Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 20

चतुर्दशतीर्थयात्रा-वर्णनम्

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (skanda.5.20.1)

सनत्कुमार उवाच । मासमेकं नरो भक्त्या पश्येद्वा वटयक्षिणीम् । पूजयेत्स्वर्णपुष्पैश्च तस्य सिद्धिर्न हीयते

sanatkumāra uvāca māsamekaṁ naro bhaktyā paśyedvā vaṭayakṣiṇīm pūjayetsvarṇapuṣpaiśca tasya siddhirna hīyate

सनत्कुमार ने कहा -- जो मनुष्य एक मास तक भक्तिपूर्वक वटयक्षिणी का दर्शन करता है अथवा उन्हें स्वर्ण-पुष्पों से पूजता है, उसकी सिद्धि कभी क्षीण नहीं होती।

श्लोक 2 (skanda.5.20.2)

इति वटयक्षिणीमाहात्म्यम् । पिशाचके नरः स्नात्वा चतुर्दश्यां विशेषतः । तिलान्ददाति यो भक्त्या न पिशाचः प्रजायते

iti vaṭayakṣiṇīmāhātmyam piśācake naraḥ snātvā caturdaśyāṁ viśeṣataḥ tilāndadāti yo bhaktyā na piśācaḥ prajāyate

इस प्रकार वटयक्षिणी का माहात्म्य वर्णित हुआ। जो मनुष्य विशेषतः चतुर्दशी को पिशाचक में स्नान कर भक्तिपूर्वक तिल का दान करता है, वह पिशाच योनि में उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 3 (skanda.5.20.3)

यं समुद्दिश्य यद्दत्तं तदक्षयतरं भवेत् । तत्कुलं हि पिशाचत्वान्मुच्यते नात्र संशयः

yaṁ samuddiśya yaddattaṁ tadakṣayataraṁ bhavet tatkulaṁ hi piśācatvānmucyate nātra saṁśayaḥ

जिसका उद्देश्य रखकर जो कुछ दान किया जाता है, वह अत्यन्त अक्षय हो जाता है; उसका कुल पिशाचत्व से अवश्य मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 4 (skanda.5.20.4)

यस्य नाम्ना नरः स्नाति पिशाचत्वात्स मुच्यते । कुंभान्वा करकान्वापि योऽत्र दद्यात्समंडकान्

yasya nāmnā naraḥ snāti piśācatvātsa mucyate kuṁbhānvā karakānvāpi yo'tra dadyātsamaṁḍakān

जिसके नाम से मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह पिशाचत्व से मुक्त हो जाता है; और जो वहाँ कुम्भ अथवा घड़े मण्डकों (पूड़ी-मिष्टान्न) के साथ दान करता है --

श्लोक 5 (skanda.5.20.5)

तस्य वै शाश्वती मुक्तिः कुले प्रेतो न जायते । शिप्रागुंफेश्वरं दृष्ट्वा रुद्रभक्तो जितेंद्रियः

tasya vai śāśvatī muktiḥ kule preto na jāyate śiprāguṁpheśvaraṁ dṛṣṭvā rudrabhakto jiteṁdriyaḥ

-- उसे शाश्वत मुक्ति प्राप्त होती है, उसके कुल में कोई प्रेत उत्पन्न नहीं होता। शिप्रा-गुम्फेश्वर का दर्शन कर, इन्द्रियजयी रुद्रभक्त --

श्लोक 6 (skanda.5.20.6)

मुच्यते सर्वपापेभ्यः कंचुकेन फणी यथा । स्नात्वागस्त्येश्वरं पश्येद्योऽतिभक्त्या च मानवः

mucyate sarvapāpebhyaḥ kaṁcukena phaṇī yathā snātvāgastyeśvaraṁ paśyedyo'tibhaktyā ca mānavaḥ

-- सर्वपापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है, जैसे सर्प अपनी केंचुली त्याग देता है। जो मनुष्य अत्यन्त भक्ति से स्नान कर अगस्त्येश्वर का दर्शन करता है --

श्लोक 7 (skanda.5.20.7)

त्यक्त्वा यमगृहं व्यास रुद्रलोकं स गच्छति । शिप्रायां यो नरः स्नात्वा पश्येड्ढुंढेश्वरं शिवम्

tyaktvā yamagṛhaṁ vyāsa rudralokaṁ sa gacchati śiprāyāṁ yo naraḥ snātvā paśyeḍḍhuṁḍheśvaraṁ śivam

-- हे व्यास! वह यमलोक को त्यागकर रुद्रलोक को जाता है। जो मनुष्य शिप्रा में स्नान कर ढुण्ढेश्वर शिव का दर्शन करता है --

श्लोक 8 (skanda.5.20.8)

सोऽश्वमेधफलं व्यास लभते नात्र संशयः । देवेनात्र पुरा व्यास वादितो डमरुर्यतः

so'śvamedhaphalaṁ vyāsa labhate nātra saṁśayaḥ devenātra purā vyāsa vādito ḍamaruryataḥ

-- हे व्यास! वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है, इसमें संशय नहीं। हे व्यास! यहाँ पूर्वकाल में देव ने डमरू बजाया था, इसीलिए --

श्लोक 9 (skanda.5.20.9)

