 (skanda.5.188.22)
तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं राजा विप्रमुखाच्च्युतम् । आसनात्पतितो भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः
tacchrutvā vipriyaṁ ghoraṁ rājā vipramukhāccyutam | āsanātpatito bhūmau chinnamūla iva drumaḥ
यह घोर अप्रिय समाचार ब्राह्मणों के मुख से सुनकर राजा जड़ से कटे वृक्ष के समान आसन से भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 23 (skanda.5.188.23)
आश्वस्य च मुहूर्तेन उन्मत्त इव संस्तदा । निरीक्ष्य च दिशः सर्वा इदं वचनमब्रवीत्
āśvasya ca muhūrtena unmatta iva saṁstadā | nirīkṣya ca diśaḥ sarvā idaṁ vacanamabravīt
एक मुहूर्त में सचेत होकर मानो उन्मत्त-सा वह सभी दिशाओं में देखते हुए इस प्रकार बोला —
श्लोक 24 (skanda.5.188.24)
किमेतदाश्चर्यपरमिति भोभो द्विजोत्तमाः । कथ्यतां कारणं सर्वं शास्त्रदृष्ट्या विभाव्य च
kimetadāścaryaparamiti bhobho dvijottamāḥ | kathyatāṁ kāraṇaṁ sarvaṁ śāstradṛṣṭyā vibhāvya ca
'हे द्विजोत्तमो! यह कैसा परम आश्चर्य है? शास्त्रदृष्टि से विचारकर इसका सम्पूर्ण कारण बताइए।'
श्लोक 25 (skanda.5.188.25)
मम वा दुष्कृतं किंचिदुताहो भवतामिह । येन नष्टोऽग्निशालायां हुतभुक्केन हेतुना
mama vā duṣkṛtaṁ kiṁcidutāho bhavatāmiha | yena naṣṭo'gniśālāyāṁ hutabhukkena hetunā
'क्या यह मेरा ही कोई दुष्कर्म है, अथवा आप लोगों का, जिस कारण अग्निशाला से अग्नि नष्ट हो गए हैं?'
श्लोक 26 (skanda.5.188.26)
मन्त्रच्छिद्रमथान्यद्वा नैव किंचिददक्षिणम् । क्रियाहीनं कृतं वाथ केन वह्निर्न दृश्यते
mantracchidramathānyadvā naiva kiṁcidadakṣiṇam | kriyāhīnaṁ kṛtaṁ vātha kena vahnirna dṛśyate
'क्या मन्त्र में कोई त्रुटि हुई है, अथवा अन्य कुछ, दक्षिणा में कोई कमी रह गई है, अथवा कोई क्रिया अधूरी की गई है — किस कारण से अग्नि दिखाई नहीं देते?'
श्लोक 27 (skanda.5.188.27)
अन्नहीनो दहेद्राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः । दातारं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः
annahīno dahedrāṣṭraṁ mantrahīnastu ṛtvijaḥ | dātāraṁ dakṣiṇāhīno nāsti yajñasamo ripuḥ
'अन्नहीन यज्ञ राष्ट्र को, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विजों को, और दक्षिणाहीन यज्ञ दाता को भस्म कर देता है — यज्ञ के समान कोई शत्रु नहीं है।'
श्लोक 28 (skanda.5.188.28)
ब्राह्मणा ऊचुः । न मन्त्रहीना हि वयं न च राजन्व्रतैस्तथा । द्रव्येण च न हीनस्त्वमन्यत्पापं विचिन्त्यताम्
brāhmaṇā ūcuḥ | na mantrahīnā hi vayaṁ na ca rājanvrataistathā | dravyeṇa ca na hīnastvamanyatpāpaṁ vicintyatām
ब्राह्मण बोले — 'हे राजन्! हम न तो मन्त्रहीन हैं, न व्रतों में कोई कमी है, और न ही आप द्रव्य में हीन हैं; अवश्य ही कोई अन्य पाप रहा होगा, इस पर विचार करना चाहिए।'
श्लोक 29 (skanda.5.188.29)
