अवन्ती खण्ड · अध्याय 19
हरसिद्धिमाहात्म्य-वर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.5.19.1)
सनत्कुमार उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि हरसिद्धिं सुसिद्धिदाम् । पार्वत्या हरणे यत्र सिद्धिः प्राप्ता हरेण च
sanatkumāra uvāca athātaḥ saṁpravakṣyāmi harasiddhiṁ susiddhidām pārvatyā haraṇe yatra siddhiḥ prāptā hareṇa ca
सनत्कुमार ने कहा -- अब मैं परम सिद्धि प्रदान करने वाली हरसिद्धि (देवी) का वर्णन करता हूँ, जहाँ पार्वती के द्वारा (दैत्यों के) संहार में स्वयं हर (शिव) को भी सिद्धि प्राप्त हुई थी।
श्लोक 2 (skanda.5.19.2)
बलिनौ दानवौ जातौ नाम्ना चण्डप्रचंडकौ । उत्खाय त्रिदिवं सर्वं गिरिं कैलासमागतौ
balinau dānavau jātau nāmnā caṇḍapracaṁḍakau utkhāya tridivaṁ sarvaṁ giriṁ kailāsamāgatau
चण्ड और प्रचण्डक नामक दो बलशाली दानव उत्पन्न हुए, जिन्होंने समस्त त्रिलोक को उखाड़कर कैलास पर्वत पर आक्रमण किया।
श्लोक 3 (skanda.5.19.3)
दृष्ट्वा तत्र गिरीशं तु उद्यताक्षाक्षहस्तकम् । नागेशं शशिखट्वांगं गृहीत्वा दक्षिणे करे
dṛṣṭvā tatra girīśaṁ tu udyatākṣākṣahastakam nāgeśaṁ śaśikhaṭvāṁgaṁ gṛhītvā dakṣiṇe kare
वहाँ उन्होंने गिरीश (शिव) को देखा, जिनका हाथ जपमाला लिए उठा हुआ था और जिन्होंने अपने दाहिने हाथ में नागराज और चन्द्रशोभित खट्वांग धारण कर रखा था।
श्लोक 4 (skanda.5.19.4)
देविदेवीति जल्पंतं दासस्तेऽस्मीति वादिनम् । यावदेकं तु फलकं तावद्द्यूतं प्रवर्तताम्
devidevīti jalpaṁtaṁ dāsaste'smīti vādinam yāvadekaṁ tu phalakaṁ tāvaddyūtaṁ pravartatām
वे 'हे देवी! हे देवी!' कहते हुए, 'मैं आपका दास हूँ' यह कहते हुए, एक ही पासे की चाल भर चलने वाला द्यूत-क्रीड़ा खेल रहे थे।
श्लोक 5 (skanda.5.19.5)
रागीभूते तदा देवे तौ प्राप्तौ देवकंटकौ । उत्सादिताः शिवगणा नंदिना प्रतिषेधितौ
rāgībhūte tadā deve tau prāptau devakaṁṭakau utsāditāḥ śivagaṇā naṁdinā pratiṣedhitau
जब देव इस प्रकार खेल में तल्लीन थे, तभी देवताओं के लिए कंटकस्वरूप वे दोनों दानव वहाँ आ पहुँचे; शिवगणों को तितर-बितर कर दिया गया, परन्तु नन्दी ने उन दोनों को रोका।
श्लोक 6 (skanda.5.19.6)
ततस्ताभ्यां तदा नंदी शूलाभ्यां प्रविदारितः । समं सव्यदक्षिणं वै सुस्राव रुधिरं बहु
tatastābhyāṁ tadā naṁdī śūlābhyāṁ pravidāritaḥ samaṁ savyadakṣiṇaṁ vai susrāva rudhiraṁ bahu
तब उन दोनों ने अपने त्रिशूलों से नन्दी को बींध दिया; उनके बाएँ और दाहिने दोनों ओर से समान रूप से प्रचुर रक्त बहने लगा।
श्लोक 7 (skanda.5.19.7)
नंदिनं ताडितं दृष्ट्वा तदा शिलादनंदनम् । ध्याता हरेण सा देवी प्रणता साऽग्रतः स्थिता
naṁdinaṁ tāḍitaṁ dṛṣṭvā tadā śilādanaṁdanam dhyātā hareṇa sā devī praṇatā sā'grataḥ sthitā
शिलाद-नन्दन नन्दी को इस प्रकार आहत देखकर, हर के ध्यान की अधिष्ठात्री वह देवी नतमस्तक होकर उनके समक्ष खड़ी हो गईं।
श्लोक 8 (skanda.5.19.8)
वध्यतां तौ महादैत्यौ वधामीति वचोऽब्रवीत् । गृहीत्वा मुद्गरं घोरमतिक्रोधादताडयत्
vadhyatāṁ tau mahādaityau vadhāmīti vaco'bravīt gṛhītvā mudgaraṁ ghoramatikrodhādatāḍayat
उन्होंने कहा -- 'उन दोनों महादैत्यों का वध होना चाहिए, मैं ही उनका वध करती हूँ' -- ऐसा कहकर उन्होंने एक भयंकर मुद्गर उठाया और अत्यन्त क्रोध में उन्हें प्रहार किया।
श्लोक 9 (skanda.5.19.9)
यदा तया हतौ दृष्टौ दानवौ बलगवितौ । हरस्तामाह हे चंडि संहृतौ दुष्टदानवौ
