अवन्ती खण्ड · अध्याय 189
रवितीर्थ वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.189.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। तत्रैव तु भवेदन्यदादित्यस्य महात्मनः । कीर्तयामि नरश्रेष्ठ यदि ते श्रवणे मतिः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tatraiva tu bhavedanyadādityasya mahātmanaḥ | kīrtayāmi naraśreṣṭha yadi te śravaṇe matiḥ
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे नरश्रेष्ठ! वहीं महात्मा सूर्य का एक और वृत्तान्त है; यदि उसे सुनने में तुम्हारी रुचि हो, तो मैं वर्णन करता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.5.189.2)
युधिष्ठिर उवाच। एतदाश्चर्यमतुलं श्रुत्वा तव मुखोद्गतम् । विस्मयाद्धृष्टरोमाहं जातोऽस्मि मुनिसत्तम
yudhiṣṭhira uvāca| etadāścaryamatulaṁ śrutvā tava mukhodgatam | vismayāddhṛṣṭaromāhaṁ jāto'smi munisattama
युधिष्ठिर बोले — हे मुनिसत्तम! आपके मुख से निकला यह अनुपम आश्चर्य सुनकर मुझे विस्मय से रोमांच हो आया है।
श्लोक 3 (skanda.5.189.3)
सहस्रकिरणो देवो हर्ता कर्ता निरञ्जनः । अवतारेण लोकानामुद्धर्ता नर्मदातटे
sahasrakiraṇo devo hartā kartā nirañjanaḥ | avatāreṇa lokānāmuddhartā narmadātaṭe
सहस्र किरणों वाले निरंजन देव, जो संहारकर्ता और सृष्टिकर्ता दोनों हैं, अवतार लेकर नर्मदा के तट पर लोकों का उद्धार करते हैं —
श्लोक 4 (skanda.5.189.4)
पुरुषाकारो भगवानुताहो तपसः फलात् । कस्य गोत्रे समुत्पन्नः कस्य देवोऽभवद्वशी
puruṣākāro bhagavānutāho tapasaḥ phalāt | kasya gotre samutpannaḥ kasya devo'bhavadvaśī
क्या भगवान् मनुष्य के रूप में प्रकट हुए, अथवा तपस्या के फलस्वरूप? वे किस गोत्र में उत्पन्न हुए, तथा किसके वशीभूत होकर वे देव प्रकट हुए?
श्लोक 5 (skanda.5.189.5)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। कुलिकान्वयसम्भूतो ब्राह्मणो भक्तिमाञ्छुचिः । ईक्ष्यामीति रविं तत्र तीर्थे यात्राकृतोद्यमः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| kulikānvayasambhūto brāhmaṇo bhaktimāñchuciḥ | īkṣyāmīti raviṁ tatra tīrthe yātrākṛtodyamaḥ
श्रीमार्कण्डेय बोले — कुलिक वंश में उत्पन्न एक भक्तिमान् तथा पवित्र ब्राह्मण 'मैं सूर्य के दर्शन करूँगा' — यह संकल्प लेकर उस तीर्थ में यात्रा के लिए उद्यत हुआ।
श्लोक 6 (skanda.5.189.6)
योजनानां शतं साग्रं निराहारो गतोदकः । प्रस्थितो देवदेवेन स्वप्नान्ते वारितः किल
yojanānāṁ śataṁ sāgraṁ nirāhāro gatodakaḥ | prasthito devadevena svapnānte vāritaḥ kila
सौ योजन से भी अधिक दूरी बिना अन्न-जल ग्रहण किए तय करते हुए, जब वह देवाधिदेव की ओर चल पड़ा, तो स्वप्न के अन्त में उसे रोका गया।
श्लोक 7 (skanda.5.189.7)
भोभो मुने महासत्त्व अलं ते व्रतमीदृशम् । सर्वं व्याप्य स्थितं पश्य स्थावरं जङ्गमं च माम्
bhobho mune mahāsattva alaṁ te vratamīdṛśam | sarvaṁ vyāpya sthitaṁ paśya sthāvaraṁ jaṅgamaṁ ca mām
'हे महासत्त्व मुनि! ऐसा व्रत तुम्हारे लिए पर्याप्त है। देखो, मैं सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त होकर स्थित हूँ।'
श्लोक 8 (skanda.5.189.8)
तपाम्यहं ततो वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । न मृतं चैव मृत्युं च यः पश्यति स पश्यति