राजोवाच - तथापि यूयं सहिता उपायं चिन्तयन्त्विति । येन श्रेयो भवेन्नित्यमिह लोके परत्र च
rājovāca - tathāpi yūyaṁ sahitā upāyaṁ cintayantviti | yena śreyo bhavennityamiha loke paratra ca
राजा बोला — 'फिर भी आप सब मिलकर कोई उपाय सोचिए, जिससे इस लोक और परलोक दोनों में सदा कल्याण हो।'
श्लोक 30 (skanda.5.188.30)
एवमुक्तास्ततः सर्वे ब्राह्मणाः कृतनिश्चयाः । निराहाराः स्थिताः शर्वे यत्र नष्टो हुताशनः
evamuktāstataḥ sarve brāhmaṇāḥ kṛtaniścayāḥ | nirāhārāḥ sthitāḥ śarve yatra naṣṭo hutāśanaḥ
ऐसा कहे जाने पर वे सभी ब्राह्मण दृढ़ निश्चय करके, जहाँ अग्नि नष्ट हुए थे, वहीं निराहार रहकर बैठ गए।
श्लोक 31 (skanda.5.188.31)
ततः स्वप्ने महातेजा हुतभुग्ब्राह्मणांस्तदा । उवाच श्रूयतां सर्वैर्मम नाशस्य कारणम्
tataḥ svapne mahātejā hutabhugbrāhmaṇāṁstadā | uvāca śrūyatāṁ sarvairmama nāśasya kāraṇam
तब स्वप्न में उस महातेजस्वी अग्नि ने ब्राह्मणों से कहा — 'मेरे नष्ट होने का कारण सब सुनें।'
श्लोक 32 (skanda.5.188.32)
प्रार्थितोऽयं मया राजा सुतां दातुं न चेच्छति । तेन नष्टोऽग्निशरणादहं भो द्विजसत्तमाः
prārthito'yaṁ mayā rājā sutāṁ dātuṁ na cecchati | tena naṣṭo'gniśaraṇādahaṁ bho dvijasattamāḥ
'मैंने इस राजा से प्रार्थना की थी, किन्तु यह अपनी कन्या देना नहीं चाहता; हे द्विजसत्तमो! इसी कारण मैं अपने अग्निस्थान से चला गया हूँ।'
श्लोक 33 (skanda.5.188.33)
यदि मे स्वसुतां राजा ददाति परमार्चिताम् । तदास्य ज्वलमानोऽहं गृहे तिष्ठामि नान्यथा
yadi me svasutāṁ rājā dadāti paramārcitām | tadāsya jvalamāno'haṁ gṛhe tiṣṭhāmi nānyathā
'यदि राजा मुझे अपनी परम पूजित कन्या दे दे, तो मैं प्रज्वलित होकर उसके घर में निवास करूँगा — अन्यथा नहीं।'
श्लोक 34 (skanda.5.188.34)
तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रा वैश्वानरमुखोद्गतम् । विस्मयोत्फुल्लनयना राजानमिदमब्रुवन्
tacchrutvā vacanaṁ viprā vaiśvānaramukhodgatam | vismayotphullanayanā rājānamidamabruvan
वैश्वानर (अग्नि) के मुख से निकला यह वचन सुनकर ब्राह्मण आश्चर्य से नेत्र फैलाए हुए राजा से यह बोले —
श्लोक 35 (skanda.5.188.35)
भवतो मतमाज्ञाय सर्वे गत्वाग्निमन्दिरम् । निराहाराः स्थिता रात्रौ पश्यामो जातवेदसम्
bhavato matamājñāya sarve gatvāgnimandiram | nirāhārāḥ sthitā rātrau paśyāmo jātavedasam
'आपकी सम्मति जानकर हम सब अग्निमन्दिर में जाकर, रात्रिभर निराहार रहकर, वहाँ जातवेदा (अग्नि) के दर्शन कर रहे थे।'
श्लोक 36 (skanda.5.188.36)
तेनोक्ताः स्वसुतां चेत्तु राजा मे दातुमिच्छति । ततोऽस्य भूयोऽपि गृहे ज्वलेऽहं नान्यथा द्विजाः
tenoktāḥ svasutāṁ cettu rājā me dātumicchati | tato'sya bhūyo'pi gṛhe jvale'haṁ nānyathā dvijāḥ
'उन्होंने हमसे कहा — यदि राजा मुझे अपनी कन्या देना चाहे, तो मैं पुनः उसके घर में प्रज्वलित होऊँगा, अन्यथा नहीं, हे द्विजो!'