देवस्तेन समाख्यातो नाम्ना डमरुकेश्वरः । भक्त्या पश्येन्नरो यस्तु देवं डमरुकेश्वरम्

devastena samākhyāto nāmnā ḍamarukeśvaraḥ bhaktyā paśyennaro yastu devaṁ ḍamarukeśvaram

-- वह देव 'डमरुकेश्वर' नाम से विख्यात हुए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देव डमरुकेश्वर का दर्शन करता है --

श्लोक 10 (skanda.5.20.10)

नैव व्याधिभयं तस्य मृतः शिवपुरं व्रजेत् । अनादिकल्पेश्वरं यस्तु भक्त्या पश्यति मानवः

naiva vyādhibhayaṁ tasya mṛtaḥ śivapuraṁ vrajet anādikalpeśvaraṁ yastu bhaktyā paśyati mānavaḥ

-- उसे रोग का भय कभी नहीं होता, और मरने पर वह शिवपुर को जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अनादिकल्पेश्वर का दर्शन करता है --

श्लोक 11 (skanda.5.20.11)

राज्यं स लभते स्वर्गं यथा देवः पुरंदरः । देवानामप्यसौ व्यास स्पर्धनीयः सदा भवेत्

rājyaṁ sa labhate svargaṁ yathā devaḥ puraṁdaraḥ devānāmapyasau vyāsa spardhanīyaḥ sadā bhavet

-- वह इन्द्र देव के समान स्वर्ग का राज्य पाता है। हे व्यास! वह देवताओं के लिए भी सदा स्पृहणीय बन जाता है।

श्लोक 12 (skanda.5.20.12)

कल्पकोटिशतं साग्रं भोगयुक्तस्तु मोदते । पश्येत्सिद्धेश्वरं यस्तु वीरभद्रं च चंडिकाम्

kalpakoṭiśataṁ sāgraṁ bhogayuktastu modate paśyetsiddheśvaraṁ yastu vīrabhadraṁ ca caṁḍikām

वह सौ करोड़ से भी अधिक कल्पों तक भोगों से युक्त होकर आनन्दित रहता है। और जो सिद्धेश्वर, वीरभद्र तथा चण्डिका का दर्शन करता है --

श्लोक 13 (skanda.5.20.13)

सोत्रैव लभते सिद्धिं जयं सर्वत्र मानवः । स्वर्णजालेश्वरं दृष्ट्वा स्नातस्तीर्थे त्रिविष्टपे

sotraiva labhate siddhiṁ jayaṁ sarvatra mānavaḥ svarṇajāleśvaraṁ dṛṣṭvā snātastīrthe triviṣṭape

-- वह मनुष्य यहीं सिद्धि और सर्वत्र विजय प्राप्त करता है। त्रिविष्टप तीर्थ में स्नान कर स्वर्णजालेश्वर का दर्शन कर --

श्लोक 14 (skanda.5.20.14)

स्वर्णेन पूजयेद्देवं सर्वपापैः प्रमुच्यते । स्नात्वा पश्येन्नरो भक्त्या यः कर्कोटेश्वरं शिवम्

svarṇena pūjayeddevaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate snātvā paśyennaro bhaktyā yaḥ karkoṭeśvaraṁ śivam

-- स्वर्ण से देव की पूजा करनी चाहिए, इससे सर्वपापों से मुक्ति मिलती है। जो मनुष्य स्नान कर भक्तिपूर्वक कर्कोटेश्वर शिव का दर्शन करता है --

श्लोक 15 (skanda.5.20.15)

सर्पतो न भयं तस्य दारिद्यं नैव जायते । यः पश्येत्परया भक्त्या महामायां सनातनीम्

sarpato na bhayaṁ tasya dāridyaṁ naiva jāyate yaḥ paśyetparayā bhaktyā mahāmāyāṁ sanātanīm

-- उसे सर्प से भय नहीं होता और उसे दरिद्रता कभी प्राप्त नहीं होती। जो मनुष्य परम भक्ति से सनातनी महामाया का दर्शन करता है --

श्लोक 16 (skanda.5.20.16)

विष्णुमायाविनिर्मुक्तः स याति परमं पदम् । अर्चयेत्परया भक्त्या यः कपालेश्वरं नरः

viṣṇumāyāvinirmuktaḥ sa yāti paramaṁ padam arcayetparayā bhaktyā yaḥ kapāleśvaraṁ naraḥ

-- वह विष्णु की माया से मुक्त होकर परमपद को प्राप्त करता है। जो मनुष्य परम भक्ति से कपालेश्वर का पूजन करता है --

श्लोक 17 (skanda.5.20.17)

स मुच्येत महापापैर्यद्यपि ब्रह्महा भवेत् । स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं च भैरवम्

sa mucyeta mahāpāpairyadyapi brahmahā bhavet svargadvāre naraḥ snātvā dṛṣṭvā devaṁ ca bhairavam

-- वह ब्रह्महत्यारा होने पर भी महापापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य स्वर्गद्वार में स्नान कर भैरव देव का दर्शन करता है --

श्लोक 18 (skanda.5.20.18)

दर्शनात्तस्य देवस्य शतयज्ञफलं भवेत्

darśanāttasya devasya śatayajñaphalaṁ bhavet

-- उस देव के दर्शनमात्र से उसे सौ यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21