tapāmyahaṁ tato varṣaṁ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca | na mṛtaṁ caiva mṛtyuṁ ca yaḥ paśyati sa paśyati
'मैं ही तप करता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। जो मृत्यु को [जीवन के समान] और मृत्यु को [जो वस्तुतः है वैसा] देखता है, वही यथार्थ में देखता है।'
श्लोक 9 (skanda.5.189.9)
वरं वरय भद्रं त्वमात्मनो यस्तवेप्सितम्
varaṁ varaya bhadraṁ tvamātmano yastavepsitam
'हे कल्याण! जो तुम्हें अभीष्ट हो, अपने लिए वह वर माँग लो।'
श्लोक 10 (skanda.5.189.10)
ब्राह्मण उवाच। यदि तुष्टोऽसि मे देव देयो यदि वरो मम । उत्तरे नर्मदाकूले सदा संनिहितो भव
brāhmaṇa uvāca| yadi tuṣṭo'si me deva deyo yadi varo mama | uttare narmadākūle sadā saṁnihito bhava
ब्राह्मण बोला — 'हे देव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो नर्मदा के उत्तर तट पर सदा प्रतिष्ठित रहिए।'
श्लोक 11 (skanda.5.189.11)
ये भक्त्या परया देव योजनानां शते स्थिताः । स्मरिष्यन्ति जितात्मानस्तेषां त्वं वरदो भव
ye bhaktyā parayā deva yojanānāṁ śate sthitāḥ | smariṣyanti jitātmānasteṣāṁ tvaṁ varado bhava
'हे देव! जो जितात्मा भक्तजन सौ योजन की दूरी में रहकर भी परम भक्ति से आपका स्मरण करेंगे, उनके लिए आप वरदाता बनिए।'
श्लोक 12 (skanda.5.189.12)
कुब्जान्धबधिरा मूका ये केचिद्विकलेन्द्रियाः । तव पादौ नमस्यन्ति तेषां त्वं वरदो भव
kubjāndhabadhirā mūkā ye kecidvikalendriyāḥ | tava pādau namasyanti teṣāṁ tvaṁ varado bhava
'जो कुबड़े, अंधे, बहरे, गूँगे अथवा जो भी विकलांग आपके चरणों को नमस्कार करें, उनके लिए भी आप वरदाता बनिए।'
श्लोक 13 (skanda.5.189.13)
शीर्णघ्राणा गतधियो ह्यस्थिचर्मावशेषिताः । तेषां त्वं करुणां देव अचिरेण कुरुष्व ह
śīrṇaghrāṇā gatadhiyo hyasthicarmāvaśeṣitāḥ | teṣāṁ tvaṁ karuṇāṁ deva acireṇa kuruṣva ha
'जिनकी घ्राण-शक्ति क्षीण हो गई हो, जिनकी बुद्धि नष्ट हो गई हो, जो केवल हड्डी और चमड़ी मात्र शेष रह गए हों — हे देव! उन पर आप शीघ्र ही करुणा कीजिए।'
श्लोक 14 (skanda.5.189.14)
येऽपि त्वां नर्मदातोये स्नात्वा तत्र दिने दिने । अर्चयन्ति जगन्नाथ तेषां त्वं वरदो भव
ye'pi tvāṁ narmadātoye snātvā tatra dine dine | arcayanti jagannātha teṣāṁ tvaṁ varado bhava
'हे जगन्नाथ! जो भी नर्मदा के जल में स्नान करके प्रतिदिन आपकी अर्चना करते हैं, उनके लिए भी आप वरदाता बनिए।'
श्लोक 15 (skanda.5.189.15)
प्रभाते ये स्तविष्यन्ति स्तवैर्वैदिकलौकिकैः । अभिप्रेतं वरं देव तेषां त्वं दद भोच्युत
prabhāte ye staviṣyanti stavairvaidikalaukikaiḥ | abhipretaṁ varaṁ deva teṣāṁ tvaṁ dada bhocyuta
'हे देव, हे अच्युत! जो प्रातःकाल वैदिक और लौकिक स्तोत्रों से आपकी स्तुति करेंगे, उन्हें उनका अभीष्ट वर प्रदान कीजिए।'
श्लोक 16 (skanda.5.189.16)
तवाग्रे वपनं देव कारयन्ति नरा भुवि । स्वामिंस्तेषां वरो देय एष मे परमो वरः
tavāgre vapanaṁ deva kārayanti narā bhuvi | svāmiṁsteṣāṁ varo deya eṣa me paramo varaḥ
'हे स्वामिन्! जो मनुष्य इस पृथ्वी पर आपके समक्ष मुण्डन-संस्कार करवाते हैं, उन्हें भी वर प्रदान कीजिए — यही मेरा सर्वोत्तम वर है।'
श्लोक 17 (skanda.5.189.17)
एवमस्त्विति तं चोक्त्वा मुनिं करुणया पुनः । शतभागेन राजेन्द्र स्थित्वा चादर्शनं गतः