श्लोक 37 (skanda.5.188.37)
एवं ज्ञात्वा महाराज स्वसुतां दातुमर्हसि
evaṁ jñātvā mahārāja svasutāṁ dātumarhasi
'यह जानकर, हे महाराज! आपको अपनी कन्या दे देनी चाहिए।'
श्लोक 38 (skanda.5.188.38)
राजोवाच - भवतां तस्य वा कार्यं देवस्य वचनं हृदि । समयं कर्तुमिच्छामि कन्यादाने ह्यनुत्तमम्
rājovāca - bhavatāṁ tasya vā kāryaṁ devasya vacanaṁ hṛdi | samayaṁ kartumicchāmi kanyādāne hyanuttamam
राजा बोला — 'यह आप लोगों का कार्य हो या उस देव का वचन, मैं इसे हृदय में धारण करता हूँ। कन्यादान में मैं एक श्रेष्ठ शर्त रखना चाहता हूँ।'
श्लोक 39 (skanda.5.188.39)
मम संनिहितो नित्यं गृहे तिष्ठतु पावकः । ददामि रुचिरापाङ्गीं नान्यथा करवाणि वै
mama saṁnihito nityaṁ gṛhe tiṣṭhatu pāvakaḥ | dadāmi rucirāpāṅgīṁ nānyathā karavāṇi vai
'अग्निदेव सदा मेरे घर में निवास करें, तभी मैं उस सुन्दर नेत्रों वाली कन्या को दूँगा — अन्यथा मैं ऐसा नहीं करूँगा।'
श्लोक 40 (skanda.5.188.40)
एवं ते ब्राह्मणाः श्रुत्वा तथाग्निं प्राप्य सत्वरम् । कथयित्वा विवाहेन योजयामासुराशु वै
evaṁ te brāhmaṇāḥ śrutvā tathāgniṁ prāpya satvaram | kathayitvā vivāhena yojayāmāsurāśu vai
यह सुनकर उन ब्राह्मणों ने शीघ्र ही अग्नि के पास जाकर यह बात कही, और तुरन्त ही विवाह द्वारा दोनों को संयुक्त कर दिया।
श्लोक 41 (skanda.5.188.41)
सुदर्शनाया लाभेन परितुष्टो हुताशनः । ज्वलते सन्निधौ नित्यं माहिष्मत्यां युधिष्ठिर
sudarśanāyā lābhena parituṣṭo hutāśanaḥ | jvalate sannidhau nityaṁ māhiṣmatyāṁ yudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर! सुदर्शना को पाकर परम संतुष्ट हुए अग्निदेव माहिष्मती में सदा उनके समीप प्रज्वलित रहते हैं।
श्लोक 42 (skanda.5.188.42)
ततः प्रभृति तत्तीर्थमग्नितीर्थं प्रचक्षते । ये तत्र पक्षसन्धौ तु स्नानदानैस्तु भाविताः
tataḥ prabhṛti tattīrthamagnitīrthaṁ pracakṣate | ye tatra pakṣasandhau tu snānadānaistu bhāvitāḥ
तभी से वह तीर्थ 'अग्नितीर्थ' कहलाने लगा। जो वहाँ पक्ष-सन्धि के अवसर पर स्नान-दान में भावित होते हैं,
श्लोक 43 (skanda.5.188.43)
तर्पयन्ति पितॄन् देवांस्तेऽश्वमेधफलैर्युताः । सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति तस्मिंस्तीर्थे नराधिप
tarpayanti pitṝn devāṁste'śvamedhaphalairyutāḥ | suvarṇaṁ ye prayacchanti tasmiṁstīrthe narādhipa
वे पितरों और देवताओं का तर्पण करके अश्वमेध यज्ञ के फल से युक्त हो जाते हैं। हे नराधिप! जो उस तीर्थ में स्वर्ण दान करते हैं,
श्लोक 44 (skanda.5.188.44)
पृथ्वीदानफलं तत्र जायते नात्र संशयः । अनाशकं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप
pṛthvīdānaphalaṁ tatra jāyate nātra saṁśayaḥ | anāśakaṁ tu yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa
उन्हें वहाँ पृथ्वी-दान का फल प्राप्त होता है — इसमें कोई सन्देह नहीं है। हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अनशन करता है,
श्लोक 45 (skanda.5.188.45)
स मृतो ह्यग्निलोके तु क्रीडते सुरपूजितः । एष ते ह्यग्नितीर्थस्य सम्भवः कथितो मया
sa mṛto hyagniloke tu krīḍate surapūjitaḥ | eṣa te hyagnitīrthasya sambhavaḥ kathito mayā
वह मरणोपरान्त देवताओं द्वारा पूजित होकर अग्निलोक में क्रीड़ा करता है। यह अग्नितीर्थ की उत्पत्ति की कथा है, जो मैंने तुम्हें सुनाई।
श्लोक 46 (skanda.5.188.46)
सर्वपापहरः पुण्यः श्रुतमात्रो नरोत्तम । धन्यः पापहरो नित्यमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत्
sarvapāpaharaḥ puṇyaḥ śrutamātro narottama | dhanyaḥ pāpaharo nityamityevaṁ śaṅkaro'bravīt
हे नरोत्तम! यह कथा सर्वपापहारी और पुण्यदायी है, केवल सुनने मात्र से ही; मनुष्य धन्य होकर सदा पापरहित हो जाता है — ऐसा शंकर ने कहा था।