yadā tayā hatau dṛṣṭau dānavau balagavitau harastāmāha he caṁḍi saṁhṛtau duṣṭadānavau
जब बल के मद में चूर वे दोनों दानव उनके द्वारा मारे गए देखे गए, तब हर ने उनसे कहा -- 'हे चण्डि! दुष्ट दानव संहृत हो गए।'
श्लोक 10 (skanda.5.19.10)
हरसिद्धिरतो लोके नाम्ना ख्यातिं गमिष्यसि । ततः प्रभृति सा देवी हरसिद्धि प्रदायिनी । हरसिद्धिरिति ख्याता महाकाले बभूव ह
harasiddhirato loke nāmnā khyātiṁ gamiṣyasi tataḥ prabhṛti sā devī harasiddhi pradāyinī harasiddhiriti khyātā mahākāle babhūva ha
'अब से संसार में तुम हरसिद्धि नाम से विख्यात होगी।' तभी से वह देवी, हर को सिद्धि प्रदान करने वाली, महाकाल में हरसिद्धि नाम से विख्यात हुईं।
श्लोक 11 (skanda.5.19.11)
यः पश्येत्परया भक्त्या हरसिद्धिं नरोत्तमः । सोऽक्षयाँल्लभते कामान्मृतः शिवपुरं व्रजेत्
yaḥ paśyetparayā bhaktyā harasiddhiṁ narottamaḥ so'kṣayā~llabhate kāmānmṛtaḥ śivapuraṁ vrajet
जो श्रेष्ठ पुरुष परम भक्ति से हरसिद्धि का दर्शन करता है, वह अक्षय कामनाओं को प्राप्त करता है और मरणोपरान्त शिवपुर को जाता है।
श्लोक 12 (skanda.5.19.12)
आदिसिद्धिं महादेवीं नित्यां व्योमस्वरूपिणीम् । हरसिद्धिं प्रपश्येद्यः सोऽभीष्टं लभते फलम्
ādisiddhiṁ mahādevīṁ nityāṁ vyomasvarūpiṇīm harasiddhiṁ prapaśyedyaḥ so'bhīṣṭaṁ labhate phalam
जो आदिसिद्धिस्वरूपा, महादेवी, नित्य, आकाशस्वरूपा हरसिद्धि का दर्शन करता है, वह अभीष्ट फल प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.5.19.13)
यः स्मरेद्धरसिद्धीति मंत्रं च चतुरक्षरम् । न वैरिणो भयं तस्य दारिद्र्यं नैव जायते
yaḥ smareddharasiddhīti maṁtraṁ ca caturakṣaram na vairiṇo bhayaṁ tasya dāridryaṁ naiva jāyate
जो 'हरसिद्धि' इस चतुरक्षर मन्त्र का स्मरण करता है, उसे शत्रु का भय नहीं रहता और उसे दरिद्रता कभी प्राप्त नहीं होती।
श्लोक 14 (skanda.5.19.14)
नरो महानवम्यां यो हरसिद्धिं प्रपूजयेत् । महिषं च बलिं दद्यात्स भवेद्भूपतिर्भुवि
naro mahānavamyāṁ yo harasiddhiṁ prapūjayet mahiṣaṁ ca baliṁ dadyātsa bhavedbhūpatirbhuvi
जो मनुष्य महानवमी को हरसिद्धि की पूजा करता है और महिष की बलि देता है, वह पृथ्वी पर राजा होता है।
श्लोक 15 (skanda.5.19.15)
नवम्यां पूजिता देवी हरसिद्धिर्हरप्रिया । तुष्टा नृणां सदा व्यास ददात्यनवमं फलम्
navamyāṁ pūjitā devī harasiddhirharapriyā tuṣṭā nṛṇāṁ sadā vyāsa dadātyanavamaṁ phalam
हे व्यास! नवमी को पूजित हरप्रिया देवी हरसिद्धि सदा प्रसन्न होकर मनुष्यों को अक्षय फल प्रदान करती हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.19.16)
सा पुण्या सा पवित्रा च सर्वत्र सुखदायिनी । स्मृता संपूजिता दृष्टा धनपुत्रसुखप्रदा
sā puṇyā sā pavitrā ca sarvatra sukhadāyinī smṛtā saṁpūjitā dṛṣṭā dhanaputrasukhapradā
वह पुण्यरूपा और पवित्र हैं, सर्वत्र सुख देने वाली हैं; स्मरण करने, पूजने अथवा दर्शन करने मात्र से वे धन, पुत्र और सुख प्रदान करती हैं।
श्लोक 17 (skanda.5.19.17)
महानवम्यां ये व्यास हन्यंते महिषादयः । सर्वे ते स्वर्गतिं यांति घ्नतां पापं न विद्यते
mahānavamyāṁ ye vyāsa hanyaṁte mahiṣādayaḥ sarve te svargatiṁ yāṁti ghnatāṁ pāpaṁ na vidyate
हे व्यास! महानवमी के दिन जो भी महिष आदि पशु मारे जाते हैं, वे सभी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं और मारने वालों को कोई पाप नहीं लगता।