evamastviti taṁ coktvā muniṁ karuṇayā punaḥ | śatabhāgena rājendra sthitvā cādarśanaṁ gataḥ
हे राजेन्द्र! 'तथास्तु' कहकर तथा उस मुनि पर करुणा करके, वे देव सौवें भाग [मात्र प्रकाश] रूप में वहाँ स्थित होकर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 18 (skanda.5.189.18)
तत्र तीर्थे नरो भक्त्या गत्वा स्नानं समाचरेत् । तर्पयेत्पितृदेवांश्च सोऽग्निष्टोमफलं लभेत्
tatra tīrthe naro bhaktyā gatvā snānaṁ samācaret | tarpayetpitṛdevāṁśca so'gniṣṭomaphalaṁ labhet
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उस तीर्थ में जाकर स्नान करता है और पितरों तथा देवताओं का तर्पण करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 19 (skanda.5.189.19)
अग्निप्रवेशं यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप । द्योतयन्वै दिशः सर्वा अग्निलोकं स गच्छति
agnipraveśaṁ yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa | dyotayanvai diśaḥ sarvā agnilokaṁ sa gacchati
हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अग्नि-प्रवेश करता है, वह समस्त दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ अग्निलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 20 (skanda.5.189.20)
यस्तत्तीर्थं समासाद्य त्यजतीह कलेवरम् । स गतो वारुणं लोकमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत्
yastattīrthaṁ samāsādya tyajatīha kalevaram | sa gato vāruṇaṁ lokamityevaṁ śaṅkaro'bravīt
जो मनुष्य उस तीर्थ को पाकर अपना शरीर त्याग देता है, वह वरुणलोक को प्राप्त होता है — ऐसा शंकर ने कहा था।
श्लोक 21 (skanda.5.189.21)
तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्संन्यासेन तनुं त्यजेत् । षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते
tatra tīrthe tu yaḥ kaścitsaṁnyāsena tanuṁ tyajet | ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate
उस तीर्थ में जो कोई संन्यासपूर्वक शरीर त्यागता है, वह साठ हज़ार वर्षों तक स्वर्गलोक में महिमामंडित होता है।
श्लोक 22 (skanda.5.189.22)
अप्सरोगणसंकीर्णे दिव्यशब्दानुनादिते । उषित्वायाति मर्त्ये वै वेदवेदाङ्गविद्भवेत्
apsarogaṇasaṁkīrṇe divyaśabdānunādite | uṣitvāyāti martye vai vedavedāṅgavidbhavet
अप्सराओं के समूहों से भरे तथा दिव्य ध्वनियों से गूँजते उस लोक में निवास करके, वह पुनः मृत्युलोक में आकर वेद-वेदांगों का ज्ञाता बनता है।
श्लोक 23 (skanda.5.189.23)
व्याधिशोकविनिर्मुक्तो धनकोटिपतिर्भवेत् । पुत्रदारसमोपेतो जीवेच्च शरदः शतम्
vyādhiśokavinirmukto dhanakoṭipatirbhavet | putradārasamopeto jīvecca śaradaḥ śatam
वह व्याधि और शोक से मुक्त होकर करोड़ों की सम्पत्ति का स्वामी बनता है, पुत्र-पत्नी से सम्पन्न होकर सौ वर्षों तक जीवित रहता है।
श्लोक 24 (skanda.5.189.24)
प्रातरुत्थाय यस्तत्र स्मरते भास्करं तदा । आजन्मजनितात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
prātarutthāya yastatra smarate bhāskaraṁ tadā | ājanmajanitātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर वहाँ भास्कर (सूर्य) का स्मरण करता है, वह जन्मभर के संचित पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें कोई सन्देह नहीं है।